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The post Ghat Sthapana 2022 – चैत्र नवरात्रि घट स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>नवरात्रि में कलश स्थापना या घट स्थापना (Ghat Sthapana) करने का बहुत महत्व होता है। इस कलश की नौ दिन तक पूजा की जाती है, अखंड ज्योति जलाई जाती है। कलश को भगवान विष्णु का रूप माना जाता है। इसलिए मां दुर्गा की पूजा करने से पहले कलश की पूजा की जाती है। कलश स्थापना करके ही सारे देवी-देवताओं का आहवाहन किया जाता है। इसके साथ ही 9 दिन के व्रत की शुरुआत होती है।
इस साल चैत्र घटस्थापना के लिए शुभ मुहूर्त 2 अप्रैल 2022, शनिवार की सुबह 06:10 बजे से 08:31 मिनट तक रहेगा। यानी कि कुल अवधि 02 घण्टे 31 मिनट की रहेगी। इसके अलावा घटस्थापना को अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:08 बजे से 12:57 बजे तक रहेगा। वहीं प्रतिपदा तिथि 1 अप्रैल 2022 को सुबह 11:53 बजे से शुरू होगी और 2 अप्रैल 2022 को सुबह 11:58 पर खत्म होगी।
चैत्र नवरात्रि के पहले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके साफ कपड़े पहन लें। इसके बाद घर के मंदिर की साफ-सफाई करके जिस जगह पर कलस्थापना करना है, वहां गंगाजल छिड़कें। फिर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर थोड़े चावल रखें। एक मिट्टी के पात्र में जौ बो दें। इस पात्र पर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करें। कलश पर स्वास्तिक बनाकर इस पर कलावा बांधें। कलश में चारों ओर अशोक के पत्ते लगाएं। फिर कलश में साबुत सुपारी, सिक्का और अक्षत डालें और एक नारियल पर चुनरी लपेटकर कलावा से बांधें। फिर इस नारियल को कलश के ऊपर पर रखते हुए देवी दुर्गा का आहवाहन करें। इसके बाद दीप जलाकर कलश की पूजा करें। ध्यान रखें कि कलश सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का ही हो। कलश स्टील सा किसी अन्य अशुद्ध धातु का नहीं होना चाहिए।
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]]>The post Mata Katyayani | माँ कात्यायनी – जाने माता की कथा, मंत्र, पूजा विधि और आरती appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>शास्त्रों में माता के नौ स्वरूप है और इन स्वरूपों कि पूजा करने से लाभ होता है। वो अपने छठे स्वरूप में कात्यायनी के नाम से जानी जाती हैं। देवी ने यह रूप महिषासुर नामक राक्षक का वध करने के लिए धारण किया था। माँ कात्यायनी को उनके हिंसक रूप के कारण युद्ध की देवी भी कहा जाता है।
माँ कात्यायनी शेर पे सवार हैं। इनकी चार भुजाएँ है ये अपने बाएँ एक हाथ ने कमल और दूसरे बाएँ हाथ में तलवार धारण करती हैं वहीं माता अपने दाएँ एक हाथ में अभय मुद्रा और दूसरे हाथ से माँ सब को आशीर्वाद प्रदान करती है।
पौराणिक कथा के अनुसार प्रसिद्ध महर्षि कात्यायन ने अनेक वर्षों तक भगवती पराम्बा की कठिन तपस्या की और उन्होंने भगवती को प्रसन्न कर उन्हें अपने घर में पुत्री रूप में जन्म लेने का वरदान माँगा। माता ने उनकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न हो कर उनकी यह इच्छा स्वीकार कर ली और देवताओं, ऋषियों के संकट दूर करने हेतु महर्षि कात्यायन के घर अश्विन कृष्णचतुर्दशी के दिन पुत्री रूप में जन्म लिया। इसलिए माता का नाम कात्यायनी पड़ा।
कुछ समय पश्चात जब पूरी दुनिया में महिषासुर नामक राक्षस ने अपना उत्पात व तांडव मचाया था तब देवी ने दशमी के दिन महिषासुर का वध कर देवों और ऋषियों को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया।
यह भी पढ़े : चैत्र नवरात्र 2022 , जानिए तिथि और कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त
