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Laabh Panchami 2023 – हिन्दू कैलेंडर का कार्तिक महीना तीज त्योहारों से भरा होता है। इसी माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को लाभ पंचमी या सौभाग्य पंचमी के रूप में मनाया जाता है। Laabh Panchami को सौभाग्य पंचमी, ज्ञान पंचमी और लेचनी पंचमी के नाम से भी जाना जाता है।

वैसे तो लाभ पंचमी का पर्व पूरे भारत में मनाया जाता है परंतु यह गुजरात राज्य का एक लोकप्रिय त्यौहार है। गुजरात में लाभ पंचमी को पाँच दिवसीय दीपावली उत्सव का समापन होता है। गुजराती नव वर्ष दीपावली के दूसरे दिन होता है अतः लाभ पंचमी का दिन गुजराती नववर्ष का पहला कामकाजी दिन होता है। गुजरात में अधिकतर व्यवसायी दिवाली के पश्चात  लाभ पंचमी के दिन वापस अपने काम को प्रारंभ करते हैं। इस दिन भक्त धन और समृद्धि के लिए भगवान शिव, लक्ष्मी जी और भगवान गणेश जी की पूजा अर्चना करते हैं। इसी दिन व्यापारी गण, नया बही खाता प्रारम्भ करते है।

लाभ पंचमी का महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लाभ पंचमी  दिन भगवान गणेश की उपासना करने से सौभाग्य की प्राप्ती होती है। कार्तिक शुक्ल पंचमी के दिन जो जातक पूरे भक्ति भाव से भगवान शिव, माता लक्ष्मी और गणेश जी को पूजता है उसकी सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। कुछ जगहों पर दीपावली के दिन नए साल की शुरुआत होती है और सौभाग्य पंचमी वाले दिन व्यापार और कारोबार में तरक्की-विस्तार के लिए शुभ माना जाता है।

Laabh Panchami 2023 दिनांक और शुभ मुहूर्त

दिनांक : 18 नवम्बर 2023
वार: शनिवार
पंचमी तिथि प्रारम्भ : 17 नवम्बर 2023 को 11:03 ए एम बजे
पंचमी तिथि समाप्त : 18 नवम्बर 2023 को 09:18 ए एम बजे
लाभ पंचमी पूजा शुभ मुहूर्त : प्रातःकाल 06:46 ए एम से 10:19 ए एम
अवधि : 03 घण्टे 34 मिनट्स

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Laabh Panchami 2023 पूजन विधि

  • लाभ पंचमी के दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान आदि से निवृत होकर सर्वप्रथम भगवान सूर्य देव को जलाभिषेक करें।
  • इसके बाद भगवान शिव जी, लक्ष्मी जी और गणेश जी की प्रतिमा या तस्वीर को स्थापित कर पूजा प्रारम्भ करें। गणेश जी की प्रतिमा या तस्वीर ना हो तो सुपारी पर मौली लपेटकर चावल के अष्दल पर श्रीगणेश के रूप में विराजित कर सकते हैं।
  • एक कलश स्थापित कर उसमें द्रव्य, अक्षत आदि डालकर उसको लाल वस्त्र से ढँकें।
  • तत्पश्चात भगवान शिव जी को भस्म, बेलपत्र, धतूरा सफ़ेद अंगोछा अर्पित कर पूजा करें एवम भगवान गणेश जी की पूजा फल, फूल, चन्दन, अक्षत, दूर्वा आदि से करें। भगवान शिव जी को दूध से बने मिष्ठान एवम गणेश जी को मोदक का भोग लगाएं।
  • भोलेनाथ, माता लक्ष्मी और भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए नीचे दिए मंत्रो का जाप करें।

        गणेश मंत्र

         लम्बोदरं महाकायं गजवक्त्रं चतुर्भुजम्। आवाहयाम्यहं देवं गणेशं सिद्धिदायकम्।।

         शिव मंत्र 

          त्रिनेत्राय नमस्तुभ्यं उमादेहार्धधारिणे। त्रिशूलधारिणे तुभ्यं भूतानां पतये नम:।।

         लक्ष्मी गायत्री मंत्र

         ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥

 

