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*
* @param int $id The Post ID.
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* @param bool $number_format Whether to format the number (eg. 9,999) or not (eg. 9999)
* @return string
*/
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/**
* Do Query
*
* @param $instance
* @return array
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}Hindu God Archives - हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव
https://astrodeeva.com/tag/hindu-god/
Daily Dose of AstrologySun, 28 Jan 2024 02:35:45 +0000en-US
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1 https://wordpress.org/?v=7.0https://astrodeeva.com/wp-content/uploads/2022/03/cropped-Logo-32x32.pngHindu God Archives - हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव
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3232विष्णु जी क्यों धारण करते है सुदर्शन चक्र, शंख, गदा और कमल?
https://astrodeeva.com/why-does-lord-vishnu-wear-sudarshan-chakra-conch/
https://astrodeeva.com/why-does-lord-vishnu-wear-sudarshan-chakra-conch/#respondSun, 28 Jan 2024 02:34:01 +0000https://astrodeeva.com/?p=3815विष्णु पुराण के अनुसार, विष्णु जी सृष्टि के पालनहार हैं और वे क्षीर सागर में वासुकि नाग पर विराजते हैं। भगवान विष्णु की चार भुजाएं हैं जिनमें से एक हाथ में सुदर्शन चक्र, दूसरे में शंख, तीसरे में गदा और चौथी भुजा में पद्म(कमल) है। लेकिन क्या आपको पता है ये चीजें भगवान विष्णु के […]
विष्णु पुराण के अनुसार, विष्णु जी सृष्टि के पालनहार हैं और वे क्षीर सागर में वासुकि नाग पर विराजते हैं। भगवान विष्णु की चार भुजाएं हैं जिनमें से एक हाथ में सुदर्शन चक्र, दूसरे में शंख, तीसरे में गदा और चौथी भुजा में पद्म(कमल) है। लेकिन क्या आपको पता है ये चीजें भगवान विष्णु के हाथों में होना मात्र एक आकृति या पहचना के लिये नहीं है। बल्कि भगवान विष्णु ने अपने हाथों में जो चीजें धारण की हैं, उनके पीछे का बहुत अधिक महत्व है।
आइए जानते हैं विष्णु जी द्वारा धारण की वस्तुओं का क्या है महत्व….
सुदर्शन चक्र का महत्व
भगवान विष्णु के एक हाथ में सुदर्शन चक्र दिखाई देता है। सुदर्शन चक्र वास्तव में इस बात का प्रतीक होता है कि व्यक्ति को अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ निश्चयी होना चाहिये। यह इस बात को भी समझाता है कि अपने लक्ष्य को भेदने की शक्ति और दूरदर्शिता के प्रति हमेशा एकाग्र रहें। सुदर्शन चक्र को भगवान विष्णु का अमोघ अस्त्र भी कहा जाता है।
शंख का महत्व
भगवान विष्णु का दूसरा शस्त्र है शंख, शंख की ध्वनि में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसके साथ ही यह भी कहना है कि शंख की ध्वनि व्यक्ति के जीवन में नकारात्मकता कम करती है और सकारात्मकता बढ़ाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से शंख से निकलने वाली ध्वनि हमारी अंतरात्मा और चेतना जागृत होती है।
गदा भगवान विष्णु के एक हाथ में रखते हैं और शक्ति प्रदान करते हैं। यह गदा होने का मतलब दुष्टों को डराने से है। दुष्टों को डराने का कार्य इस गदा से किया जाता है। जबकि अच्छे विचारवान लोगों के लिये यह रक्षा का प्रतीक है। भगवान विष्णु के हाथ में गदा ईश्वर की न्याय प्रणाली को दर्शाता है।
पद्म का महत्व
