if ( ! function_exists( 'jnews_get_views' ) ) { /** * Gets views count. * * @param int $id The Post ID. * @param string|array $range Either an string (eg. 'last7days') or -since 5.3- an array (eg. ['range' => 'custom', 'time_unit' => 'day', 'time_quantity' => 7]) * @param bool $number_format Whether to format the number (eg. 9,999) or not (eg. 9999) * @return string */ function jnews_get_views( $id = null, $range = null, $number_format = true ) { $attr = array( 'id' => $id, 'range' => $range, 'number_format' => $number_format, ); $query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $attr ) ); $views = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' ); if ( false === $views ) { $views = JNews_View_Counter()->counter->get_views( $id, $range, $number_format ); wp_cache_set( $query_hash, $views, 'jnews-view-counter' ); } return $views; } } if ( ! function_exists( 'jnews_view_counter_query' ) ) { /** * Do Query * * @param $instance * @return array */ function jnews_view_counter_query( $instance ) { $query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $instance ) ); $query = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' ); if ( false === $query ) { $query = JNews_View_Counter()->counter->query( $instance ); wp_cache_set( $query_hash, $query, 'jnews-view-counter' ); } return $query; } } एकादशी Archives - हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव https://astrodeeva.com/tag/एकादशी/ Daily Dose of Astrology Wed, 03 Jan 2024 18:43:19 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0 https://astrodeeva.com/wp-content/uploads/2022/03/cropped-Logo-32x32.png एकादशी Archives - हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव https://astrodeeva.com/tag/एकादशी/ 32 32 Ekadashi Vrat 2024 – साल 2024 एकादशी व्रत कब और कौनसी, जाने पूरी लिस्ट https://astrodeeva.com/ekadashi-vrat-2024-year-2024-know-when-and-which-ekadashi-fast-complete-list/ https://astrodeeva.com/ekadashi-vrat-2024-year-2024-know-when-and-which-ekadashi-fast-complete-list/#respond Wed, 03 Jan 2024 09:38:04 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3756 हिन्दू धर्म में हर तिथि किसी न किसी भगवान या देवता को समर्पित होती है। उसी तरह एकादशी(Ekadashi Vrat 2024) तिथि भगवान विष्णु को समर्पित तिथि है और इसका हिन्दू धर्म में बड़ा महत्व है। एकादशी के दिन भक्तजन संतान, धन-धान्य और घर की प्राप्ति के लिए उपवास करते है। कभी कभी एकादशी व्रत लगातार […]

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हिन्दू धर्म में हर तिथि किसी न किसी भगवान या देवता को समर्पित होती है। उसी तरह एकादशी(Ekadashi Vrat 2024) तिथि भगवान विष्णु को समर्पित तिथि है और इसका हिन्दू धर्म में बड़ा महत्व है। एकादशी के दिन भक्तजन संतान, धन-धान्य और घर की प्राप्ति के लिए उपवास करते है। कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्थ-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।

Ekadashi Vrat 2024 – एकादशी व्रत तिथि 2024

 

2024 एकादशी व्रत की तिथि

एकादशी

दिनांक, वार

हिंदी मास

पक्ष

 

एकादशी समय

सफला एकादशी

(Saphala
Ekadashi)

जनवरी 7, 2024
रविवार 
पौष कृष्ण पक्ष

 

प्रारम्भ – जनवरी 7, 12:41 ए एम से 
समाप्त – जनवरी 8, 12:46 ए एम तक 

पौष पुत्रदा एकादशी

(Pausha
Putrada Ekadashi)

जनवरी 21, 2024 रविवार  पौष शुक्ल पक्ष प्रारम्भ – जनवरी 20, 07:26 पी एम से 
समाप्त – जनवरी 21, 07:26 पी एम तक 
षटतिला एकादशी

(Shattila Ekadashi)

फरवरी 6, 2024, मंगलवार  माघ कृष्ण पक्ष प्रारम्भ – फरवरी 05, 05:24 पी एम से
समाप्त -फरवरी 06, 04:07 पी एम तक 

जया एकादशी

(Jaya Ekadashi)

फरवरी 20, 2024, मंगलवार 

माघ

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – फरवरी 19, 08:49 ए एम से 
समाप्त – फरवरी 20, 09:55 ए एम तक 

विजया एकादशी

(Vijaya Ekadashi)

मार्च 6, 2024, बुधवार 

फाल्गुन

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ – मार्च 06, 06:30 ए एम से 
समाप्त – मार्च 07, 04:13 ए एम तक 

आमलकी एकादशी

(Amalaki Ekadashi)

मार्च 20, 2024, बुधवार  फाल्गुन शुक्ल पक्ष प्रारम्भ – मार्च 20, 12:21 ए एम से 
समाप्त – मार्च 21, 02:22 ए एम तक 

पापमोचिनी एकादशी

(Papmochani Ekadashi)

अप्रैल 5, 2024, शुक्रवार  चैत्र कृष्ण पक्ष प्रारम्भ – अप्रैल 04, 04:14 पी एम से 
समाप्त – अप्रैल 05, 01:28 पी एम तक 

कामदा एकादशी

(Kamada Ekadashi)

अप्रैल 19, 2024, शुक्रवार 

चैत्र

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – अप्रैल 18, 05:31 पी एम से  
समाप्त – अप्रैल 19, 08:04 पी एम तक  

बरूथिनी एकादशी

(Varuthini Ekadashi)

मई 4, 2022, शनिवार 

वैशाख

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ – मई 03, 11:24 पी एम से 
समाप्त – मई 04, 08:38 पी एम तक  

मोहिनी एकादशी

(Mohini Ekadashi)

मई 19, 2024, रविवार 

वैशाख

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – मई 18, 11:22 ए एम से 
समाप्त – मई 19, 01:50 पी एम तक 

अपरा एकादशी

(Apara Ekadashi)

जून 2, 2024,
रविवार

ज्येष्ठ

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ – जून 02, 05:04 ए एम से  
समाप्त – जून 03, 02:41 ए एम तक 

निर्जला एकादशी

(Nirjala Ekadashi)

जून 18, 2024, मंगलवार 

ज्येष्ठ

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – जून 17, 04:43 ए एम पर  
समाप्त – जून 18, 06:24 ए एम पर 

योगिनी एकादशी

(Yogini Ekadashi)

जुलाई 02,
2024,
मंगलवार 

आषाढ़

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ – जुलाई 01, 10:26 ए एम से  
समाप्त – जुलाई 02, 08:42 ए एम तक  

देवशयनी एकादशी

(Devshayani Ekadashi)

जुलाई 17, 2024, बुधवार 

आषाढ़

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – जुलाई 16, 08:33 पी एम से  
समाप्त – जुलाई 17, 09:02 पी एम तक  

कामिका एकादशी

(Kamika Ekadashi)

जुलाई 31, 2024,
बुधवार 

श्रावण

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ –  जुलाई 30, 04:44 पी एम से 
समाप्त – जुलाई 31, 03:55 पी एम तक 

श्रावण पुत्रदा एकादशी

(Shravana Putrada Ekadashi)

अगस्त 16, 2024, शुक्रवार 

श्रावण

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ –  अगस्त 15, 10:26 ए एम से 
समाप्त – अगस्त 16, 09:39 ए एम तक 

अजा एकादशी

(Aja Ekadashi)

अगस्त 29, 2024, गुरुवार 

भाद्रपद

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ – अगस्त 29, 01:19 ए एम से  
समाप्त – अगस्त 30, 01:37 ए एम तक 

परिवर्तिनी एकादशी

(Parivartini Ekadashi)

सितम्बर 14, 2024, शनिवार 

भाद्रपद

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – सितम्बर 13, 10:30 पी एम से  
समाप्त – सितम्बर 14, 08:41 पी एम तक 

इन्दिरा एकादशी

(Indira Ekadashi)

सितम्बर 28
,2024, शनिवार 

आश्विन

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ –  सितम्बर 27, 01:20 पी एम से 
समाप्त – सितम्बर 28, 02:49 पी एम तक  

पापांकुशा एकादशी

(Papankusha Ekadashi)

 अक्टूबर 13, 2024, रविवार 

आश्विन

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ –  अक्टूबर 13, 09:08 ए एम से 
समाप्त – अक्टूबर 14, 06:41 ए एम तक 

रमा एकादशी

(Rama Ekadashi)

अक्टूबर 28, 2024, सोमवार 

कार्तिक

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ – अक्टूबर 27, 05:23 ए एम से 
समाप्त – अक्टूबर 28, 07:50 ए एम तक 

देवुत्थान एकादशी

(Devutthana Ekadashi)

नवम्बर 12, 2024, मंगलवार 

कार्तिक

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – नवम्बर 11, 06:46 पी एम से  
समाप्त – नवम्बर 12, 04:04 पी एम तक 

उत्पन्ना एकादशी

(Utpanna Ekadashi)

 नवम्बर 26, 2024, मंगलवार 

मार्गशीर्ष

कृष्ण पक्ष

प्रारम्भ –  नवम्बर 26, 01:01 ए एम से 
समाप्त – नवम्बर 27, 03:47 ए एम तक  

मोक्षदा एकादशी

(Mokshada Ekadashi)

दिसम्बर 11, 2024, बुधवार 

मार्गशीर्ष

शुक्ल पक्ष

प्रारम्भ – दिसम्बर 11, 03:42 ए एम से  
समाप्त – दिसम्बर 12, 01:09 ए एम तक 

सफला एकादशी

(Saphala Ekadashi)

दिसम्बर 26, 2024, गुरुवार 

 

पौष कृष्ण पक्ष
प्रारम्भ – दिसम्बर 25, 10:29 पी एम से  
समाप्त – दिसम्बर 27, 12:43 ए एम तक 

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Papmochani Ekadashi 2022 – पापमोचनी एकादशी https://astrodeeva.com/papmochani-ekadashi-2022-papmochani-ekadashi/ https://astrodeeva.com/papmochani-ekadashi-2022-papmochani-ekadashi/#respond Sat, 26 Mar 2022 04:30:13 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3057 हिन्दू या सनातन धर्म विविधता से परिपूर्ण है यह वास्तव में एक जीवन पद्धति है। हर वर्ष  होने वाले तीज, त्यौहार, कर्म कांड ही हिन्दू धर्म की विविधता और विशालता को दर्शाते हैं। हिन्दू धर्म में शुभ तिथियों और त्यौहार का बड़ा महत्व है। विभिन्न हिंदू व्रतों के बीच, एकादशी व्रत का सर्वोच्च स्थान है। हिंदू […]

