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The post पौष पुत्रदा एकादशी 2024: जाने कब है एवं कथा, महत्व और सिद्ध मंत्र appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>पुत्रदा एकादशी साल में दो बार मनाई जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार पहली पुत्रदा एकादशी पौष माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनायी जाती है इसे पौष पुत्रदा एकादशी या पौष शुक्ल पुत्रदा एकादशी कहा जाता है, जिसे अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार जनवरी या दिसंबर महीने में मनाया जाता है। और दूसरी पुत्रदा एकादशी श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनायी जाती है और इसे श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है जो इंग्लिश कैलेंडर वर्ष के अनुसार जुलाई या अगस्त के महीने में आती है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल के समय श्री कृष्ण ने अर्जुन के पूछने पर पुत्रदा एकादशी का महत्व बताते हुए कहा था। “हे अर्जुन! संसार में पुत्रदा एकादशी उपवास के समान अन्य दूसरा व्रत नहीं है। इसके पुण्य से प्राणी तपस्वी, विद्वान और धनवान बनता है। पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का उपवास करना चाहिए पुत्र प्राप्ति के लिए इससे बढ़कर दूसरा कोई व्रत नहीं है। जो कोई व्यक्ति पुत्रदा एकादशी के माहात्म्य को पढ़ता व श्रवण करता है तथा विधानानुसार इसका उपवास करता है, उसे सर्वगुण सम्पन्न पुत्ररत्न की प्राप्ति होती है। श्रीहरि की अनुकम्पा से वह मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है।”
दिनांक – 21 जनवरी 2024
वार – रविवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 20 जनवरी 2024 को 07:26 पी एम बजे से
एकादशी तिथि समाप्त – जनवरी 21, 2024 को 07:26 पी एम बजे तक
पारण (व्रत तोड़ने का) समय – 22 जनवरी 2024 को 07:14 ए एम से 09:21 ए एम तक
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्ति समय – 07:51 पी एम
पुत्रदा एकादशी की महत्ता सुन अर्जुन के मन में और जिज्ञासा जाग उठी और उस ने भगवान श्री कृष्ण से कहा – हे कमलनयन! आप कृप्या कर इस व्रत की कथा भी मुझे विस्तारपूर्वक बताएं।
श्रीकृष्ण ने कहा– “हे पाण्डुनंदन! इस एकादशी से सम्बंधित जो कथा प्रचलित है, उसे मैं तुम्हें सुनाता हूँ, श्रद्धापूर्वक श्रवण करो-
प्राचीन समय में भद्रावती नगरी में सुकेतुमान नाम का एक राजा राज्य करता था। उसके कोई संतान नहीं थी। उसकी पत्नी का नाम शैव्या था। पुत्र ना होने के कारण राजा के मन में इस बात की बड़ी चिंता थी कि उसके बाद उसे और उसके पूर्वजों को कौन पिंडदान देगा। राजा रात-दिन इसी चिंता में घुला करता था। इस चिंता के कारण एक दिन वह इतना दुखी हो गया कि उसके मन में अपने शरीर को त्याग देने की इच्छा उत्पन्न हुई , किंतु वह सोचने लगा कि आत्महत्या करना तो महापाप है, अतः उसने इस विचार को मन से निकाल दिया। एक दिन इन्हीं विचारों में डूबा हुआ वह घोड़े पर सवार होकर वन को चल दिया।
घोड़े पर सवार राजा वन, पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा। उसने वन में देखा कि मृग, बाघ, सिंह, बंदर आदि विचरण कर रहे हैं। हाथी शिशुओं और हथिनियों के बीच में विचर रहा है। उस वन में राजा ने देखा कि कहीं तो सियार कर्कश शब्द निकाल रहे हैं और कहीं मोर अपने परिवार के साथ नाच रहे हैं। वन के दृश्यों को देखकर राजा और ज्यादा दुखी हो गया कि उसके पुत्र क्यों नहीं हैं? इसी सोच-विचार में दोपहर हो गई। वह सोचने लगा कि मैंने अनेक यज्ञ किए हैं और ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन करा सामर्थ्य के अनुसार दान दक्षिण दी है, किंतु फिर भी मुझे यह दुख क्यों मिल रहा है? आखिर इसका कारण क्या है? मैं अपनी व्यथा किससे कहूं? और कौन मेरी व्यथा का समाधान कर सकता है?
अपने विचारों में खोए राजा को प्यास लगी। वह पानी की तलाश में आगे बढ़ा। कुछ दूर जाने पर उसे एक सरोवर मिला। उस सरोवर में कमल पुष्प खिले हुए थे। सारस, हंस, घड़ियाल आदि जल-क्रीड़ा में मग्न थे। सरोवर के चारों तरफ ऋषियों के आश्रम बने हुए थे। अचानक राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे। इसे शुभ शगुन समझकर राजा मन में प्रसन्न होता हुआ घोड़े से नीचे उतरा और सरोवर के किनारे बैठे हुए ऋषियों को प्रणाम करके उनके पूछा ‘हे विप्रो! आप कौन हैं? और किसलिए यहां रह रहे हैं?’
