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Dhanteras 2021: धनतेरस का त्योहार हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाएगा। इस वर्ष कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी 10 नवम्बर 2023 को दोपहर 12:35 बजे से प्रारम्भ होकर 11 नवम्बर 2023 को दोपहर 01:57 बजे तक रहेगी।

धनतेरस को धनत्रयोदशी या धन्वंतरिजयंती के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि देवताओं और दैत्यों के मध्य समुद्र मंथन के दौरान इसी दिन 14वें रत्न के रूप में धन्वंतरि देव प्रकट हुए थे। धन्वंतरि देव जब प्रकट हुए तो उनके हाथ में अमृत से भरा पीतल का कलश था। इसलिए धनतेरस के दिन पीतल का कोई बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है।आइये जानते है कि आप की जन्म राशि के अनुसार धनतेरस के दिन क्या खरीदना शुभ फल दायी होगा:

मेष राशि (Mesh Rashi) –इस राशि का स्वामी मंगल है। धनतरेस के शुभ मुहूर्त पर मेष राशि के जातकों के लिए ताबें की वस्तुएं खरीदना शुभ माना जाता है। इस दिन आप चाहें तो भूमि में भी निवेश कर सकते हैं। अगर आप इस दिन तांबे की कोई वस्तु नहीं खरीदना चाहते तो आप चांदी या इलेक्ट्रॉनिक का भी कोई समान खरीद सकते हैं। वहीं इस राशि के लोगों को शेयर, केमिकल, चमड़े, लोहे से संबंधित काम में निवेश करने से बचना चाहिए।

वृषभ राशि (Vrishabh Rashi) – वृषभ राशि का स्वामी शुक्र है। इन राशि के लोग धनतेरस के दिन चांदी का कोई सामान खरीद सकते हैं। इसके अलावा धनतेरस के दिन चावल अवश्य खरीदने चाहिए। इस खास मौके पर अनाज, कपड़ा, चांदी, चीनी, चावल, ब्यूटी प्रोडक्ट्स, परफ्यूम, दूध और उससे बने पदार्थ, प्लास्टिक, खाद्य तेल, कपड़े, और रत्नों में निवेश करने या खरीदने से लाभ होगा। इससे मां लक्ष्मी हमेशा कृपा बरसाती रहेंगी।

मिथुन राशि (Mithun Rashi) –मिथुन राशि के जातकों का स्वामी बुध है। बुध व्यापारियों को लाभ देने वाला ग्रह है। मिथुन राशि के जातक धनतेरस पर स्टील के बर्तन खरीद सकते हैं। धनतेरस के दिन आपका वाहन खरीदना या सोने में निवेश करना भी शुभ माना जाता है। इस दिन आप सफेद वस्त्र का दान करें, जिससे आपकी वित्तीय स्थिति बेहतर हो जाएगी। इसके अलावा धनतेरस के दिन कागज, लकड़ी, पीतल, गेहूं, दालें, कपड़ा, स्टील, प्लास्टिक, तेल, सौदर्य सामग्री, सीमेंट, खनिज पदार्थ आदि का व्यापार करने वाले और खरीदने वाले को लाभ मिलेगा।

कर्क राशि (Kark Rashi)-कर्क राशि का स्वामी चंद्र है। धनतेरस के दिन आपका कंपनियों के शेयर और फाइनेंस कंपनियों में निवेश करना लाभदायी होगा। कर्क राशि के लोग धनतेरस के दिन चांदी की वस्तुएं खरीद सकते हैं। इसके अलावा चाहें तो आप स्टील के बर्तन भी खरीद सकते हैं। इस दिन इलेक्ट्रॉनिक का आइटम खरीदना आपके लिए शुभ होगा, यदि आप ऐसा करते हैं तो आपके घर में मां लक्ष्मी का वास हमेशा बना रहेगा।

सिंह राशि (Singh Rashi)-सिंह राशि का स्वामी सूर्य है। धनतेरस के दिन आप शेयर या जमीन-जायदाद में निवेश कर सकते हैं। इस दिन सिंह राशि के जातक तांबे या कांसे की वस्तुओं को खरीद सकते हैं। आप चाहें तो इस खास मौके पर सोने मे निवेश कर सकते हैं या इलेक्ट्रॉनिक का कोई आइटम खरीद सकते हैं। इस दिन आप नए कपड़े भी खरीद सकते हैं ऐसा करने से मां लक्ष्मी का आशीर्वाद आप पर हमेशा बना रहेगा।