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हिन्दू या सनातन धर्म विविधता से परिपूर्ण है यह वास्तव में एक जीवन पद्धति है। हर वर्ष  होने वाले तीज, त्यौहार, कर्म कांड ही हिन्दू धर्म की विविधता और विशालता को दर्शाते हैं। हिन्दू धर्म में शुभ तिथियों और त्यौहार का बड़ा महत्व है। विभिन्न हिंदू व्रतों के बीच, एकादशी व्रत का सर्वोच्च स्थान है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक माह में दो पक्ष होते हैं, दोनों पक्षों शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की ग्याहरवीं तिथि को एकादशी का व्रत किया जाता है। इस तरह  एक महीने में दो एकादशियां, और एक वर्ष में 24 एकादशियां होती हैं।हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की ग्याहरवीं तिथि को पापमोचनी (Papmochani Ekadashi) अथवा पापों को भस्म करने वाली एकादशी के रूप में मनाया जाता हैं। इस मोह माया से भरे संसार में ऐसा कोई मनुष्य नहीं जन्मा जिससे अनजाने में कोई पाप नहीं हुआ हो इसलिए पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) का विशेष महत्व है इस एकादशी को करने से जाने-अनजाने में हुए सभी तरह के पाप के दोष से मुक्ति प्राप्त होती हैं।

पापमोचनी एकादशी 2022 (Papmochani Ekadashi 2022)

दिनांक : 28 मार्च 2022
वार : सोमवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ : 27 मार्च 2022 को 06:04 पी एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त : 28 मार्च 2022 को 04:15 पी एम बजे
पारण (व्रत तोड़ने का) समय : 29 मार्च 2022 को 06:15 ए एम से 08:43 ए एम
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय02:38 पी एम

Also Read – Ekadashi Vrat 2022 – एकादशी व्रत तिथि 2022

पापमोचनी एकादशी कथा (Story of Papmochani Ekadashi)

 पुराणों के अनुसार एक बार अर्जुन ने कहा- “हे कमलनयन! मैं ज्यों-ज्यों एकादशियों के व्रतों की कथाएँ सुन रहा हूँ, त्यों-त्यों अन्य एकादशियों के व्रतों की कथाएँ सुनने की मेरी जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही है। हे मधुसूदन! अब कृपा कर आप चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के विषय में बतलाइये। इस एकादशी का नाम क्या है? इसमें कौन-से देवता का पूजन किया जाता है तथा इस व्रत का क्या विधान है? हे श्रीकृष्ण! यह सब आप मुझे विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें।”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! एक बार यही प्रश्न पृथ्वीपति मान्धाता ने लोमश ऋषि से किया था, जो कुछ लोमश ऋषि ने राजा मान्धाता को बताया था, वही मैं तुमसे कह रहा हूँ। राजा मान्धाता ने धर्म के गुह्यतम रहस्यों के ज्ञाता महर्षि लोमश से पूछा- ‘हे ऋषिश्रेष्ठ! मनुष्य के पापों का मोचन किस प्रकार सम्भव है? कृपा कर कोई ऐसा सरल उपाय बतायें, जिससे सहज ही पापों से छुटकारा मिल जाए।’

महर्षि लोमश ने कहा- ‘हे नृपति! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम पापमोचिनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) है। उसके व्रत के प्रभाव से मनुष्यों के अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं। मैं तुम्हें इस व्रत की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो- प्राचीन समय में चैत्ररथ नामक एक वन था। उसमें अप्सराएँ किन्नरों के साथ विहार किया करती थीं। वहाँ सदैव वसन्त का मौसम रहता था, अर्थात उस जगह सदा नाना प्रकार के पुष्प खिले रहते थे। कभी गन्धर्व कन्‍याएँ विहार किया करती थीं, कभी देवेन्द्र अन्य देवताओं के साथ क्रीड़ा किया करते थे।

उसी वन में मेधावी नाम के एक ऋषि भी तपस्या में लीन रहते थे। वे शिवभक्त थे। एक दिन मञ्जुघोषा नामक एक अप्सरा ने उनको मोहित कर उनकी निकटता का लाभ उठाने की चेष्टा की, इसलिए वह कुछ दूरी पर बैठ वीणा बजाकर मधुर स्वर में गाने लगी। उसी समय शिव भक्त महर्षि मेधावी को कामदेव भी जीतने का प्रयास करने लगे। कामदेव ने उस सुन्दर अप्सरा के भ्रू का धनुष बनाया। कटाक्ष को उसकी प्रत्यन्चा बनाई और उसके नेत्रों को मञ्जुघोषा अप्सरा का सेनापति बनाया। इस तरह कामदेव अपने शत्रुभक्त को जीतने को तैयार हुआ। उस समय महर्षि मेधावी भी युवावस्था में थे और काफी हृष्ट-पुष्ट थे। उन्होंने यज्ञोपवीत तथा दण्ड धारण कर रखा था। वे दूसरे कामदेव के समान प्रतीत हो रहे थे। उस मुनि को देखकर कामदेव के वश में हुई मञ्जुघोषा ने धीरे-धीरे मधुर वाणी से वीणा पर गायन शुरू किया तो महर्षि मेधावी भी मञ्जुघोषा के मधुर गाने पर तथा उसके सौन्दर्य पर मोहित हो गए। वह अप्सरा मेधावी मुनि को कामदेव से पीड़ित जानकर उनसे आलिङ्गन करने लगी।

महर्षि मेधावी उसके सौन्दर्य पर मोहित होकर शिव रहस्य को भूल गए और काम के वशीभूत होकर उसके साथ रमण करने लगे। काम के वशीभूत होने के कारण मुनि को उस समय दिन-रात का कुछ भी ज्ञान न रहा और काफी समय तक वे रमण करते रहे। तदुपरान्त मञ्जुघोषा उस मुनि से बोली- ‘हे ऋषिवर! अब मुझे बहुत समय हो गया है, अतः स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये।’

अप्सरा की बात सुनकर ऋषि ने कहा- ‘हे मोहिनी! सन्ध्या को तो आयी हो, प्रातःकाल होने पर चली जाना।’

ऋषि के ऐसे वचनों को सुनकर अप्सरा उनके साथ रमण करने लगी। इसी प्रकार दोनों ने साथ-साथ बहुत समय बिताया।

मञ्जुघोषा ने एक दिन ऋषि से कहा- ‘हे विप्र! अब आप मुझे स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये।’

मुनि ने इस बार भी वही कहा- ‘हे रूपसी! अभी ज्यादा समय व्यतीत नहीं हुआ है, कुछ समय और ठहरो।’

मुनि की बात सुन अप्सरा ने कहा- ‘हे ऋषिवर! आपकी रात तो बहुत लम्बी है। आप स्वयं ही सोचिये कि मुझे आपके पास आये कितना समय हो गया। अब और ज्यादा समय तक ठहरना क्या उचित है?’

अप्सरा की बात सुन मुनि को समय का बोध हुआ और वह गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगे। जब उन्हें समय का ज्ञान हुआ कि उन्हें रमण करते सत्तावन (57) वर्ष व्यतीत हो चुके हैं तो उस अप्सरा को वह काल का रूप समझने लगे। इतना ज्यादा समय भोग-विलास में व्यर्थ चला जाने पर उन्हें बड़ा क्रोध आया। अब वह भयंकर क्रोध में जलते हुए उस तप नाश करने वाली अप्सरा की तरफ भृकुटी तानकर देखने लगे। क्रोध से उनके अधर काँपने लगे और इन्द्रियाँ बेकाबू होने लगीं। क्रोध से थरथराते स्वर में मुनि ने उस अप्सरा से कहा- ‘मेरे तप को नष्ट करने वाली दुष्टा! तू महा पापिन और बहुत ही दुराचारिणी है, तुझ पर धिक्कार है। अब तू मेरे शाप (श्राप) से पिशाचिनी बन जा।’

मुनि के क्रोधयुक्त शाप (श्राप) से वह अप्सरा पिशाचिनी बन गई। यह देख वह व्यथित होकर बोली- ‘हे ऋषिवर! अब मुझ पर क्रोध त्यागकर प्रसन्न होइए और कृपा करके बताइये कि इस शाप (श्राप) का निवारण किस प्रकार होगा? विद्वानों ने कहा है, साधुओं की सङ्गत अच्छा फल देने वाली होती है और आपके साथ तो मेरे बहुत वर्ष व्यतीत हुए हैं, अतः अब आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइए, अन्यथा लोग कहेंगे कि एक पुण्य आत्मा के साथ रहने पर मञ्जुघोषा को पिशाचिनी बनना पड़ा।’ मञ्जुघोषा की बात सुनकर मुनि को अपने क्रोध पर अत्यन्त ग्लानि हुई साथ ही अपनी अपकीर्ति का भय भी हुआ, अतः पिशाचिनी बनी मञ्जुघोषा से मुनि ने कहा- ‘तूने मेरा बड़ा बुरा किया है, किन्तु फिर भी मैं तुझे इस शाप (श्राप) से मुक्ति का उपाय बतलाता हूँ। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी है, उसका नाम पापमोचिनी(Papmochani Ekadashi) है। उस एकादशी का उपवास करने से तेरी पिशाचिनी की देह से मुक्ति हो जाएगी।’

ऐसा कहकर मुनि ने उसको व्रत का सब विधान समझा दिया। फिर अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए वे अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गये।

च्यवन ऋषि ने अपने पुत्र मेधावी को देखकर कहा- ‘हे पुत्र! ऐसा क्या किया है तूने कि तेरे सभी तप नष्ट हो गए हैं? जिससे तुम्हारा समस्त तेज मलिन हो गया है?’

