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पौष पुत्रदा एकादशी 2024-पुत्रदा एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है। पौष मास में शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पौष पुत्रदा एकादशी कहते हैं।यह व्रत आमतौर पर विवाहित जोड़ों द्वारा संतान प्राप्ति के लिए किया जाता हैं। विवाहित जोड़े जो संतान की चाहत रखते हैं, पुत्रदा एकादशी व्रत का पालन करते हैं और भगवान विष्णु का दिव्य आशीर्वाद पाने के लिए इस त्योहार से जुड़े विभिन्न अनुष्ठान भी करते हैं।

पुत्रदा एकादशी साल में दो बार मनाई जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार पहली पुत्रदा एकादशी पौष माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनायी जाती है इसे पौष पुत्रदा एकादशी या पौष शुक्ल पुत्रदा एकादशी कहा जाता है, जिसे अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार जनवरी या दिसंबर महीने में मनाया जाता है। और दूसरी पुत्रदा एकादशी श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनायी जाती है और इसे श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है जो इंग्लिश कैलेंडर वर्ष के अनुसार जुलाई या अगस्त के महीने में आती है।

पौष पुत्रदा एकादशी का महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल के समय श्री कृष्ण ने अर्जुन के पूछने पर पुत्रदा एकादशी का महत्व बताते हुए कहा था। “हे अर्जुन! संसार में पुत्रदा एकादशी उपवास के समान अन्य दूसरा व्रत नहीं है। इसके पुण्य से प्राणी तपस्वी, विद्वान और धनवान बनता है। पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का उपवास करना चाहिए पुत्र प्राप्ति के लिए इससे बढ़कर दूसरा कोई व्रत नहीं है। जो कोई व्यक्ति पुत्रदा एकादशी के माहात्म्य को पढ़ता व श्रवण करता है तथा विधानानुसार इसका उपवास करता है, उसे सर्वगुण सम्पन्न पुत्ररत्न की प्राप्ति होती है। श्रीहरि की अनुकम्पा से वह मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है।”

पौष पुत्रदा एकादशी 2024

दिनांक – 21 जनवरी 2024
वार – रविवार 
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 20 जनवरी 2024 को 07:26 पी एम बजे से
एकादशी तिथि समाप्त – 
जनवरी 21, 2024 को 07:26 पी एम बजे तक 
पारण (व्रत तोड़ने का) समय – 22 जनवरी 2024 को 07:14 ए एम से 09:21 ए एम तक 
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्ति समय – 07:51 पी एम

पुत्रदा एकादशी की कथा

पुत्रदा एकादशी की महत्ता सुन अर्जुन के मन में और जिज्ञासा जाग उठी और उस ने भगवान श्री कृष्ण से कहा – हे कमलनयन! आप कृप्या कर इस व्रत की कथा भी मुझे विस्तारपूर्वक बताएं।

श्रीकृष्ण ने कहा– “हे पाण्डुनंदन! इस एकादशी से सम्बंधित जो कथा प्रचलित है, उसे मैं तुम्हें सुनाता हूँ, श्रद्धापूर्वक श्रवण करो-

प्राचीन समय में भद्रावती नगरी में सुकेतुमान नाम का एक राजा राज्य करता था। उसके कोई संतान नहीं थी। उसकी पत्नी का नाम शैव्या था। पुत्र ना होने के कारण राजा के मन में इस बात की बड़ी चिंता थी कि उसके बाद उसे और उसके पूर्वजों को कौन पिंडदान देगा। राजा रात-दिन इसी चिंता में घुला करता था। इस चिंता के कारण एक दिन वह इतना दुखी हो गया कि उसके मन में अपने शरीर को त्याग देने की इच्छा उत्पन्न हुई , किंतु वह सोचने लगा कि आत्महत्या करना तो महापाप है, अतः उसने इस विचार को मन से निकाल दिया। एक दिन इन्हीं विचारों में डूबा हुआ वह घोड़े पर सवार होकर वन को चल दिया।

घोड़े पर सवार राजा वन, पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा। उसने वन में देखा कि मृग, बाघ, सिंह, बंदर आदि विचरण कर रहे हैं। हाथी शिशुओं और हथिनियों के बीच में विचर रहा है। उस वन में राजा ने देखा कि कहीं तो सियार कर्कश शब्द निकाल रहे हैं और कहीं मोर अपने परिवार के साथ नाच रहे हैं। वन के दृश्यों को देखकर राजा और ज्यादा दुखी हो गया कि उसके पुत्र क्यों नहीं हैं? इसी सोच-विचार में दोपहर हो गई। वह सोचने लगा कि मैंने अनेक यज्ञ किए हैं और ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन करा सामर्थ्य के अनुसार दान दक्षिण दी है, किंतु फिर भी मुझे यह दुख क्यों मिल रहा है? आखिर इसका कारण क्या है? मैं अपनी व्यथा किससे कहूं? और कौन मेरी व्यथा का समाधान कर सकता है?

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अपने विचारों में खोए राजा को प्यास लगी। वह पानी की तलाश में आगे बढ़ा। कुछ दूर जाने पर उसे एक सरोवर मिला। उस सरोवर में कमल पुष्प खिले हुए थे। सारस, हंस, घड़ियाल आदि जल-क्रीड़ा में मग्न थे। सरोवर के चारों तरफ ऋषियों के आश्रम बने हुए थे। अचानक राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे। इसे शुभ शगुन समझकर राजा मन में प्रसन्न होता हुआ घोड़े से नीचे उतरा और सरोवर के किनारे बैठे हुए ऋषियों को प्रणाम करके उनके पूछा ‘हे विप्रो! आप कौन हैं? और किसलिए यहां रह रहे हैं?’

