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पौष पुत्रदा एकादशी 2024-पुत्रदा एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है। पौष मास में शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पौष पुत्रदा एकादशी कहते हैं।यह व्रत आमतौर पर विवाहित जोड़ों द्वारा संतान प्राप्ति के लिए किया जाता हैं। विवाहित जोड़े जो संतान की चाहत रखते हैं, पुत्रदा एकादशी व्रत का पालन करते हैं और भगवान विष्णु का दिव्य आशीर्वाद पाने के लिए इस त्योहार से जुड़े विभिन्न अनुष्ठान भी करते हैं।

पुत्रदा एकादशी साल में दो बार मनाई जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार पहली पुत्रदा एकादशी पौष माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनायी जाती है इसे पौष पुत्रदा एकादशी या पौष शुक्ल पुत्रदा एकादशी कहा जाता है, जिसे अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार जनवरी या दिसंबर महीने में मनाया जाता है। और दूसरी पुत्रदा एकादशी श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनायी जाती है और इसे श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है जो इंग्लिश कैलेंडर वर्ष के अनुसार जुलाई या अगस्त के महीने में आती है।

पौष पुत्रदा एकादशी का महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल के समय श्री कृष्ण ने अर्जुन के पूछने पर पुत्रदा एकादशी का महत्व बताते हुए कहा था। “हे अर्जुन! संसार में पुत्रदा एकादशी उपवास के समान अन्य दूसरा व्रत नहीं है। इसके पुण्य से प्राणी तपस्वी, विद्वान और धनवान बनता है। पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का उपवास करना चाहिए पुत्र प्राप्ति के लिए इससे बढ़कर दूसरा कोई व्रत नहीं है। जो कोई व्यक्ति पुत्रदा एकादशी के माहात्म्य को पढ़ता व श्रवण करता है तथा विधानानुसार इसका उपवास करता है, उसे सर्वगुण सम्पन्न पुत्ररत्न की प्राप्ति होती है। श्रीहरि की अनुकम्पा से वह मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है।”

पौष पुत्रदा एकादशी 2024

दिनांक – 21 जनवरी 2024
वार – रविवार 
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 20 जनवरी 2024 को 07:26 पी एम बजे से
एकादशी तिथि समाप्त – 
जनवरी 21, 2024 को 07:26 पी एम बजे तक 
पारण (व्रत तोड़ने का) समय – 22 जनवरी 2024 को 07:14 ए एम से 09:21 ए एम तक 
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्ति समय – 07:51 पी एम

पुत्रदा एकादशी की कथा

पुत्रदा एकादशी की महत्ता सुन अर्जुन के मन में और जिज्ञासा जाग उठी और उस ने भगवान श्री कृष्ण से कहा – हे कमलनयन! आप कृप्या कर इस व्रत की कथा भी मुझे विस्तारपूर्वक बताएं।

श्रीकृष्ण ने कहा– “हे पाण्डुनंदन! इस एकादशी से सम्बंधित जो कथा प्रचलित है, उसे मैं तुम्हें सुनाता हूँ, श्रद्धापूर्वक श्रवण करो-

प्राचीन समय में भद्रावती नगरी में सुकेतुमान नाम का एक राजा राज्य करता था। उसके कोई संतान नहीं थी। उसकी पत्नी का नाम शैव्या था। पुत्र ना होने के कारण राजा के मन में इस बात की बड़ी चिंता थी कि उसके बाद उसे और उसके पूर्वजों को कौन पिंडदान देगा। राजा रात-दिन इसी चिंता में घुला करता था। इस चिंता के कारण एक दिन वह इतना दुखी हो गया कि उसके मन में अपने शरीर को त्याग देने की इच्छा उत्पन्न हुई , किंतु वह सोचने लगा कि आत्महत्या करना तो महापाप है, अतः उसने इस विचार को मन से निकाल दिया। एक दिन इन्हीं विचारों में डूबा हुआ वह घोड़े पर सवार होकर वन को चल दिया।

घोड़े पर सवार राजा वन, पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा। उसने वन में देखा कि मृग, बाघ, सिंह, बंदर आदि विचरण कर रहे हैं। हाथी शिशुओं और हथिनियों के बीच में विचर रहा है। उस वन में राजा ने देखा कि कहीं तो सियार कर्कश शब्द निकाल रहे हैं और कहीं मोर अपने परिवार के साथ नाच रहे हैं। वन के दृश्यों को देखकर राजा और ज्यादा दुखी हो गया कि उसके पुत्र क्यों नहीं हैं? इसी सोच-विचार में दोपहर हो गई। वह सोचने लगा कि मैंने अनेक यज्ञ किए हैं और ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन करा सामर्थ्य के अनुसार दान दक्षिण दी है, किंतु फिर भी मुझे यह दुख क्यों मिल रहा है? आखिर इसका कारण क्या है? मैं अपनी व्यथा किससे कहूं? और कौन मेरी व्यथा का समाधान कर सकता है?

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अपने विचारों में खोए राजा को प्यास लगी। वह पानी की तलाश में आगे बढ़ा। कुछ दूर जाने पर उसे एक सरोवर मिला। उस सरोवर में कमल पुष्प खिले हुए थे। सारस, हंस, घड़ियाल आदि जल-क्रीड़ा में मग्न थे। सरोवर के चारों तरफ ऋषियों के आश्रम बने हुए थे। अचानक राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे। इसे शुभ शगुन समझकर राजा मन में प्रसन्न होता हुआ घोड़े से नीचे उतरा और सरोवर के किनारे बैठे हुए ऋषियों को प्रणाम करके उनके पूछा ‘हे विप्रो! आप कौन हैं? और किसलिए यहां रह रहे हैं?’