मेधावी मुनि ने लज्जा से अपना सिर झुकाकर कहा- ‘पिताश्री! मैंने एक अप्सरा से रमण करके बहुत बड़ा पाप किया है। इसी पाप के कारण सम्भवतः मेरा सारा तेज और मेरे तप नष्ट हो गए हैं। कृपा करके आप इस पाप से छूटने का उपाय बतलाइये।’

ऋषि ने कहा- ‘हे पुत्र! तुम चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी का विधि तथा भक्तिपूर्वक उपवास करो, इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।’

अपने पिता च्यवन ऋषि के वचनों को सुनकर मेधावी मुनि ने पापमोचिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। उसके प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए। मञ्जुघोषा अप्सरा भी पापमोचिनी एकादशी का उपवास करने से पिशाचिनी की देह से छूट गई और पुनः अपना सुन्दर रूप धारण कर स्वर्गलोक चली गई। लोमश मुनि ने कहा-हे राजन! इस पापमोचिनी एकादशी के प्रभाव से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी की कथा के श्रवण व पठन से एक हजार गौदान करने का फल प्राप्त होता है। इस उपवास के करने से ब्रह्म हत्या करने वाले, स्वर्ण चुराने वाले, मद्यपान करने वाले, अगम्या गमन करने वाले आदि भयंकर पाप भी नष्ट हो जाते हैं और अन्त में स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।”

पापमोचनी एकादशी व्रत विधि 

Papmochani Ekadashi व्रत के विषय में भविष्योत्तर पुराण में विस्तार से वर्णन किया गया है। इस व्रत में भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है। इस व्रत को रखने वाले व्रती को दशमी तिथि को एक बार सात्विक भोजन करना चहिये और मन से भोग विलास की भावना को निकालकर श्री हरि में मन को लगाना चहिये।

  • व्रती एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करे। स्नान करते हुए इस पवित्र नदियों को समर्पित मंत्र का जाप कर सकते हैं।

गंगा च यमुना चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेसमिन सानिधिम कुरु”

(अर्थात्- इस पानी में, मैं गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी नदियों से दिव्य जल की उपस्थिति का आह्वान करता हूं)

  • पूजा स्थल पर पीले कुशा आसन पर बैठकर घी का दीपक जलाकर व्रत का संकल्प करें।
  • संकल्प के उपरान्त षोड्षोपचार सहित श्री विष्णु की पूजा करें।
  • पूजा के पश्चात भगवान के समक्ष बैठकर भग्वद् कथा का पाठ अथवा श्रवण करें।
  • एकादशी तिथि को जागरण करने से कई गुणा पुण्य मिलता है अत: रात्रि में भी निराहार रहकर भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें।
  • द्वादशी के दिन प्रात: स्नान करके विष्णु भगवान की पूजा करें फिर ब्रह्मणों को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करें।
  • तत्पश्चात व्रत का पारण करें

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस संसार में जो भी मनुष्य भगवान श्री विष्णु का आशीर्वाद पाना चाहता है, उसे एकादशी का व्रत जरुर करना चाहिए। एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। एकादशी के व्रत रखने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होने के साथ ही सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

 

**(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैंजिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

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भागयोन्नति के लिये किस दिन करें किस चीज का दान..

 

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Ekadashi Vrat 2022 – एकादशी व्रत तिथि 2022 https://astrodeeva.com/ekadashi-vrat-2022-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a5%e0%a4%bf-2022/ https://astrodeeva.com/ekadashi-vrat-2022-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a5%e0%a4%bf-2022/#respond Wed, 12 Jan 2022 15:40:26 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2706 हिन्दू धर्म में हर तिथि किसी न किसी भगवान या देवता को समर्पित होती है उसी तरह एकादशी(Ekadashi) तिथि भगवान विष्णु को समर्पित तिथि है और इसका हिन्दू धर्म में बड़ा महत्व है। एकादशी के दिन भक्तजन संतान, धन-धान्य और घर की प्राप्ति के लिए उपवास करते है। कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों […]

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हिन्दू धर्म में हर तिथि किसी न किसी भगवान या देवता को समर्पित होती है उसी तरह एकादशी(Ekadashi) तिथि भगवान विष्णु को समर्पित तिथि है और इसका हिन्दू धर्म में बड़ा महत्व है। एकादशी के दिन भक्तजन संतान, धन-धान्य और घर की प्राप्ति के लिए उपवास करते है। कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्थ-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।

Ekadashi Vrat 2022 – एकादशी व्रत तिथि 2022

2022 एकादशी व्रत तिथि

एकादशी

दिनांक, वार

हिंदी मास

पक्ष

एकादशी समय

पौष पुत्रदा एकादशी

(Pausha Putrada Ekadashi)

जनवरी 13, 2022, गुरुवार

पौष

शुक्ल पक्ष

पौष, शुक्ल एकादशी

प्रारम्भ – 04:49 पी एम,जनवरी 12

समाप्त – 07:32 पी एम,जनवरी 13

षटतिला एकादशी

(Shattila Ekadashi)

जनवरी 28, 2022, शुक्रवार

माघ

कृष्ण पक्ष

माघ, कृष्ण एकादशी

प्रारम्भ – 02:16 ए एम,जनवरी 28

समाप्त – 11:35 पी एम,जनवरी 28

जया एकादशी

(Jaya Ekadashi)

फरवरी 12, 2022, शनिवार

माघ

शुक्ल पक्ष

माघ, शुक्ल एकादशी

प्रारम्भ – 01:52 पी एम,फरवरी 11

समाप्त – 04:27 पी एम,फरवरी 12

विजया एकादशी

(Vijaya Ekadashi)

फरवरी 27, 2022, रविवार

फाल्गुन

कृष्ण पक्ष

फाल्गुन, कृष्ण एकादशी

प्रारम्भ – 10:39 ए एम,फरवरी 26

समाप्त – 08:12 ए एम,फरवरी 27

आमलकी एकादशी

(Amalaki Ekadashi)

मार्च 14, 2022, सोमवार

फाल्गुन

शुक्ल पक्ष

फाल्गुन, शुक्ल एकादशी

प्रारम्भ – 10:21 ए एम,मार्च 13

समाप्त – 12:05 पी एम,मार्च 14

पापमोचिनी एकादशी

(Papmochani Ekadashi)

मार्च 28, 2022, सोमवार

चैत्र

कृष्ण पक्ष

चैत्र, कृष्ण एकादशी

प्रारम्भ – 06:04 पी एम,मार्च 27

समाप्त – 04:15 पी एममार्च 28

कामदा एकादशी

(Kamada Ekadashi)

अप्रैल 12, 2022, मंगलवार

चैत्र

शुक्ल पक्ष

चैत्र, शुक्ल एकादशी

प्रारम्भ – 04:30 ए एमअप्रैल 12

समाप्त – 05:02 ए एमअप्रैल 13

बरूथिनी एकादशी

(Varuthini Ekadashi)

अप्रैल 26, 2022, मंगलवार

वैशाख

कृष्ण पक्ष

वैशाख, कृष्ण एकादशी

प्रारम्भ – 01:37 ए एमअप्रैल 26

समाप्त – 12:47 ए एमअप्रैल 27

मोहिनी एकादशी

(Mohini Ekadashi)

मई 12, 2022, बृहस्पतिवार

वैशाख

शुक्ल पक्ष

वैशाख, शुक्ल एकादशी

प्रारम्भ – 07:31 पी एम,
मई 11

समाप्त – 06:51 पी एम,
मई 12

अपरा एकादशी

(Apara Ekadashi)

मई 26, 2022, बृहस्पतिवार

ज्येष्ठ

कृष्ण पक्ष

ज्येष्ठ, कृष्ण एकादशी

प्रारम्भ – 10:32 ए एम,
मई 25

समाप्त – 10:54 ए एम,
मई 26

निर्जला एकादशी

(Nirjala Ekadashi)

जून 11, 2022, शुक्रवार

ज्येष्ठ

शुक्ल पक्ष

ज्येष्ठ, शुक्ल एकादशी

प्रारम्भ – 07:25 ए एम,
जून 10

समाप्त – 05:45 ए एम,
जून 11

योगिनी एकादशी

(Yogini Ekadashi)

जून 24, 2022, शुक्रवार

आषाढ़

कृष्ण पक्ष

आषाढ़, कृष्ण एकादशी

प्रारम्भ – 09:41 पी एम,
जून 23

समाप्त – 11:12 पी एम,
जून 24

देवशयनी एकादशी

(Devshayani Ekadashi)

जुलाई 10, 2022, रविवार

आषाढ़

शुक्ल पक्ष

आषाढ़, शुक्ल एकादशी

प्रारम्भ – 04:39 पी एम,
जुलाई 09

समाप्त – 02:13 पी एम,
जुलाई 10

कामिका एकादशी

(Kamika Ekadashi)

जुलाई 24, 2022, रविवार

श्रावण

कृष्ण पक्ष

श्रावण, कृष्ण एकादशी

प्रारम्भ – 11:27 ए एम,
जुलाई 23

समाप्त – 01:45 पी एम,
जुलाई 24

श्रावण पुत्रदा एकादशी

(Shravana Putrada Ekadashi)

अगस्त 8, 2022, सोमवार

श्रावण

शुक्ल पक्ष

श्रावण, शुक्ल एकादशी

प्रारम्भ – 11:50 पी एम,अगस्त 07

समाप्त – 09:00 पी एम,अगस्त 08

अजा एकादशी

(Aja Ekadashi)

अगस्त 23, 2022, मंगलवार

भाद्रपद

कृष्ण पक्ष

भाद्रपद, कृष्ण एकादशी

प्रारम्भ – 03:35 ए एम,अगस्त 22

समाप्त – 06:06 ए एम,अगस्त 23

परिवर्तिनी एकादशी

(Parivartini Ekadashi)

सितम्बर 6, 2022, मंगलवार

भाद्रपद

शुक्ल पक्ष

भाद्रपद, शुक्ल एकादशी

प्रारम्भ – 05:54 ए एम,सितम्बर 06

समाप्त – 03:04 ए एम,सितम्बर 07

इन्दिरा एकादशी

(Indira Ekadashi)

सितम्बर 21,2022, बुधवार

आश्विन

कृष्ण पक्ष

आश्विन, कृष्ण एकादशी

प्रारम्भ – 09:26 पी एम,सितम्बर 20

समाप्त – 11:34 पी एम,सितम्बर 21

पापांकुशा एकादशी

(Papankusha Ekadashi)

अक्टूबर 6, 2022, बृहस्पतिवार

आश्विन

शुक्ल पक्ष

आश्विन, शुक्ल एकादशी

प्रारम्भ – 12:00 पी एम,अक्टूबर 05

समाप्त – 09:40 ए एम,अक्टूबर 06

रमा एकादशी

(Rama Ekadashi)

