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सनातन धर्म में भगवान भोलेनाथ से जुड़े कई पर्व मनाए जाते हैं और इनमें श्रावण मास (sawan 2022) यानी सावन का अपना अलग ही विशेष महत्व है। भगवान शिव को यह मास अत्यधिक प्रिय है व इस माह में भगवान शिव की पूजा करने से अच्छा व शुभ फल प्राप्त होता है।
हम हमेशा से भगवान शिव की पूजा अर्चना के बारे में ही सुनते आ रहे हैं कि शिव पूजन के बारे में कहा जाता है कि शिव पूजन में विधि विधान से मंत्रों का जाप करना अनिवार्य होता है , यदि आप विधि विधान से मंत्रों का जाप करते हैं तभी आपको इसका फल मिलता है। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है| भगवान भोलेनाथ सिर्फ यह देखते हैं कि जो व्यक्ति उनकी पूजा कर रहा है उसका मन कैसा है ,उसकी श्रद्धा का भाव कैसा है, भगवान शिव या कोई भी भगवान यह नहीं देखते हैं कि किसी व्यक्ति ने उनके मंत्र का कितनी बार जाप किया या उनकी पूजा पर कितना खर्चा किया। अगर हम सही शब्दों में जाने तो भगवान भोलेनाथ यह देखते हैं कि इंसान की भक्ति का भाव कैसा है और वह कैसी भावना रखता है अगर उसकी भावना अच्छी होगी तो भगवान भोलेनाथ अवश्य प्रसन्न होंगे और उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण करेंगे |
भगवान के भक्त सच्चे मन से बिना मंत्र पढ़े भी सभी पूजन सामग्री अर्पित कर सकते हैं। उसके लिए उसमें सच्ची श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए।
अगर हम सच्ची श्रद्धा और भक्ति से एक फूल भी भगवान को अर्पित करते हैं  तो सारे पूज्य देवी- देवता व भोलेनाथ हमारे सभी कार्य सिद्ध करने के लिए मदद करते हैं और हमारा साथ देते हैं | हम जब खुद की रक्षा करेंगे तो भगवान भोलेनाथ हमारी स्वयं रक्षा करेंगे| भगवान भोलेनाथ ने स्वयं कहा है –
“न मे प्रियष्चतुर्वेदी मद्भभक्तः ष्वपचोऽपि यः।
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम्।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तस्याहं न प्रणस्यामि स च मे न प्रणस्यति। “
(अर्थात: जो भक्त सच्चे मन ,श्रद्धा और भक्ति भाव से बिना किसी वैदिक मंत्र का जाप किए भगवान शिव को सिर्फ एक पुष्प अथवा जल समर्पित करता है भगवान शिव उस व्यक्ति से भी उतना ही प्रसन्न होते हैं जितना कि किसी वैदिक मंत्रों के उच्चारण करने वाले व्यक्ति से खुश होते हैं।भगवान शिव कभी उस व्यक्ति की नजरों से दूर नहीं होते और न ही वह व्यक्ति भगवान शिव की नजरों से कभी दूर होता है। भगवान शिव एवं सभी देवी देवताओं के लिए किसी भी मंत्र के जाप से ज्यादा सच्चे मन से की जाने वाली पूजा ज्यादा मायने रखती है।)

sawan 2022 पूजा -अर्चना की विधि:

1. भगवान शिव का दूध, दही, शहद , और मिश्री, मिलाकर जलाभिषेक करें।
2. भगवान शिव को पांच प्रकार के फल चढ़ाएं।
3. भगवान शिव को धतूरा अर्पित करें व चंदन से तिलक करें।
4. भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करें और उस बेलपत्र पर ओम नमः शिवाय या राम लिखकर अर्पित करें।
5. भगवान शिव की चालीसा और आरती करें।