ऋषि बोले – ‘राजन! आज पुत्र की इच्छा करने वालो को श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करने वाली पुत्रदा एकादशी है। आज से पांच दिन बाद माघ स्नान है और हम सब इस सरोवर में स्नान करने आए हैं।’

ऋषियों की बात सुन राजा ने कहा – ‘हे मुनियो! मेरा भी कोई पुत्र नहीं है, कृपा कर मुझे भी इस एकादशी व्रत के बारे में बताएं।

ऋषि बोले – ‘हे राजन! आज पुत्रदा एकादशी है। आप इसका उपवास करें। भगवान श्रीहरि की अनुकम्पा से आपके घर अवश्य ही पुत्र होगा।’

राजा ने मुनि के वचनों के अनुसार उस दिन उपवास किया और द्वादशी को व्रत का पारण किया और ऋषियों को प्रणाम कर उन का आशीर्वाद प्राप्त कर वापस अपनी नगरी आ गया। भगवान श्रीहरि की कृपा से कुछ दिनों बाद ही रानी ने गर्भ धारण किया और नौ माह के पश्चात उसने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। यह राजकुमार बड़ा होने पर अत्यंत वीर, धनवान, यशस्वी और प्रजापालक बना।

पौष पुत्रदा एकादशी 2024 के मंत्र

  • ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र
  • विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम
  • विष्णु अष्टोत्रम
  • संतान गोपाल मन्त्र
    देवकीसुतं गोविन्दम् वासुदेव जगत्पते
    देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:

डिसक्लेमर

इस लेख में प्रदान की गई जानकारी की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की कोई गारंटी नहीं है। यह सूचना विभिन्न स्रोतों, जैसे कि ज्योतिष, पंचांग, प्रवचन, धार्मिक मान्यताएं, और धर्मग्रंथों से संकलित कर यहाँ प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, और पाठक या उपयोगकर्ता से अपील है कि वे इसे सिर्फ सूचना के रूप में ही समझें और उपयोग करें।

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Ahoi Ashtami 2023: कब होगा अहोई अष्टमी का व्रत? जाने महत्व, व्रत कथा, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि https://astrodeeva.com/ahoi-ashtami-2023-when-will-be-the-fast-of-ahoi-ashtami-know-the-importance-of-fast-story-auspicious-time-and-worship-method/ https://astrodeeva.com/ahoi-ashtami-2023-when-will-be-the-fast-of-ahoi-ashtami-know-the-importance-of-fast-story-auspicious-time-and-worship-method/#respond Fri, 27 Oct 2023 13:43:01 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3619 Ahoi Ashtami 2023: हिन्दू धर्म पूरे विश्व भर में अपनी अनोखी परंपराओं और त्योहारों के लिए जाना जाता है। इसके सभी त्योहार और वैदिक परंपरायें नयी पीढ़ी को समाज से जोड़ने का काम करती है। हिन्दू धर्म विविधता से भरा धर्म है। इसमें हर प्रांत और समुदाए के कुछ बहुत प्रचलित एवं महत्वपूर्ण अपने व्रत […]

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Ahoi Ashtami 2023: हिन्दू धर्म पूरे विश्व भर में अपनी अनोखी परंपराओं और त्योहारों के लिए जाना जाता है। इसके सभी त्योहार और वैदिक परंपरायें नयी पीढ़ी को समाज से जोड़ने का काम करती है। हिन्दू धर्म विविधता से भरा धर्म है। इसमें हर प्रांत और समुदाए के कुछ बहुत प्रचलित एवं महत्वपूर्ण अपने व्रत त्योहार हैं। 

ऐसे ही अहोई अष्टमी (Ahoi Ashtami) का एक पर्व है जो उत्तर भारत में मनाया जाता है। यह पर्व हर वर्ष हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए व्रत रख कर अहोई माता से प्रार्थना करती है।

अहोई अष्टमी व्रत कथा(Legend Of Ahoi Ashtami)

प्राचीन काल में एक गाँव में साहूकाररहता था, उसके सात पुत्र और सात बहुएं थी। साहूकारकी एक पुत्री भी थी जिसका विवाह हो चुका था और वो अपने ससुराल में रहती थी। साहूकार की बेटी दीपावली पे अपने मायके आयी हुई थी। साहूकार के घर दीपावली की तैयारियां चल रही थी तो उसकी बेटी भी दीपावली की तैयारी में अपनी भाभियों का हाथ बटाने लगी। दीपावली पर घर को लीपना था इसलिए साहूकार की बहुएं और बेटी मिट्टी लाने के लिए जंगल में गई। साहूकारकी बेटी जहां मिट्टी काट रही थी उस स्थान पर स्याही (साही) अपने बेटों से साथ रहती थी। मिट्टी काटते हुए ग़लती से साहूकार की बेटी की कुदाल के चोट से स्याही का एक बच्चा मर गया। यह देख स्याही साहूकार की बेटी पर क्रोधित होकर बोली मैं तुम्हारी कोख बांधूंगी।

यह सुन साहूकार की बेटी साही से बोली की ये अनजाने में हुई गलती है मुझे माफ़ कर दीजिए और मेरी कोख मत बंधिए पर साही अपने पुत्र की मृत्यु से दुखी और साहूकार की बेटी पर अत्यंत क्रोधित थी इसलिए साही ने उसकी बात नहीं सुनी। तब साहूकार की बेटी ने एक एक कर अपनी सातों भाभियों से प्रार्थना की वो उसके बदले अपनी कोख बंधवा ले पर उसकी छ: भाभियों ने मना कर दिया। सबसे छोटी भाभी घर में नयी थी और उस ने सोचा कि अगर में मना करूँगी तो सास बुरा मान जाएगी इसलिए उसने हाँ कर दी और अपनी ननद के बदले अपनी कोख बंधवा ली। इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे होते थे वो सात दिन बाद मर जाते थे। सात पुत्रों की इस प्रकार मृत्यु होने के बाद उसने पंडित को बुलवाकर सारा क़िस्सा बताया। पंडित जी ने उसे सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी।

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पंडित जी की सलाह के अनुसार छोटी बहु ने सुरही गाय की वर्षों तक सेवा की। उसकी सेवा से प्रसन्न हो कर सुरही गाय ने साहूकार की छोटी बहु से कहा ‘हे पुत्री, तू किस लिए मेरी इतनी सेवा कर रही है, बता तुझे मुझ से क्या चहिये?’ जो कुछ तेरी इच्छा हो वह मुझ से मांग ले। साहूकार की बहू ने सुरही गाय को सारा क़िस्सा बताया और कहा कि स्याहु माता ने मेरी कोख बांध दी है जिससे मेरे बच्चे नहीं बचते हैं. यदि आप मेरी कोख खुलवा दे तो मैं आपका उपकार मानूंगी। सुरही गाय ने सारा क़िस्सा सुन बहु से कहा ‘ पुत्री, में तेरी सेवा से बहुत प्रसन्न हूँ, में तुझे सात समुद्र पार स्याहु माता के पास ले चलती हूँ’।