अक्टूबर 21, 2022, शुक्रवार

कार्तिक

कृष्ण पक्ष

कार्तिक, कृष्ण एकादशी

प्रारम्भ – 04:04 पी एम,अक्टूबर 20

समाप्त – 05:22 पी एम,अक्टूबर 21

देवुत्थान एकादशी

(Devutthana Ekadashi)

नवम्बर 4, 2022, शुक्रवार

कार्तिक

शुक्ल पक्ष

कार्तिक, शुक्ल एकादशी

प्रारम्भ – 07:30 पी एमनवम्बर 03

समाप्त – 06:08 पी एमनवम्बर 04

उत्पन्ना एकादशी

(Utpanna Ekadashi)

नवम्बर 20, 2022, रविवार

मार्गशीर्ष

कृष्ण पक्ष

मार्गशीर्ष, कृष्ण एकादशी

प्रारम्भ – 10:29 ए एमनवम्बर 19

समाप्त – 10:41 ए एमनवम्बर 20

मोक्षदा एकादशी

(Mokshada Ekadashi)

दिसम्बर 3, 2022, शनिवार

मार्गशीर्ष

शुक्ल पक्ष

मार्गशीर्ष, शुक्ल एकादशी

प्रारम्भ – 05:39 ए एमदिसम्बर 03

समाप्त – 05:34 ए एमदिसम्बर 04

सफला एकादशी

(Saphala Ekadashi)

दिसम्बर 19,2022, सोमवार

पौष

कृष्ण पक्ष

पौष, कृष्ण एकादशी

प्रारम्भ -03:32 ए एम, दिसम्बर 19

समाप्त -02:32 ए एम, दिसम्बर 20

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Rama Ekadashi 2021 : माता लक्ष्मी को समर्पित रमा एकादशी व्रत, जाने महत्व, कथा शुभ मुहूर्त https://astrodeeva.com/rama-ekadashi-2021/ https://astrodeeva.com/rama-ekadashi-2021/#respond Sun, 24 Oct 2021 03:59:32 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2605 Rama Ekadashi 2021: हिंदू धर्म में व्रत उपवास का बहुत महत्व है। हर महीने आने वाली एकादशियों का महत्व तो ओर भी अधिक है। हर एकादशी की अपनी एक खास विशेषता होती है। उसी प्रकार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी भी खास है। आइये जानते हैं इसके महत्व, व्रत एवं पूजा विधि के बारे […]

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Rama Ekadashi 2021: हिंदू धर्म में व्रत उपवास का बहुत महत्व है। हर महीने आने वाली एकादशियों का महत्व तो ओर भी अधिक है। हर एकादशी की अपनी एक खास विशेषता होती है। उसी प्रकार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी भी खास है। आइये जानते हैं इसके महत्व, व्रत एवं पूजा विधि के बारे में।

क्यों कहते हैं इसे रमा एकादशी

कार्तिक मास भगवान विष्णु को समर्पित होता है। भगवान विष्णु इस समय शयन कर रहे होते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को ही वो चार मास बाद जागते हैं। लेकिन कृष्ण पक्ष में जितने भी त्यौहार आते हैं उनका संबंध किसी न किसी तरीके से माता लक्ष्मी से भी होता है।माता लक्ष्मी जी का एक नाम रमा भी है इसलिए इस एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है।

रमा एकादशी 2021(Rama Ekadashi 2021)

दिनांक : 01 नवम्बर 2021
वार : सोमवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 31 नवम्बर 2021 को 02:27 पी एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त – 01 नवम्बर 2021 को 01:21 पी एम बजे
पारण( व्रत तोड़ने की) तिथि: 2 नवम्बर 2021
पारण ( व्रत तोड़ने का) समय: 06:34 ए एम से 08:46 ए एम
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय – 11:31 ए एम

रमा एकादशी कथा (Legend Of Rama Ekadashi)

अर्जुन ने कहा- “हे श्रीकृष्ण! आप मुझे कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनाइए। इस एकादशी का क्या नाम है तथा इसमें किस देवता का पूजन किया जाता है? इस एकादशी का व्रत करने से किस फल की प्राप्ति होती है?कृपा करके सब विस्तारपूर्वक बतायें”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम रमा एकादशी है। इसका व्रत करने से सभी पापों का शमन होता है। इसकी कथा इस प्रकार है,

पौराणिक काल में मुचुकुंद नाम का राजा राज्य करता था। सभी देवता उसके मित्र थे। वह बड़ा सत्यवादी तथा विष्णुभक्त था। उसका राज्य बिल्कुल निष्कंटक था। उसकी चन्द्रभागा नाम की एक कन्या थी, जिसका विवाह उसने राजा चन्द्रसेन के पुत्र सोभन से कर दिया। वह राजा एकादशी का व्रत बड़े ही भक्ति भाव से नियमपूर्वक करता था और उसके राज्य में सभी इस नियम का पालन करते थे।

एक बार की बात है कि सोभन अपनी ससुराल आया हुआ था। वह कार्तिक का महीना था। उसी मास में महापुण्यदायिनी रमा एकादशी आ गई। इस दिन सभी व्रत रखते थे। चन्द्रभागा ने सोचा कि मेरे पति तो बड़े कमजोर हृदय के हैं, वे एकादशी का व्रत कैसे करेंगे, जबकि पिता के यहां तो सभी को व्रत करने की आज्ञा है। मेरा पति अगर राजाज्ञा मान कर उपवास करेंगे तो बहुत कष्ट होगा। चन्द्रभागा को जिस बात का डर था वही हुआ। राजा मुचुकुंद ने आदेश जारी किया कि इस समय उनका दामाद राज्य में पधारा हुआ है, अतः सारी प्रजा विधानपूर्वक एकादशी का व्रत करे। उसे सुनकर सोभन अपनी पत्नी के पास गया और बोला – ‘हे प्रिय! तुम मुझे कुछ उपाय बतलाओ, क्योंकि मैं उपवास नहीं कर सकता, यदि मैं उपवास करूंगा तो अवश्य ही मर जाऊंगा।’

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पति की बात सुन चन्द्रभागा ने कहा – ‘हे स्वामी! मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं कर सकता। यहां तक कि राज्य के पालतू जानवर हाथी, घोड़ा, ऊंट आदि भी अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं करते, फिर भला मनुष्य कैसे भोजन कर सकते हैं? यदि आप उपवास नहीं कर सकते तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए, क्योंकि यदि आप यहां रहेंगे तो आपको व्रत तो अवश्य ही करना पड़ेगा।’

पत्नी की बात सुन सोभन ने कहा – ‘हे प्रिय! तुम्हारी राय उचित है, परंतु मैं व्रत करने के डर से किसी दूसरे स्थान पर नहीं जाऊंगा, अब मैं व्रत अवश्य ही करूंगा, परिणाम चाहे कुछ भी और भाग्य के लिखे को भला कौन टाल सकता है।’

सभी के साथ सोभन ने भी एकादशी का व्रत किया और भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल होने लगा। सूर्य नारायण भी अस्त हो गए और जागरण के लिए रात्रि भी आ गई। वह रात सोभन को असहनीय दुख देने वाली थी। दूसरे दिन सूर्योदय होने से पूर्व ही भूख-प्यास के कारण सोभन के प्राण-पखेरू उड़ गए।

राजा ने सोभन के मृत शरीर को जल-प्रवाह करा दिया और अपनी पुत्री मायके में रहकर एकादशी का व्रत करने और भगवान विष्णु की कृपा पर भरोसा रखने को कहा। चन्द्रभागा अपने पिता की आज्ञानुसार अपने पिता के घर रहकर एकादशी के व्रत करने लगी।

उसके व्रत के प्रभाव से सोभन को जल से निकाल लिया गया और भगवान विष्णु की कृपा से उसे मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से परिपूर्ण तथा शत्रु रहित देवपुर नाम का एक उत्तम नगर प्राप्त हुआ। वह वहां का राजा बन गया। उन्हीं दिनों मुचुकुंद नगर में रहने वाला एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा के लिए निकला हुआ था। घूमते-घूमते वह सोभन के राज्य में जा पहुंचा। राजा सोभन को देख ब्राह्मण को आश्चर्य हुआ और सोभन से कहा – ‘हे राजन! आपने तो रमा एकादशी के दिन अन्न-जल ग्रहण न करने के कारण प्राण त्याग दिए थे। मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है कि ऐसा विचित्र और सुंदर नगर जिसको न तो मैंने कभी सुना और न कभी देखा है, आपको किस प्रकार प्राप्त हुआ?’

इस पर सोभन ने कहा – ‘हे ब्राह्मण! यह सब कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी के व्रत का फल है। इसी से मुझे यह अनुपम नगर प्राप्त हुआ है, किंतु यह अस्थिर है।’

सोभन की बात सुन ब्राह्मण बोला – ‘हे राजन! यह अस्थिर क्यों है और स्थिर किस प्रकार हो सकता है, सों आप मुझे समझाइए। यदि इसे स्थिर करने के लिए मैं कुछ कर सका तो अवश्य ही करूंगा।’ राजा सोभन ने कहा – ‘हे ब्राह्मण, मैंने वह व्रत विवश होकर तथा श्रद्धारहित किया था। उसके प्रभाव से मुझे यह अस्थिर नगर प्राप्त हुआ, परंतु यदि तुम इस वृत्तांत को मेरी पत्नी चन्द्रभागा से कहोगे तो वह इसको स्थिर बना सकती है।’

राजा सोभन की बात सुन ब्राह्मण अपने नगर को लौट आया और उसने चन्द्रभागा को सारा वृत्तांत कह सुनाया। इस पर राजकन्या चन्द्रभागा अचंभित हो कर बोली- ‘हे ब्राह्मण देव! आप क्या यह सब दृश्य प्रत्यक्ष देखकर आए हैं?’

