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हिन्दू धर्म पूरे विश्व भर में अपनी अनोखी परंपराओं और त्योहारों के लिए जाना जाता है। इसके सभी त्योहार और वैदिक परंपरायें नयी पीढ़ी को समाज से जोड़ने का काम करती है। हिन्दू धर्म विविधता से भरा धर्म है। इसमें हर प्रांत और समुदाए के कुछ बहुत प्रचलित एवं महत्वपूर्ण अपने व्रत त्योहार हैं। 

ऐसे ही अहोई अष्टमी का एक पर्व है जो उत्तर भारत में मनाया जाता है। यह पर्व हर वर्ष हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए व्रत रखती है और अहोई माता से प्रार्थना करती है। 

अहोई अष्टमी व्रत कथा 

प्राचीन काल में एक गाँव में साहूकाररहता था, उसके सात पुत्र और सात बहुएं थी। साहूकारकी एक पुत्री भी थी जिसका विवाह हो चुका था और वो अपने ससुराल में रहती थी। साहूकार की बेटी दीपावली पे अपने मायके आयी हुई थी। साहूकार के घर दीपावली की तैयारियां चल रही थी तो उसकी बेटी भी दीपावली की तैयारी में अपनी भाभियों का हाथ बटाने लगी। दीपावली पर घर को लीपना था इसलिए साहूकार की बहुएं और बेटी मिट्टी लाने के लिए जंगल में गई। साहूकारकी बेटी जहां मिट्टी काट रही थी उस स्थान पर स्याही (साही) अपने बेटों से साथ रहती थी। मिट्टी काटते हुए ग़लती से साहूकार की बेटी की कुदाल के चोट से स्याही का एक बच्चा मर गया। यह देख स्याही साहूकार की बेटी पर क्रोधित होकर बोली मैं तुम्हारी कोख बांधूंगी।

यह सुन साहूकार की बेटी साही से बोली की ये अनजाने में हुई गलती है मुझे माफ़ कर दीजिए और मेरी कोख मत बंधिए पर साही अपने पुत्र की मृत्यु से दुखी और साहूकार की बेटी पर अत्यंत क्रोधित थी इसलिए साही ने उसकी बात नहीं सुनी। तब साहूकार की बेटी ने एक एक कर अपनी सातों भाभियों से प्रार्थना की वो उसके बदले अपनी कोख बंधवा ले पर उसकी छ: भाभियों ने मना कर दिया। सबसे छोटी भाभी घर में नयी थी और उस ने सोचा कि अगर में मना करूँगी तो सास बुरा मान जाएगी इसलिए उसने हाँ कर दी और अपनी ननद के बदले अपनी कोख बंधवा ली। इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे होते थे वो सात दिन बाद मर जाते थे। सात पुत्रों की इस प्रकार मृत्यु होने के बाद उसने पंडित को बुलवाकर सारा क़िस्सा बताया। पंडित जी ने उसे सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी। 

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पंडित जी की सलाह के अनुसार छोटी बहु ने सुरही गाय की वर्षों तक सेवा की। उसकी सेवा से प्रसन्न हो कर सुरही गाय ने साहूकार की छोटी बहु से कहा ‘हे पुत्री, तू किस लिए मेरी इतनी सेवा कर रही है, बता तुझे मुझ से क्या चहिये?’ जो कुछ तेरी इच्छा हो वह मुझ से मांग ले। साहूकार की बहू ने सुरही गाय को सारा क़िस्सा बताया और कहा कि स्याहु माता ने मेरी कोख बांध दी है जिससे मेरे बच्चे नहीं बचते हैं. यदि आप मेरी कोख खुलवा दे तो मैं आपका उपकार मानूंगी। सुरही गाय ने सारा क़िस्सा सुन बहु से कहा ‘ पुत्री, में तेरी सेवा से बहुत प्रसन्न हूँ, में तुझे सात समुद्र पार स्याहु माता के पास ले चलती हूँ’। 

