if ( ! function_exists( 'jnews_get_views' ) ) { /** * Gets views count. * * @param int $id The Post ID. * @param string|array $range Either an string (eg. 'last7days') or -since 5.3- an array (eg. ['range' => 'custom', 'time_unit' => 'day', 'time_quantity' => 7]) * @param bool $number_format Whether to format the number (eg. 9,999) or not (eg. 9999) * @return string */ function jnews_get_views( $id = null, $range = null, $number_format = true ) { $attr = array( 'id' => $id, 'range' => $range, 'number_format' => $number_format, ); $query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $attr ) ); $views = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' ); if ( false === $views ) { $views = JNews_View_Counter()->counter->get_views( $id, $range, $number_format ); wp_cache_set( $query_hash, $views, 'jnews-view-counter' ); } return $views; } } if ( ! function_exists( 'jnews_view_counter_query' ) ) { /** * Do Query * * @param $instance * @return array */ function jnews_view_counter_query( $instance ) { $query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $instance ) ); $query = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' ); if ( false === $query ) { $query = JNews_View_Counter()->counter->query( $instance ); wp_cache_set( $query_hash, $query, 'jnews-view-counter' ); } return $query; } } Bhom Pradosh Vrat Archives - हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव https://astrodeeva.com/tag/bhom-pradosh-vrat/ Daily Dose of Astrology Mon, 08 Feb 2021 22:42:22 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0 https://astrodeeva.com/wp-content/uploads/2022/03/cropped-Logo-32x32.png Bhom Pradosh Vrat Archives - हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव https://astrodeeva.com/tag/bhom-pradosh-vrat/ 32 32 Pradosh Vrat 2021: तिथियाँ https://astrodeeva.com/pradosh-vrat-2021-%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%81/ https://astrodeeva.com/pradosh-vrat-2021-%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%81/#comments Sat, 30 Jan 2021 00:29:48 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1654 Pradosh Vrat वर्ष 2021 यह समय शिव पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है। ऐसा माना जाता है कि प्रदोष के समय शिवजी प्रसन्नचित मनोदशा में होते हैं। पंचांग के अनुसार, प्रति माह दो बार त्रयोदशी तिथि आती है एक कृष्ण पक्ष और दूसरी शुक्ल पक्ष में और उसी दिन प्रदोष व्रत किया जाता है। प्रदोष […]

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Pradosh Vrat वर्ष 2021 यह समय शिव पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है। ऐसा माना जाता है कि प्रदोष के समय शिवजी प्रसन्नचित मनोदशा में होते हैं। पंचांग के अनुसार, प्रति माह दो बार त्रयोदशी तिथि आती है एक कृष्ण पक्ष और दूसरी शुक्ल पक्ष में और उसी दिन प्रदोष व्रत किया जाता है। प्रदोष व्रत को प्रदोषम के नाम से भी जाना जाता है।

प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat)

जिस दिन त्रयोदशी तिथि प्रदोष काल के समय व्याप्त होती है उसी दिन प्रदोष का व्रत किया जाता है। प्रदोष काल सूर्यास्त से प्रारम्भ हो जाता है। जब त्रयोदशी तिथि और प्रदोष साथ-साथ होते हैं वह समय शिव भक्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है।

जानते हैं वर्ष 2021 में जनवरी से दिसंबर के बीच किन-किन तिथियों में प्रदोष व्रत पड़ेगा।(Pradosh Vrat Dates in 2021)

 