चन्द्रभागा की बात सुन ब्राह्मण बोला – ‘हे राजकन्या! मैंने तेरे पति सोभन तथा उसके नगर को प्रत्यक्ष देखा है, किंतु वह नगर अस्थिर है। तू कोई ऐसा उपाय कर जिससे कि वह स्थिर हो जाए और तेरा पति तुझ से मिल सके।

ब्राह्मण की बात सुन चन्द्रभागा बोली – ‘हे ब्राह्मण देव! आप मुझे उस नगर में ले चलिए, मैं अपने पति को देखना चाहती हूं। मैं अपने व्रत के प्रभाव से उस नगर को स्थिर बना दूंगी।’

चन्द्रभागा के वचनों को सुनकर वह ब्राह्मण उसे मंदराचल पर्वत के पास वामदेव के आश्रम में ले गया। वामदेव ने उसकी कथा को सुनकर चन्द्रभागा का मंत्रों से अभिषेक किया। चन्द्रभागा मंत्रों तथा व्रत के प्रभाव से दिव्य देह धारण करके पति के पास चली गई। सोभन ने अपनी पत्नी चन्द्रभागा को देखकर उसे प्रसन्नतापूर्वक आसन पर अपने पास बैठा लिया।

चन्द्रभागा ने कहा – ‘हे स्वामी! अब आप मेरे पुण्य को सुनिए, जब मैं अपने पिता के घर में आठ वर्ष की थी, तब ही से मैं सारे एकादशी का व्रत विधि विधान से कर रही हूं। उन्हीं व्रतों के प्रभाव से आपका यह नगर स्थिर हो जाएगा। उसके पश्चात चन्द्रभागा दिव्य स्वरूप धारण करके तथा दिव्य वस्त्रालंकारो से सजकर अपने पति के साथ सुखपूर्वक रहने लगी।

हे अर्जुन! यह मैंने रमा एकादशी का माहात्म्य कहा है। जो मनुष्य रमा एकादशी के व्रत को करते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य रमा एकादशी का माहात्म्य सुनते हैं, वह अंत समय में विष्णु लोक को जाते हैं।”

रमा एकादशी पर ऐसे करें पूजा

रमा एकादशी के दिन विष्णु भगवान के प्रति श्रद्धा रखें। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। उसके बाद पूर्ण भक्ति भाव से विष्णु भगवान और माता लक्ष्मी का पूजन करें।  भगवान को प्रसाद का भोग लगाएं और ध्यान रखें कि इस प्रसाद को भक्तों में वितरित करें।इस दिन तुलसी पूजन करना भी शुभ माना जाता है।

 

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Shravana Putrada Ekadashi : पुत्र प्राप्ति के लिए करें पुत्रदा एकादशी व्रत https://astrodeeva.com/shravana-putrada-ekadashi-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80/ https://astrodeeva.com/shravana-putrada-ekadashi-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80/#respond Wed, 18 Aug 2021 03:51:38 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2371 हिन्दू संस्कृति विविधताओं से पूर्ण है इसमें जन मानस के कल्याण के लिए अनेक प्रकार के व्रत-उपवास करने का प्रावधान हैं। इन सभी व्रत-उपवासो में एकादशी व्रत को सर्वोतम माना गया है। हिंदू पंचाग के अनुसार हर हिंदू माह में दो पक्ष होते है शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को […]

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हिन्दू संस्कृति विविधताओं से पूर्ण है इसमें जन मानस के कल्याण के लिए अनेक प्रकार के व्रत-उपवास करने का प्रावधान हैं। इन सभी व्रत-उपवासो में एकादशी व्रत को सर्वोतम माना गया है। हिंदू पंचाग के अनुसार हर हिंदू माह में दो पक्ष होते है शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहा जाता है और इस दिन भक्त भगवान विष्णु से आशीर्वाद प्राप्त कसने की लिए उपवास रखते हैं। पुत्रदा एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत आमतौर पर विवाहित जोड़ों द्वारा संतान प्राप्ति के लिए किया जाता हैं। विवाहित जोड़े जो संतान की चाहत रखते हैं, पुत्रदा एकादशी व्रत का पालन करते हैं और भगवान विष्णु का दिव्य आशीर्वाद पाने के लिए इस त्योहार से जुड़े विभिन्न अनुष्ठान भी करते हैं। पुत्रदा एकादशी साल में दो बार मनाई जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार पहली पुत्रदा एकादशी पौष माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनायी जाती है इसे पौष पुत्रदा एकादशी या पौष शुक्ल पुत्रदा एकादशी कहा जाता है, जिसे अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार जनवरी या दिसंबर महीने में मनाया जाता है। और दूसरी पुत्रदा एकादशी श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनायी जाती है और इसे श्रावण पुत्रदा एकादशी ( Shravana Putrada Ekadashi ) कहा जाता है जो इंग्लिश कैलेंडर वर्ष के अनुसार जुलाई या अगस्त के महीने में आती है।

पुत्रदा एकादशी का महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल के समय श्री कृष्ण ने अर्जुन के पूछने पर पुत्रदा एकादशी का महत्व बताते हुए कहा था। “हे अर्जुन! संसार में पुत्रदा एकादशी उपवास के समान अन्य दूसरा व्रत नहीं है। इसके पुण्य से प्राणी तपस्वी, विद्वान और धनवान बनता है। पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का उपवास करना चाहिए पुत्र प्राप्ति के लिए इससे बढ़कर दूसरा कोई व्रत नहीं है। जो कोई व्यक्ति पुत्रदा एकादशी के माहात्म्य को पढ़ता व श्रवण करता है तथा विधानानुसार इसका उपवास करता है, उसे सर्वगुण सम्पन्न पुत्ररत्न की प्राप्ति होती है। श्रीहरि की अनुकम्पा से वह मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है।”

पुत्रदा एकादशी की कथा

द्वापर युग के आरम्भ में ही महिष्मती नाम की एक नगरी थी। उस नगरी में महाजित नाम का एक राजा राज्य करता था। वह पुत्रहीन था, इसलिए वह सदा दुखी रहता था। उसे वह राज्य-सुख और वैभव, सभी कुछ बड़ा ही कष्टदायक प्रतीत होता था, क्योंकि पुत्र के बिना मनुष्य को इहलोक और परलोक दोनों में सुख नहीं मिलता है।

राजा ने पुत्र प्राप्ति के बहुत उपाय किये, किन्तु उसका हर उपाय निष्फल रहा। जैसे-जैसे राजा महाजित वृद्धावस्था की ओर बढ़ता जा रहा था, वैसे-वैसे उसकी चिन्ता भी बढ़ती जा रही थी।

एक दिन राजा ने अपनी सभा को सम्बोधित करके कहा – ‘न तो मैंने अपने जीवन में कोई पाप किया है और न ही अन्यायपूर्वक प्रजा से धन एकत्रित किया है, न ही कभी प्रजा को कष्ट दिया है और न कभी देवता और ब्राह्मणों का निरादर किया है।

मैंने प्रजा का सदैव अपने पुत्र की तरह पालन किया है, कभी किसी से ईर्ष्या भाव नहीं किया, सभी को एक समान समझा है। मेरे राज्य में कानून भी ऐसे नहीं हैं जो प्रजा में अनावश्यक डर उत्पन्न करें। इस प्रकार धर्मयुक्त राज्य करने पर भी मैं इस समय अत्यन्त कष्ट पा रहा हूँ, इसका क्या कारण है? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। आप इस पर विचार करें कि इसका क्या कारण है और क्या इस जीवन में मैं इस कष्ट से मुक्त हो पाऊँगा?

राजा के इस कष्ट के निवारण के लिए मन्त्री आदि वन को गये, ताकि वहाँ जाकर किसी ऋषि-मुनि को राजा का दुख बताकर कोई समाधान पा सकें। वन में जाकर उन्होंने श्रेष्ठ ऋषि-मुनियों के दर्शन किये।

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उस वन में वयोवृद्ध और धर्म के ज्ञाता महर्षि लोमश भी रहते थे। वे सभी जन महर्षि लोमश के पास गये। उन सबने महर्षि लोमश को दण्डवत प्रणाम किया और उनके सम्मुख बैठ गये। महर्षि के दर्शन से सभी को बड़ी प्रसन्नता हुई और सबने महर्षि लोमश से प्रार्थना की – ‘हे देव! हमारे अहो भाग्य हैं कि हमें आपके दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ।’

मन्त्री की बात सुन लोमश ऋषि ने कहा – ‘हे मन्त्रीवर! आप लोगों की विनम्रता और सद्व्यवहार से मैं अति प्रसन्न हूँ। आप मुझसे अपने आने का प्रयोजन कहें। मैं आपके कार्य को अपने सामर्थ्य के अनुसार अवश्य ही करूँगा, क्योंकि हमारा शरीर ही परोपकार के लिए बना है।

लोमश ऋषि के ऐसे मृदु वचन सुनकर मन्त्री ने कहा – ‘हे ऋषिवर! आप हमारी सभी बातों को जानने में ब्रह्मा से भी ज्यादा समर्थ हैं, अतः आप हमारे सन्देह को दूर कीजिए। महिष्मती नामक नगरी के हमारे महाराज महाजित बड़े ही धर्मात्मा व प्रजावत्सल हैं। वह प्रजा का, पुत्र की तरह धर्मानुसार पालन करते हैं, किन्तु फिर भी वे पुत्रहीन हैं। हे महामुनि! इससे वह अत्यन्त दुखी रहते हैं। हम लोग उनकी प्रजा हैं। हम भी उनके दुख से दुखी हो रहे हैं, क्योंकि प्रजा का यह कर्तव्य है कि राजा के सुख में सुख माने और दुख में दुख माने। हमें उनके पुत्रहीन होने का अभी तक कारण ज्ञात नहीं हुआ है, इसलिए हम आपके पास आये हैं। अब आपके दर्शन करके, हमको पूर्ण विश्वास है कि हमारा दुख अवश्य ही दूर हो जायेगा, क्योंकि महान पुरुषों के दर्शन मात्र से ही प्रत्येक कार्य की सिद्धि हो जाती है, अतः आप हमें बताने की कृपा करें कि किस विधान से हमारे महाराज पुत्रवान हो सकते हैं। हे ऋषिवर! यह आपका हम पर व हमारे राज्य की प्रजा पर बड़ा ही उपकार होगा।’

ऐसी करुण प्रार्थना सुनकर लोमश ऋषि नेत्र बन्द करके राजा के पूर्व जन्मों पर विचार करने लगे। कुछ पलों बाद उन्होंने विचार करके कहा – ‘हे भद्रजनो! यह राजा पिछले जन्म में अत्यन्त उद्दण्ड था तथा बुरे कर्म किया करता था। उस जन्म में यह एक गाँव से दूसरे गाँव में घूमा करता था।

