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एकादशी व्रत (Ekadashi Vrat) का भारतीय सनातन धर्म में बहुत महत्व है। इस व्रत से संकल्प और आत्मविश्वास बढ़ता है, देवताओं की कृपा बरसने लगती है और जीवन के सारे दु:ख और संताप कट जाते हैं और व्रती का भविष्य उज्ज्वल हो जाता है।

हिंदू शास्त्रों के अनुसार वर्ष 26 व्रत बताए गये है जिनको व्यक्ति अगर नियम अनुसार करे तो इन व्रत के फलस्वरूप उसके सभी पाप नष्ट होते हैं उसको निरोगी काया, पारिवारिक सुख और धन-समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह 26 व्रत हिंदू पंचांग के अनुसार प्रति माह की ग्यारहवीं तिथि यानी एकादशी तिथि को किया जाता है। इसे एकादशी व्रत और ग्यारस व्रत कहा जाता है। आइए जानते है एकादशी व्रत की 15 महत्वपूर्ण बातें….

एकादशी (Ekadashi Vrat) की ये 15 बातें आपको जरूर जानना चाहिए :-

  1. माह में 2 एकादशियां होती हैं अर्थात आपको माह में बस 2 बार और वर्ष के 365 दिनों में मात्र 24 बार ही नियमपूर्वक एकादशी व्रत(Ekadashi Vrat) रखना है। हालांकि प्रत्येक तीसरे वर्ष अधिकमास होने से 2 एकादशियां जुड़कर ये कुल 26 होती हैं। एकादशी व्रत तिथि 2022
  2. पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति एकादशी करता रहता है, वह जीवन में कभी भी संकटों से नहीं घिरता और उनके जीवन में धन और समृद्धि बनी रहती है।
  3. चैत्र माह में कामदा और वरुथिनी एकादशी होती है। कामदा से राक्षस आदि की योनि से छुटकारा मिलता है और यह सर्वकार्य सिद्धि करती है तो वरुथिनी सौभाग्य देने, सब पापों को नष्ट करने तथा मोक्ष देने वाली है।
  4. वैशाख माह में मोहिनी और अपरा आती हैं। यह एकादशी विवाह, सुख, समृद्धि और शांति प्रदान करती है, साथ ही मोह-माया के बंधनों से मुक्त करती है। अपरा एकादशी व्रत से मनुष्य को अपार खुशियों की प्राप्ति होती है तथा समस्त पापों से मुक्ति मिलती है।
  5. ज्येष्ठ माह में निर्जला और योगिनी एकादशी होती है। निर्जला का अर्थ निराहार और निर्जल रहकर व्रत करना। इसके करने से हर प्रकार की मनोरथ सिद्धि होती है। योगिनी एकादशी से समस्त पाप दूर हो जाते हैं और व्यक्ति पारिवारिक सुख पाता है।
  6. आषाढ़ माह में देवशयनी एवं कामिका होती हैं। देवशयनी एकादशी का व्रत करने से सिद्धि प्राप्त होती है। यह व्रत सभी उपद्रवों को शांत कर सुखी बनाता है। कामिका एकादशी का व्रत सभी पापों से मुक्त कर जीव को कुयोनि को प्राप्त नहीं होने देता है।
  7. श्रावण माह में पुत्रदा एवं अजा एकादशी होती है। पुत्रदा एकादशी करने से संतान सुख प्राप्त होता है। अजा एकादशी से पुत्र पर कोई संकट नहीं आता, दरिद्रता दूर हो जाती है, खोया हुआ सबकुछ पुन: प्राप्त हो जाता है।
  8. भाद्रपद माह में परिवर्तिनी एवं इंदिरा एकादशी आती हैं। परिवर्तिनी एकादशी के व्रत से सभी दु:ख दूर होकर मुक्ति मिलती है। पितरों को अधोगति से मुक्ति देने वाली इंदिरा एकादशी के व्रत से स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
  9. आश्विन माह में पापांकुशा एवं रमा एकादशी आती हैं। पापांकुशा एकादशी सभी पापों से मुक्त कर अपार धन, समृद्धि और सुख देती है। रमा एकादाशी व्रत करने से सभी सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
  10. कार्तिक माह में प्रबोधिनी एवं उत्पन्ना एकादशी आती हैं। देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करने से भाग्य जाग्रत होता है। इस दिन तुलसी पूजा होती है। उत्पन्ना एकादशी व्रत करने से हजार वाजपेय और अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। इससे देवता और पितर तृप्त होते हैं।
  11. मार्गशीर्ष माह में मोक्षदा एवं सफला एकादशी आती है। मोक्षदा एकादशी मोक्ष देने वाली और सफला एकादशी सफल करने वाली होती हैं। सफला व्रत रखने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
  12. पौष माह में पुत्रदा एवं षटतिला एकादशी आती हैं। पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत करना चाहिए। षटतिला एकादशी व्रत रखने से दुर्भाग्य, दरिद्रता तथा अनेक प्रकार के कष्ट दूर होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  13. माघ माह में जया एवं विजया एकादशी आती हैं। जया एकादशी व्रत रखने से ब्रह्महत्यादि पापों से छूट व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है तथा भूत, पिशाच आदि योनियों में नहीं जाता है। विजया एकादशी से भयंकर परेशानी से छुटकारा पाता है और इससे शत्रुओं का नाश होता है।
  14. फाल्गुन माह में आमलकी एवं पापमोचिनी एकादशी आती हैं। आमलकी एकादशी में आंवले का महत्व है। इसे करने से व्यक्ति सभी तरह के रोगों से मुक्त हो जाता है, साथ ही वह हर कार्य में सफल होता है। पापमोचिनी एकादशी व्रत से पाप का नाश होता है और संकटों से मुक्ति मिलती है।
  15. अधिक मास माह में पद्मिनी (कमला) एवं परमा एकादशी आती हैं। पद्मिनी एकादशी का व्रत सभी तरह की मनोकामनाओं को पूर्ण करता है, साथ ही यह पुत्र, कीर्ति और मोक्ष देने वाला है। परमा एकादशी धन-वैभव देती है तथा पापों का नाश कर उत्तम गति भी प्रदान करने वाली होती है।

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Nirjala Ekadashi – निर्जला एकादशी https://astrodeeva.com/nirjala-ekadashi-nirjala-ekadashi/ https://astrodeeva.com/nirjala-ekadashi-nirjala-ekadashi/#comments Mon, 23 May 2022 11:08:02 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3473 एकादशी व्रत हिन्दुओ में सबसे प्रचलित व्रत माना जाता है। वर्ष में चौबीस एकादशियाँ आती हैं, किन्तु इन सब एकादशियों में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी सबसे बढ़कर फल देने वाली समझी जाती है क्योंकि इस एक एकादशी का व्रत रखने से वर्ष भर की एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) […]

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एकादशी व्रत हिन्दुओ में सबसे प्रचलित व्रत माना जाता है। वर्ष में चौबीस एकादशियाँ आती हैं, किन्तु इन सब एकादशियों में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी सबसे बढ़कर फल देने वाली समझी जाती है क्योंकि इस एक एकादशी का व्रत रखने से वर्ष भर की एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) का व्रत अत्यन्त संयम साध्य है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है।

निर्जला एकादशी का महत्त्व(Significance of Nirjala Ekadashi)

ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता है। निर्जला यानि यह व्रत बिना जल ग्रहण किए और उपवास रखकर किया जाता है। इसलिए यह व्रत कठिन तप और साधना के समान महत्त्व रखता है। हिन्दू पंचाग अनुसार वृषभ और मिथुन संक्रांति के बीच शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है। इस व्रत को भीमसेन एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि भोजन संयम न रखने वाले पाँच पाण्डवों में एक भीमसेन ने इस व्रत का पालन कर सुफल पाए थे। इसलिए इसका नाम भीमसेनी एकादशी भी हुआ।
हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत का मात्र धार्मिक महत्त्व ही नहीं है, इसका मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के नज़रिए से भी बहुत महत्त्व है। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित होता है। इस दिन जल कलश, गौ का दान बहुत पुण्य देने वाला माना गया है। यह व्रत मन को संयम सिखाता है और शरीर को नई ऊर्जा देता है। यह व्रत पुरुष और महिलाओं दोनों द्वारा किया जा सकता है। वर्ष में अधिकमास की दो एकादशियों सहित 26 एकादशी व्रत का विधान है। जहाँ साल भर की अन्य 25 एकादशी व्रत में आहार संयम का महत्त्व है। वहीं निर्जला एकादशी के दिन आहार के साथ ही जल का संयम भी जरुरी है। इस व्रत में जल ग्रहण नहीं किया जाता है यानि निर्जल रहकर व्रत का पालन किया जाता है।
ऐसी धार्मिक मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति मात्र निर्जला एकादशी का व्रत करने से साल भर की पच्चीस एकादशी का फल पा सकता है। यहाँ तक कि अन्य एकादशी के व्रत भंग होने के दोष भी निर्जला एकादशी के व्रत से दूर हो जाते हैं। कुछ व्रती इस दिन एक भुक्त व्रत भी रखते हैं यानि सांय दान-दर्शन के बाद फलाहार और दूध का सेवन करते हैं।

निर्जला एकादशी व्रत की कथा(Legend of Nirjala Ekadashi)

