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भारतीय हिन्दू संस्कृति विविधताओं से पूर्ण है इसमें जन मानस के कल्याण के लिए अनेक प्रकार के व्रत-उपवास करने का प्रावधान हैं। इन सभी व्रत-उपवासो में एकादशी व्रत को सर्वोतम माना गया है। हिंदू पंचाग के अनुसार हर हिंदू माह में दो पक्ष होते है शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहा जाता है और इस दिन भक्त भगवान विष्णु से आशीर्वाद प्राप्त कसने की लिए उपवास रखते हैं। एकादशी का व्रत तीन दिन तक चलता है। भक्त उपवास के दिन से एक दिन पहले दोपहर में भोजन लेते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अगले दिन पेट में कोई अवशिष्ट भोजन नहीं है। भक्त एकादशी के दिन कड़ा उपवास रखते हैं और अगले दिन सूर्योदय के बाद ही उपवास तोड़ते हैं। एकादशी व्रत के दौरान सभी प्रकार के अनाज और अनाज का सेवन वर्जित होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो भक्त एकादशी का व्रत नियमित रूप से रखते हैं उनपर भगवान् श्री नारायण की कृपा सदैव बनी रहती हैं।

पुत्रदा एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत आमतौर पर विवाहित जोड़ों द्वारा संतान प्राप्ति के लिए किया जाता हैं। विवाहित जोड़े जो संतान की चाहत रखते हैं, पुत्रदा एकादशी व्रत का पालन करते हैं और भगवान विष्णु का दिव्य आशीर्वाद पाने के लिए इस त्योहार से जुड़े विभिन्न अनुष्ठान भी करते हैं। पुत्रदा एकादशी साल में दो बार मनाई जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार पहली पुत्रदा एकादशी पौष माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनायी जाती है इसे पौष पुत्रदा एकादशी या पौष शुक्ल पुत्रदा एकादशी कहा जाता है, जिसे अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार जनवरी या दिसंबर महीने में मनाया जाता है। और दूसरी पुत्रदा एकादशी श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनायी जाती है और इसे श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है जो इंग्लिश कैलेंडर वर्ष के अनुसार जुलाई या अगस्त के महीने में आती है।

पुत्रदा एकादशी का महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल के समय श्री कृष्ण ने अर्जुन के पूछने पर पुत्रदा एकादशी का महत्व बताते हुए कहा था। “हे अर्जुन! संसार में पुत्रदा एकादशी उपवास के समान अन्य दूसरा व्रत नहीं है। इसके पुण्य से प्राणी तपस्वी, विद्वान और धनवान बनता है। पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का उपवास करना चाहिए पुत्र प्राप्ति के लिए इससे बढ़कर दूसरा कोई व्रत नहीं है। जो कोई व्यक्ति पुत्रदा एकादशी के माहात्म्य को पढ़ता व श्रवण करता है तथा विधानानुसार इसका उपवास करता है, उसे सर्वगुण सम्पन्न पुत्ररत्न की प्राप्ति होती है। श्रीहरि की अनुकम्पा से वह मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है।”

पुत्रदा एकादशी की कथा

पुत्रदा एकादशी की महत्ता सुन अर्जुन के मन में और जिज्ञासा जाग उठी और उस ने भगवान श्री कृष्ण से कहा – हे कमलनयन! आप कृप्या कर इस व्रत की कथा भी मुझे विस्तारपूर्वक बताएं।

श्रीकृष्ण ने कहा– “हे पाण्डुनंदन! इस एकादशी से सम्बंधित जो कथा प्रचलित है, उसे मैं तुम्हें सुनाता हूँ, श्रद्धापूर्वक श्रवण करो-

प्राचीन समय में भद्रावती नगरी में सुकेतुमान नाम का एक राजा राज्य करता था। उसके कोई संतान नहीं थी। उसकी पत्नी का नाम शैव्या था। पुत्र ना होने के कारण राजा के मन में इस बात की बड़ी चिंता थी कि उसके बाद उसे और उसके पूर्वजों को कौन पिंडदान देगा। राजा रात-दिन इसी चिंता में घुला करता था। इस चिंता के कारण एक दिन वह इतना दुखी हो गया कि उसके मन में अपने शरीर को त्याग देने की इच्छा उत्पन्न हुई , किंतु वह सोचने लगा कि आत्महत्या करना तो महापाप है, अतः उसने इस विचार को मन से निकाल दिया। एक दिन इन्हीं विचारों में डूबा हुआ वह घोड़े पर सवार होकर वन को चल दिया।

