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*
* @param int $id The Post ID.
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* @param bool $number_format Whether to format the number (eg. 9,999) or not (eg. 9999)
* @return string
*/
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/**
* Do Query
*
* @param $instance
* @return array
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The post Shri Saraswati Chalisa – श्री सरस्वती चालीसा appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
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अर्थ: माता-पिता के चरणों की धूल मस्तक पर धारण करते हुए हे सरस्वती मां, आपकी वंदना करता हूँ, हे दातारी मुझे बुद्धि की शक्ति दो। आपकी अमित और अनंत महिमा पूरे संसार में व्याप्त है। हे मां हम भक्तों के पापों का हरण अब आप ही कर सकती हैं।
अर्थात: बुद्धि का बल रखने वाली अर्थात समस्त ज्ञान शक्ति को रखने वाली हे सरस्वती मां, आपकी जय हो। सब कुछ जानने वाली, कभी न मरने वाली, कभी न नष्ट होने वाली मां सरस्वती, आपकी जय हो। अपने हाथों में वीणा धारण करने वाली व हंस की सवारी करने वाली माता सरस्वती आपकी जय हो।
अर्थात: हे मां आपका चार भुजाओं वाला रुप पूरे संसार में प्रसिद्ध है। जब-जब इस दुनिया में पाप बुद्धि अर्थात विनाशकारी और अपवित्र वैचारिक कृत्यों का चलन बढता है और धर्म की ज्योति फीकी हो जाती है।
अर्थात: तब हे मां आप अवतार लेती हैं व इस धरती को पाप से मुक्त करती हैं।हे मां सरस्वती, जो वाल्मीकि जी हत्यारे हुआ करते थे, उनको आपसे जो प्रसाद मिला, उसे पूरा संसार जानता है।
अर्थात: आपका आशीर्वाद पाकर उन्होंने रामायण की रचना कर आदि कवि की पदवी प्राप्त की। हे मां आपकी कृपा दृष्टि से ही कालिदास जी प्रसिद्ध हुये।
अर्थात: तुलसीदास, सूरदास जैसे विद्वान और भी कितने ही ज्ञानी हुए हैं, उन्हें और किसी का सहारा नहीं था, मां ये सब केवल आपकी ही कृपा से विद्वान हुए।
अर्थात: हे मां भवानी, आप उसी तरह मुझ जैसे दीन दुखी को अपना दास जानकर अपनी कृपा करो। हे मां, पुत्र तो बहुत से अपराध व गलतियां करते रहते हैं, आप उन्हें अपने चित में धारण न करें अर्थात मेरी गलतियों को क्षमा करें, उन्हें भुला दें।
अर्थात: हे मां मैं कई तरीके से आपकी प्रार्थना करता हूं,मेरी लाज रखना। मुझ अनाथ को सिर्फ आपका सहारा है। हे मां जगदंबा दया करना,आपकी जय हो,जय हो।
अर्थात: मधु कैटभ जैसे शक्तिशाली दैत्यों ने भगवान विष्णू से जब युद्ध करने की ठानी, तो पांच हजार साल तक युद्ध करने के बाद भी विष्णु भगवान उन्हें नहीं मार सके।
अर्थात:हें मां तब आपने ही भगवान विष्णु की मदद की और राक्षसों की बुद्धि उलट दी। इस प्रकार उन राक्षसों का वध हुआ। हे मां मेरा मनोरथ भी पूरा करो।
अर्थात: चंड-मुंड जैसे विख्यात राक्षस का संहार भी आपने क्षण में कर दिया। रक्तबीज जैसे ताकतवर पापी जिनसे देवता, ऋषि-मुनि सहित पूरी पृथ्वी भय से कांपने लगी थी।
अर्थात: हे मां आपने उस दुष्ट का शीष बड़ी ही आसानी से काट कर केले की तरह खा लिया। हे मां जगदंबा मैं बार-बार आपकी प्रार्थना करता हूं, आपको नमन करता हूं। हे मां, पूरे संसार में महापापी के रुप विख्यात शुंभ-निशुंभ नामक राक्षसों का भी आपने एक पल में संहार कर दिया।
अर्थात: हे मां सरस्वती, आपने ही भरत की मां केकैयी की बुद्धि फेरकर भगवान श्री रामचंद्र को वनवास करवाया। इसी प्रकार रावण का वध भी आपने करवाकर देवताओं, मनुष्यों, ऋषि-मुनियों सबको सुख दिया।
