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चैत्र नवरात्रि (Navratri 2022)एक नए मौसम की शुरुआत का प्रतीक है और इस दौरान उपवास करना शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो लोग इन नौ दिनों का उपवास करते हैं, उन्हें देवी दुर्गा अपनी कृपा प्रदान करती हैं। इस दौरान भक्तों को ध्यान करना चाहिए, देवी महात्म्य का पाठ करना चाहिए और माँ दुर्गा के नौ रूपों में से प्रत्येक को समर्पित श्लोकों / मंत्रों का जाप करना चाहिए। नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान एक व्रती (उपवास रखने वाले व्यक्ति) को लहसुन, प्याज, गेहूं, चावल, दाल और मांस से परहेज़ करना चाहिए।

नवरात्रि (Navratri) के दौरान उपवास करने से आध्यात्मिक और आंतरिक शक्ति का संचार होता है। यह मन की बेचैनी को कम करता है और चीत को शांत कर जागरूकता और आनंद की अनुभती लाता है। ये आपकी इंद्रियों, शरीर, मन और आत्मा को शांत करने में आपकी मदद करते हैं।

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नवरात्रि के दौरान उपवास के लाभ (Benefits of fasting during Navratri)

  • आध्यात्मिक आत्म से जुड़ने के लिए एक आदर्श समय होने के अलावा, नवरात्रि का समय अपने आप को डिटॉक्स करने और पूर्व में जाने अनजाने में हुए पाप के लिए पश्चाताप करने का सबसे अच्छा समय होता है।
  • इन नौ दिनों के दौरान, लोग विभिन्न प्रकार के फल और खाद्य पदार्थ का सेवन करते हैं जो पौष्टिक होने के साथ-साथ इनमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट पूरे शरीर की सफाई के लिए फायदेमंद होते हैं।
  • जब आप उपवास करते हैं, तो आपके तरल पदार्थ का सेवन बढ़ जाता है। यह शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करता है।

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  • गेहूं, चावल और दाल से परहेज करते हुए हल्के भोजन पदार्थ जैसे सिंघारे का आटा, कुट्टू का आटा, समा, साबूदाना आदि सामग्री को भोजन में लेने से लोग अपने पाचन तंत्र को बहुत जरूरी आराम देते हैं।
  • नवरात्रि उपवास के दौरान लोग टेबल सॉल्ट या प्रोसेस्ड/रिफाइंड नमक की जगह सेंधा नमक (रासायनिक के बिना शुद्ध नमक) लेते हैं जो पाचन में मदद करता है, प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, रक्तचाप को नियंत्रित करता है और पूरे दिन शरीर को सक्रिय रखता है।
  • उपवास के दौरान व्रती गर्मी पैदा करने वाले मसालों जैसे हल्दी, हिंग, गरम मसाला, राय / सरसों, लवंग (लौंग) के उपयोग से बचते हैं और खाना पकाने के लिए तिल/सरसों के तेल के उपयोग से भी बचते हैं। व्रत की रेसिपी बनाने के लिए मूंगफली के तेल या घी का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रकार, इनसे परहेज करके और जीरा (जीरा) और काली मिर्च (काली मिर्च) का उपयोग करने से शरीर ठंडा और तरोताजा रहता है।
  • ध्यान और प्रार्थना नवरात्रि व्रत के महत्वपूर्ण अंग हैं। ये आपकी इंद्रियों, शरीर, मन और आत्मा को शांत करने में आपकी मदद करते हैं। संक्षेप में, नवरात्रि के दौरान उपवास करने से व्यक्ति आत्म-संयम, आत्म-अनुशासन, और कम से कम आध्यात्मिक जागरण का अभ्यास कर सकता है।

 

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Horoscope 24 October 2020: महा अष्टमी, जाने कैसा रहेगा आज का दिन https://astrodeeva.com/horoscope-24-october-2020-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%b0/ https://astrodeeva.com/horoscope-24-october-2020-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%b0/#respond Sat, 24 Oct 2020 06:49:13 +0000 https://astrodeeva.com/?p=990 आदिशक्ति माँ दुर्गा के महागौरी रूप की पूजा आठवें नवरात्र में की जाती है। माँ ने काली रूप में आने के पश्चात घोर तपस्या की और पुन: गौरवर्ण पाया और महागौरी कहलाई। माँ का वाहन बैल है और माँ को हलवे का भोग लगाया जाता है। आज 24 ऑक्टोबर 2020 का राशिफल  मेष राशि  इस राशि के जातकों का कार्यक्षेत्र मे प्रदर्शन अच्छा रहेगा और आने वाले समय में ये आपको फायदा देगा |पार्टनर के साथ समय अच्छा बीतेगा |जिनकी शादी नहीं हुई है उनको उपयुक्त जीवनसाथी मिलेगा |आपका ध्यान अध्यात्म की और बढ़ेगा जिससे आपको  मानसिक शांति का अनुभव प्राप्त […]

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आदिशक्ति माँ दुर्गा के महागौरी रूप की पूजा आठवें नवरात्र में की जाती है। माँ ने काली रूप में आने के पश्चात घोर तपस्या की और पुन: गौरवर्ण पाया और महागौरी कहलाई। माँ का वाहन बैल है और माँ को हलवे का भोग लगाया जाता है।

आज 24 ऑक्टोबर 2020 का राशिफल 

मेष राशि 

इस राशि के जातकों का कार्यक्षेत्र मे प्रदर्शन अच्छा रहेगा और आने वाले समय में ये आपको फायदा देगा |पार्टनर के साथ समय अच्छा बीतेगा |जिनकी शादी नहीं हुई है उनको उपयुक्त जीवनसाथी मिलेगा |आपका ध्यान अध्यात्म की और बढ़ेगा जिससे आपको  मानसिक शांति का अनुभव प्राप्त होगा |छात्रों के लिए उपयुक्त समय है अपनी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का |

वृषभ राशि 

आपके खर्चों  मे व्यय अधिक बढ़ेगा | पारिवारिक माहौल बेहतर रहेगा व्यपारिक यात्राओ से लाभ होगा | इस समय आप कोइ  नए व्यवसाय की शुरुआत  कर सकते है |दाम्पत्य जीवन सुखमय बीतेगा | परिवर्तन के योग बन रहे है जो भी निर्णय ले सोच समझ कर ले |जल्दबाजी मै कोई निर्णय न ले |

मिथुन राशी 

आर्थिक लाभ ,व्यापारिक लाभ इस दौरान आपको सभी  कार्यों मै सफलता मिलेगी | पारिवारिक कार्यों मे सफलता मिलेगी इस दौरान आप बचत को लेकर काफी प्रेरित रहेंगे लेकिन आर्थिक तौर पे आप को कई परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है | आप इस समय काफी रोमांटिक मूड मे रहेंगे |अपने पार्टनर के साथ अच्छा समय बिताएंगे |पारिवारिक सहयोग भी मिलेगा |प्रेम संबंध और दाम्पत्य जीवन बेहतर रहेगा |

