if ( ! function_exists( 'jnews_get_views' ) ) {
/**
* Gets views count.
*
* @param int $id The Post ID.
* @param string|array $range Either an string (eg. 'last7days') or -since 5.3- an array (eg. ['range' => 'custom', 'time_unit' => 'day', 'time_quantity' => 7])
* @param bool $number_format Whether to format the number (eg. 9,999) or not (eg. 9999)
* @return string
*/
function jnews_get_views( $id = null, $range = null, $number_format = true ) {
$attr = array(
'id' => $id,
'range' => $range,
'number_format' => $number_format,
);
$query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $attr ) );
$views = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' );
if ( false === $views ) {
$views = JNews_View_Counter()->counter->get_views( $id, $range, $number_format );
wp_cache_set( $query_hash, $views, 'jnews-view-counter' );
}
return $views;
}
}
if ( ! function_exists( 'jnews_view_counter_query' ) ) {
/**
* Do Query
*
* @param $instance
* @return array
*/
function jnews_view_counter_query( $instance ) {
$query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $instance ) );
$query = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' );
if ( false === $query ) {
$query = JNews_View_Counter()->counter->query( $instance );
wp_cache_set( $query_hash, $query, 'jnews-view-counter' );
}
return $query;
}
}
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]]>पौराणिक कथा :
कथा के अनुसार एक बार तुलसी जी भ्रमण कर रहीं थी। भ्रमण करते-करते वो गंगा जी के तट के समीप पहुँची जहाँ भगवान गणेश तपस्या में लीन थे। उनके तेज को देख कर तुलसी बहुत प्रभावित हुई और उन्होंने गणेश जी से विवाह करने का मन बनाय और गणेश जी की तपस्या पूर्ण होने तक वहाँ इंतज़ार किया। जब गणेश जी की तपस्या पूर्ण हुई तो अपनी
इस इच्छा को तुलसी ने गणेश जी के सामने विनय पूर्वक रखा और कहा “हे देव! मैं उचित वर प्राप्ति की कामना लेकर बहुत काल से भटक रही हूँ। आज आपको देख कर लगा कि मेरी तपस्या पूर्ण हुई। आपका ये तेजस्वी रूप देख कर मैंने मन ही मन आपको अपना पति मान लिया है इसीलिए कृपा कर मुझे अपनी भार्या के रूप में स्वीकार करें।”
गणेश जी उस समय विवाह नहीं करना चाहते थे इस लिए तुलसी की इस इच्छा को सुन कर उन्हें समझ नहीं आया कि क्या उत्तर दें, इसी कारण गणेश जी ने बड़ी मधुरता से कहा “हे देवी! आप अद्वितीय सौंदर्य की धनी हैं और आप का सौंदर्य देखकर मैं भी अभिभूत हूँ। विश्व में कदाचित ही कोई ऐसा होगा जो आपके अपनी भार्या के रूप में स्वीकार ना करे। किन्तु आप कृपया मुझे क्षमा करें क्यूँकि मैं अभी विवाह नहीं कर सकता।“ इस वचन को सुन तुलसी जी ने कहा “हे देव! अगर आप अभी विवाह नहीं करना चाहते तो में आप की प्रतीक्षा करूँगी” तब गणेश जी ने विनम्रता से कहा “हे देवी! आप मेरी बात नहीं समझी। मैं ब्रह्मचारी हूँ इसलिए मैं विवाह नहीं कर सकता। अत: आप मुझे क्षमा करें और अपने योग्य कोई अन्य वर ढूँढ लें।“
यह सुन तुलसी को अति दुःख हुआ और वो दुखी मन से वहाँ से वापिस लौट गयी। थोड़ी दूर जाने के बाद तुलसी को नारद देव मिले, तुलसी से उन्हें प्रणाम किया। तुलसी को उदास देख कर देवर्षि नारद ने कहा – “हे देवी! आप उदास क्यों हैं?” इसपर तुलसी ने देवर्षि नारद को पूरी बात बतायी। बात सब देवर्षि नारद हसने लगे और कहा “हे देवी, आप भोली हैं और किन की बात में आ गयी? सत्य तो ये है कि वे ब्रह्मचारी नहीं हैं। उन्होंने आपसे ठिठोलि की हैं।“
देवर्षि नारद का यह कथन सुन तुलसी को बहुत क्रोध आया। वो गणेश जी के पास वापस लौटी और कहा “हे देव! मैं आप से सच्चे मन से विवाह करना चाहती थी किन्तु आप ने असत्य कहकर मेरा मज़ाक़ बनाया और मेरी निष्ठा का अपमान किया। मैं आप को श्राप देती हूँ की आप एक विवाह से बच रहें हैं, अब आप की इच्छा के विरूद्ध आप के दो विवाह होंगे।“ इस श्राप को पा कर गणेश जी भी क्रोधित हो गए और उन्होंने भी तुलसी को श्राप दे दिया कि उसका विवाह एक राक्षस के साथ होगा और उस का वध अल्प काल में महादेव भगवान शंकर के हाथों से होगा। यह सुन तुलसी को बहुत पछतावा हुआ और उस ने भगवान गणेश जी से क्षमा याचना की। तब गणेश जी ने कहा “हे देवी! मेरा श्राप विफल नहीं हो सकता किन्तु मैं आपको वरदान देता हूँ कि अगले जन्म में आप को नारायण की पत्नी बनने का सौभाग्य प्राप्त होगा और कलयुग में तुम्हें पूजा जाएगा एवं तुम मनुष्य के मोक्ष प्राप्ति में सहायक होगी। परन्तु मेरी पूजा में तुम्हारा प्रयोग वर्जित होगा।
भगवान गणेश और तुलसी को अपना-अपना श्राप भोगना पड़ा। गणेश जी का विवाह रिद्धि और सिद्धि से हुआ। तुलसी का विवाह शंखचूड(जलंधर) नामक राक्षक से हुआ जिसका वध महादेव के हाथों से हुआ। अगले जन्म में तुलसी अपनी राख से एक पौधे के रूप में उत्पन हुई और उन का विवाह नारायण के रूप शालिग्राम से हुआ।
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