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हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि एकादशी का सीधा सम्बन्ध जगत के पालनहार भगवान विष्णु से है। वैसे तो हर मास में 2 एकादशी होती है और एक वर्ष में 24 एकादशियाँ आती है परंतु जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष इनकी संख्या 26 हो जाती है।इन सब में सबसे प्रथम एकादशी मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष एकादशी को माना जाता है क्यूँकि पुराणों के अनुसार इसी दिन देवी एकादशी ने उत्पन्न होकर राक्षस मुर का वध किया था। इसलिए इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi 2023) कहा जाता है।

उत्पन्ना एकादशी का महत्व

पुराणो के अनुसार जो भक्त उत्पन्ना एकादशी का विधि-विधान से व्रत करता है और इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करता है उसे संक्रान्ति में तथा सूर्य और चन्द्र ग्रहण में दान देने से और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य मनुष्य को एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। जो फल ब्राह्मणों को एक हजार गौदान करने से प्राप्त होता है, उससे दस गुना अधिक पुण्य मिलता है। इस के साथ जो भक्त इस दिन दान देता है उसे उसके दिए हुए दान का कई गुना फल प्राप्त होता है।

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

विष्णु पुराण के अनुसार एक बार अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा- “हे प्रभु! आप मुझे एकादशी व्रत के बारे में  कृपा कर विस्तारपूर्वक बताइये।”

श्रीकृष्ण बोले- “हे पार्थ! सतयुग में एक महा भयंकर दैत्य हुआ था, उसका नाम मुर था। उस दैत्य ने इन्द्र आदि देवताओं पर विजय प्राप्त कर उन्हें उनके पद से हटा दिया और स्वर्ग पे अपना आधिपत्य जमा लिया। तब इन्द्र और अन्य देवता वहाँ से भाग कर मृत्युलोक में आ गए और भगवान शंकर से प्रार्थना की- ‘हे भोलेनाथ! हम सब देवता, मुर दैत्य के अत्याचारों से दुखी होकर मृत्युलोक में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। राक्षसों के भय से हम सब बहुत दुख और कष्ट भोग रहे हैं। अतः कृपा कर आप मुर दैत्य के अत्याचार से बचने का उपाय बतलाइये।’

देवराज की प्रार्थना सुन कैलाशपति ने कहा- ‘हे देवेन्द्र! आप भगवान श्रीहरि की शरण में जाइए और उन से इस का उपाय करने का आग्रह करिये। भगवान विष्णु देवताओं को अवश्य ही इस भय से मुक्त करेंगे।’ भोलेनाथ के आदेशानुसार इन्द्र तथा अन्य देवता क्षीर सागर गए, जहाँ पर भगवान श्रीहरि शेष-शैया पर विराजमान थे।

इन्द्र सहित सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के समक्ष उपस्थित होकर उनसे प्रार्थना की – ‘हे तीनों लोकों के स्वामी! हम सभी देवताओं का आपको कोटि-कोटि प्रणाम है। हम आपकी शरण में आए हैं, आप हमारी रक्षा करें। हे जगत के पलनहार! हम सभी देवता दैत्यों के अत्याचारों से भयभीत होकर आपकी शरण में आए हैं। इस समय दैत्यों ने हमें स्वर्ग से निकाल दिया है और हम सभी देवता बड़ी ही दयनीय स्थिति में मृत्युलोक में विचरण कर रहे हैं। अब आप ही हमारे रक्षक हैं! रक्षा कीजिये।

देवताओं का आग्रह सुन, भगवान श्रीहरि बाले- ‘हे देवगणो! वह कौन-सा दैत्य है, जिसने देवताओं को जीत लिया है? आप सभी देवगण किसके भय से पृथ्वीलोक में भटक रहे हैं? क्या वह दैत्य इतना बलवान है, जिसने इन्द्र सहित सभी देवताओं को जीत लिया है? तुम निर्भय होकर मुझे सब हाल बताओ।

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तब देवेन्द्र ने कहा- ‘हे प्रभु! चन्द्रवती नामक नगरी में निवास करने वाला मुर नामक दैत्य ने बल से मृत्युलोक और देवलोक को जीत लिया हैं और सब देवताओं को देवलोक से निकालकर, अपने दैत्य कुल के असुरों लोकपाल बना दिया है। वह स्वयं सूर्य बनकर पृथ्वी को तापता है और स्वयं मेघ बनकर जल की वर्षा करता है, अतः आप इस बलशाली भयानक असुर का संहार करके देवताओं की रक्षा करें।’

इंद्र के मुख से ऐसे वचन सुन भगवान विष्णु बोले- ‘हे देवताओं! मैं आपके शत्रु का शीघ्र ही संहार करूँगा। आप सब इसी समय मेरे साथ चन्द्रवती नगरी चलिए।’

देवताओं की पुकार पर भगवान विष्णु तुरन्त ही उनके साथ चल दिए। उधर दैत्यराज मुर ने अपने तेज से जान लिया था कि श्री विष्णु युद्ध की इच्छा से उसकी राजधानी की तरफ आ रहे हैं, अतः अपने राक्षस योद्धाओं के साथ वह भी युद्ध भूमि में आकर गरजने लगा। देखते-ही-देखते घोर युद्ध शुरू हो गया। देवता तो पहले ही डरे हुए थे, वह अधिक देर तक राक्षसों का सामना न कर सके और भाग खड़े हुए। तब भगवान विष्णु स्वयं युद्ध-भूमि में आ गए। देवताओं को भागता देख  दैत्य पहले से भी ज्यादा जोश में भरकर भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे। वे अपने अस्त्र-शस्त्रों से उन पर भयंकर प्रहार करने लगे। दैत्यों के आक्रमण वारों को भगवान विष्णु अपने चक्र और गदा के प्रहारों से नष्ट करने लगे। इस युद्ध में अनेक दैत्य मृत्यु की गोद में समा गए, किन्तु दैत्य मुर भगवान विष्णु के साथ युद्ध करता रहा। उसका तो जैसे अभी बाल भी बांका नहीं हुआ था। वह बिना डरे युद्ध कर रहा था। भगवान विष्णु मुर को मारने के लिए जिन-जिन शस्त्रों का प्रयोग करते, वे सब उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगते। जब अनेक अस्त्रों-शस्त्रों का प्रयोग करने पर भी दोनो एक दूसरे को जीत न सके, तब वे आपस में मल्ल युद्ध करने लगे। यह युद्ध अनेक वर्षों तक चलता रहा। अन्त में भगवान विष्णु शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बदरिकाश्रम स्थित अड़तीस कोस लम्बी एक द्वार वाली हेमवती नामक गुफा में प्रवेश कर गए।

हे अर्जुन! उस गुफा में प्रभु ने शयन किया। भगवान विष्णु के पीछे-पीछे वह दैत्य भी चला आया था। भगवान श्रीहरि को सोता देखकर वह उन्हें मारने को तैयार हो गया। परन्तु उसकी यह इच्छा पूर्ण न हो सकी, क्योंकि उसी समय भगवान विष्णु की देह से दिव्य वस्त्र धारण किए एक अत्यन्त मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई और राक्षस को ललकारकर उससे युद्ध करने लगी और कुछ समय बीतने पर उस कन्या ने अपने शास्त्रों से दैत्य के अस्त्र-शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और उसका रथ भी तोड़ डाला। अब तो उस दैत्य को बड़ा ही क्रोध आया और वह सारी मर्यादाएँ भंग करके उस कन्या से मल्ल युद्ध करने लगा। उस तेजस्वी कन्या ने उसको धक्का मारकर मुर्च्छित कर दिया और उसकी मूर्च्छा टूटने से पूर्व ही उसका सिर काटकर धड़ से अलग कर दिया।

सिर काटते ही वह असुर मृत्यु को प्राप्त हुआ। भगवान विष्णु जब निद्रा से जागे तो उस असुर को मरा देखकर उन्हें घोर आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि इस महाबली को किसने मारा है?

तब वह तेजस्वी कन्या श्रीहरि से हाथ जोड़कर बोली- ‘हे जगदीश्वर! यह असुर आपको मारने को उद्यत था, तब मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इस असुर का वध किया है।’  कन्या की बात सुन भगवान बोले- ‘तुमने इस असुर को मारा है, अतः हे कन्या! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। इसे मारकर तुमने देवताओं के कष्ट को हरा है, इसलिए तुम अपनी इच्छानुसार वरदान मांग लो। मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करूँगा।’

भगवान की बात सुन कन्या बोली- ‘हे प्रभु! मुझे यह वरदान दीजिये कि जो भी मनुष्य या देव मेरा व्रत करे, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएँ और अन्त में उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हो। मेरे व्रत का आधा फल रात्रि को मिले और उसका आधा फल एक समय भोजन करने वाले को मिले। जो श्रद्धालु भक्तिपूर्वक मेरे व्रत को करें, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक को प्राप्त करें। जो मनुष्य मेरे व्रत में दिन तथा रात्रि को एक बार भोजन करे, वह धन-धान्य से भरपूर रहे। कृपा करके मुझे ऐसा वरदान दीजिये।’

भगवान विष्णु ने कहा- ‘हे कन्या! ऐसा ही होगा। मेरे और तुम्हारे भक्त एक ही होंगे और अन्त में संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त होकर मेरे लोक को प्राप्त करेंगे। तुम एकादशी को पैदा हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम भी एकादशी हुआ और क्योंकि तुम मेरे अंश से उत्पन्न हुई हो, इसलिए संसार मे तुम उत्पन्ना एकादशी के नाम से जानी जाओगी तथा जो मनुष्य इस दिन व्रत करेंगे, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे। तुम्हारे व्रत का फल सब तीर्थों के फल से भी महान होगा।

इतना कहकर, भगवान श्रीहरि उसी स्थान पर अंतर्ध्यान हो गए।”

श्री कृष्ण ने कहा- “हे कुंती पुत्र! एकादशी के व्रत का फल सभी व्रतों व सभी तीर्थों के फल से महान है। एकादशी व्रत करने वाले मनुष्यों के शत्रुओं का मैं जड़ से नाश कर देता हूँ और व्रत करने वाले को मोक्ष प्रदान करता हूँ। उन मनुष्यों के जीवन के जो भी कष्ट होते हैं। मैं उन्हें भी दूर कर देता हूँ। अर्थात मुझे अत्यन्त प्रिय एकादशी के व्रत को करने वाला प्राणी सभी ओर से निर्भय और सुखी होकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त होता है। हे कुन्ती पुत्र! यह मैंने तुम्हें एकादशी की उत्पत्ति के विषय में बतलाया है। एकादशी व्रत सभी पापों को नष्ट करने वाला और सिद्धि प्रदान करने वाला है। श्रेष्ठ मनुष्यों को दोनों पक्षों की एकादशियों को समान समझना चाहिए। उनमें भेद-भाव करना उचित नहीं है। जो मनुष्य एकादशी माहात्म्य का श्रवण व पठन करेंगे, उन्हें अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होगा।