घोड़े पर सवार राजा वन, पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा। उसने वन में देखा कि मृग, बाघ, सिंह, बंदर आदि विचरण कर रहे हैं। हाथी शिशुओं और हथिनियों के बीच में विचर रहा है। उस वन में राजा ने देखा कि कहीं तो सियार कर्कश शब्द निकाल रहे हैं और कहीं मोर अपने परिवार के साथ नाच रहे हैं। वन के दृश्यों को देखकर राजा और ज्यादा दुखी हो गया कि उसके पुत्र क्यों नहीं हैं? इसी सोच-विचार में दोपहर हो गई। वह सोचने लगा कि मैंने अनेक यज्ञ किए हैं और ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन करा सामर्थ्य के अनुसार दान दक्षिण दी है, किंतु फिर भी मुझे यह दुख क्यों मिल रहा है? आखिर इसका कारण क्या है? मैं अपनी व्यथा किससे कहूं? और कौन मेरी व्यथा का समाधान कर सकता है?

अपने विचारों में खोए राजा को प्यास लगी। वह पानी की तलाश में आगे बढ़ा। कुछ दूर जाने पर उसे एक सरोवर मिला। उस सरोवर में कमल पुष्प खिले हुए थे। सारस, हंस, घड़ियाल आदि जल-क्रीड़ा में मग्न थे। सरोवर के चारों तरफ ऋषियों के आश्रम बने हुए थे। अचानक राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे। इसे शुभ शगुन समझकर राजा मन में प्रसन्न होता हुआ घोड़े से नीचे उतरा और सरोवर के किनारे बैठे हुए ऋषियों को प्रणाम करके उनके पूछा ‘हे विप्रो! आप कौन हैं? और किसलिए यहां रह रहे हैं?’

ऋषि बोले – ‘राजन! आज पुत्र की इच्छा करने वालो को श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करने वाली पुत्रदा एकादशी है। आज से पांच दिन बाद माघ स्नान है और हम सब इस सरोवर में स्नान करने आए हैं।’

ऋषियों की बात सुन राजा ने कहा – ‘हे मुनियो! मेरा भी कोई पुत्र नहीं है, कृपा कर मुझे भी इस एकादशी व्रत के बारे में बताएं।

ऋषि बोले – ‘हे राजन! आज पुत्रदा एकादशी है। आप इसका उपवास करें। भगवान श्रीहरि की अनुकम्पा से आपके घर अवश्य ही पुत्र होगा।’

राजा ने मुनि के वचनों के अनुसार उस दिन उपवास किया और द्वादशी को व्रत का पारण किया और ऋषियों को प्रणाम कर उन का आशीर्वाद प्राप्त कर वापस अपनी नगरी आ गया। भगवान श्रीहरि की कृपा से कुछ दिनों बाद ही रानी ने गर्भ धारण किया और नौ माह के पश्चात उसने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। यह राजकुमार बड़ा होने पर अत्यंत वीर, धनवान, यशस्वी और प्रजापालक बना।

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पुत्रदा एकादशी व्रत विधि

पद्म पुराण के अनुसार एकादशी व्रत उत्तम फल देने वाला है और पुत्रदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु और देवी एकादशी की पूजा का विधान है। इस दिन जो भक्त विधि-विधान से व्रत कर पारण करता है उसके सारे कष्ट दूर हो जाते है और उसे जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

  • एकादशी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
  • इसके बाद धूप, दीप, नैवेद्य आदि सोलह सामग्री से षोडशोपचार पूजा करे |
  • एकादशी की रात भगवान विष्णु का भजन- कीर्तन करना चाहिए और अपने पापो के लिए क्षमा याचना करनी चाहिए ।
  • एकादशी की रात्रि को जागरण करना चहिये।
  • अगली सुबह पुनः भगवान श्रीकृष्ण की पूजा कर ब्राह्मणो को भोजन कराना चाहिए।
  • भोजन के बाद ब्राह्मण को क्षमता के अनुसार दान दे देकर विदा करना चाहिए। उसके बाद ही अपना व्रत खोलना चाहिए |

संतान की कामना के लिए क्या करें ?