चलते-चलते दोनो रास्ते में थक जाने पर आराम करने लगी, तभी अचानक साहूकार की छोटी बहू की नज़र एक ओर गयी और उस ने देखा कि एक सांप गरूड़ पंखनी के बच्चे को डंसने जा रहा है, यह देखकर उसने सांप को मार डाला। उसी वक्त गरुण पंखनी वहाँ आ गयी और खून बिखरा हुआ देखकर उसे लगा कि छोटी बहु ने उसके बच्चे के मार दिया है इस पर वह छोटी बहू को चोंच से मारना शुरू कर देती है। छोटी बहू इस पर कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है। गरूड़ पंखनी इस पर खुश होती है और सुरही सहित उन दोनो को स्याही के पास पहुंचा देती है। वहां छोटी बहू स्याहु की भी सेवा करती है. स्याहु छोटी बहू की सेवा से प्रसन्न होकर छोटी बहू को सात पुत्र और सात पुत्रवधुओं का आर्शीवाद देती है। यह सुन छोटी बहु स्याहु से कहती है की आप का आशीर्वाद पूरा नहीं हो पायेगा औरसारा क़िस्सा बताती है और कहती है की आप ने मेरी कोख बांध रखी है। स्याहु को सब याद आ जाता है तो वो छोटी बहू को कहती है की तू घर जाने पर अहोई माता का पूरे भक्ति भाव से व्रत रख कर पूजा करना और सात सात अहोई बनाकर सात कड़ाही देना। अहोई माता के आशीर्वाद से तेरी कोख खुल जाएगी और मेरे कथन के अनुसार तेरे सात पुत्र और सात पुत्रवधू होंगे।

तब साहूकार की छोटी बहू घरलोट कर स्याहु की सलाह के अनुसार अहोई माता का पूरे भक्ति भाव से व्रत रख पूजा करी और सात अहोई बनाकर सातकड़ाही देकर उजमन पन किया। इसके फल स्वरूप उसके सात पुत्र हुए और उनकी सात बहुए आयी।

अहोई अष्टमी 2023 पूजा शुभ मुहूर्त (Ahoi Ashtami 2023)

  • दिनांक : नवम्बर 5 , 2023
  • अहोई अष्टमी पूजा मुहूर्त: साय काल 5 बजकर 33 मिनट से साय काल 6 बजकर 52 मिनट तक ( अवधि – 01 घण्टा 18 मिनट्स)
  • तारों को देखने का समय : साय काल 5 बजकर 18 मिनट
  • अहोई अष्टमी के दिन चन्द्रोदय समय : रात 12 बजकर 02 मिनट, नवम्बर 6
  • अष्टमी तिथि प्रारम्भ : नवम्बर 5, 2023 को 12:59 ए एम बजे
  • अष्टमी तिथि समाप्त : नवम्बर 6, 2023 को 03:18 ए एम बज

अहोई अष्टमी व्रत पूजा विधि 

उत्तर भारत के राज्यों में अहोई अष्टमी का व्रत निम्नलिखित तरीके से मनाया जाता है।

  • प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त(सूर्योदयः से पहले) सुबह जल्दी उठ कर स्नान करने के बाद कुछ फल इत्यादि खाते है।
  • तत्पश्यात पूजा के समय संकल्प ले की ‘हे अहोई माता यह व्रत मैं अपने संतान और  की संतान की लम्बी आयु एवं अच्छे भविष्य की कामना के लिए कर रही हूँ, और माता से इसे सफल करने का आग्रह करे। इस व्रत में माता पार्वती की भी पूजा करि जाती है क्योकि वे अनहोनी से बचाने वाली माता है|
  • अहोई माता की पूजा के अनुसार गेरू से अहोई माता का एक चित्र एवं स्याहु और उसके सात पुत्रो का भी चित्र दिवार पर बनाया जाता है|
  • इसके बाद माता के सामने एक कटोरी में चावल, सिंगाड़े एवं मूली रखी जाती है|
  • माता के सामने दिया रखे एवं कहानी सुने या सुनाए| कहानी सुनते या सुनाते समय हाथ में लिए चावलों को साडी एवं दुपट्टे में बाँध दे|
  • पूजा करने से पहले मिट्टी के कर्वे में और लोटे में पानी भर कर रखते है|
  • यह सुनिश्चित कीजिये की करवा करवा चौथ के समय का होना चाहिए|
  • इसके बाद पूरे दिन निर्जला व्रत रखने का संकल्प ले|
  • शाम के वक्त अहोई माता को चौदह पूरी या मठरी या काजू का भोग लगाए|
  • शाम को तारे निकल जाने पर चावल एवं जल तारो को अर्पित किया जाता है और व्रत खोलते है।

अहोई अष्टमी आरती ( Ahoi Ashtami Arti)

जय अहोई माता जय अहोई माता ।
तुमको निसदिन ध्यावत हरी विष्णु धाता ।।

ब्रम्हाणी रुद्राणी कमला तू ही है जग दाता ।
जो कोई तुमको ध्यावत नित मंगल पाता ।।

तू ही है पाताल बसंती तू ही है सुख दाता ।
कर्म प्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता ।।

जिस घर थारो वास वही में गुण आता ।
कर न सके सोई कर ले मन नहीं घबराता ।।

तुम बिन सुख न होवे पुत्र न कोई पता ।
खान पान का वैभव तुम बिन नहीं आता ।।

शुभ गुण सुन्दर युक्ता क्षीर निधि जाता ।
रतन चतुर्दश तोंकू कोई नहीं पाता ।।

श्री अहोई माँ की आरती जो कोई गाता ।
उर उमंग अति उपजे पाप उतर जाता ।।

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April 2022 Vrat and Festival – अप्रैल 2022 में पड़ने वाले व्रत एवं त्यौहार https://astrodeeva.com/april-2022-vrat-and-festival-april-2022-vrat-and-festival/ https://astrodeeva.com/april-2022-vrat-and-festival-april-2022-vrat-and-festival/#respond Tue, 29 Mar 2022 11:30:54 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3079 April 2022 Vrat and Festival – अप्रैल 2022 व्रत एवं त्यौहार दिनांक  व्रत एवं त्यौहार  दिन / वार  1 अप्रैल 2022 चैत्र अमावस्या, इष्टि शुक्रवार 2 अप्रैल 2022 चैत्र नवरात्रि घटस्थापना पूजन,  उगादी , गुड़ी पड़वा, झूलेलाल जयन्ती शनिवार 3 अप्रैल 2022 मत्स्य जयन्ती, स्वायम्भुव मन्वादि रविवार 4 अप्रैल 2022 गौरी पूजा, गणगौर, मासिक कार्तिगाई सोमवार 5 अप्रैल 2022 विनायक चतुर्थी,  लक्ष्मी पञ्चमी, शुक्ल पञ्चमी मंगलवार 6 अप्रैल 2022 रोहिणी व्रत, स्कन्द […]

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April 2022 Vrat and Festival – अप्रैल 2022 व्रत एवं त्यौहार

