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The post Ekadashi Vrat- एकादशी व्रत करने से पहले जरूरी है इन 15 बातों को जानना….. appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>हिंदू शास्त्रों के अनुसार वर्ष 26 व्रत बताए गये है जिनको व्यक्ति अगर नियम अनुसार करे तो इन व्रत के फलस्वरूप उसके सभी पाप नष्ट होते हैं उसको निरोगी काया, पारिवारिक सुख और धन-समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह 26 व्रत हिंदू पंचांग के अनुसार प्रति माह की ग्यारहवीं तिथि यानी एकादशी तिथि को किया जाता है। इसे एकादशी व्रत और ग्यारस व्रत कहा जाता है। आइए जानते है एकादशी व्रत की 15 महत्वपूर्ण बातें….
एकादशी (Ekadashi Vrat) की ये 15 बातें आपको जरूर जानना चाहिए :-
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]]>The post Nirjala Ekadashi – निर्जला एकादशी appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
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]]>The post Mohini Ekadashi – मोहिनी एकादशी appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>मान्यता है कि वैशाख शुक्ल एकादशी के दिन ही भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया था। भगवान विष्णु ने सुमुद्र मंथन के दौरान प्राप्त हुए अमृत को देवताओं में वितरीत करने के लिये मोहिनी का रूप धारण किया था। कहा जाता है कि जब समुद्र मंथन हुआ तो अमृत प्राप्ति के बाद देवताओं व असुरों में आपाधापी मच गई थी। चूंकि ताकत के बल पर देवता असुरों को हरा नहीं सकते थे इसलिये चालाकि से भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर असुरों को अपने मोहपाश में बांध लिया और सारे अमृत का पान देवताओं को करवा दिया जिससे देवताओं ने अमरत्व प्राप्त किया। वैशाख शुक्ल एकादशी के दिन चूंकि यह सारा घटनाक्रम हुआ इस कारण इस एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा गया।
धन नष्ट हो जाने पर वेश्याओं तथा उसके दुष्ट साथियों ने भी उसका साथ छोड़ दिया। जब वह भूख-प्यास से व्यथित हो गया तो उसने चोरी करने का विचार किया और रात्रि में चोरी करके अपना पेट पालने लगा, लेकिन एक दिन वह पकड़ा गया, किन्तु सिपाहियों ने वैश्य का पुत्र जानकर छोड़ दिया। जब वह दूसरी बार पुनः पकड़ा गया, तब सिपाहियों ने भी उसका कोई लिहाज नहीं किया और राजा के सामने प्रस्तुत करके उसे सारी बात बताई। तब राजा ने उसे कारागार में डलवा दिया। कारागार में राजा के आदेश से उसे बहुत कष्ट दिए गये और अन्त में उसे नगर छोड़ने के लिए कहा गया। दुखी होकर उसे नगर छोड़ना पड़ा।
अब वह जंगल में पशु-पक्षियों को मारकर पेट भरने लगा। फिर बहेलिया बन गया और धनुष-बाण से जंगल के निरीह जीवों को मार-मारकर खाने और बेचने लगा। एक बार वह भूख और प्यास से व्याकुल होकर भोजन की खोज में निकला और कौटिन्य मुनि के आश्रम में जा पहुँचा।
इन दिनों वैशाख का महीना था। कौटिन्य मुनि गंगा स्नान करके आये थे। उनके भीगे वस्त्रों की छींटें मात्र से इस पापी को कुछ सद्बुद्धि प्राप्त हुई। वह अधम, ऋषि के पास जाकर हाथ जोड़कर कहने लगा – ‘हे महात्मा! मैंने अपने जीवन में अनेक पाप किये हैं, कृपा कर आप उन पापों से छूटने का कोई साधारण और बिना धन का उपाय बतलाइये।’
ऋषि ने कहा – ‘तू ध्यान देकर सुन – वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत कर। इस एकादशी का नाम मोहिनी है। इसका उपवास करने से तेरे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।
ऋषि के वचनों को सुन वह बहुत प्रसन्न हुआ और उनकी बतलायी हुई विधि के अनुसार उसने मोहिनी एकादशी(Mohini Ekadashi) का व्रत किया।
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]]>The post Varuthini Ekadashi 2022- 26 अप्रैल को है वरुथिनी एकादशी व्रत, जानिए शुभ मुहूर्त और पारण तिथि व समय appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>हिन्दू धर्म में वरुथिनी एकादशी का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि जो लोग नियम पूर्वक वरुथिनी एकादशी व्रत करते हैं भगवान विष्णु की कृपा से उनके समस्त दूखों का नाश हो जाता है और उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. कहते हैं कि मृत्यु के पश्चात एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को भगवान श्री हरि के चरणों में स्थान प्राप्त होता है।
दिनांक : 26 अप्रैल 2022
वार : मंगलवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ: 26 अप्रैल 2022 को 01:37 ए एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 27 अप्रैल 2022 को 12:47 ए एम बजे
पारण (व्रत तोड़ने का) समय : 27 अप्रैल 2022 को 06:41 ए एम से 08:22 ए एम
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय : 06:41 ए एम
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नामक राजा राज्य करते थे। वह अत्यंत दानशील तथा तपस्वी थे। एक दिन जब वह जंगल में तपस्या कर रहे थे, तभी न जाने कहाँ से एक जंगली भालू आया और राजा का पैर चबाने लगा। राजा पूर्ववत अपनी तपस्या में लीन रहे। कुछ देर बाद पैर चबाते-चबाते भालू राजा को घसीटकर पास के जंगल में ले गया।
राजा बहुत घबराया, मगर तापस धर्म अनुकूल उसने क्रोध और हिंसा न करके भगवान विष्णु से प्रार्थना की, करुण भाव से भगवान विष्णु को पुकारा। उसकी पुकार सुनकर भगवान श्रीहरि विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने चक्र से भालू को मार डाला।
राजा का पैर भालू पहले ही खा चुका था। इससे राजा बहुत ही शोकाकुल हुए। उन्हें दुःखी देखकर भगवान विष्णु बोले: हे वत्स! शोक मत करो। तुम मथुरा जाओ और वरूथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरी वराह अवतार मूर्ति की पूजा करो। उसके प्रभाव से पुन: सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे। इस भालू ने तुम्हें जो काटा है, यह तुम्हारे पूर्व जन्म का अपराध था।
भगवान की आज्ञा मानकर राजा मान्धाता ने मथुरा जाकर श्रद्धापूर्वक वरूथिनी एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से राजा शीघ्र ही पुन: सुंदर और संपूर्ण अंगों वाला हो गया। इसी एकादशी के प्रभाव से राजा मान्धाता स्वर्ग गये थे।
इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और वंदना की जाती है। इस व्रत की पूजा विधि इस प्रकार है:
इस दिन भक्तिभाव से भगवान मधुसूदन की पूजा करनी चाहिए। इस व्रत को करने से भगवान मधुसूदन की प्रसन्नता प्राप्त होती है और संपूर्ण पापों का नाश होता है। सुख-सौभाग्य की वृद्धि होती है तथा भगवान का चरणामृत ग्रहण करने से आत्मशुद्धि होती है।व्रती को चाहिए कि वह दशमी को अर्थात व्रत रखने से एक दिन पूर्व एक बार सात्विक भोजन करे। इस व्रत में कुछ वस्तुओं का पूर्णतया निषेध है, अतः इनका त्याग करना ही श्रेयस्कर है। व्रत करने वाले के लिए उस दिन पान खाना, दातुन करना, परनिंदा, क्रोध करना व असत्य बोलना वर्जित है। इस दिन जुआ और निद्रा का भी त्याग करें। इस व्रत में तेलयुक्त भोजन नहीं करना चाहिए। रात्रि में भगवान का नाम स्मरण करते हुए जागरण करें और द्वादशी को मांस का परित्याग करके व्रत का पालन करें।