उत्पन्ना एकादशी व्रत की विधि

एकादशी व्रत की शुरुआत उत्पन्ना एकादशी व्रत से करनी चहिये। सभी एकादशी व्रत का पूजा विधान एक समान होता है, जो कि इस प्रकार है:

  • एकादशी व्रत रखने वाले भक्त को एक दिन पूर्व यानि दशमी की रात्रि में भोजन नहीं करना चाहिए।
  • एकादशी के दिन प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए और उन्हें पुष्प, जल, धूप, दीप, अक्षत अर्पित करना चाहिए।
  • इस दिन केवल फलों का ही भोग लगाना चाहिए और समय-समय पर भगवान विष्णु का सुमिरन करना चाहिए। रात्रि में पूजन के बाद जागरण करना चाहिए.
  • अगले दिन द्वादशी को उचित समय पर पारण करना चाहिए। किसी जरुरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन व दान-दक्षिणा देना चाहिए। इसके बाद स्वयं भोजन कर के व्रत खोलना चाहिए।

उत्पन्ना एकादशी व्रत -Utpanna Ekadashi 2023

दिनांक : 08 दिसम्बर 2023

वार : शुक्रवार

एकादशी तिथि प्रारम्भ – 08 दिसम्बर 2023 को 05:06 ए एम

एकादशी तिथि समाप्त – 09 दिसम्बर 2023 को 06:31 ए एम

पारण तिथि : 09 दिसम्बर 2023

पारण समय : 01:16 पी एम से 03:20 पी एम

जीन भक्तजनो ने एकादशी के उपवास को नहीं रखा हैं और इस उपवास को रखना चाहते है वो इस मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी अर्थात उत्पन्ना एकादशी से इसका आरंभ कर सकते है क्योंकि सर्वप्रथम हेमंत ऋतु में इसी एकादशी से इस व्रत का प्रारंभ हुआ माना जाता है।

एकादशी आरती

ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता ।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। ॐ।।

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी ।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।।ॐ।।

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई।। ॐ।।

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है,
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै ।। ॐ ।।

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै ।। ॐ ।।

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी,
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की ।। ॐ ।।

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली,
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। ॐ ।।

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी,
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी।। ॐ ।।

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी ।। ॐ ।।

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए।। ॐ ।।

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला।। ॐ ।।

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।
रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी ।। ॐ ।।

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।
पावन मास में करूं विनती पार करो नैया ।। ॐ ।।

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।।
शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी ।। ॐ ।।

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै।। ॐ ।।

 

 

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Ekadashi Vrat- एकादशी व्रत करने से पहले जरूरी है इन 15 बातों को जानना….. https://astrodeeva.com/it-is-important-to-know-these-15-things-before-fasting-on-ekadashi-vrat/ https://astrodeeva.com/it-is-important-to-know-these-15-things-before-fasting-on-ekadashi-vrat/#respond Wed, 25 May 2022 12:06:52 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3480 एकादशी व्रत (Ekadashi Vrat) का भारतीय सनातन धर्म में बहुत महत्व है। इस व्रत से संकल्प और आत्मविश्वास बढ़ता है, देवताओं की कृपा बरसने लगती है और जीवन के सारे दु:ख और संताप कट जाते हैं और व्रती का भविष्य उज्ज्वल हो जाता है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार वर्ष 26 व्रत बताए गये है जिनको […]

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एकादशी व्रत (Ekadashi Vrat) का भारतीय सनातन धर्म में बहुत महत्व है। इस व्रत से संकल्प और आत्मविश्वास बढ़ता है, देवताओं की कृपा बरसने लगती है और जीवन के सारे दु:ख और संताप कट जाते हैं और व्रती का भविष्य उज्ज्वल हो जाता है।

हिंदू शास्त्रों के अनुसार वर्ष 26 व्रत बताए गये है जिनको व्यक्ति अगर नियम अनुसार करे तो इन व्रत के फलस्वरूप उसके सभी पाप नष्ट होते हैं उसको निरोगी काया, पारिवारिक सुख और धन-समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह 26 व्रत हिंदू पंचांग के अनुसार प्रति माह की ग्यारहवीं तिथि यानी एकादशी तिथि को किया जाता है। इसे एकादशी व्रत और ग्यारस व्रत कहा जाता है। आइए जानते है एकादशी व्रत की 15 महत्वपूर्ण बातें….

एकादशी (Ekadashi Vrat) की ये 15 बातें आपको जरूर जानना चाहिए :-

  1. माह में 2 एकादशियां होती हैं अर्थात आपको माह में बस 2 बार और वर्ष के 365 दिनों में मात्र 24 बार ही नियमपूर्वक एकादशी व्रत(Ekadashi Vrat) रखना है। हालांकि प्रत्येक तीसरे वर्ष अधिकमास होने से 2 एकादशियां जुड़कर ये कुल 26 होती हैं। एकादशी व्रत तिथि 2022
  2. पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति एकादशी करता रहता है, वह जीवन में कभी भी संकटों से नहीं घिरता और उनके जीवन में धन और समृद्धि बनी रहती है।
  3. चैत्र माह में कामदा और वरुथिनी एकादशी होती है। कामदा से राक्षस आदि की योनि से छुटकारा मिलता है और यह सर्वकार्य सिद्धि करती है तो वरुथिनी सौभाग्य देने, सब पापों को नष्ट करने तथा मोक्ष देने वाली है।
  4. वैशाख माह में मोहिनी और अपरा आती हैं। यह एकादशी विवाह, सुख, समृद्धि और शांति प्रदान करती है, साथ ही मोह-माया के बंधनों से मुक्त करती है। अपरा एकादशी व्रत से मनुष्य को अपार खुशियों की प्राप्ति होती है तथा समस्त पापों से मुक्ति मिलती है।
  5. ज्येष्ठ माह में निर्जला और योगिनी एकादशी होती है। निर्जला का अर्थ निराहार और निर्जल रहकर व्रत करना। इसके करने से हर प्रकार की मनोरथ सिद्धि होती है। योगिनी एकादशी से समस्त पाप दूर हो जाते हैं और व्यक्ति पारिवारिक सुख पाता है।
  6. आषाढ़ माह में देवशयनी एवं कामिका होती हैं। देवशयनी एकादशी का व्रत करने से सिद्धि प्राप्त होती है। यह व्रत सभी उपद्रवों को शांत कर सुखी बनाता है। कामिका एकादशी का व्रत सभी पापों से मुक्त कर जीव को कुयोनि को प्राप्त नहीं होने देता है।
  7. श्रावण माह में पुत्रदा एवं अजा एकादशी होती है। पुत्रदा एकादशी करने से संतान सुख प्राप्त होता है। अजा एकादशी से पुत्र पर कोई संकट नहीं आता, दरिद्रता दूर हो जाती है, खोया हुआ सबकुछ पुन: प्राप्त हो जाता है।
  8. भाद्रपद माह में परिवर्तिनी एवं इंदिरा एकादशी आती हैं। परिवर्तिनी एकादशी के व्रत से सभी दु:ख दूर होकर मुक्ति मिलती है। पितरों को अधोगति से मुक्ति देने वाली इंदिरा एकादशी के व्रत से स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
  9. आश्विन माह में पापांकुशा एवं रमा एकादशी आती हैं। पापांकुशा एकादशी सभी पापों से मुक्त कर अपार धन, समृद्धि और सुख देती है। रमा एकादाशी व्रत करने से सभी सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
  10. कार्तिक माह में प्रबोधिनी एवं उत्पन्ना एकादशी आती हैं। देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करने से भाग्य जाग्रत होता है। इस दिन तुलसी पूजा होती है। उत्पन्ना एकादशी व्रत करने से हजार वाजपेय और अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। इससे देवता और पितर तृप्त होते हैं।
  11. मार्गशीर्ष माह में मोक्षदा एवं सफला एकादशी आती है। मोक्षदा एकादशी मोक्ष देने वाली और सफला एकादशी सफल करने वाली होती हैं। सफला व्रत रखने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
  12. पौष माह में पुत्रदा एवं षटतिला एकादशी आती हैं। पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत करना चाहिए। षटतिला एकादशी व्रत रखने से दुर्भाग्य, दरिद्रता तथा अनेक प्रकार के कष्ट दूर होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  13. माघ माह में जया एवं विजया एकादशी आती हैं। जया एकादशी व्रत रखने से ब्रह्महत्यादि पापों से छूट व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है तथा भूत, पिशाच आदि योनियों में नहीं जाता है। विजया एकादशी से भयंकर परेशानी से छुटकारा पाता है और इससे शत्रुओं का नाश होता है।
  14. फाल्गुन माह में आमलकी एवं पापमोचिनी एकादशी आती हैं। आमलकी एकादशी में आंवले का महत्व है। इसे करने से व्यक्ति सभी तरह के रोगों से मुक्त हो जाता है, साथ ही वह हर कार्य में सफल होता है। पापमोचिनी एकादशी व्रत से पाप का नाश होता है और संकटों से मुक्ति मिलती है।
  15. अधिक मास माह में पद्मिनी (कमला) एवं परमा एकादशी आती हैं। पद्मिनी एकादशी का व्रत सभी तरह की मनोकामनाओं को पूर्ण करता है, साथ ही यह पुत्र, कीर्ति और मोक्ष देने वाला है। परमा एकादशी धन-वैभव देती है तथा पापों का नाश कर उत्तम गति भी प्रदान करने वाली होती है।

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Nirjala Ekadashi – निर्जला एकादशी https://astrodeeva.com/nirjala-ekadashi-nirjala-ekadashi/ https://astrodeeva.com/nirjala-ekadashi-nirjala-ekadashi/#comments Mon, 23 May 2022 11:08:02 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3473 एकादशी व्रत हिन्दुओ में सबसे प्रचलित व्रत माना जाता है। वर्ष में चौबीस एकादशियाँ आती हैं, किन्तु इन सब एकादशियों में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी सबसे बढ़कर फल देने वाली समझी जाती है क्योंकि इस एक एकादशी का व्रत रखने से वर्ष भर की एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) […]

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एकादशी व्रत हिन्दुओ में सबसे प्रचलित व्रत माना जाता है। वर्ष में चौबीस एकादशियाँ आती हैं, किन्तु इन सब एकादशियों में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी सबसे बढ़कर फल देने वाली समझी जाती है क्योंकि इस एक एकादशी का व्रत रखने से वर्ष भर की एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) का व्रत अत्यन्त संयम साध्य है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है।

निर्जला एकादशी का महत्त्व(Significance of Nirjala Ekadashi)

ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता है। निर्जला यानि यह व्रत बिना जल ग्रहण किए और उपवास रखकर किया जाता है। इसलिए यह व्रत कठिन तप और साधना के समान महत्त्व रखता है। हिन्दू पंचाग अनुसार वृषभ और मिथुन संक्रांति के बीच शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है। इस व्रत को भीमसेन एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि भोजन संयम न रखने वाले पाँच पाण्डवों में एक भीमसेन ने इस व्रत का पालन कर सुफल पाए थे। इसलिए इसका नाम भीमसेनी एकादशी भी हुआ।
हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत का मात्र धार्मिक महत्त्व ही नहीं है, इसका मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के नज़रिए से भी बहुत महत्त्व है। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित होता है। इस दिन जल कलश, गौ का दान बहुत पुण्य देने वाला माना गया है। यह व्रत मन को संयम सिखाता है और शरीर को नई ऊर्जा देता है। यह व्रत पुरुष और महिलाओं दोनों द्वारा किया जा सकता है। वर्ष में अधिकमास की दो एकादशियों सहित 26 एकादशी व्रत का विधान है। जहाँ साल भर की अन्य 25 एकादशी व्रत में आहार संयम का महत्त्व है। वहीं निर्जला एकादशी के दिन आहार के साथ ही जल का संयम भी जरुरी है। इस व्रत में जल ग्रहण नहीं किया जाता है यानि निर्जल रहकर व्रत का पालन किया जाता है।
ऐसी धार्मिक मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति मात्र निर्जला एकादशी का व्रत करने से साल भर की पच्चीस एकादशी का फल पा सकता है। यहाँ तक कि अन्य एकादशी के व्रत भंग होने के दोष भी निर्जला एकादशी के व्रत से दूर हो जाते हैं। कुछ व्रती इस दिन एक भुक्त व्रत भी रखते हैं यानि सांय दान-दर्शन के बाद फलाहार और दूध का सेवन करते हैं।

निर्जला एकादशी व्रत की कथा(Legend of Nirjala Ekadashi)

पौराणिक कथा के अनुसार जब सर्वज्ञ वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया था तब युधिष्ठिर ने कहा– जनार्दन! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवती नन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं|
तब वेदव्यासजी कहने लगे– कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है। द्वादशी के दिन स्नान करके पवित्र हो और फूलों से भगवान केशव की पूजा करे। फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे।
यह सुनकर भीमसेन बोले- परम बुद्धिमान पितामह! मेरी उत्तम बात सुनिये। राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव, ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि भीमसेन एकादशी को तुम भी न खाया करो परन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी।
भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा– यदि तुम नरक को दूषित समझते हो और तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और तो दोनों पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन नहीं करना।
भीमसेन बोले महाबुद्धिमान पितामह! मैं आपके सामने सच कहता हूँ। मुझसे एक बार भोजन करके भी व्रत नहीं किया जा सकता, तो फिर उपवास करके मैं कैसे रह सकता हूँ। मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है। इसलिए महामुनि ! मैं पूरे वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ। जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये। मैं उसका यथोचित रूप से पालन करुँगा।
व्यासजी ने कहा– भीम! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो। केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है। एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है। तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे। इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे। वर्षभर में जितनी एकादशियाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है।’
एकादशी व्रत करने वाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते। अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाव वाले, हाथ में सुदर्शन धारण करने वाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आख़िर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं। अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो। स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है। जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है। उसे एक-एक प्रहर में कोटि-कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है। मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है। निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है। इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है।
जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे। जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं। कुन्तीनन्दन! निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो- उस दिन जल में शयन करने वाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है। पर्याप्त दक्षिणा और भाँति-भाँति के मिष्ठानों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए। ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं। जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस ‘निर्जला एकादशी’ का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आने वाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है। निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए। जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है। चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इसके श्रवण से भी प्राप्त होता है। पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि “मैं भगवान केशव की प्रसन्नता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा।” द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे।
संसार सागर से तारने वाले हे देव ह्रषीकेश! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये। भीमसेन! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए। उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है। तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे। जो इस प्रकार पूर्ण रूप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है। यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया। तबसे यह लोक में पांडव एकादशी के नाम से भी विख्यात हुई।

निर्जला एकादशी व्रत नियम

निर्जला एकादशी व्रत में जल का त्याग करना होता है। इस व्रत में व्रती पानी का सेवन नहीं कर सकता है। इसीलिए इस व्रत को निर्जला एकादशी व्रत कहते हैं, व्रत का पारण करने के बाद ही व्रती जल का सेवन कर सकता है।

निर्जला एकादशी व्रत पूजा विधि

  • सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
  • घर के मंदिर में शुद्ध देशी घी का दीप प्रज्वलित करें।
  • यदि घर में भगवान विष्णु की प्रतिमा है तो भगवान विष्णु का गंगा जल से अभिषेक करें,यदि
  • चित्र है तो गंगाजल के छीटे मारें ।
  • भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें।
  • अगर संभव हो तो इस दिन व्रत भी रखें।
  • भगवान की आरती करें।
  • भगवान को भोग लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है।
  • भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। ऐसा माना जाता है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग ग्रहण नहीं करते हैं।
  • इस पावन दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की पूजा भी करें।
  • इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।

 

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Apara Ekadashi 2022 – अपरा एकादशी का शुभ दिन व मुहूर्त, जाने महत्व, व्रत कथा और पूजा विधि https://astrodeeva.com/apara-ekadashi-2022-auspicious-day-and-muhurta-of-apara-ekadashi-importance-of-fast-story-and-worship-method/ https://astrodeeva.com/apara-ekadashi-2022-auspicious-day-and-muhurta-of-apara-ekadashi-importance-of-fast-story-and-worship-method/#respond Sun, 22 May 2022 09:51:31 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3471 हिन्दू धर्म में एकादशी (Ekadashi) तिथि का दिन धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण दिन होता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक मास में 2 एकादशी होती है और एक वर्ष में 24 एकादशियाँ आती है परंतु जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष इनकी संख्या 26 हो जाती है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण और […]

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हिन्दू धर्म में एकादशी (Ekadashi) तिथि का दिन धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण दिन होता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक मास में 2 एकादशी होती है और एक वर्ष में 24 एकादशियाँ आती है परंतु जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष इनकी संख्या 26 हो जाती है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशियां तो बहुत ही खास मानी जाती हैं। हालांकि समस्त एकादशियों में ज्येष्ठ मास की शुक्ल एकादशी जिसे निर्जला एकादशी कहते हैं सर्वोत्तम मानी जाती है लेकिन ज्येष्ठ महीने की ही कृष्ण एकादशी भी कमतर नहीं मानी जा सकती। इस एकादशी को अपरा या अचला एकादशी कहा जाता है। इस दिन के व्रत की बहुत महत्ता है। आइये इस लेख में जानते हैं अपरा एकादशी(Apara Ekadashi 2022) का महत्व, व्रत कथा व पूजा विधि…….

अपरा एकादशी व्रत २०२२ – Apara Ekadashi 2022

दिनांक : 26 मई 2022
वार : बृहस्पतिवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 25 मई 2022 को 10:32 ए एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त – 26 मई 2022 को 10:54 ए एम बजे
पारण तिथि : 27 मई 2022
पारण समय : 05:25 ए एम से 08:10 ए एम
(पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय – 11:47 ए एम)

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अपरा एकादशी का महत्‍व (Significance of Apara Ekadashi 2022)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा- “हे प्रभु! ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? तथा उसका माहात्म्य क्या है? इसमें किस देवता का पूजन किया जाता है तथा इस व्रत को करने का क्या विधान है? कृपा कर यह सब मुझे विस्तारपूर्वक बतायें।”

श्रीकृष्ण ने कहा- “हे धर्मराज! ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अपरा है, क्योंकि यह अपार धन और पुण्यों को देने वाली तथा समस्त पापों का नाश करने वाली है। जो मनुष्य इसका व्रत करते हैं, उनकी लोक में प्रसिद्धि होती है। अपरा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्महत्या, प्रेत योनि, दूसरे की निन्दा आदि से उत्पन्न पापों का नाश हो जाता है, इतना ही नहीं, स्त्रीगमन, झूठी गवाही, असत्य भाषण, झूठा वेद पढ़ना, झूठा शास्त्र बनाना, ज्योतिष द्वारा किसी को भरमाना, झूठा वैद्य बनकर लोगो को ठगना आदि भयंकर पाप भी अपरा एकादशी के व्रत से नष्ट हो जाते हैं।

युद्धक्षेत्र से भागे हुए क्षत्रिय को नरक की प्राप्ति होती है, किन्तु अगर वो अपरा एकादशी का व्रत करते हैं तो  उन्हें भी स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है। गुरू से विद्या अर्जित करने के उपरान्त जो शिष्य गरु की निन्दा करते हैं तो वे अवश्य ही नरक में जाते हैं। अपरा एकादशी का व्रत करने से इनके लिये स्वर्ग जाना सम्भव हो जाता है।

तीनों पुष्करों में स्नान करने से या कार्तिक माह में स्नान करने से अथवा गंगाजी के तट पर पितरों को पिण्डदान करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल अपरा एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है।

बृहस्पति के दिन गोमती नदी में स्नान करने से, कुम्भ में श्रीकेदारनाथजी के दर्शन करने से तथा बदरिकाश्रम में रहने से तथा सूर्य ग्रहण एवं चन्द्र ग्रहण में कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो फल सिंह राशि वालों को प्राप्त होता है, वह फल अपरा एकादशी के व्रत के समान है। जो फल हाथी-घोड़े के दान से तथा यज्ञ में स्वर्णदान (सुवर्णदान) से प्राप्त होता है, वह फल अपरा एकादशी के व्रत के फल के बराबर है। गौ तथा भूमि या स्वर्ण के दान का फल भी इसके फल के समान होता है।

पापरूपी वृक्षों को काटने के लिये यह व्रत कुल्हाड़ी के समान है तथा पापरूपी अन्धकार के लिये सूर्य के समान है। अतः मनुष्य को इस एकादशी का व्रत अवश्य ही करना चाहिये। यह व्रत सब व्रतों में उत्तम है। अपरा एकादशी के दिन श्रद्धापूर्वक भगवान श्रीविष्णु का पूजन करना चाहिये। जिससे अन्त में विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।

अपरा एकादशी कथा (Legend of Apara Ekadashi)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। राजा का छोटा भाई वज्रध्वज बड़े भाई से द्वेष रखता था। एक दिन अवसर पाकर वज्रध्वज ने राजा महीध्वज की हत्या कर दी और जंगल में एक पीपल के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर पीपल पर रहने लगी। मार्ग से गुजरने वाले हर व्यक्ति को आत्मा परेशान करती। एक दिन एक ऋषि इस रास्ते से गुजर रहे थे। उन्होंने प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके प्रेत बनने का कारण जाना।

ऋषि ने पीपल के पेड़ से राजा की प्रेतात्मा को नीचे उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। राजा को प्रेत योनी से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा और द्वादशी के दिन व्रत पूरा होने पर व्रत का पुण्य प्रेत को दे दिया। एकादशी व्रत का पुण्य प्राप्त करके राजा प्रेतयोनी से मुक्त हो गया और स्वर्ग चला गया।