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महाशिवरात्रि 2022 : धन-दौलत, संपत्ति में बढ़ोतरी के लिए आज करें ये ज्योतिषीय उपाय… https://astrodeeva.com/mahashivratri-2022-do-these-astrological-remedies-today-to-increase-wealth-and-wealth/ https://astrodeeva.com/mahashivratri-2022-do-these-astrological-remedies-today-to-increase-wealth-and-wealth/#respond Tue, 01 Mar 2022 05:44:20 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2932 आज महाशिवरात्रि का पावन पर्व है। हिंदुओं के लिए ये दिन बेहद ही खास होता है। इस दिन भक्त विशेष पूजा पाठ कर भगवान शिव की अराधना करते हैं। मान्यता है कि शिव की भक्ति की शक्ति से सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। यदि आपकी आर्थिक स्थिति कमजोर है या लाख प्रयत्न के बाद […]

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आज महाशिवरात्रि का पावन पर्व है। हिंदुओं के लिए ये दिन बेहद ही खास होता है। इस दिन भक्त विशेष पूजा पाठ कर भगवान शिव की अराधना करते हैं। मान्यता है कि शिव की भक्ति की शक्ति से सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। यदि आपकी आर्थिक स्थिति कमजोर है या लाख प्रयत्न के बाद भी तरक्की नहीं मिल पा रही है तो आज महाशिवरात्रि पर आप बताए गए ज्योतिषीय उपाय करके इन बाधाओं से मुक्ति पा सकते हैं।

मनोकामना पूर्ण करने के उपाय:  महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव को उनकी प्रिय वस्तुएं जरूर अर्पित करें। भांग, धूतरा, बेलपत्र, इत्र और भस्म भोलेनाथ को काफी प्रिय है इसलिए शिवरात्रि पूजा में इन चीजों का इस्तेमाल जरूर करें। पंचामृत से शिवलिंग का अभिषेक करें। चांदी के लोटे द्वारा जलधारा से भगवान शिव का अभिषेक करें और नम: शिवाय कहते जाएं। “ॐ पार्वतीपतये नमः” मंत्र का 108 बार जप करें।

महाशिवरात्रि के दिन बन रहा है विशेष योग, इस तरह पूजा करने से मिलता है कई गुना ज्यादा फल

आर्थिक पक्ष मजबूत करने के उपाय: मान्यता है कि शिव का दही से रुद्राभिषेक करने से संपत्ति में बढ़ोतरी होती है। गन्ने के रस से अभिषेक करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। धन प्राप्ति के लिए शिवलिंग का शहद और घी से अभिषेक भी अच्छा माना जाता है। रुके हुए धन की प्राप्ति के लिए महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव के वाहन नंदी यानी बैल को हरा चारा खिलाएं। महामृत्युंजय मंत्र का शाम के समय 108 बार जप करें।

सौभाग्य के लिए करें ये काम: दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने के लिए महाशिवरात्रि पर जरूरतमंदों की मदद करें। ऐसा करने से जीवन में सभी प्रकार की समस्याओं का अंत होगा। अगर कुंडली में ग्रहों की स्थिति कमजोर है तो महाशिवरात्रि के दिन आप शिवलिंग पर दुग्धाभिषेक करें और ओम नम: शिवाय मंत्र का जप करें। ऐसा करने से कुंडली में अशुभ ग्रह शुभ फल देने लगेंगे।

नौकरी और व्यापार में तरक्की के उपाय: अगर नौकरी या व्यापार में परेशानी चल रही है तो महाशिवरात्रि के दिन व्रत रखें और शिवलिंग पर जल में शहद मिलाकर अभिषेक करें। साथ ही अनार का फूल चढ़ाएं।

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Pradosh Vrat: प्रदोष व्रत भगवान भोलेनाथ की कृपा को प्राप्त करने के लिए सबसे उत्तम व्रत https://astrodeeva.com/pradosh-vrat-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b7-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%a8/ https://astrodeeva.com/pradosh-vrat-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b7-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%a8/#comments Thu, 10 Dec 2020 04:33:00 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1487 हिन्दू पंचांग में प्रति माह में दो बार त्रयोदशी तिथि आती है एक कृष्ण पक्ष और दूसरा  शुक्ल पक्ष में और उसी दिन प्रदोष व्रत किया जाता है। प्रदोष व्रत को प्रदोषम के नाम से भी जाना जाता है। सनातन धर्म में इस व्रत को बड़ा पवित्र व्रत माना जाता है। यह दिन भगवान् शिव […]