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]]>The post Papmochani Ekadashi 2022 – पापमोचनी एकादशी appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>दिनांक : 28 मार्च 2022
वार : सोमवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ : 27 मार्च 2022 को 06:04 पी एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त : 28 मार्च 2022 को 04:15 पी एम बजे
पारण (व्रत तोड़ने का) समय : 29 मार्च 2022 को 06:15 ए एम से 08:43 ए एम
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय : 02:38 पी एम
पुराणों के अनुसार एक बार अर्जुन ने कहा- “हे कमलनयन! मैं ज्यों-ज्यों एकादशियों के व्रतों की कथाएँ सुन रहा हूँ, त्यों-त्यों अन्य एकादशियों के व्रतों की कथाएँ सुनने की मेरी जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही है। हे मधुसूदन! अब कृपा कर आप चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के विषय में बतलाइये। इस एकादशी का नाम क्या है? इसमें कौन-से देवता का पूजन किया जाता है तथा इस व्रत का क्या विधान है? हे श्रीकृष्ण! यह सब आप मुझे विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें।”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! एक बार यही प्रश्न पृथ्वीपति मान्धाता ने लोमश ऋषि से किया था, जो कुछ लोमश ऋषि ने राजा मान्धाता को बताया था, वही मैं तुमसे कह रहा हूँ। राजा मान्धाता ने धर्म के गुह्यतम रहस्यों के ज्ञाता महर्षि लोमश से पूछा- ‘हे ऋषिश्रेष्ठ! मनुष्य के पापों का मोचन किस प्रकार सम्भव है? कृपा कर कोई ऐसा सरल उपाय बतायें, जिससे सहज ही पापों से छुटकारा मिल जाए।’
महर्षि लोमश ने कहा- ‘हे नृपति! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम पापमोचिनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) है। उसके व्रत के प्रभाव से मनुष्यों के अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं। मैं तुम्हें इस व्रत की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो- प्राचीन समय में चैत्ररथ नामक एक वन था। उसमें अप्सराएँ किन्नरों के साथ विहार किया करती थीं। वहाँ सदैव वसन्त का मौसम रहता था, अर्थात उस जगह सदा नाना प्रकार के पुष्प खिले रहते थे। कभी गन्धर्व कन्याएँ विहार किया करती थीं, कभी देवेन्द्र अन्य देवताओं के साथ क्रीड़ा किया करते थे।
उसी वन में मेधावी नाम के एक ऋषि भी तपस्या में लीन रहते थे। वे शिवभक्त थे। एक दिन मञ्जुघोषा नामक एक अप्सरा ने उनको मोहित कर उनकी निकटता का लाभ उठाने की चेष्टा की, इसलिए वह कुछ दूरी पर बैठ वीणा बजाकर मधुर स्वर में गाने लगी। उसी समय शिव भक्त महर्षि मेधावी को कामदेव भी जीतने का प्रयास करने लगे। कामदेव ने उस सुन्दर अप्सरा के भ्रू का धनुष बनाया। कटाक्ष को उसकी प्रत्यन्चा बनाई और उसके नेत्रों को मञ्जुघोषा अप्सरा का सेनापति बनाया। इस तरह कामदेव अपने शत्रुभक्त को जीतने को तैयार हुआ। उस समय महर्षि मेधावी भी युवावस्था में थे और काफी हृष्ट-पुष्ट थे। उन्होंने यज्ञोपवीत तथा दण्ड धारण कर रखा था। वे दूसरे कामदेव के समान प्रतीत हो रहे थे। उस मुनि को देखकर कामदेव के वश में हुई मञ्जुघोषा ने धीरे-धीरे मधुर वाणी से वीणा पर गायन शुरू किया तो महर्षि मेधावी भी मञ्जुघोषा के मधुर गाने पर तथा उसके सौन्दर्य पर मोहित हो गए। वह अप्सरा मेधावी मुनि को कामदेव से पीड़ित जानकर उनसे आलिङ्गन करने लगी।
महर्षि मेधावी उसके सौन्दर्य पर मोहित होकर शिव रहस्य को भूल गए और काम के वशीभूत होकर उसके साथ रमण करने लगे। काम के वशीभूत होने के कारण मुनि को उस समय दिन-रात का कुछ भी ज्ञान न रहा और काफी समय तक वे रमण करते रहे। तदुपरान्त मञ्जुघोषा उस मुनि से बोली- ‘हे ऋषिवर! अब मुझे बहुत समय हो गया है, अतः स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये।’
अप्सरा की बात सुनकर ऋषि ने कहा- ‘हे मोहिनी! सन्ध्या को तो आयी हो, प्रातःकाल होने पर चली जाना।’
ऋषि के ऐसे वचनों को सुनकर अप्सरा उनके साथ रमण करने लगी। इसी प्रकार दोनों ने साथ-साथ बहुत समय बिताया।
मञ्जुघोषा ने एक दिन ऋषि से कहा- ‘हे विप्र! अब आप मुझे स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये।’
मुनि ने इस बार भी वही कहा- ‘हे रूपसी! अभी ज्यादा समय व्यतीत नहीं हुआ है, कुछ समय और ठहरो।’
मुनि की बात सुन अप्सरा ने कहा- ‘हे ऋषिवर! आपकी रात तो बहुत लम्बी है। आप स्वयं ही सोचिये कि मुझे आपके पास आये कितना समय हो गया। अब और ज्यादा समय तक ठहरना क्या उचित है?’
अप्सरा की बात सुन मुनि को समय का बोध हुआ और वह गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगे। जब उन्हें समय का ज्ञान हुआ कि उन्हें रमण करते सत्तावन (57) वर्ष व्यतीत हो चुके हैं तो उस अप्सरा को वह काल का रूप समझने लगे। इतना ज्यादा समय भोग-विलास में व्यर्थ चला जाने पर उन्हें बड़ा क्रोध आया। अब वह भयंकर क्रोध में जलते हुए उस तप नाश करने वाली अप्सरा की तरफ भृकुटी तानकर देखने लगे। क्रोध से उनके अधर काँपने लगे और इन्द्रियाँ बेकाबू होने लगीं। क्रोध से थरथराते स्वर में मुनि ने उस अप्सरा से कहा- ‘मेरे तप को नष्ट करने वाली दुष्टा! तू महा पापिन और बहुत ही दुराचारिणी है, तुझ पर धिक्कार है। अब तू मेरे शाप (श्राप) से पिशाचिनी बन जा।’
मुनि के क्रोधयुक्त शाप (श्राप) से वह अप्सरा पिशाचिनी बन गई। यह देख वह व्यथित होकर बोली- ‘हे ऋषिवर! अब मुझ पर क्रोध त्यागकर प्रसन्न होइए और कृपा करके बताइये कि इस शाप (श्राप) का निवारण किस प्रकार होगा? विद्वानों ने कहा है, साधुओं की सङ्गत अच्छा फल देने वाली होती है और आपके साथ तो मेरे बहुत वर्ष व्यतीत हुए हैं, अतः अब आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइए, अन्यथा लोग कहेंगे कि एक पुण्य आत्मा के साथ रहने पर मञ्जुघोषा को पिशाचिनी बनना पड़ा।’ मञ्जुघोषा की बात सुनकर मुनि को अपने क्रोध पर अत्यन्त ग्लानि हुई साथ ही अपनी अपकीर्ति का भय भी हुआ, अतः पिशाचिनी बनी मञ्जुघोषा से मुनि ने कहा- ‘तूने मेरा बड़ा बुरा किया है, किन्तु फिर भी मैं तुझे इस शाप (श्राप) से मुक्ति का उपाय बतलाता हूँ। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी है, उसका नाम पापमोचिनी(Papmochani Ekadashi) है। उस एकादशी का उपवास करने से तेरी पिशाचिनी की देह से मुक्ति हो जाएगी।’
ऐसा कहकर मुनि ने उसको व्रत का सब विधान समझा दिया। फिर अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए वे अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गये।
च्यवन ऋषि ने अपने पुत्र मेधावी को देखकर कहा- ‘हे पुत्र! ऐसा क्या किया है तूने कि तेरे सभी तप नष्ट हो गए हैं? जिससे तुम्हारा समस्त तेज मलिन हो गया है?’