श्री माँ दुर्गा जी के इस छठे रूप में माँ कात्यायनी की पूजा नवरात्रि के छठवें दिन होती है। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र के छठवें दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर, माँ के निमित्त विविध प्रकार की विहित पूजन की सामाग्री को संग्रहित करके भक्ति-भाव से पूजन करना चहिये और दुर्गसप्तशती का पाठ करें या ब्राह्मण से करवाएँ। माँ को केले का भोग लगना चहिये।
माँ कात्यायनी की पूरे भक्ति भाव से पूजा करने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है तथा शारीरिक बल और समृद्ध होता है। भक्त रोग और भय से मुक्त होता है तथा प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष शत्रुओं से छुटकारा प्राप्त करता है।
ऐसी भी मान्यता है की ब्रज की गोपियों ने भगवान कृष्ण को प्रियतम के रूप में पाने के लिए माँ कात्यायनी की पूजा कालिंदी यमुनाके तट पर की थी।
माँ कात्यायनी के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप किए जाने का विधान है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है
ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥
Must Read: दुर्गा सप्तशती सम्पूर्ण पाठ का फल पायें इस एक मंत्र के जाप से।Durga Saptashati
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्विनीम्॥
स्वर्णवर्णा आज्ञाचक्र स्थिताम् षष्ठम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम्॥
माँ कात्यायनी की स्तोत्र पाठ (Mata Katyayani Stotra)
कञ्चनाभां वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखी शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोऽस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालङ्कार भूषिताम्।
सिंहस्थिताम् पद्महस्तां कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
परमानन्दमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभर्ती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्वाचिन्ता, विश्वातीता कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
कां बीजा, कां जपानन्दकां बीज जप तोषिते।
कां कां बीज जपदासक्ताकां कां सन्तुता॥
कांकारहर्षिणीकां धनदाधनमासना।
कां बीज जपकारिणीकां बीज तप मानसा॥
कां कारिणी कां मन्त्रपूजिताकां बीज धारिणी।
कां कीं कूंकै क: ठ: छ: स्वाहारूपिणी॥
कात्यायनौमुख पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी हृदयम् पातु जया भगमालिनी॥
जय कात्यायनी माँ, मैया जय कात्यायनी माँ ।
उपमा रहित भवानी, दूँ किसकी उपमा ॥
मैया जय कात्यायनी….
गिरजापति शिव का तप, असुर रम्भ कीन्हाँ ।
वर-फल जन्म रम्भ गृह, महिषासुर लीन्हाँ ॥
मैया जय कात्यायनी….
कर शशांक-शेखर तप, महिषासुर भारी ।
शासन कियो सुरन पर, बन अत्याचारी ॥
मैया जय कात्यायनी….
त्रिनयन ब्रह्म शचीपति, पहुँचे, अच्युत गृह ।
महिषासुर बध हेतू, सुर कीन्हौं आग्रह ॥
मैया जय कात्यायनी….
सुन पुकार देवन मुख, तेज हुआ मुखरित ।
जन्म लियो कात्यायनी, सुर-नर-मुनि के हित ॥
मैया जय कात्यायनी….
अश्विन कृष्ण-चौथ पर, प्रकटी भवभामिनि ।
पूजे ऋषि कात्यायन, नाम काऽऽत्यायिनि ॥
मैया जय कात्यायनी….
अश्विन शुक्ल-दशी को, महिषासुर मारा ।
नाम पड़ा रणचण्डी, मरणलोक न्यारा ॥
मैया जय कात्यायनी….
दूजे कल्प संहारा, रूप भद्रकाली ।
तीजे कल्प में दुर्गा, मारा बलशाली ॥
मैया जय कात्यायनी….
दीन्हौं पद पार्षद निज, जगतजननि माया ।
देवी सँग महिषासुर, रूप बहुत भाया ॥
मैया जय कात्यायनी….
उमा रमा ब्रह्माणी, सीता श्रीराधा ।
तुम सुर-मुनि मन-मोहनि, हरिये भव-बाधा ॥
मैया जय कात्यायनी….