पौराणिक कथा के अनुसार जब सर्वज्ञ वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया था तब युधिष्ठिर ने कहा– जनार्दन! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवती नन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं|
तब वेदव्यासजी कहने लगे– कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है। द्वादशी के दिन स्नान करके पवित्र हो और फूलों से भगवान केशव की पूजा करे। फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे।
यह सुनकर भीमसेन बोले- परम बुद्धिमान पितामह! मेरी उत्तम बात सुनिये। राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव, ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि भीमसेन एकादशी को तुम भी न खाया करो परन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी।
भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा– यदि तुम नरक को दूषित समझते हो और तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और तो दोनों पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन नहीं करना।
भीमसेन बोले महाबुद्धिमान पितामह! मैं आपके सामने सच कहता हूँ। मुझसे एक बार भोजन करके भी व्रत नहीं किया जा सकता, तो फिर उपवास करके मैं कैसे रह सकता हूँ। मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है। इसलिए महामुनि ! मैं पूरे वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ। जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये। मैं उसका यथोचित रूप से पालन करुँगा।
व्यासजी ने कहा– भीम! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो। केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है। एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है। तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे। इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे। वर्षभर में जितनी एकादशियाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है।’
एकादशी व्रत करने वाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते। अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाव वाले, हाथ में सुदर्शन धारण करने वाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आख़िर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं। अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो। स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है। जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है। उसे एक-एक प्रहर में कोटि-कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है। मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है। निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है। इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है।
जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे। जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं। कुन्तीनन्दन! निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो- उस दिन जल में शयन करने वाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है। पर्याप्त दक्षिणा और भाँति-भाँति के मिष्ठानों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए। ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं। जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस ‘निर्जला एकादशी’ का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आने वाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है। निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए। जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है। चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इसके श्रवण से भी प्राप्त होता है। पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि “मैं भगवान केशव की प्रसन्नता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा।” द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे।
संसार सागर से तारने वाले हे देव ह्रषीकेश! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये। भीमसेन! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए। उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है। तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे। जो इस प्रकार पूर्ण रूप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है। यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया। तबसे यह लोक में पांडव एकादशी के नाम से भी विख्यात हुई।

निर्जला एकादशी व्रत नियम

निर्जला एकादशी व्रत में जल का त्याग करना होता है। इस व्रत में व्रती पानी का सेवन नहीं कर सकता है। इसीलिए इस व्रत को निर्जला एकादशी व्रत कहते हैं, व्रत का पारण करने के बाद ही व्रती जल का सेवन कर सकता है।

निर्जला एकादशी व्रत पूजा विधि

  • सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
  • घर के मंदिर में शुद्ध देशी घी का दीप प्रज्वलित करें।
  • यदि घर में भगवान विष्णु की प्रतिमा है तो भगवान विष्णु का गंगा जल से अभिषेक करें,यदि
  • चित्र है तो गंगाजल के छीटे मारें ।
  • भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें।
  • अगर संभव हो तो इस दिन व्रत भी रखें।
  • भगवान की आरती करें।
  • भगवान को भोग लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है।
  • भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। ऐसा माना जाता है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग ग्रहण नहीं करते हैं।
  • इस पावन दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की पूजा भी करें।
  • इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।

 

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Apara Ekadashi 2022 – अपरा एकादशी का शुभ दिन व मुहूर्त, जाने महत्व, व्रत कथा और पूजा विधि https://astrodeeva.com/apara-ekadashi-2022-auspicious-day-and-muhurta-of-apara-ekadashi-importance-of-fast-story-and-worship-method/ https://astrodeeva.com/apara-ekadashi-2022-auspicious-day-and-muhurta-of-apara-ekadashi-importance-of-fast-story-and-worship-method/#respond Sun, 22 May 2022 09:51:31 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3471 हिन्दू धर्म में एकादशी (Ekadashi) तिथि का दिन धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण दिन होता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक मास में 2 एकादशी होती है और एक वर्ष में 24 एकादशियाँ आती है परंतु जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष इनकी संख्या 26 हो जाती है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण और […]

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हिन्दू धर्म में एकादशी (Ekadashi) तिथि का दिन धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण दिन होता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक मास में 2 एकादशी होती है और एक वर्ष में 24 एकादशियाँ आती है परंतु जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष इनकी संख्या 26 हो जाती है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशियां तो बहुत ही खास मानी जाती हैं। हालांकि समस्त एकादशियों में ज्येष्ठ मास की शुक्ल एकादशी जिसे निर्जला एकादशी कहते हैं सर्वोत्तम मानी जाती है लेकिन ज्येष्ठ महीने की ही कृष्ण एकादशी भी कमतर नहीं मानी जा सकती। इस एकादशी को अपरा या अचला एकादशी कहा जाता है। इस दिन के व्रत की बहुत महत्ता है। आइये इस लेख में जानते हैं अपरा एकादशी(Apara Ekadashi 2022) का महत्व, व्रत कथा व पूजा विधि…….

अपरा एकादशी व्रत २०२२ – Apara Ekadashi 2022

दिनांक : 26 मई 2022
वार : बृहस्पतिवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 25 मई 2022 को 10:32 ए एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त – 26 मई 2022 को 10:54 ए एम बजे
पारण तिथि : 27 मई 2022
पारण समय : 05:25 ए एम से 08:10 ए एम
(पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय – 11:47 ए एम)

ये भी पढ़ें –एकादशी व्रत तिथि 2022

अपरा एकादशी का महत्‍व (Significance of Apara Ekadashi 2022)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा- “हे प्रभु! ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? तथा उसका माहात्म्य क्या है? इसमें किस देवता का पूजन किया जाता है तथा इस व्रत को करने का क्या विधान है? कृपा कर यह सब मुझे विस्तारपूर्वक बतायें।”

श्रीकृष्ण ने कहा- “हे धर्मराज! ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अपरा है, क्योंकि यह अपार धन और पुण्यों को देने वाली तथा समस्त पापों का नाश करने वाली है। जो मनुष्य इसका व्रत करते हैं, उनकी लोक में प्रसिद्धि होती है। अपरा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्महत्या, प्रेत योनि, दूसरे की निन्दा आदि से उत्पन्न पापों का नाश हो जाता है, इतना ही नहीं, स्त्रीगमन, झूठी गवाही, असत्य भाषण, झूठा वेद पढ़ना, झूठा शास्त्र बनाना, ज्योतिष द्वारा किसी को भरमाना, झूठा वैद्य बनकर लोगो को ठगना आदि भयंकर पाप भी अपरा एकादशी के व्रत से नष्ट हो जाते हैं।

युद्धक्षेत्र से भागे हुए क्षत्रिय को नरक की प्राप्ति होती है, किन्तु अगर वो अपरा एकादशी का व्रत करते हैं तो  उन्हें भी स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है। गुरू से विद्या अर्जित करने के उपरान्त जो शिष्य गरु की निन्दा करते हैं तो वे अवश्य ही नरक में जाते हैं। अपरा एकादशी का व्रत करने से इनके लिये स्वर्ग जाना सम्भव हो जाता है।

तीनों पुष्करों में स्नान करने से या कार्तिक माह में स्नान करने से अथवा गंगाजी के तट पर पितरों को पिण्डदान करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल अपरा एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है।

बृहस्पति के दिन गोमती नदी में स्नान करने से, कुम्भ में श्रीकेदारनाथजी के दर्शन करने से तथा बदरिकाश्रम में रहने से तथा सूर्य ग्रहण एवं चन्द्र ग्रहण में कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो फल सिंह राशि वालों को प्राप्त होता है, वह फल अपरा एकादशी के व्रत के समान है। जो फल हाथी-घोड़े के दान से तथा यज्ञ में स्वर्णदान (सुवर्णदान) से प्राप्त होता है, वह फल अपरा एकादशी के व्रत के फल के बराबर है। गौ तथा भूमि या स्वर्ण के दान का फल भी इसके फल के समान होता है।

पापरूपी वृक्षों को काटने के लिये यह व्रत कुल्हाड़ी के समान है तथा पापरूपी अन्धकार के लिये सूर्य के समान है। अतः मनुष्य को इस एकादशी का व्रत अवश्य ही करना चाहिये। यह व्रत सब व्रतों में उत्तम है। अपरा एकादशी के दिन श्रद्धापूर्वक भगवान श्रीविष्णु का पूजन करना चाहिये। जिससे अन्त में विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।

अपरा एकादशी कथा (Legend of Apara Ekadashi)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। राजा का छोटा भाई वज्रध्वज बड़े भाई से द्वेष रखता था। एक दिन अवसर पाकर वज्रध्वज ने राजा महीध्वज की हत्या कर दी और जंगल में एक पीपल के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर पीपल पर रहने लगी। मार्ग से गुजरने वाले हर व्यक्ति को आत्मा परेशान करती। एक दिन एक ऋषि इस रास्ते से गुजर रहे थे। उन्होंने प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके प्रेत बनने का कारण जाना।

ऋषि ने पीपल के पेड़ से राजा की प्रेतात्मा को नीचे उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। राजा को प्रेत योनी से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा और द्वादशी के दिन व्रत पूरा होने पर व्रत का पुण्य प्रेत को दे दिया। एकादशी व्रत का पुण्य प्राप्त करके राजा प्रेतयोनी से मुक्त हो गया और स्वर्ग चला गया।

अपरा एकादशी व्रत विधि ( Vrat Vidhi of Apara Ekadashi)

