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The post हिंदुओं में जनेऊ क्यों पहनते हैं और क्या है इसके लाभ, जानिए? appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>जनेऊ का सामाजिक महत्व: आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है। धारण करने के बाद उसे बताया जाता है कि उसे दो लोगों का भार या जिम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का।
यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता। मैला होने पर उतारने के बाद तुरंत ही दूसरा जनेऊ धारण करना पड़ता है।
लड़की भी पहन सकती है जनेऊ : वह लड़की जिसे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।
कब पहने जनेऊ :जिस दिन गर्भ धारण किया हो उसके आठवें वर्ष में बालक का उपनयन संस्कार किया जाता है। जनेऊ पहनने के बाद ही विद्यारंभ होता है, लेकिन आजकल गुरु परंपरा के समाप्त होने के बाद अधिकतर लोग जनेऊ नहीं पहनते हैं तो उनको विवाह के पूर्व जनेऊ पहनाई जाती है। लेकिन वह सिर्फ रस्म अदायिगी से ज्यादा कुछ नहीं, क्योंकि वे जनेऊ का महत्व नहीं समझते हैं।
।।यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत।।
अर्थात: अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है। हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके ही इसे उतारें।
इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।
यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।
जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी यज्ञोपवीत संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।
यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।
देव प्रतिमा की मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।
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]]>The post विष्णु जी क्यों धारण करते है सुदर्शन चक्र, शंख, गदा और कमल? appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
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]]>The post शाकंभरी जयंती: इस वर्ष 2024 में कब मनाई जाएगी? appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>देवी शाकंभरी देवी भगवती का अवतार हैं। इन्हें ‘हरियाली का प्रतीक’ भी कहा जाता है। शास्त्रों और हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, सभी शाकाहारी खाद्य उत्पादों को देवी शाकंभरी का प्रसाद या पवित्र प्रसाद माना जाता है।
हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ, देवी भागवतम के अनुसार, एक बार दुर्गम नाम का एक दानव था, जिसने अत्यधिक कष्टों और तपस्या से सभी चारों वेदों का अधिग्रहण कर लिया। उसने यह भी वरदान प्राप्त किया कि देवताओं को की जाने वाली सभी पूजाएँ और प्रार्थनाएँ उसके पास पहुँचेगी और इस तरह वह दुर्गम अविनाशी बन गया।
ऐसी शक्तियों को प्राप्त करने के बाद, उसने सभी को परेशान करना शुरू कर दिया जिसके परिणामस्वरूप धर्म का नुकसान हुआ और इसके कारण सैकड़ों वर्षों तक बारिश भी नहीं हुई, जिससे गंभीर अकाल की स्थिति पैदा हो गई। इससे निवारण पाने के लिए सभी साधु, ऋषि मुनि हिमालय की गुफाओं में चले गए और उन्होनें देवी माँ से मदद पाने के लिए निरंतर यज्ञ और तप किया। उनके कष्टों और संकटों को सुनकर, देवी ने शाकंभरी को अनाज, फल, जड़ी-बूटियाँ, दालें, सब्जियाँ, और साग-भाजी के रूप में अवतरित किया।
शाक शब्द का अर्थ सब्जियों से है और इस प्रकार देवी, शाकंभरी के नाम से प्रसिद्ध हुई। लोगों की दुर्दशा को देखकर देवी शाकंभरी की आंखों से 9 दिन और 9 रातों तक लगातार आँसू बहते रहे। अतः, उनके आँसू एक नदी में बदल गए और अकाल की स्थिति का अंत हो गया।