दिनांक 

व्रत एवं त्यौहार 

दिन / वार 

अप्रैल 2022

चैत्र अमावस्या, इष्टि

शुक्रवार

अप्रैल 2022

चैत्र नवरात्रि घटस्थापना पूजन,  उगादी , गुड़ी पड़वा, झूलेलाल जयन्ती

शनिवार

अप्रैल 2022

मत्स्य जयन्ती, स्वायम्भुव मन्वादि

रविवार

अप्रैल 2022

गौरी पूजा, गणगौर, मासिक कार्तिगाई

सोमवार

5 अप्रैल 2022

विनायक चतुर्थी,  लक्ष्मी पञ्चमी, शुक्ल पञ्चमी

मंगलवार

6 अप्रैल 2022

रोहिणी व्रतस्कन्द षष्ठी

बुधवार

7 अप्रैल 2022

यमुना छठ

बृहस्पतिवार

8 अप्रैल 2022

चैत्र नवपद ओली प्रारम्भ

शुक्रवार

9 अप्रैल 2022

मासिक दुर्गाष्टमी

शनिवार

10 अप्रैल 2022

राम नवमी, स्वामीनारायण जयन्ती, महातारा जयन्ती

रविवार

12 अप्रैल 2022

कामदा एकादशी

मंगलवार

13 अप्रैल 2022

वैष्णव कामदा एकादशी, वामन द्वादशी

बुधवार

14 अप्रैल 2022

महावीर स्वामी जयन्ती, मेष संक्रान्ति, सूर्य का मीन से मेष राशि में प्रवेश, पुथन्डू, अम्बेडकर जयन्ती, बैसाखी, प्रदोष व्रत

गुरुवार

15 अप्रैल 2022

विषु कानी, पहेला वैशाख, गुड फ्राइडे

शुक्रवार

16 अप्रैल 2022

हनुमान जयन्ती,  शुक्ल पूर्णिमा, चैत्र नवपद ओली पूर्ण, चैत्र पूर्णिमा व्रत, स्वारोचिष मन्वादि

शनिवार

17 अप्रैल 2022

वैशाख प्रारम्भ, ईस्टर, इष्टि

रविवार

19 अप्रैल 2022

विकट संकष्टी चतुर्थी

मंगलवार

23 अप्रैल 2022

कालाष्टमी

शनिवार

26 अप्रैल 2022

बरूथिनी एकादशी, वल्लभाचार्य जयन्ती

मंगलवार

28 अप्रैल 2022

प्रदोष व्रत

बृहस्पतिवार

29 अप्रैल 2022

मासिक शिवरात्रि,

 शुक्रवार

30 अप्रैल 2022

दर्श अमावस्या,

वैशाख अमावस्या

शनिवार

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Papmochani Ekadashi 2022 – पापमोचनी एकादशी https://astrodeeva.com/papmochani-ekadashi-2022-papmochani-ekadashi/ https://astrodeeva.com/papmochani-ekadashi-2022-papmochani-ekadashi/#respond Sat, 26 Mar 2022 04:30:13 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3057 हिन्दू या सनातन धर्म विविधता से परिपूर्ण है यह वास्तव में एक जीवन पद्धति है। हर वर्ष  होने वाले तीज, त्यौहार, कर्म कांड ही हिन्दू धर्म की विविधता और विशालता को दर्शाते हैं। हिन्दू धर्म में शुभ तिथियों और त्यौहार का बड़ा महत्व है। विभिन्न हिंदू व्रतों के बीच, एकादशी व्रत का सर्वोच्च स्थान है। हिंदू […]

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हिन्दू या सनातन धर्म विविधता से परिपूर्ण है यह वास्तव में एक जीवन पद्धति है। हर वर्ष  होने वाले तीज, त्यौहार, कर्म कांड ही हिन्दू धर्म की विविधता और विशालता को दर्शाते हैं। हिन्दू धर्म में शुभ तिथियों और त्यौहार का बड़ा महत्व है। विभिन्न हिंदू व्रतों के बीच, एकादशी व्रत का सर्वोच्च स्थान है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक माह में दो पक्ष होते हैं, दोनों पक्षों शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की ग्याहरवीं तिथि को एकादशी का व्रत किया जाता है। इस तरह  एक महीने में दो एकादशियां, और एक वर्ष में 24 एकादशियां होती हैं।हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की ग्याहरवीं तिथि को पापमोचनी (Papmochani Ekadashi) अथवा पापों को भस्म करने वाली एकादशी के रूप में मनाया जाता हैं। इस मोह माया से भरे संसार में ऐसा कोई मनुष्य नहीं जन्मा जिससे अनजाने में कोई पाप नहीं हुआ हो इसलिए पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) का विशेष महत्व है इस एकादशी को करने से जाने-अनजाने में हुए सभी तरह के पाप के दोष से मुक्ति प्राप्त होती हैं।

पापमोचनी एकादशी 2022 (Papmochani Ekadashi 2022)

दिनांक : 28 मार्च 2022
वार : सोमवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ : 27 मार्च 2022 को 06:04 पी एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त : 28 मार्च 2022 को 04:15 पी एम बजे
पारण (व्रत तोड़ने का) समय : 29 मार्च 2022 को 06:15 ए एम से 08:43 ए एम
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय02:38 पी एम

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पापमोचनी एकादशी कथा (Story of Papmochani Ekadashi)

 पुराणों के अनुसार एक बार अर्जुन ने कहा- “हे कमलनयन! मैं ज्यों-ज्यों एकादशियों के व्रतों की कथाएँ सुन रहा हूँ, त्यों-त्यों अन्य एकादशियों के व्रतों की कथाएँ सुनने की मेरी जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही है। हे मधुसूदन! अब कृपा कर आप चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के विषय में बतलाइये। इस एकादशी का नाम क्या है? इसमें कौन-से देवता का पूजन किया जाता है तथा इस व्रत का क्या विधान है? हे श्रीकृष्ण! यह सब आप मुझे विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें।”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! एक बार यही प्रश्न पृथ्वीपति मान्धाता ने लोमश ऋषि से किया था, जो कुछ लोमश ऋषि ने राजा मान्धाता को बताया था, वही मैं तुमसे कह रहा हूँ। राजा मान्धाता ने धर्म के गुह्यतम रहस्यों के ज्ञाता महर्षि लोमश से पूछा- ‘हे ऋषिश्रेष्ठ! मनुष्य के पापों का मोचन किस प्रकार सम्भव है? कृपा कर कोई ऐसा सरल उपाय बतायें, जिससे सहज ही पापों से छुटकारा मिल जाए।’

