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भए कुमार जबहिं सब भ्राता।
दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥
गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई।
अलप काल बिद्या सब आई॥
भावार्थ:-ज्यों ही सब भाई कुमारावस्था के हुए, त्यों ही गुरु, पिता और माता ने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। श्री रघुनाथजी (भाइयों सहित) गुरु के घर में विद्या पढ़ने गए और थोड़े ही समय में उनको सब विद्याएँ आ गईं॥
जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। ‘उपनयन’ का अर्थ है, ‘पास या सन्निकट ले जाना।’ किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म।

क्यों पहनते हैं जनेऊ?

हिन्दू धर्म के सोलह संस्कारों में से एक ‘उपनयन संस्कार’ के अंतर्गत ही जनेऊ पहना जाता है जिसे ‘यज्ञोपवीत संस्कार’ भी कहा जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। प्राचीनकाल में पहले शिष्य, संत और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। इस दीक्षा देने के तरीके में से एक जनेऊ धारण करना भी होता था। प्राचीनकाल में गुरुकुल में दीक्षा लेने या संन्यस्त होने के पूर्व यह संकार होता था।
यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध भी कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक होता है।

जनेऊ पहने का धार्मिक और सामाजिक ओर धार्मिक महत्व

जनेऊ का धार्मिक महत्व: यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है। जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है। धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि जनेऊ धारण करने से शरीर शुद्घ और पवित्र होता है। शास्त्रों अनुसार आदित्य, वसु, रुद्र, वायु, अग्नि, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में माना गया है। अत: उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। आचमन अर्थात मंदिर आदि में जाने से पूर्व या पूजा करने के पूर्व जल से पवित्र होने की क्रिया को आचमन कहते हैं। इस्लाम धर्म में इसे वजू कहते हैं।

जनेऊ का सामाजिक महत्व:  आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है। धारण करने के बाद उसे बताया जाता है कि उसे दो लोगों का भार या जिम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का।

एक-एक जनेऊ में 9-9 धागे होते हैं जो हमें बताते हैं कि हम पर पत्नी और पत्नी पक्ष के 9-9 ग्रहों का भार है उसे वहन करना है। अब इन 9-9 धागों के अंदर से 1-1 धागे निकालकर देखें तो इसमें 27-27 धागे होते हैं। अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के 27-27 नक्षत्रों का भी भार वहन करना है। अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो 27+9 = 36 होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर 36= 3+6 = 9 आता है, जो एक पूर्ण अंक है।
अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 2 और जोड़ दें तो 9+2= 11 होगा जो हमें बताता है की हमारा जीवन अकेले अकेले दो लोगों अर्थात् पति और पत्नी (1 और 1) के मिलने से बना है। 1+1 = 2 होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है। जब हम अपने दोनों पक्षों का ऋण वहन कर लेते हैं तो हमें अशीम शांति की प्राप्ति हो जाती है।

यज्ञोपवीत धारण करने के नियम

यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता। मैला होने पर उतारने के बाद तुरंत ही दूसरा जनेऊ धारण करना पड़ता है।

लड़की भी पहन सकती है जनेऊ : वह लड़की जिसे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।

कब पहने जनेऊ :जिस दिन गर्भ धारण किया हो उसके आठवें वर्ष में बालक का उपनयन संस्कार किया जाता है। जनेऊ पहनने के बाद ही विद्यारंभ होता है, लेकिन आजकल गुरु परंपरा के समाप्त होने के बाद अधिकतर लोग जनेऊ नहीं पहनते हैं तो उनको विवाह के पूर्व जनेऊ पहनाई जाती है। लेकिन वह सिर्फ रस्म अदायिगी से ज्यादा कुछ नहीं, क्योंकि वे जनेऊ का महत्व नहीं समझते हैं।

।।यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत।।

अर्थात: अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है। हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके ही इसे उतारें।
इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।

यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।

जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी यज्ञोपवीत संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।

यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।

देव प्रतिमा की मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।

यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।
आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

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विष्णु जी क्यों धारण करते है सुदर्शन चक्र, शंख, गदा और कमल? https://astrodeeva.com/why-does-lord-vishnu-wear-sudarshan-chakra-conch/ https://astrodeeva.com/why-does-lord-vishnu-wear-sudarshan-chakra-conch/#respond Sun, 28 Jan 2024 02:34:01 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3815 विष्णु पुराण के अनुसार, विष्णु जी सृष्टि के पालनहार हैं और वे क्षीर सागर में वासुकि नाग पर विराजते हैं। भगवान विष्णु की चार भुजाएं हैं जिनमें से एक हाथ में सुदर्शन चक्र, दूसरे में शंख, तीसरे में गदा और चौथी भुजा में पद्म(कमल) है। लेकिन क्या आपको पता है ये चीजें भगवान विष्णु के […]

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विष्णु पुराण के अनुसार, विष्णु जी सृष्टि के पालनहार हैं और वे क्षीर सागर में वासुकि नाग पर विराजते हैं। भगवान विष्णु की चार भुजाएं हैं जिनमें से एक हाथ में सुदर्शन चक्र, दूसरे में शंख, तीसरे में गदा और चौथी भुजा में पद्म(कमल) है। लेकिन क्या आपको पता है ये चीजें भगवान विष्णु के हाथों में होना मात्र एक आकृति या पहचना के लिये नहीं है। बल्कि भगवान विष्णु ने अपने हाथों में जो चीजें धारण की हैं, उनके पीछे का बहुत अधिक महत्व है।

आइए जानते हैं विष्णु जी द्वारा धारण की वस्तुओं का क्या है महत्व….

सुदर्शन चक्र का महत्व

भगवान विष्णु के एक हाथ में सुदर्शन चक्र दिखाई देता है। सुदर्शन चक्र वास्तव में इस बात का प्रतीक होता है कि व्यक्ति को अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ निश्चयी होना चाहिये। यह इस बात को भी समझाता है कि अपने लक्ष्य को भेदने की शक्ति और दूरदर्शिता के प्रति हमेशा एकाग्र रहें। सुदर्शन चक्र को भगवान विष्णु का अमोघ अस्त्र भी कहा जाता है।

शंख का महत्व

भगवान विष्णु का दूसरा शस्त्र है शंख, शंख की ध्वनि में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसके साथ ही यह भी कहना है कि शंख की ध्वनि व्यक्ति के जीवन में नकारात्मकता कम करती है और सकारात्मकता बढ़ाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से शंख से निकलने वाली ध्वनि हमारी अंतरात्मा और चेतना जागृत होती है।

गदा का महत्व

गदा भगवान विष्णु के एक हाथ में रखते हैं और शक्ति प्रदान करते हैं। यह गदा होने का मतलब दुष्टों को डराने से है। दुष्टों को डराने का कार्य इस गदा से किया जाता है। जबकि अच्छे विचारवान लोगों के लिये यह रक्षा का प्रतीक है। भगवान विष्णु के हाथ में गदा ईश्वर की न्याय प्रणाली को दर्शाता है।