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कन्या राशि (Kanya Rashi) –कन्या राशि का स्वामी बुध है, जिसे चंद्रमा का शत्रु माना जाता है। इन राशि के लोगों के लिए धनतेरस के दिन तांबे के गणेश जी खरीदना शुभ माना जाता है। वहीं इस खास मौके पर आप रसोई के लिए कोई आइटम भी खरीद सकते हैं। इस खास मौके पर अगर आप चाहें तो कांसे या हाथी के दांत से बनी चीजें भी खरीद सकते हैं।

तुला राशि (Tula Rashi) –तुला राशि का स्वामी शुक्र है। इस ऱाशि वालों को इलेक्ट्रॉनिक सामान और तेल में निवेश करना शुभ माना जाता है। तुला राशि के जातक धनतेरस के दिन चांदी या स्टील से बनी कोई भी चीजें खरीद सकते हैं। इसके अलावा आप कोई ब्यूटी प्रोडक्ट्स या घर को सजाने वाली किसी वस्तु को खरीद सकते हैं। ऐसा करने से आपको ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

वृश्चिक राशि (Vrishchik Rashi) –इस राशि के जातकों का स्वामी मंगल है। इस राशि वाले लोगों को धनतेरस के दिन जमीन, मकान, दुकान और वस्त्रों में निवेश करना चाहिए। इस खास मौके पर सोने की वस्तु को खरीदना काफी शुभ माना जाता है। यदि आप चाहें तो इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं भी खरीद सकते हैं। यदि आप इन वस्तुओं को खरीदते हैं तो आपको धनलाभ के कई योग बनेंगे।

धनु राशि (Dhanu Rashi) –इस राशि के लोगों का स्वामी गुरु है। गुरु व्यापारियों को लाभ प्रदान कराने वाला ग्रह है। धनतेरस के दिन सोने का आइटम और अनाज खरीदना शुभ माना जाता है। इसके अलावा आप इस दिन आभूषण, रत्न, अनाज, चांदी और ब्यूटी प्रोडक्टस भी खरीद सकते हैं। यदि आप इस दिन कोई पीली वस्तु खरीद लें तो आपके ऊपर लक्ष्मी के साथ-साथ बृहस्पति देव का भी आशीर्वाद बना रहेगा।

Dhanteras 2023: श्री कुबेर पूजा विधि

मकर राशि (Makar Rashi) – मकर राशि का स्वामी शनि है। धनतेरस के दिन इलेक्ट्रॉनिक सामान, वाहन, इत्र, स्टील और ब्यूटी प्रोडक्ट्स में निवेश से लाभ प्राप्त होता है। मकर राशि के लोग धनतेरस के दिन वाहन खरीद सकते हैं क्योंकि उनके लिए यह दिन काफी शुभ है। इसके अलावा आप मां लक्ष्मी के पूजन के लिए वस्त्र और चांदी का सिक्का भी खरीद सकते हैं। इस पावन अवसर पर यह सब चीजें खरीदने से आपके घर में समृद्धि का वास होगा।

कुम्भ राशि (Kumbh Rashi) –इस राशि के जातकों का स्वामी शनि है। धनतेरस के दिन लोहे, इलेक्ट्रॉनिक सामान, वाहन, इत्र, स्टील आदि वस्तुएं खऱीद सकते हैं। इस दिन आप चाहें तो नीलम रत्न भी खरीद सकते हैं। यह काफी शुभ माना जाता है। यदि आप चाहें तो इस दिन भगवान गणेश और धन की देवी लक्ष्मी के चित्र वाला सोने का सिक्का भी खरीद सकते हैं। ऐसा करने से आपकी आर्थिक स्थिति बेहतर रहेगी।