ऋषि बोले – ‘राजन! आज पुत्र की इच्छा करने वालो को श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करने वाली पुत्रदा एकादशी है। आज से पांच दिन बाद माघ स्नान है और हम सब इस सरोवर में स्नान करने आए हैं।’
ऋषियों की बात सुन राजा ने कहा – ‘हे मुनियो! मेरा भी कोई पुत्र नहीं है, कृपा कर मुझे भी इस एकादशी व्रत के बारे में बताएं।
ऋषि बोले – ‘हे राजन! आज पुत्रदा एकादशी है। आप इसका उपवास करें। भगवान श्रीहरि की अनुकम्पा से आपके घर अवश्य ही पुत्र होगा।’
राजा ने मुनि के वचनों के अनुसार उस दिन उपवास किया और द्वादशी को व्रत का पारण किया और ऋषियों को प्रणाम कर उन का आशीर्वाद प्राप्त कर वापस अपनी नगरी आ गया। भगवान श्रीहरि की कृपा से कुछ दिनों बाद ही रानी ने गर्भ धारण किया और नौ माह के पश्चात उसने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। यह राजकुमार बड़ा होने पर अत्यंत वीर, धनवान, यशस्वी और प्रजापालक बना।
डिसक्लेमर
इस लेख में प्रदान की गई जानकारी की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की कोई गारंटी नहीं है। यह सूचना विभिन्न स्रोतों, जैसे कि ज्योतिष, पंचांग, प्रवचन, धार्मिक मान्यताएं, और धर्मग्रंथों से संकलित कर यहाँ प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, और पाठक या उपयोगकर्ता से अपील है कि वे इसे सिर्फ सूचना के रूप में ही समझें और उपयोग करें।
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]]>The post Vivah Panchami 2023: विवाह पंचमी महोत्सव, जानिए क्यों मनाया जाता है? appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>दिनांक – 17 दिसम्बर 2023
वार – रविवार
पञ्चमी तिथि प्रारम्भ – 16 दिसम्बर 2023 को 08:00 पी एम बजे
पञ्चमी तिथि समाप्त – 17 दिसम्बर 2023 को 05:33 पी एम बजे
विवाह पंचमी का महोत्सव भारत और नेपाल में पूरे धूम-धाम से मनाया जाता है। इस उत्सव को नेपाल के पौराणिक शहर जनकपुरधाम और अयोध्या में भव्य रूप से मनाया जाता है।
इस महोतवस्व के दौरान नेपाल के जनकपुरधाम में प्रभु श्रीराम तथा माता सीता के विवाह का आयोजन किया जाता है। शहर की साफ-सफाई कर जनकपुर के सभी मंदिरों को सजाया जाता है। इस दिन अयोध्या से आ रही बारात के स्वागत की जबरदस्त तैयारी की जाती है। नगर भ्रमण और स्वागत करने के लिए बच्चों को राम जी और लक्ष्मण जी की प्रतिमूर्ति के रूप में बनाया जाता है। इस दिन झांकी जानकी मंदिर पहुंचकर नगर भ्रमण करती है। महोत्सव के प्रथम दिन फुलवारी लीला ,दूसरे दिन धनुष यज्ञ, तीसरे दिन भगवान राम के तिलकोत्सव की रस्म, चौथे दिन मटकोर और पंचवे दिन विवाहोत्सव मनाया जाता है। जिससे त्रेता युग की अनुभूति होती है। विवाहोत्सव के अगले दिन राम कलेवा के साथ इस महोत्सव का समापन होता है।
हिन्दू धर्म में विवाह पंचमी का विशेष महत्व है। लेकिन इस दिन कई जगह खासकर भारत के मिथिलांचल और नेपाल में विवाह नहीं करने की परंपरा है। दरअसल, 36 गुण मिलने के बाद भी सीता जी का वैवाहिक जीवन अति दुखद रहा था इसी वजह से लोग विवाह पंचमी के दिन विवाह करना उचित नहीं मानते। मान्यता है कि 14 वर्ष के कठोर वनवास के उपरांत राम ने गर्भवती सीता का त्याग कर दिया था और इस वजह से माता सीता को महारानी का सुख नहीं मील पाया। इसलिए विवाह पंचमी के दिन लोग अपनी बेटियों का विवाह नहीं करते हैं। लोगों का मानना है कि विवाह पंचमी के दिन विवाह करने से कहीं सीता की तरह ही उनकी बेटी का वैवाहिक जीवन भी दुखमयी न हो जाए।
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]]>The post Utpanna Ekadashi 2023: प्रथम एकादशी व्रत, महत्व, कथा और विधि appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>पुराणो के अनुसार जो भक्त उत्पन्ना एकादशी का विधि-विधान से व्रत करता है और इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करता है उसे संक्रान्ति में तथा सूर्य और चन्द्र ग्रहण में दान देने से और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य मनुष्य को एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। जो फल ब्राह्मणों को एक हजार गौदान करने से प्राप्त होता है, उससे दस गुना अधिक पुण्य मिलता है। इस के साथ जो भक्त इस दिन दान देता है उसे उसके दिए हुए दान का कई गुना फल प्राप्त होता है।
विष्णु पुराण के अनुसार एक बार अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा- “हे प्रभु! आप मुझे एकादशी व्रत के बारे में कृपा कर विस्तारपूर्वक बताइये।”
श्रीकृष्ण बोले- “हे पार्थ! सतयुग में एक महा भयंकर दैत्य हुआ था, उसका नाम मुर था। उस दैत्य ने इन्द्र आदि देवताओं पर विजय प्राप्त कर उन्हें उनके पद से हटा दिया और स्वर्ग पे अपना आधिपत्य जमा लिया। तब इन्द्र और अन्य देवता वहाँ से भाग कर मृत्युलोक में आ गए और भगवान शंकर से प्रार्थना की- ‘हे भोलेनाथ! हम सब देवता, मुर दैत्य के अत्याचारों से दुखी होकर मृत्युलोक में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। राक्षसों के भय से हम सब बहुत दुख और कष्ट भोग रहे हैं। अतः कृपा कर आप मुर दैत्य के अत्याचार से बचने का उपाय बतलाइये।’
देवराज की प्रार्थना सुन कैलाशपति ने कहा- ‘हे देवेन्द्र! आप भगवान श्रीहरि की शरण में जाइए और उन से इस का उपाय करने का आग्रह करिये। भगवान विष्णु देवताओं को अवश्य ही इस भय से मुक्त करेंगे।’ भोलेनाथ के आदेशानुसार इन्द्र तथा अन्य देवता क्षीर सागर गए, जहाँ पर भगवान श्रीहरि शेष-शैया पर विराजमान थे।