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हिन्दू पंचांग में प्रति माह में दो बार त्रयोदशी तिथि आती है एक कृष्ण पक्ष और दूसरा  शुक्ल पक्ष में और उसी दिन प्रदोष व्रत किया जाता है। प्रदोष व्रत को प्रदोषम के नाम से भी जाना जाता है। सनातन धर्म में इस व्रत को बड़ा पवित्र व्रत माना जाता है। यह दिन भगवान् शिव और देवी पार्वती को समर्पित है। हिन्दू पुराणो के अनुसार कलयुग में व्रत करना अति उत्तम, लाभदायक और मंगलकारी बताया गया है। प्रदोष व्रत करने से भक्त को भोलेनाथ की कृपा से उत्तम स्वास्थ्य और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

प्रदोष व्रत के नाम और उनका महत्व

सप्ताह के अलग-अलग दिन त्रयोदशी तिथि होने पर प्रदोष व्रत का नाम और फल भी भिन्न-भिन्न होता है।

रवि प्रदोष : त्रयोदशी तिथि अगर रविवार को हो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को रवि प्रदोष कहते हैं। इस प्रदोष व्रत को करने से भक्त के रोगों का नाश होता है और वो दीर्घायु होता है।

सोम प्रदोष या सौम्य प्रदोषम : त्रयोदशी तिथि अगर सोमवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को सोम प्रदोष या सौम्य प्रदोषम के नाम से जाना जाता है। सोमवार दिन शिव जी को समर्पित होने के कारण इस दिन व्रत करने से जातक की सम्पूर्ण मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।

भौम प्रदोष: त्रयोदशी तिथि अगर मंगलवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को भौम प्रदोष के नाम से जाना जाता है। उस व्रत को करने से जातक को शारीरिक और मानसिक बल प्राप्त होता है।

बुध प्रदोष: त्रयोदशी तिथि अगर बुधवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को बुध प्रदोष या बुध प्रदोषम कहते हैं। इस व्रत को करने से जातक की सभी इच्छायें पूर्ण होती है।

गुरु प्रदोष: त्रयोदशी तिथि अगर गुरुवार यानी बृहस्पतिवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को गुरु प्रदोष कहते हैं। इस व्रत को करने से जातक के शत्रुओं का नाश होता है और वो उन पर विजय प्राप्त करता है।

शुक्र प्रदोष: त्रयोदशी तिथि अगर शुक्रवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को शुक्र प्रदोष के नाम से जाना जाता है। इस व्रत को करने से जातक के सौभाग्य में व्रद्धि होती है और उसे धन-संपदा को प्राप्ति होती है।

शनि प्रदोष: त्रयोदशी तिथि अगर शनिवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को शनि प्रदोष कहते हैं। इस व्रत को करने से संतान की अभिलाषा रखने वाले जातक को संतान की प्राप्ति होती है।

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प्रदोष व्रत का महत्व

प्रदोष व्रत में भगवान शिव का रुद्राभिषेक और उनका श्रृंगार करने का बहुत ही महत्व है। प्रदोष वाले दिन महादेव की पूजा अर्चना से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। विवाह में आ रही अड़चनें दूर होती है। संतान की इच्छा रखने वाले लोगों को इस दिन पंचगव्य से महादेव का अभिषेक करना चाहिए। जिन्हें लक्ष्मी प्राप्ति और कारोबार मे सफलता की कामना हो उन्हें दूध से अभिषेक करने के बाद शिवलिंग पर फूलों की माला अर्पित करनी चाहिए। इस पूजा से उन्हें प्रत्येक काम में सफलता प्राप्त होगी।

प्रदोष व्रत की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का स्वर्गवास हो गया था। उसका अब कोई आश्रयदाता नहीं था इसलिए प्रात: होते ही वह अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल पड़ती थी। भिक्षाटन से ही वह स्वयं व पुत्र का पेट पालती थी।