2021 प्रदोष के दिन

Pradosh Vrat Dates in 2021

तिथि

प्रदोष काल समय

योदशी तिथि

10 जनवरी 2021, रविवार

प्रदोष व्रत

05:42 पी एम से 08:25 पी एम

02 घण्टे 43 मिनट्स

पौष, कृष्ण त्रयोदशी

प्रारम्भ – 04:52 पी एम, 10 जनवरी 2021

समाप्त – 02:32 पी एम, 11 जनवरी 2021

 26 जनवरी 2021, मंगलवार

भौम प्रदोष व्रत

05:56 पी एम से 08:35 पी एम

02 घण्टे 39 मिनट्स

पौष, शुक्ल त्रयोदशी

प्रारम्भ – 12:24 ए एम, 26 जनवरी 2021

समाप्त – 01:11 ए एम, 27 जनवरी 2021

9 फरवरी 2021, मंगलवार

भौम प्रदोष व्रत

06:07 पी एम से 08:42 पी एम

02 घण्टे 35 मिनट्स

माघ, कृष्ण त्रयोदशी

प्रारम्भ – 03:19 ए एम, 9 फरवरी 2021

समाप्त – 02:05 ए एम, 10 फरवरी 2021

24 फरवरी 2021, बुधवार

प्रदोष व्रत

06:18 पी एम से 08:48 पी एम

02 घण्टे 31 मिनट्स

माघ, शुक्ल त्रयोदशी

प्रारम्भ – 06:05 पी एम, 24 फरवरी 2021

समाप्त – 05:18 पी एम, 25 फरवरी 2021

10 मार्च 2021, बुधवार

प्रदोष व्रत

06:27 पी एम से 08:52 पी एम

02 घण्टे 26 मिनट्स

फाल्गुन, कृष्ण त्रयोदशी

प्रारम्भ – 02:40 पी एम, 10 मार्च 2021

समाप्त – 02:39 पी एम, 11 मार्च 2021

26 मार्च 2021, शुक्रवार

प्रदोष व्रत

06:36 पी एम से 08:56 पी एम

02 घण्टे 20 मिनट्स

फाल्गुन, शुक्ल त्रयोदशी

प्रारम्भ – 08:21 ए एम, 26 मार्च 2021

समाप्त – 06:11 ए एम, 27 मार्च 2021

9 अप्रैल 2021, शुक्रवार

प्रदोष व्रत

06:43 पी एम से 08:59 पी एम

02 घण्टे 16 मिनट्स

चैत्र, कृष्ण त्रयोदशी

प्रारम्भ – 03:15 ए एम, 9 अप्रैल 2021

समाप्त – 04:27 ए एम, 10 अप्रैल 2021

24 अप्रैल 2021, शनिवार

शनि प्रदोष व्रत

07:17 पी एम से 09:03 पी एम

01 घण्टा 46 मिनट्स

चैत्र, शुक्ल त्रयोदशी

प्रारम्भ – 07:17 पी एम, 24 अप्रैल 2021

समाप्त – 04:12 पी एम, 25 अप्रैल 2021

8 मई 2021, शनिवार

शनि प्रदोष व्रत

07:01 पी एम से 09:07 पी एम

02 घण्टे 07 मिनट्स

वैशाख, कृष्ण त्रयोदशी

प्रारम्भ – 05:20 पी एम, 8 मई 2021

समाप्त – 07:30 पी एम ,9 मई 2021

24 मई 2021, सोमवार

सोम प्रदोष व्रत

07:10 पी एम से 09:13 पी एम

02 घण्टे 03 मिनट्स

वैशाख, शुक्ल त्रयोदशी

प्रारम्भ – 03:38 ए एम, 24 मई 2021

समाप्त – 12:11 ए एम, 25 मई 2021

7 जून 2021, सोमवार

सोम प्रदोष व्रत

07:17 पी एम से 09:18 पी एम

02 घण्टे 01 मिनट

ज्येष्ठ, कृष्ण त्रयोदशी

प्रारम्भ – 08:48 ए एम, 7 जून 2021

समाप्त – 11:24 ए एम, 8 जून 2021

22 जून 2021, मंगलवार

भौम प्रदोष व्रत

07:22 पी एम से 09:23 पी एम

02 घण्टे 00 मिनट्स

ज्येष्ठ, शुक्ल त्रयोदशी

प्रारम्भ – 10:22 ए एम, 22 जून 2021

समाप्त – 06:59 ए एम, 23 जून 2021

7 जुलाई 2021, बुधवार

प्रदोष व्रत

07:23 पी एम से 09:24 पी एम

02 घण्टे 01 मिनट

आषाढ़, कृष्ण त्रयोदशी

प्रारम्भ – 01:02 ए एम, 7 जुलाई 2021