ऋषि बोले – ‘राजन! आज पुत्र की इच्छा करने वालो को श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करने वाली पुत्रदा एकादशी है। आज से पांच दिन बाद माघ स्नान है और हम सब इस सरोवर में स्नान करने आए हैं।’

ऋषियों की बात सुन राजा ने कहा – ‘हे मुनियो! मेरा भी कोई पुत्र नहीं है, कृपा कर मुझे भी इस एकादशी व्रत के बारे में बताएं।

ऋषि बोले – ‘हे राजन! आज पुत्रदा एकादशी है। आप इसका उपवास करें। भगवान श्रीहरि की अनुकम्पा से आपके घर अवश्य ही पुत्र होगा।’

राजा ने मुनि के वचनों के अनुसार उस दिन उपवास किया और द्वादशी को व्रत का पारण किया और ऋषियों को प्रणाम कर उन का आशीर्वाद प्राप्त कर वापस अपनी नगरी आ गया। भगवान श्रीहरि की कृपा से कुछ दिनों बाद ही रानी ने गर्भ धारण किया और नौ माह के पश्चात उसने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। यह राजकुमार बड़ा होने पर अत्यंत वीर, धनवान, यशस्वी और प्रजापालक बना।

पौष पुत्रदा एकादशी 2024 के मंत्र

  • ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र
  • विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम
  • विष्णु अष्टोत्रम
  • संतान गोपाल मन्त्र
    देवकीसुतं गोविन्दम् वासुदेव जगत्पते
    देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:

डिसक्लेमर

इस लेख में प्रदान की गई जानकारी की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की कोई गारंटी नहीं है। यह सूचना विभिन्न स्रोतों, जैसे कि ज्योतिष, पंचांग, प्रवचन, धार्मिक मान्यताएं, और धर्मग्रंथों से संकलित कर यहाँ प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, और पाठक या उपयोगकर्ता से अपील है कि वे इसे सिर्फ सूचना के रूप में ही समझें और उपयोग करें।

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Vivah Panchami 2023: विवाह पंचमी महोत्सव, जानिए क्यों मनाया जाता है? https://astrodeeva.com/vivah-panchami-2023-know-why-vivah-panchami-festival-is-celebrated/ https://astrodeeva.com/vivah-panchami-2023-know-why-vivah-panchami-festival-is-celebrated/#respond Fri, 08 Dec 2023 03:37:18 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3697 हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रति वर्ष मार्गशीष मास के शुक्ल पक्ष के पंचमी तिथि को विवाह पंचमी के रूप में मनाया जाता है।मान्यता है की इस दिन भगवान राम और माता सीता का विवाह हुआ था और इस दिन अगर कुंवारे भगवान राम और जानकी जी की पूजा करते है तो उन्हें  सुयोग्य और मनोवांछित […]

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हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रति वर्ष मार्गशीष मास के शुक्ल पक्ष के पंचमी तिथि को विवाह पंचमी के रूप में मनाया जाता है।मान्यता है की इस दिन भगवान राम और माता सीता का विवाह हुआ था और इस दिन अगर कुंवारे भगवान राम और जानकी जी की पूजा करते है तो उन्हें  सुयोग्य और मनोवांछित जीवनसाथी की प्राप्ति होती है और अगर विवाहित जोड़ा विधि- विधान से पूजा करे तो उनके विवाहित जीवन की सभी परेशानी समाप्त ही जाती है।

विवाह पंचमी 2023 तिथि (Vivah Panchami 2023 Tithi)

दिनांक – 17 दिसम्बर 2023
वार – रविवार
पञ्चमी तिथि प्रारम्भ – 16 दिसम्बर 2023 को 08:00 पी एम बजे
पञ्चमी तिथि समाप्त – 17 दिसम्बर 2023 को 05:33 पी एम बजे

विवाह पंचमी की पूजा विधि (Vivah Panchami Puja Vidhi)

  • विवाह पंचमी के दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें।
  • इसके बाद राम विवाह का संकल्प लें और भगवान श्री राम और माता सीता जी की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करें।
  • मूर्ति स्थापना के बाद भगवान राम को पीले वस्त्र और माता सीता को लाल वस्त्र अर्पित करें। “ॐ जानकीवल्लभाय नमः” इस मंत्र का 108 बार जाप करें और भगवान राम और सीता का गठबंधन करें।
  • इसके बाद भगवान राम और सीता जी की आरती उतारें और भोग लगाएं तथा पूरे घर में प्रसाद बांटकर आप भी ग्रहण करें।

Must Read: उत्पन्ना एकादशी – प्रथम एकादशी व्रत, महत्व, कथा और विधि

विवाह पंचमी महोत्सव

विवाह पंचमी का महोत्सव भारत और नेपाल में पूरे धूम-धाम से मनाया जाता है। इस उत्सव को नेपाल के पौराणिक शहर जनकपुरधाम और अयोध्या में भव्य रूप से मनाया जाता है।

इस महोतवस्व के दौरान नेपाल के जनकपुरधाम में प्रभु श्रीराम तथा माता सीता के विवाह का आयोजन किया जाता है। शहर की साफ-सफाई कर जनकपुर के सभी मंदिरों को सजाया जाता है। इस दिन अयोध्या से आ रही बारात के स्वागत की जबरदस्त तैयारी की जाती है। नगर भ्रमण और स्वागत करने के लिए बच्चों को राम जी और लक्ष्मण जी की प्रतिमूर्ति के रूप में बनाया जाता है। इस दिन झांकी जानकी मंदिर पहुंचकर नगर भ्रमण करती है। महोत्सव के प्रथम दिन फुलवारी लीला ,दूसरे दिन धनुष यज्ञ, तीसरे दिन भगवान राम के तिलकोत्सव की रस्म, चौथे दिन मटकोर और पंचवे दिन विवाहोत्सव मनाया जाता है। जिससे त्रेता युग की अनुभूति होती है। विवाहोत्सव के अगले दिन राम कलेवा के साथ इस महोत्सव का समापन होता है।

विवाह पंचमी के दिन नहीं होते विवाह

हिन्‍दू धर्म में विवाह पंचमी का विशेष महत्‍व है। लेकिन इस दिन कई जगह खासकर भारत के मिथिलांचल और नेपाल में व‍िवाह नहीं करने की परंपरा है। दरअसल, 36 गुण मिलने के बाद भी सीता जी का वैवाहिक जीवन अति दुखद रहा था इसी वजह से लोग विवाह पंचमी के दिन विवाह करना उचित नहीं मानते। मान्‍यता है कि 14 वर्ष के कठोर वनवास के उपरांत राम ने गर्भवती सीता का त्‍याग कर दिया था और इस वजह से माता सीता को महारानी का सुख नहीं मील पाया। इसलिए विवाह पंचमी के दिन लोग अपनी बेटियों का विवाह नहीं करते हैं। लोगों का मानना है कि विवाह पंचमी के दिन विवाह करने से कहीं सीता की तरह ही उनकी बेटी का वैवाहिक जीवन भी दुखमयी न हो जाए।