महर्षि लोमश ने कहा- ‘हे नृपति! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम पापमोचिनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) है। उसके व्रत के प्रभाव से मनुष्यों के अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं। मैं तुम्हें इस व्रत की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो- प्राचीन समय में चैत्ररथ नामक एक वन था। उसमें अप्सराएँ किन्नरों के साथ विहार किया करती थीं। वहाँ सदैव वसन्त का मौसम रहता था, अर्थात उस जगह सदा नाना प्रकार के पुष्प खिले रहते थे। कभी गन्धर्व कन्‍याएँ विहार किया करती थीं, कभी देवेन्द्र अन्य देवताओं के साथ क्रीड़ा किया करते थे।

उसी वन में मेधावी नाम के एक ऋषि भी तपस्या में लीन रहते थे। वे शिवभक्त थे। एक दिन मञ्जुघोषा नामक एक अप्सरा ने उनको मोहित कर उनकी निकटता का लाभ उठाने की चेष्टा की, इसलिए वह कुछ दूरी पर बैठ वीणा बजाकर मधुर स्वर में गाने लगी। उसी समय शिव भक्त महर्षि मेधावी को कामदेव भी जीतने का प्रयास करने लगे। कामदेव ने उस सुन्दर अप्सरा के भ्रू का धनुष बनाया। कटाक्ष को उसकी प्रत्यन्चा बनाई और उसके नेत्रों को मञ्जुघोषा अप्सरा का सेनापति बनाया। इस तरह कामदेव अपने शत्रुभक्त को जीतने को तैयार हुआ। उस समय महर्षि मेधावी भी युवावस्था में थे और काफी हृष्ट-पुष्ट थे। उन्होंने यज्ञोपवीत तथा दण्ड धारण कर रखा था। वे दूसरे कामदेव के समान प्रतीत हो रहे थे। उस मुनि को देखकर कामदेव के वश में हुई मञ्जुघोषा ने धीरे-धीरे मधुर वाणी से वीणा पर गायन शुरू किया तो महर्षि मेधावी भी मञ्जुघोषा के मधुर गाने पर तथा उसके सौन्दर्य पर मोहित हो गए। वह अप्सरा मेधावी मुनि को कामदेव से पीड़ित जानकर उनसे आलिङ्गन करने लगी।

महर्षि मेधावी उसके सौन्दर्य पर मोहित होकर शिव रहस्य को भूल गए और काम के वशीभूत होकर उसके साथ रमण करने लगे। काम के वशीभूत होने के कारण मुनि को उस समय दिन-रात का कुछ भी ज्ञान न रहा और काफी समय तक वे रमण करते रहे। तदुपरान्त मञ्जुघोषा उस मुनि से बोली- ‘हे ऋषिवर! अब मुझे बहुत समय हो गया है, अतः स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये।’

अप्सरा की बात सुनकर ऋषि ने कहा- ‘हे मोहिनी! सन्ध्या को तो आयी हो, प्रातःकाल होने पर चली जाना।’

ऋषि के ऐसे वचनों को सुनकर अप्सरा उनके साथ रमण करने लगी। इसी प्रकार दोनों ने साथ-साथ बहुत समय बिताया।

मञ्जुघोषा ने एक दिन ऋषि से कहा- ‘हे विप्र! अब आप मुझे स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये।’

मुनि ने इस बार भी वही कहा- ‘हे रूपसी! अभी ज्यादा समय व्यतीत नहीं हुआ है, कुछ समय और ठहरो।’

मुनि की बात सुन अप्सरा ने कहा- ‘हे ऋषिवर! आपकी रात तो बहुत लम्बी है। आप स्वयं ही सोचिये कि मुझे आपके पास आये कितना समय हो गया। अब और ज्यादा समय तक ठहरना क्या उचित है?’

अप्सरा की बात सुन मुनि को समय का बोध हुआ और वह गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगे। जब उन्हें समय का ज्ञान हुआ कि उन्हें रमण करते सत्तावन (57) वर्ष व्यतीत हो चुके हैं तो उस अप्सरा को वह काल का रूप समझने लगे। इतना ज्यादा समय भोग-विलास में व्यर्थ चला जाने पर उन्हें बड़ा क्रोध आया। अब वह भयंकर क्रोध में जलते हुए उस तप नाश करने वाली अप्सरा की तरफ भृकुटी तानकर देखने लगे। क्रोध से उनके अधर काँपने लगे और इन्द्रियाँ बेकाबू होने लगीं। क्रोध से थरथराते स्वर में मुनि ने उस अप्सरा से कहा- ‘मेरे तप को नष्ट करने वाली दुष्टा! तू महा पापिन और बहुत ही दुराचारिणी है, तुझ पर धिक्कार है। अब तू मेरे शाप (श्राप) से पिशाचिनी बन जा।’

मुनि के क्रोधयुक्त शाप (श्राप) से वह अप्सरा पिशाचिनी बन गई। यह देख वह व्यथित होकर बोली- ‘हे ऋषिवर! अब मुझ पर क्रोध त्यागकर प्रसन्न होइए और कृपा करके बताइये कि इस शाप (श्राप) का निवारण किस प्रकार होगा? विद्वानों ने कहा है, साधुओं की सङ्गत अच्छा फल देने वाली होती है और आपके साथ तो मेरे बहुत वर्ष व्यतीत हुए हैं, अतः अब आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइए, अन्यथा लोग कहेंगे कि एक पुण्य आत्मा के साथ रहने पर मञ्जुघोषा को पिशाचिनी बनना पड़ा।’ मञ्जुघोषा की बात सुनकर मुनि को अपने क्रोध पर अत्यन्त ग्लानि हुई साथ ही अपनी अपकीर्ति का भय भी हुआ, अतः पिशाचिनी बनी मञ्जुघोषा से मुनि ने कहा- ‘तूने मेरा बड़ा बुरा किया है, किन्तु फिर भी मैं तुझे इस शाप (श्राप) से मुक्ति का उपाय बतलाता हूँ। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी है, उसका नाम पापमोचिनी(Papmochani Ekadashi) है। उस एकादशी का उपवास करने से तेरी पिशाचिनी की देह से मुक्ति हो जाएगी।’

ऐसा कहकर मुनि ने उसको व्रत का सब विधान समझा दिया। फिर अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए वे अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गये।

च्यवन ऋषि ने अपने पुत्र मेधावी को देखकर कहा- ‘हे पुत्र! ऐसा क्या किया है तूने कि तेरे सभी तप नष्ट हो गए हैं? जिससे तुम्हारा समस्त तेज मलिन हो गया है?’

