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हिंदू धर्म ग्रंथ के अनुसार, मां बगलामुखी को 10 महाविद्याओं में से एक माना गया है। ये 10 महाविद्याओं के क्रम में 8वीं महाविद्या है। इन्हें माता पीताम्बरा या ब्रह्मास्त्र विद्या भी कहा जाता है। प्रति वर्ष वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मां बगलामुखी की जयंती (Baglamukhi Jayanti) मनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस तिथि को ही मां बगलामुखी अवतरित हुई थी। इस दिन भक्त मां बगलामुखी की विधि-विधान से पूजा की करते है।

शक्ति-स्वरूपा माँ बगलामुखी की महिमा

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को आदि शक्ति के एक और स्वरूप देवी बगलामुखी माता की जयंती (Baglamukhi Jayanti) मनाई  जाती है। इस दिन देवी बगलामुखी का व्रत एवं उनकी उपासना करना लाभकारी सिद्ध होता है। माँ बगलामुखी देवी की साधना, पूजा-अर्चना एवं उनका व्रत करना बहुत ही मंगलकारी होता है।
माता बगलामुखी देवी स्तंभन शक्ति की एक अधिष्ठात्री देवी भी है। जो अपने भक्तों के भय को दूर कर, शांति प्रदान करती है। उनके शत्रुओं का नाश करती है तथा साथ ही भक्तों पर आई बुरी शक्तियों का भी दमन करने में माता बगलामुखी की साधना उत्तम मानी गई हैं।
माता बगलामुखी का एक नाम पीतांबरा देवी भी है। माता बगलामुखी को पीले रंग की सामग्री अति प्रिय है, इसलिए माता की पूजा में पीले रंग की वस्तुओं का उपयोग करना शुभ माना गया है। माता बगलामुखी का वर्ण, स्वर्ण के समान पीला होता है। इसलिए जातक को भी देवी बगलामुखी के पूजन के दौरान पीले वस्त्र अवश्य धारण करना चाहिए। माँ बगलामुखी देवी दस महाविद्याओं में एक आठवीं महाविद्या है जो कि एक स्तंभन की देवी मानी जाती है। कहां जाता है संपूर्ण ब्रह्मांड की शक्ति का समावेश माता बगलामुखी देवी में ही निहित है। शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद-विवाद में विजयी बनाने के लिए माता बगलामुखी की उपासना करना श्रेष्ठ माना गया है, और यह लाभप्रद भी है। माँ बगलामुखी की उपासना से जीवन में सफलता व उन्नति प्राप्त होती है। इस अष्टमी के दिन माता बगलामुखी को पीले फूल चढ़ाना और पीले वस्त्र चढाने से देवी अति प्रसन्न होती है एवं अपने भक्तों पर सदा अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखती है। इस दिन माता को नारियल चढ़ाने का भी विधान है। और इस दिन हल्दी के ढेर पर एक दीपक लगाने से भी माँ बगलामुखी प्रसन्न होती है।