कर्क राशि 

आप का कार्यक्षेत्र में स्थानतरण  होने की पूरी संभावना है |आपको अपने कार्य क्षेत्र मे अधिक परिश्रम करना पढ़ेगा |आर्थिक लाभ की संभावना है लेकिन अधिक परिश्रम के बाद | पारिवारिक माहौल सौहार्द पूर्ण रहेगा |दाम्पत्य जीवन मे प्रेम बना रहेगा |

सिंह राशि 

आपके जीवन में तरक्की के नए आयाम बनेगे आपको आर्थिक लाभ मिलेगे |आपका व्यवहार दूसरों का मन जीत लेगा |वाणी की मधुरता से आप पराए लोगों को भी अपना बनाने का हुनर जानते है |कार्य स्थल पर आपको उपलब्धि प्राप्त होंगी |लेकिन जीवनसाथी और माँ के स्वास्थ्य को लेकर थोड़ी चिंता सताएंगी |

कन्या राशि 

सफलता और आर्थिक लाभ का योग बन रहा है |आपको अपने पार्टनर से भी लाभ मिलेगा और जिन जातकों की शादी की बात चल रही है वो भी तय होने की संभावना है |आप परिवार के साथ कही घूमने का प्रोग्राम बना सकते है |आपको कार्य मै सफलता मिलेगी और मान सम्मान की भी प्राप्ति होगी 

तुला राशि 

कार्य क्षेत्र मे स्थानतरण होने या बदलाव के योग बन रहे है |कोई भी निर्णय सोच समझ कर ले |आपको आर्थिक लाभ प्राप्त होगा |छात्रों के लिए ये समय बहुत बेहतर साबित होगा |जो लोग अविवाहित है वो विवाह मे बंधेगे |काफी रोमांटिक मूड रहेगा इन दिनों |कही घूमने जा सकते है |परिवरिक स्थिति अच्छी बनी रहेगी |मित्रों से मेल जोल बढ़ेगा |

 वृश्चिक राशि  

थोड़े समय के लिए तो कुछ चीजे आपको सुख दे सकती है लेकिन ये सब कुछ समय के लिए गलत काम थोड़े दिन के लिए तो सुख दे सकते है लेकिन ज्यादा समय इन सब चीजों से उम्मीद न करे आप इस समय मै बच्चों के भविष्य के लिए भी चिंतित हो सकते है और उनके साथ कोई वेचरिक मतभेद भी हो सकता है |शत्रु भी आप पर इस समय हावी होगा |

धनु राशि 

आपको जीवनसाथी का सहयोग मिलेगा और दाम्पत्य जीवन मे भी खुशहाली बनी रहेगी |आपके मित्रों का भी विस्तार होगा लेकिन ज्यादा काम करने के चक्कर मे अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही न बरते |आपके व्यपार और नॉकरी मे तरक्की के योग है |आपको मानसिक सुख और शारीरिक सुख दोनों प्राप्त होंगे |आर्थिक लाभ मिलने के योग है |

मकर राशि 

आज आपको कई प्रकार के लाभ मिलेंगे जेसे माता का सुख ,धन लाभ ,विदेश से कोई शुभ समाचार इस दौरान आप यात्रा न करे और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखे | आप बचत के उपर काफी ध्यान देंगे |मित्रों और परिवार का भरपूर सहयोग मिलेगा |व्यपार के कुछ  नए प्रस्ताव मिलेंगे |दाम्पत्य जीवन सुखमय बना रहेगा |

मीन राशि 

दाम्पत्य जीवन परेशानी मै बढ़ सकती  है |दाम्पत्य जीवन मे  काफी उत्तार चढ़ाव देखने को मिलेगा |इस समय जीवन साथी के साथ वाद –विवाद मे न पढे| जीवन साथी के स्वास्थ्य की चिंता सताएगी |आर्थिक नुकसान भी उठाना पढ़ सकता है सतर्क रहे |

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Mata Siddhidatri | माँ सिद्धिदात्री – जाने माता की कथा, मंत्र, पूजा विधि और आरती https://astrodeeva.com/mata-siddhidatri-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87/ https://astrodeeva.com/mata-siddhidatri-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87/#respond Fri, 16 Oct 2020 17:15:47 +0000 https://astrodeeva.com/?p=964 जब-जब संसार में दैत्यों का अत्याचार बढ़ता है और लोगों का धर्म से विश्वास कम होने लगता है तब-तब दुराचारियों का अंत करने दैविय शक्ति का किसी न किसी रूप में पदार्पण होता है। सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति ने इस संसार में अलग- अलग […]

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जब-जब संसार में दैत्यों का अत्याचार बढ़ता है और लोगों का धर्म से विश्वास कम होने लगता है तब-तब दुराचारियों का अंत करने दैविय शक्ति का किसी न किसी रूप में पदार्पण होता है। सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति ने इस संसार में अलग- अलग रूपों में अवतार ले कर जनमानस का कल्याण किया है। माँ दुर्गा के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन मात्र से भक्तों के संकट दूर हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

शास्त्रों में माता के नौ स्वरूप बताए गये है और इन स्वरूपों कि विधिवत सच्चे मन से पूजा करने से शुभ फल प्राप्त होता है। हमने आप को अपने पूर्व लेखों में देवी के प्रथम आठ रूपों (माँ शैलपुत्रीमाँ ब्रह्मचारिणीमाँ चंद्रघंटामाँ कुष्मांडामाँ स्कंदमातामाँ कात्यायनी, माँ कालरात्रि और माँ महागौरी) के बारे में विस्तार से बताया है। इस लेख में हम दुर्गा जी के नवम स्वरूप के बारे में बता रहे है।  देवी अपने नवम स्वरूप में सिद्धिदात्री  के नाम से जानी जाती हैं। देवी के इस स्वरूप के नाम का अर्थ- सिद्धि अर्थात आध्यात्मिक शक्ति और दात्री अर्थात् देने वाली है। सिद्धिदात्री  के नाम का शाब्दिक अर्थ है सिद्धि को प्रदान करने वाली है। इनकी भक्ति से भक्तों के अंदर की बुराइयाँ नष्ट होती हैं और प्रकाश रूपी ज्ञान का संचार होता है। 

माँ सिद्धिदात्री  का स्वरूप 

देवी सिद्धिदात्री का स्वरूप सौम्य एवं आकर्षक है। देवी कमल के पुष्प पर विराजमान है और सिंह की सवारी करती है। इनकी चार भुजाएँ है देवी अपने बाएँ हाथों में कमल का फूल और शंख धारण किए हुए है तथा अपने दाएँ एक हाथ में गदा धारण करती है और दूसरे दाहिने हाथ चक्र धारण किए हुए है। देवी का यह स्वरूप सभी प्रकार की सिद्धि देने वाला है।