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Utpanna Ekadashi 2023: प्रथम एकादशी व्रत, महत्व, कथा और विधि https://astrodeeva.com/utpanna-ekadashi-2023-first-ekadashi-fast-importance-story-and-method/ https://astrodeeva.com/utpanna-ekadashi-2023-first-ekadashi-fast-importance-story-and-method/#respond Thu, 07 Dec 2023 14:44:18 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3694 हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि एकादशी का सीधा सम्बन्ध जगत के पालनहार भगवान विष्णु से है। वैसे तो हर मास में 2 एकादशी होती है और एक वर्ष में 24 एकादशियाँ आती है परंतु जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष इनकी संख्या 26 हो जाती है।इन सब […]

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हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि एकादशी का सीधा सम्बन्ध जगत के पालनहार भगवान विष्णु से है। वैसे तो हर मास में 2 एकादशी होती है और एक वर्ष में 24 एकादशियाँ आती है परंतु जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष इनकी संख्या 26 हो जाती है।इन सब में सबसे प्रथम एकादशी मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष एकादशी को माना जाता है क्यूँकि पुराणों के अनुसार इसी दिन देवी एकादशी ने उत्पन्न होकर राक्षस मुर का वध किया था। इसलिए इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi 2023) कहा जाता है।

उत्पन्ना एकादशी का महत्व

पुराणो के अनुसार जो भक्त उत्पन्ना एकादशी का विधि-विधान से व्रत करता है और इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करता है उसे संक्रान्ति में तथा सूर्य और चन्द्र ग्रहण में दान देने से और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य मनुष्य को एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। जो फल ब्राह्मणों को एक हजार गौदान करने से प्राप्त होता है, उससे दस गुना अधिक पुण्य मिलता है। इस के साथ जो भक्त इस दिन दान देता है उसे उसके दिए हुए दान का कई गुना फल प्राप्त होता है।

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

विष्णु पुराण के अनुसार एक बार अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा- “हे प्रभु! आप मुझे एकादशी व्रत के बारे में  कृपा कर विस्तारपूर्वक बताइये।”

श्रीकृष्ण बोले- “हे पार्थ! सतयुग में एक महा भयंकर दैत्य हुआ था, उसका नाम मुर था। उस दैत्य ने इन्द्र आदि देवताओं पर विजय प्राप्त कर उन्हें उनके पद से हटा दिया और स्वर्ग पे अपना आधिपत्य जमा लिया। तब इन्द्र और अन्य देवता वहाँ से भाग कर मृत्युलोक में आ गए और भगवान शंकर से प्रार्थना की- ‘हे भोलेनाथ! हम सब देवता, मुर दैत्य के अत्याचारों से दुखी होकर मृत्युलोक में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। राक्षसों के भय से हम सब बहुत दुख और कष्ट भोग रहे हैं। अतः कृपा कर आप मुर दैत्य के अत्याचार से बचने का उपाय बतलाइये।’

देवराज की प्रार्थना सुन कैलाशपति ने कहा- ‘हे देवेन्द्र! आप भगवान श्रीहरि की शरण में जाइए और उन से इस का उपाय करने का आग्रह करिये। भगवान विष्णु देवताओं को अवश्य ही इस भय से मुक्त करेंगे।’ भोलेनाथ के आदेशानुसार इन्द्र तथा अन्य देवता क्षीर सागर गए, जहाँ पर भगवान श्रीहरि शेष-शैया पर विराजमान थे।

इन्द्र सहित सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के समक्ष उपस्थित होकर उनसे प्रार्थना की – ‘हे तीनों लोकों के स्वामी! हम सभी देवताओं का आपको कोटि-कोटि प्रणाम है। हम आपकी शरण में आए हैं, आप हमारी रक्षा करें। हे जगत के पलनहार! हम सभी देवता दैत्यों के अत्याचारों से भयभीत होकर आपकी शरण में आए हैं। इस समय दैत्यों ने हमें स्वर्ग से निकाल दिया है और हम सभी देवता बड़ी ही दयनीय स्थिति में मृत्युलोक में विचरण कर रहे हैं। अब आप ही हमारे रक्षक हैं! रक्षा कीजिये।

देवताओं का आग्रह सुन, भगवान श्रीहरि बाले- ‘हे देवगणो! वह कौन-सा दैत्य है, जिसने देवताओं को जीत लिया है? आप सभी देवगण किसके भय से पृथ्वीलोक में भटक रहे हैं? क्या वह दैत्य इतना बलवान है, जिसने इन्द्र सहित सभी देवताओं को जीत लिया है? तुम निर्भय होकर मुझे सब हाल बताओ।

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तब देवेन्द्र ने कहा- ‘हे प्रभु! चन्द्रवती नामक नगरी में निवास करने वाला मुर नामक दैत्य ने बल से मृत्युलोक और देवलोक को जीत लिया हैं और सब देवताओं को देवलोक से निकालकर, अपने दैत्य कुल के असुरों लोकपाल बना दिया है। वह स्वयं सूर्य बनकर पृथ्वी को तापता है और स्वयं मेघ बनकर जल की वर्षा करता है, अतः आप इस बलशाली भयानक असुर का संहार करके देवताओं की रक्षा करें।’

इंद्र के मुख से ऐसे वचन सुन भगवान विष्णु बोले- ‘हे देवताओं! मैं आपके शत्रु का शीघ्र ही संहार करूँगा। आप सब इसी समय मेरे साथ चन्द्रवती नगरी चलिए।’