पद्म का महत्व

पद्म का अर्थ कमल के फूल से है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कमल का फूल मन में एकाग्रता और सत्यता का प्रतीक माना जाता है। कमल का फूल मानव जीवन को बहुत बड़ी सीख देता है, जिस प्रकार कमल का फूल कीचड़ में रहकर भी खुद को साफ, सुंदर बनाकर रखता है। उसी तरह मानव को भी इस संसार रुपी माया में रहते हुये खुद को पवित्रात्मा और दोषरहित बनाकर रखना चाहिए।

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शाकंभरी जयंती: इस वर्ष 2024 में कब मनाई जाएगी? https://astrodeeva.com/when-will-shakambhari-jayanti-be-celebrated-in-this-year-2024/ https://astrodeeva.com/when-will-shakambhari-jayanti-be-celebrated-in-this-year-2024/#respond Tue, 23 Jan 2024 04:41:48 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3811 शाकंभरी पूर्णिमा को शाकंभरी जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, शाकंभरी नवरात्रि अष्टमी तिथि के दिन शुरू होती है और पौष माह की पूर्णिमा तिथि के दिन समाप्त होती है। इस त्यौहार को आठ दिनों तक मनाया जाता है और शाकंभरी पूर्णिमा को शाकंभरी नवरात्रि का समापन होता है। […]

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शाकंभरी पूर्णिमा को शाकंभरी जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, शाकंभरी नवरात्रि अष्टमी तिथि के दिन शुरू होती है और पौष माह की पूर्णिमा तिथि के दिन समाप्त होती है। इस त्यौहार को आठ दिनों तक मनाया जाता है और शाकंभरी पूर्णिमा को शाकंभरी नवरात्रि का समापन होता है।

कौन हैं देवी शाकंभरी ?

देवी शाकंभरी देवी भगवती का अवतार हैं। इन्हें ‘हरियाली का प्रतीक’ भी कहा जाता है। शास्त्रों और हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, सभी शाकाहारी खाद्य उत्पादों को देवी शाकंभरी  का प्रसाद या पवित्र प्रसाद माना जाता है।

शाकंभरी माता की कथा

हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ, देवी भागवतम के अनुसार, एक बार दुर्गम नाम का एक दानव था, जिसने अत्यधिक कष्टों और तपस्या से सभी चारों वेदों का अधिग्रहण कर लिया। उसने यह भी वरदान प्राप्त किया कि देवताओं को की जाने वाली सभी पूजाएँ और प्रार्थनाएँ उसके पास पहुँचेगी और इस तरह वह दुर्गम अविनाशी बन गया।

ऐसी शक्तियों को प्राप्त करने के बाद, उसने सभी को परेशान करना शुरू कर दिया जिसके परिणामस्वरूप धर्म का नुकसान हुआ और इसके कारण सैकड़ों वर्षों तक बारिश भी नहीं हुई, जिससे गंभीर अकाल की स्थिति पैदा हो गई। इससे निवारण पाने के लिए सभी साधु, ऋषि मुनि हिमालय की गुफाओं में चले गए और उन्होनें देवी माँ से मदद पाने के लिए निरंतर यज्ञ और तप किया। उनके कष्टों और संकटों को सुनकर, देवी ने शाकंभरी  को अनाज, फल, जड़ी-बूटियाँ, दालें, सब्जियाँ, और साग-भाजी के रूप में अवतरित किया।

शाक शब्द का अर्थ सब्जियों से है और इस प्रकार देवी, शाकंभरी के नाम से प्रसिद्ध हुई। लोगों की दुर्दशा को देखकर देवी शाकंभरी की आंखों से 9 दिन और 9 रातों तक लगातार आँसू बहते रहे। अतः, उनके आँसू एक नदी में बदल गए और अकाल की स्थिति का अंत हो गया।

देवी ने मनुष्यों और ऋषियों को राक्षस दुर्गम की क्रूरता से बचाने के लिए उसके खिलाफ भी युद्ध किया। देवी शाकंभरी  ने अपने अंदर 10 शक्तियों को प्रकट किया और अपनी सभी शक्तियों के साथ दुर्गम का वध कर  चारों वेद ऋषियों को वापस कर दिए। चूंकि देवी ने राक्षस दुर्गम को मारा था, अतः उन्हें दुर्गा नाम भी दिया गया। उस समय से भक्त शाकंभरी पूर्णिमा का व्रत रखते हैं और देवी का आशीर्वाद पाने के लिए और अपने घरों में खुशहाली की कामना करते हैं।

शाकंभरी जयंती का महत्व क्या है?

शाकंभरी पूर्णिमा का बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि यह शाकंभरी देवी की जयंती भी है। भारत में विभिन्न स्थानों पर, इस दिन को पौष पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है जिसे हिंदू कैलेंडर के अनुसार एक अत्यधिक महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस्कॉन के अनुयायी या वैष्णव सम्प्रदाय इस दिन की शुरुआत पुष्य अभिषेक यात्रा से करते हैं क्योंकि यह माघ की शुरुआत भी है जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार धार्मिक मितव्ययिता का महीना है। यदि लोग इस विशेष दिन पर पवित्र स्नान करते हैं तो उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है और साथ ही वे शाकंभरी  पूर्णिमा के दिन दान करके भी अत्यधिक गुण प्राप्त कर सकते हैं।

शाकंभरी जयंती 2024

दिनांक : 25 जनवरी 2024
वार: बृहस्पतिवार
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ  : 24 जनवरी 2024 को 09:49 पी एम बजे से
पूर्णिमा तिथि समाप्त : 25 जनवरी 2024 को 11:23 पी ए बजे तक

शाकंभरी जयंती पर क्या करें?

देवी शाकंभरी  को देवी दुर्गा का सौम्य रूप माना जाता है जो अत्यंत दयालु, कृपालु और स्नेही हैं। इस दिन, लोगों को शाकंभरी  देवी की पूजा और प्रार्थना करनी चाहिए, दान करना चाहिए, उपहार देने चाहिए, व्रत करना चाहिए, तीर्थ यात्रा करनी चाहिए, पवित्र स्नान करना चाहिए और देवी का दिव्य आशीर्वाद पाने के लिए अच्छे कर्म करने चाहिए।

माँ शाकंभरी की पूजा विधि

  • भक्तों को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर, पवित्र स्नान करना चाहिए और फिर देवी शाकंभरी  की मूर्ति को श्रद्धांजलि अर्पित करनी चाहिए।
  • भक्तों को बाणशंकरी प्रतः स्मरण मंत्र का जाप करना चाहिए।
  • देवी शाकंभरी  की मूर्ति या तस्वीर को फल और मौसमी सब्जियों से सजाना चाहिए।
  • भक्तों को देवी शाकंभरी  के मंदिर जाना चाहिए।
  • देवी को पवित्र भोजन (प्रसादम) अर्पित करना चाहिए।
  • परिवार के सभी सदस्यों के साथ मिलकर आरती की जानी चाहिए।
  • सभी भक्तों को पवित्र भोजन वितरित किया जाना चाहिए।
  • व्रत रखने वाले व्यक्ति को शाकंभरी  कथा अवश्य पढ़नी चाहिए।