मेधावी मुनि ने लज्जा से अपना सिर झुकाकर कहा- ‘पिताश्री! मैंने एक अप्सरा से रमण करके बहुत बड़ा पाप किया है। इसी पाप के कारण सम्भवतः मेरा सारा तेज और मेरे तप नष्ट हो गए हैं। कृपा करके आप इस पाप से छूटने का उपाय बतलाइये।’
ऋषि ने कहा- ‘हे पुत्र! तुम चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी का विधि तथा भक्तिपूर्वक उपवास करो, इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।’
अपने पिता च्यवन ऋषि के वचनों को सुनकर मेधावी मुनि ने पापमोचिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। उसके प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए। मञ्जुघोषा अप्सरा भी पापमोचिनी एकादशी का उपवास करने से पिशाचिनी की देह से छूट गई और पुनः अपना सुन्दर रूप धारण कर स्वर्गलोक चली गई। लोमश मुनि ने कहा-हे राजन! इस पापमोचिनी एकादशी के प्रभाव से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी की कथा के श्रवण व पठन से एक हजार गौदान करने का फल प्राप्त होता है। इस उपवास के करने से ब्रह्म हत्या करने वाले, स्वर्ण चुराने वाले, मद्यपान करने वाले, अगम्या गमन करने वाले आदि भयंकर पाप भी नष्ट हो जाते हैं और अन्त में स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।”
Papmochani Ekadashi व्रत के विषय में भविष्योत्तर पुराण में विस्तार से वर्णन किया गया है। इस व्रत में भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है। इस व्रत को रखने वाले व्रती को दशमी तिथि को एक बार सात्विक भोजन करना चहिये और मन से भोग विलास की भावना को निकालकर श्री हरि में मन को लगाना चहिये।
“गंगा च यमुना चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेसमिन सानिधिम कुरु”
(अर्थात्- इस पानी में, मैं गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी नदियों से दिव्य जल की उपस्थिति का आह्वान करता हूं)
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस संसार में जो भी मनुष्य भगवान श्री विष्णु का आशीर्वाद पाना चाहता है, उसे एकादशी का व्रत जरुर करना चाहिए। एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। एकादशी के व्रत रखने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होने के साथ ही सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
Also read –
The post Papmochani Ekadashi 2022 – पापमोचनी एकादशी appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>The post Shattila Ekadashi 2022- षटतिला एकादशी appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>माघ माह हिन्दू धर्म में बेहद पवित्र माना जाता है। इस महीने मनुष्य को अपनी इंद्रियों को काबू में रखते हुए क्रोध, अहंकार, काम, लोभ व चुगली आदि का त्याग करना चाहिए। इस माह के कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को षटतिला एकादशी या तिला एकादशी के नाम से जाना जाता है। नाम के अनुसार इस एकादशी में तिल का बहुत महत्व होता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर(English calendar ) के अनुसार, यह त्योहार जनवरी या फरवरी महीने में होता है।
पुराणों में षटतिला एकादशी का बहुत अधिक महत्व बताया गया है। जो व्यक्ति षटतिला एकादशी का व्रत करता है। उसे स्वर्णदान का फल प्राप्त होता है। इस व्रत का फल हजारों साल तक की तपस्या के बराबर बताया गया है। यह व्रत मनुष्य को न केवल जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति कराता है बल्कि इस व्रत के करने से मृत्यु के बाद बैकुंठ धाम में स्थान भी प्राप्त होता है।
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार अर्जुन ने भगवान कृष्ण से पूछते हुआ कहा “हे मुरलीधर! आपके श्रीमुख से एकादशियों की कथा सुनकर मुझे असीम आनंद की प्राप्ति हुई है। हे केशव! कृपा कर माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनाने की भी अनुकम्पा करें।”
अर्जुन के इस आग्रह को सुन भगवान कृष्ण बोले , “हे अर्जुन! में तुम्हें षटतिला एकादशी व्रत की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो-
एक बार दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा – ‘हे ऋषि श्रेष्ठ! मनुष्य मृत्युलोक में अनेक प्रकार के महापाप करते हैं और दूसरे के धन की चोरी तथा दूसरे की उन्तति देखकर ईर्ष्या आदि करते हैं, मनुष्य ऐसे पाप क्रोध, ईर्ष्या, आवेग और मूर्खतावश करते हैं और बाद में पश्चाताप करते हैं कि हाय! यह हमने क्या किया! हे महामुनि! ऐसे मनुष्यों को जो भूल वश पाप करते है उन्हें नरक से बचाने का क्या उपाय है? कोई ऐसा उपाय बताने की कृपा करें, जिससे ऐसे मनुष्यों को नरक से बचाया जा सके।
दालभ्य ऋषि की बात सुन पुलत्स्य ऋषि ने कहा – ‘हे मुनि श्रेष्ठ! आपने मुझसे अत्यंत गूढ़ प्रश्न पूछा है। इससे संसार में मनुष्यों का बहुत लाभ होगा। जिस रहस्य को इन्द्र आदि देवता भी नहीं जानते, वह रहस्य मैं आपको अवश्य ही बताऊंगा। माघ मास आने पर मनुष्य को स्नान आदि से शुद्ध रहना चाहिए और इन्द्रियों को वश में करके तथा सांसारिक मोह जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या तथा अहंकार आदि से सर्वथा बचना चाहिए।
जिस दिन मूल नक्षत्र और एकादशी तिथि हो, तब अच्छे पुण्य देने वाले नियमों को ग्रहण करना चाहिए। स्नानादि नित्य कर्म से देवों के देव भगवान श्रीहरि का पूजन व कीर्तन करना चाहिए।