  • प्रातः काल पति-पत्नी दोनों संयुक्त रूप से भगवान श्री कृष्ण की उपासना करें
  • संतान गोपाल मंत्र का जाप करें।
  • मंत्र जाप के बाद पति-पत्नी प्रसाद ग्रहण करें।
  • गरीबों को श्रद्धानुसार दक्षिणा दें और उन्हें भोजन कराएँ।

पुत्रदा एकादशी के मंत्र

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Safla Ekadashi: सफला एकादशी- सभी कार्यों में सफलता दिलाने वाली एकादशी https://astrodeeva.com/safla-ekadashi-%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82/ https://astrodeeva.com/safla-ekadashi-%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82/#comments Fri, 04 Dec 2020 11:14:10 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1461 हिन्दू संस्कृति विविधताओं से पूर्ण है इसलिए इसमें व्रत-उपवास, तीज-त्यौहार के अनेक मौके भी आते हैं। हिंदू पंचाग के अनुसार पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को विधिनुसार उपवास रखकर भक्त अपनी हर मनोकामना पूर्ण होने की उम्मीद कर सकते हैं। इस उपवास के बाद हर काम में भक्तों को सफलता मिलती है, इसलिए […]

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हिन्दू संस्कृति विविधताओं से पूर्ण है इसलिए इसमें व्रत-उपवास, तीज-त्यौहार के अनेक मौके भी आते हैं। हिंदू पंचाग के अनुसार पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को विधिनुसार उपवास रखकर भक्त अपनी हर मनोकामना पूर्ण होने की उम्मीद कर सकते हैं। इस उपवास के बाद हर काम में भक्तों को सफलता मिलती है, इसलिए इसे सफला एकादशी व्रत कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो भक्त एकादशी का व्रत नियमित रूप से रखते हैं उनपर भगवान् श्री नारायण की कृपा सदैव बनी रहती हैं।

सफला शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है सफल होना। अत: जो लोग अपने जीवन में सफलता चाहते हैं, उनके द्वारा एकादशी के व्रत का पालन करना अत्यधिक लाभकारी होता है। सफला एकादशी का अर्थ सौभाग्य, भाग्य, धन, समृद्धि, सफलता और वृद्धि के द्वार खोलने का संकेत है।

सफला एकादशी का महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार अर्जुन ने जिज्ञासा से श्री कृष्ण से पूछा – हे मधुसूदन! मैंने पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में बहुत सुना है, आप कृपा कर मुझे इस के महत्व को विस्तार पूर्वक बताइये।

अर्जुन की इस जिज्ञासा को सुन भगवान कृष्ण बोले- हे धनुर्धर अर्जुन! तुम मुझे अति प्रिय हो इसी प्रेम के कारण में तुम्हें मना नहीं कर पाता। में तुम्हारे इस प्रश्न का विस्तार से उत्तर देता हूँ। जिस तरह नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरूड़, ग्रहों में सूर्य-चन्द्र, यज्ञों में अश्वमेध और देवताओं में भगवान विष्णु श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार व्रतों में एकादशी व्रत श्रेष्ठ है। पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम ‘सफला’ है। इस एकादशी के आराध्य देव नारायण हैं। इस एकादशी के द्वारा भगवान विष्णु को शीघ्र ही प्रसन्न किया जा सकता है। इस एकादशी के दिन श्रीमन नारायण की विधि के अनुसार श्रद्धापूर्वक पूजा करनी चाहिए। मनुष्य को पांच सहस्र वर्ष तपस्या करने से जिस पुण्य का फल प्राप्त होता है, वही पुण्य श्रद्धापूर्वक भक्ति भाव से रात्रि जागरण सहित सफला एकादशी का उपवास करने से मिलता है।