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गणेश जी को ठगा एक बुढ़िया ने, जाने कैसे…. https://astrodeeva.com/an-old-lady-cheated-ganesh-ji-dont-know-how/ https://astrodeeva.com/an-old-lady-cheated-ganesh-ji-dont-know-how/#respond Wed, 17 Jan 2024 01:42:02 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3799 गणेश जी को रिद्धि-सिद्धि के देवता है।गणेश जी विघ्न हारता व शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता हैं। अगर कोई भक्त उनकी सच्चे मन से वंदना करता है, तो लंबोदर तुरंत प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद प्रदान करते हैं।  वैसे भी गणेश जी जिस स्थान पर निवास करते हैं, उनकी दोनों पत्नियां ऋद्धि तथा सिद्धि भी उनके […]

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गणेश जी को रिद्धि-सिद्धि के देवता है।गणेश जी विघ्न हारता व शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता हैं। अगर कोई भक्त उनकी सच्चे मन से वंदना करता है, तो लंबोदर तुरंत प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

 वैसे भी गणेश जी जिस स्थान पर निवास करते हैं, उनकी दोनों पत्नियां ऋद्धि तथा सिद्धि भी उनके साथ रहती हैं। उनके दोनों पुत्र शुभ व लाभ का आगमन भी गणेश जी के साथ ही होता है। कभी-कभी तो भक्त भगवान को असमंजस में डाल देते हैं। पूजा-पाठ व भक्ति का जो वरदान मांगते हैं, वह निराला होता है।

गणेश जी को कैसे ठगा एक बुढ़िया ने

काफ़ी समय पहले की बात है एक गांव में एक अंधी बुढ़िया रहती थी। वह गणेश जी की परम भक्त थी। आंखों से भले ही दिखाई नहीं देता था, परंतु वह सुबह शाम गणेश जी की भक्ति में मग्न रहती। नित्य गणेश जी की प्रतिमा के आगे बैठकर उनकी स्तुति करती। भजन गाती व समाधि में लीन रहती। गणेश जी बुढ़िया की निष्काम भक्ति से बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सोचा यह बुढ़िया नित्य मेरा स्मरण करती है, परंतु बदले में कभी कुछ नहीं मांगती।

इसे इसकी भक्ति का फल तो अवश्य मिलना ही चाहिए। ऐसा सोचकर गणेश जी एक दिन बुढ़िया के सम्मुख प्रकट हुए तथा बोले- ‘माई, तुम मेरी सच्ची भक्त हो। जिस श्रद्धा व विश्वास से तुम मीरास स्मरण करती हो, उससे मैं अति प्रसन्न हूँ। अत: तुम जो वरदान चाहो मांग सकती हो।’

बुढ़िया बोली- ‘प्रभो! मैं तो आपकी भक्ति प्रेम भाव से करती हूं। मांगने का तो मैंने कभी सोचा ही नहीं। अत: मुझे कुछ नहीं चाहिए।’ गणेश जी पुन: बोले- ‘मैं वरदान देने केलिए ही आया हूँ।’ बुढ़िया बोली- ‘हे सर्वेश्वर, मुझे मांगना तो नहीं आता। अगर आप कहें, तो मैं कल मांग लूंगी। तब तक मैं अपने बेटे व बहू से भी सलाह कर लूंगी। गणेश जी कल आने का वादा करके वापस लौट गए।

बुढ़िया का एक शादी शुदा पुत्र था। बुढ़िया ने सारा घटना क्रम अपने पुत्र और बहू को बताकर सलाह मांगी। बेटा बोला- ‘मां, तुम गणेश जी से ढेर सारा पैसा मांग लो। हमारी ग़रीबी दूर हो जाएगी। सब सुख चैन से रहेंगे।’ बुढ़िया की बहू बोली- ‘नहीं आप एक सुंदर पोते का वरदान मांगें। वंश को आगे बढ़ाने वाला भी, तो चाहिए।’ बुढ़िया बेटे और बहू की बातें सुनकर असमंजस में पड़ गई।

उसने सोचा- यह दोनों तो अपने-अपने मतलब की ही सलाह दे रहे हैं। बुढ़िया ने पड़ोसियों से सलाह लेने का मन बनाया। पड़ोसन एक नेक दिल महिला थी। उसने बुढ़िया को समझाते हुए कहा “तुम अपने अभी तक के जीवन में बहुत दुखी रही हो। अब जो थोड़ा जीवन बचा है, वह तो गणेश जी की कृपा से सुख से व्यतीत हो। धन अथवा पोते का तुम क्या करोंगी! अगर तुम्हारी आंखें ही नहीं हैं, तो यह संसारिक वस्तुएं तुम्हारे लिए व्यर्थ हैं। अत: तुम अपने लिए दोनों आंखें मांग लो।“

बुढ़िया को पड़ोसन का सुझाव सुन और भी सोच में पड़ गई। उसने सोचा- मैं कुछ ऐसा मंगू, जिससे मेरा, और मेरे परिवार का भला हो। लेकिन ऐसा क्या हो सकता है? इसी उधेड़बून में सारा दिन व्यतीत हो गया। बुढ़िया कभी कुछ मांगने का मन बनाती, तो कभी कुछ। परंतु कुछ भी निर्धारित न कर सकी।

दूसरे दिन गजानन जी पुन: प्रकट हुए तथा बोले- ‘आप जो भी मांगेंगे, वह मेरी कृपा से पूर्ण हो जाएगा। यह मेरा वचन है।’ गणेश जी के पावन वचन सुनकर बुढ़िया बोली- ‘हे गौरी पुत्र, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो कृप्या मुझे मन इच्छित वरदान दीजिए। मैं अपने पोते को सोने के गिलास में दूध पीते देखना चाहती हूं।’

बुढ़िया की बातें सुनकर विघ्न हारता उसकी मनोकामना पर मुस्कुरा दिए। बोले- ‘माई तुमने तो मुझे ठग ही लिया है। मैंने तुम्हें एक वरदान मांगने के लिए बोला था, परंतु तुमने तो एक वरदान में ही सबकुछ मांग लिया।“अष्‍टविनायक मंदिरों के दर्शन, मिलेगा विघ्‍नहर्ता का आर्शिवाद

तुमने अपने लिए लंबी उम्र तथा दोनों आंखे मांग ली। बेटे के लिए धन व बहू के लिए पोता भी मांग लिया। पोता होगा और ढेर सारा पैसा होगा, तभी तो वह सोने के गिलास में दूध पीएगा। पोते को देखने के लिए तुम जिंदा रहोगी, तभी तो देख पाओगी। अब देखने के लिए दो आंखें भी देनी ही पड़ेंगी।’ फिर भी वह बोले- ‘जो तुमने मांगा, वे सब सत्य होगा।’ यूं कहकर गणेश जी अंर्तध्यान हो गए।