  • मन्त्र स्मरण के पश्चात धुप, दीप से आरती करें। आरती सम्पन्न होने पर भगवान से सुख, शांति और समृद्धि की कामना करें।

इस प्रकार लाभ-पंचमी की कथा सम्पन्न हुई। प्रेम से बोलिए भगवान शिव जी, माता लक्ष्मी एवं गणेश जी की जय।

 

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भगवान गणेश ने मूषक को अपना वाहन क्यों चुना? https://astrodeeva.com/%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b7%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a4%be/ https://astrodeeva.com/%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b7%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a4%be/#comments Wed, 28 Apr 2021 04:46:42 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1979 हम सब जानते हैं कि गणेश जी मूषक पर विराजमान होते हैं। उनका वाहन ‘डिंक’ नामक मूषक है। गणेश जी की विशाल शारीरिक संरचना के समक्ष मूषक आकार में अत्यंत छोटा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि गणेश जी ने इतने छोटे से जीव को ही अपना वाहन क्यों चुना? इस प्रश्न का उत्तर […]

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हम सब जानते हैं कि गणेश जी मूषक पर विराजमान होते हैं। उनका वाहन ‘डिंक’ नामक मूषक है। गणेश जी की विशाल शारीरिक संरचना के समक्ष मूषक आकार में अत्यंत छोटा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि गणेश जी ने इतने छोटे से जीव को ही अपना वाहन क्यों चुना?

इस प्रश्न का उत्तर दो पौराणिक कथाओं में मिलता है। आइये जानते हैं मूषक के गणेश जी का वाहन बनने के पीछे की कथा :

प्रथम कथा

गणेश पुराण के अनुसार द्वापर युग में एक दिन देवराज इंद्र के दरबार में गहन चर्चा चल रही थी। दरबार में उपस्थित समस्त देवगण चर्चा में लीन थे किंतु क्रौंच नामक गंधर्व अप्सराओं के साथ हँसी-ठिठोली कर रहा था। जब देवराज इंद्र की दृष्टि क्रौंच पर पड़ी, तो वे क्रोधित हो उठे और उसकी चंचलता भरी हरकत के कारण उसे मूषक बन जाने का श्राप दे दिया।

क्रौंच इंद्र के श्राप के कारण मूषक बना और स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक में पराशर ऋषि के आश्रम में आ गिरा। स्वभाव से चंचल मूषक रूपी क्रौंच ने ऋषि आश्रम में उत्पात मचा दिया। उसने मिट्टी के समस्त पात्र तोड़ डाले, उसमें रखे अन्न का भक्षण कर लिया, ऋषियों के वस्त्र कुतर दिए और आश्रम की सुंदर वाटिका भी उजाड़ दी।

मूषक के इस उत्पात से पराशर ऋषि चिंतित हो गए और उससे छुटकारा दिलाने की प्रार्थना हेतु गणेश जी की शरण में पहुँचे।

गणेश जी ने पराशर ऋषि की प्रार्थना स्वीकार कर ली और मूषक रूपी क्रौंच को पकड़ने के लिए एक तेजस्वी पाश फेंका। पाश के बंधन से बचने के लिए क्रौंच पाताल लोक भाग गया। किंतु पाश ने पाताल लोक तक उसका पीछा किया और उसे बांधकर गणेश जी के समक्ष ला खड़ा किया।

साक्षात गणेश जी को अपन समक्ष देख मूषक रूपी क्रौंच भयभीत हो गया और वो भगवान गणेश जी से अपने प्राणों की भिक्षा मांगने लगा। तब गणेश जी बोले, “तूने पराशर ऋषि के आश्रम में बहुत उत्पात मचाया है, और तेरा ये क्र्त क्षमायोग्य तो नहीं है। किंतु शरणागत की रक्षा मेरा धर्म है। तुम्हें जो वरदान चाहिए मांग लो।”

गणेश जी की इस बात पर क्रौंच का अहंकार जाग उठा और वह बोला, “मुझे किसी वरदान की आवश्यकता नहीं है। आप चाहे तो मुझसे कोई वर मांग लें।”