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माँ सिद्धिदात्री की कथा 

देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने सभी प्रकार की सिद्धियाँ पाने के लिए देवी सिद्धिदात्री की उपासना की थी। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मांड के प्रारम्भ में भगवान शिव ने सृजन के लिए आदि पराशक्ति की उपासना की थी। लेकिन आदि पराशक्ति का कोई स्वरूप नहीं है इसलिए देवी, भगवान शिव के वाम अंग से सिद्धिदात्री के रूप में प्रकट हुईं हैं। इसलिए भगवान शिव को अर्धनारीश्वर कहा गया। 

माँ सिद्धिदात्री  की पूजा का विधान 

श्री माँ दुर्गा जी के इस नवम रूप में सिद्धिदात्री  की पूजा नवरात्रि के नवे और आख़री दिन होती है। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र की नवमी के दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर, माँ के निमित्त विविध प्रकार की विहित पूजन की सामाग्री को संग्रहित करके पूजा करनी चाहिए। सर्व प्रथम एक चौकी पर माँ सिद्धिदात्री  की तस्वीर या मूर्ति रखें और भक्तिभाव से हवन एवं आरती करें। नवरात्र के नवमी के दिन हवन करना चहिए  हवन करते वक्त सभी देवियों के नाम से आहुति देनी चहिये फिर माता के नाम से आहुति देनी चहिए। अगर हवन के सही श्लोक मालूम न हो तो दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोक मंत्र रूप में हैं अतः सप्तशती के श्लोक वाचन करते हुए आहुति दी जा सकती है। देवी के बीज मंत्र ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नम:” से कम से कम 108 बार आहुति दें। और फिर प्रसाद का भोग लगा कर माँ की आरती करें। 

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माँ सिद्धिदात्री के मंत्र

माँ सिद्धिदात्री  के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप करने का अपना ही महत्व है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है 

ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥

प्रार्थना मंत्र

सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

स्तुति

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान मंत्र

वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
कमलस्थिताम् चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्विनीम्॥
स्वर्णवर्णा निर्वाणचक्र स्थिताम् नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।
शङ्ख, चक्र, गदा, पद्मधरां सिद्धीदात्री भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोला पीन पयोधराम्।
कमनीयां लावण्यां श्रीणकटिं निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्त्रोत

कञ्चनाभा शङ्खचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।
स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालङ्कार भूषिताम्।
नलिस्थिताम् नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोऽस्तुते॥
परमानन्दमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभर्ती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्व वार्चिता, विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥
भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।
भवसागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥
धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनीं।
मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥

कवच मंत्र

ॐकारः पातु शीर्षो माँ, ऐं बीजम् माँ हृदयो।
हीं बीजम् सदापातु नभो गृहो च पादयो॥
ललाट कर्णो श्रीं बीजम् पातु क्लीं बीजम् माँ नेत्रम्‌ घ्राणो।
कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै माँ सर्ववदनो॥

माँ सिद्धिदात्री  की आरती

जय सिद्धिदात्री मां तू सिद्धि की दाता ।

तू भक्तों की रक्षक तू दासों की माता ।।

तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि ।

तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि ।।

कठिन काम सिद्ध करती हो तुम ।

जभी हाथ सेवक के सिर धरती हो तुम ।।

तेरी पूजा में तो ना कोई विधि है ।

तू जगदंबे दाती तू सर्व सिद्धि है ।।

रविवार को तेरा सुमिरन करे जो ।

तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो ।।

तू सब काज उसके करती है पूरे ।

कभी काम उसके रहे ना अधूरे ।।

तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया ।

रखे जिसके सिर पर मैया अपनी छाया ।।

सर्व सिद्धि दाती वह है भाग्यशाली ।

जो है तेरे दर का ही अंबे सवाली ।।

हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा ।

महा नंदा मंदिर में है वास तेरा ।।

मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता ।

भक्ति है सवाली तू जिसकी दाता ।।

https://www.youtube.com/embed/pwCTnGZm4rQ

ज्योतिषीय पहलू

ज्योतिष के अनुसार देवी सिद्धिदात्री  केतु ग्रह को नियंत्रित करती , इसलिए उनकी विधिवत उपासना करने से केतु ग्रह के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।

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Mata Mahagauri | माँ महागौरी – जाने माता की कथा, मंत्र, पूजा विधि और आरती https://astrodeeva.com/mata-mahagauri-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95/ https://astrodeeva.com/mata-mahagauri-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95/#respond Fri, 16 Oct 2020 09:35:24 +0000 https://astrodeeva.com/?p=958 जब-जब संसार में दैत्यों का अत्याचार बढ़ता है और लोगों का धर्म से विश्वास कम होने लगता है तब-तब दुराचारियों का अंत करने दैविय शक्ति का किसी न किसी रूप में पदार्पण होता है। सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति ने इस संसार में अलग- अलग […]

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जब-जब संसार में दैत्यों का अत्याचार बढ़ता है और लोगों का धर्म से विश्वास कम होने लगता है तब-तब दुराचारियों का अंत करने दैविय शक्ति का किसी न किसी रूप में पदार्पण होता है। सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति ने इस संसार में अलग- अलग रूपों में अवतार ले कर जनमानस का कल्याण किया है। माँ दुर्गा के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

शास्त्रों में माता के नौ स्वरूप बताए गये है और इन स्वरूपों कि पूजा करने से लाभ होता है। हमने आप को अपने पूर्व लेखों में देवी के प्रथम सात रूपों (माँ शैलपुत्रीमाँ ब्रह्मचारिणीमाँ चंद्रघंटामाँ कुष्मांडामाँ स्कंदमातामाँ कात्यायनी और माँ कालरात्रि) के बारे में विस्तार से बताया है। इस लेख में हम दुर्गा जी के अष्टम स्वरूप के बारे में बता रहे है।  देवी अपने अष्टम स्वरूप में महागौरी के नाम से जानी जाती हैं। देवी के इस स्वरूप के नाम का अर्थ- महा अर्थात महान और बड़ा है और गौरी अर्थात् गोरी है। महागौरी के नाम का शाब्दिक अर्थ है सबसे गोरी/ सुंदर।

माँ महागौरी का स्वरूप 

देवी महागौरी का वर्ण पूर्णतः गोरा है, इस गौरता की उपमा शंख और चंद्र से दी गई है। इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं। इसलिए इन्हें महागौरी कहा गया है। इनकी चार भुजाएँ है । माता अपने एक बाएँ हाथ में डमरू धारण किए हुए है तथा दूसरा बायां हाथ वर मुद्रा में है। देवी अपने दाएँ एक हाथ में त्रिशूल धारण करती है और दूसरा दाहिना हाथ अभय मुद्रा धारण किए हुए है। देवी महागौरी वृषभ की सवारी करती हैं। 

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माँ महागौरी की कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए देवी ने अपने बाल्यकाल से ही कठोर तपस्या प्रारम्भ की और कई वर्षों के कठोर तप के बाद भगवान शिव प्रसन्न हुए और देवी को अपनी भार्या के रूप में स्वीकार किया। इतने वर्षों की कठोर तपस्या के कारण देवी का शरीर अत्यंत जीर्ण व कमजोर होकर काले रंग का हो गया था। देवी की ऐसी दशा को देख कर भोलेनाथ ने अपने कमंडल से गंगा जल निकाल कर देवी पे छिड़क दिया और देवी को गंगा जल से स्नान करवाया। जिसके प्रभाव व शिव की इच्छा से देवी का वर्ण विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान हो गया। तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा। 