  • एकादशी के दिन सबसे पहले सुबह ब्रह्म मुहूर्त में निद्रा से उठकर स्‍नान करने के बाद साफ वस्‍त्र धारण करे।
  • उसके बाद घर के मंदिर में पूजा करने से पहले एक वेदी बनाकर उस पर 7 धान (उड़द, मूंग, गेहूं, चना, जौ, चावल और बाजरा) रखें।
  • वेदी के ऊपर एक कलश की स्‍थापना करें और उसमें आम या अशोक के 5 पत्ते लगाएं।
  • वेदी पर भगवान विष्‍णु की मूर्ति या तस्‍वीर रखें।
  • इसके बाद भगवान विष्‍णु को पीले फूल, ऋतुफल और तुलसी दल समर्पित करें। फिर धूप-दीप से विष्‍णु जी की आरती उतारें।
  • शाम के समय भगवान विष्‍णु की आरती के बाद फलाहार ग्रहण करें।
  • रात्रि के समय सोए नहीं बल्‍कि भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करें।
  • अगले दिन सुबह किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं इसके बाद खुद भी भोजन  करें।

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Mohini Ekadashi – मोहिनी एकादशी https://astrodeeva.com/mohini-ekadashi/ https://astrodeeva.com/mohini-ekadashi/#respond Wed, 11 May 2022 05:06:41 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3398 सनातन धर्म में व्रत एवं उपवास का बहुत महत्व हैं। नारद पुराण में व्रतों का महत्व बताते हुए उल्लेख किया  गया है कि – गंगा के समान कोई अन्य तीर्थ नहीं, माँ के समान कोई गुरु नहीं, भगवान विष्णु जैसा कोई देवता नहीं तथा व्रत एवं उपवास जैसा कोई तप नहीं। व्रतों में एकादशी (Ekadashi) […]

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सनातन धर्म में व्रत एवं उपवास का बहुत महत्व हैं। नारद पुराण में व्रतों का महत्व बताते हुए उल्लेख किया  गया है कि – गंगा के समान कोई अन्य तीर्थ नहीं, माँ के समान कोई गुरु नहीं, भगवान विष्णु जैसा कोई देवता नहीं तथा व्रत एवं उपवास जैसा कोई तप नहीं। व्रतों में एकादशी (Ekadashi) व्रत को सर्वोपरि माना गया है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी(Mohini Ekadashi) के नाम से जाना जाता है। यह व्रत मोह बंधन तथा पापों से मुक्ति दिलाता है। मान्यता है कि सीता माता की खोज के दौरान भगवान राम ने तथा महाभारत काल में युधिष्ठिर ने मोहिनी एकादशी व्रत कर अपने सभी दुखों से छुटकारा पाया था।

वैशाख शुक्ल एकादशी का नाम मोहिनी एकादशी कैसे पड़ा?

मान्यता है कि वैशाख शुक्ल एकादशी के दिन ही भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया था। भगवान विष्णु ने सुमुद्र मंथन के दौरान प्राप्त हुए अमृत को देवताओं में वितरीत करने के लिये मोहिनी का रूप धारण किया था। कहा जाता है कि जब समुद्र मंथन हुआ तो अमृत प्राप्ति के बाद देवताओं व असुरों में आपाधापी मच गई थी। चूंकि ताकत के बल पर देवता असुरों को हरा नहीं सकते थे इसलिये चालाकि से भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर असुरों को अपने मोहपाश में बांध लिया और सारे अमृत का पान देवताओं को करवा दिया जिससे देवताओं ने अमरत्व प्राप्त किया। वैशाख शुक्ल एकादशी के दिन चूंकि यह सारा घटनाक्रम हुआ इस कारण इस एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा गया।

मोहिनी एकादशी का महत्व

मोहिनी एकादशी का माहात्म्य बहुत अधिक माना जाता है। पुराणों के अनुसार, माता सीता से बिछड़ने के बाद भगवान श्री राम ने और महाभारत काल में युधिष्ठिर ने भी अपने दुःखों से छुटकारा पाने के लिए मोहिनी एकादशी का व्रत पुरे विधि-विधान से किया था। जिसका फल भी उन्हें मिला। माना जाता है, इस एकादशी का व्रत रखने से हर प्रकार के दुःखों से छुटकारा मिलता है। मोहिनी एकादशी(Mohini Ekadashi) व्रत कथा पढ़ने और सुनने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है।

मोहिनी एकादशी कथा 

एक बार की बात है, श्रीरामजी ने महर्षि वशिष्ठ से कहा- ‘हे गुरुश्रेष्ठ! मैंने जनकनन्दिनी सीताजी के वियोग में बहुत कष्ट भोगे हैं, अतः मेरे कष्टों का नाश किस प्रकार होगा? आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताने की कृपा करें, जिससे मेरे सभी पाप और कष्ट नष्ट हो जाएँ।’
महर्षि वशिष्ठ ने कहा- ‘हे श्रीराम! आपने बहुत उत्तम प्रश्न किया है। आपकी बुद्धि अत्यन्त कुशाग्र और पवित्र है। आपके नाम के स्मरण मात्र से ही मनुष्य पवित्र हो जाता है। आपने लोकहित में यह बड़ा ही उत्तम् प्रश्न किया है। मैं आपको एक एकादशी व्रत का माहात्म्य सुनाता हूँ- वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi)है। इस एकादशी का उपवास करने से मनुष्य के सभी पाप तथा क्लेश नष्ट हो जाते हैं। इस उपवास के प्रभाव से मनुष्य मोह के जाल से मुक्त हो जाता है। अतः हे राम! दुखी मनुष्य को इस एकादशी का उपवास अवश्य ही करना चाहिये। इस व्रत के करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
अब आप इसकी कथा को श्रद्धापूर्वक सुनिये- प्राचीन समय में सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नाम की एक नगरी बसी हुई थी। उस नगरी में द्युतिमान नामक राजा राज्य करता था। उसी नगरी में एक वैश्य रहता था, जो धन-धान्य से पूर्ण था। उसका नाम धनपाल था। वह अत्यन्त धर्मात्मा तथा नारायण-भक्त था। उसने नगर में अनेक भोजनालय, प्याऊ, कुएँ, तालाब, धर्मशालाएं आदि बनवाये, सड़को के किनारे आम, जामुन, नीम आदि के वृक्ष लगवाए, जिससे पथिकों को सुख मिले। उस वैश्य के पाँच पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़ा पुत्र अत्यन्त पापी व दुष्ट था। वह वेश्याओं और दुष्टों की संगति करता था। इससे जो समय बचता था, उसे वह जुआ खेलने में व्यतीत करता था। वह बड़ा ही अधम था और देवता, पितृ आदि किसी को भी नहीं मानता था। अपने पिता का अधिकांश धन वह बुरे व्यसनों में ही उड़ाया करता था। मद्यपान तथा मांस का भक्षण करना उसका नित्य कर्म था। जब काफी समझाने-बुझाने पर भी वह सीधे रास्ते पर नहीं आया तो दुखी होकर उसके पिता, भाइयों तथा कुटुम्बियों ने उसे घर से निकाल दिया और उसकी निन्दा करने लगे। घर से निकलने के बाद वह अपने आभूषणों तथा वस्त्रों को बेच-बेचकर अपना गुजारा करने लगा।

धन नष्ट हो जाने पर वेश्याओं तथा उसके दुष्ट साथियों ने भी उसका साथ छोड़ दिया। जब वह भूख-प्यास से व्यथित हो गया तो उसने चोरी करने का विचार किया और रात्रि में चोरी करके अपना पेट पालने लगा, लेकिन एक दिन वह पकड़ा गया, किन्तु सिपाहियों ने वैश्य का पुत्र जानकर छोड़ दिया। जब वह दूसरी बार पुनः पकड़ा गया, तब सिपाहियों ने भी उसका कोई लिहाज नहीं किया और राजा के सामने प्रस्तुत करके उसे सारी बात बताई। तब राजा ने उसे कारागार में डलवा दिया। कारागार में राजा के आदेश से उसे बहुत कष्ट दिए गये और अन्त में उसे नगर छोड़ने के लिए कहा गया। दुखी होकर उसे नगर छोड़ना पड़ा।

अब वह जंगल में पशु-पक्षियों को मारकर पेट भरने लगा। फिर बहेलिया बन गया और धनुष-बाण से जंगल के निरीह जीवों को मार-मारकर खाने और बेचने लगा। एक बार वह भूख और प्यास से व्याकुल होकर भोजन की खोज में निकला और कौटिन्य मुनि के आश्रम में जा पहुँचा।

इन दिनों वैशाख का महीना था। कौटिन्य मुनि गंगा स्नान करके आये थे। उनके भीगे वस्त्रों की छींटें मात्र से इस पापी को कुछ सद्बुद्धि प्राप्त हुई। वह अधम, ऋषि के पास जाकर हाथ जोड़कर कहने लगा – ‘हे महात्मा! मैंने अपने जीवन में अनेक पाप किये हैं, कृपा कर आप उन पापों से छूटने का कोई साधारण और बिना धन का उपाय बतलाइये।’

ऋषि ने कहा – ‘तू ध्यान देकर सुन – वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत कर। इस एकादशी का नाम मोहिनी है। इसका उपवास करने से तेरे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।

ऋषि के वचनों को सुन वह बहुत प्रसन्न हुआ और उनकी बतलायी हुई विधि के अनुसार उसने मोहिनी एकादशी(Mohini Ekadashi) का व्रत किया।

हे श्रीराम! इस व्रत के प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो गये और अन्त में वह गरुड़ पर सवार हो विष्णुलोक को गया। संसार में इस व्रत से उत्तम दूसरा कोई व्रत नहीं है। इसके माहात्म्य के श्रवण व पठन से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य एक सहस्र गौदान के पुण्य के बराबर है।

मोहिनी एकादशी पूजा विधि (Mohini Ekadashi Puja Vidhi)