देवी ने मनुष्यों और ऋषियों को राक्षस दुर्गम की क्रूरता से बचाने के लिए उसके खिलाफ भी युद्ध किया। देवी शाकंभरी ने अपने अंदर 10 शक्तियों को प्रकट किया और अपनी सभी शक्तियों के साथ दुर्गम का वध कर चारों वेद ऋषियों को वापस कर दिए। चूंकि देवी ने राक्षस दुर्गम को मारा था, अतः उन्हें दुर्गा नाम भी दिया गया। उस समय से भक्त शाकंभरी पूर्णिमा का व्रत रखते हैं और देवी का आशीर्वाद पाने के लिए और अपने घरों में खुशहाली की कामना करते हैं।
शाकंभरी पूर्णिमा का बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि यह शाकंभरी देवी की जयंती भी है। भारत में विभिन्न स्थानों पर, इस दिन को पौष पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है जिसे हिंदू कैलेंडर के अनुसार एक अत्यधिक महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस्कॉन के अनुयायी या वैष्णव सम्प्रदाय इस दिन की शुरुआत पुष्य अभिषेक यात्रा से करते हैं क्योंकि यह माघ की शुरुआत भी है जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार धार्मिक मितव्ययिता का महीना है। यदि लोग इस विशेष दिन पर पवित्र स्नान करते हैं तो उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है और साथ ही वे शाकंभरी पूर्णिमा के दिन दान करके भी अत्यधिक गुण प्राप्त कर सकते हैं।
दिनांक : 25 जनवरी 2024
वार: बृहस्पतिवार
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ : 24 जनवरी 2024 को 09:49 पी एम बजे से
पूर्णिमा तिथि समाप्त : 25 जनवरी 2024 को 11:23 पी ए बजे तक
देवी शाकंभरी को देवी दुर्गा का सौम्य रूप माना जाता है जो अत्यंत दयालु, कृपालु और स्नेही हैं। इस दिन, लोगों को शाकंभरी देवी की पूजा और प्रार्थना करनी चाहिए, दान करना चाहिए, उपहार देने चाहिए, व्रत करना चाहिए, तीर्थ यात्रा करनी चाहिए, पवित्र स्नान करना चाहिए और देवी का दिव्य आशीर्वाद पाने के लिए अच्छे कर्म करने चाहिए।
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]]>The post गणेश जी को ठगा एक बुढ़िया ने, जाने कैसे…. appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>वैसे भी गणेश जी जिस स्थान पर निवास करते हैं, उनकी दोनों पत्नियां ऋद्धि तथा सिद्धि भी उनके साथ रहती हैं। उनके दोनों पुत्र शुभ व लाभ का आगमन भी गणेश जी के साथ ही होता है। कभी-कभी तो भक्त भगवान को असमंजस में डाल देते हैं। पूजा-पाठ व भक्ति का जो वरदान मांगते हैं, वह निराला होता है।
काफ़ी समय पहले की बात है एक गांव में एक अंधी बुढ़िया रहती थी। वह गणेश जी की परम भक्त थी। आंखों से भले ही दिखाई नहीं देता था, परंतु वह सुबह शाम गणेश जी की भक्ति में मग्न रहती। नित्य गणेश जी की प्रतिमा के आगे बैठकर उनकी स्तुति करती। भजन गाती व समाधि में लीन रहती। गणेश जी बुढ़िया की निष्काम भक्ति से बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सोचा यह बुढ़िया नित्य मेरा स्मरण करती है, परंतु बदले में कभी कुछ नहीं मांगती।
इसे इसकी भक्ति का फल तो अवश्य मिलना ही चाहिए। ऐसा सोचकर गणेश जी एक दिन बुढ़िया के सम्मुख प्रकट हुए तथा बोले- ‘माई, तुम मेरी सच्ची भक्त हो। जिस श्रद्धा व विश्वास से तुम मीरास स्मरण करती हो, उससे मैं अति प्रसन्न हूँ। अत: तुम जो वरदान चाहो मांग सकती हो।’
बुढ़िया बोली- ‘प्रभो! मैं तो आपकी भक्ति प्रेम भाव से करती हूं। मांगने का तो मैंने कभी सोचा ही नहीं। अत: मुझे कुछ नहीं चाहिए।’ गणेश जी पुन: बोले- ‘मैं वरदान देने केलिए ही आया हूँ।’ बुढ़िया बोली- ‘हे सर्वेश्वर, मुझे मांगना तो नहीं आता। अगर आप कहें, तो मैं कल मांग लूंगी। तब तक मैं अपने बेटे व बहू से भी सलाह कर लूंगी। गणेश जी कल आने का वादा करके वापस लौट गए।