देवी का नाम महागौरी क्यों पड़ा इस पर एक और पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार माता और शिव जी बातें कर रहे थे इसी बीच बातों बातों में भगवान शिव ने माता से कुछ कह दिया। जिसे माता ने अपने मन में लगा लिया और वहाँ से चली गयी और तपस्या में लीन हो गयी। जब माता कई वर्षों तक नहीं लौटी तो भगवान शिव उन्हें खोजने के लिए निकल पड़े। खोजते खोजते शिव वहाँ पहुँच गये जहाँ माता तपस्या में लीन थी। तपस्या के कारण माता का शरीर अति तेज से युक्त हो गया जिसे देख शिव जी में माता को गौरी कह कर संबोधित किया तभी से इन्हें माँ महागौरी के रूप में जाना जाने लगा।

माँ महागौरी की पूजा का विधान 

श्री माँ दुर्गा जी के इस अष्टम रूप में महागौरी की पूजा नवरात्रि के आठवे दिन होती है। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र के आठवे दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर, माँ के निमित्त विविध प्रकार की विहित पूजन की सामाग्री को संग्रहित करके पूजा करनी चाहिए। सर्व प्रथम एक चौकी पर सफ़ेद वस्त्र बिछाकर उस पर महागौरी यंत्र रखें और यंत्र की स्थापना कर माँ महागौरी की पूजा करनी चाहिए। और दुर्गसप्तशती का पाठ करें या ब्राह्मण से करवाएँ। 

दुर्गा पूजा में अष्टमी तिथि का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है। इस दिन महिलाएँ अपने सुहाग के लिए देवी माँ को चुनरी भेंट करती हैं। अष्टमी के दिन कन्या पूजन करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। कन्याओं की संख्या 9 होनी चाहिए। कन्याओं की आयु 2 साल से ऊपर और 10 साल से अधिक न हो। भोजन कराने के बाद कन्याओं को दक्षिणा देनी चाहिए।

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माँ महागौरी के मंत्र

माँ महागौरी के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप करने का अपना ही महत्व है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है:

ॐ देवी महागौर्यै नमः॥

॥ प्रार्थना मंत्र ॥

श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥

॥ स्तुति ॥

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

॥ ध्यान मंत्र ॥

वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढा चतुर्भुजा महागौरी यशस्विनीम्॥
पूर्णन्दु निभाम् गौरी सोमचक्रस्थिताम् अष्टमम् महागौरी त्रिनेत्राम्।
वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् त्रैलोक्य मोहनम्।
कमनीयां लावण्यां मृणालां चन्दन गन्धलिप्ताम्॥

॥ स्त्रोत ॥

सर्वसङ्कट हन्त्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥
सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदायनीम्।
डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यमङ्गल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।
वददम् चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

॥ कवच मंत्र ॥

ॐकारः पातु शीर्षो माँ, हीं बीजम् माँ, हृदयो।
क्लीं बीजम् सदापातु नभो गृहो च पादयो॥
ललाटम् कर्णो हुं बीजम् पातु महागौरी माँ नेत्रम्‌ घ्राणो।
कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा माँ सर्ववदनो॥

॥ माँ महागौरी की आरती ॥

जय महागौरी जगत की माया।
जया उमा भवानी जय महामाया॥

हरिद्वार कनखल के पासा।
महागौरी तेरी वहां निवासा॥

चंद्रकली ओर ममता अंबे।
जय शक्ति जय जय माँ जगंदबे॥

भीमा देवी विमला माता।
कौशिकी देवी जग विख्यता॥

हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा।
महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा॥

सती {सत} हवन कुंड में था जलाया।
उसी धुएं ने रूप काली बनाया॥

बना धर्म सिंह जो सवारी में आया।
तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया॥

तभी माँ ने महागौरी नाम पाया।
शरण आनेवाले का संकट मिटाया॥

शनिवार को तेरी पूजा जो करता।
माँ बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता॥

भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो।
महागौरी माँ तेरी हरदम ही जय हो॥

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ज्योतिषीय पहलू

ज्योतिष के अनुसार देवी महागौरी राहु ग्रह को नियंत्रित करती , इसलिए उनकी विधिवत उपासना करने से राहु ग्रह के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।

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जब-जब संसार में दैत्यों का अत्याचार बढ़ता है और लोगों का धर्म से विश्वास कम होने लगता है तब-तब दुराचारियों का अंत करने दैविय शक्ति का किसी न किसी रूप में पदार्पण होता है। सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति ने इस संसार में अलग- अलग रूपों में अवतार ले कर जनमानस का कल्याण किया है। माँ दुर्गा के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

शास्त्रों में माता के नौ स्वरूप बताए गये है और इन स्वरूपों कि पूजा करने से लाभ होता है। हमने आप को अपने पूर्व लेखों में देवी के प्रथम छःरूपों (माँ शैलपुत्रीमाँ ब्रह्मचारिणीमाँ चंद्रघंटामाँ कुष्मांडामाँ स्कंदमाता और माँ कात्यायनी ) के बारे में विस्तार से बताया है। इस लेख में हम दुर्गा जी के सातवें स्वरूप के बारे में बता रहे है। देवी अपने सातवें स्वरूप में कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। देवी के इस स्वरूप के नाम का अर्थ- काल अर्थात मृत्यु और समय है और रात्रि अर्थात् रात है। कालरात्रि के नाम का शाब्दिक अर्थ है रात/ अंधेरे को ख़त्म करने वाली। 

माँ कालरात्रि का स्वरूप 

देवी कालरात्रि का शरीर रात के अंधकार की तरह कृष्ण वर्ण का है इनके बाल बिखरे हुए हैं तथा इनके गले में विधुत की माला है। इनके चार भुजाएँ है अपनी बाएँ एक हाथ में कटार तथा एक हाथ में खगड धारण किया हुआ है। देवी के दोनो दाहिने हाथ वरमुद्रा और अभय मुद्रा में है। कालरात्रि का वाहन गर्दभ(गधा) है। इनके तीन नेत्र है तथा इनके श्वास से अग्नि निकलती है। ये तीनों ही नेत्र ब्रह्मांड के समान गोल हैं। माँ कालरात्रि भक्तों का हमेशा कल्याण करती हैं, अतः इन्हें शुभंकरी भी कहते हैं।

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माँ कालरात्रि की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार तीनों लोकों में शुम्भ निशुम्भ नामक दानवो ने आतंक मचा रखा था और देवलोक पर दानवो का राज हो गया था। इससे परेशान होकर सभी देवता माँ पार्वती के पास इस समस्या के समाधान के लिए पहुंचे। माँ उस समय अपने घर में स्नान कर रहीं थीं, इसलिए उन्होंने उनकी मदद के लिए चण्डी को भेजा।