इन्द्र सहित सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के समक्ष उपस्थित होकर उनसे प्रार्थना की – ‘हे तीनों लोकों के स्वामी! हम सभी देवताओं का आपको कोटि-कोटि प्रणाम है। हम आपकी शरण में आए हैं, आप हमारी रक्षा करें। हे जगत के पलनहार! हम सभी देवता दैत्यों के अत्याचारों से भयभीत होकर आपकी शरण में आए हैं। इस समय दैत्यों ने हमें स्वर्ग से निकाल दिया है और हम सभी देवता बड़ी ही दयनीय स्थिति में मृत्युलोक में विचरण कर रहे हैं। अब आप ही हमारे रक्षक हैं! रक्षा कीजिये।
देवताओं का आग्रह सुन, भगवान श्रीहरि बाले- ‘हे देवगणो! वह कौन-सा दैत्य है, जिसने देवताओं को जीत लिया है? आप सभी देवगण किसके भय से पृथ्वीलोक में भटक रहे हैं? क्या वह दैत्य इतना बलवान है, जिसने इन्द्र सहित सभी देवताओं को जीत लिया है? तुम निर्भय होकर मुझे सब हाल बताओ।
तब देवेन्द्र ने कहा- ‘हे प्रभु! चन्द्रवती नामक नगरी में निवास करने वाला मुर नामक दैत्य ने बल से मृत्युलोक और देवलोक को जीत लिया हैं और सब देवताओं को देवलोक से निकालकर, अपने दैत्य कुल के असुरों लोकपाल बना दिया है। वह स्वयं सूर्य बनकर पृथ्वी को तापता है और स्वयं मेघ बनकर जल की वर्षा करता है, अतः आप इस बलशाली भयानक असुर का संहार करके देवताओं की रक्षा करें।’
इंद्र के मुख से ऐसे वचन सुन भगवान विष्णु बोले- ‘हे देवताओं! मैं आपके शत्रु का शीघ्र ही संहार करूँगा। आप सब इसी समय मेरे साथ चन्द्रवती नगरी चलिए।’
देवताओं की पुकार पर भगवान विष्णु तुरन्त ही उनके साथ चल दिए। उधर दैत्यराज मुर ने अपने तेज से जान लिया था कि श्री विष्णु युद्ध की इच्छा से उसकी राजधानी की तरफ आ रहे हैं, अतः अपने राक्षस योद्धाओं के साथ वह भी युद्ध भूमि में आकर गरजने लगा। देखते-ही-देखते घोर युद्ध शुरू हो गया। देवता तो पहले ही डरे हुए थे, वह अधिक देर तक राक्षसों का सामना न कर सके और भाग खड़े हुए। तब भगवान विष्णु स्वयं युद्ध-भूमि में आ गए। देवताओं को भागता देख दैत्य पहले से भी ज्यादा जोश में भरकर भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे। वे अपने अस्त्र-शस्त्रों से उन पर भयंकर प्रहार करने लगे। दैत्यों के आक्रमण वारों को भगवान विष्णु अपने चक्र और गदा के प्रहारों से नष्ट करने लगे। इस युद्ध में अनेक दैत्य मृत्यु की गोद में समा गए, किन्तु दैत्य मुर भगवान विष्णु के साथ युद्ध करता रहा। उसका तो जैसे अभी बाल भी बांका नहीं हुआ था। वह बिना डरे युद्ध कर रहा था। भगवान विष्णु मुर को मारने के लिए जिन-जिन शस्त्रों का प्रयोग करते, वे सब उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगते। जब अनेक अस्त्रों-शस्त्रों का प्रयोग करने पर भी दोनो एक दूसरे को जीत न सके, तब वे आपस में मल्ल युद्ध करने लगे। यह युद्ध अनेक वर्षों तक चलता रहा। अन्त में भगवान विष्णु शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बदरिकाश्रम स्थित अड़तीस कोस लम्बी एक द्वार वाली हेमवती नामक गुफा में प्रवेश कर गए।
हे अर्जुन! उस गुफा में प्रभु ने शयन किया। भगवान विष्णु के पीछे-पीछे वह दैत्य भी चला आया था। भगवान श्रीहरि को सोता देखकर वह उन्हें मारने को तैयार हो गया। परन्तु उसकी यह इच्छा पूर्ण न हो सकी, क्योंकि उसी समय भगवान विष्णु की देह से दिव्य वस्त्र धारण किए एक अत्यन्त मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई और राक्षस को ललकारकर उससे युद्ध करने लगी और कुछ समय बीतने पर उस कन्या ने अपने शास्त्रों से दैत्य के अस्त्र-शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और उसका रथ भी तोड़ डाला। अब तो उस दैत्य को बड़ा ही क्रोध आया और वह सारी मर्यादाएँ भंग करके उस कन्या से मल्ल युद्ध करने लगा। उस तेजस्वी कन्या ने उसको धक्का मारकर मुर्च्छित कर दिया और उसकी मूर्च्छा टूटने से पूर्व ही उसका सिर काटकर धड़ से अलग कर दिया।
सिर काटते ही वह असुर मृत्यु को प्राप्त हुआ। भगवान विष्णु जब निद्रा से जागे तो उस असुर को मरा देखकर उन्हें घोर आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि इस महाबली को किसने मारा है?
तब वह तेजस्वी कन्या श्रीहरि से हाथ जोड़कर बोली- ‘हे जगदीश्वर! यह असुर आपको मारने को उद्यत था, तब मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इस असुर का वध किया है।’ कन्या की बात सुन भगवान बोले- ‘तुमने इस असुर को मारा है, अतः हे कन्या! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। इसे मारकर तुमने देवताओं के कष्ट को हरा है, इसलिए तुम अपनी इच्छानुसार वरदान मांग लो। मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करूँगा।’
भगवान की बात सुन कन्या बोली- ‘हे प्रभु! मुझे यह वरदान दीजिये कि जो भी मनुष्य या देव मेरा व्रत करे, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएँ और अन्त में उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हो। मेरे व्रत का आधा फल रात्रि को मिले और उसका आधा फल एक समय भोजन करने वाले को मिले। जो श्रद्धालु भक्तिपूर्वक मेरे व्रत को करें, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक को प्राप्त करें। जो मनुष्य मेरे व्रत में दिन तथा रात्रि को एक बार भोजन करे, वह धन-धान्य से भरपूर रहे। कृपा करके मुझे ऐसा वरदान दीजिये।’
भगवान विष्णु ने कहा- ‘हे कन्या! ऐसा ही होगा। मेरे और तुम्हारे भक्त एक ही होंगे और अन्त में संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त होकर मेरे लोक को प्राप्त करेंगे। तुम एकादशी को पैदा हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम भी एकादशी हुआ और क्योंकि तुम मेरे अंश से उत्पन्न हुई हो, इसलिए संसार मे तुम उत्पन्ना एकादशी के नाम से जानी जाओगी तथा जो मनुष्य इस दिन व्रत करेंगे, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे। तुम्हारे व्रत का फल सब तीर्थों के फल से भी महान होगा।
इतना कहकर, भगवान श्रीहरि उसी स्थान पर अंतर्ध्यान हो गए।”