बुढ़िया का एक शादी शुदा पुत्र था। बुढ़िया ने सारा घटना क्रम अपने पुत्र और बहू को बताकर सलाह मांगी। बेटा बोला- ‘मां, तुम गणेश जी से ढेर सारा पैसा मांग लो। हमारी ग़रीबी दूर हो जाएगी। सब सुख चैन से रहेंगे।’ बुढ़िया की बहू बोली- ‘नहीं आप एक सुंदर पोते का वरदान मांगें। वंश को आगे बढ़ाने वाला भी, तो चाहिए।’ बुढ़िया बेटे और बहू की बातें सुनकर असमंजस में पड़ गई।
उसने सोचा- यह दोनों तो अपने-अपने मतलब की ही सलाह दे रहे हैं। बुढ़िया ने पड़ोसियों से सलाह लेने का मन बनाया। पड़ोसन एक नेक दिल महिला थी। उसने बुढ़िया को समझाते हुए कहा “तुम अपने अभी तक के जीवन में बहुत दुखी रही हो। अब जो थोड़ा जीवन बचा है, वह तो गणेश जी की कृपा से सुख से व्यतीत हो। धन अथवा पोते का तुम क्या करोंगी! अगर तुम्हारी आंखें ही नहीं हैं, तो यह संसारिक वस्तुएं तुम्हारे लिए व्यर्थ हैं। अत: तुम अपने लिए दोनों आंखें मांग लो।“
बुढ़िया को पड़ोसन का सुझाव सुन और भी सोच में पड़ गई। उसने सोचा- मैं कुछ ऐसा मंगू, जिससे मेरा, और मेरे परिवार का भला हो। लेकिन ऐसा क्या हो सकता है? इसी उधेड़बून में सारा दिन व्यतीत हो गया। बुढ़िया कभी कुछ मांगने का मन बनाती, तो कभी कुछ। परंतु कुछ भी निर्धारित न कर सकी।
दूसरे दिन गजानन जी पुन: प्रकट हुए तथा बोले- ‘आप जो भी मांगेंगे, वह मेरी कृपा से पूर्ण हो जाएगा। यह मेरा वचन है।’ गणेश जी के पावन वचन सुनकर बुढ़िया बोली- ‘हे गौरी पुत्र, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो कृप्या मुझे मन इच्छित वरदान दीजिए। मैं अपने पोते को सोने के गिलास में दूध पीते देखना चाहती हूं।’
बुढ़िया की बातें सुनकर विघ्न हारता उसकी मनोकामना पर मुस्कुरा दिए। बोले- ‘माई तुमने तो मुझे ठग ही लिया है। मैंने तुम्हें एक वरदान मांगने के लिए बोला था, परंतु तुमने तो एक वरदान में ही सबकुछ मांग लिया।“अष्टविनायक मंदिरों के दर्शन, मिलेगा विघ्नहर्ता का आर्शिवाद
तुमने अपने लिए लंबी उम्र तथा दोनों आंखे मांग ली। बेटे के लिए धन व बहू के लिए पोता भी मांग लिया। पोता होगा और ढेर सारा पैसा होगा, तभी तो वह सोने के गिलास में दूध पीएगा। पोते को देखने के लिए तुम जिंदा रहोगी, तभी तो देख पाओगी। अब देखने के लिए दो आंखें भी देनी ही पड़ेंगी।’ फिर भी वह बोले- ‘जो तुमने मांगा, वे सब सत्य होगा।’ यूं कहकर गणेश जी अंर्तध्यान हो गए।
कुछ समय पश्चात गणेश जी की कृपा से बुढ़िया के घर पोता हुआ। बेटे का कारोबार चल निकला तथा बुढ़िया की आंखों की रौशनी वापस लौट आई। बुढ़िया अपने परिवार सहित सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगी।
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इस लेख में प्रदान की गई जानकारी की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की कोई गारंटी नहीं है। यह सूचना विभिन्न स्रोतों, जैसे कि ज्योतिष, पंचांग, प्रवचन, धार्मिक मान्यताएं, और धर्मग्रंथों से संकलित कर यहाँ प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, और पाठक या उपयोगकर्ता से अपील है कि वे इसे सिर्फ सूचना के रूप में ही समझें और उपयोग करें।
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]]>The post पौष पुत्रदा एकादशी 2024: जाने कब है एवं कथा, महत्व और सिद्ध मंत्र appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>पुत्रदा एकादशी साल में दो बार मनाई जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार पहली पुत्रदा एकादशी पौष माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनायी जाती है इसे पौष पुत्रदा एकादशी या पौष शुक्ल पुत्रदा एकादशी कहा जाता है, जिसे अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार जनवरी या दिसंबर महीने में मनाया जाता है। और दूसरी पुत्रदा एकादशी