मेधावी मुनि ने लज्जा से अपना सिर झुकाकर कहा- ‘पिताश्री! मैंने एक अप्सरा से रमण करके बहुत बड़ा पाप किया है। इसी पाप के कारण सम्भवतः मेरा सारा तेज और मेरे तप नष्ट हो गए हैं। कृपा करके आप इस पाप से छूटने का उपाय बतलाइये।’

ऋषि ने कहा- ‘हे पुत्र! तुम चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी का विधि तथा भक्तिपूर्वक उपवास करो, इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।’

अपने पिता च्यवन ऋषि के वचनों को सुनकर मेधावी मुनि ने पापमोचिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। उसके प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए। मञ्जुघोषा अप्सरा भी पापमोचिनी एकादशी का उपवास करने से पिशाचिनी की देह से छूट गई और पुनः अपना सुन्दर रूप धारण कर स्वर्गलोक चली गई। लोमश मुनि ने कहा-हे राजन! इस पापमोचिनी एकादशी के प्रभाव से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी की कथा के श्रवण व पठन से एक हजार गौदान करने का फल प्राप्त होता है। इस उपवास के करने से ब्रह्म हत्या करने वाले, स्वर्ण चुराने वाले, मद्यपान करने वाले, अगम्या गमन करने वाले आदि भयंकर पाप भी नष्ट हो जाते हैं और अन्त में स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।”

पापमोचनी एकादशी व्रत विधि 

Papmochani Ekadashi व्रत के विषय में भविष्योत्तर पुराण में विस्तार से वर्णन किया गया है। इस व्रत में भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है। इस व्रत को रखने वाले व्रती को दशमी तिथि को एक बार सात्विक भोजन करना चहिये और मन से भोग विलास की भावना को निकालकर श्री हरि में मन को लगाना चहिये।

  • व्रती एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करे। स्नान करते हुए इस पवित्र नदियों को समर्पित मंत्र का जाप कर सकते हैं।

गंगा च यमुना चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेसमिन सानिधिम कुरु”

(अर्थात्- इस पानी में, मैं गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी नदियों से दिव्य जल की उपस्थिति का आह्वान करता हूं)

  • पूजा स्थल पर पीले कुशा आसन पर बैठकर घी का दीपक जलाकर व्रत का संकल्प करें।
  • संकल्प के उपरान्त षोड्षोपचार सहित श्री विष्णु की पूजा करें।
  • पूजा के पश्चात भगवान के समक्ष बैठकर भग्वद् कथा का पाठ अथवा श्रवण करें।
  • एकादशी तिथि को जागरण करने से कई गुणा पुण्य मिलता है अत: रात्रि में भी निराहार रहकर भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें।
  • द्वादशी के दिन प्रात: स्नान करके विष्णु भगवान की पूजा करें फिर ब्रह्मणों को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करें।
  • तत्पश्चात व्रत का पारण करें

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस संसार में जो भी मनुष्य भगवान श्री विष्णु का आशीर्वाद पाना चाहता है, उसे एकादशी का व्रत जरुर करना चाहिए। एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। एकादशी के व्रत रखने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होने के साथ ही सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

 

**(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैंजिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

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पूजा-पाठ से सम्बंधित 30 जरूरी नियम जो हर हिन्दू को पता होने चाहिए https://astrodeeva.com/%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a0-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%a4-30-%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%b0/ https://astrodeeva.com/%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a0-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%a4-30-%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%b0/#respond Mon, 10 May 2021 11:37:14 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2038 हिन्दू धर्म में नियमित पूजा पाठ का बहुत महत्व है। सुख और समृद्धिशाली जीवन के लिए देवी-देवताओं के पूजन की परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है और आज भी हिन्दू बड़ी संख्या में इस परंपरा को निभाते हैं। पूजन से हमारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, लेकिन पूजा करते समय कुछ खास नियमों […]

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हिन्दू धर्म में नियमित पूजा पाठ का बहुत महत्व है। सुख और समृद्धिशाली जीवन के लिए देवी-देवताओं के पूजन की परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है और आज भी हिन्दू बड़ी संख्या में इस परंपरा को निभाते हैं। पूजन से हमारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, लेकिन पूजा करते समय कुछ खास नियमों का पालन भी किया जाना चाहिए। अन्यथा पूजन का शुभ फल पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं हो पाता है। यहां हम शास्त्रों में वर्णित 30 ऐसे नियम बता रहे हैं जो सामान्य पूजन में भी ध्यान रखने चाहिए। इन बातों का ध्यान रखने पर पूजा सफल और शुभ फल प्राप्त होते हैं।