कुछ समय पश्चात गणेश जी की कृपा से बुढ़िया के घर पोता हुआ। बेटे का कारोबार चल निकला तथा बुढ़िया की आंखों की रौशनी वापस लौट आई। बुढ़िया अपने परिवार सहित सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगी।

 

डिसक्लेमर

इस लेख में प्रदान की गई जानकारी की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की कोई गारंटी नहीं है। यह सूचना विभिन्न स्रोतों, जैसे कि ज्योतिष, पंचांग, प्रवचन, धार्मिक मान्यताएं, और धर्मग्रंथों से संकलित कर यहाँ प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, और पाठक या उपयोगकर्ता से अपील है कि वे इसे सिर्फ सूचना के रूप में ही समझें और उपयोग करें।

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पौष पुत्रदा एकादशी 2024: जाने कब है एवं कथा, महत्व और सिद्ध मंत्र https://astrodeeva.com/know-when-is-pausha-putrada-ekadashi-2024-story/ https://astrodeeva.com/know-when-is-pausha-putrada-ekadashi-2024-story/#respond Mon, 15 Jan 2024 19:06:13 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3797 पौष पुत्रदा एकादशी 2024-पुत्रदा एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है। पौष मास में शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पौष पुत्रदा एकादशी कहते हैं।यह व्रत आमतौर पर विवाहित जोड़ों द्वारा संतान प्राप्ति के लिए किया जाता हैं। विवाहित जोड़े जो संतान की चाहत रखते हैं, पुत्रदा एकादशी व्रत का पालन करते […]

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पौष पुत्रदा एकादशी 2024-पुत्रदा एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है। पौष मास में शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पौष पुत्रदा एकादशी कहते हैं।यह व्रत आमतौर पर विवाहित जोड़ों द्वारा संतान प्राप्ति के लिए किया जाता हैं। विवाहित जोड़े जो संतान की चाहत रखते हैं, पुत्रदा एकादशी व्रत का पालन करते हैं और भगवान विष्णु का दिव्य आशीर्वाद पाने के लिए इस त्योहार से जुड़े विभिन्न अनुष्ठान भी करते हैं।

पुत्रदा एकादशी साल में दो बार मनाई जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार पहली पुत्रदा एकादशी पौष माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनायी जाती है इसे पौष पुत्रदा एकादशी या पौष शुक्ल पुत्रदा एकादशी कहा जाता है, जिसे अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार जनवरी या दिसंबर महीने में मनाया जाता है। और दूसरी पुत्रदा एकादशी श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनायी जाती है और इसे श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है जो इंग्लिश कैलेंडर वर्ष के अनुसार जुलाई या अगस्त के महीने में आती है।

पौष पुत्रदा एकादशी का महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल के समय श्री कृष्ण ने अर्जुन के पूछने पर पुत्रदा एकादशी का महत्व बताते हुए कहा था। “हे अर्जुन! संसार में पुत्रदा एकादशी उपवास के समान अन्य दूसरा व्रत नहीं है। इसके पुण्य से प्राणी तपस्वी, विद्वान और धनवान बनता है। पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का उपवास करना चाहिए पुत्र प्राप्ति के लिए इससे बढ़कर दूसरा कोई व्रत नहीं है। जो कोई व्यक्ति पुत्रदा एकादशी के माहात्म्य को पढ़ता व श्रवण करता है तथा विधानानुसार इसका उपवास करता है, उसे सर्वगुण सम्पन्न पुत्ररत्न की प्राप्ति होती है। श्रीहरि की अनुकम्पा से वह मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है।”

पौष पुत्रदा एकादशी 2024

दिनांक – 21 जनवरी 2024
वार – रविवार 
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 20 जनवरी 2024 को 07:26 पी एम बजे से
एकादशी तिथि समाप्त – 
जनवरी 21, 2024 को 07:26 पी एम बजे तक 
पारण (व्रत तोड़ने का) समय – 22 जनवरी 2024 को 07:14 ए एम से 09:21 ए एम तक 
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्ति समय – 07:51 पी एम

पुत्रदा एकादशी की कथा

पुत्रदा एकादशी की महत्ता सुन अर्जुन के मन में और जिज्ञासा जाग उठी और उस ने भगवान श्री कृष्ण से कहा – हे कमलनयन! आप कृप्या कर इस व्रत की कथा भी मुझे विस्तारपूर्वक बताएं।

श्रीकृष्ण ने कहा– “हे पाण्डुनंदन! इस एकादशी से सम्बंधित जो कथा प्रचलित है, उसे मैं तुम्हें सुनाता हूँ, श्रद्धापूर्वक श्रवण करो-

प्राचीन समय में भद्रावती नगरी में सुकेतुमान नाम का एक राजा राज्य करता था। उसके कोई संतान नहीं थी। उसकी पत्नी का नाम शैव्या था। पुत्र ना होने के कारण राजा के मन में इस बात की बड़ी चिंता थी कि उसके बाद उसे और उसके पूर्वजों को कौन पिंडदान देगा। राजा रात-दिन इसी चिंता में घुला करता था। इस चिंता के कारण एक दिन वह इतना दुखी हो गया कि उसके मन में अपने शरीर को त्याग देने की इच्छा उत्पन्न हुई , किंतु वह सोचने लगा कि आत्महत्या करना तो महापाप है, अतः उसने इस विचार को मन से निकाल दिया। एक दिन इन्हीं विचारों में डूबा हुआ वह घोड़े पर सवार होकर वन को चल दिया।

घोड़े पर सवार राजा वन, पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा। उसने वन में देखा कि मृग, बाघ, सिंह, बंदर आदि विचरण कर रहे हैं। हाथी शिशुओं और हथिनियों के बीच में विचर रहा है। उस वन में राजा ने देखा कि कहीं तो सियार कर्कश शब्द निकाल रहे हैं और कहीं मोर अपने परिवार के साथ नाच रहे हैं। वन के दृश्यों को देखकर राजा और ज्यादा दुखी हो गया कि उसके पुत्र क्यों नहीं हैं? इसी सोच-विचार में दोपहर हो गई। वह सोचने लगा कि मैंने अनेक यज्ञ किए हैं और ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन करा सामर्थ्य के अनुसार दान दक्षिण दी है, किंतु फिर भी मुझे यह दुख क्यों मिल रहा है? आखिर इसका कारण क्या है? मैं अपनी व्यथा किससे कहूं? और कौन मेरी व्यथा का समाधान कर सकता है?

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अपने विचारों में खोए राजा को प्यास लगी। वह पानी की तलाश में आगे बढ़ा। कुछ दूर जाने पर उसे एक सरोवर मिला। उस सरोवर में कमल पुष्प खिले हुए थे। सारस, हंस, घड़ियाल आदि जल-क्रीड़ा में मग्न थे। सरोवर के चारों तरफ ऋषियों के आश्रम बने हुए थे। अचानक राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे। इसे शुभ शगुन समझकर राजा मन में प्रसन्न होता हुआ घोड़े से नीचे उतरा और सरोवर के किनारे बैठे हुए ऋषियों को प्रणाम करके उनके पूछा ‘हे विप्रो! आप कौन हैं? और किसलिए यहां रह रहे हैं?’