श्री कृष्ण ने कहा- “हे कुंती पुत्र! एकादशी के व्रत का फल सभी व्रतों व सभी तीर्थों के फल से महान है। एकादशी व्रत करने वाले मनुष्यों के शत्रुओं का मैं जड़ से नाश कर देता हूँ और व्रत करने वाले को मोक्ष प्रदान करता हूँ। उन मनुष्यों के जीवन के जो भी कष्ट होते हैं। मैं उन्हें भी दूर कर देता हूँ। अर्थात मुझे अत्यन्त प्रिय एकादशी के व्रत को करने वाला प्राणी सभी ओर से निर्भय और सुखी होकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त होता है। हे कुन्ती पुत्र! यह मैंने तुम्हें एकादशी की उत्पत्ति के विषय में बतलाया है। एकादशी व्रत सभी पापों को नष्ट करने वाला और सिद्धि प्रदान करने वाला है। श्रेष्ठ मनुष्यों को दोनों पक्षों की एकादशियों को समान समझना चाहिए। उनमें भेद-भाव करना उचित नहीं है। जो मनुष्य एकादशी माहात्म्य का श्रवण व पठन करेंगे, उन्हें अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होगा।
एकादशी व्रत की शुरुआत उत्पन्ना एकादशी व्रत से करनी चहिये। सभी एकादशी व्रत का पूजा विधान एक समान होता है, जो कि इस प्रकार है:
दिनांक : 08 दिसम्बर 2023
वार : शुक्रवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 08 दिसम्बर 2023 को 05:06 ए एम
एकादशी तिथि समाप्त – 09 दिसम्बर 2023 को 06:31 ए एम
पारण तिथि : 09 दिसम्बर 2023
पारण समय : 01:16 पी एम से 03:20 पी एम
जीन भक्तजनो ने एकादशी के उपवास को नहीं रखा हैं और इस उपवास को रखना चाहते है वो इस मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी अर्थात उत्पन्ना एकादशी से इसका आरंभ कर सकते है क्योंकि सर्वप्रथम हेमंत ऋतु में इसी एकादशी से इस व्रत का प्रारंभ हुआ माना जाता है।
ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता ।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। ॐ।।
तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी ।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।।ॐ।।
मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई।। ॐ।।
पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है,
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै ।। ॐ ।।
नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै ।। ॐ ।।
विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी,
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की ।। ॐ ।।
चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली,
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। ॐ ।।
शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी,
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी।। ॐ ।।
योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी ।। ॐ ।।
कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए।। ॐ ।।
अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला।। ॐ ।।
पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।
रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी ।। ॐ ।।
देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।
पावन मास में करूं विनती पार करो नैया ।। ॐ ।।
परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।।
शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी ।। ॐ ।।
जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै।। ॐ ।।
The post Utpanna Ekadashi 2023: प्रथम एकादशी व्रत, महत्व, कथा और विधि appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>The post Ahoi Ashtami 2023: कब होगा अहोई अष्टमी का व्रत? जाने महत्व, व्रत कथा, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>ऐसे ही अहोई अष्टमी (Ahoi Ashtami) का एक पर्व है जो उत्तर भारत में मनाया जाता है। यह पर्व हर वर्ष हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए व्रत रख कर अहोई माता से प्रार्थना करती है।
प्राचीन काल में एक गाँव में साहूकाररहता था, उसके सात पुत्र और सात बहुएं थी। साहूकारकी एक पुत्री भी थी जिसका विवाह हो चुका था और वो अपने ससुराल में रहती थी। साहूकार की बेटी दीपावली पे अपने मायके आयी हुई थी। साहूकार के घर दीपावली की तैयारियां चल रही थी तो उसकी बेटी भी दीपावली की तैयारी में अपनी भाभियों का हाथ बटाने लगी। दीपावली पर घर को लीपना था इसलिए साहूकार की बहुएं और बेटी मिट्टी लाने के लिए जंगल में गई। साहूकारकी बेटी जहां मिट्टी काट रही थी उस स्थान पर स्याही (साही) अपने बेटों से साथ रहती थी। मिट्टी काटते हुए ग़लती से साहूकार की बेटी की कुदाल के चोट से स्याही का एक बच्चा मर गया। यह देख स्याही साहूकार की बेटी पर क्रोधित होकर बोली मैं तुम्हारी कोख बांधूंगी।
यह सुन साहूकार की बेटी साही से बोली की ये अनजाने में हुई गलती है मुझे माफ़ कर दीजिए और मेरी कोख मत बंधिए पर साही अपने पुत्र की मृत्यु से दुखी और साहूकार की बेटी पर अत्यंत क्रोधित थी इसलिए साही ने उसकी बात नहीं सुनी। तब साहूकार की बेटी ने एक एक कर अपनी सातों भाभियों से प्रार्थना की वो उसके बदले अपनी कोख बंधवा ले पर उसकी छ: भाभियों ने मना कर दिया। सबसे छोटी भाभी घर में नयी थी और उस ने सोचा कि अगर में मना करूँगी तो सास बुरा मान जाएगी इसलिए उसने हाँ कर दी और अपनी ननद के बदले अपनी कोख बंधवा ली। इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे होते थे वो सात दिन बाद मर जाते थे। सात पुत्रों की इस प्रकार मृत्यु होने के बाद उसने पंडित को बुलवाकर सारा क़िस्सा बताया। पंडित जी ने उसे सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी।