एकादशी (Ekadashi) के दिन उपवास करें तथा रात को जागरण और हवन करें। उसके दूसरे दिन धूप, दीप, नैवेद्य से भगवान श्रीहरि की पूजा-अर्चना करें तथा खिचड़ी का भोग लगाएं। उस दिन श्रीविष्णु को पेठा, नारियल, सीताफल या सुपारी सहित अर्घ्य अवश्य देना चाहिए, तदुपरांत उनकी स्तुति करनी चाहिए – ‘हे जगदीश्वर! आप निराश्रितों को शरण देने वाले हैं। आप संसार में डूबे हुए का उद्धार करने वाले हैं। हे कमलनयन! हे मधुसूदन! हे जगन्नाथ! हे पुण्डरीकाक्ष! आप लक्ष्मीजी सहित मेरे इस तुच्छ अर्घ्य को स्वीकार कीजिए।’ इसके पश्चात ब्राह्मण को जल से भरा घड़ा और तिल दान करने चाहिए। यदि सम्भव हो तो ब्राह्मण को गऊ और तिल दान देना चाहिए। इस प्रकार मनुष्य जितने तिलों का दान करता है। वह उतने ही सहस्र वर्ष स्वर्ग में वास करता है।
इस प्रकार छः रूपों में तिलों का प्रयोग षटतिला कहलाती है। इससे अनेक प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। इतना कहकर पुलस्त्य ऋषि ने कहा – ‘अब मैं एकादशी की कथा सुनाता हूँ-
एक समय नारदजी ने भगवान विष्णु से लोक कल्याण के लिए प्रश्न किया जिसके उत्तर में भगवान ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य नारदजी से कहा। भगवान ने नारदजी से कहा कि – हे नारद! मैं तुमसे सत्य घटना कहता हूं, ध्यानपूर्वक सुनो।
प्राचीन काल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदैव व्रत करती, एक बार उसने एक माह तक व्रत किया जिसके कारण उसका शरीर अत्यंत क्षीण व दुर्बल हो गया। बुद्धिमान होने के बावजूद उसने कभी भी देवताओं या ब्राह्मणों के लिए किसी प्रकार का अन्न या धन का दान नहीं किया था। इससे मैंने सोचा कि ब्राह्मणी ने व्रत आदि से अपना शरीर शुद्ध कर लिया है, अब इसे विष्णुलोक तो मिल ही जाएगा परंतु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इससे इसकी तृप्ति होना कठिन है।
भगवान ने आगे कहा- ऐसा सोचकर मैं भिखारी के वेश में मृत्युलोक में उस ब्राह्मणी के पास गया और उससे भिक्षा माँगी। वह ब्राह्मणी बोली- महाराज आप किस लिए आए हो? मैंने कहा- मुझे भिक्षा चाहिए। इस पर उसने मुझे एक मिट्टी का पिंड दे दिया। मैं उस पिंड को लेकर स्वर्ग लौट आया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी भी शरीर त्याग कर स्वर्ग में आ गई। ब्राह्मणी के मिट्टी के पिंड के दान के प्रभाव से स्वर्ग में सुंदर महल मिला, परंतु उस महल में और कुछ न देख कर वह घबराकर मेरे पास आई और कहने लगी कि भगवन मैंने अपने जीवन काल में अनेक व्रत आदि से आपकी पूजा की
परंतु फिर भी मेरा घर सब वस्तुओं से रिक्त है। इसका क्या कारण है?
इस पर मैंने कहा- तुम अपने घर जाओ। जब देवस्त्रियाँ तुम्हें देखने के लिए आएँगी तब तुम उनसे षटतिला एकादशी(Shattila Ekadashi) व्रत का महत्व और उसका विधान पूछना, जब तक वह न बताएं, तब तक द्वार नहीं खोलना।
मेरे ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली- आप मुझे देखने आई हैं तो षटतिला एकादशी का महत्व मुझसे कहो। उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी कि मैं कहती हूँ। जब ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना तब द्वार खोल दिया। देवांगनाओं ने उसको देखा कि न तो वह गांधर्वी है और न आसुरी है वरन पहले जैसी मानुषी है। उस ब्राह्मणी ने देवस्त्रियों के कथनानुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया।
इसके प्रभाव से वह सुंदर और रूपवती हो गई तथा उसका घर समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया। अतः हे पार्थ! मनुष्यों को अज्ञान को त्यागकर षटतिला एकादशी(Shattila Ekadashi) का उपवास करना चाहिए। इस एकादशी व्रत के करने वाले को जन्म-जन्म की निरोगता प्राप्त हो जाती है। इस उपवास से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।”
दिनांक : 28 जनवरी 2022
वार : शुक्रवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 28 जनवरी 2022 को 2:16 ए एम
एकादशी तिथि समाप्त – 28 जनवरी 2022 को 11:35 पी एम
पारण तिथि : 29 जनवरी 2022
पारण समय : 07:11 ए एम से 09:20 ए एम
षटतिला एकादशी( Shattila Ekadashi) के दिन तिल का 6 प्रकार से उपयोग किया जाता है।
षटतिला एकादशी व्रत पारण (Shattila Ekadashi Vrat Paran)
पारण का मतलब एकादशी व्रत के समापन से है जो अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है। लेकिन ध्यान रखें कि इस व्रत का पारण द्वादशी तिथि के भीतर ही कर लेना चाहिए। व्रत के समापन के समय इस बात का भी ध्यान रखें कि कहीं हरि वासर तो नहीं लग रहा है। द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि को हरि वासर कहा जाता है। पारण के लिए प्रात:काल को सही माना गया है। अगर हरि वासर के कारण ऐसा संभव न हो तब मध्याह्न के बाद व्रत खोलना उचित रहता है।
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2022 एकादशी व्रत तिथि |
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एकादशी |
दिनांक, वार |
हिंदी मास |
पक्ष |
एकादशी समय |
पौष पुत्रदा एकादशी(Pausha Putrada Ekadashi) |
जनवरी 13, 2022, गुरुवार |
पौष |
शुक्ल पक्ष |
पौष, शुक्ल एकादशीप्रारम्भ – 04:49 पी एम,जनवरी 12समाप्त – 07:32 पी एम,जनवरी 13 |
षटतिला एकादशी(Shattila Ekadashi) |
जनवरी 28, 2022, शुक्रवार |
माघ |
कृष्ण पक्ष |
माघ, कृष्ण एकादशीप्रारम्भ – 02:16 ए एम,जनवरी 28समाप्त – 11:35 पी एम,जनवरी 28 |
जया एकादशी(Jaya Ekadashi) |
फरवरी 12, 2022, शनिवार |
माघ |
शुक्ल पक्ष |
माघ, शुक्ल एकादशीप्रारम्भ – 01:52 पी एम,फरवरी 11समाप्त – 04:27 पी एम,फरवरी 12 |
विजया एकादशी(Vijaya Ekadashi) |
फरवरी 27, 2022, रविवार |
फाल्गुन |
कृष्ण पक्ष |
फाल्गुन, कृष्ण एकादशीप्रारम्भ – 10:39 ए एम,फरवरी 26समाप्त – 08:12 ए एम,फरवरी 27 |
आमलकी एकादशी(Amalaki Ekadashi) |
मार्च 14, 2022, सोमवार |
फाल्गुन |
शुक्ल पक्ष |