 सफला एकादशी की कथा

सफला एकादशी की महत्ता सुन अर्जुन के मन में और जिज्ञासा जाग उठी और उस ने भगवान श्री कृष्ण से कहा – हे कमलनयन! सफला एकादशी का उपवास सभी भक्तों को पुण्य प्रदान करने वाला है आप कृप्या कर इस व्रत की कथा भी मुझे विस्तारपूर्वक बताएं।

हे कुंती पुत्र! अब तुम इस सफला एकादशी की कथा ध्यानपूर्वक सुनो-

प्राचीन समय में चम्पावती नगरी में महिष्मान नामक एक राजा राज्य करता था। उसके चार पुत्र थे। उसका सबसे बड़े पुत्र का नामलुम्पक था। वह महापापी और दुष्ट था, वह हमेशा, पर-स्त्री गमन में तथा वेश्याओं के यहां जाकर अपने पिता का धन व्यय किया करता था। सारी प्रजा उसके कुकर्मों से बहुत दुःखी थी, परंतु युवराज होने के कारण किसी में भी इतना साहस नहीं था कि कोई राजा से उसकी शिकायत करता। एक दिन राजा को लुम्पक के सारे कुकर्मों का पता चल गया। तब राजा अत्यधिक क्रोधित हुआ और उसने अपने पुत्र लुम्पक को अपने राज्य से निकाल दिया। पिता द्वारा त्यागने पर और राज्य से निष्कासित होने पर वह सोचने लगा कि मैं क्या करूं? कहां जाऊं? अंत में उसने रात्रि को पिता के राज्य में चोरी करने की ठानी।

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वह दिन में राज्य से बाहर रहता और रात्रि को चुपके से नगर में प्रवेश कर चोरी तथा अन्य कुकर्म करने लगा। दिन में वे वन के निर्दोष पशु-पक्षियों को मारकर उनका भक्षण किया करता था। किसी-किसी रात जब वह नगर में चोरी आदि करते पकड़ा भी जाता तो राजा के डर से पहरेदार उसे छोड़ देते थे। कहते हैं कि कभी-कभी अनजाने में भी प्राणी ईश्वर की कृपा का पात्र बन जाता है। ऐसा ही कुछ लुम्पक के साथ भी हुआ। जिस वन में वह रहता था, उस वन में एक प्राचीन पीपल का पेड़ था तथा उस वन को सभी लोग देवताओं का क्रीड़ा-स्थल मानते थे। वन में उसी पीपल के वृक्ष के नीचे महापापी लुम्पक रहता था। कुछ दिन बाद पौष मास के कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन वस्त्रहीन और दुर्बल होने के कारण लुम्पक तेज ठंड से मूर्च्छित हो गया और उसके हाथ-पैर अकड़ गए। सूर्य के उदय होने पर भी उसकी मूर्च्छा नहीं टूटी। वह ज्यों-का-त्यों पड़ा रहा।

जब सूर्य के तपने से उसे कुछ गर्मी मिली, तब दोपहर में कहीं उसे होश आया और वह अपने स्थान से उठकर किसी प्रकार चलते हुए वन में भोजन की खोज में फिरने लगा। उस दिन दुर्बल होने के कारण वह शिकार करने में असमर्थ था, इसलिए पृथ्वी पर गिरे हुए फलों को लेकर पीपल के वृक्ष के नीचे गया। तब तक शाम हो गयी और सूर्यदेव अस्त कर गए थे। भूखा होने के बाद भी वह उन फलों को न खा सका, क्योंकि वह तो मांस खाने का आदि था और उसे फल खाना तनिक भी अच्छा नहीं लगा, अतः उसने उन फलों को पीपल की जड़ के पास रख दिया और दुःखी होकर बोला – ‘हे ईश्वर! यह फल आपको ही अर्पण हैं। इन फलों से आप ही तृप्त हों। ऐसा कहकर वह रोने लगा और रात को उसे नींद नहीं आई। वह सारी रात रोता रहा। इस प्रकार उस पापी से अनजाने में ही एकादशी का उपवास और रात्रि जागरण हो गया। उस महापापी के इस उपवास तथा रात्रि जागरण से भगवान श्रीहरि अत्यंत प्रसन्न हुए और उसके सभी पाप नष्ट हो गए। सुबह होते ही एक दिव्य रथ अनेक सुंदर वस्तुओं से सजा हुआ आया और उसके सामने खड़ा हो गया। उसी समय आकाशवाणी हुई – ‘हे युवराज! भगवान नारायण के प्रभाव से तेरे सभी पाप नष्ट हो गए हैं, अब तू अपने पिता के पास जाकर राज्य प्राप्त कर।’