बगलामुखी के उत्पत्ति की कथा

हिंदू धर्म ग्रंथों में वर्णित पौराणिक कथा के अनुसार, बहुत पहले एक विश्व विनाश करने वाला तूफान उत्पन्न हुआ। जिस कारण पृथ्वी पर चारों ओर हाहाकार मच गया। इस विनाशकारी तूफान को देखकर श्री हरि विष्णु अति चिंतित हुए, और जब भगवान विष्णु को इस समस्या का कोई समाधान नहीं मिला, तब वे उनके आराध्य देवाधिदेव महादेव की शरण लेने के लिए उनका स्मरण करने लगे। तभी भगवान शिव ने अपने ध्यान में लीन भगवान विष्णु को यह ध्यान दिलाया कि किसी शक्ति द्वारा इस तूफान को रोक पाना संभव नहीं। फिर भगवान विष्णु ने आदि-शक्ति जगदंबा को प्रसन्न करने के लिए एक हरिद्रा सरोवर के निकट बैठकर, एक कठोर तप करना आरंभ कर दिया । भगवान विष्णु ने तप के माध्यम से शक्तिस्वरुपा आदिशक्ति त्रिपुर सुंदरी को प्रसन्न किया। देवी त्रिपुर सुंदरी माता, श्री हरि विष्णु की साधना से बहुत प्रसन्न हुई। उस समय वैशाख शुक्ल पक्ष की अष्टमी की रात्रि थी। उसी अष्टमी की रात देवी त्रिपुर सुंदरी ने माता बगलामुखी का रूप धारण किया(Baglamukhi Jayanti)। तभी त्र्येलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी ने भगवान विष्णु के कहने पर सृष्टि के विनाश को नियंत्रित कर रोका एवं भगवान विष्णु की चिंतित अवस्था को दूर किया। तभी सृष्टि का ऐसा महाविनाश, महाप्रलय रुक सका। माता बगलामुखी एक प्रकार से समस्त संशयों का शमन करने वाली देवी है, जो कि उनके भक्तों की हर दुविधा दूर कर उनकी रक्षा भी करती है।

मां बगलामुखी पूजन 

माँ बगलामुखी की पूजा हेतु इस दिन(Baglamukhi Jayanti) प्रात: काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर अपनी निद्रा त्याग कर नित्य कर्मों में निवृत्त होकर, पीले वस्त्र धारण करने चाहिए. साधना अकेले में, मंदिर में या किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर की जानी चाहिए. पूजा करने के हेतु पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा करने के लिए आसन पर बैठें चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती बगलामुखी का चित्र स्थापित करें.

इसके बाद आचमन कर हाथ धोएं। आसन पवित्रीकरण, स्वस्तिवाचन, दीप प्रज्जवलन के बाद हाथ में पीले चावल, हरिद्रा, पीले फूल और दक्षिणा लेकर संकल्प करें। इस पूजा में  ब्रह्मचर्य का पालन करना आवशयक होता है  मंत्र- सिद्ध करने की साधना में माँ बगलामुखी का पूजन यंत्र चने की दाल से बनाया जाता है और यदि हो सके तो ताम्रपत्र या चाँदी के पत्र पर इसे अंकित करें।

ये भी पढ़ें : एक मंत्र के जाप से पायें दुर्गा सप्तशती सम्पूर्ण पाठ का फल

माँ बगलामुखी मंत्र | Bagalamukhi Mantra

ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै सर्व दुष्टानाम वाचं मुखं पदम् स्तम्भय जिह्वाम कीलय-कीलय बुद्धिम विनाशाय ह्लीं ॐ नम:
(इस मंत्र को मां का विशेष मंत्र माना जाता है। मां के इस मंत्र का जप करने से मां प्रसन्न होती हैं और सभी मनोकामनाओं को पूरा करती हैं।)
ॐ ह्लीं ह्लीं ह्लीं बगले सर्व भयं हर:
(इस मंत्र को मां बगलामुखी का भय नाशक मंत्र कहा जाता है। इस मंत्र के जप से भय दूर हो जाता है। जिन लोगों को किसी भी चीज से डर लगता है, उन्हें नियमित मां बगलामुखी के इस भयनाशक मंत्र का जप करना चाहिए।)
ॐ बगलामुखी देव्यै ह्लीं ह्रीं क्लीं शत्रु नाशं कुरु
(इस मंत्र को मां बगलामुखी का शत्रु नाशक मंत्र कहा जाता है। जिन व्यक्तियों को अपने शत्रुओं से भय रहता है उन्हें इस मंत्र का जप करना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति इस मंत्र का नियमित जप करते हैं, उनका शत्रु भी कुछ नहीं बिगाड़ पाते हैं। इस मंत्र के नियमित जप से मां बगलामुखी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।)
ॐ ह्लीं श्रीं ह्लीं पितांबरे तंत्र बाधां नाशय नाशय
(मां बगलामुखी का यह मंत्र काफी प्रभावशाली है। इस मंत्र को जादू-टोना नाशक मंत्र कहा जाता है। जिन जातकों पर भूत-प्रेत या कोई बुरा साया होता है, उन्हें इस मंत्र का नियमित जप करना चाहिए। इस मंत्र के जप करने से व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है और उसके ऊपर से भूत-प्रेत का साया हट जाता है।)