पद्म का अर्थ कमल के फूल से है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कमल का फूल मन में एकाग्रता और सत्यता का प्रतीक माना जाता है। कमल का फूल मानव जीवन को बहुत बड़ी सीख देता है, जिस प्रकार कमल का फूल कीचड़ में रहकर भी खुद को साफ, सुंदर बनाकर रखता है। उसी तरह मानव को भी इस संसार रुपी माया में रहते हुये खुद को पवित्रात्मा और दोषरहित बनाकर रखना चाहिए।
]]>https://astrodeeva.com/why-does-lord-vishnu-wear-sudarshan-chakra-conch/feed/0Shrimad Bhagwat Geeta: श्रीमद भगवत गीता के सभी 18 अध्याय के नाम
https://astrodeeva.com/shrimad-bhagwat-geeta-names-of-all-18-chapters-of-shrimad-bhagwat-geeta/
https://astrodeeva.com/shrimad-bhagwat-geeta-names-of-all-18-chapters-of-shrimad-bhagwat-geeta/#respondMon, 18 Dec 2023 14:46:15 +0000https://astrodeeva.com/?p=3711Shrimad Bhagwat Geeta की उत्पत्ति धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन हुई थी। इस विशेष तिथि को ‘मोक्षदा एकादशी‘ के रूप में भी मनाया जाता है। गीता एक सार्वभौमिक ग्रंथ है, जो किसी विशेष काल, धर्म, संप्रदाय, या जाति के लिए नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानव जाति के […]
]]>Shrimad Bhagwat Geeta की उत्पत्ति धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन हुई थी। इस विशेष तिथि को ‘मोक्षदा एकादशी‘ के रूप में भी मनाया जाता है। गीता एक सार्वभौमिक ग्रंथ है, जो किसी विशेष काल, धर्म, संप्रदाय, या जाति के लिए नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानव जाति के लिए है। इसे श्रीभगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर कहा है, इसलिए ग्रंथ में कहीं भी ‘श्रीकृष्ण उवाच’ नहीं, बल्कि ‘श्रीभगवानुवाच’ का प्रयोग किया गया है।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गाकर छंद रूप में उपदेश दिया, इसलिए इसे गीता कहा जाता है। क्योंकि उपदेश देने वाले स्वयं भगवान थे, इसलिए इस ग्रंथ का नाम भगवद्गीता है। गीता माहात्म्य के अनुसार, श्रीकृष्ण ने पद्म पुराण में बताया है कि भवबंधन (जन्म-मरण) से मुक्ति की प्राप्ति के लिए गीता ही पर्याप्त ग्रंथ है। गीता का मुख्य उद्देश्य ईश्वर का ज्ञान प्रदान करना माना जाता है।
भगवद्गीता में कई विद्याओं का वर्णन है, जिनमें चार प्रमुख हैं – अभय विद्या, साम्य विद्या, ईश्वर विद्या और ब्रह्म विद्या।
अभय विद्या मृत्यु के भय को दूर करती है।
साम्य विद्या राग-द्वेष से छुटकारा दिलाकर जीव में समत्व भाव पैदा करती है।
ईश्वर विद्या के प्रभाव से साधक अहंकार और गर्व के विकार से बचता है।
ब्रह्म विद्या से अंतरात्मा में ब्रह्मा भाव को जगाता है।
श्रीमद्भागवत गीता
गीता का दूसरा नाम गीतोपनिषद है। श्रीमद्भागवत गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं, इन श्लोकों में कर्म, धर्म, कर्मफल, जन्म, मृत्यु, सत्य, असत्य आदि जीवन से जुड़े मूलभूत प्रश्नों के उत्तर मौजूद हैं।
भगवत गीता के सभी 18 अध्याय के नाम इस प्रकार है:
अध्याय 1: अर्जुनविषादयोगः – कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण अध्याय 2: साङ्ख्ययोगः – गीता का सार अध्याय 3: कर्मयोगः – कर्मयोग अध्याय 4: ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः – दिव्य ज्ञान अध्याय 5: कर्मसंन्यासयोगः – कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म अध्याय 6: आत्मसंयमयोगः – ध्यानयोग अध्याय 7: ज्ञानविज्ञानयोगः – भगवद्ज्ञान अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोगः – भगवत्प्राप्ति अध्याय 9: राजविद्याराजगुह्ययोगः – परम गुह्य ज्ञान अध्याय 10: विभूतियोगः – श्री भगवान् का ऐश्वर्य अध्याय 11: विश्वरूपदर्शनयोगः – विराट रूप अध्याय 12: भक्तियोगः – भक्तियोग अध्याय 13: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः – प्रकृति, पुरुष तथा चेतना अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोगः – प्रकृति के तीन गुण अध्याय 15: पुरुषोत्तमयोगः – पुरुषोत्तम योग अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोगः – दैवी तथा आसुरी स्वभाव अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोगः – श्रद्धा के विभाग अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोगः – उपसंहार-संन्यास की सिद्धि
]]>https://astrodeeva.com/shrimad-bhagwat-geeta-names-of-all-18-chapters-of-shrimad-bhagwat-geeta/feed/0Gayatri Mantra: गायत्री मंत्र का जप इस समय करने से मिलता है मन का चाहा हुआ फल
https://astrodeeva.com/by-chanting-the-gayatri-mantra-at-this-time-one-gets-the-desired-fruit-of-the-mind/
https://astrodeeva.com/by-chanting-the-gayatri-mantra-at-this-time-one-gets-the-desired-fruit-of-the-mind/#respondMon, 06 Jun 2022 15:28:34 +0000https://astrodeeva.com/?p=3501गायत्री मंत्र (Gayatri Mantra) से सभी सनातनी जन भली-भांती परिचित होते हैं। हमें बचपन के दिनों से ही इस मन्त्र का जाप शुरू करवा दिया जाता है और जीवन के अंतिम पड़ाव ‘बुढ़ापे’ तक यह जप चलता रहता है। हिन्दू धर्म का सबसे सरल मन्त्र यही है और वेदों में इस मन्त्र को ईश्वर की […]
]]>गायत्री मंत्र (Gayatri Mantra) से सभी सनातनी जन भली-भांती परिचित होते हैं। हमें बचपन के दिनों से ही इस मन्त्र का जाप शुरू करवा दिया जाता है और जीवन के अंतिम पड़ाव ‘बुढ़ापे’ तक यह जप चलता रहता है। हिन्दू धर्म का सबसे सरल मन्त्र यही है और वेदों में इस मन्त्र को ईश्वर की प्राप्ति का मन्त्र बताया गया है।
गायत्री मन्त्र देखने में तो बहुत छोटा सा 24 अक्षरों का मन्त्र दीखता है परन्तु इसमें गजब शक्ति है। यह दिव्य मंत्र कलयुग की हर परेशानी का समाधान है। इस मंत्र का जप करने से किसी भी प्रकार की समस्या को दूर किया जा सकता है। अपनी इच्छा की पूर्ति करने के लिए गायत्री मंत्र का जप सबसे अच्छा साधन है। सभी मंत्रों में गायत्री मंत्र सबसे दिव्य और चमत्कारी है। इस मंत्र के जपने से सभी इच्छाए पूरी होती है। गायत्री मंत्र से ब्रह्मज्ञान, दैवीय कृपा, सांसारिक सुख-सुविधाएँ और धन प्राप्त किया जा सकता है।
भावार्थ : उस सर्वरक्षक प्राणों से प्यारे, दु:खनाशक, सुखस्वरूप श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंतरात्मा में धारण करें तथा वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।
गायत्री मंत्र का जाप किस समय करना चाहिए?
गायत्री मंत्र वेदों में सर्वश्रेष्ठ मंत्र है। इस मंत्र के जप के लिए तीन समय बताए गये है। गायत्री मंत्र के जप के लिए पहला समय प्रात:काल है। इस मंत्र के जप के लिए दूसरा समय दोपहर मध्यान्ह का है। दोपहर में भी इस मंत्र का जप किया जाता है। तीसरा समय सूर्यास्त से कुछ देर पहले(गोधूलि बेला) में मंत्र का जप करना है। इन तीन समय के अतिरिक्त यदि गायत्री मंत्र का जप करना हो तो मौन रहकर जप करना चाहिए।
इस मंत्र का जप करने के लिए रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना चाहिए। गायत्री मंत्र के जप से मन में उत्साह, विचारों में सकारात्मकता एवं त्वचा में चमक आती है। गायत्री मंत्र का जप विद्यार्थियों के लिए बहुत लाभदायक है। इस मंत्र का रोजाना एक सौ आठ बार जप करने से विद्यार्थी को सभी प्रकार की विद्या प्राप्त करने में आसानी होती है।