जब यह आकाशवाणी लुम्पक ने सुनी तो वह अत्यंत प्रसन्न होते हुए बोला – ‘हे प्रभु! आप अत्यंत दयालु हो आपकी जय हो!’ ऐसा कहकर उसने सुंदर वस्त्र धारण किए और फिर अपने पिता के पास गया। पिता के पास पहुंचकर उसने सारी कथा पिता को सुनाई। पुत्र के मुख से सारा वृत्तांत सुनने के बाद पिता इसे ईश्वर का आदेश मान कर अपना सारा राज्य उसी समय पुत्र को सौंप दिया और स्वयं वन में चला गया। अब लुम्पक अपने पूर्व आचरण के विपरीत भगवान की भक्ति और शास्त्रानुसार राज्य करने लगा। वृद्धावस्था आने पर वह अपने पुत्र को राज्य सौंपकर भगवान का भजन करने के लिए वन में चला गया और अंत में परम पद को प्राप्त हुए। हे पार्थ! जो मनुष्य श्रद्धा व भक्तिपूर्वक इस सफला एकादशी का उपवास करते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में मुक्ति प्राप्त होती है।

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सफला एकादशी व्रत विधि

पद्म पुराण के अनुसार एकादशी व्रत उत्तम फल देने वाला है और सफला एकादशी के दिन भगवान विष्णु और देवी एकादशी की पूजा का विधान है। इस दिन जो भक्त विधि-विधान से व्रत कर पारण करता है उसके सारे कष्ट दूर हो जाते है और उसे जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

  • सफला एकादशी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
  • इसके बाद धूप, दीप, नैवेद्य आदि सोलह सामग्री से षोडशोपचार पूजा करे |
  • सफला एकादशी की रात भगवान विष्णु का भजन- कीर्तन करना चाहिए और अपने पापो के लिए क्षमा याचना करनी चाहिए ।
  • सफला एकादशी की रात्रि को जागरण करना चहिये।
  • अगली सुबह पुनः भगवान श्रीकृष्ण की पूजा कर ब्राह्मणो को भोजन कराना चाहिए।
  • भोजन के बाद ब्राह्मण को क्षमता के अनुसार दान दे देकर विदा करना चाहिए। उसके बाद ही अपना व्रत खोलना चाहिए |

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हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि एकादशी का सीधा सम्बन्ध जगत के पालनहार भगवान विष्णु से है। वैसे तो हर मास में 2 एकादशी होती है और एक वर्ष में 24 एकादशियाँ आती है परंतु जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष इनकी संख्या 26 हो जाती है।

इन सब में सबसे प्रथम एकादशी मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष एकादशी को माना जाता है क्यूँकि पुराणों के अनुसार इसी दिन देवी एकादशी ने उत्पन्न होकर राक्षस मुर का वध किया था। इसलिए इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है।

उत्पन्ना एकादशी का महत्व

पुराणो के अनुसार जो भक्त उत्पन्ना एकादशी का विधि-विधान से व्रत करता है और इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करता है उसे संक्रान्ति में तथा सूर्य और चन्द्र ग्रहण में दान देने से और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य मनुष्य को एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। जो फल ब्राह्मणों को एक हजार गौदान करने से प्राप्त होता है, उससे दस गुना अधिक पुण्य मिलता है। इस के साथ जो भक्त इस दिन दान देता है उसे उसके दिए हुए दान का कई गुना फल प्राप्त होता है।

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

विष्णु पुराण के अनुसार एक बार अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा- “हे प्रभु! आप मुझे एकादशी व्रत के बारे में  कृपा कर विस्तारपूर्वक बताइये।”

