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Ahoi Ashtami 2023: हिन्दू धर्म पूरे विश्व भर में अपनी अनोखी परंपराओं और त्योहारों के लिए जाना जाता है। इसके सभी त्योहार और वैदिक परंपरायें नयी पीढ़ी को समाज से जोड़ने का काम करती है। हिन्दू धर्म विविधता से भरा धर्म है। इसमें हर प्रांत और समुदाए के कुछ बहुत प्रचलित एवं महत्वपूर्ण अपने व्रत त्योहार हैं। 

ऐसे ही अहोई अष्टमी (Ahoi Ashtami) का एक पर्व है जो उत्तर भारत में मनाया जाता है। यह पर्व हर वर्ष हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए व्रत रख कर अहोई माता से प्रार्थना करती है।

अहोई अष्टमी व्रत कथा(Legend Of Ahoi Ashtami)

प्राचीन काल में एक गाँव में साहूकाररहता था, उसके सात पुत्र और सात बहुएं थी। साहूकारकी एक पुत्री भी थी जिसका विवाह हो चुका था और वो अपने ससुराल में रहती थी। साहूकार की बेटी दीपावली पे अपने मायके आयी हुई थी। साहूकार के घर दीपावली की तैयारियां चल रही थी तो उसकी बेटी भी दीपावली की तैयारी में अपनी भाभियों का हाथ बटाने लगी। दीपावली पर घर को लीपना था इसलिए साहूकार की बहुएं और बेटी मिट्टी लाने के लिए जंगल में गई। साहूकारकी बेटी जहां मिट्टी काट रही थी उस स्थान पर स्याही (साही) अपने बेटों से साथ रहती थी। मिट्टी काटते हुए ग़लती से साहूकार की बेटी की कुदाल के चोट से स्याही का एक बच्चा मर गया। यह देख स्याही साहूकार की बेटी पर क्रोधित होकर बोली मैं तुम्हारी कोख बांधूंगी।

यह सुन साहूकार की बेटी साही से बोली की ये अनजाने में हुई गलती है मुझे माफ़ कर दीजिए और मेरी कोख मत बंधिए पर साही अपने पुत्र की मृत्यु से दुखी और साहूकार की बेटी पर अत्यंत क्रोधित थी इसलिए साही ने उसकी बात नहीं सुनी। तब साहूकार की बेटी ने एक एक कर अपनी सातों भाभियों से प्रार्थना की वो उसके बदले अपनी कोख बंधवा ले पर उसकी छ: भाभियों ने मना कर दिया। सबसे छोटी भाभी घर में नयी थी और उस ने सोचा कि अगर में मना करूँगी तो सास बुरा मान जाएगी इसलिए उसने हाँ कर दी और अपनी ननद के बदले अपनी कोख बंधवा ली। इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे होते थे वो सात दिन बाद मर जाते थे। सात पुत्रों की इस प्रकार मृत्यु होने के बाद उसने पंडित को बुलवाकर सारा क़िस्सा बताया। पंडित जी ने उसे सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी।

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पंडित जी की सलाह के अनुसार छोटी बहु ने सुरही गाय की वर्षों तक सेवा की। उसकी सेवा से प्रसन्न हो कर सुरही गाय ने साहूकार की छोटी बहु से कहा ‘हे पुत्री, तू किस लिए मेरी इतनी सेवा कर रही है, बता तुझे मुझ से क्या चहिये?’ जो कुछ तेरी इच्छा हो वह मुझ से मांग ले। साहूकार की बहू ने सुरही गाय को सारा क़िस्सा बताया और कहा कि स्याहु माता ने मेरी कोख बांध दी है जिससे मेरे बच्चे नहीं बचते हैं. यदि आप मेरी कोख खुलवा दे तो मैं आपका उपकार मानूंगी। सुरही गाय ने सारा क़िस्सा सुन बहु से कहा ‘ पुत्री, में तेरी सेवा से बहुत प्रसन्न हूँ, में तुझे सात समुद्र पार स्याहु माता के पास ले चलती हूँ’।