एकादशी व्रत के लिये व्रती को दशमी तिथि से ही नियमों का पालन करना चाहिये। दशमी तिथि को एक समय ही सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिये। ब्रह्मचर्य का पूर्णत: पालन करना चाहिये।
  • एकादशी से दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिये।
  • इसके पश्चात लाल वस्त्र से सजाकर कलश स्थापना कर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिये।
  • दिन में व्रती को मोहिनी एकादशी की व्रत कथा का सुननी या पढ़नी चाहिये।
  • रात्रि के समय श्री हरि का स्मरण करते हुए, भजन कीर्तन करते हुए जागरण करना चाहिये।
  • द्वादशी के दिन एकादशी व्रत का पारण किया जाता है।
  • सर्व प्रथम भगवान की पूजा कर किसी योग्य ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद को भोजनादि करवाकर दान दक्षिणा देकर संतुष्ट करना चाहिये। इसके पश्चात ही स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिये।

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Kamada Ekadashi 2022- कामदा एकादशी दिलाए मुक्ति https://astrodeeva.com/kamada-ekadashi-2022-kamada-ekadashi-brings-salvation/ https://astrodeeva.com/kamada-ekadashi-2022-kamada-ekadashi-brings-salvation/#respond Mon, 11 Apr 2022 12:00:58 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3196 Kamada Ekadashi 2022 : चैत्र महीने के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी को कामदा एकादशी(Kamada Ekadashi) मनाई जाती है। यह एकादशी चैत्र नवरात्र और रामनवमी के बाद आती है। इस एकादशी के दिन भगवान विष्‍णु की पूजा का विधान है। इस एकादशी का व्रत विधिपूर्वक रखने से व्‍यक्ति के सभी पापों का नाश हो जाता और राक्षस […]

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Kamada Ekadashi 2022 : चैत्र महीने के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी को कामदा एकादशी(Kamada Ekadashi) मनाई जाती है। यह एकादशी चैत्र नवरात्र और रामनवमी के बाद आती है। इस एकादशी के दिन भगवान विष्‍णु की पूजा का विधान है। इस एकादशी का व्रत विधिपूर्वक रखने से व्‍यक्ति के सभी पापों का नाश हो जाता और राक्षस आदि की योनि भी छूट जाती है। कहते हैं कि संसार में इसके बराबर कोई और दूसरा व्रत नहीं है। इसकी कथा पढ़ने या सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

कामदा एकादशी 2022(Kamada Ekadashi 2022 Shubh Timing)

दिनांक : 12 अप्रैल 2022
वार : मंगलवार

एकादशी तिथि प्रारम्भ: 12 अप्रैल 2022 को 04:30 ए एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 13 अप्रैल 2022 को 05:02 पी एम बजे

पारण (व्रत तोड़ने का) समय : 13 अप्रैल 2022 को 01:39 पी एम से 04:12 पी एम
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय : 10:58 ए एम

कामदा एकादशी का महत्‍व (Significance of Kamada Ekadashi)

हिन्‍दू धर्म में कामदा एकादशी का विशेष महत्‍व है। कहते हैं कि इस व्रत को करने से राक्षस योनि से तो छुटकारा मिलता ही है साथ ही साथ व्‍यक्ति को सभी संकटों और पापों से मुक्ति भी मिल जाती है। कामदा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। सुहागिन महिलाएं अगर इस एकादशी का व्रत रखें तो उन्‍हें अखंड सौभाग्‍य का वरदान प्राप्त होता है। और अगर इस व्रत को विवाह इच्छुक कुंवारी कन्‍याएं करें तो उनके विवाह में आ रही बाधा दूर होती है।

कामदा एकादशी व्रत कथा (Vrat Story of Kamada Ekadashi)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार राजा दिलीप ने गुरु वशिष्ठ से पूछा – “हे गुरुदेव! चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? उसमें किस देवता का पूजन होता है तथा उसका क्या विधान है? वह आप कृपापूर्वक बताइये।“

मुनि वशिष्ठ ने कहा – ‘हे राजन! चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम कामदा एकादशी है। यह समस्त पापों को नष्ट करने वाली है। जैसे अग्नि काठ  को जलाकर राख कर देती है, वैसे ही कामदा एकादशी के पुण्य के प्रभाव से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होती है। इसके उपवास से मनुष्य निकृष्ट योनि से मुक्त हो जाता है और अन्ततः उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। अब मैं इस एकादशी का माहात्म्य सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो- प्राचीन समय में भागीपुर नामक एक नगर था। जिस पर पुण्डरीक नाम का राजा राज करता था। राजा पुण्डरीक अनेक ऐश्वर्यों से युक्त था। उसके राज्य में अनेक अप्सराएँ, गन्धर्व, किन्नर आदि वास करते थे। उसी नगर में ललित और ललिता नाम के गायन विद्या में पारन्गत गन्धर्व स्त्री-पुरुष अति सम्पन्न घर में निवास करते हुए विहार किया करते थे। उन दोनों में इतना प्रेम था कि वे अलग हो जाने की कल्पना मात्र से ही व्यथित हो उठते थे। एक बार राजा पुण्डरीक गन्धर्वों सहित सभा में विराजमान थे। वहाँ गन्धर्वों के साथ ललित भी गायन कर रहा था। उस समय उसकी प्रियतमा ललिता वहाँ उपस्थित नहीं थी। गायन करते-करते अचानक उसे उसका ख्याल आ गया, जिसके कारण वह अशुद्ध गायन करने लगा। नागराज कर्कोटक ने राजा पुण्डरीक से उसकी शिकायत की। इस पर राजा को भयंकर क्रोध आया और उन्होंने क्रोधवश ललित को शाप (श्राप) दे दिया – ‘अरे नीच! तू मेरे सम्मुख गायन करते हुए भी अपनी स्त्री का स्मरण कर रहा है, इससे तू नरभक्षी दैत्य बनकर अपने कर्म का फल भोग।’

ललित गन्धर्व उसी समय राजा पुण्डरीक के शाप (श्राप) से एक भयंकर दैत्य में बदल गया। उसका मुख विकराल हो गया। उसके नेत्र सूर्य, चन्द्र के समान प्रदीप्त होने लगे। मुँह से आग की भयंकर ज्वालाएँ निकलने लगीं, उसकी नाक पर्वत की कन्दरा के समान विशाल हो गई और गर्दन पहाड़ के समान दिखायी देने लगी। उसकी भुजाएँ दो-दो योजन लम्बी हो गईं। इस प्रकार उसका शरीर आठ योजन का हो गया। इस तरह राक्षस बन जाने पर वह अनेक दुःख भोगने लगा। अपने प्रियतम ललित का ऐसा हाल होने पर ललिता अथाह दुःख से व्यथित हो उठी। वह अपने पति के उद्धार के लिए विचार करने लगी कि मैं कहाँ जाऊँ और क्या करूँ? किस जतन से अपने पति को इस नरक तुल्य कष्ट से मुक्त कराऊँ?

ये भी पढ़ें: Ekadashi Vrat 2022 – एकादशी व्रत तिथि 2022

राक्षस बना ललित घोर वनों में रहते हुए अनेक प्रकार के पाप करने लगा। उसकी स्त्री ललिता भी उसके पीछे-पीछे जाती और उसकी हालत देखकर विलाप करने लगती।

एक बार वह अपने पति के पीछे-पीछे चलते हुए विन्ध्याचल पर्वत पर पहुँच गई। उस स्थान पर उसने श्रृंगी मुनि का आश्रम देखा। वह शीघ्रता से उस आश्रम में गई और मुनि के सामने पहुँचकर दण्डवत् प्रणाम कर विनीत भाव से प्रार्थना करने लगी – ‘हे महर्षि! मैं वीरधन्वा नामक गन्धर्व की पुत्री ललिता हूँ, मेरा पति राजा पुण्डरीक के शाप (श्राप) से एक भयंकर दैत्य बन गया है। उससे मुझे अपार दुःख हो रहा है। अपने पति के कष्ट के कारण मैं बहुत दुखी हूँ। हे मुनिश्रेष्ठ! कृपा करके आप उसे राक्षस योनि से मुक्ति का कोई उत्तम उपाय बताएँ।’

समस्त वृत्तान्त सुनकर मुनि श्रृंगी ने कहा – ‘हे पुत्री! चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम कामदा एकादशी है। उसके व्रत करने से प्राणी के सभी मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण हो जाते हैं। यदि तू उसके व्रत के पुण्य को अपने पति को देगी तो वह सहज ही राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा और राजा का शाप (श्राप) शान्त हो जाएगा।’

ऋषि के कहे अनुसार ललिता ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया और द्वादशी के दिन ब्राह्मणों के समक्ष अपने व्रत का फल अपने पति को दे दिया और ईश्वर से प्रार्थना करने लगी – ‘हे प्रभु! मैंने जो यह उपवास किया है, उसका फल मेरे पतिदेव को मिले, जिससे उनकी राक्षस योनि से शीघ्र ही मुक्ति हो।’

एकादशी का फल देते ही उसका पति राक्षस योनि से मुक्त हो गया और अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त हुआ। वह अनेक सुन्दर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत होकर पहले की भाँति ललिता के साथ विहार करने लगा।

कामदा एकादशी के प्रभाव से वह पहले की भाँति सुन्दर हो गया और मृत्यु के बाद दोनों पुष्पक विमान पर बैठकर विष्णुलोक को चले गये।

कामदा एकादशी व्रत विधि ( Vrat Vidhi of Kamada Ekadashi)

इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और वंदना की जाती है। इस व्रत की पूजा विधि इस प्रकार है:

  • कामदा एकादशी व्रत के लिए उपासक को व्रत से पूर्व दशमी के दिन एक ही समय सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। व्रती को संयमित और ब्रह्मचार्य का पालन करना चाहिए।
  • एकादशी के दिन प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेकर धूप, दीप, फल और पंचामृत आदि अर्पित करके भगवान विष्णु के की पूजा करनी चाहिए।
  • तुलसी की माला ले और पीले आसन पर बैठकर ॐ नमो भगवते श्रीगोविन्दाय  मंत्र का एक माला जाप करें।
  • रात्रि में जागरण कर श्री हरि के नाम के भजन करना चाहिए।
  • द्वादशी के दिन किसी जरुरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन कराकर, दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिये।
**(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैंजिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

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Shattila Ekadashi 2022- षटतिला एकादशी https://astrodeeva.com/shattila-ekadashi-2022-%e0%a4%b7%e0%a4%9f%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80/ https://astrodeeva.com/shattila-ekadashi-2022-%e0%a4%b7%e0%a4%9f%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80/#respond Fri, 28 Jan 2022 03:47:35 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2718 नारद पुराण में व्रतों का महत्व बताते हुए उल्लेख किया  गया है कि – गंगा के समान कोई अन्य तीर्थ नहीं, माँ के समान कोई गुरु नहीं, भगवान विष्णु जैसा कोई देवता नहीं तथा व्रत एवं उपवास जैसा कोई तप नहीं। व्रतों में एकादशी(Ekadashi) व्रत को सर्वोपरि माना गया है। हिंदू पंचाग के अनुसार हर […]

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नारद पुराण में व्रतों का महत्व बताते हुए उल्लेख किया  गया है कि – गंगा के समान कोई अन्य तीर्थ नहीं, माँ के समान कोई गुरु नहीं, भगवान विष्णु जैसा कोई देवता नहीं तथा व्रत एवं उपवास जैसा कोई तप नहीं। व्रतों में एकादशी(Ekadashi) व्रत को सर्वोपरि माना गया है। हिंदू पंचाग के अनुसार हर हिंदू माह में दो पक्ष होते है शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी(Ekadashi) कहा जाता है और इस दिन भक्त भगवान विष्णु से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उपवास रखते हैं। एकादशी का व्रत तीन दिन तक चलता है। भक्त उपवास के दिन से एक दिन पहले दोपहर में भोजन लेते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अगले दिन पेट में कोई अवशिष्ट भोजन नहीं है। भक्त एकादशी के दिन कड़ा उपवास रखते हैं और अगले दिन सूर्योदय के बाद ही उपवास तोड़ते हैं। एकादशी व्रत के दौरान सभी प्रकार के अनाज का सेवन वर्जित होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो भक्त एकादशी का व्रत नियमित रूप से रखते हैं उनपर भगवान् श्री नारायण की कृपा सदैव बनी रहती है।

माघ माह हिन्दू धर्म में बेहद पवित्र माना जाता है। इस महीने मनुष्य को अपनी इंद्रियों को काबू में रखते हुए क्रोध, अहंकार, काम, लोभ व चुगली आदि का त्याग करना चाहिए। इस माह के कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को षटतिला एकादशी या तिला एकादशी के नाम से जाना जाता है। नाम के अनुसार इस एकादशी में तिल का बहुत महत्व होता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर(English calendar ) के अनुसार, यह त्योहार जनवरी या फरवरी महीने में होता है।

षटतिला एकादशी का महत्व (Significance of Shattila Ekadashi)

पुराणों में षटतिला एकादशी का बहुत अधिक महत्व बताया गया है। जो व्यक्ति षटतिला एकादशी का व्रत करता है। उसे स्वर्णदान का फल प्राप्त होता है। इस व्रत का फल हजारों साल तक की तपस्या के बराबर बताया गया है। यह व्रत मनुष्य को न केवल जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति कराता है बल्कि इस व्रत के करने से मृत्यु के बाद बैकुंठ धाम में स्थान भी प्राप्त होता है।

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षटतिला एकादशी की कथा ( Shattila Ekadashi Vrat Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार अर्जुन ने भगवान कृष्ण से पूछते हुआ कहा “हे मुरलीधर! आपके श्रीमुख से एकादशियों की कथा सुनकर मुझे असीम आनंद की प्राप्ति हुई है। हे केशव! कृपा कर माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनाने की भी अनुकम्पा करें।”

अर्जुन के इस आग्रह को सुन भगवान कृष्ण बोले , “हे अर्जुन! में तुम्हें षटतिला एकादशी व्रत की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो-

एक बार दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा – ‘हे ऋषि श्रेष्ठ! मनुष्य मृत्युलोक में अनेक प्रकार के महापाप करते हैं और दूसरे के धन की चोरी तथा दूसरे की उन्तति देखकर ईर्ष्या आदि करते हैं, मनुष्य ऐसे पाप क्रोध, ईर्ष्या, आवेग और मूर्खतावश करते हैं और बाद में पश्चाताप करते हैं कि हाय! यह हमने क्या किया! हे महामुनि! ऐसे मनुष्यों को जो भूल वश पाप करते है उन्हें नरक से बचाने का क्या उपाय है? कोई ऐसा उपाय बताने की कृपा करें, जिससे ऐसे मनुष्यों को नरक से बचाया जा सके।

दालभ्य ऋषि की बात सुन पुलत्स्य ऋषि ने कहा – ‘हे मुनि श्रेष्ठ! आपने मुझसे अत्यंत गूढ़ प्रश्न पूछा है। इससे संसार में मनुष्यों का बहुत लाभ होगा। जिस रहस्य को इन्द्र आदि देवता भी नहीं जानते, वह रहस्य मैं आपको अवश्य ही बताऊंगा। माघ मास आने पर मनुष्य को स्नान आदि से शुद्ध रहना चाहिए और इन्द्रियों को वश में करके तथा सांसारिक मोह जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या तथा अहंकार आदि से सर्वथा बचना चाहिए।

जिस दिन मूल नक्षत्र और एकादशी तिथि हो, तब अच्छे पुण्य देने वाले नियमों को ग्रहण करना चाहिए। स्नानादि नित्य कर्म से देवों के देव भगवान श्रीहरि का पूजन व कीर्तन करना चाहिए।

एकादशी (Ekadashi) के दिन उपवास करें तथा रात को जागरण और हवन करें। उसके दूसरे दिन धूप, दीप, नैवेद्य से भगवान श्रीहरि की पूजा-अर्चना करें तथा खिचड़ी का भोग लगाएं। उस दिन श्रीविष्णु को पेठा, नारियल, सीताफल या सुपारी सहित अर्घ्य अवश्य देना चाहिए, तदुपरांत उनकी स्तुति करनी चाहिए – ‘हे जगदीश्वर! आप निराश्रितों को शरण देने वाले हैं। आप संसार में डूबे हुए का उद्धार करने वाले हैं। हे कमलनयन! हे मधुसूदन! हे जगन्नाथ! हे पुण्डरीकाक्ष! आप लक्ष्मीजी सहित मेरे इस तुच्छ अर्घ्य को स्वीकार कीजिए।’ इसके पश्चात ब्राह्मण को जल से भरा घड़ा और तिल दान करने चाहिए। यदि सम्भव हो तो ब्राह्मण को गऊ और तिल दान देना चाहिए। इस प्रकार मनुष्य जितने तिलों का दान करता है। वह उतने ही सहस्र वर्ष स्वर्ग में वास करता है।

  • तिल स्नान
  • तिल की उबटन
  • तिलोदक
  • तिल का हवन
  • तिल का भोजन
  • तिल का दान

इस प्रकार छः रूपों में तिलों का प्रयोग षटतिला कहलाती है। इससे अनेक प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। इतना कहकर पुलस्त्य ऋषि ने कहा – ‘अब मैं एकादशी की कथा सुनाता हूँ-

एक समय नारदजी ने भगवान विष्णु से लोक कल्याण के लिए प्रश्न किया जिसके उत्तर में भगवान ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य नारदजी से कहा। भगवान ने नारदजी से कहा कि – हे नारद! मैं तुमसे सत्य घटना कहता हूं,  ध्यानपूर्वक सुनो।

प्राचीन काल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदैव व्रत करती, एक बार उसने एक माह तक व्रत किया जिसके कारण उसका शरीर अत्यंत क्षीण व दुर्बल हो गया। बुद्धिमान होने के बावजूद उसने कभी भी देवताओं या ब्राह्मणों के लिए किसी प्रकार का अन्न या धन का दान नहीं किया था। इससे मैंने सोचा कि ब्राह्मणी ने व्रत आदि से अपना शरीर शुद्ध कर लिया है, अब इसे विष्णुलोक तो मिल ही जाएगा परंतु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इससे इसकी तृप्ति होना कठिन है।

भगवान ने आगे कहा- ऐसा सोचकर मैं भिखारी के वेश में मृत्युलोक में उस ब्राह्मणी के पास गया और उससे भिक्षा माँगी। वह ब्राह्मणी बोली- महाराज आप किस लिए आए हो? मैंने कहा- मुझे भिक्षा चाहिए। इस पर उसने मुझे एक मिट्टी का पिंड दे दिया। मैं उस पिंड को लेकर स्वर्ग लौट आया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी भी शरीर त्याग कर स्वर्ग में आ गई। ब्राह्मणी के मिट्टी के पिंड के दान के प्रभाव से स्वर्ग में सुंदर महल मिला, परंतु उस महल में और कुछ न देख कर वह घबराकर मेरे पास आई और कहने लगी कि भगवन मैंने अपने जीवन काल में अनेक व्रत आदि से आपकी पूजा की

परंतु फिर भी मेरा घर सब वस्तुओं से रिक्त है। इसका क्या कारण है?