एक दिन ब्राह्मणी घर लौट रही थी तो उसे एक लड़का घायल अवस्था में कराहता हुआ मिला। ब्राह्मणी दयावश उसे अपने घर ले आई। वह लड़का विदर्भ का राजकुमार था। शत्रु सैनिकों ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसके पिता को बंदी बना लिया था और राज्य पर नियंत्रण कर लिया था इसलिए वह मारा-मारा फिर रहा था। राजकुमार ब्राह्मण-पुत्र के साथ ब्राह्मणी के घर रहने लगा।

एक दिन अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा तो वह उस पर मोहित हो गई। अगले दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने लाई। उन्हें भी राजकुमार भा गया। कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को शंकर भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि राजकुमार और अंशुमति का विवाह कर दिया जाए उन्होंने वैसा ही किया।

ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करती थी। उसके व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को खदेड़ दिया और पिता के राज्य को पुन: प्राप्त कर आनंदपूर्वक रहने लगा।

राजकुमार ने ब्राह्मण-पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया। ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के महात्म्य से जैसे राजकुमार और ब्राह्मण-पुत्र के दिन फिरे, वैसे ही शंकर भगवान अपने दूसरे भक्तों के दिन भी फेरते हैं। अत: प्रदोष का व्रत करने वाले सभी भक्तों को यह कथा अवश्य पढ़नी अथवा सुननी चाहिए।

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प्रदोष व्रत पूजन विधि

स्कन्द पुराण में प्रदोष व्रत करने की सही विधि का वर्णन किया गया है। आप दो प्रकार से इस व्रत कर सकते है।

  • 24 घंटे का व्रत रखें जिसमें रात के समय जागरण भी शामिल होगा।
  • दूसरी  प्रक्रिया है सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक उपवास रखना और संध्या में शिव पूजा के पश्चात् व्रत तोडना।

व्रत के दौरान इन बातों का ध्यान रखें 

  • प्रदोष के दिन प्रात:काल नित्य कर्म से निवृत्त होकर बेलपत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप आदि चढ़ाकर शिवजी का पूजन करना चाहिए।
  • प्रदोष के पूरे दिन निराहार रहें।
  • पूरे दिन ‘ॐ नम: शिवाय’ मंत्र का मन ही मन अधिक से अधिक जप करें।
  • प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 से लेकर 7:00 बजे के बीच की जाती है।
  • त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सूर्यास्त से 3 घड़ी पूर्व शिव जी का पूजन करना चाहिए।
  • व्रतधारी को चाहिए कि पूजन से पहले शाम को दोबारा स्नान कर स्वच्छ सफेद वस्त्र धारण करें।

पूजन विधि

व्रतधारी जातक शिव मंदिर जाकर या घर में भी पूजा कर सकता हैं। वो पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार कर पूजन की सभी सामग्री एकत्रित करें। फिर कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भरकर रख लें।

इसके बाद कुश के आसन पर बैठकर शिवजी की पूजा विधि-विधान से करें और ॐ नम: शिवाय मंत्र का जाप करते हुए शिवजी का जलाभिषेक करें।

इसके बाद दोनों हाथ जो‌ड़कर शिवजी का ध्यान करें। शिवजी का ध्यान करते समय उनसे भक्ति भाव से प्रार्थना करें-

“त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्रमा का आभूषण धारण करने वाले पिंगल वर्ण के जटाजूटधारी, करोड़ों चंद्रमा के समान कांतिवान, नीले कंठ तथा अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान, वरदहस्त, त्रिशूलधारी, नागों के कुंडल पहने, व्याघ्र चर्म धारण किए हुए भगवान शिव हमारे सारे कष्टों को दूर कर सुख-समृद्धि प्रदान करें।”

इस प्रकार ध्यानमग्न होकर प्रदोष व्रत की कथा सुनें अथवा सुनाएं।

कथा समाप्ति के बाद हवन सामग्री मिलाकर “ॐ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा” मंत्र से 11 या 21 या 108 बार आहुति दें।