अहंकारी क्रौंच के इस कथन पर गणेश जी मंद-मंद मुस्कुराये और बोले, “ऐसा ही सही। मैं तुझसे अपना वाहन बन जाने का वर मांगता हूँ।”

क्रौंच के पास कोई अन्य विकल्प न था। अपने कथन अनुसार वह गणेश जी का वाहन बन गया। गणेश जी जैसे ही मूषक रुपी क्रौंच पर सवार हुए, उनके भारी भरकम शरीर से वह दबने लगा और उसके प्राणों पर बन आई। उसका सारा अहंकार चूर-चूर हो गया। उसने गणेश जी से क्षमा माँगी और याचना की कि वे अपना वजन वहन करने योग्य कर लें। गणेश जी ने वैसा ही किया।

उस दिन से मूषक गणेश जी का वाहन बन गया। गणेश जी के वाहन के रूप में उसका नाम ‘डिंक’ पड़ा। गणेश जी की मूषक पर सवारी स्वार्थ पर विजय का संकेत है।   

दूसरी कथा

पौराणिक कथा के अनुसार गजमुखासुर नामक दैत्य ने देव लोक में उत्पात मचा रखा था। समस्त देवता उससे तंग थे। एक दिन सभी देवगण एकत्रित होकर गणेश जी की शरण में पहुँचे और उनसे गजमुखासुर दैत्य से मुक्ति दिलाने हेतु प्रार्थना करने लगे।

देवताओं की रक्षा के लिए गणेश जी ने गजमुखासुर से युद्ध किया। इस युद्ध में गणेश जी का एक दांत टूट गया। इसी दांत से गणेश जी ने गजमुखासुर पर प्रहार किया, जिससे बचने के लिए गजमुखासुर में मूषक का रूप धारण किया और युद्धस्थल से भाग खड़ा हुआ। किंतु गणेश जी ने उसे पकड़ लिया।

तब गजमुखासुर गणेश जी से क्षमायाचना करते हुए अपने प्राणों की भीख मांगने लगा। गणेश जी ने उसे क्षमा कर अपना वाहन बना लिया।

**(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैंजिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

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गणेश पूजा में तुलसी क्यों वर्जित हैं ? https://astrodeeva.com/%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82/ https://astrodeeva.com/%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82/#comments Tue, 25 Aug 2020 12:29:21 +0000 https://astrodeeva.com/?p=553 हिन्दू धर्म प्रकृति से जुड़ा धर्म है। इस धर्म में कई पेड़-पौधों को देवी-देवताओं जैसा माना जाता है और उन की पूजा भी की जाती है, उन सब पेड़-पौधों में तुलसी को सबसे पवित्र माना गया हैं और इस की पूजा भी की जाती हैं। हर हिन्दू देवता की पूजा में तुलसी को चढ़ाने की […]

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हिन्दू धर्म प्रकृति से जुड़ा धर्म है। इस धर्म में कई पेड़-पौधों को देवी-देवताओं जैसा माना जाता है और उन की पूजा भी की जाती है, उन सब पेड़-पौधों में तुलसी को सबसे पवित्र माना गया हैं और इस की पूजा भी की जाती हैं। हर हिन्दू देवता की पूजा में तुलसी को चढ़ाने की प्रथा हैं। विष्णु जी को तुलसी समर्पित करने से विशेष फल की प्राप्ति होती हैं। परंतु क्या आप जानते हैं की गणेश जी को तुलसी चढ़ना वर्जित है और इसे अशुभ माना जाता है।

पौराणिक कथा :

कथा के अनुसार एक बार तुलसी जी भ्रमण कर रहीं थी। भ्रमण करते-करते वो गंगा जी के तट के समीप पहुँची जहाँ भगवान गणेश तपस्या में लीन थे। उनके तेज को देख कर तुलसी बहुत प्रभावित हुई और उन्होंने गणेश जी से विवाह करने का मन बनाय और गणेश जी की तपस्या पूर्ण होने तक वहाँ इंतज़ार किया। जब गणेश जी की तपस्या पूर्ण हुई तो अपनी 