ऋषि बोले – ‘राजन! आज पुत्र की इच्छा करने वालो को श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करने वाली पुत्रदा एकादशी है। आज से पांच दिन बाद माघ स्नान है और हम सब इस सरोवर में स्नान करने आए हैं।’

ऋषियों की बात सुन राजा ने कहा – ‘हे मुनियो! मेरा भी कोई पुत्र नहीं है, कृपा कर मुझे भी इस एकादशी व्रत के बारे में बताएं।

ऋषि बोले – ‘हे राजन! आज पुत्रदा एकादशी है। आप इसका उपवास करें। भगवान श्रीहरि की अनुकम्पा से आपके घर अवश्य ही पुत्र होगा।’

राजा ने मुनि के वचनों के अनुसार उस दिन उपवास किया और द्वादशी को व्रत का पारण किया और ऋषियों को प्रणाम कर उन का आशीर्वाद प्राप्त कर वापस अपनी नगरी आ गया। भगवान श्रीहरि की कृपा से कुछ दिनों बाद ही रानी ने गर्भ धारण किया और नौ माह के पश्चात उसने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। यह राजकुमार बड़ा होने पर अत्यंत वीर, धनवान, यशस्वी और प्रजापालक बना।

पौष पुत्रदा एकादशी 2024 के मंत्र

  • ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र
  • विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम
  • विष्णु अष्टोत्रम
  • संतान गोपाल मन्त्र
    देवकीसुतं गोविन्दम् वासुदेव जगत्पते
    देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:

डिसक्लेमर

इस लेख में प्रदान की गई जानकारी की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की कोई गारंटी नहीं है। यह सूचना विभिन्न स्रोतों, जैसे कि ज्योतिष, पंचांग, प्रवचन, धार्मिक मान्यताएं, और धर्मग्रंथों से संकलित कर यहाँ प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, और पाठक या उपयोगकर्ता से अपील है कि वे इसे सिर्फ सूचना के रूप में ही समझें और उपयोग करें।

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Lohri 2024: लोहड़ी क्यों और कैसे मनाएँ? जाने लोहड़ी गीत https://astrodeeva.com/lohri-2024-why-and-how-to-celebrate-lohri-know-lohri-songs/ https://astrodeeva.com/lohri-2024-why-and-how-to-celebrate-lohri-know-lohri-songs/#respond Sat, 13 Jan 2024 05:24:20 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3794 Lohri 2024: भारत के पंजाब प्रांत और उत्तर भारत के लोगों द्वारा मनाए जाने वाला का एक प्रमुख त्यौहार है। यह त्यौहार अत्यंत लोकप्रिय होने के कारण अब पूरे विश्व में मनाया जाता है। लोहड़ी का शाब्दिक अर्थ होता है लो मतलब आग, ओह मतलब उपले और एडी मतलह रेवड़ी। यह त्यौहार शरद ऋतु के […]

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Lohri 2024: भारत के पंजाब प्रांत और उत्तर भारत के लोगों द्वारा मनाए जाने वाला का एक प्रमुख त्यौहार है। यह त्यौहार अत्यंत लोकप्रिय होने के कारण अब पूरे विश्व में मनाया जाता है। लोहड़ी का शाब्दिक अर्थ होता है लो मतलब आग, ओह मतलब उपले और एडी मतलह रेवड़ी। यह त्यौहार शरद ऋतु के अंत में मनाया जाता है और माना जाता है की इसके बाद दिन बड़े होने लगते हैं।

यह त्यौहार प्रति वर्ष मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व उसकी पूर्वसंध्या पर 13 जनवरी को धूम-धाम से सिखों द्वारा पूरे विश्व में मनाया जाता है। लोहड़ी के दिन से कुछ दिन पहले से बालक एवं बालिकाएँ लोकगीत गाकर अपने मोहल्ले अथवा गाँव से लोहड़ी के लिए लकड़ी और उपले इकट्ठे करते हैं। इस अवसर पर विवाहिता महिलाओं के मयके से वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फलादि तथा अन्य उपहार भेजे जाते हैं।

Lohri 2024: लोहड़ी की लोककथा कथा

लोहड़ी मनाएँ जाने के पिछे वैसे तो कई मान्यताएं हैं, लेकिन सबसे प्रचलित लोककथा दुल्ला भट्टी से जुड़ी है।

कई वर्षों से लोग लोहड़ी पर्व को दूल्ला भट्टी नामक चरित्र से जोड़ते हैं। लोहड़ी के कई गीतों में इनके नाम का ज़िक्र आता है। कहते हैं कि मुगल शासक अकबर के काल में एक नौजवान था। कथा के अनुसार एक गरीब ब्राह्मण की दो बेटियाँ थी। जिनका नाम सुंदरी और मुंदरी था। वह दोनो बहुत सुंदर थी। ब्राह्मण ने उन दोनो का विवाह पास के गाँव में पक्का कर दिया। जब ब्राह्मण की बेटियों की सुंदरता के बारे में वहाँ के मुग़ल शासकों को पता चला तो उनकी नियत ख़राब हो गयी। इस बात का जब लड़के वालों को पता चला तो उन लोगों ने रिश्ता तोड़ दिया।

इस बात से परेशान ब्राह्मण अपनी क़िस्मत को कोसते हुए जब रास्ते में जा रहा था तो उसकी मुलाक़ात दुल्ला भट्टी से हुयी। दुल्ला भट्टी को जब सारी बात पता चली तो उसने ब्राह्मण को उसकी बेटियों का विवाह कराने का आश्वासन दिया और उन की बेटियों को अपनी लड़की माना। इसके बाद उसके सारे गाँव वालों को जंगल में इकट्ठा किया और एक जगह आग जला कर उन दोनो लड़कियों की शादी करवाई। ग़रीबी के कारण शादी के समय लड़कियों के कपड़े फटे पुराने थे। उस समय सभी गाँव वालों ने उन्हें दान दिया। दुल्ला भट्टी के पास केवल शक्कर होने के कारण उसने उन्हें शक्कर शगुन में दी। तब से यह त्यौहार मनाया जा रहा है।

मकर संक्रांति 2024: इस दिन क्यों खाई जाती है खिचड़ी?

कैसे मनाया जाता हैं लोहड़ी पर्व  (How we celebrate Lohri 2024)

लोहड़ी आने के कई दिनों पहले ही युवा एवम बच्चे लोहड़ी के गीत गाते हैं. पन्द्रह दिनों पहले यह गीत गाना शुरू कर दिया जाता हैं जिन्हें घर-घर जाकर गया जाता हैं. इन गीतों में वीर शहीदों को याद किया जाता हैं जिनमे दुल्ला भट्टी के नाम विशेष रूप से लिया जाता हैं

लोहड़ी के दिन शाम को आग जलाने के बाद उसमें तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी और मूंगफली लोहड़ी को अर्पित की जाती है। उसके बाद सुंदरिए-मुंदरिए हो, ओ आ गई लोहड़ी वे, जैसे पारंपरिक गीत अग्नि के गोल-गोल चक्कर लगाकर गाते हैं और ढोल-नगाड़े बजाते और नाचते हैं।

लोकप्रिय लोहड़ी गीत (Lohri Song)

सुंदर मुंदरिए – हो
तेरा कौन विचारा-हो
दुल्ला भट्टी वाला-हो
दुल्ले ने धी ब्याही-हो
सेर शक्कर पाई-हो
कुडी दे बोझे पाई-हो
कुड़ी दा लाल पटाका-हो
कुड़ी दा शालू पाटा-हो
शालू कौन समेटे-हो
चाचा गाली देसे-हो
चाचे चूरी कुट्टी-हो
जिमींदारां लुट्टी-हो
जिमींदारा सदाए-हो
गिन-गिन पोले लाए-हो
इक पोला घिस गया जिमींदार वोट्टी लै के नस्स गया – हो!