एक बार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन की बात है, यह दो दिन से भूखा था। दोपहर के समय एक जलाशय पर जल पीने गया। उस स्थान पर उस समय ब्यायी हुई एक गाय जल पी रही थी। राजा ने उसको प्यासी ही भगा दिया और स्वयं जल पीने लगा।

हे श्रेष्ठ पुरुषों! इसलिए राजा को यह कष्ट भोगने पड़ रहे हैं।

एकादशी के दिन भूखा रहने का फल यह हुआ कि इस जन्म में यह राजा है और प्यासी गाय को जलाशय से भगाने के कारण पुत्रहीन है।’

यह जान सभी सभासद प्रार्थना करने लगे – ‘हे -ऋषि श्रेष्ठ! शास्त्रों में ऐसा लिखा है कि पुण्य से पाप नष्ट हो जाते हैं, अतः कृपा करके आप हमें कोई ऐसा उपाय बताइये, जिससे हमारे राजा के पूर्व जन्म के पाप नष्ट हो जायें और उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हो।’

सभासदों की प्रार्थना सुनकर लोमश मुनि ने कहा – ‘हे श्रेष्ठ पुरुषो! यदि तुम सब श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी का व्रत और रात्रि जागरण करो और उस व्रत का फल राजा के निमित्त कर दो, तो तुम्हारे राजा के यहाँ पुत्र उत्पन्न होगा। राजा के सभी कष्टों का नाश हो जायेगा।’

इस उपाय को जानकर मन्त्री सहित सभी ने महर्षि को कोटि-कोटि धन्यवाद दिया तथा उनका आशीर्वाद लेकर अपने राज्य में लौट आये। तदुपरान्त उन्होंने लोमश ऋषि की आज्ञानुसार पुत्रदा एकादशी का विधानपूर्वक उपवास किया और द्वादशी को उसका फल राजा को दे दिया।

इस पुण्य के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और नौ माह पश्चात एक अत्यन्त तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।

पुत्रदा एकादशी के मंत्र

पुत्रदा एकादशी व्रत विधि

पद्म पुराण के अनुसार एकादशी व्रत उत्तम फल देने वाला है और पुत्रदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु और देवी एकादशी की पूजा का विधान है। इस दिन जो भक्त विधि-विधान से व्रत कर पारण करता है उसके सारे कष्ट दूर हो जाते है और उसे जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

  • एकादशी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
  • इसके बाद धूप, दीप, नैवेद्य आदि सोलह सामग्री से षोडशोपचार पूजा करे |
  • एकादशी की रात भगवान विष्णु का भजन- कीर्तन करना चाहिए और अपने पापो के लिए क्षमा याचना करनी चाहिए ।
  • एकादशी की रात्रि को जागरण करना चहिये।
  • अगली सुबह पुनः भगवान श्रीकृष्ण की पूजा कर ब्राह्मणो को भोजन कराना चाहिए।
  • भोजन के बाद ब्राह्मण को क्षमता के अनुसार दान दे देकर विदा करना चाहिए। उसके बाद ही अपना व्रत खोलना चाहिए |

संतान की कामना के लिए क्या करें ?

  • प्रातः काल पति-पत्नी दोनों संयुक्त रूप से भगवान श्री कृष्ण की उपासना करें
  • संतान गोपाल मंत्र का जाप करें।
  • मंत्र जाप के बाद पति-पत्नी प्रसाद ग्रहण करें।
  • गरीबों को श्रद्धानुसार दक्षिणा दें और उन्हें भोजन कराएँ।

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Varuthini Ekadashi- बरूथनी एकादशी https://astrodeeva.com/varuthini-ekadashi-%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%a5%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80/ https://astrodeeva.com/varuthini-ekadashi-%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%a5%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80/#respond Fri, 07 May 2021 02:51:00 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2021 वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi) मनाई जाती है। इसे वरूथिनी ग्यारस भी कहते हैं। इस दिन भगवान के मधुसूदन स्वरूप की उपासना की जाती है। इस व्रत के माहात्म्य को पढ़ने से एक सहस्र गौदान का पुण्य प्राप्त होता है। इसका फल गंगा स्नान करने के फल से […]

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वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi) मनाई जाती है। इसे वरूथिनी ग्यारस भी कहते हैं। इस दिन भगवान के मधुसूदन स्वरूप की उपासना की जाती है। इस व्रत के माहात्म्य को पढ़ने से एक सहस्र गौदान का पुण्य प्राप्त होता है। इसका फल गंगा स्नान करने के फल से भी अधिक है।

वरुथिनी एकादशी का महत्‍व (Significance of Varuthini Ekadashi)

हिन्‍दू धर्म में वरुथिनी एकादशी का विशेष महत्‍व है। ऐसी मान्यता है कि जो लोग नियम पूर्वक वरुथिनी एकादशी व्रत करते हैं भगवान विष्णु की कृपा से उनके समस्त दूखों का नाश हो जाता है और उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. कहते हैं कि मृत्यु के पश्चात एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को भगवान श्री हरि के चरणों में स्थान प्राप्त होता है।

वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Vrat Story of Varuthini Ekadashi)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नामक राजा राज्य करते थे। वह अत्यंत दानशील तथा तपस्वी थे। एक दिन जब वह जंगल में तपस्या कर रहे थे, तभी न जाने कहाँ से एक जंगली भालू आया और राजा का पैर चबाने लगा। राजा पूर्ववत अपनी तपस्या में लीन रहे। कुछ देर बाद पैर चबाते-चबाते भालू राजा को घसीटकर पास के जंगल में ले गया।

राजा बहुत घबराया, मगर तापस धर्म अनुकूल उसने क्रोध और हिंसा न करके भगवान विष्णु से प्रार्थना की, करुण भाव से भगवान विष्णु को पुकारा। उसकी पुकार सुनकर भगवान श्रीहरि विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने चक्र से भालू को मार डाला।

राजा का पैर भालू पहले ही खा चुका था। इससे राजा बहुत ही शोकाकुल हुए। उन्हें दुःखी देखकर भगवान विष्णु बोले: हे वत्स! शोक मत करो। तुम मथुरा जाओ और वरूथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरी वराह अवतार मूर्ति की पूजा करो। उसके प्रभाव से पुन: सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे। इस भालू ने तुम्हें जो काटा है, यह तुम्हारे पूर्व जन्म का अपराध था।

भगवान की आज्ञा मानकर राजा मान्धाता ने मथुरा जाकर श्रद्धापूर्वक वरूथिनी एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से राजा शीघ्र ही पुन: सुंदर और संपूर्ण अंगों वाला हो गया। इसी एकादशी के प्रभाव से राजा मान्धाता स्वर्ग गये थे।

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वरुथिनी एकादशी व्रत विधि ( Vrat Vidhi of Varuthini Ekadashi)

इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और वंदना की जाती है। इस व्रत की पूजा विधि इस प्रकार है:

इस दिन भक्तिभाव से भगवान मधुसूदन की पूजा करनी चाहिए। इस व्रत को करने से भगवान मधुसूदन की प्रसन्नता प्राप्त होती है और संपूर्ण पापों का नाश होता है। सुख-सौभाग्य की वृद्धि होती है तथा भगवान का चरणामृत ग्रहण करने से आत्मशुद्धि होती है।व्रती को चाहिए कि वह दशमी को अर्थात व्रत रखने से एक दिन पूर्व एक बार सात्विक भोजन करे। इस व्रत में कुछ वस्तुओं का पूर्णतया निषेध है, अतः इनका त्याग करना ही श्रेयस्कर है। व्रत करने वाले के लिए उस दिन पान खाना, दातुन करना, परनिंदा, क्रोध करना व असत्य बोलना वर्जित है। इस दिन जुआ और निद्रा का भी त्याग करें। इस व्रत में तेलयुक्त भोजन नहीं करना चाहिए। रात्रि में भगवान का नाम स्मरण करते हुए जागरण करें और द्वादशी को मांस का परित्याग करके व्रत का पालन करें।

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Shattila Ekadashi – षटतिला एकादशी https://astrodeeva.com/shattila-ekadashi-%e0%a4%b7%e0%a4%9f%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80/ https://astrodeeva.com/shattila-ekadashi-%e0%a4%b7%e0%a4%9f%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80/#respond Sat, 09 Jan 2021 10:22:46 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1592 जैसे हर धर्म में अपने अपने व्रत रखने का प्रावधान है उसी तरह हिन्दू संस्कृति में भी व्रत एवं उपवास का बहुत महत्व हैं। क्योंकि इसका विधान आत्मा और मन की शुद्धि के लिए होता हैं। व्रत या उपवास करने से शारीरिक और ज्ञानशक्ति में वृद्धि होती है। व्रत एवं उपवास आरोग्य एवं लम्बे जीवन […]

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जैसे हर धर्म में अपने अपने व्रत रखने का प्रावधान है उसी तरह हिन्दू संस्कृति में भी व्रत एवं उपवास का बहुत महत्व हैं। क्योंकि इसका विधान आत्मा और मन की शुद्धि के लिए होता हैं। व्रत या उपवास करने से शारीरिक और ज्ञानशक्ति में वृद्धि होती है। व्रत एवं उपवास आरोग्य एवं लम्बे जीवन की प्राप्ति के उत्तम साधन हैं। जो व्यक्ति नियमित व्रत एवं उपवास करते हैं, उन्हें उत्तम स्वास्थ्य तथा लम्बे जीवन की प्राप्ति के साथ-साथ ईश्वर के चरणों में स्थान प्राप्त होता हैं।

नारद पुराण में व्रतों का महत्व बताते हुए उल्लेख किया  गया है कि – गंगा के समान कोई अन्य तीर्थ नहीं, माँ के समान कोई गुरु नहीं, भगवान विष्णु जैसा कोई देवता नहीं तथा व्रत एवं उपवास जैसा कोई तप नहीं। व्रतों में एकादशी(Ekadashi) व्रत को सर्वोपरि माना गया है। हिंदू पंचाग के अनुसार हर हिंदू माह में दो पक्ष होते है शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी(Ekadashi) कहा जाता है और इस दिन भक्त भगवान विष्णु से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उपवास रखते हैं। एकादशी का व्रत तीन दिन तक चलता है। भक्त उपवास के दिन से एक दिन पहले दोपहर में भोजन लेते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अगले दिन पेट में कोई अवशिष्ट भोजन नहीं है। भक्त एकादशी के दिन कड़ा उपवास रखते हैं और अगले दिन सूर्योदय के बाद ही उपवास तोड़ते हैं। एकादशी व्रत के दौरान सभी प्रकार के अनाज का सेवन वर्जित होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो भक्त एकादशी का व्रत नियमित रूप से रखते हैं उनपर भगवान् श्री नारायण की कृपा सदैव बनी रहती है।