श्रीकृष्ण बोले- “हे पार्थ! सतयुग में एक महा भयंकर दैत्य हुआ था, उसका नाम मुर था। उस दैत्य ने इन्द्र आदि देवताओं पर विजय प्राप्त कर उन्हें उनके पद से हटा दिया और स्वर्ग पे अपना आधिपत्य जमा लिया। तब इन्द्र और अन्य देवता वहाँ से भाग कर मृत्युलोक में आ गए और भगवान शंकर से प्रार्थना की- ‘हे भोलेनाथ! हम सब देवता, मुर दैत्य के अत्याचारों से दुखी होकर मृत्युलोक में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। राक्षसों के भय से हम सब बहुत दुख और कष्ट भोग रहे हैं। अतः कृपा कर आप मुर दैत्य के अत्याचार से बचने का उपाय बतलाइये।’

देवराज की प्रार्थना सुन कैलाशपति ने कहा- ‘हे देवेन्द्र! आप भगवान श्रीहरि की शरण में जाइए और उन से इस का उपाय करने का आग्रह करिये। भगवान विष्णु देवताओं को अवश्य ही इस भय से मुक्त करेंगे।’ भोलेनाथ के आदेशानुसार इन्द्र तथा अन्य देवता क्षीर सागर गए, जहाँ पर भगवान श्रीहरि शेष-शैया पर विराजमान थे।

इन्द्र सहित सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के समक्ष उपस्थित होकर उनसे प्रार्थना की – ‘हे तीनों लोकों के स्वामी! हम सभी देवताओं का आपको कोटि-कोटि प्रणाम है। हम आपकी शरण में आए हैं, आप हमारी रक्षा करें। हे जगत के पलनहार! हम सभी देवता दैत्यों के अत्याचारों से भयभीत होकर आपकी शरण में आए हैं। इस समय दैत्यों ने हमें स्वर्ग से निकाल दिया है और हम सभी देवता बड़ी ही दयनीय स्थिति में मृत्युलोक में विचरण कर रहे हैं। अब आप ही हमारे रक्षक हैं! रक्षा कीजिये।

देवताओं का आग्रह सुन, भगवान श्रीहरि बाले- ‘हे देवगणो! वह कौन-सा दैत्य है, जिसने देवताओं को जीत लिया है? आप सभी देवगण किसके भय से पृथ्वीलोक में भटक रहे हैं? क्या वह दैत्य इतना बलवान है, जिसने इन्द्र सहित सभी देवताओं को जीत लिया है? तुम निर्भय होकर मुझे सब हाल बताओ।

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तब देवेन्द्र ने कहा- ‘हे प्रभु! चन्द्रवती नामक नगरी में निवास करने वाला मुर नामक दैत्य ने बल से मृत्युलोक और देवलोक को जीत लिया हैं और सब देवताओं को देवलोक से निकालकर, अपने दैत्य कुल के असुरों लोकपाल बना दिया है। वह स्वयं सूर्य बनकर पृथ्वी को तापता है और स्वयं मेघ बनकर जल की वर्षा करता है, अतः आप इस बलशाली भयानक असुर का संहार करके देवताओं की रक्षा करें।’

इंद्र के मुख से ऐसे वचन सुन भगवान विष्णु बोले- ‘हे देवताओं! मैं आपके शत्रु का शीघ्र ही संहार करूँगा। आप सब इसी समय मेरे साथ चन्द्रवती नगरी चलिए।’