जब देवी चण्डी दानवो से युद्ध करने पहुँची तो दानवो की तरफ़ से चण्ड-मुण्ड नामक दानव आए। देवी ने उनका वध किया जिसके कारण उनका नाम चामुंडा पड़ा। इसके बाद रक्तबीज नामक राक्षस आया। उस को वरदान था की जैसे ही उसके रक्त की बूँद धरती पर गिरेगी तो एक नया रक्तबीज उत्पन होगा। तब देवी ने उसे मारकर उसका रक्त पान करने का निर्णय किया और माँ कालरात्रि को उत्पन्न किया। ताकि माँ कालरात्रि रक्तबीज का वध कर उस का सारा रक्तपान कर ले ताकि रक्त की एक बूँद भी धरती पर ना गिरे और नया रक्तबीज उत्पन ना हो सके।

माँ कालरात्रि की पूजा का विधान 

श्री माँ दुर्गा जी के इस सप्तम रूप में माँ कालरात्रि की पूजा नवरात्रि के सातवें दिन होती है। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र के सातवें दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर, माँ के निमित्त विविध प्रकार की विहित पूजन की सामाग्री को संग्रहित करके नवग्रह, दशदिक्पाल, देवी के परिवार में उपस्थित देवी देवता की पूजा करनी चाहिए, फिर मां कालरात्रि की पूजा करनी चाहिए। और दुर्गसप्तशती का पाठ करें या ब्राह्मण से करवाएँ। 

दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है। सप्तमी की पूजा अन्य दिनों की तरह ही होती परंतु रात्रि में विशेष विधान के साथ देवी की पूजा करने का विधान है। इस दिन कहीं कहीं तांत्रिक विधि से पूजा होने पर मदिरा भी देवी को अर्पित कि जाती है। सप्तमी की रात्रि ‘को सिद्धियों’ की रात भी कहा जाता है। इनकी साधना यदि शास्त्रीय विधि से की जाए तो तत्काल फल प्राप्त होता है। इसमे तनिक भी संदेह नहीं हैं। काली कलकत्ते वाली का नाम कौन नहीं जानता? वैसे तो माँ काली की पूजा व अर्चना सम्पूर्ण भारत व विश्व के अन्य देशों में होती है। किन्तु बंगाल व असम में उनकी पूजा बड़े ही धूम-धाम से की जाती है।

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माँ कालरात्रि के मंत्र

माँ कालरात्रि के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप करने का अपना ही महत्व है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है:

ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥

प्रार्थना मंत्र

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोह लताकण्टकभूषणा।
वर्धन मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

स्तुति

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान मंत्र

करालवन्दना घोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिम् करालिंका दिव्याम् विद्युतमाला विभूषिताम्॥
दिव्यम् लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयम् वरदाम् चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम्॥
महामेघ प्रभाम् श्यामाम् तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवम् सचियन्तयेत् कालरात्रिम् सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥

स्त्रोत

हीं कालरात्रि श्रीं कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥
कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥
क्लीं ह्रीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

कवच मंत्र

ऊँ क्लीं मे हृदयम् पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततम् पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥
रसनाम् पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशङ्करभामिनी॥
वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥

माँ कालरात्रि की आरती

कालरात्रि जय-जय-महाकाली।
काल के मुह से बचाने वाली॥

दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा।
महाचंडी तेरा अवतार॥

पृथ्वी और आकाश पे सारा।
महाकाली है तेरा पसारा॥

खडग खप्पर रखने वाली।
दुष्टों का लहू चखने वाली॥

कलकत्ता स्थान तुम्हारा।
सब जगह देखूं तेरा नजारा॥

सभी देवता सब नर-नारी।
गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥

रक्तदंता और अन्नपूर्णा।
कृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥

ना कोई चिंता रहे बीमारी।
ना कोई गम ना संकट भारी॥

उस पर कभी कष्ट ना आवें।
महाकाली माँ जिसे बचाबे॥

तू भी भक्त प्रेम से कह।
कालरात्रि माँ तेरी जय॥

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ज्योतिषीय पहलू

ज्योतिष के अनुसार देवी कालरात्रि शनि ग्रह को नियंत्रित करती , इसलिए उनकी विधिवत उपासना करने से शनि के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।

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Mata Katyayani | माँ कात्यायनी – जाने माता की कथा, मंत्र, पूजा विधि और आरती https://astrodeeva.com/mata-katyayani-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4/ https://astrodeeva.com/mata-katyayani-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4/#comments Tue, 13 Oct 2020 04:08:49 +0000 https://astrodeeva.com/?p=935 जब-जब संसार में दैत्यों का अत्याचार बढ़ता है और लोगों का धर्म से विश्वास कम होने लगता है तब-तब दुराचारियों का अंत करने दैविय शक्ति का किसी न किसी रूप में पदार्पण होता है। सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति ने इस संसार में अलग- अलग […]

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जब-जब संसार में दैत्यों का अत्याचार बढ़ता है और लोगों का धर्म से विश्वास कम होने लगता है तब-तब दुराचारियों का अंत करने दैविय शक्ति का किसी न किसी रूप में पदार्पण होता है। सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति ने इस संसार में अलग- अलग रूपों में अवतार ले कर जनमानस का कल्याण किया है। माँ भवानी के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

शास्त्रों में माता के नौ स्वरूप है और इन स्वरूपों कि पूजा करने से लाभ होता है। वो अपने छठे स्वरूप में कात्यायनी के नाम से जानी जाती हैं। देवी ने यह रूप महिषासुर नामक राक्षक का वध करने के लिए धारण किया था। माँ कात्यायनी को उनके हिंसक रूप के कारण युद्ध की देवी भी कहा जाता है।

माँ कात्यायनी का स्वरूप

माँ कात्यायनी शेर पे सवार हैं। इनकी चार भुजाएँ है ये अपने बाएँ एक हाथ ने कमल और दूसरे बाएँ हाथ में तलवार धारण करती हैं वहीं माता अपने दाएँ एक हाथ में अभय मुद्रा और दूसरे हाथ से माँ सब को आशीर्वाद प्रदान करती है। 

माँ कात्यायनी की कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार प्रसिद्ध महर्षि  कात्यायन ने अनेक वर्षों तक भगवती पराम्बा की कठिन तपस्या की और उन्होंने भगवती को प्रसन्न कर उन्हें अपने घर में पुत्री रूप में जन्म लेने का वरदान माँगा। माता ने उनकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न हो कर उनकी यह इच्छा स्वीकार कर ली और देवताओं, ऋषियों के संकट दूर करने हेतु महर्षि कात्यायन के घर अश्विन कृष्णचतुर्दशी के दिन पुत्री रूप में जन्म लिया। इसलिए माता का नाम कात्यायनी पड़ा। 

कुछ समय पश्चात जब पूरी दुनिया में महिषासुर नामक राक्षस ने अपना उत्पात व तांडव मचाया था तब देवी ने दशमी के दिन महिषासुर का वध कर देवों और ऋषियों को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया। 