ये नियम इस प्रकार हैं …

  1. सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु, ये पंचदेव कहलाते हैं, इनकी पूजा सभी कार्यों में अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए । प्रतिदिन पूजन करते समय इन पंचदेव का ध्यान करना चाहिए। इससे लक्ष्मी कृपा और समृद्धि प्राप्त होती है।
  2. शिवजी,गणेशजी और भैरवजी को तुलसी नहीं चढ़ानी चाहिए।
  3. मां दुर्गा को दूर्वा (एक प्रकार की घास) नहीं चढ़ानी चाहिए। यह गणेशजी को विशेष रूप से अर्पित की जाती है।
  4. सूर्य देव को शंख के जल से अर्घ्य नहीं देना चाहिए ।
  5. तुलसी का पत्ता बिना स्नान किए नहीं तोड़ना चाहिए । शास्त्रों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति बिना नहाए ही तुलसी के पत्तों को तोड़ता है तो पूजन में ऐसे पत्ते भगवान द्वारा स्वीकार नहीं किए जाते हैं।
  6. शास्त्रों के अनुसार देवी-देवताओं का पूजन दिन में पांच बार करना चाहिए । सुबह 5 से 6 बजे तक ब्रह्म मुहूर्त में पूजन और आरती होनी चाहिए। इसके बाद प्रात: 9 से 10 बजे तक दूसरी बार का पूजन। दोपहर में तीसरी बार पूजन करना चाहिए। इस पूजन के बाद भगवान को शयन करवाना चाहिए। शाम के समय चार-पांच बजे पुन: पूजन और आरती। रात को 8-9 बजे शयन आरती करनी चाहिए। जिन घरों में नियमित रूप से पांच बार पूजन किया जाता है, वहां सभी देवी-देवताओं का वास होता है और ऐसे घरों में धन-धान्य की कोई कमी नहीं होती है।
  7. प्लास्टिक की बोतल में या किसी अपवित्र धातु के बर्तन में गंगाजल नहीं रखना चाहिए । अपवित्र धातु जैसे एल्युमिनियम और लोहे से बने बर्तन। गंगाजल तांबे के बर्तन में रखना शुभ रहता है।
  8. स्त्रियों को और अपवित्र अवस्था में पुरुषों को शंख नहीं बजाना चाहिए । यह इस नियम का पालन नहीं किया जाता है तो जहां शंख बजाया जाता है, वहां से देवी लक्ष्मी चली जाती हैं।
  9. मंदिर और देवी-देवताओं की मूर्ति के सामने कभी भी पीठ दिखाकर नहीं बैठना चाहिए ।
  10. केतकी का फूल शिवलिंग पर अर्पित नहीं करना चाहिए ।
  11. किसी भी पूजा में मनोकामना की सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ानी चाहिए । दक्षिणा अर्पित करते समय अपने दोषों को छोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। दोषों को जल्दी से जल्दी छोड़ने पर मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होंगी।
  12. दूर्वा (एक प्रकार की घास) रविवार को नहीं तोडऩी चाहिए।
  13. मां लक्ष्मी को विशेष रूप से कमल का फूल अर्पित किया जाता है । इस फूल को पांच दिनों तक जल छिड़क कर पुन: चढ़ा सकते हैं।
  14. शास्त्रों के अनुसार शिवजी को प्रिय बिल्व पत्र छह माह तक बासी नहीं माने जाते हैं । अत: इन्हें जल छिड़क कर पुन: शिवलिंग पर अर्पित किया जा सकता है।
  15. तुलसी के पत्तों को 11 दिनों तक बासी नहीं माना जाता है। इसकी पत्तियों पर हर रोज जल छिड़कर पुन: भगवान को अर्पित किया जा सकता है।
  16. आमतौर पर फूलों को हाथों में रखकर हाथों से भगवान को अर्पित किया जाता है । ऐसा नहीं करना चाहिए। फूल चढ़ाने के लिए फूलों को किसी पवित्र पात्र में रखना चाहिए और इसी पात्र में से लेकर देवी-देवताओं को अर्पित करना चाहिए।
  17. तांबे के बर्तन में चंदन, घिसा हुआ चंदन या चंदन का पानी नहीं रखना चाहिए ।
  18. हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि कभी भी दीपक से दीपक नहीं जलाना चाहिए । शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति दीपक से दीपक जलते हैं, वे रोगी होते हैं।
  19. बुधवार और रविवार को पीपल के वृक्ष में जल अर्पित नहीं करना चाहिए ।
  20. पूजा हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख रखकर करनी चाहिए । यदि संभव हो सके तो सुबह 6 से 8 बजे के बीच में पूजा अवश्य करें।
  21. पूजा करते समय आसन के लिए ध्यान रखें कि बैठने का आसन ऊनी होगा तो श्रेष्ठ रहेगा ।
  22. घर के मंदिर में सुबह एवं शाम को दीपक अवश्य जलाएं । एक दीपक घी का और एक दीपक तेल का जलाना चाहिए।
  23. पूजन-कर्म और आरती पूर्ण होने के बाद उसी स्थान पर खड़े होकर 3 परिक्रमाएं अवश्य करनी चाहिए।
  24. रविवार, एकादशी, द्वादशी, संक्रान्ति तथा संध्या काल में तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ना चाहिए ।
  25. भगवान की आरती करते समय ध्यान रखें ये बातें- भगवान के चरणों की चार बार आरती करें , नाभि की दो बार और मुख की एक या तीन बार आरती करें । इस प्रकार भगवान के समस्त अंगों की कम से कम सात बार आरती करनी चाहिए।
  26. पूजाघर में मूर्तियाँ 1, 3, 5, 7, 9, 11 इंच तक की होनी चाहिए, इससे बड़ी नहीं तथा खड़े हुए गणेश जी, सरस्वतीजी, लक्ष्मीजी, की मूर्तियाँ घर में नहीं होनी चाहिए।
  27. गणेश या देवी की प्रतिमा तीन तीन, शिवलिंग दो, शालिग्राम दो, सूर्य प्रतिमा दो, गोमती चक्र दो की संख्या में कदापि न रखें ।
  28. अपने मंदिर में सिर्फ प्रतिष्ठित मूर्ति ही रखें उपहार , काँच, लकड़ी एवं फायबर की मूर्तियां न रखें एवं खण्डित , जलीकटी फोटो और टूटा काँच तुरंत हटा दें। शास्त्रों के अनुसार खंडित मूर्तियों की पूजा वर्जित की गई है। जो भी मूर्ति खंडित हो जाती है, उसे पूजा के स्थल से हटा देना चाहिए और किसी पवित्र बहती नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए। खंडित मूर्तियों की पूजा अशुभ मानी गई है। इस संबंध में यह बात ध्यान रखने योग्य है कि सिर्फ शिवलिंग कभी भी, किसी भी अवस्था में खंडित नहीं माना जाता है।
  29. मंदिर के ऊपर भगवान के वस्त्र, पुस्तकें एवं आभूषण आदि भी न रखें मंदिर में पर्दा अति आवश्यक है अपने पूज्य माता -पिता तथा पित्रों का फोटो मंदिर में कदापि न रखें , उन्हें घर के नैऋत्य कोण में स्थापित करें।
  30. विष्णु की चार, गणेश की तीन, सूर्य की सात, दुर्गा की एक एवं शिव की आधी परिक्रमा कर सकते हैं ।

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Karwa Chauth 2020: करवा चौथ व्रत कथा, शुभ मुहूर्त और नियम https://astrodeeva.com/karwa-chauth-2020-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%ad-%e0%a4%ae%e0%a5%81/ https://astrodeeva.com/karwa-chauth-2020-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%ad-%e0%a4%ae%e0%a5%81/#comments Mon, 02 Nov 2020 15:31:16 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1265 हिन्दू धर्म में हर तिथि किसी न किसी भगवान या देवताओं की समर्पित होती है इसलिए हिन्दू धर्म में हर माह कोई ना कोई व्रत और त्यौहार आता है और इन विशेष तिथियों पर व्रत और उपवास का बहुत महत्व होता है। ऐसे ही हर वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को जो […]

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हिन्दू धर्म में हर तिथि किसी न किसी भगवान या देवताओं की समर्पित होती है इसलिए हिन्दू धर्म में हर माह कोई ना कोई व्रत और त्यौहार आता है और इन विशेष तिथियों पर व्रत और उपवास का बहुत महत्व होता है। ऐसे ही हर वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को जो व्रत किया जाता है वह उत्तर भारत की विवाहित महिलाओं का महत्वपूर्ण व्रत है। इस व्रत को करवा चौथ कहते है।