देवताओं की पुकार पर भगवान विष्णु तुरन्त ही उनके साथ चल दिए। उधर दैत्यराज मुर ने अपने तेज से जान लिया था कि श्री विष्णु युद्ध की इच्छा से उसकी राजधानी की तरफ आ रहे हैं, अतः अपने राक्षस योद्धाओं के साथ वह भी युद्ध भूमि में आकर गरजने लगा। देखते-ही-देखते घोर युद्ध शुरू हो गया। देवता तो पहले ही डरे हुए थे, वह अधिक देर तक राक्षसों का सामना न कर सके और भाग खड़े हुए। तब भगवान विष्णु स्वयं युद्ध-भूमि में आ गए। देवताओं को भागता देख  दैत्य पहले से भी ज्यादा जोश में भरकर भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे। वे अपने अस्त्र-शस्त्रों से उन पर भयंकर प्रहार करने लगे। दैत्यों के आक्रमण वारों को भगवान विष्णु अपने चक्र और गदा के प्रहारों से नष्ट करने लगे। इस युद्ध में अनेक दैत्य मृत्यु की गोद में समा गए, किन्तु दैत्य मुर भगवान विष्णु के साथ युद्ध करता रहा। उसका तो जैसे अभी बाल भी बांका नहीं हुआ था। वह बिना डरे युद्ध कर रहा था। भगवान विष्णु मुर को मारने के लिए जिन-जिन शस्त्रों का प्रयोग करते, वे सब उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगते। जब अनेक अस्त्रों-शस्त्रों का प्रयोग करने पर भी दोनो एक दूसरे को जीत न सके, तब वे आपस में मल्ल युद्ध करने लगे। यह युद्ध अनेक वर्षों तक चलता रहा। अन्त में भगवान विष्णु शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बदरिकाश्रम स्थित अड़तीस कोस लम्बी एक द्वार वाली हेमवती नामक गुफा में प्रवेश कर गए।

हे अर्जुन! उस गुफा में प्रभु ने शयन किया। भगवान विष्णु के पीछे-पीछे वह दैत्य भी चला आया था। भगवान श्रीहरि को सोता देखकर वह उन्हें मारने को तैयार हो गया। परन्तु उसकी यह इच्छा पूर्ण न हो सकी, क्योंकि उसी समय भगवान विष्णु की देह से दिव्य वस्त्र धारण किए एक अत्यन्त मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई और राक्षस को ललकारकर उससे युद्ध करने लगी और कुछ समय बीतने पर उस कन्या ने अपने शास्त्रों से दैत्य के अस्त्र-शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और उसका रथ भी तोड़ डाला। अब तो उस दैत्य को बड़ा ही क्रोध आया और वह सारी मर्यादाएँ भंग करके उस कन्या से मल्ल युद्ध करने लगा। उस तेजस्वी कन्या ने उसको धक्का मारकर मुर्च्छित कर दिया और उसकी मूर्च्छा टूटने से पूर्व ही उसका सिर काटकर धड़ से अलग कर दिया।

सिर काटते ही वह असुर मृत्यु को प्राप्त हुआ। भगवान विष्णु जब निद्रा से जागे तो उस असुर को मरा देखकर उन्हें घोर आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि इस महाबली को किसने मारा है?

तब वह तेजस्वी कन्या श्रीहरि से हाथ जोड़कर बोली- ‘हे जगदीश्वर! यह असुर आपको मारने को उद्यत था, तब मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इस असुर का वध किया है।’  कन्या की बात सुन भगवान बोले- ‘तुमने इस असुर को मारा है, अतः हे कन्या! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। इसे मारकर तुमने देवताओं के कष्ट को हरा है, इसलिए तुम अपनी इच्छानुसार वरदान मांग लो। मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करूँगा।’

भगवान की बात सुन कन्या बोली- ‘हे प्रभु! मुझे यह वरदान दीजिये कि जो भी मनुष्य या देव मेरा व्रत करे, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएँ और अन्त में उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हो। मेरे व्रत का आधा फल रात्रि को मिले और उसका आधा फल एक समय भोजन करने वाले को मिले। जो श्रद्धालु भक्तिपूर्वक मेरे व्रत को करें, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक को प्राप्त करें। जो मनुष्य मेरे व्रत में दिन तथा रात्रि को एक बार भोजन करे, वह धन-धान्य से भरपूर रहे। कृपा करके मुझे ऐसा वरदान दीजिये।’

भगवान विष्णु ने कहा- ‘हे कन्या! ऐसा ही होगा। मेरे और तुम्हारे भक्त एक ही होंगे और अन्त में संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त होकर मेरे लोक को प्राप्त करेंगे। तुम एकादशी को पैदा हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम भी एकादशी हुआ और क्योंकि तुम मेरे अंश से उत्पन्न हुई हो, इसलिए संसार मे तुम उत्पन्ना एकादशी के नाम से जानी जाओगी तथा जो मनुष्य इस दिन व्रत करेंगे, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे। तुम्हारे व्रत का फल सब तीर्थों के फल से भी महान होगा।