श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनायी जाती है और इसे श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है जो इंग्लिश कैलेंडर वर्ष के अनुसार जुलाई या अगस्त के महीने में आती है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल के समय श्री कृष्ण ने अर्जुन के पूछने पर पुत्रदा एकादशी का महत्व बताते हुए कहा था। “हे अर्जुन! संसार में पुत्रदा एकादशी उपवास के समान अन्य दूसरा व्रत नहीं है। इसके पुण्य से प्राणी तपस्वी, विद्वान और धनवान बनता है। पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का उपवास करना चाहिए पुत्र प्राप्ति के लिए इससे बढ़कर दूसरा कोई व्रत नहीं है। जो कोई व्यक्ति पुत्रदा एकादशी के माहात्म्य को पढ़ता व श्रवण करता है तथा विधानानुसार इसका उपवास करता है, उसे सर्वगुण सम्पन्न पुत्ररत्न की प्राप्ति होती है। श्रीहरि की अनुकम्पा से वह मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है।”
दिनांक – 21 जनवरी 2024
वार – रविवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 20 जनवरी 2024 को 07:26 पी एम बजे से
एकादशी तिथि समाप्त – जनवरी 21, 2024 को 07:26 पी एम बजे तक
पारण (व्रत तोड़ने का) समय – 22 जनवरी 2024 को 07:14 ए एम से 09:21 ए एम तक
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्ति समय – 07:51 पी एम
पुत्रदा एकादशी की महत्ता सुन अर्जुन के मन में और जिज्ञासा जाग उठी और उस ने भगवान श्री कृष्ण से कहा – हे कमलनयन! आप कृप्या कर इस व्रत की कथा भी मुझे विस्तारपूर्वक बताएं।
श्रीकृष्ण ने कहा– “हे पाण्डुनंदन! इस एकादशी से सम्बंधित जो कथा प्रचलित है, उसे मैं तुम्हें सुनाता हूँ, श्रद्धापूर्वक श्रवण करो-
प्राचीन समय में भद्रावती नगरी में सुकेतुमान नाम का एक राजा राज्य करता था। उसके कोई संतान नहीं थी। उसकी पत्नी का नाम शैव्या था। पुत्र ना होने के कारण राजा के मन में इस बात की बड़ी चिंता थी कि उसके बाद उसे और उसके पूर्वजों को कौन पिंडदान देगा। राजा रात-दिन इसी चिंता में घुला करता था। इस चिंता के कारण एक दिन वह इतना दुखी हो गया कि उसके मन में अपने शरीर को त्याग देने की इच्छा उत्पन्न हुई , किंतु वह सोचने लगा कि आत्महत्या करना तो महापाप है, अतः उसने इस विचार को मन से निकाल दिया। एक दिन इन्हीं विचारों में डूबा हुआ वह घोड़े पर सवार होकर वन को चल दिया।
घोड़े पर सवार राजा वन, पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा। उसने वन में देखा कि मृग, बाघ, सिंह, बंदर आदि विचरण कर रहे हैं। हाथी शिशुओं और हथिनियों के बीच में विचर रहा है। उस वन में राजा ने देखा कि कहीं तो सियार कर्कश शब्द निकाल रहे हैं और कहीं मोर अपने परिवार के साथ नाच रहे हैं। वन के दृश्यों को देखकर राजा और ज्यादा दुखी हो गया कि उसके पुत्र क्यों नहीं हैं? इसी सोच-विचार में दोपहर हो गई। वह सोचने लगा कि मैंने अनेक यज्ञ किए हैं और ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन करा सामर्थ्य के अनुसार दान दक्षिण दी है, किंतु फिर भी मुझे यह दुख क्यों मिल रहा है? आखिर इसका कारण क्या है? मैं अपनी व्यथा किससे कहूं? और कौन मेरी व्यथा का समाधान कर सकता है?
अपने विचारों में खोए राजा को प्यास लगी। वह पानी की तलाश में आगे बढ़ा। कुछ दूर जाने पर उसे एक सरोवर मिला। उस सरोवर में कमल पुष्प खिले हुए थे। सारस, हंस, घड़ियाल आदि जल-क्रीड़ा में मग्न थे। सरोवर के चारों तरफ ऋषियों के आश्रम बने हुए थे। अचानक राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे। इसे शुभ शगुन समझकर राजा मन में प्रसन्न होता हुआ घोड़े से नीचे उतरा और सरोवर के किनारे बैठे हुए ऋषियों को प्रणाम करके उनके पूछा ‘हे विप्रो! आप कौन हैं? और किसलिए यहां रह रहे हैं?’