अर्थात: आपकी विजय गाथाएं तो अनादि काल से हैं, अनंत हैं इसलिए आपके यश का गुणगान न करने का सामर्थ्य कोई नहीं रखता। जिनकी रक्षक बनकर आप खड़ी हों, उन्हें स्वयं भगवान विष्णु या फिर भगवान शिव भी नहीं मार सकते।
अर्थात: रक्त दंतिका,शताक्षी,दानव भक्षी जैसे आपके अनेक नाम हैं। हे मां मुश्किल से मुश्किल कार्यों को करने के कारण समस्त संसार ने आपको दुर्गा कहा।
अर्थात: हे मां आप कष्टों का हरण करने वाली हैं, आप जब भी कृपा करती हैं, सुख की प्राप्ती होती है, अर्थात सुख देती हैं। जब कोई राजा क्रोधित होकर मारना चाहता हो, या फिर जंगल में खूंखार जानवरों से घिरे हों।
अर्थात: या फिर समुद्र के बीच जब साथ कोई न हो और तूफान से घिर जाएं, भूत प्रेत सताते हों या फिर गरीबी अथवा किसी भी प्रकार के कष्ट सताते हों।
अर्थात:हे मां आपका नाप जपते ही सब कुछ ठीक हो जाता है इसमें कोई संदेह नहीं है अर्थात इसमें कोई शक नहीं है कि आपका नाम जपने से बड़े से बड़ा संकट भी टल जाता है, दूर हो जाता है। जो संतानहीन हैं, वे और सब को छोड़कर आप माता की पूजा करें ।
अर्थात: वो हर रोज इस चालीसा का पाठ करें, तो उन्हें गुणवान व सुंदर संतान की प्राप्ति होगी। साथ ही माता पर धूप आदि नैवेद्य चढ़ाने से सारे संकट दूर हो जाते हैं।
अर्थात: जो भी माता की भक्ति करता है, कष्ट उसके पास नहीं फटकते अर्थात किसी प्रकार का दुख उनके करीब नहीं आता। जो भी सौ बार बंदी पाठ करता है, उसके बंदी पाश दूर हो जाते हैं। हे माता भवानी सदा अपना दास समझकर, मुझ पर कृपा करें व इस भवसागर से मुक्ति दें।
अर्थ: हे मां आपकी दमक सूर्य के समान है, तो मेरा रूप अंधकार जैसा है। मुझे भवसागर रुपी कुंए में डूबने से बचाओ। हे मां सरस्वती मुझे बल, बुद्धि और विद्या का दान दीजिये। हे मां इस पापी रामसागर को अपना आश्रय देकर पवित्र करें।
।। इति सरस्वती चालीसा समाप्त ।।
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]]>The post Surya Chalisa – सूर्य देव चालीसा हिन्दी अर्थ सहित appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अङ्ग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के सङ्ग॥
अर्थ: सूर्य देव का शरीर स्वर्ण रंग का है व कानों में मकर के कुंडल हैं एवं उनके गले में मोतियों की माला है। पद्मासन होकर शंख और चक्र के साथ सूर्य भगवान का ध्यान लगाना चाहिए।
जय सविता जय जयति दिवाकर!। सहस्त्रांशु! सप्ताश्व तिमिरहर॥
भानु! पतंग! मरीची! भास्कर!। सविता हंस! सुनूर विभाकर॥
विवस्वान! आदित्य! विकर्तन। मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥
अम्बरमणि! खग! रवि कहलाते। वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥
अर्थ: हे भगवान सूर्य देव आपकी जय हो, हे दिवाकर आपकी जय हो। हे सहस्त्राशुं, सप्ताश्व, तिमिरहर, भानु, पतंग, मरीची, भास्कर, सविता हंस, विभाकर, विवस्वान, आदित्य, विकर्तन, मार्तण्ड, विष्णु रुप विरोचन, अंबर मणि, खग और रवि कहलाने वाले भगवान सूर्य जिन्हें वदों में हिरण्यगर्भ कहा गया है।
सहस्त्रांशु प्रद्योतन, कहिकहि। मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥
अरुण सदृश सारथी मनोहर। हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥
मंडल की महिमा अति न्यारी। तेज रूप केरी बलिहारी॥
उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते। देखि पुरन्दर लज्जित होते॥