फाल्गुन, शुक्ल एकादशीप्रारम्भ – 10:21 ए एम,मार्च 13समाप्त – 12:05 पी एम,मार्च 14 |
पापमोचिनी एकादशी(Papmochani Ekadashi) |
मार्च 28, 2022, सोमवार |
चैत्र |
कृष्ण पक्ष |
चैत्र, कृष्ण एकादशीप्रारम्भ – 06:04 पी एम,मार्च 27समाप्त – 04:15 पी एम, मार्च 28 |
कामदा एकादशी(Kamada Ekadashi) |
अप्रैल 12, 2022, मंगलवार |
चैत्र |
शुक्ल पक्ष |
चैत्र, शुक्ल एकादशीप्रारम्भ – 04:30 ए एम, अप्रैल 12समाप्त – 05:02 ए एम, अप्रैल 13 |
बरूथिनी एकादशी(Varuthini Ekadashi) |
अप्रैल 26, 2022, मंगलवार |
वैशाख |
कृष्ण पक्ष |
वैशाख, कृष्ण एकादशीप्रारम्भ – 01:37 ए एम, अप्रैल 26समाप्त – 12:47 ए एम, अप्रैल 27 |
मोहिनी एकादशी(Mohini Ekadashi) |
मई 12, 2022, बृहस्पतिवार |
वैशाख |
शुक्ल पक्ष |
वैशाख, शुक्ल एकादशीप्रारम्भ – 07:31 पी एम,
|
अपरा एकादशी(Apara Ekadashi) |
मई 26, 2022, बृहस्पतिवार |
ज्येष्ठ |
कृष्ण पक्ष |
ज्येष्ठ, कृष्ण एकादशीप्रारम्भ – 10:32 ए एम,
|
निर्जला एकादशी(Nirjala Ekadashi) |
जून 11, 2022, शुक्रवार |
ज्येष्ठ |
शुक्ल पक्ष |
ज्येष्ठ, शुक्ल एकादशीप्रारम्भ – 07:25 ए एम,
|
योगिनी एकादशी(Yogini Ekadashi) |
जून 24, 2022, शुक्रवार |
आषाढ़ |
कृष्ण पक्ष |
आषाढ़, कृष्ण एकादशीप्रारम्भ – 09:41 पी एम,
|
देवशयनी एकादशी(Devshayani Ekadashi) |
जुलाई 10, 2022, रविवार |
आषाढ़ |
शुक्ल पक्ष |
आषाढ़, शुक्ल एकादशीप्रारम्भ – 04:39 पी एम,
|
कामिका एकादशी(Kamika Ekadashi) |
जुलाई 24, 2022, रविवार |
श्रावण |
कृष्ण पक्ष |
श्रावण, कृष्ण एकादशीप्रारम्भ – 11:27 ए एम,
|
श्रावण पुत्रदा एकादशी(Shravana Putrada Ekadashi) |
अगस्त 8, 2022, सोमवार |
श्रावण |
शुक्ल पक्ष |
श्रावण, शुक्ल एकादशीप्रारम्भ – 11:50 पी एम,अगस्त 07समाप्त – 09:00 पी एम,अगस्त 08 |
अजा एकादशी(Aja Ekadashi) |
अगस्त 23, 2022, मंगलवार |
भाद्रपद |
कृष्ण पक्ष |
भाद्रपद, कृष्ण एकादशीप्रारम्भ – 03:35 ए एम,अगस्त 22समाप्त – 06:06 ए एम,अगस्त 23 |
परिवर्तिनी एकादशी(Parivartini Ekadashi) |
सितम्बर 6, 2022, मंगलवार |
भाद्रपद |
शुक्ल पक्ष |
भाद्रपद, शुक्ल एकादशीप्रारम्भ – 05:54 ए एम,सितम्बर 06समाप्त – 03:04 ए एम,सितम्बर 07 |
इन्दिरा एकादशी(Indira Ekadashi) |
सितम्बर 21,2022, बुधवार |
आश्विन |
कृष्ण पक्ष |
आश्विन, कृष्ण एकादशीप्रारम्भ – 09:26 पी एम,सितम्बर 20समाप्त – 11:34 पी एम,सितम्बर 21 |
पापांकुशा एकादशी(Papankusha Ekadashi) |
अक्टूबर 6, 2022, बृहस्पतिवार |
आश्विन |
शुक्ल पक्ष |
आश्विन, शुक्ल एकादशीप्रारम्भ – 12:00 पी एम,अक्टूबर 05समाप्त – 09:40 ए एम,अक्टूबर 06 |
रमा एकादशी(Rama Ekadashi) |
अक्टूबर 21, 2022, शुक्रवार |
कार्तिक |
कृष्ण पक्ष |
कार्तिक, कृष्ण एकादशीप्रारम्भ – 04:04 पी एम,अक्टूबर 20समाप्त – 05:22 पी एम,अक्टूबर 21 |
देवुत्थान एकादशी(Devutthana Ekadashi) |
नवम्बर 4, 2022, शुक्रवार |
कार्तिक |
शुक्ल पक्ष |
कार्तिक, शुक्ल एकादशीप्रारम्भ – 07:30 पी एम, नवम्बर 03समाप्त – 06:08 पी एम, नवम्बर 04 |
उत्पन्ना एकादशी(Utpanna Ekadashi) |
नवम्बर 20, 2022, रविवार |
मार्गशीर्ष |
कृष्ण पक्ष |
मार्गशीर्ष, कृष्ण एकादशीप्रारम्भ – 10:29 ए एम, नवम्बर 19समाप्त – 10:41 ए एम, नवम्बर 20 |
मोक्षदा एकादशी(Mokshada Ekadashi) |
दिसम्बर 3, 2022, शनिवार |
मार्गशीर्ष |
शुक्ल पक्ष |
मार्गशीर्ष, शुक्ल एकादशीप्रारम्भ – 05:39 ए एम, दिसम्बर 03समाप्त – 05:34 ए एम, दिसम्बर 04 |
सफला एकादशी(Saphala Ekadashi) |
दिसम्बर 19,2022, सोमवार |
पौष |
कृष्ण पक्ष |
पौष, कृष्ण एकादशीप्रारम्भ -03:32 ए एम, दिसम्बर 19समाप्त -02:32 ए एम, दिसम्बर 20 |
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]]>हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का सीधा सम्बन्ध जगत के पालनहार भगवान विष्णु से है। वैसे तो हर मास में 2 एकादशी होती है और एक वर्ष में 24 एकादशियाँ आती है परंतु जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष इनकी संख्या 26 हो जाती है।
दिनांक : 14 दिसम्बर 2021
वार : मंगलवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ : 13 दिसम्बर 2021 को 09:32 पी एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त : 14 दिसम्बर 2021 को 11:35 पी एम बजे
पारण (व्रत तोड़ने की) तिथि : 15 दिसम्बर 2021
पारण (व्रत तोड़ने का) समय : सुबह 07:06 से 09:10 बजे तक
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय : 16 दिसम्बर 2021, 02:01 ए एम बजे
एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत रखते हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती है।
विष्णु पुराण के अनुसार एक बार अर्जुन में भगवान कृष्ण से कहा “हे परम पूजनीय ,हे त्रिलोकीनाथ! आप सभी को सुख व मोक्ष देने वाले हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। हे प्रभु! आप कृपा करने वाले हैं। मेरी एक जिज्ञासा को शांत कीजिए।”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! जो कुछ भी जानना चाहते हो, निर्भय होकर कहो, मैं अवश्य ही तुम्हारी जिज्ञासा को शांत करूंगा।”
“हे प्रभु! कृपा करके मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी पड़ती है उसके विषय में बताने की कृपा करें। उसका नाम क्या है? उस दिन कौन-से देवता की पूजा की जाती है और उसकी पूजन विधि क्या है? उसका व्रत करने से मनुष्य को क्या फल मिलता है? प्रभु! कृपा कर मेरे इन प्रश्नों का विस्तार पूर्वक उत्तर देकर मेरी इस जिज्ञासा को दूर कीजिए।