जयति मङ्गला काली, आद्या भवमोचनि ।
सत्यानन्दस्वरूपणि, महिषासुर-मर्दनि ॥
मैया जय कात्यायनी….
जय-जय अग्निज्वाला, साध्वी भवप्रीता ।
करो हरण दुःख मेरे, भव्या सुपुनीता॥
मैया जय कात्यायनी….
अघहारिणि भवतारिणि, चरण-शरण दीजै ।
हृदय-निवासिनि दुर्गा, कृपा-दृष्टि कीजै ॥
मैया जय कात्यायनी….
ब्रह्मा अक्षर शिवजी, तुमको नित ध्यावै ।
करत ‘अशोक’ नीराजन, वाञ्छितफल पावै॥
मैया जय कात्यायनी….
(आरती रचना-अशोक कुमार खरे)
ज्योतिष के अनुसार देवी कात्यायनि बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करती , इसलिए उनकी विधिवत उपासना करने से बृहस्पति के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।
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]]>The post Mata kushmanda | माँ कुष्मांडा- जाने माता की कथा, मंत्र, पूजा विधि और आरती appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब सृष्टि कि रचना नहि हुई थी और हर जग अंधकार का राज था तब देवी कूष्माण्डा ने अपनी मुस्कुराहट से इस सृष्टि की उत्पति की। तब से देवी कूष्माण्डा का निवास सूर्यमंडल के मध्य में है और यह सूर्य मंडल को अपने संकेत से नियंत्रित करती हैं।
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माँ कुष्मांडा को लाल रंग अति प्रिय है | माँ कुष्मांडा श्री दुर्गा का चौथा स्वरूप है | इनकी पूजा नवरात्र के चौथे दिन चतुर्थी को बड़े विधि विधान से करनी चाहिए | अतः नवरात्र के चौथे दिन ब्रह्म मुहुर्त मे उठ कर नियमित कार्यों से निर्वित होकर माँ की निमित विविध प्रकार की पूजन की सामग्री को संग्रहीत करके पूजन करना चाहिए और दुर्गसप्तशती का पाठ करें या ब्राह्मण से करवाएँ। माँ को लाल पुष्प रोली ,अक्षत और लाल महावर और लाल चूड़ी अवश्य चढ़ाये और मालपुए से माँ कुष्मांडा को भोग लगाना चाहिए |
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥
सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥
भास्वर भानु निभाम् अनाहत स्थिताम् चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पद्म, सुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कोमलाङ्गी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहि दुःख शोक निवारिणीम्।
परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।
हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥
कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,
पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।
दिग्विदिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजम् सर्वदावतु॥
चौथा जब नवरात्र हो, कुष्मांडा को ध्याते।
जिसने रचा ब्रह्माण्ड यह, पूजन है
आध्शक्ति कहते जिन्हें, अष्टभुजी है रूप।
इस शक्ति के तेज से कहीं छाव कही धुप॥
कुम्हड़े की बलि करती है तांत्रिक से स्वीकार।
पेठे से भी रीज्ती सात्विक करे विचार॥
क्रोधित जब हो जाए यह उल्टा करे व्यवहार।
उसको रखती दूर माँ, पीड़ा देती अपार॥
सूर्य चन्द्र की रौशनी यह जग में फैलाए।
शरणागत की मैं आया तू ही राह दिखाए॥
नवरात्रों की माँ कृपा करदो माँ।
नवरात्रों की माँ कृपा करदो माँ॥
जय माँ कुष्मांडा मैया।
ज्योतिष के अनुसार माँ कुष्मांडा सूर्य मंडल में विराजित है और सूर्य का मार्गदर्शन करती है अतः इनकी उपासना करने से सूर्य के कुप्रभावों से बचा जा सकता है। माँ कभी अपने भक्तों को निराश नहीं करती।