समाप्त – 03:20 ए एम, 8 जुलाई 2021

21 जुलाई  2021, बुधवार

प्रदोष व्रत

07:18 पी एम से 09:22 पी एम

02 घण्टे 04 मिनट्स

आषाढ़, शुक्ल त्रयोदशी

प्रारम्भ – 04:26 पी एम, 21 जुलाई  2021

समाप्त – 01:32 पी एम, 22 जुलाई  2021

5 अगस्त 2021, बृहस्पतिवार

प्रदोष व्रत

07:09 पी एम से 09:16 पी एम

02 घण्टे 07 मिनट्स

श्रावण, कृष्ण त्रयोदशी

प्रारम्भ – 05:09 पी एम, 5 अगस्त 2021

समाप्त – 06:28 पी एम, 5 अगस्त 2021

20 अगस्त 2021, शुक्रवार

प्रदोष व्रत

06:56 पी एम से 08:50 पी एम

01 घण्टा 54 मिनट्स

श्रावण, शुक्ल त्रयोदशी

प्रारम्भ – 10:54 पी एम, 19 अगस्त 2021

समाप्त – 08:50 पी एम, 20 अगस्त 2021

4 सितम्बर 2021, शनिवार

शनि प्रदोष व्रत

06:39 पी एम से 08:56 पी एम

02 घण्टे 16 मिनट्स

भाद्रपद, कृष्ण त्रयोदशी

प्रारम्भ – 08:24 ए एम, 4 सितम्बर 2021

समाप्त – 08:21 ए एम, 5 सितम्बर 2021

18 सितम्बर 2021, शनिवार

शनि प्रदोष व्रत

06:23 पी एम से 08:44 पी एम

02 घण्टे 21 मिनट्स

भाद्रपद, शुक्ल त्रयोदशी

प्रारम्भ – 06:54 ए एम, 18 सितम्बर 2021

समाप्त – 05:59 ए एम, 19 सितम्बर 2021

4 अक्टूबर 2021, सोमवार

सोम प्रदोष व्रत

06:04 पी एम से 08:30 पी एम

02 घण्टे 27 मिनट्स

आश्विन, कृष्ण त्रयोदशी

प्रारम्भ – 10:29 पी एम, 3 अक्टूबर 2021

समाप्त – 09:05 पी एम, 4 अक्टूबर 2021

17 अक्टूबर 2021, रविवार

प्रदोष व्रत

05:49 पी एम से 08:20 पी एम

02 घण्टे 31 मिनट्स

आश्विन, शुक्ल त्रयोदशी

प्रारम्भ – 05:39 पी एम, 17 अक्टूबर 2021

समाप्त – 06:07 पी एम, 18 अक्टूबर 2021

2 नवम्बर 2021, मंगलवार

भौम प्रदोष व्रत

05:35 पी एम से 08:11 पी एम

02 घण्टे 36 मिनट्स

कार्तिक, कृष्ण त्रयोदशी

प्रारम्भ – 11:31 ए एम, 2 नवम्बर 2021

समाप्त – 09:02 ए एम, 3 नवम्बर 2021

16 नवम्बर 2021, मंगलवार

भौम प्रदोष व्रत

05:27 पी एम से 08:07 पी एम

02 घण्टे 40 मिनट्स

कार्तिक, शुक्ल त्रयोदशी

प्रारम्भ – 08:01 ए एम, 16 नवम्बर 2021

समाप्त – 09:50 ए एम, 17 नवम्बर 2021

02 दिसम्बर 2021, बृहस्पतिवार

प्रदोष व्रत

05:24 पी एम से 08:07 पी एम

02 घण्टे 43 मिनट्स

मार्गशीर्ष, कृष्ण त्रयोदशी

प्रारम्भ – 11:35 पी एम, 01 दिसम्बर 2021

समाप्त – 08:26 पी एम, 02 दिसम्बर 2021

16 दिसम्बर 2021, बृहस्पतिवार

प्रदोष व्रत

05:27 पी एम से 08:11 पी एम

02 घण्टे 44 मिनट्स

मार्गशीर्ष, शुक्ल त्रयोदशी

प्रारम्भ – 02:01 ए एम, 16 दिसम्बर 2021

समाप्त – 04:40 ए एम, 17 दिसम्बर 2021

31 दिसम्बर 2021, शुक्रवार

प्रदोष व्रत

05:35 पी एम से 08:19 पी एम

02 घण्टे 44 मिनट्स

पौष, कृष्ण त्रयोदशी

प्रारम्भ – 10:39 ए एम, 31 दिसम्बर 2021

समाप्त – 07:17 ए एम, 01 जनवरी 2022

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स्कंद पुराण के अनुसार यहाँ है भगवान शिव की आरामगाह