इस पर मैंने कहा- तुम अपने घर जाओ। जब देवस्त्रियाँ तुम्हें देखने के लिए आएँगी तब तुम उनसे षटतिला एकादशी(Shattila Ekadashi) व्रत का महत्व और उसका विधान पूछना, जब तक वह न बताएं, तब तक द्वार नहीं खोलना।

मेरे ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली- आप मुझे देखने आई हैं तो षटतिला एकादशी का महत्व मुझसे कहो। उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी कि मैं कहती हूँ। जब ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना तब द्वार खोल दिया। देवांगनाओं ने उसको देखा कि न तो वह गांधर्वी है और न आसुरी है वरन पहले जैसी मानुषी है। उस ब्राह्मणी ने देवस्त्रियों के कथनानुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया।

इसके प्रभाव से वह सुंदर और रूपवती हो गई तथा उसका घर समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया। अतः हे पार्थ! मनुष्यों को अज्ञान को त्यागकर षटतिला एकादशी(Shattila Ekadashi) का उपवास करना चाहिए। इस एकादशी व्रत के करने वाले को जन्म-जन्म की निरोगता प्राप्त हो जाती है। इस उपवास से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।”

षटतिला एकादशी की व्रत २०२२ – Shattila Ekadashi 2022

दिनांक : 28 जनवरी 2022
वार : शुक्रवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 28 जनवरी 2022 को 2:16 ए एम
एकादशी तिथि समाप्त – 28 जनवरी 2022 को 11:35 पी एम
पारण तिथि : 29 जनवरी 2022
पारण समय : 07:11 ए एम से 09:20 ए एम

षटतिला एकादशी की व्रत विधि (Shattila Ekadashi Puja Vidhi)

  • षटतिला एकादशी के एक दिन पूर्व दशमी तिथि से ही शुरु हो जाता है। इसलिए षटतिला एकादशी के नियमों का पालन दशमी तिथि से ही करें।
  • षटतिला एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त उठें और तिल के जल से स्नान करें । इसके बाद साफ वस्त्र धारण करें। लेकिन काले और नीले रंग के वस्त्र बिल्कुल भी धारण न करें।
  • इसके बाद एक साफ चौकी पर गंगाजल के छिंटे मारकर उस पर पीला कपड़ा बिछाएं और भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
  • इसके बाद उस प्रतिमा या तस्वीर को पंचामृत से स्नान कराएं जिसमें तुलसी दल अवश्य हो। इसके बाद दुबारा भगवान विष्णु को गंगाजल से स्नान कराएं।
  • इसके बाद भगवान विष्णु को पीले रंग के फूलों की माला पहनाएं और उन्हें पीले वस्त्र, पीले रंग के फूल, पीले रंग के फल , काले और सफेद तिल, नैवेद्य आदि अर्पित करें।
  • षटतिला एकादशी के दिन पुष्य नक्षत्र में गोबर, कपास, तिल मिलाकर उपले बनाने चाहिए फिर कुशा के आसन पर बैठकर- ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप कम से कम 108 बार करना चाहिए और इस उपलों से 108 बार हवन करना चाहिए।

षटतिला एकादशी( Shattila Ekadashi)  के दिन तिल का 6 प्रकार से उपयोग किया जाता है।

  1. तिल के जल से स्नान करें
  2. पिसे हुए तिल का उबटन करें
  3. तिलों का हवन करें
  4. तिल मिला हुआ जल पीयें
  5. तिलों का दान करें
  6. तिलों की मिठाई और व्यंजन बनाएं

षटतिला एकादशी व्रत पारण (Shattila Ekadashi Vrat Paran)

पारण का मतलब एकादशी व्रत के समापन से है जो अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है। लेकिन ध्यान रखें कि इस व्रत का पारण द्वादशी तिथि के भीतर ही कर लेना चाहिए। व्रत के समापन के समय इस बात का भी ध्यान रखें कि कहीं हरि वासर तो नहीं लग रहा है। द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि को हरि वासर कहा जाता है। पारण के लिए प्रात:काल को सही माना गया है। अगर हरि वासर के कारण ऐसा संभव न हो तब मध्याह्न के बाद व्रत खोलना उचित रहता है।

घर में समृद्धि लानी हे तो लगायें ये पेड़ -पौधे

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Mokshada Ekadashi 2021: मोक्षदा एकादशी , मोक्ष प्रदान करने वाला उत्तम व्रत https://astrodeeva.com/mokshada-ekadashi-2021-%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-%e0%a4%aa/ https://astrodeeva.com/mokshada-ekadashi-2021-%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-%e0%a4%aa/#respond Tue, 14 Dec 2021 03:03:12 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2698 मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी(Mokshada Ekadashi) के नाम से जाना जाता है। इस का तात्पर्य मोक्ष से है, यह पितरों के लिए मोक्ष के द्वार खोलती है। मोक्षदा एकादशी के दिन ही भगवान कृष्ण ने महाभारत के दौरान कुरुक्षेत्र में युगों-युगों तक मनुष्य को नई दिशा प्रदान करने वाली गीता […]

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मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी(Mokshada Ekadashi) के नाम से जाना जाता है। इस का तात्पर्य मोक्ष से है, यह पितरों के लिए मोक्ष के द्वार खोलती है। मोक्षदा एकादशी के दिन ही भगवान कृष्ण ने महाभारत के दौरान कुरुक्षेत्र में युगों-युगों तक मनुष्य को नई दिशा प्रदान करने वाली गीता का अर्जुन को उपदेश दिया था। इसलिय मोक्षदा एकादशी के दिन ही गीता जयंती भी मनायी जाती है। अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार मोक्षदा एकादशी नवंबर या दिसंबर के माह में आती है।

हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का सीधा सम्बन्ध जगत के पालनहार भगवान विष्णु से है। वैसे तो हर मास में 2 एकादशी होती है और एक वर्ष में 24 एकादशियाँ आती है परंतु जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष इनकी संख्या 26 हो जाती है।

मोक्षदा एकादशी 2021- Mokshada Ekadashi

दिनांक : 14 दिसम्बर 2021
वार : मंगलवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ : 13 दिसम्बर 2021 को 09:32 पी एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त : 14 दिसम्बर 2021 को 11:35 पी एम बजे
पारण (व्रत तोड़ने की) तिथि : 15 दिसम्बर 2021
पारण (व्रत तोड़ने का) समय : सुबह 07:06 से 09:10 बजे तक
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय : 16 दिसम्बर 2021, 02:01 ए एम बजे

एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत रखते हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती है।

मोक्षदा एकादशी की कथा

विष्णु पुराण के अनुसार एक बार अर्जुन में भगवान कृष्ण से कहा “हे परम पूजनीय ,हे त्रिलोकीनाथ! आप सभी को सुख व मोक्ष देने वाले हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। हे प्रभु! आप कृपा करने वाले हैं। मेरी एक जिज्ञासा को शांत कीजिए।”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! जो कुछ भी जानना चाहते हो, निर्भय होकर कहो, मैं अवश्य ही तुम्हारी जिज्ञासा को शांत करूंगा।”

“हे प्रभु! कृपा करके मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी पड़ती है उसके विषय में बताने की कृपा करें। उसका नाम क्या है? उस दिन कौन-से देवता की पूजा की जाती है और उसकी पूजन विधि क्या है? उसका व्रत करने से मनुष्य को क्या फल मिलता है? प्रभु! कृपा कर मेरे इन प्रश्नों का विस्तार पूर्वक उत्तर देकर मेरी इस जिज्ञासा को दूर कीजिए।

अर्जुन की जिज्ञासा सुन श्रीकृष्ण बोले- ‘हे अर्जुन! तुमने बहुत ही उत्तम प्रश्न किया है। मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी अनेक पापों को नष्ट करने वाली है। संसार में इसे मोक्षदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस एकादशी के दिन श्री दामोदर भगवान का धूप, दीप, नैवेद्य आदि से भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिए। हे धनञ्जय! इस एकादशी व्रत के पुण्य के प्रभाव से नरक में गए हुए माता, पिता, पितरादि को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

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इसकी कथा इस प्रकार है, इसे ध्यानपूर्वक सुनो- वैखानस नाम का एक राजा प्राचीन नगर में राज करता था। उसके राज्य में चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण रहते थे। राजा अपनी प्रजा का पुत्र के समान पालन किया करता था। एक रात्रि को स्वप्न में राजा ने अपने पिता को नरक की यातनाएं भोगते देखा, और वो इस स्वप्न को देखकर बड़ा ही व्याकुल हुआ। वह बेचैनी से सुबह होने की प्रतीक्षा करने लगा। सुबह होते ही उसने ब्राह्मणों को बुलाकर स्वप्न की बात बताई- ‘हे ब्राह्मणों! रात्रि को स्वप्न में मैंने अपने पिता को नरक की यातनाएं भोगते देखा। उन्होंने मुझसे कहा है कि हे पुत्र! मैं घोर नरक भोग रहा हूँ। मेरी यहां से मुक्ति कराओ। जब से मैंने उनके यह वचन सुने हैं, तब से मुझे चैन नहीं है। अब मैं क्या करूं? आप ज्ञानी ब्राह्मणजन मुझे कुछ उपाय बताइए जिससे मेरे पिता को मुक्ति प्राप्त हो। यदि मैंने अपने पिता को नरक की यातनाओं से मुक्त कराने के प्रयास नहीं किए तो मेरा जीवन निरर्थक है।

राजा के इस कथन को सुनकर ब्राह्मणों ने आपस में विचार-विमर्श किया, फिर एकमत होकर बोले- ‘राजन! वर्तमान, भूत और भविष्य के ज्ञाता पर्वत नाम के एक मुनि हैं। आप अपनी इस व्यथा को उनसे जाकर कहें और उन से इसका उपाय बताने की कृपा करें, वे अवश्य ही इसका कोई सरल उपाय आपको बता देंगे।’

ब्राह्मणों की बात मान राजा पर्वत मुनि के आश्रम पर गए। आश्रम में अनेक शांतचित्त योगी और मुनि तपस्या कर रहे थे। राजा ने पर्वत मुनि को दण्डवत् प्रणाम किया तथा अपना परिचय दिया। पर्वत मुनि ने राजा से कुशलक्षेम पूछी, तब राजा ने मुनि को व्यथित हृदय से रात में देखे गए स्वप्न की पूरी बात बताई और फिर दुःखी स्वर में बोला- ‘हे महर्षि! आप कृपा कर मेरा मार्ग दर्शन करें कि ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए? कैसे मैं अपने पिता को नरक की यातना से मुक्ति दिलाऊं?’

