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जातक के व्यवसाय में कैसी स्थिति रहेगी इस विषय का आंकलन ज्योतिष द्वारा किया जा सकता है। ग्रहों की किस प्रकार की दृष्टि, युति या स्थान परिवर्तन कैसा हो रहा है, इन सभी तथ्यों के आधार पर कारोबार में सफलता-असफलता एवं लाभ हानि को ज्ञात किया जा सकता है। जन्म कुण्डली के अनुसार व्यक्ति में कार्यनिष्ठा का भाव देखने के लिये दशम घर से शनि का संबन्ध देखा जाता है।

जातक की कुण्डली के आधार पर इस बात का पता लगाया जा सकता है कि वह कैरियर के क्षेत्र में कौन सी लाईन पकडेगा। कई व्यक्ति जीवन में दूसरों के अधीन रहकर कार्य करते हैं अर्थात नौकरी से अपनी आजीविका प्राप्त करते हैं तो कुछ व्यक्ति स्वतंत्र रुप से कार्य करना पसन्द करते हैं। कुण्डली में व्यापार करने के लिए योग मौजूद होते हैं। यह योग निम्नलिखित हैं।

  • चन्द्रमा, गुरु तथा शुक्र परस्पर दो या बारह भावों में स्थित हों तो व्यक्ति स्वयं के व्यवसाय से जीविकोपार्जन करता है।
  • यदि चन्द्र कुण्डली में शुभ ग्रह केन्द्र में हो तो जातक बिजनेस से धन कमाता है।
  • कुण्डली में बुध, राहु या शनि से दृष्ट अथवा युति है तो व्यक्ति स्वतंत्र रुप से व्यवसाय करने की चाह रखता है। लेकिन शनि कुण्डली में बली होकर बुध को दृष्ट कर रहा है तो व्यक्ति नौकरी करता है।
  • चन्द्र कुण्डली से गुरु तृतीय भाव में स्थित हो तथा शुक्र लाभ भाव में स्थित हो तो व्यक्ति अपना स्वयं का व्यवसाय कर सकता है।
  • कुण्डली में सप्तम भाव का स्वामी यदि धन भाव में स्थित है और बुध सप्तम भाव में स्थित हो व्यक्ति बिजनेस कर सकता है।
  • कुण्डली में बुध तथा शुक्र द्वितीय भाव अथवा सप्तम भाव में स्थित हों और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तब जातक व्यापार की ओर झुकाव रख सकता है।
  • बुध को बिजनेस का कारक ग्रह माना जाता है। बुध कुण्डली में यदि सप्तम भाव में द्वितीयेश के साथ है तब जातक बिजनेस करता है।
  • दूसरे भाव का स्वामी शुभ ग्रह की राशि में स्थित हो और बुध या सप्तमेश उसे देख रहें हों तब व्यक्ति व्यापार करता है।
  • यदि गुरु की द्वितीय भाव के स्वामी पर दृष्टि हो तो व्यक्ति व्यापार कर सकता है।
  • उच्च के बुध पर द्वितीयेश की दृष्टि होने पर जातक व्यापार करने में रूचि रखता है।
  • यदि लग्नेश तथा दशमेश की परस्पर एक दूसरे पर दृष्टि हो, युति या दोनों का स्थान परिवर्तन हो रहा हो तब व्यक्ति बिजनेस कर सकता है।
  • दशम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि होने से व्यापार करता है। उसे बिजनेस में धन लाभ होता है।
  • दशम भाव में बुध की स्थिति से व्यक्ति व्यापारी बनता है।
  • कुण्डली में आत्मकारक ग्रह के नवाँश में शनि स्थित है तब व्यक्ति व्यापार में समृद्धि पाता है।
  • सप्तम भाव से द्वादश भाव तक या दशम भाव से तृतीय भाव तक पाँच या पाँच से अधिक ग्रह स्थित हैं तब व्यक्ति स्वतंत्र व्यापार करता है।
  • दशम भाव का स्वामी केन्द्र या त्रिकोण भाव में स्थित है तब भी व्यक्ति स्वतंत्र रुप से व्यापार कर सकता है।

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कौन सा व्यवसाय चुने?