माघ माह हिन्दू धर्म में बेहद पवित्र माना जाता है। इस महीने मनुष्य को अपनी इंद्रियों को काबू में रखते हुए क्रोध, अहंकार, काम, लोभ व चुगली आदि का त्याग करना चाहिए। इस माह के कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को षटतिला एकादशी या तिला एकादशी के नाम से जाना जाता है। नाम के अनुसार इस एकादशी में तिल का बहुत महत्व होता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर(English calendar ) के अनुसार, यह त्योहार जनवरी या फरवरी महीने में होता है।

षटतिला एकादशी का महत्व (Significance of Shattila Ekadashi)

पुराणों में षटतिला एकादशी का बहुत अधिक महत्व बताया गया है। जो व्यक्ति षटतिला एकादशी का व्रत करता है। उसे स्वर्णदान का फल प्राप्त होता है। इस व्रत का फल हजारों साल तक की तपस्या के बराबर बताया गया है। यह व्रत मनुष्य को न केवल जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति कराता है बल्कि इस व्रत के करने से मृत्यु के बाद बैकुंठ धाम में स्थान भी प्राप्त होता है।

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षटतिला एकादशी की कथा ( Shattila Ekadashi Vrat Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार अर्जुन ने भगवान कृष्ण से पूछते हुआ कहा “हे मुरलीधर! आपके श्रीमुख से एकादशियों की कथा सुनकर मुझे असीम आनंद की प्राप्ति हुई है। हे केशव! कृपा कर माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनाने की भी अनुकम्पा करें।”

अर्जुन के इस आग्रह को सुन भगवान कृष्ण बोले , “हे अर्जुन! में तुम्हें षटतिला एकादशी व्रत की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो-

एक बार दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा – ‘हे ऋषि श्रेष्ठ! मनुष्य मृत्युलोक में अनेक प्रकार के महापाप करते हैं और दूसरे के धन की चोरी तथा दूसरे की उन्तति देखकर ईर्ष्या आदि करते हैं, मनुष्य ऐसे पाप क्रोध, ईर्ष्या, आवेग और मूर्खतावश करते हैं और बाद में पश्चाताप करते हैं कि हाय! यह हमने क्या किया! हे महामुनि! ऐसे मनुष्यों को जो भूल वश पाप करते है उन्हें नरक से बचाने का क्या उपाय है? कोई ऐसा उपाय बताने की कृपा करें, जिससे ऐसे मनुष्यों को नरक से बचाया जा सके।

दालभ्य ऋषि की बात सुन पुलत्स्य ऋषि ने कहा – ‘हे मुनि श्रेष्ठ! आपने मुझसे अत्यंत गूढ़ प्रश्न पूछा है। इससे संसार में मनुष्यों का बहुत लाभ होगा। जिस रहस्य को इन्द्र आदि देवता भी नहीं जानते, वह रहस्य मैं आपको अवश्य ही बताऊंगा। माघ मास आने पर मनुष्य को स्नान आदि से शुद्ध रहना चाहिए और इन्द्रियों को वश में करके तथा सांसारिक मोह जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या तथा अहंकार आदि से सर्वथा बचना चाहिए।

जिस दिन मूल नक्षत्र और एकादशी तिथि हो, तब अच्छे पुण्य देने वाले नियमों को ग्रहण करना चाहिए। स्नानादि नित्य कर्म से देवों के देव भगवान श्रीहरि का पूजन व कीर्तन करना चाहिए।

एकादशी (Ekadashi) के दिन उपवास करें तथा रात को जागरण और हवन करें। उसके दूसरे दिन धूप, दीप, नैवेद्य से भगवान श्रीहरि की पूजा-अर्चना करें तथा खिचड़ी का भोग लगाएं। उस दिन श्रीविष्णु को पेठा, नारियल, सीताफल या सुपारी सहित अर्घ्य अवश्य देना चाहिए, तदुपरांत उनकी स्तुति करनी चाहिए – ‘हे जगदीश्वर! आप निराश्रितों को शरण देने वाले हैं। आप संसार में डूबे हुए का उद्धार करने वाले हैं। हे कमलनयन! हे मधुसूदन! हे जगन्नाथ! हे पुण्डरीकाक्ष! आप लक्ष्मीजी सहित मेरे इस तुच्छ अर्घ्य को स्वीकार कीजिए।’ इसके पश्चात ब्राह्मण को जल से भरा घड़ा और तिल दान करने चाहिए। यदि सम्भव हो तो ब्राह्मण को गऊ और तिल दान देना चाहिए। इस प्रकार मनुष्य जितने तिलों का दान करता है। वह उतने ही सहस्र वर्ष स्वर्ग में वास करता है।

  • तिल स्नान
  • तिल की उबटन
  • तिलोदक
  • तिल का हवन
  • तिल का भोजन
  • तिल का दान

इस प्रकार छः रूपों में तिलों का प्रयोग षटतिला कहलाती है। इससे अनेक प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। इतना कहकर पुलस्त्य ऋषि ने कहा – ‘अब मैं एकादशी की कथा सुनाता हूँ-

एक समय नारदजी ने भगवान विष्णु से लोक कल्याण के लिए प्रश्न किया जिसके उत्तर में भगवान ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य नारदजी से कहा। भगवान ने नारदजी से कहा कि – हे नारद! मैं तुमसे सत्य घटना कहता हूं,  ध्यानपूर्वक सुनो।

प्राचीन काल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदैव व्रत करती, एक बार उसने एक माह तक व्रत किया जिसके कारण उसका शरीर अत्यंत क्षीण व दुर्बल हो गया। बुद्धिमान होने के बावजूद उसने कभी भी देवताओं या ब्राह्मणों के लिए किसी प्रकार का अन्न या धन का दान नहीं किया था। इससे मैंने सोचा कि ब्राह्मणी ने व्रत आदि से अपना शरीर शुद्ध कर लिया है, अब इसे विष्णुलोक तो मिल ही जाएगा परंतु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इससे इसकी तृप्ति होना कठिन है।

भगवान ने आगे कहा- ऐसा सोचकर मैं भिखारी के वेश में मृत्युलोक में उस ब्राह्मणी के पास गया और उससे भिक्षा माँगी। वह ब्राह्मणी बोली- महाराज आप किस लिए आए हो? मैंने कहा- मुझे भिक्षा चाहिए। इस पर उसने मुझे एक मिट्टी का पिंड दे दिया। मैं उस पिंड को लेकर स्वर्ग लौट आया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी भी शरीर त्याग कर स्वर्ग में आ गई। ब्राह्मणी के मिट्टी के पिंड के दान के प्रभाव से स्वर्ग में सुंदर महल मिला, परंतु उस महल में और कुछ न देख कर वह घबराकर मेरे पास आई और कहने लगी कि भगवन मैंने अपने जीवन काल में अनेक व्रत आदि से आपकी पूजा की

परंतु फिर भी मेरा घर सब वस्तुओं से रिक्त है। इसका क्या कारण है?

इस पर मैंने कहा- तुम अपने घर जाओ। जब देवस्त्रियाँ तुम्हें देखने के लिए आएँगी तब तुम उनसे षटतिला एकादशी(Shattila Ekadashi) व्रत का महत्व और उसका विधान पूछना, जब तक वह न बताएं, तब तक द्वार नहीं खोलना।

मेरे ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली- आप मुझे देखने आई हैं तो षटतिला एकादशी का महत्व मुझसे कहो। उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी कि मैं कहती हूँ। जब ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना तब द्वार खोल दिया। देवांगनाओं ने उसको देखा कि न तो वह गांधर्वी है और न आसुरी है वरन पहले जैसी मानुषी है। उस ब्राह्मणी ने देवस्त्रियों के कथनानुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया।

इसके प्रभाव से वह सुंदर और रूपवती हो गई तथा उसका घर समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया। अतः हे पार्थ! मनुष्यों को अज्ञान को त्यागकर षटतिला एकादशी(Shattila Ekadashi) का उपवास करना चाहिए। इस एकादशी व्रत के करने वाले को जन्म-जन्म की निरोगता प्राप्त हो जाती है। इस उपवास से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।”

षटतिला एकादशी की व्रत विधि (Shattila Ekadashi Puja Vidhi)

  • षटतिला एकादशी के एक दिन पूर्व दशमी तिथि से ही शुरु हो जाता है। इसलिए षटतिला एकादशी के नियमों का पालन दशमी तिथि से ही करें।
  • षटतिला एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त उठें और तिल के जल से स्नान करें । इसके बाद साफ वस्त्र धारण करें। लेकिन काले और नीले रंग के वस्त्र बिल्कुल भी धारण न करें।
  • इसके बाद एक साफ चौकी पर गंगाजल के छिंटे मारकर उस पर पीला कपड़ा बिछाएं और भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
  • इसके बाद उस प्रतिमा या तस्वीर को पंचामृत से स्नान कराएं जिसमें तुलसी दल अवश्य हो। इसके बाद दुबारा भगवान विष्णु को गंगाजल से स्नान कराएं।
  • इसके बाद भगवान विष्णु को पीले रंग के फूलों की माला पहनाएं और उन्हें पीले वस्त्र, पीले रंग के फूल, पीले रंग के फल , काले और सफेद तिल, नैवेद्य आदि अर्पित करें।
  • षटतिला एकादशी के दिन पुष्य नक्षत्र में गोबर, कपास, तिल मिलाकर उपले बनाने चाहिए फिर कुशा के आसन पर बैठकर- ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप कम से कम 108 बार करना चाहिए और इस उपलों से 108 बार हवन करना चाहिए।

षटतिला एकादशी( Shattila Ekadashi)  के दिन तिल का 6 प्रकार से उपयोग किया जाता है।

  1. तिल के जल से स्नान करें
  2. पिसे हुए तिल का उबटन करें
  3. तिलों का हवन करें
  4. तिल मिला हुआ जल पीयें
  5. तिलों का दान करें
  6. तिलों की मिठाई और व्यंजन बनाएं

षटतिला एकादशी व्रत पारण (Shattila Ekadashi Vrat Paran)