राजा की बात सुन , पर्वत मुनि ने अपने नेत्र बंद कर विचार करने लगे। कुछ देर गम्भीरतापूर्वक चिंतन करने के बाद उन्होंने कहा- ‘राजन! मैंने अपने योगबल के द्वारा तुम्हारे पिता के सभी कर्मों का ज्ञान प्राप्त किया है। उन्होंने पूर्व जन्म में अपनी पत्नियों में भेदभाव किया था। अपनी बड़ी रानी के कहने में आकर उन्होंने अपनी दूसरी पत्नी को ऋतुदान मांगने पर नहीं दिया था। उसी पाप कर्म के फल से तुम्हारे पिता को नरक प्राप्त हुआ है।’

यह जानकर राजा ने याचना-भरे स्वर में कहा- ‘हे ऋषिवर! मेरे पिता के उद्धार का आप कोई उपाय बताने की कृपा करें, किस प्रकार वे इस पाप से मुक्त होंगे?’

इस पर पर्वत मुनि बोले- ‘हे राजन! मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी होती है, उसे मोक्षदा एकादशी कहते हैं। यह मोक्ष प्रदान करने वाली है। आप इस मोक्षदा एकादशी का व्रत करें और उस व्रत के पुण्य को संकल्प करके अपने पिता को अर्पित कर दें। एकादशी के पुण्य प्रभाव से अवश्य ही आपके पिता की मुक्ति होगी।’

पर्वत मुनि के वचनों को सुनकर राजा अपने राज्य को लौट आया और परिवार सहित मोक्षदा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। इस व्रत के पुण्य को राजा ने अपने पिता को अर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से राजा के पिता को सहज ही मुक्ति मिल गई। स्वर्ग को प्रस्थान करते हुए राजा के पिता ने कहा- ‘हे पुत्र! तेरा कल्याण हो’ इतना कहकर राजा के पिता ने स्वर्ग को प्रस्थान किया।

मोक्षदा एकादशी का महत्व

हे कुंती पुत्र! जो मनुष्य मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का उपवास करते हैं, उनके सभी, पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में वे स्वर्ग लोक को प्राप्त करते हैं। इस उपवास से उत्तम फल और मोक्ष प्रदान करने वाला कोई भी दूसरा व्रत नहीं है। हे अर्जुन! प्रत्येक मनुष्य की प्रबल इच्छा होती है कि वह मोक्ष प्राप्त करे। मोक्ष की इच्छा करने वालों के लिए मोक्षदा एकादशी का यह उपवास अति महत्त्वपूर्ण है। पिता के प्रति पुत्र के दायित्व का इस कथा से श्रेष्ठ दृष्टांत दूसरा कोई नहीं है, अतः भगवान श्रीहरि विष्णु के निमित्त यह उपवास पूर्ण निष्ठा व श्रद्धा से करना चाहिए।”

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मोक्षदा एकादशी व्रत पूजा विधि

मोक्षदा एकादशी के दिन भगवान श्री कृष्ण, महर्षि वेद व्यास और श्रीमद् भागवत गीता का पूजन किया जाता है। इस व्रत की पूजा विधि इस प्रकार है:

  1. व्रत से एक दिन पूर्व यानी दशमी तिथि को दोपहर में भोजन करना चाहिए और रात्रि में भोजन नहीं करें।
  2. एकादशी के दिन प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
  3. व्रत का संकल्प लेने के बाद भगवान विष्णु की पूजा करें। उन्हें धूप,दीप और नैवेद्य आदि अर्पित करें। वहीं रात्रि में भी पूजा और जागरण करें।
  4. एकादशी के अगले दिन द्वादशी को पूजन के बाद जरुरतमंद व्यक्ति को भोजन व दान-दक्षिणा देनी चाहिए। इसके बाद भोजन ग्रहण करके व्रत खोलना चाहिए।

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Utpanna Ekadashi 2021 – प्रथम एकादशी व्रत, जाने महत्व, कथा और विधि https://astrodeeva.com/utpanna-ekadashi-2021-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a5%e0%a4%ae-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87/ https://astrodeeva.com/utpanna-ekadashi-2021-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a5%e0%a4%ae-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87/#respond Mon, 29 Nov 2021 17:12:10 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2684 हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि एकादशी का सीधा सम्बन्ध जगत के पालनहार भगवान विष्णु से है। वैसे तो हर मास में 2 एकादशी होती है और एक वर्ष में 24 एकादशियाँ आती है परंतु जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष इनकी संख्या 26 हो जाती है। इन सब […]

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हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि एकादशी का सीधा सम्बन्ध जगत के पालनहार भगवान विष्णु से है। वैसे तो हर मास में 2 एकादशी होती है और एक वर्ष में 24 एकादशियाँ आती है परंतु जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष इनकी संख्या 26 हो जाती है। इन सब में सबसे प्रथम एकादशी मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष एकादशी यानी उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi ) को माना जाता है क्यूँकि पुराणों के अनुसार इसी दिन देवी एकादशी ने उत्पन्न होकर राक्षस मुर का वध किया था। इसलिए इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है।

Utpanna Ekadashi व्रत 2021

दिनांक : 30 नवम्बर 2021
वार : मंगलवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 30 नवम्बर 2021 को 04:13 ए एम
एकादशी तिथि समाप्त – 01 दिसम्बर 2021 को 02:13 ए एम
पारण तिथि : 01 दिसम्बर 2021
पारण समय : 07:34 ए एम से 09:02 ए एम

जीन भक्तजनो ने एकादशी के उपवास को कभी नहीं रखा हैं और इस उपवास को रखना चाहते है वो इस मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी अर्थात उत्पन्ना एकादशी से इसका आरंभ कर सकते है क्योंकि सर्वप्रथम हेमंत ऋतु में इसी एकादशी से इस व्रत का प्रारंभ हुआ माना जाता है।

उत्पन्ना एकादशी का महत्व – Significance of Utpanna Ekadashi

पुराणो के अनुसार जो भक्त उत्पन्ना एकादशी का विधि-विधान से व्रत करता है और इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करता है उसे संक्रान्ति में तथा सूर्य और चन्द्र ग्रहण में दान देने से और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य मनुष्य को एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। जो फल ब्राह्मणों को एक हजार गौदान करने से प्राप्त होता है, उससे दस गुना अधिक पुण्य मिलता है। इस के साथ जो भक्त इस दिन दान देता है उसे उसके दिए हुए दान का कई गुना फल प्राप्त होता है।

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा – Legend of Utpanna Ekadashi

विष्णु पुराण के अनुसार एक बार अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा- “हे प्रभु! आप मुझे एकादशी व्रत के बारे में  कृपा कर विस्तारपूर्वक बताइये।”

श्रीकृष्ण बोले- “हे पार्थ! सतयुग में एक महा भयंकर दैत्य हुआ था, उसका नाम मुर था। उस दैत्य ने इन्द्र आदि देवताओं पर विजय प्राप्त कर उन्हें उनके पद से हटा दिया और स्वर्ग पे अपना आधिपत्य जमा लिया। तब इन्द्र और अन्य देवता वहाँ से भाग कर मृत्युलोक में आ गए और भगवान शंकर से प्रार्थना की- ‘हे भोलेनाथ! हम सब देवता, मुर दैत्य के अत्याचारों से दुखी होकर मृत्युलोक में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। राक्षसों के भय से हम सब बहुत दुख और कष्ट भोग रहे हैं। अतः कृपा कर आप मुर दैत्य के अत्याचार से बचने का उपाय बतलाइये।’

देवराज की प्रार्थना सुन कैलाशपति ने कहा- ‘हे देवेन्द्र! आप भगवान श्रीहरि की शरण में जाइए और उन से इस का उपाय करने का आग्रह करिये। भगवान विष्णु देवताओं को अवश्य ही इस भय से मुक्त करेंगे।’ भोलेनाथ के आदेशानुसार इन्द्र तथा अन्य देवता क्षीर सागर गए, जहाँ पर भगवान श्रीहरि शेष-शैया पर विराजमान थे।

इन्द्र सहित सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के समक्ष उपस्थित होकर उनसे प्रार्थना की – ‘हे तीनों लोकों के स्वामी! हम सभी देवताओं का आपको कोटि-कोटि प्रणाम है। हम आपकी शरण में आए हैं, आप हमारी रक्षा करें। हे जगत के पलनहार! हम सभी देवता दैत्यों के अत्याचारों से भयभीत होकर आपकी शरण में आए हैं। इस समय दैत्यों ने हमें स्वर्ग से निकाल दिया है और हम सभी देवता बड़ी ही दयनीय स्थिति में मृत्युलोक में विचरण कर रहे हैं। अब आप ही हमारे रक्षक हैं! रक्षा कीजिये।

