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भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (Bhimashankar Jyotirling) महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रृद्धा से इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं।

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की कथा (Story of Shri Bhimashankar Jyotirlinga)

प्राचीन काल में भीम नाम का एक महापराक्रमी राक्षस हुआ। वह सदा धर्म का नाश करता और सभी प्राणियों को दुःख देता था। वह महाबली राक्षस कुम्भकरण के वीर्य और कर्कटी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। एक दिन भीम ने अपनी माता से पुछा –”माँ ! मेरे पिता कहाँ हैं? तुम अकेली क्यों रहती हो? मैं यह सब जानना चाहता हूँ। “

कर्कटी बोली – ”बेटा! रावण के छोटे भाई कुम्भकरण तेरे पिता थे। भाई सहित उस महाबली वीर को श्रीराम ने मार डाला। मेरे पिता का नाम कर्कट और माता का नाम पुष्कसी था।

विराध मेरे पति थे, जिन्हें राम ने पहले ही मार डाला था। अपने प्रिय स्वामी के मारे जाने पर मैं अपने माता-पिता के साथ रहती थी। एक दिन मेरे माता-पिता अगस्त्य मुनि के शिष्य सुतीक्ष्ण को अपना आहार बनाने के लिए गए। उन्होंने कुपित होकर मेरे माता-पिता को भस्म कर दिया। तब से मैं अकेली होकर बड़े दुःख के साथ इस पर्वत पर रहने लगी। एक दिन महान बल पराक्रम से संपन्न कुम्भकरण यहाँ आये और उन्होंने बलात मेरे साथ समागम किया फिर मुझे छोड़कर लंका चले गए। इसके बाद तुम्हारा जन्म हुआ। तुम भी अपने पिता के समान महान बलवान और पराक्रमी हो। अब मैं तुम्हारे सहारे ही यहाँ अपना समय व्यतीत करती हूँ। “

अपनी माता की बात सुनकर भयानक पराक्रमी भीम क्रोधित होकर विचार करने लगा कि – ‘विष्णु ने मेरे पिता को मार डाला। मेरे नाना-नानी भी उनके भक्त के हाथों मारे गए। उन्होंने विराध को भी मार डाला इस प्रकार मेरी माता को बहुत दुःख दिया है। अगर मैं अपने पिता का पुत्र हूँ तो श्रीहरि को अवश्य पीड़ा दूँगा।‘ ऐसा निश्चय करके उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए एक हजार वर्षों तक कठोर तप किया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी उसके सामने प्रकट हुए और बोले –”भीम ! मै तुम्हारी तपस्या सेप्रसन्न हूँ, तुम्हारी जो भीअभिलाषा हो मांग लो।“

भीम बोला – ”हे कमलासन ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसा बल दीजिये जिसकी कहीं कोई तुलना न हो।“ ब्रह्मा जी ने भीम को मनोवांछित वर प्रदान किया और अंतर्ध्यान हो गए। ब्रह्मा जी से वर पाकर भीम अपने घर पहुँचा और अपनी माता को प्रणाम करके बोला –”माँ! अब तुम मेरा बल देखो। मैं इन्द्र आदि देवताओं तथा उनकी सहायता करने वाले विष्णु का संहार कर डालूँगा।  ऐसा कहकर परम भीम ने पहले इन्द्र सहित समस्त देवताओं को पराजित किया और देवताओं की सहायता को पहुँचे श्रीहरि को भी परास्त किया।

इसके बाद उसने पृथ्वी को जीतना आरम्भ किया। सबसे पहले वह कामरूप देश के राजा सुदक्षिण को जीतने के लिए गया सुदक्षिण भगवान शिव के परम भक्त थे और उनके ही आश्रित होकर राज्य करते थे। सुदक्षिण के साथ भीम का भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में सुदक्षिण पराजित हुए और भीम ने उनका राज्य अपने अधिकार में ले लिया। इसके बाद भीम ने उस शिवभक्त राजा सुदक्षिण को कारागार में डाल दिया। सुदक्षिण कारागार में ही एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर भगवान शिव के ध्यान-पूजन और पंचाक्षर मन्त्र के जप में अपना समय व्यतीत करने लगे।इधर दुष्ट भीम अपनी विशाल सेना के साथ समस्त पृथ्वी को अपने वश में कर लिया। वह वेदों और शास्त्रों में वर्णित धर्म का लोप करने लगा।