यदि किसी व्यक्ति के व्यापार, नौकरी में हानि हो रही है या कार्य में सफलता नहीं मिलती है तो उन्हें गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए।
शुक्रवार को पीले वस्त्र पहनकर गायत्री माता का ध्यान कर गायत्री मंत्र के आगे और पीछे श्रीं सम्पुट लगाकर जप करने से दरिद्रता का नाश होता है।
यदि किसी दंपत्ति को संतान नहीं है या संतान से दुखी है तो सुबह पति-पत्नी एक साथ सफेद वस्त्र धारण कर गायत्री मंत्र का जप करें।
यदि किसी के विवाह में अनावश्यक देरी हो रही हो तो सोमवार को सुबह के समय पीले वस्त्र धारण कर माता पार्वती का ध्यान करते हुए एक सौ आठ बार जाप करने से विवाह कार्य में आने वाली समस्त बाधाएं दूर होती हैं।
]]>https://astrodeeva.com/by-chanting-the-gayatri-mantra-at-this-time-one-gets-the-desired-fruit-of-the-mind/feed/0Ashta Lakshmi: माता लक्ष्मी के 8 स्वरूप
https://astrodeeva.com/ashta-lakshmi-8-forms-of-mata-lakshmi/
https://astrodeeva.com/ashta-lakshmi-8-forms-of-mata-lakshmi/#commentsFri, 15 Apr 2022 01:19:00 +0000https://astrodeeva.com/?p=3212Ashta Lakshmi – धर्मग्रंथों में माता लक्ष्मी को धन समृद्धि की देवी बताया गया है। इन्हें भगवान विष्णु की पत्नी और आदिशक्ति भी कहा गया। धन समृद्धि के लिए लोग इनकी पूजा अर्चना करते हैं लेकिन देवी लक्ष्मी एक नहीं पूरी 8 हैं और यह अलग-अलग माध्यमों से अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती हैं। इसलिए […]
]]>Ashta Lakshmi – धर्मग्रंथों में माता लक्ष्मी को धन समृद्धि की देवी बताया गया है। इन्हें भगवान विष्णु की पत्नी और आदिशक्ति भी कहा गया। धन समृद्धि के लिए लोग इनकी पूजा अर्चना करते हैं लेकिन देवी लक्ष्मी एक नहीं पूरी 8 हैं और यह अलग-अलग माध्यमों से अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती हैं। इसलिए धर्मग्रंथों में अष्ट लक्ष्मी का उल्लेख किया गया है। ये अष्ट लक्ष्मी (Ashta Lakshmi) अपने नाम के अनुसार फल देती हैं इसलिए आपको मनोकामना और सुख-समृद्धि की चाहत के अनुसार ही देवी लक्ष्मी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करनी चाहिए है। भक्त प्रति शुक्रवार और दीपावली को माँ लक्ष्मी के इन (Ashta Lakshmi) सभी रूपों की वंदना कर माता को प्रसन्न करके असीम सम्पदा और धन की प्राप्ति कर सकते है | आज मां लक्ष्मी के प्रिय दिन शुक्रवार को हम आपको अष्ट लक्ष्मी के सभी स्वरूपों और उनकी पूजा विधि के बारे में बता रहे हैं…
अष्ट लक्ष्मी के स्वरूप – Ashta Lakshmi Forms
पहला स्वरूप – आदिलक्ष्मी
देवी लक्ष्मी का पहला स्वरूप आदिलक्ष्मी का है इन्हें मूललक्ष्मी, आदिशक्ति भी कहा जाता है। श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार महालक्ष्मी ने ही सृष्टि के आरंभ में त्रिदेवों को प्रकट किया और इन्हीं से महाकाली और महासरस्वती ने आकार लिया। इन्होंने स्वयं जगत के संचालन के लिए भगवान विष्णु के साथ रहना स्वीकार किया। यह देवी जीव-जंतुओं को प्राण प्रदान करती हैं, इनसे जीवन की उत्पत्ति हुई है। इनके भक्त मोह-माया से मुक्ति होकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं। इनकी कृपा से लोक-परलोक में सुख-संपदा प्राप्त होती है।
दूसरा स्वरूप – धनलक्ष्मी
देवी लक्ष्मी का दूसरा स्वरूप हैं धनलक्ष्मी। इन्होंने भगवान विष्णु को कुबेर के कर्ज से मुक्ति दिलाने के लिए यह रूप धारण किया था। इस देवी का संबंध भगवान वेंकटेश से है जो भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। वेंकटेश रूप में भगवान ने देवी पद्मावती से विवाह के लिए कुबेर से कर्ज लिया। इसी कर्ज को चुकाने में भगवान की सहायता के लिए देवी लक्ष्मी धनलक्ष्मी रूप में प्रकट हुईं। इनके पास धन से भरा कलश है और एक हाथ में कमल फूल है। इनकी पूजा और भक्ति आर्थिक परेशानियों और कर्ज से मुक्ति दिलाती है। कर्ज से परेशान लोगों को देवी लक्ष्मी के इस स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।