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माँ कात्यायनी की पूजा का विधान 

श्री माँ दुर्गा जी के इस छठे रूप में माँ कात्यायनी  की पूजा नवरात्रि के छठवें दिन होती है। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र के छठवें दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर, माँ के निमित्त विविध प्रकार की विहित पूजन की सामाग्री को संग्रहित करके भक्ति-भाव से पूजन करना चहिये और दुर्गसप्तशती का पाठ करें या ब्राह्मण से करवाएँ। माँ को केले का भोग लगना चहिये।

माँ कात्यायनी की पूरे भक्ति भाव से पूजा करने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है तथा शारीरिक बल और समृद्ध होता है। भक्त रोग और भय से मुक्त होता है तथा प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष शत्रुओं से छुटकारा प्राप्त करता है। 

ऐसी भी मान्यता है की ब्रज की गोपियों ने भगवान कृष्ण को प्रियतम के रूप में पाने के लिए माँ कात्यायनी की पूजा कालिंदी यमुनाके तट पर की थी। 

माँ कात्यायनी के मंत्र

माँ कात्यायनी के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप किए जाने का विधान है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है 

ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥

Must Read: दुर्गा सप्तशती सम्पूर्ण पाठ का फल पायें इस एक मंत्र के जाप से।Durga Saptashati

प्रार्थना मंत्र

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥

स्तुति

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान

वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्विनीम्॥
स्वर्णवर्णा आज्ञाचक्र स्थिताम् षष्ठम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम्॥

माँ कात्यायनी की स्तोत्र पाठ (Mata Katyayani Stotra)

कञ्चनाभां वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखी शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोऽस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालङ्कार भूषिताम्।
सिंहस्थिताम् पद्महस्तां कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
परमानन्दमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभर्ती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्वाचिन्ता, विश्वातीता कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
कां बीजा, कां जपानन्दकां बीज जप तोषिते।
कां कां बीज जपदासक्ताकां कां सन्तुता॥
कांकारहर्षिणीकां धनदाधनमासना।
कां बीज जपकारिणीकां बीज तप मानसा॥
कां कारिणी कां मन्त्रपूजिताकां बीज धारिणी।
कां कीं कूंकै क: ठ: छ: स्वाहारूपिणी॥

माँ कात्यायनी की कवच ( Mata Katyayani Kavach)

कात्यायनौमुख पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी हृदयम् पातु जया भगमालिनी॥

|| माँ कात्यायनी की आरती ||

जय कात्यायनी माँ, मैया जय कात्यायनी माँ ।
उपमा  रहित  भवानी,   दूँ   किसकी  उपमा ॥
मैया जय कात्यायनी….

गिरजापति शिव का तप, असुर रम्भ कीन्हाँ ।
वर-फल जन्म रम्भ  गृह,  महिषासुर  लीन्हाँ ॥
मैया जय कात्यायनी….

कर  शशांक-शेखर   तप,  महिषासुर   भारी ।
शासन   कियो   सुरन  पर,  बन   अत्याचारी ॥
मैया जय कात्यायनी….

त्रिनयन  ब्रह्म  शचीपति,  पहुँचे, अच्युत  गृह ।
महिषासुर   बध   हेतू,   सुर   कीन्हौं   आग्रह ॥
मैया जय कात्यायनी….

सुन  पुकार  देवन मुख,  तेज  हुआ  मुखरित ।
जन्म लियो कात्यायनी, सुर-नर-मुनि के हित ॥
मैया जय कात्यायनी….

अश्विन कृष्ण-चौथ  पर,  प्रकटी  भवभामिनि ।
पूजे  ऋषि   कात्यायन,  नाम  काऽऽत्यायिनि ॥
मैया जय कात्यायनी….

अश्विन  शुक्ल-दशी    को,   महिषासुर  मारा ।
नाम   पड़ा   रणचण्डी,   मरणलोक    न्यारा ॥
मैया जय कात्यायनी….

दूजे      कल्प    संहारा,    रूप     भद्रकाली ।
तीजे    कल्प    में    दुर्गा,   मारा   बलशाली ॥
मैया जय कात्यायनी….

दीन्हौं पद  पार्षद  निज,  जगतजननि  माया ।
देवी   सँग    महिषासुर,  रूप   बहुत   भाया ॥
मैया जय कात्यायनी….

उमा     रमा     ब्रह्माणी,    सीता    श्रीराधा ।
तुम  सुर-मुनि  मन-मोहनि, हरिये  भव-बाधा ॥
मैया जय कात्यायनी….

जयति   मङ्गला  काली,  आद्या  भवमोचनि ।
सत्यानन्दस्वरूपणि,        महिषासुर-मर्दनि ॥
मैया जय कात्यायनी….

जय-जय  अग्निज्वाला,   साध्वी   भवप्रीता ।
करो  हरण   दुःख   मेरे,   भव्या    सुपुनीता॥
मैया जय कात्यायनी….

अघहारिणि भवतारिणि, चरण-शरण  दीजै ।
हृदय-निवासिनि    दुर्गा,   कृपा-दृष्टि  कीजै ॥
मैया जय कात्यायनी….

ब्रह्मा  अक्षर  शिवजी,  तुमको   नित  ध्यावै ।
करत ‘अशोक’ नीराजन, वाञ्छितफल पावै॥
मैया जय कात्यायनी….

(आरती रचना-अशोक कुमार खरे)

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ज्योतिषीय पहलू

ज्योतिष के अनुसार देवी कात्यायनि बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करती , इसलिए उनकी विधिवत उपासना करने से बृहस्पति के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।

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Mata Skandmata | माँ स्कंदमाता- जाने माता के मंत्र, पूजा विधि और आरती https://astrodeeva.com/mata-skandmata-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4/ https://astrodeeva.com/mata-skandmata-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4/#comments Sat, 10 Oct 2020 09:12:53 +0000 https://astrodeeva.com/?p=917 सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। माँ अपने हर रूप में अपने भक्तों का कल्याण करती है। माँ भवानी के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति के नौ […]

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सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। माँ अपने हर रूप में अपने भक्तों का कल्याण करती है। माँ भवानी के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति के नौ स्वरूप है और इन स्वरूपों कि पूजा करने से लाभ होता है। वो अपने पांचवें स्वरूप में स्कंदमाता के नाम से जानी जाती हैं। माता के इस रूप का शाब्दिक अर्थ है स्कंद मतलब भगवान कार्तिकेय/मुरुगन और माता मतलब माता है, अतः इनके नाम का मतलब स्कंद की माता है। 

माँ स्कंदमाता का स्वरूप 

माता का यह ममतामयी स्वरूप है शास्त्रों के अनुसार इनकी चार भुजाएँ हैं। माँ ने एक हाथ से अपने पुत्र भगवान कार्तिकेय(स्कंद) को अपने गोद में बैठाया हुआ है, दो भुजाओं में माँ कमल के फूल को धारण किये हुए है और एक भुजा से अपने भक्तों को आशीर्वाद प्रदान कर रही हैं। माँ शक्ति अपने इस रूप से संदेश देती है की वो अपना वात्सल्य सभी को एक समान प्रदान करती है परंतु अगर कोई उनके संतान/भक्त को किसी प्रकार का कष्ट देता है तो माँ उग्र रूप में आकर दुष्टों का संहार भी करती हैं।