मीन राशि (Meen Rashi) –मीन राशि वालों का स्वामी गुरु है। चंद्रमा का घनिष्ठ मित्र माना जाता है। धनतेरस के दिन सोना, चांदी, रत्न, आभूषण आदि सामग्रियों को खरीदना शुभ माना जाता है। इसके अलावा आप इस दिन चांदी के बर्तन भी खरीद सकते हैं। अगर आप चाहें तो कोई इलेक्ट्रॉनिक आइटम भी खरीद सकते हैं। ये सब खरीदते हैं तो आप पर मां लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है।

 

नोट:- ये सब समान खरीदना आपकी इच्छा पे निर्भर करता है जो लोग किसी वजह से समान नहीं खरीद सकते वो भगवान के हाथ जोड़ कर पूजा अर्चना कर प्रसाद ग्रहण करे | बताई गयी वस्तुओं के अलावा धनतेरस के दिन नमक ,हल्दी की गांठ ,लक्ष्मी गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति ,साबुत धनिया और झाड़ू भी खरीदना अति शुभ माना जाता है |

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Dev Diwali 2021: देव दीपावली कब और वाराणसी में क्यों मनायी जाती है ? https://astrodeeva.com/dev-diwali-2021-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5-%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3/ https://astrodeeva.com/dev-diwali-2021-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5-%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3/#respond Wed, 17 Nov 2021 00:28:07 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2676 देव दीपावली ( Dev Diwali )या देवताओं की दीपावली हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। हिन्दू कैलंडर के अनुसार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व दीपावली के 15 दिन के बाद मनाया जाता है। इस पर्व के दिन उत्तर प्रदेश के धार्मिक शहर वाराणसी(काशी) की रौनक़ […]

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देव दीपावली ( Dev Diwali )या देवताओं की दीपावली हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। हिन्दू कैलंडर के अनुसार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व दीपावली के 15 दिन के बाद मनाया जाता है। इस पर्व के दिन उत्तर प्रदेश के धार्मिक शहर वाराणसी(काशी) की रौनक़ देखते ही बनती है। देव दिवाली देवताओं का त्योहार है, इस दिन माँ गंगा और भोलेनाथ की बड़े धूम-धाम के पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है की इस दिन सभी देवी देवता भगवान शिव के विजयोत्सव को मनाने पृथ्वी पर आए थे और इस दिन को दीपावली उत्सव की तरह मनाया था।

देव दीपावली 2021 ( Dev Diwali 2021)

दिनांक – 18 नवंबर 2021
वार – बृहस्पतिवार
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ – 18 नवंबर 2021 को 12:00 पी एम बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त – 19 नवंबर 2021  को 02:26 पी एम बजे
प्रदोषकाल देव दीपावली मुहूर्त – 05:09 पी एम से 07:47 पी एम
अवधि – 02 घण्टे 38 मिनट्स

देव दीपावली व्रत कथा ( Legend of Dev Diwali )

पौराणिक कथा के अनुसार, शिव जी और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर नामक राक्षस का वध कर दिया तो उसका बदला लेने के लिए उसके तीन पुत्र तारकाक्ष, कमलाक्ष औऱ विद्युन्माली ने ब्रह्मा जी की तपस्या की और उन्हें प्रसन्न करके उनसे अमर होने का वरदान मांगा परंतु ब्रह्मा जी ने उन्हें यह वरदान देने से मना कर दिया। ब्रह्मा जी ने कहा कि तुम इसकी जगह कुछ और वरदान मांग लो इसके बाद तारकासुर के पुत्रों ने कहा “आप हमें वरदान दीजिए की आप हमारे नाम के नगर बनायेंगे और हम तीनो भाइयों का वध एक ही तीर से हो। ब्रह्मा जी ने उन्हें तथास्तु कह दिया।