देवताओं की पुकार पर भगवान विष्णु तुरन्त ही उनके साथ चल दिए। उधर दैत्यराज मुर ने अपने तेज से जान लिया था कि श्री विष्णु युद्ध की इच्छा से उसकी राजधानी की तरफ आ रहे हैं, अतः अपने राक्षस योद्धाओं के साथ वह भी युद्ध भूमि में आकर गरजने लगा। देखते-ही-देखते घोर युद्ध शुरू हो गया। देवता तो पहले ही डरे हुए थे, वह अधिक देर तक राक्षसों का सामना न कर सके और भाग खड़े हुए। तब भगवान विष्णु स्वयं युद्ध-भूमि में आ गए। देवताओं को भागता देख  दैत्य पहले से भी ज्यादा जोश में भरकर भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे। वे अपने अस्त्र-शस्त्रों से उन पर भयंकर प्रहार करने लगे। दैत्यों के आक्रमण वारों को भगवान विष्णु अपने चक्र और गदा के प्रहारों से नष्ट करने लगे। इस युद्ध में अनेक दैत्य मृत्यु की गोद में समा गए, किन्तु दैत्य मुर भगवान विष्णु के साथ युद्ध करता रहा। उसका तो जैसे अभी बाल भी बांका नहीं हुआ था। वह बिना डरे युद्ध कर रहा था। भगवान विष्णु मुर को मारने के लिए जिन-जिन शस्त्रों का प्रयोग करते, वे सब उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगते। जब अनेक अस्त्रों-शस्त्रों का प्रयोग करने पर भी दोनो एक दूसरे को जीत न सके, तब वे आपस में मल्ल युद्ध करने लगे। यह युद्ध अनेक वर्षों तक चलता रहा। अन्त में भगवान विष्णु शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बदरिकाश्रम स्थित अड़तीस कोस लम्बी एक द्वार वाली हेमवती नामक गुफा में प्रवेश कर गए।

हे अर्जुन! उस गुफा में प्रभु ने शयन किया। भगवान विष्णु के पीछे-पीछे वह दैत्य भी चला आया था। भगवान श्रीहरि को सोता देखकर वह उन्हें मारने को तैयार हो गया। परन्तु उसकी यह इच्छा पूर्ण न हो सकी, क्योंकि उसी समय भगवान विष्णु की देह से दिव्य वस्त्र धारण किए एक अत्यन्त मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई और राक्षस को ललकारकर उससे युद्ध करने लगी और कुछ समय बीतने पर उस कन्या ने अपने शास्त्रों से दैत्य के अस्त्र-शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और उसका रथ भी तोड़ डाला। अब तो उस दैत्य को बड़ा ही क्रोध आया और वह सारी मर्यादाएँ भंग करके उस कन्या से मल्ल युद्ध करने लगा। उस तेजस्वी कन्या ने उसको धक्का मारकर मुर्च्छित कर दिया और उसकी मूर्च्छा टूटने से पूर्व ही उसका सिर काटकर धड़ से अलग कर दिया।

सिर काटते ही वह असुर मृत्यु को प्राप्त हुआ। भगवान विष्णु जब निद्रा से जागे तो उस असुर को मरा देखकर उन्हें घोर आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि इस महाबली को किसने मारा है?

तब वह तेजस्वी कन्या श्रीहरि से हाथ जोड़कर बोली- ‘हे जगदीश्वर! यह असुर आपको मारने को उद्यत था, तब मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इस असुर का वध किया है।’  कन्या की बात सुन भगवान बोले- ‘तुमने इस असुर को मारा है, अतः हे कन्या! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। इसे मारकर तुमने देवताओं के कष्ट को हरा है, इसलिए तुम अपनी इच्छानुसार वरदान मांग लो। मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करूँगा।’

भगवान की बात सुन कन्या बोली- ‘हे प्रभु! मुझे यह वरदान दीजिये कि जो भी मनुष्य या देव मेरा व्रत करे, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएँ और अन्त में उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हो। मेरे व्रत का आधा फल रात्रि को मिले और उसका आधा फल एक समय भोजन करने वाले को मिले। जो श्रद्धालु भक्तिपूर्वक मेरे व्रत को करें, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक को प्राप्त करें। जो मनुष्य मेरे व्रत में दिन तथा रात्रि को एक बार भोजन करे, वह धन-धान्य से भरपूर रहे। कृपा करके मुझे ऐसा वरदान दीजिये।’

भगवान विष्णु ने कहा- ‘हे कन्या! ऐसा ही होगा। मेरे और तुम्हारे भक्त एक ही होंगे और अन्त में संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त होकर मेरे लोक को प्राप्त करेंगे। तुम एकादशी को पैदा हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम भी एकादशी हुआ और क्योंकि तुम मेरे अंश से उत्पन्न हुई हो, इसलिए संसार मे तुम उत्पन्ना एकादशी के नाम से जानी जाओगी तथा जो मनुष्य इस दिन व्रत करेंगे, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे। तुम्हारे व्रत का फल सब तीर्थों के फल से भी महान होगा।

इतना कहकर, भगवान श्रीहरि उसी स्थान पर अंतर्ध्यान हो गए।”

श्री कृष्ण ने कहा- “हे कुंती पुत्र! एकादशी के व्रत का फल सभी व्रतों व सभी तीर्थों के फल से महान है। एकादशी व्रत करने वाले मनुष्यों के शत्रुओं का मैं जड़ से नाश कर देता हूँ और व्रत करने वाले को मोक्ष प्रदान करता हूँ। उन मनुष्यों के जीवन के जो भी कष्ट होते हैं। मैं उन्हें भी दूर कर देता हूँ। अर्थात मुझे अत्यन्त प्रिय एकादशी के व्रत को करने वाला प्राणी सभी ओर से निर्भय और सुखी होकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त होता है। हे कुन्ती पुत्र! यह मैंने तुम्हें एकादशी की उत्पत्ति के विषय में बतलाया है। एकादशी व्रत सभी पापों को नष्ट करने वाला और सिद्धि प्रदान करने वाला है। श्रेष्ठ मनुष्यों को दोनों पक्षों की एकादशियों को समान समझना चाहिए। उनमें भेद-भाव करना उचित नहीं है। जो मनुष्य एकादशी माहात्म्य का श्रवण व पठन करेंगे, उन्हें अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होगा।

उत्पन्ना एकादशी व्रत की विधि

एकादशी व्रत की शुरुआत उत्पन्ना एकादशी व्रत से करनी चहिये। सभी एकादशी व्रत का पूजा विधान एक समान होता है, जो कि इस प्रकार है:

  • एकादशी व्रत रखने वाले भक्त को एक दिन पूर्व यानि दशमी की रात्रि में भोजन नहीं करना चाहिए।
  • एकादशी के दिन प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए और उन्हें पुष्प, जल, धूप, दीप, अक्षत अर्पित करना चाहिए।
  • इस दिन केवल फलों का ही भोग लगाना चाहिए और समय-समय पर भगवान विष्णु का सुमिरन करना चाहिए। रात्रि में पूजन के बाद जागरण करना चाहिए.
  • अगले दिन द्वादशी को उचित समय पर पारण करना चाहिए। किसी जरुरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन व दान-दक्षिणा देना चाहिए। इसके बाद स्वयं भोजन कर के व्रत खोलना चाहिए।

उत्पन्ना एकादशी व्रत -Utpanna Ekadashi 2023

दिनांक : 08 दिसम्बर 2023

वार : शुक्रवार

एकादशी तिथि प्रारम्भ – 08 दिसम्बर 2023 को 05:06 ए एम

एकादशी तिथि समाप्त – 09 दिसम्बर 2023 को 06:31 ए एम

पारण तिथि : 09 दिसम्बर 2023

पारण समय : 01:16 पी एम से 03:20 पी एम

जीन भक्तजनो ने एकादशी के उपवास को नहीं रखा हैं और इस उपवास को रखना चाहते है वो इस मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी अर्थात उत्पन्ना एकादशी से इसका आरंभ कर सकते है क्योंकि सर्वप्रथम हेमंत ऋतु में इसी एकादशी से इस व्रत का प्रारंभ हुआ माना जाता है।

एकादशी आरती

ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता ।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। ॐ।।

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी ।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।।ॐ।।

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई।। ॐ।।

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है,
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै ।। ॐ ।।

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै ।। ॐ ।।

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी,
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की ।। ॐ ।।

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली,
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। ॐ ।।

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी,
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी।। ॐ ।।

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी ।। ॐ ।।

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए।। ॐ ।।

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला।। ॐ ।।

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।
रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी ।। ॐ ।।

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।
पावन मास में करूं विनती पार करो नैया ।। ॐ ।।

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।।
शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी ।। ॐ ।।

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै।। ॐ ।।

 

 

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Ahoi Ashtami 2023: कब होगा अहोई अष्टमी का व्रत? जाने महत्व, व्रत कथा, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि https://astrodeeva.com/ahoi-ashtami-2023-when-will-be-the-fast-of-ahoi-ashtami-know-the-importance-of-fast-story-auspicious-time-and-worship-method/ https://astrodeeva.com/ahoi-ashtami-2023-when-will-be-the-fast-of-ahoi-ashtami-know-the-importance-of-fast-story-auspicious-time-and-worship-method/#respond Fri, 27 Oct 2023 13:43:01 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3619 Ahoi Ashtami 2023: हिन्दू धर्म पूरे विश्व भर में अपनी अनोखी परंपराओं और त्योहारों के लिए जाना जाता है। इसके सभी त्योहार और वैदिक परंपरायें नयी पीढ़ी को समाज से जोड़ने का काम करती है। हिन्दू धर्म विविधता से भरा धर्म है। इसमें हर प्रांत और समुदाए के कुछ बहुत प्रचलित एवं महत्वपूर्ण अपने व्रत […]

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Ahoi Ashtami 2023: हिन्दू धर्म पूरे विश्व भर में अपनी अनोखी परंपराओं और त्योहारों के लिए जाना जाता है। इसके सभी त्योहार और वैदिक परंपरायें नयी पीढ़ी को समाज से जोड़ने का काम करती है। हिन्दू धर्म विविधता से भरा धर्म है। इसमें हर प्रांत और समुदाए के कुछ बहुत प्रचलित एवं महत्वपूर्ण अपने व्रत त्योहार हैं। 

ऐसे ही अहोई अष्टमी (Ahoi Ashtami) का एक पर्व है जो उत्तर भारत में मनाया जाता है। यह पर्व हर वर्ष हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए व्रत रख कर अहोई माता से प्रार्थना करती है।

अहोई अष्टमी व्रत कथा(Legend Of Ahoi Ashtami)

प्राचीन काल में एक गाँव में साहूकाररहता था, उसके सात पुत्र और सात बहुएं थी। साहूकारकी एक पुत्री भी थी जिसका विवाह हो चुका था और वो अपने ससुराल में रहती थी। साहूकार की बेटी दीपावली पे अपने मायके आयी हुई थी। साहूकार के घर दीपावली की तैयारियां चल रही थी तो उसकी बेटी भी दीपावली की तैयारी में अपनी भाभियों का हाथ बटाने लगी। दीपावली पर घर को लीपना था इसलिए साहूकार की बहुएं और बेटी मिट्टी लाने के लिए जंगल में गई। साहूकारकी बेटी जहां मिट्टी काट रही थी उस स्थान पर स्याही (साही) अपने बेटों से साथ रहती थी। मिट्टी काटते हुए ग़लती से साहूकार की बेटी की कुदाल के चोट से स्याही का एक बच्चा मर गया। यह देख स्याही साहूकार की बेटी पर क्रोधित होकर बोली मैं तुम्हारी कोख बांधूंगी।

यह सुन साहूकार की बेटी साही से बोली की ये अनजाने में हुई गलती है मुझे माफ़ कर दीजिए और मेरी कोख मत बंधिए पर साही अपने पुत्र की मृत्यु से दुखी और साहूकार की बेटी पर अत्यंत क्रोधित थी इसलिए साही ने उसकी बात नहीं सुनी। तब साहूकार की बेटी ने एक एक कर अपनी सातों भाभियों से प्रार्थना की वो उसके बदले अपनी कोख बंधवा ले पर उसकी छ: भाभियों ने मना कर दिया। सबसे छोटी भाभी घर में नयी थी और उस ने सोचा कि अगर में मना करूँगी तो सास बुरा मान जाएगी इसलिए उसने हाँ कर दी और अपनी ननद के बदले अपनी कोख बंधवा ली। इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे होते थे वो सात दिन बाद मर जाते थे। सात पुत्रों की इस प्रकार मृत्यु होने के बाद उसने पंडित को बुलवाकर सारा क़िस्सा बताया। पंडित जी ने उसे सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी।