अर्थ: सहस्त्रांशु प्रद्योतन (देवताओं की रक्षा के लिए देवमाता अदिति के तप से प्रसन्न होकर सूर्य देव उनके पुत्र के रुप में हजारवें अंश में प्रकट हुए थे) कहकर मुनि गण खुशी से झूमते हैं। सूर्य देव के सारथी अरुण हैं, जो रथ पर सवार होकर सात घोड़ों को हांकते हैं। आपके मंडल की महिमा बहुत अलग है। हे सूर्यदेव आपके इस तेज रुप, आपके इस प्रकाश रुप पर हम न्यौछावर हैं। आपके रथ में उच्चै:श्रवा (घोड़े की प्रजाति जिसका रंग सफेद होता है जो उड़ते हैं और तेज गति से दौड़ते हैं देवराज इंद्र के पास यह घोड़ा होता था, सागर मंथन के दौरान निकले 14 रत्नों में एक उच्चै:श्रवा घोड़ा भी था जिसे देवराज इंद्र को दिया गया था।) के समान घोड़े जुते हुए हैं, जिन्हें देखकर स्वयं इंद्र भी शर्माते हैं।
मित्र मरीचि भानु अरुण भास्कर। सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥
पूषा रवि आदित्य नाम लै। हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥
द्वादस नाम प्रेम सों गावैं। मस्तक बारह बार नवावैं॥
चार पदारथ जन सो पावै। दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥
अर्थ: मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता, सूर्य, अर्क, खग, कलिकर पौष माह में रवि एवं आदित्य नाम लेकर और हिरण्यगर्भाय नम: कहकर बारह मासों में आपके इन नामों का प्रेम से गुणगान करके, बारह बार नमन करने से चारों पदार्थ अर्थ, बल, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है व दुख, दरिद्रता और पाप नष्ट हो जाते हैं।
नमस्कार को चमत्कार यह। विधि हरिहर को कृपासार यह॥
सेवै भानु तुमहिं मन लाई। अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥
बारह नाम उच्चारन करते। सहस जनम के पातक टरते॥
उपाख्यान जो करते तवजन। रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥
अर्थ: सूर्य नमस्कार का चमत्कार यह होता है कि यह भगवान सूर्यदेव की कृपा पाने का एक आसान तरीका है। जो भी मन लगाकर भगवान सूर्य देव की सेवा करता है, वह आठों सिद्धियां व नौ निधियां प्राप्त करता है। सूर्य देव के बारह नामों का उच्चारण करने से हजारों जन्मों के पापी भी मुक्त हो जाते हैं। जो जन आपकी महिमा का गुणगान करते हैं, आप क्षण में ही उन्हें शत्रुओं से छुटकारा दिलाते हो।
धन सुत जुत परिवार बढ़तु है। प्रबल मोह को फंद कटतु है॥
अर्क शीश को रक्षा करते। रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत। कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥
भानु नासिका वासकरहुनित। भास्कर करत सदा मुखको हित॥
अर्थ: जो भी आपकी महिमा गाता है धन, संतान सहित परिवार में समृद्धि बढ़ती है, बड़े से बड़े मोह के बंधन भी कट जाते हैं। भगवान श्री सूर्यदेव अर्क के रुप में शीश की रक्षा करते हैं अर्थात शीश पर विराजमान हैं, तो मस्तक पर रवि नित्य विहार करते हैं। सूर्य रुप में वे आंखों में बसे हैं तो दिनकर रुप में कानों अर्थात श्रवण इंद्रियों पर रहते हैं। भानु रुप में वे नासिका में वास करते हैं तो भास्कर रुप सदा चेहरे के लिए हितकर होता है।
ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे। रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा। तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥
पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर। त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥
युगल हाथ पर रक्षा कारन। भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥
अर्थ: सूर्यदेव होठों पर पर्जन्य तो रसना यानि जिह्वा पर तीक्ष्ण अर्थात तीखे रुप में बसते हैं। कंठ पर सुवर्ण रेत की तरह शोभायमान हैं तो कंधों पर तेजधार हथियार के समान तिग्म तेजस: रुप में। भुजाओं में पुषां तो पीठ पर मित्र रुप में त्वष्टा, वरुण के रुप में सदा गर्मी पैदा करते रहते हैं। युगल रुप में रक्षा कारणों से हाथों पर विराजमान हैं, तो भानुमान के रुप में हृदय में आनन्द स्वरुप रहते हुए उदर में विचरते हैं।
बसत नाभि आदित्य मनोहर। कटिमंह, रहत मन मुदभर॥
जंघा गोपति सविता बासा। गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥
विवस्वान पद की रखवारी। बाहर बसते नित तम हारी॥
सहस्त्रांशु सर्वांग सम्हारै। रक्षा कवच विचित्र विचारे॥
अर्थ: नाभि में मन का हरण करने वाले अर्थात मन को मोह लेने वाले मनोहर रुप आदित्य बसते हैं, तो वहीं कमर में मन मुदभर के रुप में रहते हैं। जांघों में गोपति सविता रुप में रहते हैं तो दिवाकर रुप में गुप्त इंद्रियों में। पैरों के रक्षक आप विवस्वान रुप में हैं। अंधेरे का नाश करने के लिए आप बाहर रहते हैं। सहस्त्राशुं रुप में आप प्रकृति के हर अंग को संभालते हैं आपका रक्षा कवच बहुत ही विचित्र है।
अस जोजन अपने मन माहीं। भय जगबीच करहुं तेहि नाहीं ॥
दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहु न व्यापै। जोजन याको मन मंह जापै॥
अंधकार जग का जो हरता। नव प्रकाश से आनन्द भरता॥
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही। कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥
अर्थ: जो भी व्यक्ति भगवान सूर्य देव को अपने मन में रखता है अर्थात उन्हें स्मरण करता है उसे दुनिया में किसी चीज से भय नहीं रहता। जो भी व्यक्ति सूर्यदेव का जाप करता है उसे किसी भी प्रकार के चर्मरोग एवं कुष्ठ रोग नहीं लगते। सूर्यदेव पूरे संसार के अंधकार को मिटाकर उसमें अपने प्रकाश से आनन्द को भरते हैं। हे सूर्यदेव मैं आपको कोटि-कोटि प्रणाम करता हूं क्योंकि आपके प्रताप से ही अन्य ग्रहों के दोष भी दूर हो जाते हैं।
मंद सदृश सुत जग में जाके। धर्मराज सम अद्भुत बांके॥
धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा। किया करत सुरमुनि नर सेवा॥
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों। दूर हटतसो भवके भ्रम सों॥
परम धन्य सों नर तनधारी। हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥
अर्थ: सूर्यदेव के धर्मराज के समान पुत्र हैं अर्थात भगवान शनिदेव जो धर्मराज की तरह न्यायाधिकारी हैं। हे दिनमनि आप धन्य हैं, देवता, ऋषि-मुनि, सब आपकी सेवा करते हैं। जो भी नियमपूर्वक पूरे भक्तिभाव से सूर्यदेव की भक्ति करता है, वह भव के भ्रम से दूर हो जाता है अर्थात उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। जो भी आपकी भक्ति करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं। जिन पर आपकी कृपा होती है, आप उनके तमाम दुखों के अंधेरे को दूर कर जीवन में खुशियों का प्रकाश लेकर आते हैं।
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन। मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥
भानु उदय बैसाख गिनावै। ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥
यम भादों आश्विन हिमरेता। कातिक होत दिवाकर नेता॥
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं। पुरुष नाम रविहैं मलमासहिं॥
