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ज्योतिष शास्त्र में गंड मूल नक्षत्रों (Gand Mool Nakshatra) को दोषकारी माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब किसी शिशु का जन्म गण्डमूल नक्षत्र में हो तो इसको गंडमूल दोष कहा जाता है। इसके कारण बालक और उसके माता-पिता एवं भाई-बहिनों के जीवन पर कष्टकारी प्रभाव पड़ता है इसलिए इस नक्षत्र में पैदा हुए शिशु और उसके परिजनों की भलाई के लिए गंडमूल शांति के उपाय कराना अति आवश्यक है।

गंडमूल क्या है? (What is Gand Mool Nakshatra?)

ज्योतिष शास्त्र में पृथ्वी को केंद्र मानकर पुरे ब्रह्माण्ड को 12 राशी में विभाजित किया गया है। 12 राशी में 27 नक्षत्र होते है। एक नक्षत्र में 4 चरण होते है अर्थात 12 राशी में 108 चरण हुए। इनमें केतु व बुध के स्वामित्व में आने वाले नक्षत्रों को गंड मूल कहते हैं, जो इस प्रकार हैं:

नक्षत्र स्वामी ग्रह देवता
अश्वनी केतु अश्विनी कुमार
अश्लेषा बुध सर्प
मघा केतु पितृ
ज्येष्ठा बुध इंद्र
मूल केतु राक्षस
रेवती बुध सूर्य

कैसे बनता है गण्डमूल योग?

राशि चक्र में ऎसी तीन स्थितियां होती हैं, जबराशि और नक्षत्र दोनों एक साथ समाप्त होते हैं। यह स्थिति “गंड नक्षत्र” कहलाती है। जब इन्हीं समाप्ति स्थल से नई राशि और नक्षत्र की शुरूआत होती है तो इन्हें “मूलनक्षत्र” कहते हैं। इसतरह तीन नक्षत्र गंड और तीन नक्षत्र मूल कहलाते हैं। गंड और मूल नक्षत्रों को इस प्रकार देखा जा सकता है।

यदि कर्क राशि तथा अश्लेषा नक्षत्र की समाप्ति साथ में होती हो तथा वही सिंह राशि का प्रारंभ और मघा नक्षत्र का उदय एक साथ हो तो इसे अश्लेषा गण्ड और मघा मूल नक्षत्र कहा जाता है। यदि वृश्चिक राशि और ज्येष्ठा नक्षत्र की समाप्ति एक साथ हो तथा धनु राशि और मूल नक्षत्र का आरम्भ यही से हो तो इस स्थिति को ज्येष्ठा गण्ड और ‘मूल’ मूल नक्षत्र कहा जाता है। यदि मीन राशि और रेवती नक्षत्र एक साथ समाप्त हो तथा मेष राशि व अश्विनी नक्षत्र की शुरुआत एक साथ हो तो इस स्थिति को रेवती गण्ड और अश्विनी मूल नक्षत्र कहा जाता है।

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क्यों होता है गंडमूल नक्षत्र दोषकारी?

हिन्दू ज्योतिष के अनुसार नक्षत्र, लग्न और राशि के संधि काल को अशुभ माना जाता है और गंड मूल नक्षत्र संधि नक्षत्र होते हैं, इसलिए जातक पर इसके अशुभ प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। इसके साथ ही गंडमूल नक्षत्रों के देवता भी बुरे प्रभाव देने वाले होते हैं। ये नक्षत्र मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु व मीन राशी के आरम्भ व अंत में आते हैं। काल पुरुष चक्र के अनुसार इन राशियों का प्रभाव जातक के शरीर, मन, बुद्धि, आयु, भाग्य आदि पर पड़ता है और गंडमूल का प्रभाव भी इन्हीं के ऊपर देखने को मिलता है।

ज्योतिष शास्त्र में मूल नक्षत्र में जन्मे बालक को पिता के लिए कष्टप्रद माना जाता है. ऐसा नहीं है कि सभी गंडमूल के नक्षत्र अशुभ होता हैं। कुछ शुभ भी होते है।

Gand Mool Nakshatra दोष  का नक्षत्र के चरण अनुसार प्रभाव

अश्विनी नक्शत्र :

1 चरण : पिता को कष्ट भय.
2 चरण : सुख सम्पति में वृद्धि
3 चरण : राज काज में विजय
4 चरण : राज्य में सम्मान

अश्लेशा नक्षत्र :

1 चरण : शान्ति करवाए तो शुभ फल प्राप्त होता है
2 चरण : धन नाश
3 चरण : माता को कष्ट
4 चरण : पिता के लिए कष्टप्रद

मघा  नक्षत्र :

1 चरण: माता के लिए अनिष्ट
2 चरण: पिता को कष्ट.
3 चरण: सुख और समृधि कारक.
4 चरण: धन विद्या और प्रगति .

ज्येष्ठ नक्षत्र :

1 चरण : बड़े भाई को कष्ट.
2 चरण : छोटे भाई को कष्ट.
3 चरण : माता को कष्ट .
4 चरण: खुद के शरीर को कष्ट.

मूल नक्षत्र :

1 चरण : पिता को कष्ट, भय ।
2 चरण : माता को कष्ट ।
3 चरण : धन लाभ।
4 चरण : लाभ लेकिन यतन से

रेवती नक्षत्र:

1 चरण : राज्य एवं सम्मान ।
2 चरण : वैभव में वृद्धि ।
3 चरण : व्यापार में लाभ ।
4 चरण ; विविध प्रकार के कष्ट ।

गंड मूल नक्षत्र के शांति उपाय

यदि किसी शिशु का जन्म गंडमूल में हुआ है तो जन्म के 27वें दिन ठीक उसी नक्षत्र के आने पर अच्छे जानकार पंडित जी से शांति पूजा करानी चाहिए।

यदि गंड मूल शांति के उपाय शिशु के जन्म से ठीक 27वें दिन न हो पाएं अथवा किसी कारण से गंडमूल दोष के बारे में आपको विलम्ब से पता चले तो भी आप इसकी शांति के निम्न उपाय उपाय कर सकते हैं।

  • नाग देव का पूजन करें
  • पितृों के निमित्त दान करें
  • घर में गंडमूल शांति के लिए यज्ञ करें
  • अमावस्या के दिन ब्राह्मण भोजन कराएं
  • किसी मंदिर में शिवलिंग को स्थापित करें
  • प्रत्येक अमावस्या को गौ, स्वर्ण, अन्न आदि का दान करें
  • छाया पात्र का दान करें ( जन्म से 27 दिन तक पिता जन्मे बच्चे का मुँह ना देखे और २७वे दिन उसी नक्षत्र में एक कांसे के बर्तन में तेल भर कर और बच्चे को अपने कंधे पे बिठा कर उसके चेहरे की छाया को देखें फिर इस को दान कर दें)
  • माता या पिता 6 माह तक विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें

 

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