  • मंगल और चतुर्थ भाव का स्वामी केन्द्र या त्रिकोण भाव में स्थित हो या लाभ भाव में स्थित हो और दशमेश के साथ शुक्र तथा चन्द्रमा की युति हो तब व्यक्ति कृषि तथा पशुपालन से धन प्राप्त करता है।
  • कुण्डली के नवम भाव में बुध, शुक्र तथा शनि स्थित है तब व्यक्ति कृषि कार्य से धन प्राप्त करता है।
  • कुण्डली में सूर्य ग्रह से लेकर शनि ग्रह तक सभी ग्रह परस्पर त्रिकोण भाव में स्थित हैं, तब जातक कृषि से संबंधित कार्यों से अपनी आजीविका कमा सकता है।
  • गुरु अष्टम भाव में स्थित हो और पाप ग्रह केन्द्र में हों और किसी भी शुभ ग्रह का संबंध इनसे नहीं हो तो व्यक्ति माँस – मछली आदि का व्यापार करता है।
  • बुध या शुक्र दशम भाव में दशमेश का नवाँशपति होकर स्थित हो तो व्यक्ति कपडे़ का व्यवसाय कर सकता है।
  • लग्न तथा सप्तम भाव में सभी ग्रह स्थित हो तब शकट योग बनता है और व्यक्ति ट्राँसपोर्ट से या लकडी़ के सामान के व्यापार से धनोपार्जन करता है।
  • राहु-केतु को छोड़कर कुण्डली में सातों ग्रह किन्हीं चार भावों में स्थित है तो व्यक्ति भूमि अर्थात कृषि कार्य से लाभ पाता है।
  • कुण्डली में चन्द्रमा या शुक्र की युति लग्नेश से हो जातक लेखक, कवि या पत्रकार बन सकता है।
  • मंगल तथा सूर्य के दशम भाव में स्थित होने के कारण जातक अपनी कार्य कुशलता के आधार पर एक अच्छा कारीगर बनता है और धन पाता है।
  • चन्द्रमा, बुध के नवाँश में स्थित हो और सूर्य से दृष्ट हो तब व्यक्ति अभिनय के क्षेत्र में सफलता हासिल करता है।
  • दशम भाव में चन्द्रमा तथा राहु की युति व्यक्ति को कूटनीतिज्ञ बनाती है।
  • कुण्डली में दशम भाव में मंगल स्थित हो या मंगल का दशम भाव के स्वामी के साथ दृष्टि या युति संबंध हो तब व्यक्ति कुशल प्रशासक बनता है या सेना में अधिकारी का पद प्राप्त कर सकता है।

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Rahu Kaal : राहु काल क्या है, इसमें शुभ कार्य करना वर्जित क्यों है? https://astrodeeva.com/rahu-kaal-what-is-rahu-kaal-why-is-it-forbidden-to-do-auspicious-work-in-this/ https://astrodeeva.com/rahu-kaal-what-is-rahu-kaal-why-is-it-forbidden-to-do-auspicious-work-in-this/#respond Fri, 11 Feb 2022 11:16:25 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2862 हम सब ने राहुकाल(Rahu kaal) के बारे में अवश्य सुना है। लेकिन राहुकाल क्या है, कब आता है और इसमें शुभ कार्य करना वर्जित क्यों कहा गया है। इसके बारे में कम ही लोग जानते है। राहुकाल एक ऐसा समय है जब राहु अपने पूर्ण प्रभाव में होता है। ज्योतिष शास्त्र में राहु को पाप […]

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हम सब ने राहुकाल(Rahu kaal) के बारे में अवश्य सुना है। लेकिन राहुकाल क्या है, कब आता है और इसमें शुभ कार्य करना वर्जित क्यों कहा गया है। इसके बारे में कम ही लोग जानते है। राहुकाल एक ऐसा समय है जब राहु अपने पूर्ण प्रभाव में होता है। ज्योतिष शास्त्र में राहु को पाप ग्रह के रूप में देखा जाता है।

राहु काल क्या है? ( What is Rahu Kaal?)