तब समस्त देवता और ऋषिगण भगवान शिव के शरण में पहुँचे और प्रणाम करके उनकी स्तुति की। उनकी स्तुति से अत्यंत प्रसन्न होकर भगवान शिव बोले –

” देवगण तथा महर्षियों ! मैं प्रसन्न हूँ। वर मांगो। तुम्हारा कौन सा कार्य सिद्ध करूँ ? “

देवता बोले – ” देवेश्वर ! आप अंतर्यामी हैं, आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है। प्रभो ! कुम्भकरण से उत्पन्न कर्कटी का बलवान पुत्र राक्षस भीम ब्रह्मा जी से वर पाकर समस्त संसार को पीड़ा दे रहा है। अतः आप इस दुखदायी राक्षस का नाश करके हम पर कृपा कीजिये।“ शम्भू ने कहा – ” देवताओं ! कामरूप देश के राजा सुदक्षिण मेरे श्रेष्ठ भक्त हैं। उनसे मेरा एक संदेश कह दो। उनसे कहना कि ब्रह्माजी के वर से शक्तिशाली होकर भीम ने जो उनका तिरस्कार किया है , मैं शीघ्र ही उस दुष्ट राक्षस को उसका उचित दंड दूँगा। “

इसके बाद सभी देवता और ऋषिगण प्रसन्न होकर राजा सुदक्षिण के पास जाकर उनको भगवान शिव का संदेश सुनाया और अपने अपने स्थान को चले गए। भीम के गुप्तचरों ने इस बात की सूचना उसे दी और कहा कि राजा सुदक्षिण आपके नाश के लिए कोई षड्यंत्र कर रहे हैं।यह समाचार सुनते ही भीम कुपित होकर राजा सुदक्षिण को मारने के उद्देश्य से हाथ में तलवार लेकर कारागार में पहुँचा। वहाँ पहुँच कर उसने राजा को बहुत सारे दुर्वचन कहे और भगवान शंकर के पार्थिव लिंग को नष्ट करने हेतु तलवार चलायी।

वह तलवार उस पार्थिव लिंग का स्पर्श करे इसके पहले ही वहाँ साक्षात भगवान शंकर प्रकट हो गए और बोले – ” देखो, मैं अपने भक्त की रक्षा के लिए यहाँ प्रकट हुआ हूँ। मेरा व्रत है कि मैं सदा अपने भक्त की रक्षा करूँ।  ऐसा कहकर भगवान शंकर ने अपने त्रिशूल से उस तलवार के दो टुकड़े कर दिए और हुंकार मात्र से ही तत्काल भीम सहित समस्त राक्षसों को भस्म कर डाला। भगवान शंकर की कृपा से इन्द्र आदि समस्त देवताओं और ऋषियों को शांति मिली तथा सारे संसार की पीड़ा और दुःख का अंत हुआ।

उस समय देवताओं और ऋषियों ने भगवान शंकर की स्तुति की और कहा – ” प्रभो ! आप यहाँ लोगों को सुख देने के लिए सदा निवास करें। आपका दर्शन करने से यहाँ सबका कल्याण होगा। आप भीमशंकर के नाम से विख्यात होंगे और सबके मनोरथों को सिद्ध करेंगे। आपका यह ज्योतिर्लिंग सदा पूजनीय और समस्त विपत्तियों का निवारण करने वाला होगा। “उनके इस प्रकार प्रार्थना करने पर लोक हि में भक्तवत्सल भगवान शिव प्रसन्नतापूर्वक वहीं स्थित हो गए।

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