अर्थ: माघ माह में आप अरुण तो फाल्गुन में सूर्य, बसंत ऋतु में वेदांग तो उद्यकाल में आप रवि कहलाते हैं। बैसाख में उदयकाल के समय आप भानु तो ज्येष्ठ माह में इंद्र, वहीं आषाढ़ में रवि कहलाते हैं। भादों माह में यम तो आश्विन में हिमरेता कहलाते हैं, कार्तिक माह में दिवाकर के नाम से आपकी पूजा की जाती है। अगहन (कार्तिक के बाद और पूस के पहले का समय) में भिन्न नामों से पूजे जाते हैं तो पूस माह में विष्णु रुप में आपकी पूजा होती हैं। मलमास या पुरुषोत्तम मास (जब सूर्य दो राशियों में सक्रांति नहीं करता तो वह समय मलमास कहलाता है ऐसा अवसर लगभग तीन साल में एक बार आता है) में आपका नाम रवि लिया जाता है।
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहि बिबिध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥
अर्थ: जो भी व्यक्ति भानु चालीसा को प्रेम से प्रतिदिन गाता है अर्थात इसका पाठ करता है, उसे सुख-समृद्धि तो मिलती ही है, साथ ही उसे हर कार्य में सफलता भी प्राप्त होती है।
॥इति श्री सूर्य चालीसा ॥
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स्कंद पुराण के अनुसार यहाँ है भगवान शिव की आरामगाह
The post Surya Chalisa – सूर्य देव चालीसा हिन्दी अर्थ सहित appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>The post Shiv Chalisa – शिव चालीसा हिंदी अर्थ सहित appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>अर्थ: हे गिरिजा पुत्र भगवान श्री गणेश आपकी जय हो। आप मंगलकारी हैं, विद्वता के दाता हैं, अयोध्यादास( शिव चालीसा के रचयिता) की प्रार्थना है प्रभु कि आप ऐसा वरदान दें जिससे सारे भय समाप्त हो जांए।
अर्थात: हे गौरवशाली भगवान, पार्वती की पत्नी तुम सबसे दयालु हो। आप हमेशा गरीबों और पवित्र भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। आपका सुंदर रूप आपके माथे पर चंद्रमा के साथ सुशोभित है और आपके कान पर सांप। हुड की बालियां हैं।
अर्थात: पवित्र गंगा आपके उलझे हुए बालों से बहती है। संत और संत आपकी भव्य उपस्थिति से आकर्षित होते हैं। आपकी गर्दन के चारों ओर खोपड़ी की एक माला है। सफेद राख आपके दिव्य रूप को सुशोभित करती है और सिंह की त्वचा के कपड़े आपके शरीर को सुशोभित करते हैं।
अर्थात: हे प्रभु, आपकी बाईं ओर मैना की प्रिय पुत्री आपके शानदार रूप में शामिल होती है। हे सिंह की चमड़ी पहनने वाला, आपके हाथ में त्रिशूल सभी शत्रुओं का नाश करता है।
अर्थात: भगवान शिव के साथ नंदी और श्री गणेश एक महासागर के बीच में दो कमलों के समान सुंदर दिखाई देते हैं। कवि और दार्शनिक भगवान कार्तिकेय के अद्भुत स्वरूप और गहरे रंग के गणों (परिचारकों) का वर्णन नहीं कर सकते।
अर्थात: हे प्रभु, जब भी देवताओं ने विनम्रतापूर्वक आपकी सहायता मांगी, आपने विनम्रतापूर्वक और उनकी सभी समस्याओं को दूर कर दिया। जब दानव तारक ने उन्हें नाराज कर दिया और आपने उसे नष्ट कर दिया, तब आपने देवताओं को अपनी उदार मदद दी।
अर्थात: हे प्रभु, आपने बिना देर किए शादानन भेज दिया और इस तरह दुष्टों लावा और निमेष को नष्ट कर दिया। आपने दानव जलंधर का भी संहार किया। आपका रेनॉ दुनिया भर में जाना जाता है।
अर्थात: हे भगवान, पुरारी, आपने राक्षसों को हराकर और नष्ट करके सभी देवताओं और मानव जाति को बचाया त्रिपुरासुर। आपने अपने भक्त भागीरथ को आशीर्वाद दिया और वह कठोर तपस्या के बाद अपनी मन्नत पूरी करने में सफल रहे।
अर्थात: हे कृपालु, भक्त हमेशा आपकी महिमा गाते हैं। यहां तक कि वेद भी आपकी महानता का वर्णन करने में असमर्थ हैं। कोई भी उतना उदार नहीं है जितना आप हैं।