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पंडित जी की सलाह के अनुसार छोटी बहु ने सुरही गाय की वर्षों तक सेवा की। उसकी सेवा से प्रसन्न हो कर सुरही गाय ने साहूकार की छोटी बहु से कहा ‘हे पुत्री, तू किस लिए मेरी इतनी सेवा कर रही है, बता तुझे मुझ से क्या चहिये?’ जो कुछ तेरी इच्छा हो वह मुझ से मांग ले। साहूकार की बहू ने सुरही गाय को सारा क़िस्सा बताया और कहा कि स्याहु माता ने मेरी कोख बांध दी है जिससे मेरे बच्चे नहीं बचते हैं. यदि आप मेरी कोख खुलवा दे तो मैं आपका उपकार मानूंगी। सुरही गाय ने सारा क़िस्सा सुन बहु से कहा ‘ पुत्री, में तेरी सेवा से बहुत प्रसन्न हूँ, में तुझे सात समुद्र पार स्याहु माता के पास ले चलती हूँ’।

चलते-चलते दोनो रास्ते में थक जाने पर आराम करने लगी, तभी अचानक साहूकार की छोटी बहू की नज़र एक ओर गयी और उस ने देखा कि एक सांप गरूड़ पंखनी के बच्चे को डंसने जा रहा है, यह देखकर उसने सांप को मार डाला। उसी वक्त गरुण पंखनी वहाँ आ गयी और खून बिखरा हुआ देखकर उसे लगा कि छोटी बहु ने उसके बच्चे के मार दिया है इस पर वह छोटी बहू को चोंच से मारना शुरू कर देती है। छोटी बहू इस पर कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है। गरूड़ पंखनी इस पर खुश होती है और सुरही सहित उन दोनो को स्याही के पास पहुंचा देती है। वहां छोटी बहू स्याहु की भी सेवा करती है. स्याहु छोटी बहू की सेवा से प्रसन्न होकर छोटी बहू को सात पुत्र और सात पुत्रवधुओं का आर्शीवाद देती है। यह सुन छोटी बहु स्याहु से कहती है की आप का आशीर्वाद पूरा नहीं हो पायेगा औरसारा क़िस्सा बताती है और कहती है की आप ने मेरी कोख बांध रखी है। स्याहु को सब याद आ जाता है तो वो छोटी बहू को कहती है की तू घर जाने पर अहोई माता का पूरे भक्ति भाव से व्रत रख कर पूजा करना और सात सात अहोई बनाकर सात कड़ाही देना। अहोई माता के आशीर्वाद से तेरी कोख खुल जाएगी और मेरे कथन के अनुसार तेरे सात पुत्र और सात पुत्रवधू होंगे।

तब साहूकार की छोटी बहू घरलोट कर स्याहु की सलाह के अनुसार अहोई माता का पूरे भक्ति भाव से व्रत रख पूजा करी और सात अहोई बनाकर सातकड़ाही देकर उजमन पन किया। इसके फल स्वरूप उसके सात पुत्र हुए और उनकी सात बहुए आयी।

अहोई अष्टमी 2023 पूजा शुभ मुहूर्त (Ahoi Ashtami 2023)

  • दिनांक : नवम्बर 5 , 2023
  • अहोई अष्टमी पूजा मुहूर्त: साय काल 5 बजकर 33 मिनट से साय काल 6 बजकर 52 मिनट तक ( अवधि – 01 घण्टा 18 मिनट्स)
  • तारों को देखने का समय : साय काल 5 बजकर 18 मिनट
  • अहोई अष्टमी के दिन चन्द्रोदय समय : रात 12 बजकर 02 मिनट, नवम्बर 6
  • अष्टमी तिथि प्रारम्भ : नवम्बर 5, 2023 को 12:59 ए एम बजे
  • अष्टमी तिथि समाप्त : नवम्बर 6, 2023 को 03:18 ए एम बज

अहोई अष्टमी व्रत पूजा विधि 

उत्तर भारत के राज्यों में अहोई अष्टमी का व्रत निम्नलिखित तरीके से मनाया जाता है।

  • प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त(सूर्योदयः से पहले) सुबह जल्दी उठ कर स्नान करने के बाद कुछ फल इत्यादि खाते है।
  • तत्पश्यात पूजा के समय संकल्प ले की ‘हे अहोई माता यह व्रत मैं अपने संतान और  की संतान की लम्बी आयु एवं अच्छे भविष्य की कामना के लिए कर रही हूँ, और माता से इसे सफल करने का आग्रह करे। इस व्रत में माता पार्वती की भी पूजा करि जाती है क्योकि वे अनहोनी से बचाने वाली माता है|
  • अहोई माता की पूजा के अनुसार गेरू से अहोई माता का एक चित्र एवं स्याहु और उसके सात पुत्रो का भी चित्र दिवार पर बनाया जाता है|
  • इसके बाद माता के सामने एक कटोरी में चावल, सिंगाड़े एवं मूली रखी जाती है|
  • माता के सामने दिया रखे एवं कहानी सुने या सुनाए| कहानी सुनते या सुनाते समय हाथ में लिए चावलों को साडी एवं दुपट्टे में बाँध दे|
  • पूजा करने से पहले मिट्टी के कर्वे में और लोटे में पानी भर कर रखते है|
  • यह सुनिश्चित कीजिये की करवा करवा चौथ के समय का होना चाहिए|
  • इसके बाद पूरे दिन निर्जला व्रत रखने का संकल्प ले|
  • शाम के वक्त अहोई माता को चौदह पूरी या मठरी या काजू का भोग लगाए|
  • शाम को तारे निकल जाने पर चावल एवं जल तारो को अर्पित किया जाता है और व्रत खोलते है।

अहोई अष्टमी आरती ( Ahoi Ashtami Arti)