चलते-चलते दोनो रास्ते में थक जाने पर आराम करने लगी, तभी अचानक साहूकार की छोटी बहू की नज़र एक ओर गयी और उस ने देखा कि एक सांप गरूड़ पंखनी के बच्चे को डंसने जा रहा है, यह देखकर उसने सांप को मार डाला। उसी वक्त गरुण पंखनी वहाँ आ गयी और खून बिखरा हुआ देखकर उसे लगा कि छोटी बहु ने उसके बच्चे के मार दिया है इस पर वह छोटी बहू को चोंच से मारना शुरू कर देती है। छोटी बहू इस पर कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है। गरूड़ पंखनी इस पर खुश होती है और सुरही सहित उन दोनो को स्याही के पास पहुंचा देती है। वहां छोटी बहू स्याहु की भी सेवा करती है. स्याहु छोटी बहू की सेवा से प्रसन्न होकर छोटी बहू को सात पुत्र और सात पुत्रवधुओं का आर्शीवाद देती है। यह सुन छोटी बहु स्याहु से कहती है की आप का आशीर्वाद पूरा नहीं हो पायेगा औरसारा क़िस्सा बताती है और कहती है की आप ने मेरी कोख बांध रखी है। स्याहु को सब याद आ जाता है तो वो छोटी बहू को कहती है की तू घर जाने पर अहोई माता का पूरे भक्ति भाव से व्रत रख कर पूजा करना और सात सात अहोई बनाकर सात कड़ाही देना। अहोई माता के आशीर्वाद से तेरी कोख खुल जाएगी और मेरे कथन के अनुसार तेरे सात पुत्र और सात पुत्रवधू होंगे।

तब साहूकार की छोटी बहू घरलोट कर स्याहु की सलाह के अनुसार अहोई माता का पूरे भक्ति भाव से व्रत रख पूजा करी और सात अहोई बनाकर सातकड़ाही देकर उजमन पन किया। इसके फल स्वरूप उसके सात पुत्र हुए और उनकी सात बहुए आयी।

अहोई अष्टमी 2023 पूजा शुभ मुहूर्त (Ahoi Ashtami 2023)

  • दिनांक : नवम्बर 5 , 2023
  • अहोई अष्टमी पूजा मुहूर्त: साय काल 5 बजकर 33 मिनट से साय काल 6 बजकर 52 मिनट तक ( अवधि – 01 घण्टा 18 मिनट्स)
  • तारों को देखने का समय : साय काल 5 बजकर 18 मिनट
  • अहोई अष्टमी के दिन चन्द्रोदय समय : रात 12 बजकर 02 मिनट, नवम्बर 6
  • अष्टमी तिथि प्रारम्भ : नवम्बर 5, 2023 को 12:59 ए एम बजे
  • अष्टमी तिथि समाप्त : नवम्बर 6, 2023 को 03:18 ए एम बज

अहोई अष्टमी व्रत पूजा विधि 

उत्तर भारत के राज्यों में अहोई अष्टमी का व्रत निम्नलिखित तरीके से मनाया जाता है।

  • प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त(सूर्योदयः से पहले) सुबह जल्दी उठ कर स्नान करने के बाद कुछ फल इत्यादि खाते है।
  • तत्पश्यात पूजा के समय संकल्प ले की ‘हे अहोई माता यह व्रत मैं अपने संतान और  की संतान की लम्बी आयु एवं अच्छे भविष्य की कामना के लिए कर रही हूँ, और माता से इसे सफल करने का आग्रह करे। इस व्रत में माता पार्वती की भी पूजा करि जाती है क्योकि वे अनहोनी से बचाने वाली माता है|
  • अहोई माता की पूजा के अनुसार गेरू से अहोई माता का एक चित्र एवं स्याहु और उसके सात पुत्रो का भी चित्र दिवार पर बनाया जाता है|
  • इसके बाद माता के सामने एक कटोरी में चावल, सिंगाड़े एवं मूली रखी जाती है|
  • माता के सामने दिया रखे एवं कहानी सुने या सुनाए| कहानी सुनते या सुनाते समय हाथ में लिए चावलों को साडी एवं दुपट्टे में बाँध दे|
  • पूजा करने से पहले मिट्टी के कर्वे में और लोटे में पानी भर कर रखते है|
  • यह सुनिश्चित कीजिये की करवा करवा चौथ के समय का होना चाहिए|
  • इसके बाद पूरे दिन निर्जला व्रत रखने का संकल्प ले|
  • शाम के वक्त अहोई माता को चौदह पूरी या मठरी या काजू का भोग लगाए|
  • शाम को तारे निकल जाने पर चावल एवं जल तारो को अर्पित किया जाता है और व्रत खोलते है।

अहोई अष्टमी आरती ( Ahoi Ashtami Arti)

जय अहोई माता जय अहोई माता ।
तुमको निसदिन ध्यावत हरी विष्णु धाता ।।

ब्रम्हाणी रुद्राणी कमला तू ही है जग दाता ।
जो कोई तुमको ध्यावत नित मंगल पाता ।।

तू ही है पाताल बसंती तू ही है सुख दाता ।
कर्म प्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता ।।