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Pradosh Vrat: प्रदोष व्रत भगवान भोलेनाथ की कृपा को प्राप्त करने के लिए सबसे उत्तम व्रत https://astrodeeva.com/pradosh-vrat-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b7-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%a8/ https://astrodeeva.com/pradosh-vrat-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b7-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%a8/#comments Thu, 10 Dec 2020 04:33:00 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1487 हिन्दू पंचांग में प्रति माह में दो बार त्रयोदशी तिथि आती है एक कृष्ण पक्ष और दूसरा  शुक्ल पक्ष में और उसी दिन प्रदोष व्रत किया जाता है। प्रदोष व्रत को प्रदोषम के नाम से भी जाना जाता है। सनातन धर्म में इस व्रत को बड़ा पवित्र व्रत माना जाता है। यह दिन भगवान् शिव […]

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हिन्दू पंचांग में प्रति माह में दो बार त्रयोदशी तिथि आती है एक कृष्ण पक्ष और दूसरा  शुक्ल पक्ष में और उसी दिन प्रदोष व्रत किया जाता है। प्रदोष व्रत को प्रदोषम के नाम से भी जाना जाता है। सनातन धर्म में इस व्रत को बड़ा पवित्र व्रत माना जाता है। यह दिन भगवान् शिव और देवी पार्वती को समर्पित है। हिन्दू पुराणो के अनुसार कलयुग में व्रत करना अति उत्तम, लाभदायक और मंगलकारी बताया गया है। प्रदोष व्रत करने से भक्त को भोलेनाथ की कृपा से उत्तम स्वास्थ्य और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

प्रदोष व्रत के नाम और उनका महत्व

सप्ताह के अलग-अलग दिन त्रयोदशी तिथि होने पर प्रदोष व्रत का नाम और फल भी भिन्न-भिन्न होता है।

रवि प्रदोष : त्रयोदशी तिथि अगर रविवार को हो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को रवि प्रदोष कहते हैं। इस प्रदोष व्रत को करने से भक्त के रोगों का नाश होता है और वो दीर्घायु होता है।

सोम प्रदोष या सौम्य प्रदोषम : त्रयोदशी तिथि अगर सोमवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को सोम प्रदोष या सौम्य प्रदोषम के नाम से जाना जाता है। सोमवार दिन शिव जी को समर्पित होने के कारण इस दिन व्रत करने से जातक की सम्पूर्ण मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।

भौम प्रदोष: त्रयोदशी तिथि अगर मंगलवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को भौम प्रदोष के नाम से जाना जाता है। उस व्रत को करने से जातक को शारीरिक और मानसिक बल प्राप्त होता है।

बुध प्रदोष: त्रयोदशी तिथि अगर बुधवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को बुध प्रदोष या बुध प्रदोषम कहते हैं। इस व्रत को करने से जातक की सभी इच्छायें पूर्ण होती है।

गुरु प्रदोष: त्रयोदशी तिथि अगर गुरुवार यानी बृहस्पतिवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को गुरु प्रदोष कहते हैं। इस व्रत को करने से जातक के शत्रुओं का नाश होता है और वो उन पर विजय प्राप्त करता है।

शुक्र प्रदोष: त्रयोदशी तिथि अगर शुक्रवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को शुक्र प्रदोष के नाम से जाना जाता है। इस व्रत को करने से जातक के सौभाग्य में व्रद्धि होती है और उसे धन-संपदा को प्राप्ति होती है।

शनि प्रदोष: त्रयोदशी तिथि अगर शनिवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को शनि प्रदोष कहते हैं। इस व्रत को करने से संतान की अभिलाषा रखने वाले जातक को संतान की प्राप्ति होती है।

ये भी पढ़ें : वर्ष 2021 में प्रदोष तिथियाँ

प्रदोष व्रत का महत्व

प्रदोष व्रत में भगवान शिव का रुद्राभिषेक और उनका श्रृंगार करने का बहुत ही महत्व है। प्रदोष वाले दिन महादेव की पूजा अर्चना से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। विवाह में आ रही अड़चनें दूर होती है। संतान की इच्छा रखने वाले लोगों को इस दिन पंचगव्य से महादेव का अभिषेक करना चाहिए। जिन्हें लक्ष्मी प्राप्ति और कारोबार मे सफलता की कामना हो उन्हें दूध से अभिषेक करने के बाद शिवलिंग पर फूलों की माला अर्पित करनी चाहिए। इस पूजा से उन्हें प्रत्येक काम में सफलता प्राप्त होगी।

प्रदोष व्रत की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का स्वर्गवास हो गया था। उसका अब कोई आश्रयदाता नहीं था इसलिए प्रात: होते ही वह अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल पड़ती थी। भिक्षाटन से ही वह स्वयं व पुत्र का पेट पालती थी।