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]]>The post Mata Chandraghanta | माँ चंद्रघंटा- जाने माता की कथा, मंत्र, पूजा विधि और आरती appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>मार्कडेंय पुराण के अनुसार माँ आदिशक्ति के नौ स्वरूप है और वो अपने तीसरे स्वरूप मे चंद्रघंटा के नाम से जानी जाती है | नवरात्र के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है | शिव महा पुराण के अनुसार देवी चंद्र घंटा माँ पार्वती का विवाहित रूप है| माँ पार्वती के विवाह के बाद माँ पार्वती ने अपने मस्तक को अर्ध चंद्रमा से सजाना शुरू कर दिया इसलिए वह चंद्रघंटा के रूप मे लोकप्रिय हुई | देवी चंद्रघंटा को क्षमा और शांति की देवी के रूप मे पूजा जाता है | माँ चंद्रघंटा की दस भजाएँ है और माता इनमे अस्त्र -शस्त्र धारण किये रहती हैं। दाहिने हाथो मे त्रिशूल ,गदा, तलवार और कमंडल होता हैतथा वरण पाँचवे हाथ में तथा बाएं हाथों मे कमल का फूल तीर ,धनुष और पाँचवे हाथ मे अभय मुद्रा | सिंह पर सवार इस देवी की मुद्रा युद्ध मे एक वीरांगना के समान है जिससे दानव –दैत्य भी कापते है |
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पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार देवताओं और असुरों के बीच घमासान युद्ध हुआ। देवताओं का नेतृत्व गेवराज इंद्र ने किया और असुरों का नेतृत्व महिषासुर ने किया। इस युद्ध में असुरों ने देवताओं को परास्त कर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। महिषासुर स्वर्ग पर राज करने लगा और देवताओं को प्रताड़ित करने लगा। उस से छुटकारा और इंद्र अपना स्वर्ग पुनः पाने के लिए भगवान बिष्णु, ब्रह्मा और शिव जी के पास गये और उन को सब हाल विस्तार से बता कर मदद की गुहार लगायी।
देवताओं द्धारा महिषासुर के अत्याचारों के बारे में सुन भगवान बिष्णु, ब्रह्मा और शिव जी को अत्यंत क्रोध आया। उस क्रोध के कारण तीनो के मुख से ऊर्जा उत्पन्न हुई और एक में मिल गयी। इस ऊर्जा से देवी का अवतरण हुआ। इस देवी को भगवान शिव ने त्रिशुल, भगवान विष्णु ने चक्र और अन्य सभी देवी-देवताओं ने शस्त्र प्रदान किए। इस सभी शस्त्रों से सज्जित को कर माँ चंद्रघंटा ने महिषासुर समेत सभी दानवों का वध कर स्वर्गलोक को मुक्त कराया।
माँ चंद्रघंटा श्री दुर्गा जी का तीसरा स्वरूप है | इनकी पूजा बड़े विधि विधान से करनी चाहिए अतः नवरात्र के तीसरे दिन ब्रह्म मुहुर्त मे उठकर नियमित कार्यों से निर्वित होकर माँ की पूजा करनी चाहिए | इसके बाद माँ चंद्रघंटा को सिंदूर ,अक्षत ,सूंघनधित धूप ,इत्र ,चमेली का पुष्प अर्पित करे | इसके बाद माता को दूध या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाए |
वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥
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आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥
रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्वसिध्दिदायकम्॥
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दा बिना होमं।
स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥
जय मां चंद्रघंटा सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे सभी काम।
चंद्र समान तुम शीतल दाती। चंद्र तेज किरणों में समाती।।
क्रोध को शांत करने वाली। मीठे बोल सिखाने वाली।
मन की मालक मन भाती हो। चंद्र घंटा तुम वरदाती हो।।
सुंदर भाव को लाने वाली। हर संकट मे बचाने वाली।
हर बुधवार जो तुझे ध्याये। श्रद्धा सहित जो विनय सुनाएं।।