ब्रह्मा जी से वरदान पाने के बाद तारकासुर के तीनों पुत्रों ने तीनों लोकों पर कब्जा कर लिया। और देवी देवताओं पर अत्याचार करने लगे। उनके अत्याचार से मुक्ति पाने के लिए सभी देवी देवता भगवान शिव के पास पहुंचे और भोलेनाथ को सारा वृत्तांत बताया । उन्होंने तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली का वध कर उनके अत्याचारों से मुक्ति प्रदान करने के लिए प्रार्थना की। तब भोलेनाथ ने देव विश्वकर्मा से एक रथ का निर्माण करवाया और उस दिव्य रथ पर सवार होकर भगवान शिव दैत्यों का वध करने निकले। देव और राक्षसों के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया और जब युद्ध के दौरान तीनों दैत्य यानि त्रिपुरा एक साथ आए तो भगवान शंकर ने एक ही तीर से ही तीनों का वध कर दिया। इसके बाद से ही भोलेनाथ को त्रिपुरारी कहा जाने लगा। तब देवताओं ने भोलेनाथ की विजय की खुशी में उनकी नगरी काशी नगरी वाराणसी(काशी) में दीप दान किया। कहते हैं तभी से वाराणसी(काशी) में कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव-दिवाली मनाने की परंपरा चली आ रही है।

ये भी पढ़ें : शिव चालीसा हिंदी अर्थ सहित

देव दीपावली पर क्या करें?

इस त्योहार पर, भक्त प्रातःकाल पवित्र गंगा नदी में स्नान करते हैं जिसे कार्तिक स्नान के रूप में जाना जाता है। इसके बाद भक्त पहले भगवान गणेश जी की फिर भगवान शिव और भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करते है। भगवान शिव को इस दिन पूजा में पुष्प, घी, नैवेद्य, बेलपत्र और भगवान विष्णु को पूजा में पीले फूल, नैवेद्य, पीले वस्त्र, पीली मिठाई अर्पित करते हैं। इसके बाद दीप दान किया जाता है, अर्थात् देवी गंगा को श्रद्धा के प्रतीक के रूप में दीपक अर्पित किए जाते हैं।

वाराणसी की गंगा आरती इस धार्मिक त्योहार का एक प्रमुख आकर्षण है, जो 24 पुजारियों और 24 युवा लड़कियों द्वारा अत्यंत पवित्रता और भक्ति के साथ किया जाता है।

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Deepawali 2021: दीपावली पर बन रहा है दुर्लभ योग, जाने पूजा का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि https://astrodeeva.com/deepawali-2021-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a4%a8-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2/ https://astrodeeva.com/deepawali-2021-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a4%a8-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2/#respond Wed, 03 Nov 2021 11:11:53 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2645 हिन्दू धर्म में दीपावली (Deepawali) एक ऐसा त्यौहार है जिसका हर हिन्दू वर्ष भर बेसब्री से इंतज़ार करता है और अपनी यथाशक्ति अनुसार इस पर्व को मनाता है। यह पर्व हर वर्ष हिन्दू  पंचांग  के अनुसार कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भक्तजन माता लक्ष्मी, सरस्वती  और भगवान […]

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हिन्दू धर्म में दीपावली (Deepawali) एक ऐसा त्यौहार है जिसका हर हिन्दू वर्ष भर बेसब्री से इंतज़ार करता है और अपनी यथाशक्ति अनुसार इस पर्व को मनाता है। यह पर्व हर वर्ष हिन्दू  पंचांग  के अनुसार कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भक्तजन माता लक्ष्मी, सरस्वती  और भगवान गणेश की विधि विधान से पूजा कर उनको प्रसन्न करते है और उन से धन-संपत्ती, बुद्धि  और सुख-समृद्धि प्रदान करने की कामना करते हैं।

Deepawali 2021 शुभ मुहूर्त

दिनांक – 04 नवम्बर 2021
वार – गुरूवार/ बृहस्पतिवार
अमावस्या तिथि प्रारम्भ – 04 नवम्बर 2021 को 06:03 ए एम बजे
अमावस्या तिथि समाप्त – 05 नवम्बर 2021 को 02:44 ए एम बजे
प्रदोष काल – 05:43 पी एम से 08:10 पी एम
वृषभ लग्न – 06:09 पी एम से 08:04 पी एम
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त – 04 नवम्बर 2021 को 06:09 पी एम से 08:04 पी एम

Deepawali लक्ष्मी पूजा के लिये शुभ चौघड़िया मुहूर्त

प्रातः मुहूर्त (शुभ) – 06:35 ए एम से 07:58 ए एम
प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत) – 10:42 ए एम से 02:49 पी एम
अपराह्न मुहूर्त (शुभ) – 04:11 पी एम से 05:34 पी एम
सायाह्न मुहूर्त (अमृत, चर) – 05:34 पी एम से 08:49 पी एम
रात्रि मुहूर्त (लाभ) – 12:05 ए एम से 01:43 ए एम, नवम्बर 05