अर्जुन की जिज्ञासा सुन श्रीकृष्ण बोले- ‘हे अर्जुन! तुमने बहुत ही उत्तम प्रश्न किया है। मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी अनेक पापों को नष्ट करने वाली है। संसार में इसे मोक्षदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस एकादशी के दिन श्री दामोदर भगवान का धूप, दीप, नैवेद्य आदि से भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिए। हे धनञ्जय! इस एकादशी व्रत के पुण्य के प्रभाव से नरक में गए हुए माता, पिता, पितरादि को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
इसकी कथा इस प्रकार है, इसे ध्यानपूर्वक सुनो- वैखानस नाम का एक राजा प्राचीन नगर में राज करता था। उसके राज्य में चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण रहते थे। राजा अपनी प्रजा का पुत्र के समान पालन किया करता था। एक रात्रि को स्वप्न में राजा ने अपने पिता को नरक की यातनाएं भोगते देखा, और वो इस स्वप्न को देखकर बड़ा ही व्याकुल हुआ। वह बेचैनी से सुबह होने की प्रतीक्षा करने लगा। सुबह होते ही उसने ब्राह्मणों को बुलाकर स्वप्न की बात बताई- ‘हे ब्राह्मणों! रात्रि को स्वप्न में मैंने अपने पिता को नरक की यातनाएं भोगते देखा। उन्होंने मुझसे कहा है कि हे पुत्र! मैं घोर नरक भोग रहा हूँ। मेरी यहां से मुक्ति कराओ। जब से मैंने उनके यह वचन सुने हैं, तब से मुझे चैन नहीं है। अब मैं क्या करूं? आप ज्ञानी ब्राह्मणजन मुझे कुछ उपाय बताइए जिससे मेरे पिता को मुक्ति प्राप्त हो। यदि मैंने अपने पिता को नरक की यातनाओं से मुक्त कराने के प्रयास नहीं किए तो मेरा जीवन निरर्थक है।
राजा के इस कथन को सुनकर ब्राह्मणों ने आपस में विचार-विमर्श किया, फिर एकमत होकर बोले- ‘राजन! वर्तमान, भूत और भविष्य के ज्ञाता पर्वत नाम के एक मुनि हैं। आप अपनी इस व्यथा को उनसे जाकर कहें और उन से इसका उपाय बताने की कृपा करें, वे अवश्य ही इसका कोई सरल उपाय आपको बता देंगे।’
ब्राह्मणों की बात मान राजा पर्वत मुनि के आश्रम पर गए। आश्रम में अनेक शांतचित्त योगी और मुनि तपस्या कर रहे थे। राजा ने पर्वत मुनि को दण्डवत् प्रणाम किया तथा अपना परिचय दिया। पर्वत मुनि ने राजा से कुशलक्षेम पूछी, तब राजा ने मुनि को व्यथित हृदय से रात में देखे गए स्वप्न की पूरी बात बताई और फिर दुःखी स्वर में बोला- ‘हे महर्षि! आप कृपा कर मेरा मार्ग दर्शन करें कि ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए? कैसे मैं अपने पिता को नरक की यातना से मुक्ति दिलाऊं?’
राजा की बात सुन , पर्वत मुनि ने अपने नेत्र बंद कर विचार करने लगे। कुछ देर गम्भीरतापूर्वक चिंतन करने के बाद उन्होंने कहा- ‘राजन! मैंने अपने योगबल के द्वारा तुम्हारे पिता के सभी कर्मों का ज्ञान प्राप्त किया है। उन्होंने पूर्व जन्म में अपनी पत्नियों में भेदभाव किया था। अपनी बड़ी रानी के कहने में आकर उन्होंने अपनी दूसरी पत्नी को ऋतुदान मांगने पर नहीं दिया था। उसी पाप कर्म के फल से तुम्हारे पिता को नरक प्राप्त हुआ है।’
यह जानकर राजा ने याचना-भरे स्वर में कहा- ‘हे ऋषिवर! मेरे पिता के उद्धार का आप कोई उपाय बताने की कृपा करें, किस प्रकार वे इस पाप से मुक्त होंगे?’
इस पर पर्वत मुनि बोले- ‘हे राजन! मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी होती है, उसे मोक्षदा एकादशी कहते हैं। यह मोक्ष प्रदान करने वाली है। आप इस मोक्षदा एकादशी का व्रत करें और उस व्रत के पुण्य को संकल्प करके अपने पिता को अर्पित कर दें। एकादशी के पुण्य प्रभाव से अवश्य ही आपके पिता की मुक्ति होगी।’
पर्वत मुनि के वचनों को सुनकर राजा अपने राज्य को लौट आया और परिवार सहित मोक्षदा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। इस व्रत के पुण्य को राजा ने अपने पिता को अर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से राजा के पिता को सहज ही मुक्ति मिल गई। स्वर्ग को प्रस्थान करते हुए राजा के पिता ने कहा- ‘हे पुत्र! तेरा कल्याण हो’ इतना कहकर राजा के पिता ने स्वर्ग को प्रस्थान किया।
हे कुंती पुत्र! जो मनुष्य मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का उपवास करते हैं, उनके सभी, पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में वे स्वर्ग लोक को प्राप्त करते हैं। इस उपवास से उत्तम फल और मोक्ष प्रदान करने वाला कोई भी दूसरा व्रत नहीं है। हे अर्जुन! प्रत्येक मनुष्य की प्रबल इच्छा होती है कि वह मोक्ष प्राप्त करे। मोक्ष की इच्छा करने वालों के लिए मोक्षदा एकादशी का यह उपवास अति महत्त्वपूर्ण है। पिता के प्रति पुत्र के दायित्व का इस कथा से श्रेष्ठ दृष्टांत दूसरा कोई नहीं है, अतः भगवान श्रीहरि विष्णु के निमित्त यह उपवास पूर्ण निष्ठा व श्रद्धा से करना चाहिए।”
मोक्षदा एकादशी के दिन भगवान श्री कृष्ण, महर्षि वेद व्यास और श्रीमद् भागवत गीता का पूजन किया जाता है। इस व्रत की पूजा विधि इस प्रकार है:
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]]>दिनांक : 30 नवम्बर 2021
वार : मंगलवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 30 नवम्बर 2021 को 04:13 ए एम
एकादशी तिथि समाप्त – 01 दिसम्बर 2021 को 02:13 ए एम
पारण तिथि : 01 दिसम्बर 2021
पारण समय : 07:34 ए एम से 09:02 ए एम
जीन भक्तजनो ने एकादशी के उपवास को कभी नहीं रखा हैं और इस उपवास को रखना चाहते है वो इस मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी अर्थात उत्पन्ना एकादशी से इसका आरंभ कर सकते है क्योंकि सर्वप्रथम हेमंत ऋतु में इसी एकादशी से इस व्रत का प्रारंभ हुआ माना जाता है।