देवताओं का आग्रह सुन, भगवान श्रीहरि बाले- ‘हे देवगणो! वह कौन-सा दैत्य है, जिसने देवताओं को जीत लिया है? आप सभी देवगण किसके भय से पृथ्वीलोक में भटक रहे हैं? क्या वह दैत्य इतना बलवान है, जिसने इन्द्र सहित सभी देवताओं को जीत लिया है? तुम निर्भय होकर मुझे सब हाल बताओ।

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तब देवेन्द्र ने कहा- ‘हे प्रभु! चन्द्रवती नामक नगरी में निवास करने वाला मुर नामक दैत्य ने बल से मृत्युलोक और देवलोक को जीत लिया हैं और सब देवताओं को देवलोक से निकालकर, अपने दैत्य कुल के असुरों लोकपाल बना दिया है। वह स्वयं सूर्य बनकर पृथ्वी को तापता है और स्वयं मेघ बनकर जल की वर्षा करता है, अतः आप इस बलशाली भयानक असुर का संहार करके देवताओं की रक्षा करें।’

इंद्र के मुख से ऐसे वचन सुन भगवान विष्णु बोले- ‘हे देवताओं! मैं आपके शत्रु का शीघ्र ही संहार करूँगा। आप सब इसी समय मेरे साथ चन्द्रवती नगरी चलिए।’

देवताओं की पुकार पर भगवान विष्णु तुरन्त ही उनके साथ चल दिए। उधर दैत्यराज मुर ने अपने तेज से जान लिया था कि श्री विष्णु युद्ध की इच्छा से उसकी राजधानी की तरफ आ रहे हैं, अतः अपने राक्षस योद्धाओं के साथ वह भी युद्ध भूमि में आकर गरजने लगा। देखते-ही-देखते घोर युद्ध शुरू हो गया। देवता तो पहले ही डरे हुए थे, वह अधिक देर तक राक्षसों का सामना न कर सके और भाग खड़े हुए। तब भगवान विष्णु स्वयं युद्ध-भूमि में आ गए। देवताओं को भागता देख  दैत्य पहले से भी ज्यादा जोश में भरकर भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे। वे अपने अस्त्र-शस्त्रों से उन पर भयंकर प्रहार करने लगे। दैत्यों के आक्रमण वारों को भगवान विष्णु अपने चक्र और गदा के प्रहारों से नष्ट करने लगे। इस युद्ध में अनेक दैत्य मृत्यु की गोद में समा गए, किन्तु दैत्य मुर भगवान विष्णु के साथ युद्ध करता रहा। उसका तो जैसे अभी बाल भी बांका नहीं हुआ था। वह बिना डरे युद्ध कर रहा था। भगवान विष्णु मुर को मारने के लिए जिन-जिन शस्त्रों का प्रयोग करते, वे सब उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगते। जब अनेक अस्त्रों-शस्त्रों का प्रयोग करने पर भी दोनो एक दूसरे को जीत न सके, तब वे आपस में मल्ल युद्ध करने लगे। यह युद्ध अनेक वर्षों तक चलता रहा। अन्त में भगवान विष्णु शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बदरिकाश्रम स्थित अड़तीस कोस लम्बी एक द्वार वाली हेमवती नामक गुफा में प्रवेश कर गए।

हे अर्जुन! उस गुफा में प्रभु ने शयन किया। भगवान विष्णु के पीछे-पीछे वह दैत्य भी चला आया था। भगवान श्रीहरि को सोता देखकर वह उन्हें मारने को तैयार हो गया। परन्तु उसकी यह इच्छा पूर्ण न हो सकी, क्योंकि उसी समय भगवान विष्णु की देह से दिव्य वस्त्र धारण किए एक अत्यन्त मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई और राक्षस को ललकारकर उससे युद्ध करने लगी और कुछ समय बीतने पर उस कन्या ने अपने शास्त्रों से दैत्य के अस्त्र-शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और उसका रथ भी तोड़ डाला। अब तो उस दैत्य को बड़ा ही क्रोध आया और वह सारी मर्यादाएँ भंग करके उस कन्या से मल्ल युद्ध करने लगा। उस तेजस्वी कन्या ने उसको धक्का मारकर मुर्च्छित कर दिया और उसकी मूर्च्छा टूटने से पूर्व ही उसका सिर काटकर धड़ से अलग कर दिया।

सिर काटते ही वह असुर मृत्यु को प्राप्त हुआ। भगवान विष्णु जब निद्रा से जागे तो उस असुर को मरा देखकर उन्हें घोर आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि इस महाबली को किसने मारा है?

तब वह तेजस्वी कन्या श्रीहरि से हाथ जोड़कर बोली- ‘हे जगदीश्वर! यह असुर आपको मारने को उद्यत था, तब मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इस असुर का वध किया है।’  कन्या की बात सुन भगवान बोले- ‘तुमने इस असुर को मारा है, अतः हे कन्या! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। इसे मारकर तुमने देवताओं के कष्ट को हरा है, इसलिए तुम अपनी इच्छानुसार वरदान मांग लो। मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करूँगा।’

भगवान की बात सुन कन्या बोली- ‘हे प्रभु! मुझे यह वरदान दीजिये कि जो भी मनुष्य या देव मेरा व्रत करे, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएँ और अन्त में उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हो। मेरे व्रत का आधा फल रात्रि को मिले और उसका आधा फल एक समय भोजन करने वाले को मिले। जो श्रद्धालु भक्तिपूर्वक मेरे व्रत को करें, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक को प्राप्त करें। जो मनुष्य मेरे व्रत में दिन तथा रात्रि को एक बार भोजन करे, वह धन-धान्य से भरपूर रहे। कृपा करके मुझे ऐसा वरदान दीजिये।’

भगवान विष्णु ने कहा- ‘हे कन्या! ऐसा ही होगा। मेरे और तुम्हारे भक्त एक ही होंगे और अन्त में संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त होकर मेरे लोक को प्राप्त करेंगे। तुम एकादशी को पैदा हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम भी एकादशी हुआ और क्योंकि तुम मेरे अंश से उत्पन्न हुई हो, इसलिए संसार मे तुम उत्पन्ना एकादशी के नाम से जानी जाओगी तथा जो मनुष्य इस दिन व्रत करेंगे, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे। तुम्हारे व्रत का फल सब तीर्थों के फल से भी महान होगा।

इतना कहकर, भगवान श्रीहरि उसी स्थान पर अंतर्ध्यान हो गए।”

श्री कृष्ण ने कहा- “हे कुंती पुत्र! एकादशी के व्रत का फल सभी व्रतों व सभी तीर्थों के फल से महान है। एकादशी व्रत करने वाले मनुष्यों के शत्रुओं का मैं जड़ से नाश कर देता हूँ और व्रत करने वाले को मोक्ष प्रदान करता हूँ। उन मनुष्यों के जीवन के जो भी कष्ट होते हैं। मैं उन्हें भी दूर कर देता हूँ। अर्थात मुझे अत्यन्त प्रिय एकादशी के व्रत को करने वाला प्राणी सभी ओर से निर्भय और सुखी होकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त होता है। हे कुन्ती पुत्र! यह मैंने तुम्हें एकादशी की उत्पत्ति के विषय में बतलाया है। एकादशी व्रत सभी पापों को नष्ट करने वाला और सिद्धि प्रदान करने वाला है। श्रेष्ठ मनुष्यों को दोनों पक्षों की एकादशियों को समान समझना चाहिए। उनमें भेद-भाव करना उचित नहीं है। जो मनुष्य एकादशी माहात्म्य का श्रवण व पठन करेंगे, उन्हें अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होगा।

उत्पन्ना एकादशी व्रत की विधि – Vrat Vidhi of Utpanna Ekadashi

एकादशी व्रत की शुरुआत उत्पन्ना एकादशी व्रत से करनी चहिये। सभी एकादशी व्रत का पूजा विधान एक समान होता है, जो कि इस प्रकार है:

  • एकादशी व्रत रखने वाले भक्त को एक दिन पूर्व यानि दशमी की रात्रि में भोजन नहीं करना चाहिए।
  • एकादशी के दिन प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए और उन्हें पुष्प, जल, धूप, दीप, अक्षत अर्पित करना चाहिए।
  • इस दिन केवल फलों का ही भोग लगाना चाहिए और समय-समय पर भगवान विष्णु का सुमिरन करना चाहिए। रात्रि में पूजन के बाद जागरण करना चाहिए.
  • अगले दिन द्वादशी को उचित समय पर पारण करना चाहिए। किसी जरुरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन व दान-दक्षिणा देना चाहिए। इसके बाद स्वयं भोजन कर के व्रत खोलना चाहिए।

एकादशी आरती

ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता ।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। ॐ।।

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी ।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।।ॐ।।

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई।। ॐ।।

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है।
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै ।। ॐ ।।

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै ।। ॐ ।।

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी,
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की ।। ॐ ।।

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली,
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। ॐ ।।

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी,
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी।। ॐ ।।

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी ।। ॐ ।।

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए।। ॐ ।।

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला।। ॐ ।।

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।
रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी ।। ॐ ।।

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।
पावन मास में करूं विनती पार करो नैया ।। ॐ ।।

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।।
शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी ।। ॐ ।।

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै।। ॐ 

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