पारण का मतलब एकादशी व्रत के समापन से है जो अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है। लेकिन ध्यान रखें कि इस व्रत का पारण द्वादशी तिथि के भीतर ही कर लेना चाहिए। व्रत के समापन के समय इस बात का भी ध्यान रखें कि कहीं हरि वासर तो नहीं लग रहा है। द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि को हरि वासर कहा जाता है। पारण के लिए प्रात:काल को सही माना गया है। अगर हरि वासर के कारण ऐसा संभव न हो तब मध्याह्न के बाद व्रत खोलना उचित रहता है।

घर में समृद्धि लानी हे तो लगायें ये पेड़ -पौधे

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रमा एकादशी व्रत – महत्व और कथा https://astrodeeva.com/%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95/ https://astrodeeva.com/%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95/#respond Sat, 07 Nov 2020 05:49:02 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1277 कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी कहते है। भगवान विष्णु की पत्नी लक्ष्मी जी का नाम रमा भी है इसलिए इस एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है। रमा एकादशी 2020 दिनांक : नवम्बर 11, 2020 वार : बुधवार एकादशी तिथि प्रारम्भ – नवम्बर 11, 2020 को 03:22 ए एम बजे एकादशी तिथि समाप्त – नवम्बर 12, 2020 को 12:40 ए […]

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कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी कहते है। भगवान विष्णु की पत्नी लक्ष्मी जी का नाम रमा भी है इसलिए इस एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है।

रमा एकादशी 2020

दिनांक : नवम्बर 11, 2020
वार : बुधवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ – नवम्बर 11, 2020 को 03:22 ए एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त – नवम्बर 12, 2020 को 12:40 ए एम बजे
पारण( व्रत तोड़ने की) तिथि: नवम्बर 12, 2020
पारण ( व्रत तोड़ने का) समय: 06:42 ए एम से 08:51 ए एम

रमा एकादशी कथा

अर्जुन ने कहा- “हे श्रीकृष्ण! आप मुझे कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनाइए। इस एकादशी का क्या नाम है तथा इसमें किस देवता का पूजन किया जाता है? इस एकादशी का व्रत करने से किस फल की प्राप्ति होती है?कृपा करके सब विस्तारपूर्वक बतायें”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम रमा एकादशी है। इसका व्रत करने से सभी पापों का शमन होता है। इसकी कथा इस प्रकार है,

पौराणिक काल में मुचुकुंद नाम का राजा राज्य करता था। सभी देवता उसके मित्र थे। वह बड़ा सत्यवादी तथा विष्णुभक्त था। उसका राज्य बिल्कुल निष्कंटक था। उसकी चन्द्रभागा नाम की एक कन्या थी, जिसका विवाह उसने राजा चन्द्रसेन के पुत्र सोभन से कर दिया। वह राजा एकादशी का व्रत बड़े ही भक्ति भाव से नियमपूर्वक करता था और उसके राज्य में सभी इस नियम का पालन करते थे।

एक बार की बात है कि सोभन अपनी ससुराल आया हुआ था। वह कार्तिक का महीना था। उसी मास में महापुण्यदायिनी रमा एकादशी आ गई। इस दिन सभी व्रत रखते थे। चन्द्रभागा ने सोचा कि मेरे पति तो बड़े कमजोर हृदय के हैं, वे एकादशी का व्रत कैसे करेंगे, जबकि पिता के यहां तो सभी को व्रत करने की आज्ञा है। मेरा पति अगर राजाज्ञा मान कर उपवास करेंगे तो बहुत कष्ट होगा। चन्द्रभागा को जिस बात का डर था वही हुआ। राजा मुचुकुंद ने आदेश जारी किया कि इस समय उनका दामाद राज्य में पधारा हुआ है, अतः सारी प्रजा विधानपूर्वक एकादशी का व्रत करे। उसे सुनकर सोभन अपनी पत्नी के पास गया और बोला – ‘हे प्रिय! तुम मुझे कुछ उपाय बतलाओ, क्योंकि मैं उपवास नहीं कर सकता, यदि मैं उपवास करूंगा तो अवश्य ही मर जाऊंगा।’

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पति की बात सुन चन्द्रभागा ने कहा – ‘हे स्वामी! मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं कर सकता। यहां तक कि राज्य के पालतू जानवर हाथी, घोड़ा, ऊंट आदि भी अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं करते, फिर भला मनुष्य कैसे भोजन कर सकते हैं? यदि आप उपवास नहीं कर सकते तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए, क्योंकि यदि आप यहां रहेंगे तो आपको व्रत तो अवश्य ही करना पड़ेगा।’

पत्नी की बात सुन सोभन ने कहा – ‘हे प्रिय! तुम्हारी राय उचित है, परंतु मैं व्रत करने के डर से किसी दूसरे स्थान पर नहीं जाऊंगा, अब मैं व्रत अवश्य ही करूंगा, परिणाम चाहे कुछ भी और भाग्य के लिखे को भला कौन टाल सकता है।’

सभी के साथ सोभन ने भी एकादशी का व्रत किया और भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल होने लगा। सूर्य नारायण भी अस्त हो गए और जागरण के लिए रात्रि भी आ गई। वह रात सोभन को असहनीय दुख देने वाली थी। दूसरे दिन सूर्योदय होने से पूर्व ही भूख-प्यास के कारण सोभन के प्राण-पखेरू उड़ गए।

राजा ने सोभन के मृत शरीर को जल-प्रवाह करा दिया और अपनी पुत्री मायके में रहकर एकादशी का व्रत करने और भगवान विष्णु की कृपा पर भरोसा रखने को कहा। चन्द्रभागा अपने पिता की आज्ञानुसार अपने पिता के घर रहकर एकादशी के व्रत करने लगी।

उसके व्रत के प्रभाव से सोभन को जल से निकाल लिया गया और भगवान विष्णु की कृपा से उसे मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से परिपूर्ण तथा शत्रु रहित देवपुर नाम का एक उत्तम नगर प्राप्त हुआ। वह वहां का राजा बन गया। उन्हीं दिनों मुचुकुंद नगर में रहने वाला एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा के लिए निकला हुआ था। घूमते-घूमते वह सोभन के राज्य में जा पहुंचा। राजा सोभन को देख ब्राह्मण को आश्चर्य हुआ और सोभन से कहा – ‘हे राजन! आपने तो रमा एकादशी के दिन अन्न-जल ग्रहण न करने के कारण प्राण त्याग दिए थे। मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है कि ऐसा विचित्र और सुंदर नगर जिसको न तो मैंने कभी सुना और न कभी देखा है, आपको किस प्रकार प्राप्त हुआ?’

इस पर सोभन ने कहा – ‘हे ब्राह्मण! यह सब कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी के व्रत का फल है। इसी से मुझे यह अनुपम नगर प्राप्त हुआ है, किंतु यह अस्थिर है।’

सोभन की बात सुन ब्राह्मण बोला – ‘हे राजन! यह अस्थिर क्यों है और स्थिर किस प्रकार हो सकता है, सों आप मुझे समझाइए। यदि इसे स्थिर करने के लिए मैं कुछ कर सका तो अवश्य ही करूंगा।’ राजा सोभन ने कहा – ‘हे ब्राह्मण, मैंने वह व्रत विवश होकर तथा श्रद्धारहित किया था। उसके प्रभाव से मुझे यह अस्थिर नगर प्राप्त हुआ, परंतु यदि तुम इस वृत्तांत को मेरी पत्नी चन्द्रभागा से कहोगे तो वह इसको स्थिर बना सकती है।’

राजा सोभन की बात सुन ब्राह्मण अपने नगर को लौट आया और उसने चन्द्रभागा को सारा वृत्तांत कह सुनाया। इस पर राजकन्या चन्द्रभागा अचंभित हो कर बोली- ‘हे ब्राह्मण देव! आप क्या यह सब दृश्य प्रत्यक्ष देखकर आए हैं?’

चन्द्रभागा की बात सुन ब्राह्मण बोला – ‘हे राजकन्या! मैंने तेरे पति सोभन तथा उसके नगर को प्रत्यक्ष देखा है, किंतु वह नगर अस्थिर है। तू कोई ऐसा उपाय कर जिससे कि वह स्थिर हो जाए और तेरा पति तुझ से मिल सके।

ब्राह्मण की बात सुन चन्द्रभागा बोली – ‘हे ब्राह्मण देव! आप मुझे उस नगर में ले चलिए, मैं अपने पति को देखना चाहती हूं। मैं अपने व्रत के प्रभाव से उस नगर को स्थिर बना दूंगी।’

चन्द्रभागा के वचनों को सुनकर वह ब्राह्मण उसे मंदराचल पर्वत के पास वामदेव के आश्रम में ले गया। वामदेव ने उसकी कथा को सुनकर चन्द्रभागा का मंत्रों से अभिषेक किया। चन्द्रभागा मंत्रों तथा व्रत के प्रभाव से दिव्य देह धारण करके पति के पास चली गई। सोभन ने अपनी पत्नी चन्द्रभागा को देखकर उसे प्रसन्नतापूर्वक आसन पर अपने पास बैठा लिया।

चन्द्रभागा ने कहा – ‘हे स्वामी! अब आप मेरे पुण्य को सुनिए, जब मैं अपने पिता के घर में आठ वर्ष की थी, तब ही से मैं सारे एकादशी का व्रत विधि विधान से कर रही हूं। उन्हीं व्रतों के प्रभाव से आपका यह नगर स्थिर हो जाएगा। उसके पश्चात चन्द्रभागा दिव्य स्वरूप धारण करके तथा दिव्य वस्त्रालंकारो से सजकर अपने पति के साथ सुखपूर्वक रहने लगी।

हे अर्जुन! यह मैंने रमा एकादशी का माहात्म्य कहा है। जो मनुष्य रमा एकादशी के व्रत को करते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य रमा एकादशी का माहात्म्य सुनते हैं, वह अंत समय में विष्णु लोक को जाते हैं।”

रमा एकादशी पर ऐसे करें पूजा

रमा एकादशी के दिन विष्णु भगवान के प्रति श्रद्धा रखें। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। उसके बाद पूर्ण भक्ति भाव से विष्णु भगवान और माता लक्ष्मी का पूजन करें। भगवान को प्रसाद का भोग लगाएं और ध्यान रखें कि इस प्रसाद को भक्तों में वितरित करें।

 

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