पुराणो के अनुसार जो भक्त उत्पन्ना एकादशी का विधि-विधान से व्रत करता है और इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करता है उसे संक्रान्ति में तथा सूर्य और चन्द्र ग्रहण में दान देने से और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य मनुष्य को एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। जो फल ब्राह्मणों को एक हजार गौदान करने से प्राप्त होता है, उससे दस गुना अधिक पुण्य मिलता है। इस के साथ जो भक्त इस दिन दान देता है उसे उसके दिए हुए दान का कई गुना फल प्राप्त होता है।
विष्णु पुराण के अनुसार एक बार अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा- “हे प्रभु! आप मुझे एकादशी व्रत के बारे में कृपा कर विस्तारपूर्वक बताइये।”
श्रीकृष्ण बोले- “हे पार्थ! सतयुग में एक महा भयंकर दैत्य हुआ था, उसका नाम मुर था। उस दैत्य ने इन्द्र आदि देवताओं पर विजय प्राप्त कर उन्हें उनके पद से हटा दिया और स्वर्ग पे अपना आधिपत्य जमा लिया। तब इन्द्र और अन्य देवता वहाँ से भाग कर मृत्युलोक में आ गए और भगवान शंकर से प्रार्थना की- ‘हे भोलेनाथ! हम सब देवता, मुर दैत्य के अत्याचारों से दुखी होकर मृत्युलोक में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। राक्षसों के भय से हम सब बहुत दुख और कष्ट भोग रहे हैं। अतः कृपा कर आप मुर दैत्य के अत्याचार से बचने का उपाय बतलाइये।’
देवराज की प्रार्थना सुन कैलाशपति ने कहा- ‘हे देवेन्द्र! आप भगवान श्रीहरि की शरण में जाइए और उन से इस का उपाय करने का आग्रह करिये। भगवान विष्णु देवताओं को अवश्य ही इस भय से मुक्त करेंगे।’ भोलेनाथ के आदेशानुसार इन्द्र तथा अन्य देवता क्षीर सागर गए, जहाँ पर भगवान श्रीहरि शेष-शैया पर विराजमान थे।
इन्द्र सहित सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के समक्ष उपस्थित होकर उनसे प्रार्थना की – ‘हे तीनों लोकों के स्वामी! हम सभी देवताओं का आपको कोटि-कोटि प्रणाम है। हम आपकी शरण में आए हैं, आप हमारी रक्षा करें। हे जगत के पलनहार! हम सभी देवता दैत्यों के अत्याचारों से भयभीत होकर आपकी शरण में आए हैं। इस समय दैत्यों ने हमें स्वर्ग से निकाल दिया है और हम सभी देवता बड़ी ही दयनीय स्थिति में मृत्युलोक में विचरण कर रहे हैं। अब आप ही हमारे रक्षक हैं! रक्षा कीजिये।
देवताओं का आग्रह सुन, भगवान श्रीहरि बाले- ‘हे देवगणो! वह कौन-सा दैत्य है, जिसने देवताओं को जीत लिया है? आप सभी देवगण किसके भय से पृथ्वीलोक में भटक रहे हैं? क्या वह दैत्य इतना बलवान है, जिसने इन्द्र सहित सभी देवताओं को जीत लिया है? तुम निर्भय होकर मुझे सब हाल बताओ।
तब देवेन्द्र ने कहा- ‘हे प्रभु! चन्द्रवती नामक नगरी में निवास करने वाला मुर नामक दैत्य ने बल से मृत्युलोक और देवलोक को जीत लिया हैं और सब देवताओं को देवलोक से निकालकर, अपने दैत्य कुल के असुरों लोकपाल बना दिया है। वह स्वयं सूर्य बनकर पृथ्वी को तापता है और स्वयं मेघ बनकर जल की वर्षा करता है, अतः आप इस बलशाली भयानक असुर का संहार करके देवताओं की रक्षा करें।’
इंद्र के मुख से ऐसे वचन सुन भगवान विष्णु बोले- ‘हे देवताओं! मैं आपके शत्रु का शीघ्र ही संहार करूँगा। आप सब इसी समय मेरे साथ चन्द्रवती नगरी चलिए।’
देवताओं की पुकार पर भगवान विष्णु तुरन्त ही उनके साथ चल दिए। उधर दैत्यराज मुर ने अपने तेज से जान लिया था कि श्री विष्णु युद्ध की इच्छा से उसकी राजधानी की तरफ आ रहे हैं, अतः अपने राक्षस योद्धाओं के साथ वह भी युद्ध भूमि में आकर गरजने लगा। देखते-ही-देखते घोर युद्ध शुरू हो गया। देवता तो पहले ही डरे हुए थे, वह अधिक देर तक राक्षसों का सामना न कर सके और भाग खड़े हुए। तब भगवान विष्णु स्वयं युद्ध-भूमि में आ गए। देवताओं को भागता देख दैत्य पहले से भी ज्यादा जोश में भरकर भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे। वे अपने अस्त्र-शस्त्रों से उन पर भयंकर प्रहार करने लगे। दैत्यों के आक्रमण वारों को भगवान विष्णु अपने चक्र और गदा के प्रहारों से नष्ट करने लगे। इस युद्ध में अनेक दैत्य मृत्यु की गोद में समा गए, किन्तु दैत्य मुर भगवान विष्णु के साथ युद्ध करता रहा। उसका तो जैसे अभी बाल भी बांका नहीं हुआ था। वह बिना डरे युद्ध कर रहा था। भगवान विष्णु मुर को मारने के लिए जिन-जिन शस्त्रों का प्रयोग करते, वे सब उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगते। जब अनेक अस्त्रों-शस्त्रों का प्रयोग करने पर भी दोनो एक दूसरे को जीत न सके, तब वे आपस में मल्ल युद्ध करने लगे। यह युद्ध अनेक वर्षों तक चलता रहा। अन्त में भगवान विष्णु शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बदरिकाश्रम स्थित अड़तीस कोस लम्बी एक द्वार वाली हेमवती नामक गुफा में प्रवेश कर गए।
हे अर्जुन! उस गुफा में प्रभु ने शयन किया। भगवान विष्णु के पीछे-पीछे वह दैत्य भी चला आया था। भगवान श्रीहरि को सोता देखकर वह उन्हें मारने को तैयार हो गया। परन्तु उसकी यह इच्छा पूर्ण न हो सकी, क्योंकि उसी समय भगवान विष्णु की देह से दिव्य वस्त्र धारण किए एक अत्यन्त मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई और राक्षस को ललकारकर उससे युद्ध करने लगी और कुछ समय बीतने पर उस कन्या ने अपने शास्त्रों से दैत्य के अस्त्र-शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और उसका रथ भी तोड़ डाला। अब तो उस दैत्य को बड़ा ही क्रोध आया और वह सारी मर्यादाएँ भंग करके उस कन्या से मल्ल युद्ध करने लगा। उस तेजस्वी कन्या ने उसको धक्का मारकर मुर्च्छित कर दिया और उसकी मूर्च्छा टूटने से पूर्व ही उसका सिर काटकर धड़ से अलग कर दिया।
सिर काटते ही वह असुर मृत्यु को प्राप्त हुआ। भगवान विष्णु जब निद्रा से जागे तो उस असुर को मरा देखकर उन्हें घोर आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि इस महाबली को किसने मारा है?