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हिंदू धर्म ग्रंथ के अनुसार, मां बगलामुखी को 10 महाविद्याओं में से एक माना गया है। ये 10 महाविद्याओं के क्रम में 8वीं महाविद्या है। इन्हें माता पीताम्बरा या ब्रह्मास्त्र विद्या भी कहा जाता है। प्रति वर्ष वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मां बगलामुखी की जयंती (Baglamukhi Jayanti) मनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस तिथि को ही मां बगलामुखी अवतरित हुई थी। इस दिन भक्त मां बगलामुखी की विधि-विधान से पूजा की करते है।

हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार मां बगलामुखी की पूजा करने से गंभीर बीमारियों से मुक्ति मिलती है, मुकदमों में जीत हासिल होती है, जमीनी विवाद सुलझ जाते हैं और शत्रुओं का नाश होता है।

बगलामुखी के उत्पत्ति की कथा। Baglamukhi Story

हिंदू धर्म ग्रंथों में वर्णित पौराणिक कथा के अनुसार, सतयुग में एक बार भयंकर तूफान आया था जिसके कारण सृष्टि का विनाश होने लगा. तब भगवान विष्णु के तप के बाद हरिद्रा सरोवर से मां बगलामुखी जलक्रीड़ा करती हुई उत्पन्न हुईं थीं। तब नारायण भगवान ने सृष्टि के विनाश को रोकने के लिए मां बगलामुखी से प्रार्थना की। भगवान के तप और प्रार्थना से मां बगलामुखी तथास्तु कहकर अंतर्धान हो गई. जिस दिन यह घटना घटी उस दिन वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि थी। तभी से हर साल मां बगलामुखी की जयंती इसी तिथि को मनाई जाने लगी।

मां बगलामुखी पूजन | Bagalamukhi pujan 

माँ बगलामुखी की पूजा हेतु इस दिन प्रात: काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर अपनी निद्रा त्याग कर नित्य कर्मों में निवृत्त होकर, पीले वस्त्र धारण करने चाहिए. साधना अकेले में, मंदिर में या किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर की जानी चाहिए. पूजा करने के हेतु पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा करने के लिए आसन पर बैठें चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती बगलामुखी का चित्र स्थापित करें.

इसके बाद आचमन कर हाथ धोएं। आसन पवित्रीकरण, स्वस्तिवाचन, दीप प्रज्जवलन के बाद हाथ में पीले चावल, हरिद्रा, पीले फूल और दक्षिणा लेकर संकल्प करें। इस पूजा में  ब्रह्मचर्य का पालन करना आवशयक होता है  मंत्र- सिद्ध करने की साधना में माँ बगलामुखी का पूजन यंत्र चने की दाल से बनाया जाता है और यदि हो सके तो ताम्रपत्र या चाँदी के पत्र पर इसे अंकित करें।

ये भी पढ़ें : एक मंत्र के जाप से पायें दुर्गा सप्तशती सम्पूर्ण पाठ का फल

माँ बगलामुखी मंत्र | Bagalamukhi Mantra

श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि।
त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे। श्री बगलामुखी दैवतायै नमो ह्रदये।
ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये। स्वाहा शक्तये नम: पाद्यो:।
ऊँ नम: सर्वांगं श्री बगलामुखी देवता प्रसाद सिद्धयर्थ न्यासे विनियोग:।

इसके पश्चात आवाहन करना चाहिए

ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल मनोहारिणी अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा।

अब देवी का ध्यान करें इस प्रकार

सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम्
हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्
हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै
व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्।

मंत्र | Mantra

ऊँ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां
वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्ववां कीलय
बुद्धि विनाशय ह्रीं ओम् स्वाहा।

 

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