ऋषि बोले – ‘राजन! आज पुत्र की इच्छा करने वालो को श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करने वाली पुत्रदा एकादशी है। आज से पांच दिन बाद माघ स्नान है और हम सब इस सरोवर में स्नान करने आए हैं।’
ऋषियों की बात सुन राजा ने कहा – ‘हे मुनियो! मेरा भी कोई पुत्र नहीं है, कृपा कर मुझे भी इस एकादशी व्रत के बारे में बताएं।
ऋषि बोले – ‘हे राजन! आज पुत्रदा एकादशी है। आप इसका उपवास करें। भगवान श्रीहरि की अनुकम्पा से आपके घर अवश्य ही पुत्र होगा।’
राजा ने मुनि के वचनों के अनुसार उस दिन उपवास किया और द्वादशी को व्रत का पारण किया और ऋषियों को प्रणाम कर उन का आशीर्वाद प्राप्त कर वापस अपनी नगरी आ गया। भगवान श्रीहरि की कृपा से कुछ दिनों बाद ही रानी ने गर्भ धारण किया और नौ माह के पश्चात उसने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। यह राजकुमार बड़ा होने पर अत्यंत वीर, धनवान, यशस्वी और प्रजापालक बना।
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]]>The post Lohri 2024: लोहड़ी क्यों और कैसे मनाएँ? जाने लोहड़ी गीत appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>यह त्यौहार प्रति वर्ष मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व उसकी पूर्वसंध्या पर 13 जनवरी को धूम-धाम से सिखों द्वारा पूरे विश्व में मनाया जाता है। लोहड़ी के दिन से कुछ दिन पहले से बालक एवं बालिकाएँ लोकगीत गाकर अपने मोहल्ले अथवा गाँव से लोहड़ी के लिए लकड़ी और उपले इकट्ठे करते हैं। इस अवसर पर विवाहिता महिलाओं के मयके से वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फलादि तथा अन्य उपहार भेजे जाते हैं।
लोहड़ी मनाएँ जाने के पिछे वैसे तो कई मान्यताएं हैं, लेकिन सबसे प्रचलित लोककथा दुल्ला भट्टी से जुड़ी है।
कई वर्षों से लोग लोहड़ी पर्व को दूल्ला भट्टी नामक चरित्र से जोड़ते हैं। लोहड़ी के कई गीतों में इनके नाम का ज़िक्र आता है। कहते हैं कि मुगल शासक अकबर के काल में एक नौजवान था। कथा के अनुसार एक गरीब ब्राह्मण की दो बेटियाँ थी। जिनका नाम सुंदरी और मुंदरी था। वह दोनो बहुत सुंदर थी। ब्राह्मण ने उन दोनो का विवाह पास के गाँव में पक्का कर दिया। जब ब्राह्मण की बेटियों की सुंदरता के बारे में वहाँ के मुग़ल शासकों को पता चला तो उनकी नियत ख़राब हो गयी। इस बात का जब लड़के वालों को पता चला तो उन लोगों ने रिश्ता तोड़ दिया।
इस बात से परेशान ब्राह्मण अपनी क़िस्मत को कोसते हुए जब रास्ते में जा रहा था तो उसकी मुलाक़ात दुल्ला भट्टी से हुयी। दुल्ला भट्टी को जब सारी बात पता चली तो उसने ब्राह्मण को उसकी बेटियों का विवाह कराने का आश्वासन दिया और उन की बेटियों को अपनी लड़की माना। इसके बाद उसके सारे गाँव वालों को जंगल में इकट्ठा किया और एक जगह आग जला कर उन दोनो लड़कियों की शादी करवाई। ग़रीबी के कारण शादी के समय लड़कियों के कपड़े फटे पुराने थे। उस समय सभी गाँव वालों ने उन्हें दान दिया। दुल्ला भट्टी के पास केवल शक्कर होने के कारण उसने उन्हें शक्कर शगुन में दी। तब से यह त्यौहार मनाया जा रहा है।
लोहड़ी आने के कई दिनों पहले ही युवा एवम बच्चे लोहड़ी के गीत गाते हैं. पन्द्रह दिनों पहले यह गीत गाना शुरू कर दिया जाता हैं जिन्हें घर-घर जाकर गया जाता हैं. इन गीतों में वीर शहीदों को याद किया जाता हैं जिनमे दुल्ला भट्टी के नाम विशेष रूप से लिया जाता हैं
लोहड़ी के दिन शाम को आग जलाने के बाद उसमें तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी और मूंगफली लोहड़ी को अर्पित की जाती है। उसके बाद सुंदरिए-मुंदरिए हो, ओ आ गई लोहड़ी वे, जैसे पारंपरिक गीत अग्नि के गोल-गोल चक्कर लगाकर गाते हैं और ढोल-नगाड़े बजाते और नाचते हैं।
सुंदर मुंदरिए – हो
तेरा कौन विचारा-हो
दुल्ला भट्टी वाला-हो
दुल्ले ने धी ब्याही-हो
सेर शक्कर पाई-हो
कुडी दे बोझे पाई-हो
कुड़ी दा लाल पटाका-हो
कुड़ी दा शालू पाटा-हो
शालू कौन समेटे-हो
चाचा गाली देसे-हो
चाचे चूरी कुट्टी-हो
जिमींदारां लुट्टी-हो
जिमींदारा सदाए-हो
गिन-गिन पोले लाए-हो
इक पोला घिस गया जिमींदार वोट्टी लै के नस्स गया – हो!
