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Religion

Pitru Paksha 2021

Shradh 2020: श्राद्ध कब और कैसे करें, जाने पूरा विवरण एवं विधि

शास्त्र के अनुरार “श्रद्धयां इदम् श्राद्धम्” अर्थात पितरों के निमित्त श्रद्धा से किया गया कर्म ही श्राद्ध है। साधारण शब्दों में श्राद्ध अपनेकुल देवताओं और पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करना है। हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष में श्राद्ध 16 दिनों की विशेष अवधि है। यह भाद्रपद पूर्णिमा से प्रारम्भ होकर आश्विन की अमावस्या तक होता है। इस अवधि को श्राद्ध पक्ष, पितृपक्ष और महालय के नाम सेजाना जाता है। माना जाता है की इस अवधि के समय पूर्वज जिनका इस संसार से गमन हो गया है वो विभिन्न रूपों में पृथ्वी पर अपनेरिश्तेदारों को आशीर्वाद देने के लिए आते हैं। श्राद्ध कैसे शुरू हुआ? महाभारत में गंगा पुत्र भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को श्राद्ध के विषय में खास...

अष्‍टविनायक मंदिरों के दर्शन, मिलेगा विघ्‍नहर्ता का आर्शिवाद

अष्‍टविनायक मंदिरों के दर्शन, मिलेगा विघ्‍नहर्ता का आर्शिवाद

देश भर में अनेक प्रसिद्ध गणेश मंदिर हैं और गणपति महोत्सव के मौके पर उन सब मंदिरो में दर्शनो के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। अब हमआपको गणेश जी के 8 मंदिरो के बारे में बता रहें जो बहुत प्राचीन है। महाराष्ट्र के पुणे के विभिन्न स्थानो में गणेश जी के आठ मंदिर हैं, इन्हें अष्टविनायक कहा जाता है। इन मंदिरों में गणेश जी की स्वयंभू (अपने आप प्रकट हुई) प्रतिमा है और कहा जाता है की यहाँ भगवान गणेश स्वयं विराजते हैं और इन अष्ट स्वरूप के दर्शन मात्र से कई जन्मों का पुण्य मिलता है। गणपति महोत्सव के मौके पर अष्टविनायक यात्रा का अपना महत्व है। पुणे के आस-पास स्थित गणपति जी के आठ स्वयभू मंदिरों के दर्शन के लिए यूंतो हमेशा ही श्रद्धालुओं की भीड़ रहती हैं, लेकिन गणेशोत्सव के दौरान यहां का माहौल अलग ही निराला होता है। इन अष्टविनायकों के साथ कईदिलचस्प कहानियां जुड़ी हुई हैं। माना जाता है कि ब्रह्मा जी के वरदान के बाद श्री गणेश ने हर युग में अलग-अलग रुपों में अवतार लिया और लोगोंको आशीर्वाद दिया।  ।। अष्टविनायक मंत्र ।। स्वस्ति श्रीगणनायकं गजमुखं मोरेश्वरं सिद्धिदम् ॥१॥बल्लाळं मुरुडे विनायकमहं चिन्तामणिं थेवरे ॥२॥लेण्याद्रौ गिरिजात्मजं सुवरदं विघ्नेश्वरं ओझरे ॥३॥ग्रामे रांजणनामके गणपतिं कुर्यात् सदा मङ्गलम् ॥४॥ श्री मयूरेश्वर मंदिर (मोरगांव, पुणे) मयूरेश्वर (मोरेश्वर) मंदिर पुणे से ८० किलोमीटर मोरगाँव में स्थित है। इस मंदिर के चारों कोनों में मीनारें और दीवारें हैं। यहाँ चार द्वार हैं जो चारों युग ( सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग) के प्रतीक हैं। यहाँ गणेशजी बैठी हुई मुद्रा  विराजमान  है। कहते हैं कि इसी स्‍थान पर गणेश जी नेसिंधुरासुर नाम के राक्षस का वध मोर पर सवार होकर उससे युद्ध करते हुए किया था। इसी कारण उनको मयूरेश्वर कहा जाता है। ये भी पढ़े : Ganesh Chaturthi 2020: घर में गणपति स्थापना,...

Ganesh Chaturthi 2020: घर में गणपति स्थापना, जानें शुभ मुहूर्त एवं पूजन विधि

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श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटी समप्रभा | निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येशु सर्वदा || अर्थ - घुमावदार सूंड वाले, विशाल शरीर काय,...

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