तब वह तेजस्वी कन्या श्रीहरि से हाथ जोड़कर बोली- ‘हे जगदीश्वर! यह असुर आपको मारने को उद्यत था, तब मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इस असुर का वध किया है।’ कन्या की बात सुन भगवान बोले- ‘तुमने इस असुर को मारा है, अतः हे कन्या! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। इसे मारकर तुमने देवताओं के कष्ट को हरा है, इसलिए तुम अपनी इच्छानुसार वरदान मांग लो। मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करूँगा।’
भगवान की बात सुन कन्या बोली- ‘हे प्रभु! मुझे यह वरदान दीजिये कि जो भी मनुष्य या देव मेरा व्रत करे, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएँ और अन्त में उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हो। मेरे व्रत का आधा फल रात्रि को मिले और उसका आधा फल एक समय भोजन करने वाले को मिले। जो श्रद्धालु भक्तिपूर्वक मेरे व्रत को करें, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक को प्राप्त करें। जो मनुष्य मेरे व्रत में दिन तथा रात्रि को एक बार भोजन करे, वह धन-धान्य से भरपूर रहे। कृपा करके मुझे ऐसा वरदान दीजिये।’
भगवान विष्णु ने कहा- ‘हे कन्या! ऐसा ही होगा। मेरे और तुम्हारे भक्त एक ही होंगे और अन्त में संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त होकर मेरे लोक को प्राप्त करेंगे। तुम एकादशी को पैदा हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम भी एकादशी हुआ और क्योंकि तुम मेरे अंश से उत्पन्न हुई हो, इसलिए संसार मे तुम उत्पन्ना एकादशी के नाम से जानी जाओगी तथा जो मनुष्य इस दिन व्रत करेंगे, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे। तुम्हारे व्रत का फल सब तीर्थों के फल से भी महान होगा।
इतना कहकर, भगवान श्रीहरि उसी स्थान पर अंतर्ध्यान हो गए।”
श्री कृष्ण ने कहा- “हे कुंती पुत्र! एकादशी के व्रत का फल सभी व्रतों व सभी तीर्थों के फल से महान है। एकादशी व्रत करने वाले मनुष्यों के शत्रुओं का मैं जड़ से नाश कर देता हूँ और व्रत करने वाले को मोक्ष प्रदान करता हूँ। उन मनुष्यों के जीवन के जो भी कष्ट होते हैं। मैं उन्हें भी दूर कर देता हूँ। अर्थात मुझे अत्यन्त प्रिय एकादशी के व्रत को करने वाला प्राणी सभी ओर से निर्भय और सुखी होकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त होता है। हे कुन्ती पुत्र! यह मैंने तुम्हें एकादशी की उत्पत्ति के विषय में बतलाया है। एकादशी व्रत सभी पापों को नष्ट करने वाला और सिद्धि प्रदान करने वाला है। श्रेष्ठ मनुष्यों को दोनों पक्षों की एकादशियों को समान समझना चाहिए। उनमें भेद-भाव करना उचित नहीं है। जो मनुष्य एकादशी माहात्म्य का श्रवण व पठन करेंगे, उन्हें अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होगा।
एकादशी व्रत की शुरुआत उत्पन्ना एकादशी व्रत से करनी चहिये। सभी एकादशी व्रत का पूजा विधान एक समान होता है, जो कि इस प्रकार है:
ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता ।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। ॐ।।
तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी ।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।।ॐ।।
मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई।। ॐ।।
पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है।
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै ।। ॐ ।।
नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै ।। ॐ ।।
विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी,
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की ।। ॐ ।।
चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली,
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। ॐ ।।
शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी,
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी।। ॐ ।।
योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी ।। ॐ ।।
कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए।। ॐ ।।
अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला।। ॐ ।।
पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।
रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी ।। ॐ ।।
देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।
पावन मास में करूं विनती पार करो नैया ।। ॐ ।।
परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।।
शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी ।। ॐ ।।
जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै।। ॐ
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]]>मान्यता है कि भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी को 4 माह के लिए क्षिरसागर में शयन के लिए जाते है और भगवान विष्णु के शयनकाल के ४ मास के दौरान विवाह आदि मांगलिक कार्य नहीं किये जाते हैं। भगवान विष्णु अपने शयनकाल के उपरांत प्रबोधिनि एकादशी के दिन जागते है और इसी दिन के बाद सभी शुभ तथा मांगलिक कार्य शुरू होते हैं। इस दिन तुलसी विवाह का आयोजन भी किया जाता है।
दिनांक : 14 नवम्बर 2021
वार : रविवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 14 नवम्बर 2021 को 05:48 ए एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त – 15 नवम्बर 2021 को 06:39 ए एम बजे
पारण( व्रत तोड़ने की) तिथि: 15 नवम्बर 2021
पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय- 01:00 पी एम
एक समय भगवान नारायण से लक्ष्मी जी ने कहा- ‘हे नाथ! अब आप दिन-रात जागते रहते हैं और जब सोते हैं तो लाखों-करोड़ों वर्ष तक को सो जाते हैं तथा उस समय समस्त चराचर का नाश भी कर डालते हैं। अत: आप नियम से प्रतिवर्ष निद्रा लिया करें। इससे मुझे भी कुछ समय विश्राम करने का समय मिल जाएगा।’ लक्ष्मी जी की बात सुनकर नारायण मुस्काराए और बोले- ‘देवी’! तुमने ठीक कहा है। मेरे जागने से सब देवों को और ख़ास कर तुमको कष्ट होता है। तुम्हें मेरी सेवा से जरा भी अवकाश नहीं मिलता। इसलिए, तुम्हारे कथनानुसार आज से मैं प्रति वर्ष चार मास वर्षा ऋतु में शयन किया करूंगा। उस समय तुमको और देवगणों को आराम मिलेगा। मेरी यह निद्रा अल्पनिद्रा और प्रलयकालीन महानिद्रा कहलाएगी। यह मेरी अल्पनिद्रा मेरे भक्तों को परम मंगलकारी उत्सवप्रद तथा पुण्यवर्धक होगी। इस काल में मेरे जो भी भक्त मेरे शयन की भावना कर मेरी सेवा करेंगे तथा शयन और उत्पादन के उत्सव आनन्दपूर्वक आयोजित करेंगे उनके घर में तुम्हारे सहित निवास करूँगा।
अर्जुन ने श्री हरी से कहा आप कृपा करके मुझे कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के विषय में भी बतलाइये। इसके व्रत का क्या विधान है? इसकी क्या विधि है? इस व्रत के करने से किस फल की प्राप्ति होती है? कृपया यह सब विस्तारपूर्वक कहिए।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे पार्थ! तुम मेरे बड़े ही प्रिय सखा हो। इस विषय में मैं तुम्हें नारद और ब्रह्माजी के बीच हुए वार्तालाप को सुनाता हूं। एक समय नारदजी ने ब्रह्माजी से पूछा – ‘हे पिता! प्रबोधिनी एकादशी के व्रत का क्या फल होता है, आप कृपा करके मुझे यह सब विधानपूर्वक बताएं।’
ब्रह्माजी ने कहा- ‘हे पुत्र! कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रबोधिनी एकादशी के व्रत का फल एक सहस्र अश्वमेध यज्ञ तथा सौ राजसूय यज्ञ के फल के बराबर होता है।’ प्राणी को सभी कर्मों को त्यागते हुए भगवान नारायण की प्रसन्नता के लिए कार्तिक माह की प्रबोधिनी एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। जो मनुष्य इस एकादशी व्रत को करता है, वह धनवान, योगी तपस्वी तथा इन्द्रियों को जीतने वाला होता है, क्योंकि एकादशी भगवान विष्णु की अत्यंत प्रिय है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
ब्रह्माजी की बात सुनकर नारद जी बोले – ‘हे पिता! अब आप एकादशी के व्रत का विधान कहिए और इस व्रत के करने से किस पुण्य की प्राप्ति होती है? कृपा कर यह भी बतायिए।
नारद की बात सुन ब्रह्माजी बोले – इस एकादशी के दिन मनुष्य को ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाना चाहिए और स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प करना चाहिए। उस समय भगवान विष्णु से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे प्रभु! आज मैं निराहार रहूंगा और दूसरे दिन भोजन करूंगा, इसलिए आप मेरी रक्षा करें। इस प्रकार प्रार्थना करके भगवान का पूजन करना चाहिए और व्रत प्रारंभ करना चाहिए। शंख के जल से भगवान को अर्घ्य देना चाहिए। इस दिन रात्रि को जागरण करना चहिये और रात्रि में भगवान का स्मरण और भजन करते हुए रात्रि व्यतीत करनी चाहिए।
इस प्रकार रात्रि में भगवान का पूजन करके प्रातःकाल शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए। स्नान करने के बाद भगवान की स्तुति करते हुए भगवान का पूजन करना चाहिए। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और दक्षिणा देकर आदर सहित उन्हें प्रसन्नता पूर्वक विदा करना चाहिए और उचित समयानुसर व्रत का पारण करना चहिये।
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