इतना कहकर, भगवान श्रीहरि उसी स्थान पर अंतर्ध्यान हो गए।”

श्री कृष्ण ने कहा- “हे कुंती पुत्र! एकादशी के व्रत का फल सभी व्रतों व सभी तीर्थों के फल से महान है। एकादशी व्रत करने वाले मनुष्यों के शत्रुओं का मैं जड़ से नाश कर देता हूँ और व्रत करने वाले को मोक्ष प्रदान करता हूँ। उन मनुष्यों के जीवन के जो भी कष्ट होते हैं। मैं उन्हें भी दूर कर देता हूँ। अर्थात मुझे अत्यन्त प्रिय एकादशी के व्रत को करने वाला प्राणी सभी ओर से निर्भय और सुखी होकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त होता है। हे कुन्ती पुत्र! यह मैंने तुम्हें एकादशी की उत्पत्ति के विषय में बतलाया है। एकादशी व्रत सभी पापों को नष्ट करने वाला और सिद्धि प्रदान करने वाला है। श्रेष्ठ मनुष्यों को दोनों पक्षों की एकादशियों को समान समझना चाहिए। उनमें भेद-भाव करना उचित नहीं है। जो मनुष्य एकादशी माहात्म्य का श्रवण व पठन करेंगे, उन्हें अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होगा।

उत्पन्ना एकादशी व्रत की विधि

एकादशी व्रत की शुरुआत उत्पन्ना एकादशी व्रत से करनी चहिये। सभी एकादशी व्रत का पूजा विधान एक समान होता है, जो कि इस प्रकार है:

  • एकादशी व्रत रखने वाले भक्त को एक दिन पूर्व यानि दशमी की रात्रि में भोजन नहीं करना चाहिए।
  • एकादशी के दिन प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए और उन्हें पुष्प, जल, धूप, दीप, अक्षत अर्पित करना चाहिए।
  • इस दिन केवल फलों का ही भोग लगाना चाहिए और समय-समय पर भगवान विष्णु का सुमिरन करना चाहिए। रात्रि में पूजन के बाद जागरण करना चाहिए.
  • अगले दिन द्वादशी को उचित समय पर पारण करना चाहिए। किसी जरुरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन व दान-दक्षिणा देना चाहिए। इसके बाद स्वयं भोजन कर के व्रत खोलना चाहिए।

उत्पन्ना एकादशी व्रत 2020

दिनांक : 10 दिसम्बर 2020

वार : बृहस्पतिवार

एकादशी तिथि प्रारम्भ – 10 दिसम्बर 2020 को 12:51 पी एम

एकादशी तिथि समाप्त – 11 दिसम्बर 2020 को 10:04 ए एम

पारण तिथि : 11 दिसम्बर 2020

पारण समय : 01:17 पी एम से 03:21 पी एम

जीन भक्तजनो ने एकादशी के उपवास को नहीं रखा हैं और इस उपवास को रखना चाहते है वो इस मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी अर्थात उत्पन्ना एकादशी से इसका आरंभ कर सकते है क्योंकि सर्वप्रथम हेमंत ऋतु में इसी एकादशी से इस व्रत का प्रारंभ हुआ माना जाता है।

एकादशी आरती

ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता ।

विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। ॐ।।

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी ।

गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।।ॐ।।

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।

शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई।। ॐ।।

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है,

शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै ।। ॐ ।।

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।

शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै ।। ॐ ।।

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी,

पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की ।। ॐ ।।

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली,

नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। ॐ ।।

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी,

नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी।। ॐ ।।

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।

देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी ।। ॐ ।।

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।

श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए।। ॐ ।।

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।

इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला।। ॐ ।।

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।

रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी ।। ॐ ।।

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।

पावन मास में करूं विनती पार करो नैया ।। ॐ ।।

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।।

शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी ।। ॐ ।।

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।

जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै।। ॐ ।।

 

 

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