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माँ स्कंदमाता की पूजा का विधान 

श्री माँ दुर्गा जी के इस पंचम रूप में माँ स्कंदमाता  की पूजा नवरात्रि के पाँचवें दिन होती है। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र के पाँचवें दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर, माँ के निमित्त विविध प्रकार की विहित पूजन की सामाग्री को संग्रहित करके भक्ति-भाव से पूजन करना चहिये और दुर्गसप्तशती का पाठ करें या ब्राह्मण से करवाएँ। माँ को केले का भोग लगना चहिये।

माँ स्कंदमाता की पूजा करने से भगवान स्कंद की पूजा भी स्वतः हो जाती है। जो भक्त भक्ति-भाव से माता की पूजा आराधना करता है तो माँ उसे ज्ञान, शक्ति और समृद्धि प्रदान करती है। 

माँ स्कंदमाता के मंत्र (Mata Skandmata Mantra)

माँ स्कंदमाता के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप किए जाने का विधान है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है 

ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥

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प्रार्थना मंत्र

सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चित करद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

स्तुति

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।
धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥

स्कंदमाता की स्तोत्र पाठ (Mata Skandmata Stotra)

नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।
समग्रतत्वसागररमपारपार गहराम्॥
शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्।
ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रीन्तिभास्कराम्॥
महेन्द्रकश्यपार्चिता सनंतकुमाररसस्तुताम्।
सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलादभुताम्॥
अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्।
मुमुक्षुभिर्विचिन्तता विशेषतत्वमुचिताम्॥
नानालंकार भूषितां मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्।
सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेन्दमारभुषताम्॥
सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्रकौरिघातिनीम्।
शुभां पुष्पमालिनी सुकर्णकल्पशाखिनीम्॥
तमोन्धकारयामिनी शिवस्वभाव कामिनीम्।
सहस्त्र्सूर्यराजिका धनज्ज्योगकारिकाम्॥
सुशुध्द काल कन्दला सुभडवृन्दमजुल्लाम्।
प्रजायिनी प्रजावति नमामि मातरं सतीम्॥
स्वकर्मकारिणी गति हरिप्रयाच पार्वतीम्।
अनन्तशक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्तिमुक्तिदाम्॥
पुनःपुनर्जगद्वितां नमाम्यहं सुरार्चिताम्।
जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवीपाहिमाम्॥


स्कंदमाता की कवच ( Mata Skandmata Kavach)

ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा।
हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥
श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।
सर्वांग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा॥
वाणंवपणमृते हुं फ्ट बीज समन्विता।
उत्तरस्या तथाग्नेव वारुणे नैॠतेअवतु॥
इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी।
सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥

माँ स्कंदमाता की आरती :

जय तेरी हो स्कन्द माता। पांचवां नाम तुम्हारा आता॥

सबके मन की जानन हारी। जग जननी सबकी महतारी॥

तेरी जोत जलाता रहूं मैं। हरदम तुझे ध्याता रहूं मै॥

कई नामों से तुझे पुकारा। मुझे एक है तेरा सहारा॥

कही पहाड़ों पर है डेरा। कई शहरों में तेरा बसेरा॥

हर मन्दिर में तेरे नजारे। गुण गाए तेरे भक्त प्यारे॥

भक्ति अपनी मुझे दिला दो। शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो॥

इन्द्र आदि देवता मिल सारे। करे पुकार तुम्हारे द्वारे॥

दुष्ट दैत्य जब चढ़ कर आए। तू ही खण्ड हाथ उठाए॥

दासों को सदा बचाने आयी। भक्त की आस पुजाने आयी॥

ज्योतिषीय पहलू

ज्योतिष के अनुसार देवी स्कंदमाता बुध ग्रह को नियंत्रित करती , इसलिए उनकी विधिवत उपासना करने से बुध  के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।

 

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Mata Chandraghanta | माँ चंद्रघंटा- जाने माता की कथा, मंत्र, पूजा विधि और आरती https://astrodeeva.com/mata-chandraghanta-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%9a%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%98%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4/ https://astrodeeva.com/mata-chandraghanta-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%9a%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%98%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4/#respond Tue, 06 Oct 2020 12:23:15 +0000 https://astrodeeva.com/?p=891 माँ आदिशक्ति सम्पूर्ण जगत का कल्याण करती है| माँ भवानी के नौ के नौ रूप इतने कल्याणकारी है की इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते है और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है | मार्कडेंय पुराण के अनुसार माँ आदिशक्ति के नौ स्वरूप है और वो अपने तीसरे स्वरूप मे […]

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माँ आदिशक्ति सम्पूर्ण जगत का कल्याण करती है| माँ भवानी के नौ के नौ रूप इतने कल्याणकारी है की इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते है और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है |

मार्कडेंय पुराण के अनुसार माँ आदिशक्ति के नौ स्वरूप है और वो अपने तीसरे स्वरूप मे चंद्रघंटा के नाम से जानी जाती है | नवरात्र के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है | शिव महा पुराण के अनुसार देवी चंद्र घंटा माँ पार्वती का विवाहित रूप है|  माँ पार्वती के विवाह के बाद  माँ पार्वती ने अपने मस्तक को अर्ध चंद्रमा से सजाना शुरू कर दिया  इसलिए वह चंद्रघंटा के रूप मे लोकप्रिय हुई | देवी चंद्रघंटा को क्षमा और शांति की देवी के रूप मे पूजा जाता है | माँ चंद्रघंटा की दस भजाएँ है और माता इनमे अस्त्र -शस्त्र धारण किये रहती हैं। दाहिने हाथो मे त्रिशूल ,गदा, तलवार और कमंडल होता हैतथा वरण पाँचवे हाथ में तथा बाएं हाथों मे कमल का फूल तीर ,धनुष और पाँचवे हाथ मे अभय मुद्रा | सिंह पर सवार इस देवी की मुद्रा युद्ध मे एक वीरांगना के समान है जिससे दानव –दैत्य भी कापते है |

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माँ चंद्रघंटा की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार देवताओं और असुरों के बीच घमासान युद्ध हुआ। देवताओं का नेतृत्व गेवराज इंद्र ने किया और असुरों का नेतृत्व महिषासुर ने किया। इस युद्ध में असुरों ने देवताओं को परास्त कर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। महिषासुर स्वर्ग पर राज करने लगा और देवताओं को प्रताड़ित करने लगा। उस से छुटकारा और इंद्र अपना स्वर्ग पुनः पाने के लिए भगवान बिष्णु, ब्रह्मा और शिव जी के पास गये और उन को सब हाल विस्तार से बता कर मदद की गुहार लगायी। 