चलते-चलते दोनो रास्ते में थक जाने पर आराम करने लगी, तभी अचानक साहूकार की छोटी बहू की नज़र एक ओर गयी और उस ने देखा कि एक सांप गरूड़ पंखनी के बच्चे को डंसने जा रहा है, यह देखकर उसने सांप को मार डाला। उसी वक्त गरुण पंखनी वहाँ आ गयी और खून बिखरा हुआ देखकर उसे लगा कि छोटी बहु ने उसके बच्चे के मार दिया है इस पर वह छोटी बहू को चोंच से मारना शुरू कर देती है। छोटी बहू इस पर कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है। गरूड़ पंखनी इस पर खुश होती है और सुरही सहित उन दोनो को स्याही के पास पहुंचा देती है। वहां छोटी बहू स्याहु की भी सेवा करती है. स्याहु छोटी बहू की सेवा से प्रसन्न होकर छोटी बहू को सात पुत्र और सात पुत्रवधुओं का आर्शीवाद देती है। यह सुन छोटी बहु स्याहु से कहती है की आप का आशीर्वाद पूरा नहीं हो पायेगा औरसारा क़िस्सा बताती है और कहती है की आप ने मेरी कोख बांध रखी है। स्याहु को सब याद आ जाता है तो वो छोटी बहू को कहती है की तू घर जाने पर अहोई माता का पूरे भक्ति भाव से व्रत रख कर पूजा करना और सात सात अहोई बनाकर सात कड़ाही देना। अहोई माता के आशीर्वाद से तेरी कोख खुल जाएगी और मेरे कथन के अनुसार तेरे सात पुत्र और सात पुत्रवधू होंगे।

तब साहूकार की छोटी बहू घरलोट कर स्याहु की सलाह के अनुसार अहोई माता का पूरे भक्ति भाव से व्रत रख पूजा करी और सात अहोई बनाकर सातकड़ाही देकर उजमन पन किया। इसके फल स्वरूप उसके सात पुत्र हुए और उनकी सात बहुए आयी।

अहोई अष्टमी 2020 पूजा शुभ मुहूर्त

  • दिनांक: नवम्बर 8, 2020
  • अहोई अष्टमी पूजा मुहूर्त: साय काल 5 बजकर 31 मिनट से साय काल 6 बजकर 50 मिनट तक ( अवधि – 01 घण्टा 19 मिनट्स) 
  • तारों को देखने का समय: 5 बजकर 56 मिनट
  • अहोई अष्टमी के दिन चन्द्रोदय समय: रात 11 बजकर 56 मिनट

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अहोई अष्टमी व्रत पूजा विधि 

उत्तर भारत के राज्यों में अहोई अष्टमी का व्रत निम्नलिखित तरीके से मनाया जाता है।

  • प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त(सूर्योदयः से पहले) सुबह जल्दी उठ कर स्नान करने के बाद कुछ फल इत्यादि खाते है।
  • तत्पश्यात पूजा के समय संकल्प ले की ‘हे अहोई माता यह व्रत मैं अपने संतान और  की संतान की लम्बी आयु एवं अच्छे भविष्य की कामना के लिए कर रही हूँ, और माता से इसे सफल करने का आग्रह करे। इस व्रत में माता पार्वती की भी पूजा करि जाती है क्योकि वे अनहोनी से बचाने वाली माता है| 
  • अहोई माता की पूजा के अनुसार गेरू से अहोई माता का एक चित्र एवं स्याहु और उसके सात पुत्रो का भी चित्र दिवार पर बनाया जाता है| 
  • इसके बाद माता के सामने एक कटोरी में चावल, सिंगाड़े एवं मूली रखी जाती है| 
  • माता के सामने दिया रखे एवं कहानी सुने या सुनाए| कहानी सुनते या सुनाते समय हाथ में लिए चावलों को साडी एवं दुपट्टे में बाँध दे| 
  • पूजा करने से पहले मिट्टी के कर्वे में और लोटे में पानी भर कर रखते है| 
  • यह सुनिश्चित कीजिये की करवा करवा चौथ के समय का होना चाहिए| 
  • इसके बाद पूरे दिन निर्जला व्रत रखने का संकल्प ले|
  • शाम के वक्त अहोई माता को चौदह पूरी या मठरी या काजू का भोग लगाए|
  • शाम को तारे निकल जाने पर चावल एवं जल तारो को अर्पित किया जाता है और व्रत खोलते है।

अहोई अष्टमी आरती 

जय अहोई माता जय अहोई माता ।

तुमको निसदिन ध्यावत हरी विष्णु धाता ।।

ब्रम्हाणी रुद्राणी कमला तू ही है जग दाता ।

जो कोई तुमको ध्यावत नित मंगल पाता ।।

तू ही है पाताल बसंती तू ही है सुख दाता ।

कर्म प्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता ।।

जिस घर थारो वास वही में गुण आता ।

कर न सके सोई कर ले मन नहीं घबराता ।।

तुम बिन सुख न होवे पुत्र न कोई पता ।

खान पान का वैभव तुम बिन नहीं आता ।।

शुभ गुण सुन्दर युक्ता क्षीर निधि जाता ।

रतन चतुर्दश तोंकू कोई नहीं पाता ।।

श्री अहोई माँ की आरती जो कोई गाता ।

उर उमंग अति उपजे पाप उतर जाता ।।

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