अपरा एकादशी व्रत विधि ( Vrat Vidhi of Apara Ekadashi)

  • एकादशी के दिन सबसे पहले सुबह ब्रह्म मुहूर्त में निद्रा से उठकर स्‍नान करने के बाद साफ वस्‍त्र धारण करे।
  • उसके बाद घर के मंदिर में पूजा करने से पहले एक वेदी बनाकर उस पर 7 धान (उड़द, मूंग, गेहूं, चना, जौ, चावल और बाजरा) रखें।
  • वेदी के ऊपर एक कलश की स्‍थापना करें और उसमें आम या अशोक के 5 पत्ते लगाएं।
  • वेदी पर भगवान विष्‍णु की मूर्ति या तस्‍वीर रखें।
  • इसके बाद भगवान विष्‍णु को पीले फूल, ऋतुफल और तुलसी दल समर्पित करें। फिर धूप-दीप से विष्‍णु जी की आरती उतारें।
  • शाम के समय भगवान विष्‍णु की आरती के बाद फलाहार ग्रहण करें।
  • रात्रि के समय सोए नहीं बल्‍कि भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करें।
  • अगले दिन सुबह किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं इसके बाद खुद भी भोजन  करें।

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शिव पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रदोष व्रत

स्कंद पुराण के अनुसार यहाँ है भगवान शिव की आरामगाह

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Mohini Ekadashi – मोहिनी एकादशी https://astrodeeva.com/mohini-ekadashi/ https://astrodeeva.com/mohini-ekadashi/#respond Wed, 11 May 2022 05:06:41 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3398 सनातन धर्म में व्रत एवं उपवास का बहुत महत्व हैं। नारद पुराण में व्रतों का महत्व बताते हुए उल्लेख किया  गया है कि – गंगा के समान कोई अन्य तीर्थ नहीं, माँ के समान कोई गुरु नहीं, भगवान विष्णु जैसा कोई देवता नहीं तथा व्रत एवं उपवास जैसा कोई तप नहीं। व्रतों में एकादशी (Ekadashi) […]

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सनातन धर्म में व्रत एवं उपवास का बहुत महत्व हैं। नारद पुराण में व्रतों का महत्व बताते हुए उल्लेख किया  गया है कि – गंगा के समान कोई अन्य तीर्थ नहीं, माँ के समान कोई गुरु नहीं, भगवान विष्णु जैसा कोई देवता नहीं तथा व्रत एवं उपवास जैसा कोई तप नहीं। व्रतों में एकादशी (Ekadashi) व्रत को सर्वोपरि माना गया है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी(Mohini Ekadashi) के नाम से जाना जाता है। यह व्रत मोह बंधन तथा पापों से मुक्ति दिलाता है। मान्यता है कि सीता माता की खोज के दौरान भगवान राम ने तथा महाभारत काल में युधिष्ठिर ने मोहिनी एकादशी व्रत कर अपने सभी दुखों से छुटकारा पाया था।

वैशाख शुक्ल एकादशी का नाम मोहिनी एकादशी कैसे पड़ा?

मान्यता है कि वैशाख शुक्ल एकादशी के दिन ही भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया था। भगवान विष्णु ने सुमुद्र मंथन के दौरान प्राप्त हुए अमृत को देवताओं में वितरीत करने के लिये मोहिनी का रूप धारण किया था। कहा जाता है कि जब समुद्र मंथन हुआ तो अमृत प्राप्ति के बाद देवताओं व असुरों में आपाधापी मच गई थी। चूंकि ताकत के बल पर देवता असुरों को हरा नहीं सकते थे इसलिये चालाकि से भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर असुरों को अपने मोहपाश में बांध लिया और सारे अमृत का पान देवताओं को करवा दिया जिससे देवताओं ने अमरत्व प्राप्त किया। वैशाख शुक्ल एकादशी के दिन चूंकि यह सारा घटनाक्रम हुआ इस कारण इस एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा गया।

मोहिनी एकादशी का महत्व

मोहिनी एकादशी का माहात्म्य बहुत अधिक माना जाता है। पुराणों के अनुसार, माता सीता से बिछड़ने के बाद भगवान श्री राम ने और महाभारत काल में युधिष्ठिर ने भी अपने दुःखों से छुटकारा पाने के लिए मोहिनी एकादशी का व्रत पुरे विधि-विधान से किया था। जिसका फल भी उन्हें मिला। माना जाता है, इस एकादशी का व्रत रखने से हर प्रकार के दुःखों से छुटकारा मिलता है। मोहिनी एकादशी(Mohini Ekadashi) व्रत कथा पढ़ने और सुनने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है।

मोहिनी एकादशी कथा 

एक बार की बात है, श्रीरामजी ने महर्षि वशिष्ठ से कहा- ‘हे गुरुश्रेष्ठ! मैंने जनकनन्दिनी सीताजी के वियोग में बहुत कष्ट भोगे हैं, अतः मेरे कष्टों का नाश किस प्रकार होगा? आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताने की कृपा करें, जिससे मेरे सभी पाप और कष्ट नष्ट हो जाएँ।’
महर्षि वशिष्ठ ने कहा- ‘हे श्रीराम! आपने बहुत उत्तम प्रश्न किया है। आपकी बुद्धि अत्यन्त कुशाग्र और पवित्र है। आपके नाम के स्मरण मात्र से ही मनुष्य पवित्र हो जाता है। आपने लोकहित में यह बड़ा ही उत्तम् प्रश्न किया है। मैं आपको एक एकादशी व्रत का माहात्म्य सुनाता हूँ- वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi)है। इस एकादशी का उपवास करने से मनुष्य के सभी पाप तथा क्लेश नष्ट हो जाते हैं। इस उपवास के प्रभाव से मनुष्य मोह के जाल से मुक्त हो जाता है। अतः हे राम! दुखी मनुष्य को इस एकादशी का उपवास अवश्य ही करना चाहिये। इस व्रत के करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
अब आप इसकी कथा को श्रद्धापूर्वक सुनिये- प्राचीन समय में सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नाम की एक नगरी बसी हुई थी। उस नगरी में द्युतिमान नामक राजा राज्य करता था। उसी नगरी में एक वैश्य रहता था, जो धन-धान्य से पूर्ण था। उसका नाम धनपाल था। वह अत्यन्त धर्मात्मा तथा नारायण-भक्त था। उसने नगर में अनेक भोजनालय, प्याऊ, कुएँ, तालाब, धर्मशालाएं आदि बनवाये, सड़को के किनारे आम, जामुन, नीम आदि के वृक्ष लगवाए, जिससे पथिकों को सुख मिले। उस वैश्य के पाँच पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़ा पुत्र अत्यन्त पापी व दुष्ट था। वह वेश्याओं और दुष्टों की संगति करता था। इससे जो समय बचता था, उसे वह जुआ खेलने में व्यतीत करता था। वह बड़ा ही अधम था और देवता, पितृ आदि किसी को भी नहीं मानता था। अपने पिता का अधिकांश धन वह बुरे व्यसनों में ही उड़ाया करता था। मद्यपान तथा मांस का भक्षण करना उसका नित्य कर्म था। जब काफी समझाने-बुझाने पर भी वह सीधे रास्ते पर नहीं आया तो दुखी होकर उसके पिता, भाइयों तथा कुटुम्बियों ने उसे घर से निकाल दिया और उसकी निन्दा करने लगे। घर से निकलने के बाद वह अपने आभूषणों तथा वस्त्रों को बेच-बेचकर अपना गुजारा करने लगा।

धन नष्ट हो जाने पर वेश्याओं तथा उसके दुष्ट साथियों ने भी उसका साथ छोड़ दिया। जब वह भूख-प्यास से व्यथित हो गया तो उसने चोरी करने का विचार किया और रात्रि में चोरी करके अपना पेट पालने लगा, लेकिन एक दिन वह पकड़ा गया, किन्तु सिपाहियों ने वैश्य का पुत्र जानकर छोड़ दिया। जब वह दूसरी बार पुनः पकड़ा गया, तब सिपाहियों ने भी उसका कोई लिहाज नहीं किया और राजा के सामने प्रस्तुत करके उसे सारी बात बताई। तब राजा ने उसे कारागार में डलवा दिया। कारागार में राजा के आदेश से उसे बहुत कष्ट दिए गये और अन्त में उसे नगर छोड़ने के लिए कहा गया। दुखी होकर उसे नगर छोड़ना पड़ा।

अब वह जंगल में पशु-पक्षियों को मारकर पेट भरने लगा। फिर बहेलिया बन गया और धनुष-बाण से जंगल के निरीह जीवों को मार-मारकर खाने और बेचने लगा। एक बार वह भूख और प्यास से व्याकुल होकर भोजन की खोज में निकला और कौटिन्य मुनि के आश्रम में जा पहुँचा।

इन दिनों वैशाख का महीना था। कौटिन्य मुनि गंगा स्नान करके आये थे। उनके भीगे वस्त्रों की छींटें मात्र से इस पापी को कुछ सद्बुद्धि प्राप्त हुई। वह अधम, ऋषि के पास जाकर हाथ जोड़कर कहने लगा – ‘हे महात्मा! मैंने अपने जीवन में अनेक पाप किये हैं, कृपा कर आप उन पापों से छूटने का कोई साधारण और बिना धन का उपाय बतलाइये।’

ऋषि ने कहा – ‘तू ध्यान देकर सुन – वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत कर। इस एकादशी का नाम मोहिनी है। इसका उपवास करने से तेरे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।

ऋषि के वचनों को सुन वह बहुत प्रसन्न हुआ और उनकी बतलायी हुई विधि के अनुसार उसने मोहिनी एकादशी(Mohini Ekadashi) का व्रत किया।

हे श्रीराम! इस व्रत के प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो गये और अन्त में वह गरुड़ पर सवार हो विष्णुलोक को गया। संसार में इस व्रत से उत्तम दूसरा कोई व्रत नहीं है। इसके माहात्म्य के श्रवण व पठन से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य एक सहस्र गौदान के पुण्य के बराबर है।

मोहिनी एकादशी पूजा विधि (Mohini Ekadashi Puja Vidhi)

एकादशी व्रत के लिये व्रती को दशमी तिथि से ही नियमों का पालन करना चाहिये। दशमी तिथि को एक समय ही सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिये। ब्रह्मचर्य का पूर्णत: पालन करना चाहिये।
  • एकादशी से दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिये।
  • इसके पश्चात लाल वस्त्र से सजाकर कलश स्थापना कर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिये।
  • दिन में व्रती को मोहिनी एकादशी की व्रत कथा का सुननी या पढ़नी चाहिये।
  • रात्रि के समय श्री हरि का स्मरण करते हुए, भजन कीर्तन करते हुए जागरण करना चाहिये।
  • द्वादशी के दिन एकादशी व्रत का पारण किया जाता है।
  • सर्व प्रथम भगवान की पूजा कर किसी योग्य ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद को भोजनादि करवाकर दान दक्षिणा देकर संतुष्ट करना चाहिये। इसके पश्चात ही स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिये।