 

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संक्रांति: वर्ष 2024 की संक्रांति तिथियाँ https://astrodeeva.com/sankranti-dates-of-sankranti-year-2024/ https://astrodeeva.com/sankranti-dates-of-sankranti-year-2024/#respond Wed, 10 Jan 2024 12:28:57 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3788 धार्मिक परंपरा में भगवान सूर्य को प्रत्यक्ष देव कहा गया है। वहीं ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक सूर्य देव सभी ग्रहों के राजा हैं। सूर्यदेव जब एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं तो उस अवस्था को संक्रांति कहा जाता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार एक वर्ष में 12 संक्रांति होती है। यदि आप […]

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धार्मिक परंपरा में भगवान सूर्य को प्रत्यक्ष देव कहा गया है। वहीं ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक सूर्य देव सभी ग्रहों के राजा हैं। सूर्यदेव जब एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं तो उस अवस्था को संक्रांति कहा जाता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार एक वर्ष में 12 संक्रांति होती है।

यदि आप संक्रांति के दिन उपवास रखते हैं तो यहां जानिए वर्ष 2024 की सभी 12 संक्रांतियों की तारीखें। मकर, मेष, मिथुन, धनु और कर्क संक्रांति ज्यादा महत्व माना गया है। जब कभी भी सूर्य का राशि परिवर्तन होता है तो उस दिन सूर्य की पूजा करने से मान-सम्मान में वृद्धि, बल, आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। करियर में उच्च अधिकारी के पद पर बैठने की कामना पूरी होती है। निम्नलिखित जानकारी पंचांग पर आधारित है। पंचांग भेद से तिथि के समय में परिवर्तन होता भी है।

 

वर्ष 2024 की सभी 12 संक्रांति की तिथियाँ

2024 Sankranti Calendar

1 15 जनवरी 2024 सोमवार
2 13 फरवरी 2024
कुंभ संक्रांति
मंगलवार
3 14 मार्च 2024
मीन संक्रांति
बृहस्पतिवार
4 13 अप्रैल 2024
मेष संक्रांति
शनिवार
5 14 मई 2024
वृषभ संक्रांति
मंगलवार
6 15 जून 2024
मिथुन संक्रांति
शनिवार
7 16 जुलाई 2024
कर्क संक्रांति
मंगलवार
8 16 अगस्त 2024
सिंह संक्रांति
शुक्रवार
9 16 सितंबर 2024
कन्या संक्रांति
सोमवार
10 17 अक्टूबर 2024
तुला संक्रांति
बृहस्पतिवार
11 16 नवंबर 2024
वृश्‍चिक संक्रांति
शनिवार
12 15 दिसंबर 2024
धनु संक्रांति
रविवार

 

डिसक्लेमर

इस लेख में प्रदान की गई जानकारी की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की कोई गारंटी नहीं है। यह सूचना विभिन्न स्रोतों, जैसे कि ज्योतिष, पंचांग, प्रवचन, धार्मिक मान्यताएं, और धर्मग्रंथों से संकलित कर यहाँ प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, और पाठक या उपयोगकर्ता से अपील है कि वे इसे सिर्फ सूचना के रूप में ही समझें और उपयोग करें।

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मकर संक्रांति 2024: इस दिन क्यों खाई जाती है खिचड़ी? जाने धार्मिक कारण… https://astrodeeva.com/makar-sankranti-2024-why-khichdi-is-eaten-on-this-day-know-the-religious-reasons/ https://astrodeeva.com/makar-sankranti-2024-why-khichdi-is-eaten-on-this-day-know-the-religious-reasons/#comments Wed, 10 Jan 2024 05:37:44 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3783 मकर संक्रांति 2024- यह हिंदू धर्म के बड़े त्योहारों मे से एक है। मकर संक्रांति को खिचड़ी बनाने और खाने का अपना ही अलग खास महत्व होता है इसी कारण कई प्रांतों में इसे खिचड़ी पर्व के नाम से भी जाता है। यह खिचड़ी हर जगह अलग-अलग तरीके से बनाई जाती है। कोई चावल और […]

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मकर संक्रांति 2024- यह हिंदू धर्म के बड़े त्योहारों मे से एक है। मकर संक्रांति को खिचड़ी बनाने और खाने का अपना ही अलग खास महत्व होता है इसी कारण कई प्रांतों में इसे खिचड़ी पर्व के नाम से भी जाता है।
यह खिचड़ी हर जगह अलग-अलग तरीके से बनाई जाती है। कोई चावल और मूंग की दाल डालकर सिंपल खिचड़ी बनाता है तो कोई कई तरह की सब्जियां खासकर डालकर इसे बनाते है। कुल मिलाकर देखा जाये हो पूरे भारत में 60 से भी ज्यादा तरीके से खिचड़ी बनाई जाती है।
ज्योतिष अनुसार खिचड़ी बनाने के पीछे ग्रहों का शांत होना माना जाता है। जहां चावल को चंद्रमा का प्रतीक मनाते है, तो काली दाल को शनि औऱ सब्जियों को बुध ग्रह का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने से ग्रहों की स्थिति मजबूत होती है।

मकर संक्रांति 2024 – खिचड़ी का धार्मिक महत्व और और इस दिन क्यों खाई जाती है खिचड़ी?

मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने के पीछे की मान्यता बाबा गोरखनाथ जी से जुड़ी हुई है। माना जाता है कि खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगियों को खिलजी से संघर्ष के कारण भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था। इस वजह से योगी अक्सर भूखे रह जाते थे और दिन प्रति दिन कमजोर हो रहे थे। दिन-ब-दिन योगियों की बिगड़ती हालत को देख बाबा गोरखनाथ ने इस समस्या का हल निकालते हुए दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी।यह व्यंजन पौष्टिक होने के साथ-साथ स्वादिष्ट भी था और इससे शरीर को तुरंत उर्जा भी मिलती थी। नाथ योगियों को यह व्यंजन काफी पसंद आया।

ये भी पढ़ें: लोहड़ी का इतिहास और कैसे मनायी जाती है?

बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम ‘खिचड़ी’ रखा। झटपट तैयार होने वाली खिचड़ी से नाथ योगियों की भोजन की समस्या का समाधान हो गया और इसके साथ ही वे खिलजी के आतंक को दूर करने में भी सफल हुए। खिलजी से मुक्ति मिलने के कारण गोरखपुर में मकर संक्रांति को विजय दर्शन पर्व के रूप में भी मनाया जाता है।
इस दिन गोरखपुर के गोरखनाथ के मंदिर के पास खिचड़ी मेला आरंभ होता है। कई दिनों तक चलने वाले इस मेले में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और इसे ही प्रसाद रूप में वितरित किया जाता है।

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इस लेख में प्रदान की गई जानकारी की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की कोई गारंटी नहीं है। यह सूचना विभिन्न स्रोतों, जैसे कि ज्योतिष, पंचांग, प्रवचन, धार्मिक मान्यताएं, और धर्मग्रंथों से संकलित कर यहाँ प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, और पाठक या उपयोगकर्ता से अपील है कि वे इसे सिर्फ सूचना के रूप में ही समझें और उपयोग करें।

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Ekadashi Vrat 2024 – साल 2024 एकादशी व्रत कब और कौनसी, जाने पूरी लिस्ट https://astrodeeva.com/ekadashi-vrat-2024-year-2024-know-when-and-which-ekadashi-fast-complete-list/ https://astrodeeva.com/ekadashi-vrat-2024-year-2024-know-when-and-which-ekadashi-fast-complete-list/#respond Wed, 03 Jan 2024 09:38:04 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3756 हिन्दू धर्म में हर तिथि किसी न किसी भगवान या देवता को समर्पित होती है। उसी तरह एकादशी(Ekadashi Vrat 2024) तिथि भगवान विष्णु को समर्पित तिथि है और इसका हिन्दू धर्म में बड़ा महत्व है। एकादशी के दिन भक्तजन संतान, धन-धान्य और घर की प्राप्ति के लिए उपवास करते है। कभी कभी एकादशी व्रत लगातार […]

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हिन्दू धर्म में हर तिथि किसी न किसी भगवान या देवता को समर्पित होती है। उसी तरह एकादशी(Ekadashi Vrat 2024) तिथि भगवान विष्णु को समर्पित तिथि है और इसका हिन्दू धर्म में बड़ा महत्व है। एकादशी के दिन भक्तजन संतान, धन-धान्य और घर की प्राप्ति के लिए उपवास करते है। कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्थ-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।

Ekadashi Vrat 2024 – एकादशी व्रत तिथि 2024

 

2024 एकादशी व्रत की तिथि

एकादशी

दिनांक, वार

हिंदी मास

पक्ष

 

एकादशी समय

सफला एकादशी

(Saphala
Ekadashi)

जनवरी 7, 2024
रविवार 
पौष कृष्ण पक्ष

 

प्रारम्भ – जनवरी 7, 12:41 ए एम से 
समाप्त – जनवरी 8, 12:46 ए एम तक 

पौष पुत्रदा एकादशी

(Pausha
Putrada Ekadashi)

जनवरी 21, 2024 रविवार  पौष शुक्ल पक्ष प्रारम्भ – जनवरी 20, 07:26 पी एम से 
समाप्त – जनवरी 21, 07:26 पी एम तक 
षटतिला एकादशी

(Shattila Ekadashi)

फरवरी 6, 2024, मंगलवार  माघ कृष्ण पक्ष प्रारम्भ – फरवरी 05, 05:24 पी एम से
समाप्त -फरवरी 06, 04:07 पी एम तक 

जया एकादशी

(Jaya Ekadashi)

फरवरी 20, 2024, मंगलवार 

माघ

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – फरवरी 19, 08:49 ए एम से 
समाप्त – फरवरी 20, 09:55 ए एम तक 

विजया एकादशी

(Vijaya Ekadashi)

मार्च 6, 2024, बुधवार 

फाल्गुन

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ – मार्च 06, 06:30 ए एम से 
समाप्त – मार्च 07, 04:13 ए एम तक 

आमलकी एकादशी

(Amalaki Ekadashi)

मार्च 20, 2024, बुधवार  फाल्गुन शुक्ल पक्ष प्रारम्भ – मार्च 20, 12:21 ए एम से 
समाप्त – मार्च 21, 02:22 ए एम तक 

पापमोचिनी एकादशी

(Papmochani Ekadashi)

अप्रैल 5, 2024, शुक्रवार  चैत्र कृष्ण पक्ष प्रारम्भ – अप्रैल 04, 04:14 पी एम से 
समाप्त – अप्रैल 05, 01:28 पी एम तक 

कामदा एकादशी

(Kamada Ekadashi)

अप्रैल 19, 2024, शुक्रवार 

चैत्र

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – अप्रैल 18, 05:31 पी एम से  
समाप्त – अप्रैल 19, 08:04 पी एम तक  

बरूथिनी एकादशी

(Varuthini Ekadashi)

मई 4, 2022, शनिवार 

वैशाख

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ – मई 03, 11:24 पी एम से 
समाप्त – मई 04, 08:38 पी एम तक  

मोहिनी एकादशी

(Mohini Ekadashi)

मई 19, 2024, रविवार 

वैशाख

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – मई 18, 11:22 ए एम से 
समाप्त – मई 19, 01:50 पी एम तक 

अपरा एकादशी

(Apara Ekadashi)

जून 2, 2024,
रविवार

ज्येष्ठ

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ – जून 02, 05:04 ए एम से  
समाप्त – जून 03, 02:41 ए एम तक 

निर्जला एकादशी

(Nirjala Ekadashi)

जून 18, 2024, मंगलवार 

ज्येष्ठ

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – जून 17, 04:43 ए एम पर  
समाप्त – जून 18, 06:24 ए एम पर 

योगिनी एकादशी

(Yogini Ekadashi)

जुलाई 02,
2024,
मंगलवार 

आषाढ़

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ – जुलाई 01, 10:26 ए एम से  
समाप्त – जुलाई 02, 08:42 ए एम तक  

देवशयनी एकादशी

(Devshayani Ekadashi)

जुलाई 17, 2024, बुधवार 

आषाढ़

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – जुलाई 16, 08:33 पी एम से  
समाप्त – जुलाई 17, 09:02 पी एम तक  

कामिका एकादशी

(Kamika Ekadashi)

जुलाई 31, 2024,
बुधवार 

श्रावण

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ –  जुलाई 30, 04:44 पी एम से 
समाप्त – जुलाई 31, 03:55 पी एम तक 

श्रावण पुत्रदा एकादशी

(Shravana Putrada Ekadashi)

अगस्त 16, 2024, शुक्रवार 

श्रावण

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ –  अगस्त 15, 10:26 ए एम से 
समाप्त – अगस्त 16, 09:39 ए एम तक 

अजा एकादशी

(Aja Ekadashi)

अगस्त 29, 2024, गुरुवार 

भाद्रपद

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ – अगस्त 29, 01:19 ए एम से  
समाप्त – अगस्त 30, 01:37 ए एम तक 

परिवर्तिनी एकादशी

(Parivartini Ekadashi)