देवताओं द्धारा महिषासुर के अत्याचारों के बारे में सुन भगवान बिष्णु, ब्रह्मा और शिव जी को अत्यंत क्रोध आया। उस क्रोध के कारण तीनो के मुख से ऊर्जा उत्पन्न हुई और एक में मिल गयी। इस ऊर्जा से देवी का अवतरण हुआ। इस देवी को भगवान शिव ने त्रिशुल, भगवान विष्णु ने चक्र और अन्य सभी देवी-देवताओं ने शस्त्र प्रदान किए। इस सभी शस्त्रों से सज्जित को कर माँ चंद्रघंटा ने महिषासुर समेत सभी दानवों का वध कर स्वर्गलोक को मुक्त कराया। 

माँ चंद्रघंटा की पूजा का विधान

माँ चंद्रघंटा श्री दुर्गा जी का तीसरा स्वरूप है | इनकी पूजा बड़े विधि विधान से करनी चाहिए अतः नवरात्र के तीसरे दिन ब्रह्म मुहुर्त मे उठकर नियमित कार्यों से निर्वित होकर माँ की पूजा करनी चाहिए | इसके बाद माँ चंद्रघंटा को सिंदूर ,अक्षत ,सूंघनधित धूप ,इत्र ,चमेली का पुष्प अर्पित करे | इसके बाद माता को दूध या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाए |

माँ चंद्रघंटा के मंत्र 

ध्यान मंत्र 

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

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स्तोत्र पाठ

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥

कवच

रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्वसिध्दिदायकम्॥
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दा बिना होमं।
स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥

माँ चंद्रघंटा की आरती

जय मां चंद्रघंटा सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे सभी काम।

चंद्र समान तुम शीतल दाती। चंद्र तेज किरणों में समाती।।

क्रोध को शांत करने वाली। मीठे बोल सिखाने वाली।

मन की मालक मन भाती हो। चंद्र घंटा तुम वरदाती हो।।

सुंदर भाव को लाने वाली। हर संकट मे बचाने वाली।

हर बुधवार जो तुझे ध्याये। श्रद्धा सहित जो विनय सुनाएं।।

मूर्ति चंद्र आकार बनाएं। सन्मुख घी की ज्योत जलाएं।

शीश झुका कहे मन की बाता। पूर्ण आस करो जगदाता।।

कांची पुर स्थान तुम्हारा। करनाटिका में मान तुम्हारा।

नाम तेरा रटू महारानी। भक्त की रक्षा करो भवानी।।

ज्योतिष पहलू 

ज्योतिष के अनुसार माँ चंद्रघंटा शुक्र ग्रह को नियंत्रित करती है इसलिए इनकी विधिवत उपासना करने से शुक्र ग्रह के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते है |

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Mata Brahmacharini | माँ ब्रह्मचारिणी- जाने माता की कथा, मंत्र, पूजा विधि और आरती https://astrodeeva.com/mata-brahmacharini-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a3%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87/ https://astrodeeva.com/mata-brahmacharini-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a3%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87/#comments Fri, 02 Oct 2020 05:21:19 +0000 https://astrodeeva.com/?p=873 माँ आदिशक्ति सम्पूर्ण जगत का कल्याण करती है। माँ भवानी के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार माँ आदिशक्ति के नौ स्वरूप है और वो अपने दूसरे स्वरूप में ब्रह्मचारिणी के नाम से जानी जाती हैं। […]

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माँ आदिशक्ति सम्पूर्ण जगत का कल्याण करती है। माँ भवानी के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार माँ आदिशक्ति के नौ स्वरूप है और वो अपने दूसरे स्वरूप में ब्रह्मचारिणी के नाम से जानी जाती हैं। नवरात्र के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। भक्त एवं योगी इस दिन माँ के चरणों में अपना मन लगाते हैं। ब्रह्म का शाब्दिक अर्थ होता है तपस्या और चारिणी का अर्थ होता है आचरण करने वाली। अतः ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। जो माता के रूप में सीधा दिखता है। माँ ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में जप की माला और बाएँ हाथ में कमंडल रहता है। 

माँ ब्रह्मचारिणी की कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया। देवऋषि नारद ने इनकी कुंडली देख कर बताया कि इस कन्या का विवाह तो त्रिलोक के स्वामी भगवान शंकर से होगा। यह सुन देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने की इच्छा अपने माता-पिता के सामने व्यक्त की। देवी की यह इच्छा सुन उनके माता-पिता को चिंता हुई और उन्होंने देवी को हतोत्साहित करने की पुरजोर कोशिश की परंतु देवी ने तो भोलेनाथ को पति के रूप में पाने दृढ़ निश्चय कर लिया था। 

देवी ने भगवान शंकर को पाने के लिए कठोर तपस्या की। उन्होंने एक हजार वर्ष तक केवल फल-फूल का सेवन किया तथा एक सौ वर्ष तक केवल शाक पर निर्वाह किया। देवी ने कई हजार वर्ष तक निर्जला तप किया। इस कठोर तपस्या करने के कारण ही देवी को तपश्चारिणी के नाम से भी जाना जाता है। अंत में देवी भगवान शिव को मनाने में सफल हुई और शिव जी ने उनसे विवाह किया। 

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माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा का विधान 

माँ ब्रह्मचारिणी श्री दुर्गा जी का दूसरा रूप हैं। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र के दूसरे दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर माँ की पूजा करनी चहिये।  

देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें-

इधाना कदपद्माभ्याममक्षमालाक कमण्डलु । देवी प्रसिदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्त्मा ।।

इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भांति भांति के फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें, देवी को लाल फूल अति पसंद है। 

माँ ब्रह्मचारिणी के मंत्र

माँ ब्रह्मचारिणी के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप किए जाने का विधान है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है। 

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

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ध्यान मंत्र 

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥
परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

कवच

त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

मंत्र, स्तोत्र पाठ और कवच के जाप के साथ घी एवं  कपूर मिलाकर देवी की आरती करें। 

माँ ब्रह्मचारिणी की आरती:

जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता। जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।

ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो।।

ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा। जिसको जपे सकल संसारा।

जय गायत्री वेद की माता। जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।।

कमी कोई रहने न पाए। कोई भी दुख सहने न पाए।

उसकी विरति रहे ठिकाने। जो ​तेरी महिमा को जाने।।

रुद्राक्ष की माला ले कर। जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।

आलस छोड़ करे गुणगाना। मां तुम उसको सुख पहुंचाना।।

ब्रह्माचारिणी तेरो नाम। पूर्ण करो सब मेरे काम।

भक्त तेरे चरणों का पुजारी। रखना लाज मेरी महतारी।।

आरती करने के उपरांत  दोनों हाथ जोड़कर सभी देवी देवताओं को प्रणाम करें और नीचे दिए मंत्र के द्वारा क्षमा प्रार्थना करें-
“आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं, पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी”

ज्योतिषीय पहलू

ज्योतिष के अनुसार माँ ब्रह्मचारिणी मंगल ग्रह को नियंत्रित करती हैंइसलिए उनकी विधिवत से उपासना करने से मंगल ग्रह के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।

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