इस इच्छा को तुलसी ने गणेश जी के सामने विनय पूर्वक रखा और कहा “हे देव! मैं उचित वर प्राप्ति की कामना लेकर बहुत काल से भटक रही हूँ। आज आपको देख कर लगा कि मेरी तपस्या पूर्ण हुई। आपका ये तेजस्वी रूप देख कर मैंने मन ही मन आपको अपना पति मान लिया है इसीलिए कृपा कर मुझे अपनी भार्या के रूप में स्वीकार करें।”

गणेश जी उस समय विवाह नहीं करना चाहते थे इस लिए तुलसी की इस इच्छा को सुन कर उन्हें समझ नहीं आया कि क्या उत्तर दें, इसी कारण गणेश जी ने बड़ी मधुरता से कहा “हे देवी! आप अद्वितीय सौंदर्य की धनी हैं और आप का सौंदर्य देखकर मैं भी अभिभूत हूँ। विश्व में कदाचित ही कोई ऐसा होगा जो आपके अपनी भार्या के रूप में स्वीकार  ना करे। किन्तु आप कृपया मुझे क्षमा करें क्यूँकि मैं अभी विवाह नहीं कर सकता।“ इस वचन को सुन तुलसी जी ने कहा “हे देव! अगर आप अभी विवाह नहीं करना चाहते तो में आप की प्रतीक्षा करूँगी” तब गणेश जी ने विनम्रता से कहा “हे देवी! आप मेरी बात नहीं समझी। मैं ब्रह्मचारी हूँ इसलिए मैं विवाह नहीं कर सकता। अत: आप मुझे क्षमा करें और अपने योग्य कोई अन्य वर ढूँढ लें।“

यह सुन तुलसी को अति दुःख हुआ और वो दुखी मन से वहाँ से वापिस लौट गयी। थोड़ी दूर जाने के बाद तुलसी को नारद देव मिले, तुलसी से उन्हें प्रणाम किया। तुलसी को उदास देख कर देवर्षि नारद ने कहा – “हे देवी! आप उदास क्यों हैं?” इसपर तुलसी ने देवर्षि नारद को पूरी बात बतायी। बात सब देवर्षि नारद हसने लगे और कहा “हे देवी, आप भोली हैं और किन की बात में आ गयी? सत्य तो ये है कि वे ब्रह्मचारी नहीं हैं। उन्होंने आपसे ठिठोलि की हैं।“

देवर्षि नारद का यह कथन सुन तुलसी को बहुत क्रोध आया। वो गणेश जी के पास वापस लौटी और कहा “हे देव! मैं आप से सच्चे मन से विवाह करना चाहती थी किन्तु आप ने असत्य कहकर मेरा मज़ाक़ बनाया और मेरी निष्ठा का अपमान किया। मैं आप को श्राप देती हूँ की आप एक विवाह से बच रहें हैं, अब आप की इच्छा के विरूद्ध आप के दो विवाह होंगे।“ इस श्राप को पा कर गणेश जी भी क्रोधित हो गए और उन्होंने भी तुलसी को श्राप दे दिया कि उसका विवाह एक राक्षस के साथ होगा और उस का वध अल्प काल में महादेव भगवान शंकर के हाथों से होगा। यह सुन तुलसी को बहुत पछतावा हुआ और उस ने भगवान गणेश जी से क्षमा याचना की। तब गणेश जी ने कहा “हे देवी! मेरा श्राप विफल नहीं हो सकता किन्तु मैं आपको वरदान देता हूँ कि अगले जन्म में आप को नारायण की पत्नी बनने का सौभाग्य प्राप्त होगा और कलयुग में तुम्हें पूजा जाएगा एवं तुम मनुष्य के मोक्ष प्राप्ति में सहायक होगी। परन्तु मेरी पूजा में तुम्हारा प्रयोग वर्जित होगा।

भगवान गणेश और तुलसी को अपना-अपना श्राप भोगना पड़ा। गणेश जी का विवाह रिद्धि और सिद्धि से हुआ। तुलसी का विवाह शंखचूड(जलंधर) नामक राक्षक से हुआ जिसका वध महादेव के हाथों से हुआ। अगले जन्म में तुलसी अपनी राख से एक पौधे के रूप में उत्पन हुई और उन का विवाह नारायण के रूप शालिग्राम से हुआ। 

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