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]]>The post संक्रांति: वर्ष 2024 की संक्रांति तिथियाँ appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>यदि आप संक्रांति के दिन उपवास रखते हैं तो यहां जानिए वर्ष 2024 की सभी 12 संक्रांतियों की तारीखें। मकर, मेष, मिथुन, धनु और कर्क संक्रांति ज्यादा महत्व माना गया है। जब कभी भी सूर्य का राशि परिवर्तन होता है तो उस दिन सूर्य की पूजा करने से मान-सम्मान में वृद्धि, बल, आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। करियर में उच्च अधिकारी के पद पर बैठने की कामना पूरी होती है। निम्नलिखित जानकारी पंचांग पर आधारित है। पंचांग भेद से तिथि के समय में परिवर्तन होता भी है।
वर्ष 2024 की सभी 12 संक्रांति की तिथियाँ2024 Sankranti Calendar |
|||
| 1 | 15 जनवरी 2024 | सोमवार | |
| 2 | 13 फरवरी 2024 |
कुंभ संक्रांति
|
मंगलवार |
| 3 | 14 मार्च 2024 |
मीन संक्रांति
|
बृहस्पतिवार |
| 4 | 13 अप्रैल 2024 |
मेष संक्रांति
|
शनिवार |
| 5 | 14 मई 2024 |
वृषभ संक्रांति
|
मंगलवार |
| 6 | 15 जून 2024 |
मिथुन संक्रांति
|
शनिवार |
| 7 | 16 जुलाई 2024 |
कर्क संक्रांति
|
मंगलवार |
| 8 | 16 अगस्त 2024 |
सिंह संक्रांति
|
शुक्रवार |
| 9 | 16 सितंबर 2024 |
कन्या संक्रांति
|
सोमवार |
| 10 | 17 अक्टूबर 2024 |
तुला संक्रांति
|
बृहस्पतिवार |
| 11 | 16 नवंबर 2024 |
वृश्चिक संक्रांति
|
शनिवार |
| 12 | 15 दिसंबर 2024 |
धनु संक्रांति
|
रविवार |
डिसक्लेमर
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2024 एकादशी व्रत की तिथि |
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एकादशी |
दिनांक, वार |
हिंदी मास |
पक्ष
|
एकादशी समय |
सफला एकादशी(Saphala
|
जनवरी 7, 2024 रविवार |
पौष | कृष्ण पक्ष
|
प्रारम्भ – जनवरी 7, 12:41 ए एम से समाप्त – जनवरी 8, 12:46 ए एम तक |
पौष पुत्रदा एकादशी(Pausha
|
जनवरी 21, 2024 रविवार | पौष | शुक्ल पक्ष | प्रारम्भ – जनवरी 20, 07:26 पी एम से समाप्त – जनवरी 21, 07:26 पी एम तक |
षटतिला एकादशी
(Shattila Ekadashi) |
फरवरी 6, 2024, मंगलवार | माघ | कृष्ण पक्ष | प्रारम्भ – फरवरी 05, 05:24 पी एम से समाप्त -फरवरी 06, 04:07 पी एम तक |
जया एकादशी(Jaya Ekadashi) |
फरवरी 20, 2024, मंगलवार |
माघ |
शुक्ल पक्ष |
प्रारम्भ – फरवरी 19, 08:49 ए एम से
समाप्त – फरवरी 20, 09:55 ए एम तक
|
विजया एकादशी(Vijaya Ekadashi) |
मार्च 6, 2024, बुधवार |
फाल्गुन |
कृष्ण पक्ष |
प्रारम्भ – मार्च 06, 06:30 ए एम से
समाप्त – मार्च 07, 04:13 ए एम तक
|
आमलकी एकादशी(Amalaki Ekadashi) |
मार्च 20, 2024, बुधवार | फाल्गुन | शुक्ल पक्ष | प्रारम्भ – मार्च 20, 12:21 ए एम से समाप्त – मार्च 21, 02:22 ए एम तक |
पापमोचिनी एकादशी(Papmochani Ekadashi) |
