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माघ शुक्ल अष्टमी को भीष्म पितामह की पुण्यतिथि (Bhishma Ashtami) के रूप में मनाया जाता है। भीष्म पितामह ने आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली तथा जीवन पर्यन्त उसका पालन किया। अपने पिता के प्रति उनकी निष्ठा एवं समर्पण के कारण, भीष्म पितामह को अपनी इच्छानुसार मृत्यु का समय चयन करने का वरदान प्राप्त हुआ था।

भीष्माष्टमी व्रत कथा – Bhishma Ashtami Legend 

महाभारत के तथ्यों के अनुसार गंगापुत्र देवव्रत की माता देवी गंगा अपने पति को दिये वचन के अनुसार अपने पुत्र को अपने साथ ले गई थी। देवव्रत की प्रारम्भिक शिक्षा और लालन-पालन इनकी माता के पास ही पूरा हुआ। इन्होनें महार्षि परशुराम जी से शस्त्र विद्धा प्राप्त की। दैत्यगुरु शुक्राचार्य से भी इन्हें काफी कुछ सिखने का मौका मिला। अपनी अनुपम युद्धकला के लिये भी इन्हें विशेष रुप से जाना जाता है।

जब देवव्रत ने अपनी सभी शिक्षाएं पूरी कर ली तो, उन्हें उनकी माता ने उनके पिता को सौंप दिया। कई वर्षों के बाद पिता-पुत्र का मिलन हुआ, और महाराज शांतनु ने अपने पुत्र को युवराज घोषित कर दिया। समय व्यतीत होने पर सत्यवती नामक युवती पर मोहित होने के कारण महाराज शांतनु ने युवती से विवाह का आग्रह किया। युवती के पिता ने अपनी पुत्री का विवाह करने से पूर्व यह शर्त महाराज के सम्मुख रखी की, देवी सत्यवती की होने वाली संतान ही राज्य की उतराधिकारी बनेगी। इसी शर्त पर वे इस विवाह के लिये सहमति देगें।

यह शर्त महाराज को स्वीकार नहीं थी, परन्तु जब इसका देवव्रत को पता चला तो, उन्होंने अपने पिता के सुख को ध्यान में रखते हुए, यह भीष्म प्रतिज्ञा ली कि वे सारे जीवन में ब्रह्माचार्य व्रत का पालन करेगें।  देवव्रत की प्रतिज्ञा से प्रसन्न होकर उसके पिता ने उसे इच्छा मृ्त्यु का वरदान दिया।

फरवरी 2022 में पड़ने वाले व्रत एवं त्यौहार

कालान्तर में भीष्म को पांच पांडवों के विरुद्ध युद्द करना पडा। शिखंडी पर शस्त्र न उठाने के अपने प्रण के कारण उन्होने युद्ध क्षेत्र में अपने शस्त्र त्याग दिये। युद्ध में वे घायल हो, गये और 18 दिनों तक मृ्त्यु शया पर पडे रहें, परन्तु शरीर छोडने के लिये उन्होंने सूर्य के उत्तर दिशा अथवा उतरायण होने की प्रतिक्षा की। जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी प्रतिज्ञा को निभाने के कारण देवव्रत भीष्म के नाम से अमर हुए।

माघ मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी को भीष्म पितामह की निर्वाण तिथि के रुप में मनाया जाता है। इस तिथि में कुश, तिल, जल से भीष्म पितामह का तर्पण करना चाहिए। इससे व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती है।

भीष्म अष्टमी पर्व का महत्व – Bhishma Ashtami significance

इस दिन लोग भीष्म पितामह के लिये एकोदिष्ट श्राद्ध करते हैं। इस श्राद्ध का सुझाव उन लोगों के लिये दिया गया है, जिनके पिता की मृत्यु हो गयी है। हालाँकि, कई लोग यह मानते हैं कि, भीष्म पितामह का श्राद्ध अनुष्ठान कोई भी व्यक्ति कर सकता है, चाहें उसके पिता जीवित हों अथवा मृत।

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