निशिता काल मुहूर्त

निशिता काल – 11:39 पी एम से 12:31 ए एम, नवम्बर 05
सिंह लग्न – 12:39 ए एम से 02:56 ए एम, नवम्बर 05

Deepawali पूजन सामग्री

दीपावली पूजन की सभी सामग्री लगभग घर में ही मिल जाती हैं लेकिन कुछ अतिरिक्त चीजों को बाहर से लाया जा सकता है। ये वस्तुएं हैं- लक्ष्मी, सरस्वती व गणेश जी की प्रतिमा या चित्र, रोली, कुमकुम, चावल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, धूप, कपूर, अगरबत्तियां, मिट्टी तथा तांबे के दीपक, रुई, कलावा (मौलि), नारियल, शहद, दही, गंगाजल, गुड़, धनिया, फल, फूल( कमल और गुलाब के फूल भी मां को बहुत प्रिय हैं), जौ, गेहूँ, दूर्वा, चंदन, सिंदूर, घृत, पंचामृत, दूध, मेवे, खील, बताशे, गंगाजल, जनेऊ,वस्त्र, लाल कपड़ा,चौकी, कलश, कमल गट्टे की माला, शंख, आसन, थाली, चांदी का सिक्का, भोग व प्रसाद हेतु मिष्ठान्न।

Deepawali पूजन विधि 

दीपावली की पूजा में सबसे पहले एक चौकी पर सफेद या लाल वस्त्र बिछा कर उस पर मां लक्ष्मी, सरस्वती व गणेश जी को प्रतिमा या चित्र को विराजमान करें। इसके बाद हाथ में थोड़ा सा जल लेकर उसे प्रतिमा के ऊपर निम्न मंत्र पढ़ते हुए छिड़कें।

ऊँ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा।
य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: वाह्याभंतर: शुचि:।।

इसके बाद में इसी तरह से स्वयं को तथा अपने पूजा के आसन को भी इसी तरह जल छिड़ककर पवित्र कर लें।

अब पृथ्वी मां को प्रणाम करके निम्न मंत्र बोलें तथा उनसे क्षमा प्रार्थना करते हुए अपने आसन पर विराजमान हों

पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥

ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥
पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः

अब पुष्प या चम्मच से अपनी दायी अंजुलि में जल ले कर निम्न मंत्र बोलते हुए आचमन करें

ॐ केशवाय नमः
ॐ नारायणाय नमः
ॐ वासुदेवाय नमः

अब हृषिकेशाय नमः मंत्र कहते हुए हाथों को धो लें। इस प्रक्रिया को आचमन कहते हैं इससे विद्या, आत्म और बुद्धि तत्व का शोधन हो जाता है। तत्पश्चात तिलक लगाएँ। अब आप पूजा के लिये पूरी तरह पवित्र हैं।

ध्यान व संकल्प

अब मन को एकाग्र कर प्रभु में ध्यान लगाएँ और संकल्प करें।

संकल्प के लिये हाथ में अक्षत, पुष्प और जल लें साथ में कुछ द्रव्य यानि पैसे भी लें और संकल्प मंत्र का जाप करते हुए संकल्प करें कि मैं अमुक व्यक्ति( अपना नाम), अमुक गोत्र( आप का गोत्र),अमुक स्थान( जिस शहर व स्थान में पूजा की जा रही है) , दिनांक, समय पर सपरिवार  मां लक्ष्मी, सरस्वती तथा गणेश जी का पूजन करने जा रहा हूं, जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हों।”