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पंडित जी की सलाह के अनुसार छोटी बहु ने सुरही गाय की वर्षों तक सेवा की। उसकी सेवा से प्रसन्न हो कर सुरही गाय ने साहूकार की छोटी बहु से कहा ‘हे पुत्री, तू किस लिए मेरी इतनी सेवा कर रही है, बता तुझे मुझ से क्या चहिये?’ जो कुछ तेरी इच्छा हो वह मुझ से मांग ले। साहूकार की बहू ने सुरही गाय को सारा क़िस्सा बताया और कहा कि स्याहु माता ने मेरी कोख बांध दी है जिससे मेरे बच्चे नहीं बचते हैं. यदि आप मेरी कोख खुलवा दे तो मैं आपका उपकार मानूंगी। सुरही गाय ने सारा क़िस्सा सुन बहु से कहा ‘ पुत्री, में तेरी सेवा से बहुत प्रसन्न हूँ, में तुझे सात समुद्र पार स्याहु माता के पास ले चलती हूँ’।
चलते-चलते दोनो रास्ते में थक जाने पर आराम करने लगी, तभी अचानक साहूकार की छोटी बहू की नज़र एक ओर गयी और उस ने देखा कि एक सांप गरूड़ पंखनी के बच्चे को डंसने जा रहा है, यह देखकर उसने सांप को मार डाला। उसी वक्त गरुण पंखनी वहाँ आ गयी और खून बिखरा हुआ देखकर उसे लगा कि छोटी बहु ने उसके बच्चे के मार दिया है इस पर वह छोटी बहू को चोंच से मारना शुरू कर देती है। छोटी बहू इस पर कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है। गरूड़ पंखनी इस पर खुश होती है और सुरही सहित उन दोनो को स्याही के पास पहुंचा देती है। वहां छोटी बहू स्याहु की भी सेवा करती है. स्याहु छोटी बहू की सेवा से प्रसन्न होकर छोटी बहू को सात पुत्र और सात पुत्रवधुओं का आर्शीवाद देती है। यह सुन छोटी बहु स्याहु से कहती है की आप का आशीर्वाद पूरा नहीं हो पायेगा औरसारा क़िस्सा बताती है और कहती है की आप ने मेरी कोख बांध रखी है। स्याहु को सब याद आ जाता है तो वो छोटी बहू को कहती है की तू घर जाने पर अहोई माता का पूरे भक्ति भाव से व्रत रख कर पूजा करना और सात सात अहोई बनाकर सात कड़ाही देना। अहोई माता के आशीर्वाद से तेरी कोख खुल जाएगी और मेरे कथन के अनुसार तेरे सात पुत्र और सात पुत्रवधू होंगे।
तब साहूकार की छोटी बहू घरलोट कर स्याहु की सलाह के अनुसार अहोई माता का पूरे भक्ति भाव से व्रत रख पूजा करी और सात अहोई बनाकर सातकड़ाही देकर उजमन पन किया। इसके फल स्वरूप उसके सात पुत्र हुए और उनकी सात बहुए आयी।
उत्तर भारत के राज्यों में अहोई अष्टमी का व्रत निम्नलिखित तरीके से मनाया जाता है।
जय अहोई माता जय अहोई माता ।
तुमको निसदिन ध्यावत हरी विष्णु धाता ।।
ब्रम्हाणी रुद्राणी कमला तू ही है जग दाता ।
जो कोई तुमको ध्यावत नित मंगल पाता ।।
तू ही है पाताल बसंती तू ही है सुख दाता ।
कर्म प्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता ।।
जिस घर थारो वास वही में गुण आता ।
कर न सके सोई कर ले मन नहीं घबराता ।।
तुम बिन सुख न होवे पुत्र न कोई पता ।
खान पान का वैभव तुम बिन नहीं आता ।।
शुभ गुण सुन्दर युक्ता क्षीर निधि जाता ।
रतन चतुर्दश तोंकू कोई नहीं पाता ।।
श्री अहोई माँ की आरती जो कोई गाता ।
उर उमंग अति उपजे पाप उतर जाता ।।
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]]>The post Venus Transit : धन, वैभव, प्रेम और सौंदर्य के देव का राशि परिवर्तन, जाने अपनी राशि अनुसार आप पर प्रभाव … appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>शुक्र ग्रह मीन राशि में उच्च के होते हैं और कन्या राशि में नीच के होते हैं | शुक्र का सम्बन्ध प्रेम जीवन, रोमांस, भव्यता, शौक, सुख-सुविधाओं आदि से होता है | शुक्र देव उच्च होकर(Venus Transit) मीन राशि मे देव गुरु बृहस्पति के साथ रहेंगे यह एक शुभ योग है जिनकी भी ब्रहस्पति या शुक्र की दशा होगी या फिर मीन राशि मे बैठे ग्रहो को उनको इसके शुभ प्रभाव मिलेंगे।आइये जानते हैं राशि अनुसार इस गोचर का जातकों पर प्रभाव-
मेष राशि – भाग्येश और सप्तमेश की युति रहेगी आपके अंदर कामवासना बढ़ेगी और अनैतिक सम्बन्ध से आपको बचना चाहिए नही तो आप कलंकित हो सकते है किसी स्त्री की वजह से आपको नुकसान हो सकता है शारीरिक सुख के लिए आपका धन खर्च हो सकता है।
वर्षभ राशि– आपकी आमदनी बढ़ेगी पर आपको महसूस नही होगी आपका पैसा आपके पास रुकेगा नही, लाभ तो होगा पर उस लाभ से आपको फायदा महसूस नही होगा, आपके दुश्मन पर आपका दबाव रहेगा और उनसे आपको लाभ भी होगा।
मिथुन राशि– बाहरी क्षेत्रो से आपको लाभ होगा आपकी नोकरी में तरक्की हो सकती है, कारोबार में मुनाफा पहले से अच्छा होगा ,कोई नया कार्य जो शुरू किया है वो भी अच्छा चलने लगेगा।
कर्क राशि– भाग्य आपका साथ देगा और अचानक धन लाभ भी होगा, आपको कोई कीमती चीज़ भी मिल सकती है। आपकी मेहनत आपको सफलता तक लेकर जाएगी।
सिंह राशि– पंचमेश कर्मेश दोनो ही आठवे भाव मे है कोई योन रोग आपको परेशान कर सकता है, बाहरी सम्बन्ध से बचे। कारोबार में उतार चढ़ाव रहेंगे, लाभ ज्यादा नही होगा साथ मे मानसिक परेशानी भी रहेगी।
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कन्या राशि– पार्टनरशिप में आपको लाभ होगा और आपकी कोई यात्रा भी हो सकती है। जीवनसाथी की तरफ से कोई न कोई चिंता आपको परेशान करेगी। आपका भाग्य मजबूती के साथ इस वक़्त काम करेगा।
तुला राशि– दुश्मनों से ही लाभ होगा, आपके साथ कॉम्पिटिशन करने वाले ही आपको फायदा पहुचा देंगे। आपके पास धन बढेगा और आप अपने काम पर पूरा फोकस कर पाएंगे। अगर आपका कोई केस चल रहा है तो उसमे जल्दी ही फायदा होगा।
वृश्चिक राशि– आपके अंदर आकर्षण बढेगा और आप दूसरों की तरफ खीचेंगे, आपका कोई प्रेम संबंध शुरू हो सकता है। सन्तान की तरफ से जो चिंता थी वो कम होगी।
धनु राशि– कुछ नया लेना चाहेंगे। लोन पर नई नई चीज़ों के लिए आपका मन विचलित होगा, आप शॉपिंग पर पैसा खर्च करेंगे। कारोबार में अचानक फायदा होने के योग बनेंगे।
मकर राशि– आपको मित्रो से, छोटे भाई बहनों से फायदा होगा। अटके काम को पूरा करने में आपके अपने सहयोग करेंगे ।आपके काम की तारीफ होगी, नई नोकरी का योग भी बनेगा जिसमे आपको लाभ होगा।