तीसरा स्वरूप – धान्यलक्ष्मी
धान्य का अर्थ है अन्न संपदा। देवी लक्ष्मी का यह स्वरूप अन्न का भंडार बनाए रखती हैं। इन्हें माता अन्नपूर्णा का स्वरूप भी माना जाता है। यह देवी हर घर में अन्न रूप में विराजमान रहती हैं। इन्हें प्रसन्न करने का एक सरल तरीका है कि घर में अन्न की बर्बादी ना करें। जिन घरों में अन्न का निरादर नहीं होता है उस घर में यह देवी प्रसन्नता पूर्वक रहती हैं और अन्न धन का भंडार बना रहता है।
चौथा स्वरूप – गजलक्ष्मी
देवी लक्ष्मी अपने चौथे स्वरूप में गजलक्ष्मी रूप में पूजी जाती हैं। इस स्वरूप में देवी कमल पुष्प के ऊपर हाथी पर विराजमान हैं और इनके दोनों ओर हाथी सूंड में जल लेकर इनका अभिषेक करते हैं। देवी की चार भुजाएं हैं जिनमें देवी ने कमल का फूल, अमृत कलश, बेल और शंख धारण किया है। देवी गजलक्ष्मी को कृषि और उर्वरता की देवी माना गया है। राज को समृद्धि प्रदान करने वाली देवी होने के कारण इन्हें राजलक्ष्मी भी कहा जाता है। यह संतान सुख भी प्रदान करती हैं। कृषिक्षेत्र से जुड़े लोगों और संतान की इच्छा रखने वालों को देवी के इस स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।
पांचवां स्वरूप – सन्तानलक्ष्मी
माता लक्ष्मी का पांचवां स्वरूप संतान लक्ष्मी का है। श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार देवी आदिशक्ति का पांचवां स्वरूप स्कंदमाता का है जो अपनी गोद में बालक कुमार स्कंद को बैठाए हुई हैं। माता संतानलक्ष्मी का स्वरूप स्कंदमाता से मिलता-जुलता हुआ है और यह देवी लक्ष्मी का पांचवां स्वरूप हैं इसलिए स्कंदमाता और संतान लक्ष्मी को समान माना गया है। संतान लक्ष्मी माता की चार भुजाएं हैं जिनमें दो भुजाओं में माता ने कलश धारण किया है और नीचे के दोनों हाथों में तलवार और ढ़ाल है। यह देवी भक्तों की रक्षा अपने संतान के समान करती हैं। इनकी पूजा से योग्य संतान की प्राप्ति होती है। संतान से घर में सुख समृद्धि आती है।
छठा स्वरूप – वीरलक्ष्मी
अपने नाम के अनुसार यह देवी वीरों और साहसी लोगों की आराध्य हैं। यह युद्ध में विजय दिलाती हैं। इनकी आठ भुजाएं हैं जिनमें देवी ने विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण किया हुआ है। माता वीर लक्ष्मी भक्तों की रक्षा करती हैं और अकाल मृत्यु से बचाती हैं। इनकी कृपा से सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इन्हें मां कात्यायिनी का स्वरूप भी माना जाता है जिन्होंने महिषासुर का वध करके भक्तों की रक्षा की।
सातवां स्वरूप – विजयलक्ष्मी
देवी का सातवां स्वरूप विजयलक्ष्मी का है इन्हें जयलक्ष्मी भी कहा जाता है। इस स्वरूप में माता सभी प्रकार की विजय प्रादान करने वाली हैं। अष्टभुजी यह माता भक्तों को अभय प्रदान करती हैं। कोर्ट-कचहरी में जीत का मामला हो या किसी क्षेत्र में आप संकट में फंसे हों तो देवी के इस स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।
आठवां स्वरूप – विद्यालक्ष्मी
शिक्षा और ज्ञान से समृद्धि प्रदान करने वाली देवी लक्ष्मी माता का आठवां स्वरूप है। इनका स्वरूप मां दुर्गा से दूसरे स्वरूप ब्रह्मचारिणी माता से मिलता-जुलता है। इनकी साधना से शिक्षा के क्षेत्र में सफलता और ज्ञान की वृद्धि होती है। इनके साधक अपनी बुद्धि और ज्ञान से प्रसिद्धि पाते हैं।