अप्रैल 5, 2024, शुक्रवार | चैत्र | कृष्ण पक्ष | प्रारम्भ – अप्रैल 04, 04:14 पी एम से समाप्त – अप्रैल 05, 01:28 पी एम तक |
कामदा एकादशी(Kamada Ekadashi) |
अप्रैल 19, 2024, शुक्रवार |
चैत्र |
शुक्ल पक्ष |
प्रारम्भ – अप्रैल 18, 05:31 पी एम से
समाप्त – अप्रैल 19, 08:04 पी एम तक
|
बरूथिनी एकादशी(Varuthini Ekadashi) |
मई 4, 2022, शनिवार |
वैशाख |
कृष्ण पक्ष |
प्रारम्भ – मई 03, 11:24 पी एम से
समाप्त – मई 04, 08:38 पी एम तक
|
मोहिनी एकादशी(Mohini Ekadashi) |
मई 19, 2024, रविवार |
वैशाख |
शुक्ल पक्ष |
प्रारम्भ – मई 18, 11:22 ए एम से
समाप्त – मई 19, 01:50 पी एम तक
|
अपरा एकादशी(Apara Ekadashi) |
जून 2, 2024,
|
ज्येष्ठ |
कृष्ण पक्ष |
प्रारम्भ – जून 02, 05:04 ए एम से
समाप्त – जून 03, 02:41 ए एम तक
|
निर्जला एकादशी(Nirjala Ekadashi) |
जून 18, 2024, मंगलवार |
ज्येष्ठ |
शुक्ल पक्ष |
प्रारम्भ – जून 17, 04:43 ए एम पर
समाप्त – जून 18, 06:24 ए एम पर
|
योगिनी एकादशी(Yogini Ekadashi) |
जुलाई 02,
|
आषाढ़ |
कृष्ण पक्ष |
प्रारम्भ – जुलाई 01, 10:26 ए एम से
समाप्त – जुलाई 02, 08:42 ए एम तक
|
देवशयनी एकादशी(Devshayani Ekadashi) |
जुलाई 17, 2024, बुधवार |
आषाढ़ |
शुक्ल पक्ष |
प्रारम्भ – जुलाई 16, 08:33 पी एम से
समाप्त – जुलाई 17, 09:02 पी एम तक
|
कामिका एकादशी(Kamika Ekadashi) |
जुलाई 31, 2024,
|
श्रावण |
कृष्ण पक्ष |
प्रारम्भ – जुलाई 30, 04:44 पी एम से
समाप्त – जुलाई 31, 03:55 पी एम तक
|
श्रावण पुत्रदा एकादशी(Shravana Putrada Ekadashi) |
अगस्त 16, 2024, शुक्रवार |
श्रावण |
शुक्ल पक्ष |
प्रारम्भ – अगस्त 15, 10:26 ए एम से
समाप्त – अगस्त 16, 09:39 ए एम तक
|
अजा एकादशी(Aja Ekadashi) |
अगस्त 29, 2024, गुरुवार |
भाद्रपद |
कृष्ण पक्ष |
प्रारम्भ – अगस्त 29, 01:19 ए एम से
समाप्त – अगस्त 30, 01:37 ए एम तक
|
परिवर्तिनी एकादशी(Parivartini Ekadashi) |
सितम्बर 14, 2024, शनिवार |
भाद्रपद |
शुक्ल पक्ष |
प्रारम्भ – सितम्बर 13, 10:30 पी एम से
समाप्त – सितम्बर 14, 08:41 पी एम तक
|
इन्दिरा एकादशी(Indira Ekadashi) |
सितम्बर 28
|
आश्विन |
कृष्ण पक्ष |
प्रारम्भ – सितम्बर 27, 01:20 पी एम से
समाप्त – सितम्बर 28, 02:49 पी एम तक
|
पापांकुशा एकादशी(Papankusha Ekadashi) |
अक्टूबर 13, 2024, रविवार |
आश्विन |
शुक्ल पक्ष |
प्रारम्भ – अक्टूबर 13, 09:08 ए एम से
समाप्त – अक्टूबर 14, 06:41 ए एम तक
|
रमा एकादशी(Rama Ekadashi) |
अक्टूबर 28, 2024, सोमवार |
कार्तिक |
कृष्ण पक्ष |
प्रारम्भ – अक्टूबर 27, 05:23 ए एम से
समाप्त – अक्टूबर 28, 07:50 ए एम तक
|
देवुत्थान एकादशी(Devutthana Ekadashi) |
नवम्बर 12, 2024, मंगलवार |
कार्तिक |
शुक्ल पक्ष |
प्रारम्भ – नवम्बर 11, 06:46 पी एम से
समाप्त – नवम्बर 12, 04:04 पी एम तक