कुम्भ राशि– पैसा आएगा आपके पास और जुड़ेगा भी। परिवार का सहयोग भी प्राप्त होगा। चल रही आंखों की परेशानी में कुछ सुधार होगा।अचानक से कही से आपके पास अच्छा पैसा आने का योग भी बनेगा जो आपकी बड़ी परेशानी को कम करेगा।
मीन राशि– मेहनत से आपको लाभ होगा पर छोटी मोटी कोई न कोई बीमारी आपको परेशान करेगी, मानसिक चिंता रहेगी। मित्रो से साथ आपका झगड़ा हो सकता है, वाहन का इस्तेमाल सम्भाल कर या एक महीना न करे तो ज्यादा अच्छा रहेगा।
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]]>The post शास्त्रों के अनुसार जाने किन कार्यों में पत्नी को दायीं और कब बाईं ओर होना चाहिए…? appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>शास्त्रों में स्त्री पुरुष की वामांगी होती है इसलिए सिंदूर दान करते समय, द्विरागमन, भोजन करते समय, सोते समय, सेवा के समय, आशीर्वाद ग्रहण करते समय और ब्राह्मणों के पांव धोते समय पत्नी को पति के बायीं ओर रहना चाहिए। इससे शुभ फलों की प्राप्ति होती है।
वामांगी होने के बाद भी कुछ विशेष कार्यों में पत्नी को दायीं ओर रहकर कार्य करने के लिए शास्त्र कहता हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि कन्यादान करते समय, विवाह, यज्ञकर्म एवं जातकर्म, नामकरण और अन्न प्राशन के शुभ अवसर पर पत्नी को पति के दाहिने भाग की ओर बैठना चाहिए।
पत्नी के पति के दाएं और बायीं ओर बैठने संबंधी मान्यता के पीछे तर्क यह है कि जो कार्य सांसारिक होते हैं अथवा जो कर्म इह लौकिक होते हैं, उसमें पत्नी को पुरुष के बायीं ओर बैठना चाहिए। जैसे मांग में सिंदूर भरते समय, सेवा करते समय, सोने के समय आदि कार्यों में पत्नी वामांगी का कार्य करती है। यज्ञ, कन्या दान करते समय, विवाह आदि ये सभी शुभ कार्य पुरुष प्रधान होते हैं। इसलिए इन कार्यों में पत्नी को पुरुष के दायीं ओर बैठने का नियम शास्त्रों में बताया गया है।
भगवान शिव की अर्धनारीश्वर रूप में पूजा की जाती है क्योंकि मान्यता है कि भगवान शिव के बायीं हिस्से से स्त्री की उत्पत्ती हुई थी। भगवान का यह अवतार स्त्री और पुरुष की समानता का संदेश देता है। शिव ने यह रूप अपनी इच्छा से लिया था ताकि वह संसार को संदेश दे सकें कि बिना स्त्री के पुरुष अधूरा है और बिना पुरुष के स्त्री अधूरी है। ईश्वर की नजर में स्त्री और पुरुष दोनों एक समान हैं और दोनों का बराबर सम्मान है।
शिवपुराण में एक कथा मिलती है कि किस तरह भगवान शिव ने अपनी वामांगी को अधिकारी बताया। कथा के अनुसार, जब भगवान राम 14 वर्ष के लिए वनवास गए थे तब देवी सती ने उनकी परिक्षा लेने के लिए सीता का रूप धारण कर लिया था। लेकिन भगवान राम माता सती को पहचान लेते हैं और उनकी प्रार्थना करते हैं।
जब देवी सति वापस कैलाश आती हैं तब भगवान शिव नाराज हो जाते हैं। भगवान शिव माता सती से कहते हैं कि आपने मेरे आराध्य देव की परिक्षा लेकर गलत कार्य किया है। ऐसा करके आपने भगवान राम का अपमान किया है। इसलिए आपने वामांगी होने का अधिकार खो दिया है।
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]]>The post Ashta Lakshmi: माता लक्ष्मी के 8 स्वरूप appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>देवी लक्ष्मी का पहला स्वरूप आदिलक्ष्मी का है इन्हें मूललक्ष्मी, आदिशक्ति भी कहा जाता है। श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार महालक्ष्मी ने ही सृष्टि के आरंभ में त्रिदेवों को प्रकट किया और इन्हीं से महाकाली और महासरस्वती ने आकार लिया। इन्होंने स्वयं जगत के संचालन के लिए भगवान विष्णु के साथ रहना स्वीकार किया। यह देवी जीव-जंतुओं को प्राण प्रदान करती हैं, इनसे जीवन की उत्पत्ति हुई है। इनके भक्त मोह-माया से मुक्ति होकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं। इनकी कृपा से लोक-परलोक में सुख-संपदा प्राप्त होती है।
देवी लक्ष्मी का दूसरा स्वरूप हैं धनलक्ष्मी। इन्होंने भगवान विष्णु को कुबेर के कर्ज से मुक्ति दिलाने के लिए यह रूप धारण किया था। इस देवी का संबंध भगवान वेंकटेश से है जो भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। वेंकटेश रूप में भगवान ने देवी पद्मावती से विवाह के लिए कुबेर से कर्ज लिया। इसी कर्ज को चुकाने में भगवान की सहायता के लिए देवी लक्ष्मी धनलक्ष्मी रूप में प्रकट हुईं। इनके पास धन से भरा कलश है और एक हाथ में कमल फूल है। इनकी पूजा और भक्ति आर्थिक परेशानियों और कर्ज से मुक्ति दिलाती है। कर्ज से परेशान लोगों को देवी लक्ष्मी के इस स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।
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]]>The post Surya Arghya – क्या है सूर्य को जल चढ़ाने के नियम, पालन करने से बढ़ेगा मान-सम्मान appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
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]]>The post April 2022 Vrat and Festival – अप्रैल 2022 में पड़ने वाले व्रत एवं त्यौहार appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
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दिनांक |
व्रत एवं त्यौहार |
दिन / वार |
1 अप्रैल 2022 |
चैत्र अमावस्या, इष्टि |
शुक्रवार |
2 अप्रैल 2022 |
चैत्र नवरात्रि घटस्थापना पूजन, उगादी , गुड़ी पड़वा, झूलेलाल जयन्ती |
शनिवार |
3 अप्रैल 2022 |
मत्स्य जयन्ती, स्वायम्भुव मन्वादि |
रविवार |
4 अप्रैल 2022 |
गौरी पूजा, गणगौर, मासिक कार्तिगाई |
सोमवार |
5 अप्रैल 2022 |
विनायक चतुर्थी, लक्ष्मी पञ्चमी, शुक्ल पञ्चमी |
मंगलवार |
6 अप्रैल 2022 |
रोहिणी व्रत, स्कन्द षष्ठी |
बुधवार |
7 अप्रैल 2022 |