करवा चौथ का शाब्दिक अर्थ है ‘करवा’ अर्थारत मिट्टी का बर्तन और चौथ अर्थारत माह का चौथा दिन। सुहागिने इस एक दिवसीय पर्व को उत्साह एवं श्रद्धा से मनाती है। इस दिन विवाहित महिलाएं सूर्योदय से चंद्रोदय तक कठोर निर्जला व्रत रख कर अपने पति के जीवन की सुरक्षा तथा दीर्धायु सुनिश्चित करने के लिए प्रार्थना करती हैं। यद्यपि पूरे विश्व में हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले लोग इस पर्व को विधि पूर्वक धूमधाम से मनाते है लेकिन करवा चौथ मुख्यत: हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान राज्यों में मनाया जाता है।

करवा चौथ 2020

दिनांक: नवम्बर 4, 2020
वार: बुधवार
करवा चौथ पूजा मुहूर्त – 05:34 पी एम से 06:52 पी एम
(अवधि – 01 घण्टा 18 मिनट्स)
करवा चौथ व्रत समय – 06:35 ए एम से 08:12 पी एम
(अवधि – 13 घण्टे 37 मिनट्स)
करवा चौथ के दिन चन्द्रोदय – 08:12 पी एम
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ – नवम्बर 04, 2020 को 03:24 ए एम बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त – नवम्बर 05, 2020 को 05:14 ए एम बजे

करवा चौथ व्रत कथा

बहुत समय पहले एक शहर में एक साहूकार रहता था। वेदशर्मा का विवाह लीलावती से हुआ था जिससे उसके सात पुत्र और वीरावती नाम की एक गुणवान पुत्री थी। क्योंकि सात भाईयों की वह केवल एक अकेली बहन थी जिसके कारण वह अपने माता-पिता के साथ-साथ अपने भाईयों की भी लाड़ली थी।

शादी के बाद वीरावती जब अपने मायके आयी तब उसने अपनी भाभियों के साथ पति की लम्बी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा। करवा चौथ के व्रत के दौरान वीरावती को भूख सहन नहीं हुई और कमजोरी के कारण वह मूर्छित हो गई।

सभी भाईयों से अपनी लाड़ली बहन की यह अवस्था सहन नहीं हो पा रही थी। उन्होंने वीरवती को भोजन करने को कहा पर वीरावती जो कि एक पतिव्रता नारी है चन्द्रमा के दर्शन किये बिना भोजन ग्रहण करने से मना कर दिया। तब सभी भाईयों ने मिलकर एक योजना बनाई जिससे उनकी बहन भोजन ग्रहण कर ले। उनमें से एक भाई कुछ दूर वट के वृक्ष पर हाथ में दीपक लेकर चढ़ गया। उसके बाकी सभी भाईयों ने अपनी लाड़ली बहन से कहा कि चन्द्रोदय हो गया है और उसे छत पर जा कर चन्द्रमा के दर्शन कर लेने चहिये।

वीरावती ने दीपक को देख विश्वास कर लिया कि चन्द्रमा वृक्ष के पीछे निकल आया है। और दीपक को चन्द्रमा समझ अर्घ अर्पण कर अपने व्रत को तोड़ा। वीरावती ने जब भोजन करना प्रारम्भ किया तो उसे अशुभ संकेत मिलने लगे। पहले कौर में उसे बाल मिला, दुसरें में उसे छींक आई और तीसरे कौर में उसे अपने ससुराल वालों से निमंत्रण मिला। अपने ससुराल पहुँचने के बाद उसने अपने पति के मृत शरीर को पाया।

अपने पति के मृत शरीर को देखकर वीरावती रोने लगी और करवा चौथ के व्रत के दौरान अपनी किसी भूल के लिए खुद को दोषी ठहरा कर विलाप करने लगी। उसका विलाप सुनकर देवी इन्द्राणी जो कि इन्द्र देवता की पत्नी है, वीरावती को सान्त्वना देने के लिए पहुँची। वीरावती ने देवी इन्द्राणी से पूछा कि करवा चौथ के दिन ही उसके पति की मृत्यु क्यों हुई और अपने पति को जीवित करने की वह देवी इन्द्राणी से विनती करने लगी। वीरावती का दुःख देखकर देवी इन्द्राणी ने उससे कहा कि उसने चन्द्रमा को अर्घ अर्पण किये बिना ही व्रत को तोड़ा था जिसके कारण उसके पति की असामयिक मृत्यु हो गई। देवी इन्द्राणी ने वीरावती को करवा चौथ के व्रत के साथ-साथ पूरे साल में हर माह की चौथ को व्रत करने की सलाह दी और उसे आश्वासित किया कि ऐसा करने से उसका पति जीवित लौट आएगा।

इसके बाद वीरावती सभी धार्मिक कृत्यों और मासिक उपवास को पूरे विश्वास के साथ करती। अन्त में उन सभी व्रतों से मिले पुण्य के कारण वीरावती को उसका पति पुनः प्राप्त हो गया।

इस व्रत में कुछ नियम हैं, जिनका पालन जरूर करना चाहिए:

1. इस व्रत में कहीं सरगी खाने का रिवाज है, तो कहीं नहीं है। इसलिए अपने परंपरा के अनुसार ही व्रत रखना चाहिए। सुबह सूर्योदय से पहले स्नान आदि करके पूजा घर की सफ़ाई करें। फिर सास द्वारा दिया हुआ भोजन(सरगी) करें और भगवान की पूजा करके निर्जला व्रत का संकल्प लें।
2. इस व्रत में महिलाओं को पूरा श्रृंगार करना चाहिए। इस व्रत में महिलाएं को मेहंदी से लेकर सोलह श्रृंगार करना चाहिए।
3. यह व्रत निर्जला रखा जाता है। परंतु हर जगह अपने-अपने रिवाजों के अनुसार व्रत रखा जाता है।
4. चन्द्रोदय के पश्चात, चंद्रमा के दर्शन कर पति के हाथ से पानी पीकर व्रत खोला जाता है। करवों से पूजा : इस व्रत में मिट्टी के करवे लिए जाते हैं और उनसे पूजा की जाती है। इस व्रत के दौरान सुहागिने करवा चौथ की कथा सुनती व सुनाती है।
5. करवा चौथ की पूजा में भगवान शिव, माता पार्वती, गणेश और कार्तिकेय सहित नंदी जी की भी पूजा की जाती है।
6. पूजा के बाद चंद्रमा को छलनी से ही देखा जाता है और उसके बाद पति को भी उसी छलनी से देखते हैं।

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