तत्पश्चात शिवजी की आरती करें तथा प्रसाद वितरित करके भोजन ग्रहण करें।

व्रत करने वाले व्यक्ति को कम-से-कम 11 अथवा 26 त्रयोदशी व्रत के बाद उद्यापन करना चाहिए।

सोमवती अमावस्या – महत्व और व्रत कथा

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स्कंद पुराण के अनुसार यहाँ है भगवान शिव की आरामगाह https://astrodeeva.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%af%e0%a4%b9%e0%a4%be/ https://astrodeeva.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%af%e0%a4%b9%e0%a4%be/#respond Tue, 28 Jul 2020 16:05:59 +0000 https://astrodeeva.com/?p=245 सनातन धर्म के अनुसार भगवान ब्रह्मा  सृजन के देव हैं , भगवान विष्णु को पालनहार कहा गया है और भगवान शिव को संहार का देवता कहा गया है। भगवान शिव अपने भोलेपन एवं रौद्ररूप के लिए विख्यात हैं। जिस प्रकार इस ब्रह्मण्ड का ना कोई अंत है, न कोई छोर और न ही कोई शूरुआत, उसी प्रकार शिव अनादि है सम्पूर्ण […]

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सनातन धर्म के अनुसार भगवान ब्रह्मा  सृजन के देव हैं , भगवान विष्णु को पालनहार कहा गया है और भगवान शिव को संहार का देवता कहा गया है। भगवान शिव अपने भोलेपन एवं रौद्ररूप के लिए विख्यात हैं। जिस प्रकार इस ब्रह्मण्ड का ना कोई अंत है, न कोई छोर और न ही कोई शूरुआत, उसी प्रकार शिव अनादि है सम्पूर्ण ब्रह्मांड शिव के अंदर समाया हुआ है जब कुछ नहीं था तब भी शिव थे जब कुछ न होगा तब भी शिव ही होंगे।

भगवान शिव को हेमेशा तपस्वी के रूप में जाना जाता है देवभूमि उत्तराखंड को महादेव की तपस्थली कहा जाता है। यहाँ हम आप को ऐसे तीर्थस्थान के बारे में बताने जा रहे हे जो की देश में ही नहीं अपितु विदेशों में भी प्रख्यात है, यहाँ हर वर्ष लाखों की संख्या में तीर्थयात्री आते हैं।

यह स्थान उत्तराखंड,पौड़ी जनपद के अंतर्गत लैन्सडौन डेरियाखाल – रिखणीखाल मार्ग पर स्थित चखुलाखाल गांव से 4 किलोमीटर की दूरी पर पर्वत श्रृंखलाओं के बीच एक बेहद ही मनमोहक शांत जगह है। यह स्थान देवदार के घने जंगलो के मध्य में स्थित ताड़केश्वर भगवान का पौराणिक मंदिर मौजूद है। 

स्कंद पुराण के केदारखंड में इस स्थान का वर्णन मिलता है 

समुद्र तल से 1800 मीटर की ऊँचाई पर स्थित इस स्थल को भगवान शिव का आरामगाह कहा जाता है। इस मंदिर परिसर में त्रिशुल के आकार के देवदार के वृक्ष हैं जो श्रद्धालुओं की आस्था को और भी ज्यादा मजबूत करते हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार ताड़कासुर दैत्य का वध करने के बाद भगवान शिव ने इसी जगह पर आकर विश्राम किया। विश्राम के दौरान जब सूर्य की तेज किरणें भगवान शिव के चेहरे पर पड़ीं, तो मां पार्वती ने शिवजी के चारों ओर देवदार के सात वृक्ष लगाए। ये विशाल वृक्ष आज भी ताड़केश्वर धाम के अहाते में मौजूद हैं।

यहां तक पहुंचने के लिए कोटद्वार पौड़ी से चखुलियाखाल तक जीप-टैक्सी जाती रहती हैं। यहां से 5 किमी पैदल दूरी पर ताड़केश्वर धाम है। ये एक ऐसा मंदिर है, जहां हर साल देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां की खूबसूरती बेमिसाल है और इसे देखकर हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है। खासतौर पर श्रावण मास पर तो यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

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