यमुना छठ |
बृहस्पतिवार |
8 अप्रैल 2022 |
चैत्र नवपद ओली प्रारम्भ |
शुक्रवार |
9 अप्रैल 2022 |
मासिक दुर्गाष्टमी |
शनिवार |
10 अप्रैल 2022 |
राम नवमी, स्वामीनारायण जयन्ती, महातारा जयन्ती |
रविवार |
12 अप्रैल 2022 |
कामदा एकादशी |
मंगलवार |
13 अप्रैल 2022 |
वैष्णव कामदा एकादशी, वामन द्वादशी |
बुधवार |
14 अप्रैल 2022 |
महावीर स्वामी जयन्ती, मेष संक्रान्ति, सूर्य का मीन से मेष राशि में प्रवेश, पुथन्डू, अम्बेडकर जयन्ती, बैसाखी, प्रदोष व्रत |
गुरुवार |
15 अप्रैल 2022 |
विषु कानी, पहेला वैशाख, गुड फ्राइडे |
शुक्रवार |
16 अप्रैल 2022 |
हनुमान जयन्ती, शुक्ल पूर्णिमा, चैत्र नवपद ओली पूर्ण, चैत्र पूर्णिमा व्रत, स्वारोचिष मन्वादि |
शनिवार |
17 अप्रैल 2022 |
वैशाख प्रारम्भ, ईस्टर, इष्टि |
रविवार |
19 अप्रैल 2022 |
विकट संकष्टी चतुर्थी |
मंगलवार |
23 अप्रैल 2022 |
कालाष्टमी |
शनिवार |
26 अप्रैल 2022 |
बरूथिनी एकादशी, वल्लभाचार्य जयन्ती |
मंगलवार |
28 अप्रैल 2022 |
प्रदोष व्रत |
बृहस्पतिवार |
29 अप्रैल 2022 |
मासिक शिवरात्रि, |
शुक्रवार |
30 अप्रैल 2022 |
दर्श अमावस्या,वैशाख अमावस्या |
शनिवार |
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]]>The post Papmochani Ekadashi 2022 – पापमोचनी एकादशी appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>दिनांक : 28 मार्च 2022
वार : सोमवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ : 27 मार्च 2022 को 06:04 पी एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त : 28 मार्च 2022 को 04:15 पी एम बजे
पारण (व्रत तोड़ने का) समय : 29 मार्च 2022 को 06:15 ए एम से 08:43 ए एम
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय : 02:38 पी एम
पुराणों के अनुसार एक बार अर्जुन ने कहा- “हे कमलनयन! मैं ज्यों-ज्यों एकादशियों के व्रतों की कथाएँ सुन रहा हूँ, त्यों-त्यों अन्य एकादशियों के व्रतों की कथाएँ सुनने की मेरी जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही है। हे मधुसूदन! अब कृपा कर आप चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के विषय में बतलाइये। इस एकादशी का नाम क्या है? इसमें कौन-से देवता का पूजन किया जाता है तथा इस व्रत का क्या विधान है? हे श्रीकृष्ण! यह सब आप मुझे विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें।”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! एक बार यही प्रश्न पृथ्वीपति मान्धाता ने लोमश ऋषि से किया था, जो कुछ लोमश ऋषि ने राजा मान्धाता को बताया था, वही मैं तुमसे कह रहा हूँ। राजा मान्धाता ने धर्म के गुह्यतम रहस्यों के ज्ञाता महर्षि लोमश से पूछा- ‘हे ऋषिश्रेष्ठ! मनुष्य के पापों का मोचन किस प्रकार सम्भव है? कृपा कर कोई ऐसा सरल उपाय बतायें, जिससे सहज ही पापों से छुटकारा मिल जाए।’
महर्षि लोमश ने कहा- ‘हे नृपति! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम पापमोचिनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) है। उसके व्रत के प्रभाव से मनुष्यों के अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं। मैं तुम्हें इस व्रत की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो- प्राचीन समय में चैत्ररथ नामक एक वन था। उसमें अप्सराएँ किन्नरों के साथ विहार किया करती थीं। वहाँ सदैव वसन्त का मौसम रहता था, अर्थात उस जगह सदा नाना प्रकार के पुष्प खिले रहते थे। कभी गन्धर्व कन्याएँ विहार किया करती थीं, कभी देवेन्द्र अन्य देवताओं के साथ क्रीड़ा किया करते थे।
उसी वन में मेधावी नाम के एक ऋषि भी तपस्या में लीन रहते थे। वे शिवभक्त थे। एक दिन मञ्जुघोषा नामक एक अप्सरा ने उनको मोहित कर उनकी निकटता का लाभ उठाने की चेष्टा की, इसलिए वह कुछ दूरी पर बैठ वीणा बजाकर मधुर स्वर में गाने लगी। उसी समय शिव भक्त महर्षि मेधावी को कामदेव भी जीतने का प्रयास करने लगे। कामदेव ने उस सुन्दर अप्सरा के भ्रू का धनुष बनाया। कटाक्ष को उसकी प्रत्यन्चा बनाई और उसके नेत्रों को मञ्जुघोषा अप्सरा का सेनापति बनाया। इस तरह कामदेव अपने शत्रुभक्त को जीतने को तैयार हुआ। उस समय महर्षि मेधावी भी युवावस्था में थे और काफी हृष्ट-पुष्ट थे। उन्होंने यज्ञोपवीत तथा दण्ड धारण कर रखा था। वे दूसरे कामदेव के समान प्रतीत हो रहे थे। उस मुनि को देखकर कामदेव के वश में हुई मञ्जुघोषा ने धीरे-धीरे मधुर वाणी से वीणा पर गायन शुरू किया तो महर्षि मेधावी भी मञ्जुघोषा के मधुर गाने पर तथा उसके सौन्दर्य पर मोहित हो गए। वह अप्सरा मेधावी मुनि को कामदेव से पीड़ित जानकर उनसे आलिङ्गन करने लगी।
महर्षि मेधावी उसके सौन्दर्य पर मोहित होकर शिव रहस्य को भूल गए और काम के वशीभूत होकर उसके साथ रमण करने लगे। काम के वशीभूत होने के कारण मुनि को उस समय दिन-रात का कुछ भी ज्ञान न रहा और काफी समय तक वे रमण करते रहे। तदुपरान्त मञ्जुघोषा उस मुनि से बोली- ‘हे ऋषिवर! अब मुझे बहुत समय हो गया है, अतः स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये।’
अप्सरा की बात सुनकर ऋषि ने कहा- ‘हे मोहिनी! सन्ध्या को तो आयी हो, प्रातःकाल होने पर चली जाना।’
ऋषि के ऐसे वचनों को सुनकर अप्सरा उनके साथ रमण करने लगी। इसी प्रकार दोनों ने साथ-साथ बहुत समय बिताया।
मञ्जुघोषा ने एक दिन ऋषि से कहा- ‘हे विप्र! अब आप मुझे स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये।’
मुनि ने इस बार भी वही कहा- ‘हे रूपसी! अभी ज्यादा समय व्यतीत नहीं हुआ है, कुछ समय और ठहरो।’
मुनि की बात सुन अप्सरा ने कहा- ‘हे ऋषिवर! आपकी रात तो बहुत लम्बी है। आप स्वयं ही सोचिये कि मुझे आपके पास आये कितना समय हो गया। अब और ज्यादा समय तक ठहरना क्या उचित है?’