अर्थात: भगवान, जब समुद्र मंथन किया गया था और घातक जहर उभरा था, सभी के लिए आपकी गहरी करुणा से बाहर, आपने जहर पिया और दुनिया को विनाश से बचाया। आपका गला नीला हो गया, इस प्रकार आप नीलकंठ के नाम से जाने जाते हैं।
अर्थात: जब भगवान राम ने आपकी पूजा की, तो वह राक्षसों के राजा, रावण पर विजयी हो गए। जब भगवान राम ने श्री राम की भक्ति का परीक्षण करने के लिए एक हजार कमल के फूल, दैवीय माता की पूजा करने की इच्छा की, तो आपके अनुरोध पर सभी फूलों को छुपा दिया।
अर्थात: हे भगवान, आप श्री राम की ओर देखते रहे, जो उनकी पूजा करने के लिए अपनी कमल जैसी आंखों की पेशकश करना चाहते थे। जब आपने ऐसी गहन भक्ति देखी, तो आप प्रसन्न हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया। आपने उसकी दिली इच्छा की।
अर्थात: महिमा तुम पर हो हे कृपालु, अनंत, अमर, सर्व-व्याप्त प्रभु। ईविल ने मुझे प्रताड़ित किया और मैं सांसारिक अस्तित्व की इस दुनिया में लक्ष्यहीन यात्रा करता रहा। लगता है कोई राहत नहीं मिल रही है।
अर्थात: हे भगवन! मैं आपकी मदद करता हूं और इस क्षण में अपने दिव्य आशीर्वाद की तलाश करता हूं। मुझे बचाओ और बचाओ। अपने त्रिशूल से मेरे शत्रुओं का नाश करो। मुझे बुरे विचारों की यातना से मुक्त करो।
अर्थात: हे प्रभु, जब मैं संकट में हूँ, तो न तो मेरे माता-पिता, भाई, बहन और प्रियजन मेरे कष्ट दूर कर सकते हैं। मैं केवल आप पर निर्भर हूं। तुम मेरी आशा हो। इस जबरदस्त यातना के कारण को खत्म करो और मुझे अपनी करुणा के साथ आशीर्वाद दो।
अर्थात: हे प्रभु, आप समृद्धि के साथ दलितों को आशीर्वाद देते हैं और अज्ञानी को ज्ञान देते हैं। भगवान, मेरे सीमित ज्ञान के कारण, मैं उनकी पूजा करने के लिए छोड़ दिया। कृपया मुझे क्षमा करें और मुझ पर अपनी कृपा बरसाएं।
अर्थात: हे भगवान शंकर, आप सभी दुखों का नाश करने वाले हैं। आप सभी बाधाओं को दूर करते हैं और अपने भक्तों को अनंत आनंद प्रदान करते हैं। संत और ऋषि तेरा सबसे सुंदर रूप का ध्यान करते हैं। यहां तक कि शरद और नारद जैसे खगोलीय प्राणी भी आपके प्रति श्रद्धा में झुकते हैं।
अर्थात: हे प्रभु, आप को प्रणाम। यहां तक कि ब्रह्मा भी तेरा महानता का वर्णन करने में असमर्थ हैं। जो भी श्रद्धा और भक्ति के साथ इन श्लोकों का पाठ करता है उसे आपका असीम आशीर्वाद प्राप्त होता है।
अर्थात: जो भक्त इन छंदों का गहन प्रेम से जाप करते हैं, वे भगवान शिव की कृपा से समृद्ध हो जाते हैं। संतान की कामना करने वाले निःसंतान भी, शिव-प्रसाद को आस्था और भक्ति के साथ बांटने के बाद उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
अर्थात: त्रयोदशी (13 वें दिन) पर एक पंडित को आमंत्रित करना चाहिए और श्रद्धापूर्वक भगवान शिव को प्रसाद चढ़ाना चाहिए। जो लोग त्रयोदशी पर भगवान शिव का उपवास करते हैं और प्रार्थना करते हैं वे हमेशा स्वस्थ और समृद्ध होते हैं।
अर्थात: जो भी भगवान शिव को धूप, प्रसाद चढ़ाता है और प्रेम और भक्ति के साथ आरती करता है, उसे इस दुनिया में भौतिक सुख और आध्यात्मिक आनंद प्राप्त होता है और उसके बाद भगवान शिव के निवास पर पहुंच जाता है। कवि प्रार्थना करता है कि भगवान शिव सभी के कष्टों को दूर करें और उन्हें अनंत आनंद प्रदान करें।
अर्थ: हे सार्वभौम भगवान, हर सुबह एक नियम के रूप में मैं इस चालीसा का भक्ति के साथ पाठ करता हूं। कृपया मुझे आशीर्वाद दें ताकि मैं अपनी सामग्री और आध्यात्मिक इच्छाओं को पूरा करने में सक्षम हो सकूं।
।। इति श्री शिव चालीसा।।
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