मूर्ति चंद्र आकार बनाएं। सन्मुख घी की ज्योत जलाएं।
शीश झुका कहे मन की बाता। पूर्ण आस करो जगदाता।।
कांची पुर स्थान तुम्हारा। करनाटिका में मान तुम्हारा।
नाम तेरा रटू महारानी। भक्त की रक्षा करो भवानी।।
ज्योतिष पहलू
ज्योतिष के अनुसार माँ चंद्रघंटा शुक्र ग्रह को नियंत्रित करती है इसलिए इनकी विधिवत उपासना करने से शुक्र ग्रह के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते है |
The post Mata Chandraghanta | माँ चंद्रघंटा- जाने माता की कथा, मंत्र, पूजा विधि और आरती appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>The post Shardiya Navaratri 2020: नवरात्रि, जानिए तिथि और शुभ मुहूर्त appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>वैसे तो दुर्गा जी के 108 नाम बताये जाते हैं लेकिन नवरात्रि में उन के नौ रूपों की स्तुति और पूजा-पाठ की जाती है। स्वयं ब्रह्मा जी ने माँ दुर्गा के नौ रूपों का उल्लेख संक्षेप में इस श्लोक द्वारा किया है।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।

प्रथम नवरात्र में माँ दुर्गा की शैलपुत्री के रूप में पूजा की जाती है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री शैलपुत्री की पूजा करने से मूलाधार चक्र जागृत होजाता है और साधकों को सभी प्रकार की सिद्धियां स्वत: ही प्राप्त हो जाती हैं। माँ का वाहन सिंह है तथा इन्हें गाय का घी अथवा उससे बने पदार्थोंका भोग लगाया जाता है।

दूसरे नवरात्र में माँ के ब्रह्मचारिणी एवं तपश्चारिणी रूप को पूजा जाता है। जो साधक माँ के इस रूप की पूजा करते हैं उन्हें तप, त्याग, वैराग्य, संयम और सदाचार की प्राप्ति होती है और जीवन में वे जिस बात का संकल्प कर लेते हैं उसे पूरा करके ही रहते हैं। माँ ब्रह्मचारिणी का कोई भी वाहन नहीं है पैर ही वाहन है माँ को शक्कर का भोग प्रिय है।
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माँ के इस रूप में मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चन्द्र बना होने के कारण इनका नाम चन्द्रघंटा पड़ा तथा तीसरे नवरात्र में माँ के इसी रूप की पूजा की जाती है तथा माँ की कृपा से साधक को संसार के सभी कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। शेर पर सवारी करने वाली माता को दूध का भोग प्रिय है।

अपने उदर से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने वाली माँ कुष्मांडा की पूजा चौथे नवरात्र में करने का विधान है। इनकी आराधना करने वाले भक्तों केसभी प्रकार के रोग एवं कष्ट मिट जाते हैं तथा साधक को माँ की भक्ति के साथ ही आयु, यश और बल की प्राप्ति भी सहज ही हो जाती है। माँ को भोग में मालपुआ अति प्रिय है।

पंचम नवरात्र में आदिशक्ति माँ दुर्गा की स्कंदमाता के रूप में पूजा होती है। कुमार कार्तिकेय की माता होने के कारण इनका नाम स्कंदमातापड़ा। इनकी पूजा करने वाले साधक संसार के सभी सुखों को भोगते हुए अंत में मोक्ष पद को प्राप्त होते हैं। उनके जीवन में किसी भी प्रकार कीवस्तु का कोई अभाव कभी नहीं रहता। इन्हें पद्मासनादेवी भी कहते हैं। माँ का वाहन सिंह है और इन्हें केले का भोग अति प्रिय है
पंचम नवरात्र में आदिशक्ति माँ दुर्गा की स्कंदमाता के रूप में पूजा होती है। कुमार कार्तिकेय की माता होने के कारण इनका नाम स्कंदमाता पड़ा। इनकी पूजा करने वाले साधक संसार के सभी सुखों को भोगते हुए अंत में मोक्ष पद को प्राप्त होते हैं। उनके जीवन में किसी भी प्रकार की वस्तु का कोई अभाव कभी नहीं रहता। इन्हें पद्मासनादेवी भी कहते हैं। माँ का वाहन सिंह है और इन्हें केले का भोग अति प्रिय है।