|
उत्पन्ना एकादशी(Utpanna Ekadashi) |
नवम्बर 26, 2024, मंगलवार |
मार्गशीर्ष |
कृष्ण पक्ष |
प्रारम्भ – नवम्बर 26, 01:01 ए एम से
समाप्त – नवम्बर 27, 03:47 ए एम तक
|
मोक्षदा एकादशी(Mokshada Ekadashi) |
दिसम्बर 11, 2024, बुधवार |
मार्गशीर्ष |
शुक्ल पक्ष |
प्रारम्भ – दिसम्बर 11, 03:42 ए एम से
समाप्त – दिसम्बर 12, 01:09 ए एम तक
|
सफला एकादशी(Saphala Ekadashi) |
दिसम्बर 26, 2024, गुरुवार |
पौष | कृष्ण पक्ष |
प्रारम्भ – दिसम्बर 25, 10:29 पी एम से
समाप्त – दिसम्बर 27, 12:43 ए एम तक
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]]>श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गाकर छंद रूप में उपदेश दिया, इसलिए इसे गीता कहा जाता है। क्योंकि उपदेश देने वाले स्वयं भगवान थे, इसलिए इस ग्रंथ का नाम भगवद्गीता है। गीता माहात्म्य के अनुसार, श्रीकृष्ण ने पद्म पुराण में बताया है कि भवबंधन (जन्म-मरण) से मुक्ति की प्राप्ति के लिए गीता ही पर्याप्त ग्रंथ है। गीता का मुख्य उद्देश्य ईश्वर का ज्ञान प्रदान करना माना जाता है।
भगवद्गीता में कई विद्याओं का वर्णन है, जिनमें चार प्रमुख हैं – अभय विद्या, साम्य विद्या, ईश्वर विद्या और ब्रह्म विद्या।
गीता का दूसरा नाम गीतोपनिषद है। श्रीमद्भागवत गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं, इन श्लोकों में कर्म, धर्म, कर्मफल, जन्म, मृत्यु, सत्य, असत्य आदि जीवन से जुड़े मूलभूत प्रश्नों के उत्तर मौजूद हैं।
अध्याय 1: अर्जुनविषादयोगः – कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण
अध्याय 2: साङ्ख्ययोगः – गीता का सार
अध्याय 3: कर्मयोगः – कर्मयोग
अध्याय 4: ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः – दिव्य ज्ञान
अध्याय 5: कर्मसंन्यासयोगः – कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म
अध्याय 6: आत्मसंयमयोगः – ध्यानयोग
अध्याय 7: ज्ञानविज्ञानयोगः – भगवद्ज्ञान
अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोगः – भगवत्प्राप्ति
अध्याय 9: राजविद्याराजगुह्ययोगः – परम गुह्य ज्ञान
अध्याय 10: विभूतियोगः – श्री भगवान् का ऐश्वर्य
अध्याय 11: विश्वरूपदर्शनयोगः – विराट रूप
अध्याय 12: भक्तियोगः – भक्तियोग
अध्याय 13: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः – प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोगः – प्रकृति के तीन गुण
अध्याय 15: पुरुषोत्तमयोगः – पुरुषोत्तम योग
अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोगः – दैवी तथा आसुरी स्वभाव
अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोगः – श्रद्धा के विभाग
अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोगः – उपसंहार-संन्यास की सिद्धि
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