 इसके बाद भगवान गणेश और माँ गौरी की पूजा करें। इसके बाद कलश पूजन करें। अब फिर नवग्रहों का पूजन कीजिए। हाथ में अक्षत और पुष्प ले कर नवग्रह स्तोत्र बोलिए। इसके बाद भगवती षोडश मातृकाओं ( १. गौरी, २. पद्मा, ३. शची, ४. मेधा, ५. सावित्री, ६. विजया, ७. जया, ८. देव सेना, ९. स्वधा, १०. स्वाहा, ११. मातरः, १२. लोकमातरः, १३. धृतिः, १४. पुष्टिः, १५. तुष्टिः, १६. आत्मनः कुलदेवताः ) का पूजन किया जाता है। इन सभी के पूजन के बाद मातृकाओं को गंध, अक्षत व पुष्प प्रदान करते हुए पूजन करें। अब मौलि लेकर गणपति जी , माता लक्ष्मी व सरस्वती को अर्पण कर और स्वयं के हाथ पर भी बंधवा लें। अब सभी देवी-देवताओं के तिलक लगाकर स्वयं को भी तिलक लगवाएं। इसके बाद मां महालक्ष्मी की पूजा आरंभ करें।

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लक्ष्मी पूजन

सर्व प्रथम माता लक्ष्मी का ध्यान करें और निम्न मंत्र बोलें

ॐ या सा पद्मासनस्था, विपुल-कटि-तटी, पद्म-दलायताक्षी।
गम्भीरावर्त-नाभिः, स्तन-भर-नमिता, शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया।।

लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। मणि-गज-खचितैः, स्नापिता हेम-कुम्भैः।
नित्यं सा पद्म-हस्ता, मम वसतु गृहे, सर्व-मांगल्य-युक्ता।।

 अर्थात – भगवती लक्ष्मी कमल के आसन पर विराजमान हैं, कमल की पंखुड़ियों के समान सुन्दर बड़े-बड़े जिनके नेत्र हैं, जिनकी विस्तृत कमर और गहरे आवर्तवाली नाभि है, जो पयोधरों के भार से झुकी हुई और सुन्दर वस्त्र के उत्तरीय से सुशोभित हैं, जो मणि-जटित दिव्य स्वर्ण-कलशों के द्वारा स्नान किए हुए हैं, वे कमल-हस्ता सदा सभी मङ्गलों के सहित मेरे घर में निवास करें।

देवी की प्रतिष्ठा करें

हाथ में अक्षत लेकर बोलें “ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मी, इहागच्छ इह तिष्ठ, एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।

स्नान कराएं

ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः।।

इदं रक्त चंदनम् लेपनम्  से रक्त चंदन लगाएं।

इदं सिन्दूराभरणं  से सिन्दूर लगाएं।

ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, कमलायै नमो नमः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।’ इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं। अब लक्ष्मी देवी को इदं रक्त वस्त्र समर्पयामि कहकर लाल वस्त्र पहनाएं।

लक्ष्मी देवी की अंग पूजा

बायें हाथ में अक्षत लेकर दायें हाथ से थोड़ा-थोड़ा छोड़ते जायें—

ॐ चपलायै नम: पादौ पूजयामि।
ॐ चंचलायै नम: जानूं पूजयामि ।
ॐ कमलायै नम: कटि पूजयामि ।
ॐ कात्यायिन्यै नम: नाभि पूजयामि ।
ॐ जगन्मातरे नम: जठरं पूजयामि ।
ॐ विश्ववल्लभायै नम: वक्षस्थल पूजयामि ।
ॐ कमलवासिन्यै नम: भुजौ पूजयामि ।
ॐ कमल पत्राक्ष्य नम: नेत्रत्रयं पूजयामि ।
ॐ श्रियै नम: शिरं: पूजयामि।

अष्ट-सिद्धि पूजा

अङ्ग-देवताओं की पूजा करने के बाद पुनः बाएँ हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें.

ॐ अणिम्ने नम:।
ॐ महिम्न नम:।
ॐ गरिम्णे नम:।
ॐ लघिम्ने नम:।
ॐ प्राप्त्यै नम:।
ॐ प्राकाम्यै नम:।
ॐ ईशितायै नम:।
ॐ वशितायै नम:।

अष्टलक्ष्मी पूजन

पुनः बाएँ हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें.