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महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति माँ दुर्गा ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और उनका कात्यायनी नाम पड़ा। छठे नवरात्र में माँ के इसी रूप की पूजा की जाती है। माँ की कृपा से साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि चारों फलों की जहां प्राप्ति होती है। वहीं वह आलौकिक तेज से अलंकृत होकर हर प्रकार के भय, शोक एवं संतापों से मुक्त होकर खुशहाल जीवन व्यतीत करता है। और माँ को शहद अति प्रिय है।

सभी राक्षसों के लिए कालरूप बनकर आई माँ दुर्गा के इस रूप की पूजा सातवें नवरात्र में की जाती है। माँ के स्मरण मात्र से ही सभी प्रकार के भूत, पिशाच एवं भय समाप्त हो जाते हैं। माँ की कृपा से भानूचक्र जागृत होता है और भक्त हमेशा भयमुक्त रहता हैं। माँ गधे की सवारी करती है और माँ को गुड़ का भोग अतिप्रिय है।

आदिशक्ति माँ दुर्गा के महागौरी रूप की पूजा आठवें नवरात्र में की जाती है। माँ ने काली रूप में आने के पश्चात घोर तपस्या की और पुन: गौरवर्ण पाया और महागौरी कहलाई। माँ का वाहन बैल है और माँ को हलवे का भोग लगाया जाता है।

नौवें नवरात्र में माँ के इस रूप की पूजा एवं आराधना की जाती है, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है माँ का यह रूप साधक को सभी प्रकार कीऋद्धियां एवं सिद्धियां प्रदान करने वाला है। जिस पर माँ की कृपा हो जाती है उसके लिए जीवन में कुछ भी पाना असंभव नहीं रहता। माँ शेर परबिराजमान है माँ को खीर अति प्रिय है अत: माँ को खीर का भोग लगाना चाहिए।
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हर वर्ष शारदीय नवरात्रि की शुरुआत श्राद्ध की सर्वपित्र अमावस्या के बाद ही हो जाती है। लेकिन इस वर्ष अधिकमास लगने के कारण नवरात्रि एक माह विलम्ब से शुरू होगी। इस बार शारदीय नवरात्रि 17 अक्टूबर से शुरू होकर २५ अक्टूबर नवमी तिथि को सम्पन होगी।
17 अक्टूबर 2020: प्रतिपदा घटस्थापना
18 अक्टूबर 2020: द्वितीया मां ब्रह्मचारिणी पूजा
19 अक्टूबर 2020: तृतीय मां चंद्रघंटा पूजा
20 अक्टूबर 2020 : चतुर्थी मां कुष्मांडा पूजा
21 अक्टूबर 2020: पंचमी मां स्कंदमाता पूजा
22 अक्टूबर 2020: षष्ठी मां कात्यायनी पूजा
23 अक्टूबर 2020: सप्तमी मां कालरात्रि पूजा
24 अक्टूबर 2020 :अष्टमी मां महागौरी दुर्गा महा नवमी पूजा दुर्गा महा अष्टमी पूजा
25 अक्टूबर 2020 : नवमी मां सिद्धिदात्री नवरात्रि पारण
नवरात्रि के दौरान घटस्थापना एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। यह नौ दिनों के उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है। घटस्थापना देवी शक्ति का आह्वान है और शास्त्रों में नवरात्रि की शुरुआत में एक निश्चित अवधि के दौरान घटस्थापना करने के लिए नियमों और दिशानिर्देशों को अच्छी तरह से परिभाषित किया है। घटस्थापना करने का शुभ मुहूर्त प्रतिपदा के दिन एक तिहाई होता है। यदि किसी कारण इस मुहूर्त में घटस्थापना नहीं कर पाते तो अभिजीत मुहूर्त के दौरान घटस्थापना की जा सकती है।
दिनांक : 17 अक्टूबर 2020
घटस्थापना मुहूर्त – 06:23 ए एम से 10:12 ए एम
(अवधि – 03 घण्टे 49 मिनट्स)
घटस्थापना अभिजित मुहूर्त – 11:43 ए एम से 12:29 पी एम
(अवधि – 00 घण्टे 46 मिनट्स)
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