जय अहोई माता जय अहोई माता ।
तुमको निसदिन ध्यावत हरी विष्णु धाता ।।

ब्रम्हाणी रुद्राणी कमला तू ही है जग दाता ।
जो कोई तुमको ध्यावत नित मंगल पाता ।।

तू ही है पाताल बसंती तू ही है सुख दाता ।
कर्म प्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता ।।

जिस घर थारो वास वही में गुण आता ।
कर न सके सोई कर ले मन नहीं घबराता ।।

तुम बिन सुख न होवे पुत्र न कोई पता ।
खान पान का वैभव तुम बिन नहीं आता ।।

शुभ गुण सुन्दर युक्ता क्षीर निधि जाता ।
रतन चतुर्दश तोंकू कोई नहीं पाता ।।

श्री अहोई माँ की आरती जो कोई गाता ।
उर उमंग अति उपजे पाप उतर जाता ।।

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Venus Transit : धन, वैभव, प्रेम और सौंदर्य के देव का राशि परिवर्तन, जाने अपनी राशि अनुसार आप पर प्रभाव … https://astrodeeva.com/venus-transit-wealth-splendor/ https://astrodeeva.com/venus-transit-wealth-splendor/#respond Tue, 26 Apr 2022 11:09:28 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3313 Venus Transit – शुक्र को धन, वैभव, प्रेम, सौंदर्य, विलासिता वैवाहिक जीवन का कारक माना गया है। जब कभी भी शुक्र का राशि परिवर्तन होता है तो इसका असर सभी राशियों पर होता है। 27 अप्रैल बुधवार शाम को 6:16 बजे को शुक्र ग्रह का मीन राशि में प्रवेश होगा और यहाँ पर 23 मई रात्रि 8 […]

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Venus Transit – शुक्र को धन, वैभव, प्रेम, सौंदर्य, विलासिता वैवाहिक जीवन का कारक माना गया है। जब कभी भी शुक्र का राशि परिवर्तन होता है तो इसका असर सभी राशियों पर होता है। 27 अप्रैल बुधवार शाम को 6:16 बजे को शुक्र ग्रह का मीन राशि में प्रवेश होगा और यहाँ पर 23 मई रात्रि 8 बजकर 24 मिनट तक रहेंगे।

शुक्र ग्रह मीन राशि में उच्च के होते हैं और कन्या राशि में नीच के होते हैं | शुक्र का सम्बन्ध प्रेम जीवन, रोमांस, भव्यता, शौक, सुख-सुविधाओं आदि से होता है | शुक्र देव उच्च होकर(Venus Transit) मीन राशि मे देव गुरु बृहस्पति के साथ रहेंगे यह एक शुभ योग है जिनकी भी ब्रहस्पति या शुक्र की दशा होगी या फिर मीन राशि मे बैठे ग्रहो को उनको इसके शुभ प्रभाव मिलेंगे।आइये जानते हैं राशि अनुसार इस गोचर का जातकों पर प्रभाव-

राशि अनुसार शुक्र के गोचर का जातकों पर प्रभाव (Effect Of Venus Transit)

मेष राशि – भाग्येश और सप्तमेश की युति रहेगी आपके अंदर कामवासना बढ़ेगी और अनैतिक सम्बन्ध से आपको बचना चाहिए नही तो आप कलंकित हो सकते है किसी स्त्री की वजह से आपको नुकसान हो सकता है शारीरिक सुख के लिए आपका धन खर्च हो सकता है।

वर्षभ राशि– आपकी आमदनी बढ़ेगी पर आपको महसूस नही होगी आपका पैसा आपके पास रुकेगा नही, लाभ तो होगा पर उस लाभ से आपको फायदा महसूस नही होगा, आपके दुश्मन पर आपका दबाव रहेगा और उनसे आपको लाभ भी होगा।

मिथुन राशि– बाहरी क्षेत्रो से आपको लाभ होगा आपकी नोकरी में तरक्की हो सकती है, कारोबार में मुनाफा पहले से अच्छा होगा ,कोई नया कार्य जो शुरू किया है वो भी अच्छा चलने लगेगा।

कर्क राशि– भाग्य आपका साथ देगा और अचानक धन लाभ भी होगा, आपको कोई कीमती चीज़ भी मिल सकती है। आपकी मेहनत आपको सफलता तक लेकर जाएगी।

सिंह राशि– पंचमेश कर्मेश दोनो ही आठवे भाव मे है कोई योन रोग आपको परेशान कर सकता है, बाहरी सम्बन्ध से बचे। कारोबार में उतार चढ़ाव रहेंगे, लाभ ज्यादा नही होगा साथ मे मानसिक परेशानी भी रहेगी।

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कन्या राशि– पार्टनरशिप में आपको लाभ होगा और आपकी कोई यात्रा भी हो सकती है। जीवनसाथी की तरफ से कोई न कोई चिंता आपको परेशान करेगी। आपका भाग्य मजबूती के साथ इस वक़्त काम करेगा।

तुला राशि– दुश्मनों से ही लाभ होगा, आपके साथ कॉम्पिटिशन करने वाले ही आपको फायदा पहुचा देंगे। आपके पास धन बढेगा और आप अपने काम पर पूरा फोकस कर पाएंगे। अगर आपका कोई केस चल रहा है तो उसमे जल्दी ही फायदा होगा।

वृश्चिक  राशि– आपके अंदर आकर्षण बढेगा और आप दूसरों की तरफ खीचेंगे, आपका कोई प्रेम संबंध शुरू हो सकता है। सन्तान की तरफ से जो चिंता थी वो कम होगी।

धनु राशि– कुछ नया लेना चाहेंगे। लोन पर नई नई चीज़ों के लिए आपका मन विचलित होगा, आप शॉपिंग पर पैसा खर्च करेंगे। कारोबार में अचानक फायदा होने के योग बनेंगे।

मकर राशि– आपको मित्रो से, छोटे भाई बहनों से फायदा होगा। अटके काम को पूरा करने में आपके अपने सहयोग करेंगे ।आपके काम की तारीफ होगी, नई नोकरी का योग भी बनेगा जिसमे आपको लाभ होगा।

कुम्भ राशि– पैसा आएगा आपके पास और जुड़ेगा भी। परिवार का सहयोग भी प्राप्त होगा। चल रही आंखों की परेशानी में कुछ सुधार होगा।अचानक से कही से आपके पास अच्छा पैसा आने का योग भी बनेगा जो आपकी बड़ी परेशानी को कम करेगा।