एक दिन ब्राह्मणी घर लौट रही थी तो उसे एक लड़का घायल अवस्था में कराहता हुआ मिला। ब्राह्मणी दयावश उसे अपने घर ले आई। वह लड़का विदर्भ का राजकुमार था। शत्रु सैनिकों ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसके पिता को बंदी बना लिया था और राज्य पर नियंत्रण कर लिया था इसलिए वह मारा-मारा फिर रहा था। राजकुमार ब्राह्मण-पुत्र के साथ ब्राह्मणी के घर रहने लगा।

एक दिन अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा तो वह उस पर मोहित हो गई। अगले दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने लाई। उन्हें भी राजकुमार भा गया। कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को शंकर भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि राजकुमार और अंशुमति का विवाह कर दिया जाए उन्होंने वैसा ही किया।

ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करती थी। उसके व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को खदेड़ दिया और पिता के राज्य को पुन: प्राप्त कर आनंदपूर्वक रहने लगा।

राजकुमार ने ब्राह्मण-पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया। ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के महात्म्य से जैसे राजकुमार और ब्राह्मण-पुत्र के दिन फिरे, वैसे ही शंकर भगवान अपने दूसरे भक्तों के दिन भी फेरते हैं। अत: प्रदोष का व्रत करने वाले सभी भक्तों को यह कथा अवश्य पढ़नी अथवा सुननी चाहिए।

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प्रदोष व्रत पूजन विधि

स्कन्द पुराण में प्रदोष व्रत करने की सही विधि का वर्णन किया गया है। आप दो प्रकार से इस व्रत कर सकते है।

  • 24 घंटे का व्रत रखें जिसमें रात के समय जागरण भी शामिल होगा।
  • दूसरी  प्रक्रिया है सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक उपवास रखना और संध्या में शिव पूजा के पश्चात् व्रत तोडना।

व्रत के दौरान इन बातों का ध्यान रखें 

  • प्रदोष के दिन प्रात:काल नित्य कर्म से निवृत्त होकर बेलपत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप आदि चढ़ाकर शिवजी का पूजन करना चाहिए।
  • प्रदोष के पूरे दिन निराहार रहें।
  • पूरे दिन ‘ॐ नम: शिवाय’ मंत्र का मन ही मन अधिक से अधिक जप करें।
  • प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 से लेकर 7:00 बजे के बीच की जाती है।
  • त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सूर्यास्त से 3 घड़ी पूर्व शिव जी का पूजन करना चाहिए।
  • व्रतधारी को चाहिए कि पूजन से पहले शाम को दोबारा स्नान कर स्वच्छ सफेद वस्त्र धारण करें।

पूजन विधि

व्रतधारी जातक शिव मंदिर जाकर या घर में भी पूजा कर सकता हैं। वो पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार कर पूजन की सभी सामग्री एकत्रित करें। फिर कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भरकर रख लें।

इसके बाद कुश के आसन पर बैठकर शिवजी की पूजा विधि-विधान से करें और ॐ नम: शिवाय मंत्र का जाप करते हुए शिवजी का जलाभिषेक करें।

इसके बाद दोनों हाथ जो‌ड़कर शिवजी का ध्यान करें। शिवजी का ध्यान करते समय उनसे भक्ति भाव से प्रार्थना करें-

“त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्रमा का आभूषण धारण करने वाले पिंगल वर्ण के जटाजूटधारी, करोड़ों चंद्रमा के समान कांतिवान, नीले कंठ तथा अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान, वरदहस्त, त्रिशूलधारी, नागों के कुंडल पहने, व्याघ्र चर्म धारण किए हुए भगवान शिव हमारे सारे कष्टों को दूर कर सुख-समृद्धि प्रदान करें।”

इस प्रकार ध्यानमग्न होकर प्रदोष व्रत की कथा सुनें अथवा सुनाएं।

कथा समाप्ति के बाद हवन सामग्री मिलाकर “ॐ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा” मंत्र से 11 या 21 या 108 बार आहुति दें।

तत्पश्चात शिवजी की आरती करें तथा प्रसाद वितरित करके भोजन ग्रहण करें।

व्रत करने वाले व्यक्ति को कम-से-कम 11 अथवा 26 त्रयोदशी व्रत के बाद उद्यापन करना चाहिए।

सोमवती अमावस्या – महत्व और व्रत कथा

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