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Varuthini Ekadashi 2022- 26 अप्रैल को है वरुथिनी एकादशी व्रत, जानिए शुभ मुहूर्त और पारण तिथि व समय https://astrodeeva.com/varuthini-ekadashi-2022-is-on-26-april-know-the-auspicious-time-and-date-and-time-of-varuthini-ekadashi-fast/ https://astrodeeva.com/varuthini-ekadashi-2022-is-on-26-april-know-the-auspicious-time-and-date-and-time-of-varuthini-ekadashi-fast/#respond Sun, 24 Apr 2022 06:05:46 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3245 वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi 2022) मनाई जाती है। इसे वरूथिनी ग्यारस भी कहते हैं। इस दिन भगवान के मधुसूदन स्वरूप की उपासना की जाती है। इस व्रत के माहात्म्य को पढ़ने से एक सहस्र गौदान का पुण्य प्राप्त होता है। इसका फल गंगा स्नान करने के फल […]

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वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi 2022) मनाई जाती है। इसे वरूथिनी ग्यारस भी कहते हैं। इस दिन भगवान के मधुसूदन स्वरूप की उपासना की जाती है। इस व्रत के माहात्म्य को पढ़ने से एक सहस्र गौदान का पुण्य प्राप्त होता है। इसका फल गंगा स्नान करने के फल से भी अधिक है।

वरुथिनी एकादशी का महत्‍व (Significance of Varuthini Ekadashi 2022)

हिन्‍दू धर्म में वरुथिनी एकादशी का विशेष महत्‍व है। ऐसी मान्यता है कि जो लोग नियम पूर्वक वरुथिनी एकादशी व्रत करते हैं भगवान विष्णु की कृपा से उनके समस्त दूखों का नाश हो जाता है और उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. कहते हैं कि मृत्यु के पश्चात एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को भगवान श्री हरि के चरणों में स्थान प्राप्त होता है।

वरुथिनी एकादशी 2022 (Varuthini Ekadashi 2022)

दिनांक : 26 अप्रैल 2022
वार : मंगलवार

एकादशी तिथि प्रारम्भ: 26 अप्रैल 2022 को 01:37 ए एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 27 अप्रैल 2022 को 12:47 ए एम बजे

पारण (व्रत तोड़ने का) समय : 27 अप्रैल 2022 को 06:41 ए एम से 08:22 ए एम
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय : 06:41 ए एम

वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Vrat Story of Varuthini Ekadashi)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नामक राजा राज्य करते थे। वह अत्यंत दानशील तथा तपस्वी थे। एक दिन जब वह जंगल में तपस्या कर रहे थे, तभी न जाने कहाँ से एक जंगली भालू आया और राजा का पैर चबाने लगा। राजा पूर्ववत अपनी तपस्या में लीन रहे। कुछ देर बाद पैर चबाते-चबाते भालू राजा को घसीटकर पास के जंगल में ले गया।

राजा बहुत घबराया, मगर तापस धर्म अनुकूल उसने क्रोध और हिंसा न करके भगवान विष्णु से प्रार्थना की, करुण भाव से भगवान विष्णु को पुकारा। उसकी पुकार सुनकर भगवान श्रीहरि विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने चक्र से भालू को मार डाला।

राजा का पैर भालू पहले ही खा चुका था। इससे राजा बहुत ही शोकाकुल हुए। उन्हें दुःखी देखकर भगवान विष्णु बोले: हे वत्स! शोक मत करो। तुम मथुरा जाओ और वरूथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरी वराह अवतार मूर्ति की पूजा करो। उसके प्रभाव से पुन: सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे। इस भालू ने तुम्हें जो काटा है, यह तुम्हारे पूर्व जन्म का अपराध था।

भगवान की आज्ञा मानकर राजा मान्धाता ने मथुरा जाकर श्रद्धापूर्वक वरूथिनी एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से राजा शीघ्र ही पुन: सुंदर और संपूर्ण अंगों वाला हो गया। इसी एकादशी के प्रभाव से राजा मान्धाता स्वर्ग गये थे।

ये भी पढ़ें: एकादशी व्रत तिथि 2022

वरुथिनी एकादशी व्रत विधि ( Vrat Vidhi of Varuthini Ekadashi)

इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और वंदना की जाती है। इस व्रत की पूजा विधि इस प्रकार है:

इस दिन भक्तिभाव से भगवान मधुसूदन की पूजा करनी चाहिए। इस व्रत को करने से भगवान मधुसूदन की प्रसन्नता प्राप्त होती है और संपूर्ण पापों का नाश होता है। सुख-सौभाग्य की वृद्धि होती है तथा भगवान का चरणामृत ग्रहण करने से आत्मशुद्धि होती है।व्रती को चाहिए कि वह दशमी को अर्थात व्रत रखने से एक दिन पूर्व एक बार सात्विक भोजन करे। इस व्रत में कुछ वस्तुओं का पूर्णतया निषेध है, अतः इनका त्याग करना ही श्रेयस्कर है। व्रत करने वाले के लिए उस दिन पान खाना, दातुन करना, परनिंदा, क्रोध करना व असत्य बोलना वर्जित है। इस दिन जुआ और निद्रा का भी त्याग करें। इस व्रत में तेलयुक्त भोजन नहीं करना चाहिए। रात्रि में भगवान का नाम स्मरण करते हुए जागरण करें और द्वादशी को मांस का परित्याग करके व्रत का पालन करें।

**(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैंजिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

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Papmochani Ekadashi 2022 – पापमोचनी एकादशी https://astrodeeva.com/papmochani-ekadashi-2022-papmochani-ekadashi/ https://astrodeeva.com/papmochani-ekadashi-2022-papmochani-ekadashi/#respond Sat, 26 Mar 2022 04:30:13 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3057 हिन्दू या सनातन धर्म विविधता से परिपूर्ण है यह वास्तव में एक जीवन पद्धति है। हर वर्ष  होने वाले तीज, त्यौहार, कर्म कांड ही हिन्दू धर्म की विविधता और विशालता को दर्शाते हैं। हिन्दू धर्म में शुभ तिथियों और त्यौहार का बड़ा महत्व है। विभिन्न हिंदू व्रतों के बीच, एकादशी व्रत का सर्वोच्च स्थान है। हिंदू […]

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हिन्दू या सनातन धर्म विविधता से परिपूर्ण है यह वास्तव में एक जीवन पद्धति है। हर वर्ष  होने वाले तीज, त्यौहार, कर्म कांड ही हिन्दू धर्म की विविधता और विशालता को दर्शाते हैं। हिन्दू धर्म में शुभ तिथियों और त्यौहार का बड़ा महत्व है। विभिन्न हिंदू व्रतों के बीच, एकादशी व्रत का सर्वोच्च स्थान है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक माह में दो पक्ष होते हैं, दोनों पक्षों शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की ग्याहरवीं तिथि को एकादशी का व्रत किया जाता है। इस तरह  एक महीने में दो एकादशियां, और एक वर्ष में 24 एकादशियां होती हैं।हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की ग्याहरवीं तिथि को पापमोचनी (Papmochani Ekadashi) अथवा पापों को भस्म करने वाली एकादशी के रूप में मनाया जाता हैं। इस मोह माया से भरे संसार में ऐसा कोई मनुष्य नहीं जन्मा जिससे अनजाने में कोई पाप नहीं हुआ हो इसलिए पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) का विशेष महत्व है इस एकादशी को करने से जाने-अनजाने में हुए सभी तरह के पाप के दोष से मुक्ति प्राप्त होती हैं।

पापमोचनी एकादशी 2022 (Papmochani Ekadashi 2022)

दिनांक : 28 मार्च 2022
वार : सोमवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ : 27 मार्च 2022 को 06:04 पी एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त : 28 मार्च 2022 को 04:15 पी एम बजे
पारण (व्रत तोड़ने का) समय : 29 मार्च 2022 को 06:15 ए एम से 08:43 ए एम
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय02:38 पी एम

Also Read – Ekadashi Vrat 2022 – एकादशी व्रत तिथि 2022

पापमोचनी एकादशी कथा (Story of Papmochani Ekadashi)

 पुराणों के अनुसार एक बार अर्जुन ने कहा- “हे कमलनयन! मैं ज्यों-ज्यों एकादशियों के व्रतों की कथाएँ सुन रहा हूँ, त्यों-त्यों अन्य एकादशियों के व्रतों की कथाएँ सुनने की मेरी जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही है। हे मधुसूदन! अब कृपा कर आप चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के विषय में बतलाइये। इस एकादशी का नाम क्या है? इसमें कौन-से देवता का पूजन किया जाता है तथा इस व्रत का क्या विधान है? हे श्रीकृष्ण! यह सब आप मुझे विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें।”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! एक बार यही प्रश्न पृथ्वीपति मान्धाता ने लोमश ऋषि से किया था, जो कुछ लोमश ऋषि ने राजा मान्धाता को बताया था, वही मैं तुमसे कह रहा हूँ। राजा मान्धाता ने धर्म के गुह्यतम रहस्यों के ज्ञाता महर्षि लोमश से पूछा- ‘हे ऋषिश्रेष्ठ! मनुष्य के पापों का मोचन किस प्रकार सम्भव है? कृपा कर कोई ऐसा सरल उपाय बतायें, जिससे सहज ही पापों से छुटकारा मिल जाए।’

महर्षि लोमश ने कहा- ‘हे नृपति! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम पापमोचिनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) है। उसके व्रत के प्रभाव से मनुष्यों के अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं। मैं तुम्हें इस व्रत की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो- प्राचीन समय में चैत्ररथ नामक एक वन था। उसमें अप्सराएँ किन्नरों के साथ विहार किया करती थीं। वहाँ सदैव वसन्त का मौसम रहता था, अर्थात उस जगह सदा नाना प्रकार के पुष्प खिले रहते थे। कभी गन्धर्व कन्‍याएँ विहार किया करती थीं, कभी देवेन्द्र अन्य देवताओं के साथ क्रीड़ा किया करते थे।

उसी वन में मेधावी नाम के एक ऋषि भी तपस्या में लीन रहते थे। वे शिवभक्त थे। एक दिन मञ्जुघोषा नामक एक अप्सरा ने उनको मोहित कर उनकी निकटता का लाभ उठाने की चेष्टा की, इसलिए वह कुछ दूरी पर बैठ वीणा बजाकर मधुर स्वर में गाने लगी। उसी समय शिव भक्त महर्षि मेधावी को कामदेव भी जीतने का प्रयास करने लगे। कामदेव ने उस सुन्दर अप्सरा के भ्रू का धनुष बनाया। कटाक्ष को उसकी प्रत्यन्चा बनाई और उसके नेत्रों को मञ्जुघोषा अप्सरा का सेनापति बनाया। इस तरह कामदेव अपने शत्रुभक्त को जीतने को तैयार हुआ। उस समय महर्षि मेधावी भी युवावस्था में थे और काफी हृष्ट-पुष्ट थे। उन्होंने यज्ञोपवीत तथा दण्ड धारण कर रखा था। वे दूसरे कामदेव के समान प्रतीत हो रहे थे। उस मुनि को देखकर कामदेव के वश में हुई मञ्जुघोषा ने धीरे-धीरे मधुर वाणी से वीणा पर गायन शुरू किया तो महर्षि मेधावी भी मञ्जुघोषा के मधुर गाने पर तथा उसके सौन्दर्य पर मोहित हो गए। वह अप्सरा मेधावी मुनि को कामदेव से पीड़ित जानकर उनसे आलिङ्गन करने लगी।