जिस घर थारो वास वही में गुण आता ।
कर न सके सोई कर ले मन नहीं घबराता ।।

तुम बिन सुख न होवे पुत्र न कोई पता ।
खान पान का वैभव तुम बिन नहीं आता ।।

शुभ गुण सुन्दर युक्ता क्षीर निधि जाता ।
रतन चतुर्दश तोंकू कोई नहीं पाता ।।

श्री अहोई माँ की आरती जो कोई गाता ।
उर उमंग अति उपजे पाप उतर जाता ।।

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माँ आदिशक्ति सम्पूर्ण जगत का कल्याण करती है। माँ भवानी के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार माँ आदिशक्ति के नौ स्वरूप है और वो अपने दूसरे स्वरूप में ब्रह्मचारिणी के नाम से जानी जाती हैं। नवरात्र के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। भक्त एवं योगी इस दिन माँ के चरणों में अपना मन लगाते हैं। ब्रह्म का शाब्दिक अर्थ होता है तपस्या और चारिणी का अर्थ होता है आचरण करने वाली। अतः ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। जो माता के रूप में सीधा दिखता है। माँ ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में जप की माला और बाएँ हाथ में कमंडल रहता है। 

माँ ब्रह्मचारिणी की कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया। देवऋषि नारद ने इनकी कुंडली देख कर बताया कि इस कन्या का विवाह तो त्रिलोक के स्वामी भगवान शंकर से होगा। यह सुन देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने की इच्छा अपने माता-पिता के सामने व्यक्त की। देवी की यह इच्छा सुन उनके माता-पिता को चिंता हुई और उन्होंने देवी को हतोत्साहित करने की पुरजोर कोशिश की परंतु देवी ने तो भोलेनाथ को पति के रूप में पाने दृढ़ निश्चय कर लिया था। 

देवी ने भगवान शंकर को पाने के लिए कठोर तपस्या की। उन्होंने एक हजार वर्ष तक केवल फल-फूल का सेवन किया तथा एक सौ वर्ष तक केवल शाक पर निर्वाह किया। देवी ने कई हजार वर्ष तक निर्जला तप किया। इस कठोर तपस्या करने के कारण ही देवी को तपश्चारिणी के नाम से भी जाना जाता है। अंत में देवी भगवान शिव को मनाने में सफल हुई और शिव जी ने उनसे विवाह किया। 

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माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा का विधान 

माँ ब्रह्मचारिणी श्री दुर्गा जी का दूसरा रूप हैं। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र के दूसरे दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर माँ की पूजा करनी चहिये।  

देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें-

इधाना कदपद्माभ्याममक्षमालाक कमण्डलु । देवी प्रसिदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्त्मा ।।

इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भांति भांति के फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें, देवी को लाल फूल अति पसंद है। 

माँ ब्रह्मचारिणी के मंत्र

माँ ब्रह्मचारिणी के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप किए जाने का विधान है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है। 

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

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ध्यान मंत्र 

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥
परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

कवच

त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

मंत्र, स्तोत्र पाठ और कवच के जाप के साथ घी एवं  कपूर मिलाकर देवी की आरती करें। 

माँ ब्रह्मचारिणी की आरती:

जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता। जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।

ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो।।

ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा। जिसको जपे सकल संसारा।

जय गायत्री वेद की माता। जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।।

कमी कोई रहने न पाए। कोई भी दुख सहने न पाए।

उसकी विरति रहे ठिकाने। जो ​तेरी महिमा को जाने।।

रुद्राक्ष की माला ले कर। जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।

आलस छोड़ करे गुणगाना। मां तुम उसको सुख पहुंचाना।।

ब्रह्माचारिणी तेरो नाम। पूर्ण करो सब मेरे काम।

भक्त तेरे चरणों का पुजारी। रखना लाज मेरी महतारी।।

आरती करने के उपरांत  दोनों हाथ जोड़कर सभी देवी देवताओं को प्रणाम करें और नीचे दिए मंत्र के द्वारा क्षमा प्रार्थना करें-
“आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं, पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी”

ज्योतिषीय पहलू

ज्योतिष के अनुसार माँ ब्रह्मचारिणी मंगल ग्रह को नियंत्रित करती हैंइसलिए उनकी विधिवत से उपासना करने से मंगल ग्रह के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।

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