सितम्बर 14, 2024, शनिवार 

भाद्रपद

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – सितम्बर 13, 10:30 पी एम से  
समाप्त – सितम्बर 14, 08:41 पी एम तक 

इन्दिरा एकादशी

(Indira Ekadashi)

सितम्बर 28
,2024, शनिवार 

आश्विन

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ –  सितम्बर 27, 01:20 पी एम से 
समाप्त – सितम्बर 28, 02:49 पी एम तक  

पापांकुशा एकादशी

(Papankusha Ekadashi)

 अक्टूबर 13, 2024, रविवार 

आश्विन

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ –  अक्टूबर 13, 09:08 ए एम से 
समाप्त – अक्टूबर 14, 06:41 ए एम तक 

रमा एकादशी

(Rama Ekadashi)

अक्टूबर 28, 2024, सोमवार 

कार्तिक

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ – अक्टूबर 27, 05:23 ए एम से 
समाप्त – अक्टूबर 28, 07:50 ए एम तक 

देवुत्थान एकादशी

(Devutthana Ekadashi)

नवम्बर 12, 2024, मंगलवार 

कार्तिक

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – नवम्बर 11, 06:46 पी एम से  
समाप्त – नवम्बर 12, 04:04 पी एम तक 

उत्पन्ना एकादशी

(Utpanna Ekadashi)

 नवम्बर 26, 2024, मंगलवार 

मार्गशीर्ष

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ –  नवम्बर 26, 01:01 ए एम से 
समाप्त – नवम्बर 27, 03:47 ए एम तक  

मोक्षदा एकादशी

(Mokshada Ekadashi)

दिसम्बर 11, 2024, बुधवार 

मार्गशीर्ष

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – दिसम्बर 11, 03:42 ए एम से  
समाप्त – दिसम्बर 12, 01:09 ए एम तक 

सफला एकादशी

(Saphala Ekadashi)

दिसम्बर 26, 2024, गुरुवार 

 

पौष कृष्ण पक्ष
प्रारम्भ – दिसम्बर 25, 10:29 पी एम से  
समाप्त – दिसम्बर 27, 12:43 ए एम तक 

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Shrimad Bhagwat Geeta: श्रीमद भगवत गीता के सभी 18 अध्याय के नाम https://astrodeeva.com/shrimad-bhagwat-geeta-names-of-all-18-chapters-of-shrimad-bhagwat-geeta/ https://astrodeeva.com/shrimad-bhagwat-geeta-names-of-all-18-chapters-of-shrimad-bhagwat-geeta/#respond Mon, 18 Dec 2023 14:46:15 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3711 Shrimad Bhagwat Geeta की उत्पत्ति धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन हुई थी। इस विशेष तिथि को ‘मोक्षदा एकादशी‘ के रूप में भी मनाया जाता है। गीता एक सार्वभौमिक ग्रंथ है, जो किसी विशेष काल, धर्म, संप्रदाय, या जाति के लिए नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानव जाति के […]

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Shrimad Bhagwat Geeta की उत्पत्ति धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन हुई थी। इस विशेष तिथि को ‘मोक्षदा एकादशी‘ के रूप में भी मनाया जाता है। गीता एक सार्वभौमिक ग्रंथ है, जो किसी विशेष काल, धर्म, संप्रदाय, या जाति के लिए नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानव जाति के लिए है। इसे श्रीभगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर कहा है, इसलिए ग्रंथ में कहीं भी ‘श्रीकृष्ण उवाच’ नहीं, बल्कि ‘श्रीभगवानुवाच’ का प्रयोग किया गया है।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गाकर छंद रूप में उपदेश दिया, इसलिए इसे गीता कहा जाता है। क्योंकि उपदेश देने वाले स्वयं भगवान थे, इसलिए इस ग्रंथ का नाम भगवद्गीता है। गीता माहात्म्य के अनुसार, श्रीकृष्ण ने पद्म पुराण में बताया है कि भवबंधन (जन्म-मरण) से मुक्ति की प्राप्ति के लिए गीता ही पर्याप्त ग्रंथ है। गीता का मुख्य उद्देश्य ईश्वर का ज्ञान प्रदान करना माना जाता है।

भगवद्गीता में कई विद्याओं का वर्णन है, जिनमें चार प्रमुख हैं – अभय विद्या, साम्य विद्या, ईश्वर विद्या और ब्रह्म विद्या।

  • अभय विद्या मृत्यु के भय को दूर करती है।
  • साम्य विद्या राग-द्वेष से छुटकारा दिलाकर जीव में समत्व भाव पैदा करती है।
  • ईश्वर विद्या के प्रभाव से साधक अहंकार और गर्व के विकार से बचता है।
  • ब्रह्म विद्या से अंतरात्मा में ब्रह्मा भाव को जगाता है।

श्रीमद्भागवत गीता

गीता का दूसरा नाम गीतोपनिषद है। श्रीमद्भागवत गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं, इन श्लोकों में कर्म, धर्म, कर्मफल, जन्म, मृत्यु, सत्य, असत्य आदि जीवन से जुड़े मूलभूत प्रश्नों के उत्तर मौजूद हैं।

भगवत गीता के सभी 18 अध्याय के नाम इस प्रकार है:

अध्याय 1: अर्जुनविषादयोगः – कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण
अध्याय 2: साङ्ख्ययोगः – गीता का सार
अध्याय 3: कर्मयोगः – कर्मयोग
अध्याय 4: ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः – दिव्य ज्ञान
अध्याय 5: कर्मसंन्यासयोगः – कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म
अध्याय 6: आत्मसंयमयोगः – ध्यानयोग
अध्याय 7: ज्ञानविज्ञानयोगः – भगवद्ज्ञान
अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोगः – भगवत्प्राप्ति
अध्याय 9: राजविद्याराजगुह्ययोगः – परम गुह्य ज्ञान
अध्याय 10: विभूतियोगः – श्री भगवान् का ऐश्वर्य
अध्याय 11: विश्वरूपदर्शनयोगः – विराट रूप
अध्याय 12: भक्तियोगः – भक्तियोग
अध्याय 13: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः – प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोगः – प्रकृति के तीन गुण
अध्याय 15: पुरुषोत्तमयोगः – पुरुषोत्तम योग
अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोगः – दैवी तथा आसुरी स्वभाव
अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोगः – श्रद्धा के विभाग
अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोगः – उपसंहार-संन्यास की सिद्धि

Also Read: एक मंत्र जो देता है सम्पूर्ण भागवत पाठ का फल

श्रीमद्भागवत गीता में दिया गया कुछ परम ज्ञान

  • परिवर्तन ही संसार का नियम है।
  • जो हुआ अच्छे के लिए हुआ। जो हो रहा है वो अच्छे के लिए हो रहा है और जो होगा वो भी अच्छे के लिए होगा।
  • मनुष्य को कर्म कर्म करना चहिये, फल की चिंता नहीं।
  • आत्मा अमर है, वो न जन्म लेती है और ना ही मरती है।
  • मनुष्य खाली हाथ आया था और खाली हाथ ही जाएगा।

 

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