महर्षि मेधावी उसके सौन्दर्य पर मोहित होकर शिव रहस्य को भूल गए और काम के वशीभूत होकर उसके साथ रमण करने लगे। काम के वशीभूत होने के कारण मुनि को उस समय दिन-रात का कुछ भी ज्ञान न रहा और काफी समय तक वे रमण करते रहे। तदुपरान्त मञ्जुघोषा उस मुनि से बोली- ‘हे ऋषिवर! अब मुझे बहुत समय हो गया है, अतः स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये।’

अप्सरा की बात सुनकर ऋषि ने कहा- ‘हे मोहिनी! सन्ध्या को तो आयी हो, प्रातःकाल होने पर चली जाना।’

ऋषि के ऐसे वचनों को सुनकर अप्सरा उनके साथ रमण करने लगी। इसी प्रकार दोनों ने साथ-साथ बहुत समय बिताया।

मञ्जुघोषा ने एक दिन ऋषि से कहा- ‘हे विप्र! अब आप मुझे स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये।’

मुनि ने इस बार भी वही कहा- ‘हे रूपसी! अभी ज्यादा समय व्यतीत नहीं हुआ है, कुछ समय और ठहरो।’

मुनि की बात सुन अप्सरा ने कहा- ‘हे ऋषिवर! आपकी रात तो बहुत लम्बी है। आप स्वयं ही सोचिये कि मुझे आपके पास आये कितना समय हो गया। अब और ज्यादा समय तक ठहरना क्या उचित है?’

अप्सरा की बात सुन मुनि को समय का बोध हुआ और वह गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगे। जब उन्हें समय का ज्ञान हुआ कि उन्हें रमण करते सत्तावन (57) वर्ष व्यतीत हो चुके हैं तो उस अप्सरा को वह काल का रूप समझने लगे। इतना ज्यादा समय भोग-विलास में व्यर्थ चला जाने पर उन्हें बड़ा क्रोध आया। अब वह भयंकर क्रोध में जलते हुए उस तप नाश करने वाली अप्सरा की तरफ भृकुटी तानकर देखने लगे। क्रोध से उनके अधर काँपने लगे और इन्द्रियाँ बेकाबू होने लगीं। क्रोध से थरथराते स्वर में मुनि ने उस अप्सरा से कहा- ‘मेरे तप को नष्ट करने वाली दुष्टा! तू महा पापिन और बहुत ही दुराचारिणी है, तुझ पर धिक्कार है। अब तू मेरे शाप (श्राप) से पिशाचिनी बन जा।’

मुनि के क्रोधयुक्त शाप (श्राप) से वह अप्सरा पिशाचिनी बन गई। यह देख वह व्यथित होकर बोली- ‘हे ऋषिवर! अब मुझ पर क्रोध त्यागकर प्रसन्न होइए और कृपा करके बताइये कि इस शाप (श्राप) का निवारण किस प्रकार होगा? विद्वानों ने कहा है, साधुओं की सङ्गत अच्छा फल देने वाली होती है और आपके साथ तो मेरे बहुत वर्ष व्यतीत हुए हैं, अतः अब आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइए, अन्यथा लोग कहेंगे कि एक पुण्य आत्मा के साथ रहने पर मञ्जुघोषा को पिशाचिनी बनना पड़ा।’ मञ्जुघोषा की बात सुनकर मुनि को अपने क्रोध पर अत्यन्त ग्लानि हुई साथ ही अपनी अपकीर्ति का भय भी हुआ, अतः पिशाचिनी बनी मञ्जुघोषा से मुनि ने कहा- ‘तूने मेरा बड़ा बुरा किया है, किन्तु फिर भी मैं तुझे इस शाप (श्राप) से मुक्ति का उपाय बतलाता हूँ। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी है, उसका नाम पापमोचिनी(Papmochani Ekadashi) है। उस एकादशी का उपवास करने से तेरी पिशाचिनी की देह से मुक्ति हो जाएगी।’

ऐसा कहकर मुनि ने उसको व्रत का सब विधान समझा दिया। फिर अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए वे अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गये।

च्यवन ऋषि ने अपने पुत्र मेधावी को देखकर कहा- ‘हे पुत्र! ऐसा क्या किया है तूने कि तेरे सभी तप नष्ट हो गए हैं? जिससे तुम्हारा समस्त तेज मलिन हो गया है?’

मेधावी मुनि ने लज्जा से अपना सिर झुकाकर कहा- ‘पिताश्री! मैंने एक अप्सरा से रमण करके बहुत बड़ा पाप किया है। इसी पाप के कारण सम्भवतः मेरा सारा तेज और मेरे तप नष्ट हो गए हैं। कृपा करके आप इस पाप से छूटने का उपाय बतलाइये।’

ऋषि ने कहा- ‘हे पुत्र! तुम चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी का विधि तथा भक्तिपूर्वक उपवास करो, इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।’

अपने पिता च्यवन ऋषि के वचनों को सुनकर मेधावी मुनि ने पापमोचिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। उसके प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए। मञ्जुघोषा अप्सरा भी पापमोचिनी एकादशी का उपवास करने से पिशाचिनी की देह से छूट गई और पुनः अपना सुन्दर रूप धारण कर स्वर्गलोक चली गई। लोमश मुनि ने कहा-हे राजन! इस पापमोचिनी एकादशी के प्रभाव से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी की कथा के श्रवण व पठन से एक हजार गौदान करने का फल प्राप्त होता है। इस उपवास के करने से ब्रह्म हत्या करने वाले, स्वर्ण चुराने वाले, मद्यपान करने वाले, अगम्या गमन करने वाले आदि भयंकर पाप भी नष्ट हो जाते हैं और अन्त में स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।”

पापमोचनी एकादशी व्रत विधि 

Papmochani Ekadashi व्रत के विषय में भविष्योत्तर पुराण में विस्तार से वर्णन किया गया है। इस व्रत में भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है। इस व्रत को रखने वाले व्रती को दशमी तिथि को एक बार सात्विक भोजन करना चहिये और मन से भोग विलास की भावना को निकालकर श्री हरि में मन को लगाना चहिये।

  • व्रती एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करे। स्नान करते हुए इस पवित्र नदियों को समर्पित मंत्र का जाप कर सकते हैं।

गंगा च यमुना चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेसमिन सानिधिम कुरु”

(अर्थात्- इस पानी में, मैं गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी नदियों से दिव्य जल की उपस्थिति का आह्वान करता हूं)

  • पूजा स्थल पर पीले कुशा आसन पर बैठकर घी का दीपक जलाकर व्रत का संकल्प करें।
  • संकल्प के उपरान्त षोड्षोपचार सहित श्री विष्णु की पूजा करें।
  • पूजा के पश्चात भगवान के समक्ष बैठकर भग्वद् कथा का पाठ अथवा श्रवण करें।
  • एकादशी तिथि को जागरण करने से कई गुणा पुण्य मिलता है अत: रात्रि में भी निराहार रहकर भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें।
  • द्वादशी के दिन प्रात: स्नान करके विष्णु भगवान की पूजा करें फिर ब्रह्मणों को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करें।
  • तत्पश्चात व्रत का पारण करें

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस संसार में जो भी मनुष्य भगवान श्री विष्णु का आशीर्वाद पाना चाहता है, उसे एकादशी का व्रत जरुर करना चाहिए। एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। एकादशी के व्रत रखने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होने के साथ ही सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

 

**(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैंजिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

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भागयोन्नति के लिये किस दिन करें किस चीज का दान..

 

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Amalaki Ekadashi 2022- आमलकी एकादशी https://astrodeeva.com/amalaki-ekadashi-2022-%e0%a4%86%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80/ https://astrodeeva.com/amalaki-ekadashi-2022-%e0%a4%86%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80/#respond Sun, 13 Mar 2022 05:58:15 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2964 Amalaki Ekadashi 2022 : हिन्दू धर्म को व्रत और त्यौहारों का धर्म कहा जाता है इसमें लगभग वर्ष भर कोई न कोई व्रत अथवा त्यौहार होता ही रहता है। व्रत एवं त्यौहार हिन्दू धर्म की सांस्कृतिक धरोहर हैं। प्राय: सभी पुराणों में इसका उल्लेख मिलता है कि हमारे ऋषि-मुनि व्रत उपवास के द्वारा ही शरीर, […]

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Amalaki Ekadashi 2022 : हिन्दू धर्म को व्रत और त्यौहारों का धर्म कहा जाता है इसमें लगभग वर्ष भर कोई न कोई व्रत अथवा त्यौहार होता ही रहता है। व्रत एवं त्यौहार हिन्दू धर्म की सांस्कृतिक धरोहर हैं। प्राय: सभी पुराणों में इसका उल्लेख मिलता है कि हमारे ऋषि-मुनि व्रत उपवास के द्वारा ही शरीर, मन तथा आत्मा की शुद्धि करते हुए अलौकिक शक्ति प्राप्त करते थे। विभिन्न हिंदू व्रतों के बीच, एकादशी व्रत का सर्वोच्च स्थान माना जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, फाल्गुन मास के  शुल्क पक्ष के ग्यारहवें दिन (एकादशी) को आमलकी एकादशी (Amalaki Ekadashi)के रूप में मनाया जाता है। आमलकी एकादशी का त्यौहार होली और महा शिवरात्रि के बीच आता है। आमलकी शब्द भारतीय आंवले का प्रतिनिधित्व करता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह माना जाता है कि देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु आंवले के वृक्ष में निवास करते हैं। इस प्रकार, इस पेड़ को अत्यधिक शुभ माना जाता है। लोग आमलकी एकादशी की पूर्व संध्या पर पेड़ की पूजा करते हैं और आराधना करते हैं।

आमलकी एकादशी 2022 (Amalaki Ekadashi 2022)

दिनांक : 14 मार्च 2022
वार : सोमवार

एकादशी तिथि प्रारम्भ: 13 मार्च 2022 को 10:21 ए एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 14 मार्च 2022 को 12:05 पी एम बजे

पारण (व्रत तोड़ने का) समय : 15 मार्च 2022 को 06:31 ए एम से 08:55 ए एम
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय : 01:12 पी एम