राहु काल, प्रत्येक दिवस की एक निश्चित समयावधि होती है, जो लगभग डेढ़ घण्टे (एक घण्टा तीस मिनट) तक रहती है। राहु काल, सूर्योदय तथा सूर्यास्त के मध्य, दिन के आठ खण्डों में से एक खण्ड है। एक निश्चित स्थान के अनुसार, सूर्योदय तथा सूर्यास्त के मध्य की कुल समयावधि को निकालकर, उस अवधि को आठ से विभाजित करने के पश्चात्, दिन के आठ खण्डों की गणना की जाती है।

सूर्योदय तथा सूर्यास्त के स्थानीय समय में अन्तर के कारण, राहु काल का समय व अवधि दो स्थानों के लिये समान नहीं होती है। यहाँ तक कि, एक स्थान के लिये भी राहु काल का समय व अवधि सभी दिनों के लिये समान नहीं होती है, क्योंकि प्रतिदिन सूर्योदय तथा सूर्यास्त का समय परिवर्तित होता रहता है। अन्य शब्दों में कहें तो, राहु काल प्रत्येक स्थान तथा दिन के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। इसलिये, राहु काल प्रत्येक दिन देखना चाहिये।

सूर्योदय के पश्चात् प्रथम खण्ड (सूर्योदय एवं सूर्यास्त के बीच के आठ खण्डो में से एक) सदैव शुभः होता है, यह लगभग डेढ़ घण्टे तक रहता है। माना जाता है कि, यह अवधि सदैव राहु के प्रभाव से मुक्त रहती है। सोमवार को राहु काल दूसरे खण्ड में, शनिवार को तीसरे खण्ड में, शुक्रवार को चौथे खण्ड में, बुधवार को पाँचवें खण्ड में, गुरुवार को छठे खण्ड में, मंगलवार को सातवें तथा रविवार को आठवें खण्ड में रहता है।

कुछ लोग, राहु काल को रात्रि की अवधि के लिये भी मानते हैं, जो कि कम लोकप्रिय है, क्योंकि अधिकांश महत्वपूर्ण एवं शुभः कार्य दिन के समय आरम्भ किये जाते हैं। रात्रि के समय राहु काल की गणना सूर्यास्त तथा अगले दिन सूर्योदय के बीच की अवधि को आठ से विभाजित करके भी की जा सकती है। मंगलवार, शुक्रवार तथा रविवार के दिन राहु काल का सप्ताह के अन्य दिनों की तुलना में अधिक प्रभाव पड़ता है। मुख्यतः दक्षिण भारत में, राहु काल को अत्यधिक महत्व दिया जाता है।

जन्म कुंडली में कालसर्प दोष के लक्षण और इसके सरल उपाय

राहुकाल में क्या करना निषेध है ? (What not to do during Rahu Kaal?)

  • राहुकाल में कोई भी शुभ कार्य का आरम्भ नहीं करना चाहिए।
  • राहुकाल काल में किसी भी चीज़ की खरीदी-बिक्री करने से हानि का सामना करना पड़ सकता है।
  • राहुकाल के समय में शुभ ग्रहों के लिए यज्ञ या उनसे सम्बन्धित कार्य करने में राहु बाधक होता है। इस कारण इस कार्यों का मनोवान्छित परिणाम प्राप्त नहीं होता हैं।
  • राहुकाल में भूलकर भी वाहन, मकान, मोबाइल, कम्प्यूटर,  टेलीविज़न, आभूषण या अन्य कोई भी बहुमूल्य वस्तु की ख़रीदारी करना निषेध कहा गया है।
  • राहुकाल में विवाह, सगाई, धार्मिक कार्य तथा गृह प्रवेश नहीं करना चाहिए।

राहुकाल में क्या किया जा सकता है? ( What not do during RahuKal?)

  • राहुकाल में यदि आप राहु से सम्बन्धित कार्य करें, तो सकारात्मक परिणाम मिलता है।
  • राहुकाल के समय राहु ग्रह की शांति के लिए यज्ञ अनुष्ठान करने चाहिए।
  • काल-सर्प दोष के अनुष्ठान के लिए राहुकाल का समय चुना जा सकता है। ऐसा करने से उचित परिणाम प्राप्त होते है।
  • राहु ग्रह की शान्ति के लिए चींटी या पशु-पक्षी को अनाज खिलाने से तुरंत ही सकारात्मक परिणाम मिलने शुरू हो जाते है।
  • दि आप किसी कार्य विशेष के लिए राहुकाल के शुरू होने से पहले ही निकल चुके हैं, तो राहुकाल के समय अपनी यात्रा या कार्य नहीं रोकना चाहिए।
  • राहु काल का विचार मात्र किसी नवीन कार्य को आरम्भ करने के लिये किया जाता है, किन्तु पूर्व से ही चले आ रहे कार्यों को राहु काल के समय जारी रखा जा सकता है।

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