ॐ आद्ये लक्ष्म्यै नम:।
ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम:।
ॐ सौभाग्य लक्ष्म्यै नम:।
ॐ अमृत लक्ष्म्यै नम:।
ॐ लक्ष्म्यै नम:।
ॐ सत्य लक्ष्म्यै नम:।
ॐ भोगलक्ष्म्यै नम:।
ॐ योग लक्ष्म्यै नम:।

नैवैद्य अर्पण

पूजन के पश्चात देवी को “इदं नानाविधि नैवेद्यानि ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें।

मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: “इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” बालें।

प्रसाद अर्पित करने के बाद “इदं आचमनयं ॐ महालक्ष्मियै नम: ” मंत्र बोले और आचमन करायें.

अब पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि।

अब एक फूल लेकर लक्ष्मी देवी पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ॐ महालक्ष्मियै नम:।

लक्ष्मी जी की पूजा के बाद भगवान विष्णु एवं शिव जी की पूजा करनी चाहिए और फिर गल्ले की पूजा करें। पूजन के पश्चात सपरिवार आरती और क्षमा प्रार्थना करें।

क्षमा प्रार्थना मंत्र

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर।।
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं माया देवं परिपूर्ण तदस्तु में।

अर्थात- हे ईश्वर मैं आपका “आवाह्न” करना नहीं जानता हूं न ही विसर्जन अर्थात् न ही आपको विदा करना जानता हूं मुझे आपकी पूजा भी करनी नहीं आती है। अगर मेरे से आप की पूजा में कोई भूल हो गयी है तो कृपा करके मुझे क्षमा करें। न मुझे मंत्र का ज्ञान है न ही क्रिया का, मैं तो आपकी भक्ति करना भी नहीं जानता। मैं यथा संभव पूजा कर रहा हूं, कृपा करके मेरी भूल को क्षमा कर दें और पूजा को पूर्णता प्रदान करें।

अब अपने बड़ों का आशीर्वाद लें और छोटों को भेंट व उपहार दें और सब के साथ पर्व मनाएँ।

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हिन्दू धर्म में सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों को बहुत महत्ता दी गयी है इसी कारण इसके तीज त्यौहार भी इन रिश्तों को और प्रगाढ़ करते हैं। हिन्दू धर्म में जैसे पति पत्नी के संबंध के लिए करवा चौथ पर्व मनाया जाता है और माता पुत्र के लिए अहोई अष्टमी करती है उसी तरह बहन-भाई के लिए रक्षाबंधन और भाई दूज का पर्व मनाया जाता है।

भाई दूज का त्यौहार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है| भाई दूज का त्यौहार भाई- बहन के रिश्ते पर आधारित त्यौहार है। भाई दूज दीपावली के दो दिन बाद आने वाला एक ऐसा त्यौहार है, जिसमें बहन अपने भाई के प्रति अगाध प्रेम और स्नेह को अभिव्यक्त करती है| इस दिन बहनें अपने भाईयों की खुशहाली के लिए कामना करती हैं|

इस भाई दूज या भैया दूज त्यौहार को भाई टीका, यम द्वितीया, भ्रातृ द्वितीया आदि नामों से भी जाना जाता है।

भाई दूज 2020 कब और शुभ मुहूर्त

दिनांक : 16 नवम्बर 2020

वार : सोमवार

द्वितीया तिथि प्रारम्भ : 16 नवम्बर 2020 को 07:06 ए एम बजे

द्वितीया तिथि समाप्त : 17 नवम्बर 2020 को 03:56 ए एम बजे

भाई दूज तिलक शुभ मुहूर्त :दोपहर 1:10 से 3:18 तक

अवधि :2 घंटे 8 मिनट

 