आमलकी एकादशी व्रत कथा (Story of Amalaki Ekadashi)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार राजा मान्धाता ने वशिष्ठ जी से पूछा- ‘हे वशिष्ठ जी! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो ऐसे व्रत का विधान बताने की कृपा करें, जिससे मेरा कल्याण हो।’

महर्षि वशिष्ठजी ने कहा – ‘हे राजन! सब व्रतों से उत्तम और अंत में मोक्ष देने वाला आमलकी एकादशी का व्रत है।’

राजा मान्धाता ने कहा – ‘हे ऋषिश्रेष्ठ! इस आमलकी एकादशी के व्रत की उत्पत्ति कैसे हुई? इस व्रत के करने का क्या विधान है? हे वेदों के ज्ञाता! कृपा कर यह सब वृत्तांत मुझे विस्तारपूर्वक बताएं।’

महर्षि वशिष्ठ ने कहा – हे राजन! मैं तुम्हारे समक्ष विस्तार से इस व्रत का वृत्तांत कहता हूँ- यह व्रत फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में होता है। इस व्रत के फल से सभी पाप समूल नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत का पुण्य एक हजार गौदान के फल के बराबर है। आमलकी (आंवले) की महत्ता उसके गुणों के अतिरिक्त इस बात में भी है कि इसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के श्रीमुख से हुई है। अब मैं आपको एक पौराणिक कथा सुनाता हूँ। ध्यानपूर्वक श्रवण करो-

प्राचीन समय में वैदिक नामक एक नगर था। उस नगर में चारों वर्ण के लोग मिलजुल कर प्रसन्ततापूर्वक रहते थे। नगर में सदैव वेदध्वनि गूंजा करती थी और उस नगरी में कोई भी पापी, दुराचारी, नास्तिक आदि न था।

उस वैदिक नामक नगर में चैत्ररथ नामक चन्द्रवंशी राजा राज्य करता था। वह उच्चकोटि का विद्वान तथा धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था, उसके राज्य में कोई भी गरीब नहीं था और न ही कंजूस। उस राज्य के सभी लोग विष्णु-भक्त थे। वहां के छोटे-बड़े सभी निवासी प्रत्येक एकादशी का उपवास करते थे।

एक बार फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी आई। उस दिन राजा और प्रत्येक प्रजाजन, वृद्ध से बालक तक ने आनंदपूर्वक उस एकादशी को उपवास किया। राजा ने अपनी प्रजा के साथ मंदिर में आकर कलश स्थापित करके तथा धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न, छत्र आदि से धात्री का पूजन करने लगा। वे सब धात्री की इस प्रकार स्तुति करने लगे – ‘हे धात्री! आप ब्रह्म स्वरूपा हैं। आप ब्रह्माजी द्वारा उत्पन्न हो और सभी पापों को नष्ट करने वाली हैं, आपको नमस्कार है। आप मेरा अर्घ्य स्वीकार करो। आप श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा सम्मानित हैं, मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, मेरे सभी पापों का हरण करो।’

उस मंदिर में रात को सभी ने जागरण किया। रात के समय उस जगह पर एक बहेलिया आया। वह अपने कुटुंब का पालन जीव हिंसा करके करता था। वह भूख-प्यास से अत्यंत व्याकुल था, कुष्ठ भोजन पाने की इच्छा से वह मंदिर के एक कोने में बैठ गया। उस जगह बैठकर वह भगवान विष्णु की कथा तथा एकादशी माहात्म्य सुनने लगा। इस प्रकार उस बहेलिए ने सारी रात अन्य लोगों के साथ जागरण कर व्यतीत की। प्रातःकाल सभी लोग अपने-अपने निवास पर चले गए। इसी प्रकार वह बहेलिया भी अपने घर चला गया और वहां जाकर भोजन किया। कुछ समय बीतने के पश्चात उस बहेलिए की मृत्यु हो गई। उसने जीव हिंसा की थी, इस कारण वह घोर नरक का भागी था, परंतु उस दिन एकादशी का व्रत तथा जागरण के प्रभाव से उसने राजा विदुरथ के यहां जन्म लिया। उसका नाम वसुरथ रखा गया। बड़ा होने पर वह चतुरंगिणी सेना सहित तथा धन-धान्य से युक्त होकर दस सहस्र ग्रामों का संचालन करने लगा। वह तेज में सूर्य के समान, कांति में चन्द्रमा के समान, वीरता में भगवान विष्णु के समान तथा क्षमा में पृथ्वी के समान था। वह अत्यंत धार्मिक, सत्यवादी, कर्मवीर और विष्णु-भक्त था। वह प्रजा का समान भाव से पालन करता था। दान देना उसका नित्य का कर्म था।

एक बार राजा वसुरथ शिकार खेलने के लिए गया। दैवयोग से वन में वह रास्ता भटक गया और दिशा का ज्ञान न होने के कारण उसी वन में एक वृक्ष के नीचे सो गया। कुष्ठ समय पश्चात पहाड़ी डाकू वहां आए और राजा को अकेला देखकर ‘मारो-मारो’ चिल्लाते हुए राजा वसुरथ की ओर दौड़े। वह डाकू कहने लगे कि इस दुष्ट राजा ने हमारे माता-पिता, पुत्र-पौत्र आदि समस्त सम्बंधियों को मारा है तथा देश से निकाल दिया। अब हमें इसे मारकर अपने अपमान का बदला लेना चाहिए। इतना कह वे डाकू राजा को मारने लगे और उस पर अस्त्र-शस्त्र का प्रहार करने लगे। उन डाकुओं के अस्त्र-शस्त्र राजा के शरीर पर लगते ही नष्ट हो जाते और राजा को पुष्पों के समान प्रतीत होते। कुछ देर बाद प्रभु इच्छा से उन डाकुओं के अस्त्र-शस्त्र उन्हीं पर प्रहार करने लगे, जिससे वे सभी मूर्च्छित हो गए। उसी समय राजा के शरीर से एक दिव्य देवी प्रकट हुई। वह देवी अत्यंत सुंदर थी तथा सुंदर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत थी। उसकी भृकुटी टेढ़ी थी। उसकी आंखों से क्रोध की भीषण लपटें निकल रही थीं और वह काल के समान प्रतीत हो रही थी। उसने देखते-ही-देखते उन सभी डाकुओं का समूल नाश कर दिया।

जब राजा नींद से जागा तो उसने वहां अनेक डाकुओं को मृत पाया। वह सोचने लगा किसने इन्हें किसने मारा? इस वन में कौन मेरा हितैषी रहता है?राजा वसुरथ ऐसा विचार कर ही रहा था कि तभी आकाशवाणी हुई- ‘हे राजन! तुम भगवान विष्णु के प्रिय भक्त हो और इस संसार मे भगवान विष्णु के अतिरिक्त तेरी रक्षा कौन कर सकता है!’ इस आकाशवाणी को सुनकर राजा ने भगवान विष्णु को स्मरण कर उन्हें प्रणाम किया, फिर अपने नगर को वापस आ गया और सुखपूर्वक राज्य करने लगा।

महर्षि वशिष्ठ ने कहा– ‘हे राजन! यह सब आमलकी एकादशी के व्रत का प्रभाव था, जो मनुष्य एक भी बार आमलकी एकादशी का व्रत करता है, वह प्रत्येक कार्य में सफल होता है और अंत में वैकुंठ धाम को पाता है’।”

आमलकी एकादशी व्रत विधि (Rituals of Amalaki Ekadashi)

  • एकादशी से एक दिन पूर्व एक वेदी बनाकर उस पर सप्त धान्य रखें
  • सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी का कलश उस पर स्थापित करें
  • एकादशी के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में निद्रा त्याग करें और निर्मल जल से स्नान कर व्रत का संकल्प लें
  • पंचपल्लव कलश में रखकर भगवान विष्णु की मूर्ति की स्थापना करें
  • धूप, दीप, चंदन, फल, फूल व तुलसी आदि से श्री हरि की पूजा करें
  • उपवास के साथ-साथ भगवन कथा का पाठ व श्रवण करें
  • रात्रि में श्री हरि के नाम का ही भजन कीर्तन करते हुए जगराता करें
  • द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन आदि करवाएं व कलश को दान कर दें
  • तत्पश्चात व्रत का पारण करें
(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैंजिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

 

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Ekadashi Vrat 2022 – एकादशी व्रत तिथि 2022

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Vijaya Ekadashi 2022- हिन्दू धर्म को व्रत और त्यौहारों  का धर्म कहा जाता है इसमें हर रोज़ कोई न कोई पूजा या त्यौहार होता ही रहता है। व्रत एवं त्यौहार हिन्दू धर्म की सांस्कृतिक धरोहर हैं। प्राय: सभी पुराणों में इसका उल्लेख मिलता है कि हमारे ऋषि-मुनि व्रत उपवास के द्वारा ही शरीर, मन तथा आत्मा की शुद्धि करते हुए अलौकिक शक्ति प्राप्त करते थे। विभिन्न हिंदू व्रतों के बीच, एकादशी व्रत का सर्वोच्च महत्व है और यह सभी हिंदुओं में एक सबसे लोकप्रिय उपवास भी है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, आमतौर पर एक वर्ष में 24 एकादशियां होती हैं। एक महीने में दो एकादशियां होती हैं, जिसमें एक कृष्ण पक्ष के समय और दूसरी शुक्ल पक्ष के समय होती है। वर्ष के प्रत्येक मास की दोनों एकादशियों को बहुत ही शुभ माना जाता है। एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। एकादशी के व्रत रखने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होने के साथ ही सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

Vijaya Ekadashi – विजया एकादशी

हिंदू कैलेंडर के अनुसार, फाल्गुन माह में कृष्ण पक्ष के ग्यारहवें दिन (एकादशी) को विजया एकादशी के रूप में मनाया जाता है। अंग्रेज़ी(ग्रेगोरियन) कैलेंडर के अनुसार, विजया एकादशी की प्रति वर्ष फरवरी या मार्च में होती है जिसे भगवान विष्णु की पूजा के लिए मनाया जाता है।

विजया एकादशी कथा (Story of Vijaya Ekadashi)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार देवर्षि नारद जी ने जगत पिता ब्रह्माजी से कहा- ‘हे ब्रह्माजी! आप मुझे फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष एकादशी की व्रत कथा और महत्व बताने की कृपा करें।’

नारद की बात सुन ब्रह्माजी ने कहा- ‘हे पुत्र! फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष एकादशी को विजया एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी का उपवास पूर्व के पाप तथा वर्तमान के पापों को नष्ट करने वाला है। इस एकादशी का विधान मैंने आज तक किसी से नहीं कहा परंतु तुम्हें बताता हूँ, यह उपवास करने वाले सभी मनुष्यों को विजय प्रदान होती है।

अब श्रद्धापूर्वक कथा का श्रवण करो- श्रीराम को जब चौदह वर्ष का वनवास मिला, तब वह भ्राता लक्ष्मण तथा माता सीता सहित पंचवटी में निवास करने लगे। उस समय महापापी रावण ने माता सीता का हरण कर लिया।

इस दुःखद घटना से श्रीरामजी तथा लक्ष्मणजी अत्यंत दुखी हुए और सीताजी की खोज में वन-वन भटकने लगे। जंगल-जंगल घूमते हुए, वे मरणासन्न जटायु के पास जा पहुंचे। जटायु ने उन्हें माता सीता के हरण का पूरा वृत्तांत सुनाया और भगवान श्रीरामजी की गोद में प्राण त्यागकर स्वर्ग की तरफ प्रस्थान किया। कुछ दूर आगे चलकर श्रीराम व लक्ष्मण की हनुमान जी से मुलाक़ात हुई और सुग्रीवजी के साथ मित्रता हो गई और वहां उन्होंने बालि का वध किया।

श्रीराम भक्त हनुमानजी ने लंका में जाकर माता सीता का पता लगाया और माता से श्रीरामजी तथा महाराज सुग्रीव की मित्रता का वर्णन सुनाया। वहां से लौटकर हनुमानजी श्रीरामचन्द्रजी के पास आए और अशोक वाटिका का सारा वृत्तांत कह सुनाया।

सब हाल जानने के बाद श्रीरामचन्द्रजी ने सुग्रीव की सहमति से वानरों तथा भालुओं की सेना सहित लंका की तरफ प्रस्थान किया। समुद्र किनारे पहुंचने पर श्रीरामजी ने विशाल समुद्र को घड़ियालों से भरा देखकर लक्ष्मणजी से कहा- ‘हे लक्ष्मण! अनेक मगरमच्छों और जीवों से भरे इस विशाल समुद्र को कैसे पार करेंगे?’