अप्सरा की बात सुन मुनि को समय का बोध हुआ और वह गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगे। जब उन्हें समय का ज्ञान हुआ कि उन्हें रमण करते सत्तावन (57) वर्ष व्यतीत हो चुके हैं तो उस अप्सरा को वह काल का रूप समझने लगे। इतना ज्यादा समय भोग-विलास में व्यर्थ चला जाने पर उन्हें बड़ा क्रोध आया। अब वह भयंकर क्रोध में जलते हुए उस तप नाश करने वाली अप्सरा की तरफ भृकुटी तानकर देखने लगे। क्रोध से उनके अधर काँपने लगे और इन्द्रियाँ बेकाबू होने लगीं। क्रोध से थरथराते स्वर में मुनि ने उस अप्सरा से कहा- ‘मेरे तप को नष्ट करने वाली दुष्टा! तू महा पापिन और बहुत ही दुराचारिणी है, तुझ पर धिक्कार है। अब तू मेरे शाप (श्राप) से पिशाचिनी बन जा।’
मुनि के क्रोधयुक्त शाप (श्राप) से वह अप्सरा पिशाचिनी बन गई। यह देख वह व्यथित होकर बोली- ‘हे ऋषिवर! अब मुझ पर क्रोध त्यागकर प्रसन्न होइए और कृपा करके बताइये कि इस शाप (श्राप) का निवारण किस प्रकार होगा? विद्वानों ने कहा है, साधुओं की सङ्गत अच्छा फल देने वाली होती है और आपके साथ तो मेरे बहुत वर्ष व्यतीत हुए हैं, अतः अब आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइए, अन्यथा लोग कहेंगे कि एक पुण्य आत्मा के साथ रहने पर मञ्जुघोषा को पिशाचिनी बनना पड़ा।’ मञ्जुघोषा की बात सुनकर मुनि को अपने क्रोध पर अत्यन्त ग्लानि हुई साथ ही अपनी अपकीर्ति का भय भी हुआ, अतः पिशाचिनी बनी मञ्जुघोषा से मुनि ने कहा- ‘तूने मेरा बड़ा बुरा किया है, किन्तु फिर भी मैं तुझे इस शाप (श्राप) से मुक्ति का उपाय बतलाता हूँ। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी है, उसका नाम पापमोचिनी(Papmochani Ekadashi) है। उस एकादशी का उपवास करने से तेरी पिशाचिनी की देह से मुक्ति हो जाएगी।’
ऐसा कहकर मुनि ने उसको व्रत का सब विधान समझा दिया। फिर अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए वे अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गये।
च्यवन ऋषि ने अपने पुत्र मेधावी को देखकर कहा- ‘हे पुत्र! ऐसा क्या किया है तूने कि तेरे सभी तप नष्ट हो गए हैं? जिससे तुम्हारा समस्त तेज मलिन हो गया है?’
मेधावी मुनि ने लज्जा से अपना सिर झुकाकर कहा- ‘पिताश्री! मैंने एक अप्सरा से रमण करके बहुत बड़ा पाप किया है। इसी पाप के कारण सम्भवतः मेरा सारा तेज और मेरे तप नष्ट हो गए हैं। कृपा करके आप इस पाप से छूटने का उपाय बतलाइये।’
ऋषि ने कहा- ‘हे पुत्र! तुम चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी का विधि तथा भक्तिपूर्वक उपवास करो, इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।’
अपने पिता च्यवन ऋषि के वचनों को सुनकर मेधावी मुनि ने पापमोचिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। उसके प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए। मञ्जुघोषा अप्सरा भी पापमोचिनी एकादशी का उपवास करने से पिशाचिनी की देह से छूट गई और पुनः अपना सुन्दर रूप धारण कर स्वर्गलोक चली गई। लोमश मुनि ने कहा-हे राजन! इस पापमोचिनी एकादशी के प्रभाव से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी की कथा के श्रवण व पठन से एक हजार गौदान करने का फल प्राप्त होता है। इस उपवास के करने से ब्रह्म हत्या करने वाले, स्वर्ण चुराने वाले, मद्यपान करने वाले, अगम्या गमन करने वाले आदि भयंकर पाप भी नष्ट हो जाते हैं और अन्त में स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।”
Papmochani Ekadashi व्रत के विषय में भविष्योत्तर पुराण में विस्तार से वर्णन किया गया है। इस व्रत में भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है। इस व्रत को रखने वाले व्रती को दशमी तिथि को एक बार सात्विक भोजन करना चहिये और मन से भोग विलास की भावना को निकालकर श्री हरि में मन को लगाना चहिये।
“गंगा च यमुना चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेसमिन सानिधिम कुरु”
(अर्थात्- इस पानी में, मैं गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी नदियों से दिव्य जल की उपस्थिति का आह्वान करता हूं)
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस संसार में जो भी मनुष्य भगवान श्री विष्णु का आशीर्वाद पाना चाहता है, उसे एकादशी का व्रत जरुर करना चाहिए। एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। एकादशी के व्रत रखने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होने के साथ ही सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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