भाई दूज की कथा

 पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान सूर्य की पत्नी छाया के कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। दोनो भाई बहन में बहुत स्नेह था। यमुना स्नेहवश अनेको बार अपने भ्राता यमराज से निवेदन करती की वो उनके घर आकर भोजन ग्रहण करें| परंतु यमराज अपनी व्यस्ता के कारण यमुना की बात को टाल देते अथवा भूल जाते थे| यमुना के अनेकों बार बुलाने पर एक दिन यमराज यमुना के घर पहुंचे। इस मौके पर यमुना ने अपने भाई यमराज के लिए अनेको प्रकार के स्वादिष्ट पकवान बनाये और भ्राता यमराज को आदर और स्नेह से भोजन कराया और तिलक कर उनके खुशहाल जीवन की कामना की। बहन यमुना के प्रेम, स्नेह और समर्पण को देख यमराज बहुत प्रसन्न हुए और बहन यमुना से वरदान मांगने को कहा, तो यमुना ने कहा कि, आप हर वर्ष इसी दिन मेरे घर भोजन करने आया करो तथा इस दिन जो भी बहन अपने भाई का तिलक करे और स्नेह पूर्वक भोजन कराए उसे तुम्हारा भय नहीं रहे। बहन यमुना के वचन सुनकर यमराज अति प्रसन्न हुए और तथास्तु’ कहकर यमलोक  चले गए। इसी दिन से भाई दूज पर्व की शुरुआत हुई। इस दिन यमुना नदी में स्नान का बड़ा महत्व है क्योंकि कहा जाता है कि भाई दूज के मौके पर जो भाई-बहन यमुना नदी में स्नान करते हैं उन्हें पुण्य की प्राप्ति होती है।

 

भाई दूज की पूजा विधि

  • इस दिन बहने सुबह ब्रह्म महुर्त में उठ कर नहा धोकर अपने भाई को घर पर भोजन के लिए बुलाएं।
  • बहनें, भाई के तिलक और आरती के लिए थाल सजायें और इसमें कुमकुम, सिंदूर, चंदन,फल, फूल, मिठाई और सुपारी आदि सामग्री रखें।
  • भाई के आने के बाद उसको को एक पाट पर बैठायें और शुभ मुहूर्त में बहन अपने भाई को घी और चावल का टीका लगाएँ और भाई की हथेली पर सिंदूर, पान, सुपारी और सूखा नारियल यानी गोला भी रखें।
  • भाई के हाथ पर कलावा बाधें और उनका मुंह मीठा कराएँ। इसके साथ ही उसकी लंबी आयु,स्वस्थ जिवन,सफलता आदि की कामना करें।
  • अब भाई की आरती उतरें औऱ उसके बाद उसे भजोन करवाएं.

भारत और नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में भाई दूज पर्व

 उत्तर भारत में भाई दूज

उत्तर भारत में भाई दूज का त्यौहार बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। पंजाब प्रांत में तो इस पर्व को रक्षाबंधन से ज़्यादा महत्व दिया जाता है। उत्तर भारत में इस त्यौहार के दिन बहनें भाई का तिलक कर उन्हें बताशे खिलाती हैं और सूखा नरियल( गोला) भी देती हैं। तिलक के बाद भाई भेंट स्वरूप बहन को उपहार देता है।

महाराष्ट्र में भाई दूज

महाराष्ट्र और गोवा में भाई दूज को भाऊ बीज के नाम से जाना जाता है। मराठी में भाऊ का अर्थ है भाई। इस मौके पर बहनें तिलक लगाकर भाई के खुशहाल जीवन की कामना करती हैं।

पश्चिम बंगाल में भाई दूज

पश्चिम बंगाल में भाई दूज को भाई फोटा पर्व के नाम से मनाया जाता है। इस दिन बहनें व्रत रखती हैं और भाई का तिलक करने के बाद भोजन करती हैं। तिलक के बाद भाई भेंट स्वरूप बहन को उपहार देता है।

बिहार में भाई दूज

बिहार में भाई दूज पर एक सबसे अनोखी परंपरा निभाई जाती है। इस दिन बहनें भाइयों को डांटती हैं और उन्हें भला बुरा कहती हैं और फिर उनसे माफी मांगती हैं। दरअसल यह परंपरा भाइयों द्वारा पहले की गई गलतियों के चलते निभाई जाती है। इस रस्म के बाद बहनें भाइयों को तिलक लगाकर उन्हें मिठाई खिलाती हैं।

नेपाल में भाई दूज

नेपाल में भाई दूज पर्व भाई तिहार के नाम से जाना जाता है। तिहार का मतलब तिलक या टीका होता है। इसके अलावा इसे भाई टीका के नाम से भी मनाया जाता है। नेपाल में इस दिन बहनें भाइयों के माथे पर सात रंग से बना तिलक लगाती हैं और उनकी लंबी आयु व सुख, समृद्धि की कामना करती हैं।

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