प्रभु श्रीराम की बात सुनकर लक्ष्मणजी ने कहा- ‘भ्राताश्री! आप पुराण पुरुषोत्तम आदिपुरुष हैं। आपसे कुछ भी विलुप्त नहीं है। यहां से आधा योजन दूर कुमारी द्वीप में वकदाल्भ्य मुनि का आश्रम है। वे अनेक शास्त्रों के ज्ञाता हैं। वे ही आपकी विजय के उपाय बता सकते हैं’

अपने छोटे भाई लक्ष्मणजी के वचनों को सुन श्रीरामजी वकदाल्भ्य ऋषि के आश्रम में गए और उन्हें प्रणाम किया। अपने आश्रम में श्रीराम को आया देख महर्षि वकदाल्भ्य ने पूछा- ‘हे श्रीराम! आपने किस प्रयोजन से मेरे आश्रम को पवित्र किया है, कृपा कर अपना प्रयोजन कहें प्रभु!’

मुनि के मधुर वचनों को सुन श्रीरामजी ने कहा- ‘हे ऋषिवर! मैं सेना सहित यहां आया हूँ और राक्षसराज रावण से अपनी भार्या सीता को मुक्त कराने की इच्छा से लंका जा रहा हूं। कृपा कर आप समुद्र को पार करने का कोई उपाय बताएं। आपके पास आने का मेरा यही प्रयोजन है।’

महर्षि वकदाल्भ्य ने कहा- ‘हे राम! मैं आपको एक अति उत्तम व्रत बतलाता हूं। जिसके करने से आपको विजयश्री अवश्य ही प्राप्त होगी।’

‘यह कैसा व्रत है मुनिश्रेष्ठ! जिसे करने से समस्त क्षेत्रों में विजय की प्राप्ति होती है?’ जिज्ञासु हो श्रीराम ने पूछा। इस पर महर्षि वकदाल्भ्य ने कहा- ‘हे श्रीराम! फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी (Vijaya Ekadashi) का उपवास करने से आप अवश्य ही समुद्र को पार कर लेंगे और युद्ध में भी आपकी विजय होगी। हे मर्यादा पुरुषोत्तम! इस उपवास के लिए दशमी के दिन स्वर्ण, चांदी, तांबे या मिट्टी का एक कलश बनाएं। उस कलश को जल से भरकर तथा उस पर पंच पल्लव रखकर उसे वेदिका पर स्थापित करें। उस कलश के नीचे सतनजा अर्थात मिले हुए सात अनाज और ऊपर जौ रखें। उस पर विष्णु की स्वर्ण की प्रतिमा स्थापित करें। एकादशी के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर धूप, दीप, नैवेद्य, नारियल आदि से भगवान श्रीहरि का पूजन करें। वह सारा दिन भक्तिपूर्वक कलश के सामने व्यतीत करें और रात को भी उसी तरह बैठे रहकर जागरण करें। द्वादशी के दिन नदी या बालाब के किनारे स्नान आदि से निवृत्त होकर उस कलश को ब्राह्मण को दे दें। हे दशरथनंदन! यदि आप इस व्रत को सेनापतियों के साथ करेंगे तो अवश्य ही विजयश्री आपका वरण करेगी।’ मुनि के वचन सुन तब श्रीरामचन्द्रजी ने विधिपूर्वक विजया एकादशी का व्रत किया और इसके प्रभाव से राक्षसों के ऊपर विजय प्राप्त की।

ये भी पढ़ें : Ekadashi Vrat 2022 – एकादशी व्रत तिथि 2022

विजया एकादशी व्रत विधि (Rituals of Vijaya Ekadashi)

  • एकादशी से एक दिन पूर्व एक वेदी बनाकर उस पर सप्त धान्य रखें
  • सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी का कलश उस पर स्थापित करें
  • एकादशी के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में निद्रा त्याग करें और निर्मल जल से स्नान कर व्रत का संकल्प लें
  • पंचपल्लव कलश में रखकर भगवान विष्णु की मूर्ति की स्थापना करें
  • धूप, दीप, चंदन, फल, फूल व तुलसी आदि से श्री हरि की पूजा करें
  • उपवास के साथ-साथ भगवन कथा का पाठ व श्रवण करें
  • रात्रि में श्री हरि के नाम का ही भजन कीर्तन करते हुए जगराता करें
  • द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन आदि करवाएं व कलश को दान कर दें
  • तत्पश्चात व्रत का पारण करें

विजया एकादशी 2022 (Vijaya Ekadashi 2022)

दिनांक : 27 फरवरी 2022
वार : रविवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ: 26 फरवरी 2022 को सुबह 10 बजकर 39 मिनट
एकादशी तिथि समाप्त: 27 फरवरी 2022 को सुबह 08 बजकर 12 मिनट
पारण (व्रत तोड़ने का) समय : 27 फरवरी 2022 को दोपहर 01 बजकर 43 मिनट से 04 बजकर 01 मिनट
पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय  – दोपहर 01 बजकर 35 मिनट

विजया एकादशी 2022 पर बन रहा है शुभ संयोग

इस वर्ष विजया एकादशी के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और त्रिपुष्कर योग भी बन रहा है। विजया एकादशी पर पूजा का शुभ मुहूर्त दोपहर 12.11 से दोपहर 12.57 मिनट तक रहेगा।

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Jaya Ekadashi 2022- 12 फरवरी को है जया एकादशी व्रत, जाने पूजा मुहूर्त एवं पारण समय https://astrodeeva.com/jaya-ekadashi-2022-is-on-12th-february/ https://astrodeeva.com/jaya-ekadashi-2022-is-on-12th-february/#respond Tue, 08 Feb 2022 05:23:44 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2757 हिन्दू धर्म में एकादशी (Ekadashi) धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तिथि है। इस दिन के व्रत की बहुत मान्यता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक मास में 2 एकादशी होती है और एक वर्ष में 24 एकादशियाँ आती है परंतु जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष इनकी संख्या 26 हो जाती है। वर्ष के […]

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हिन्दू धर्म में एकादशी (Ekadashi) धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तिथि है। इस दिन के व्रत की बहुत मान्यता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक मास में 2 एकादशी होती है और एक वर्ष में 24 एकादशियाँ आती है परंतु जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष इनकी संख्या 26 हो जाती है। वर्ष के प्रत्येक मास की दोनों एकादशियों को बहुत ही शुभ माना जाता है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (Jaya Ekadashi) का भी अपना विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस एकादशी के उपवास से पिशाचों सा जीवन व्यतीत करने वाले पापी से पापी व्यक्ति को भी मोक्ष प्राप्ति होती हैं। माघ शुक्ल एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है। आइये जानते हैं जया एकादशी (Jaya Ekadashi 2022) का महत्व, पूजा मुहूर्त ,पारण समय व पूजा विधि ।

जया एकादशी महत्‍व (Significance of Jaya Ekadashi)

पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत के समय अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण इस एकादशी का महत्व पूछते हुए उनसे कहा “हे मुरलीधर! हे भगवन्! कृपा कर आप मुझे माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के सम्बंध मे विस्तारपूर्वक बताएं। शुक्ल पक्ष की एकादशी में किस देवता का पूजन करना चाहिए तथा इस एकादशी के व्रत के करने से किस फल की प्राप्ति होती है?”

एकादशी व्रत तिथि 2022

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे कुंतिपुत्र! माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहते हैं। इस एकादशी के उपवास से मनुष्य भूत, प्रेत, पिशाच आदि की योनि से छूट जाता है और उसे जया एकादशी के उपवास के फलस्वरूप कुयोनि से सहज ही मुक्ति मिल जाती है। जो मनुष्य इस एकादशी का व्रत कर लेता है, उसने मानो सभी तप, यज्ञ, दान कर लिए हैं। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक जया एकादशी का व्रत करते हैं, वे अवश्य ही सहस्र वर्ष तक स्वर्ग में वास करते हैं।” अतः इस एकादशी के उपवास को विधि अनुसार करना चाहिए।“

जया एकादशी 2022(Jaya Ekadashi 2022)

दिनांक : 12 फरवरी 2022
वार : शनिवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ : 11 फरवरी 2022 को 01:52 पी एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त : 12 फरवरी 2022 को 04:27 पी एम बजे
पारण (व्रत तोड़ने की) तिथि : 13 फरवरी 2022
पारण (व्रत तोड़ने का) समय : सुबह 07:01 ए एम से 09:15 ए एम बजे तक
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय : 06:42 पी एम बजे

एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत रखते हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती है।

जया एकादशी व्रत विधि ( Vrat Vidhi of Jaya Ekadashi)

इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और वंदना की जाती है। इस व्रत की पूजा विधि इस प्रकार है:

  • जया एकादशी व्रत के लिए उपासक को व्रत से पूर्व दशमी के दिन एक ही समय सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। व्रती को संयमित और ब्रह्मचार्य का पालन करना चाहिए।
  • प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेकर धूप, दीप, फल और पंचामृत आदि अर्पित करके भगवान विष्णु के श्री कृष्ण अवतार की पूजा करनी चाहिए।
  • तुलसी की माला ले और पीले आसन पर बैठकर ॐ नमो भगवते श्रीगोविन्दाय  मंत्र का एक माला जाप करें।
  • रात्रि में जागरण कर श्री हरि के नाम के भजन करना चाहिए।
  • द्वादशी के दिन किसी जरुरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन कराकर, दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिये।

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