मीन राशि– मेहनत से आपको लाभ होगा पर छोटी मोटी कोई न कोई बीमारी आपको परेशान करेगी, मानसिक चिंता रहेगी। मित्रो से साथ आपका झगड़ा हो सकता है, वाहन का इस्तेमाल सम्भाल कर या एक महीना न करे तो ज्यादा अच्छा रहेगा।

शुक्र ग्रह के उपाय (Venus Remedies)

  • शुक्रवार को मखाने डालकर गाय के दूध में खीर बनाए और उस को विष्णु लक्ष्मी जी को भोग लगाकर मंदिर में बाटें।
  • शुक्रवार को माँ दुर्गा के श्रृंगार का सामान मंदिर में दान दें।
  • एक देसी घी का दीपक हर रोज़ लक्ष्मी माता के सामने जलाना चाहिए।
  • यदि आप शुक्र ग्रह के दोष से पीड़ित हैं तो आपको गाय को रोटी खिलाना चाहिए।
  • रत्नों में हीरा धारण करना चाहिए।

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शास्त्रों के अनुसार जाने किन कार्यों में पत्नी को दायीं और कब बाईं ओर होना चाहिए…? https://astrodeeva.com/according-to-the-scriptures-in-which-tasks-the-wife-should-be-on-the-right-and-when-on-the-left/ https://astrodeeva.com/according-to-the-scriptures-in-which-tasks-the-wife-should-be-on-the-right-and-when-on-the-left/#respond Mon, 25 Apr 2022 14:26:27 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3285 हिंदू शास्त्रों में पत्नी को वामांगी का दर्जा दिया गया है, जिसका अर्थ होता है बाएं अंग का अधिकारी। इसलिए पुरुषों के शरीर का बायां यानी लेफ्ट भाग के शरीर का हिस्सा महिलाओं का माना जाता है। इसका कारण यह है कि भगवान शिव के बाएं अंग से स्त्री की उत्पत्ती हुई थी, जिसका प्रतीक […]

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हिंदू शास्त्रों में पत्नी को वामांगी का दर्जा दिया गया है, जिसका अर्थ होता है बाएं अंग का अधिकारी। इसलिए पुरुषों के शरीर का बायां यानी लेफ्ट भाग के शरीर का हिस्सा महिलाओं का माना जाता है। इसका कारण यह है कि भगवान शिव के बाएं अंग से स्त्री की उत्पत्ती हुई थी, जिसका प्रतीक है कि महादेव का अर्धनारीश्वर शरीर। लेकिन शास्त्रों में कई कार्यों या संस्कार में महिलाओं को दायीं ओर होने को भी कहा गया है। जिसमें महिलाओं को दायीं ओर रहकर ही कुछ कार्य को करना होता है। आइए जानते हैं पत्नी को कब दायीं ओर और कब बाईं ओर होना चाहिए। इसके पीछे क्या है धार्मिक और शास्त्रिय मत..

पत्नी को इन कार्यों में पति के बायीं ओर बैठती चाहिए 

शास्त्रों में स्त्री पुरुष की वामांगी होती है इसलिए सिंदूर दान करते समय, द्विरागमन, भोजन करते समय, सोते समय, सेवा के समय, आशीर्वाद ग्रहण करते समय और ब्राह्मणों के पांव धोते समय पत्नी को पति के बायीं ओर रहना चाहिए। इससे शुभ फलों की प्राप्ति होती है।

पत्नी को इन कार्यों में पति के दायीं ओर बैठती चाहिए 

वामांगी होने के बाद भी कुछ विशेष कार्यों में पत्नी को दायीं ओर रहकर कार्य करने के लिए शास्त्र कहता हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि कन्यादान करते समय, विवाह, यज्ञकर्म एवं जातकर्म, नामकरण और अन्न प्राशन के शुभ अवसर पर पत्नी को पति के दाहिने भाग की ओर बैठना चाहिए।

जानिए क्या है दाएं और बायीं ओर का तर्क 

पत्नी के पति के दाएं और बायीं ओर बैठने संबंधी मान्यता के पीछे तर्क यह है कि जो कार्य सांसारिक होते हैं अथवा जो कर्म इह लौकिक होते हैं, उसमें पत्नी को पुरुष के बायीं ओर बैठना चाहिए। जैसे मांग में सिंदूर भरते समय, सेवा करते समय, सोने के समय आदि कार्यों में पत्नी वामांगी का कार्य करती है। यज्ञ, कन्या दान करते समय, विवाह आदि ये सभी शुभ कार्य पुरुष प्रधान होते हैं। इसलिए इन कार्यों में पत्नी को पुरुष के दायीं ओर बैठने का नियम शास्त्रों में बताया गया है।

भगवान शिव ने दिया समानता का संदेश

भगवान शिव की अर्धनारीश्वर रूप में पूजा की जाती है क्योंकि मान्यता है कि भगवान शिव के बायीं हिस्से से स्त्री की उत्पत्ती हुई थी। भगवान का यह अवतार स्त्री और पुरुष की समानता का संदेश देता है। शिव ने यह रूप अपनी इच्छा से लिया था ताकि वह संसार को संदेश दे सकें कि बिना स्त्री के पुरुष अधूरा है और बिना पुरुष के स्त्री अधूरी है। ईश्वर की नजर में स्त्री और पुरुष दोनों एक समान हैं और दोनों का बराबर सम्मान है।

शिवपुराण में मिलती है कथा

शिवपुराण में एक कथा मिलती है कि किस तरह भगवान शिव ने अपनी वामांगी को अधिकारी बताया। कथा के अनुसार, जब भगवान राम 14 वर्ष के लिए वनवास गए थे तब देवी सती ने उनकी परिक्षा लेने के लिए सीता का रूप धारण कर लिया था। लेकिन भगवान राम माता सती को पहचान लेते हैं और उनकी प्रार्थना करते हैं।

भगवान शिव हो जाते हैं नाराज

जब देवी सति वापस कैलाश आती हैं तब भगवान शिव नाराज हो जाते हैं। भगवान शिव माता सती से कहते हैं कि आपने मेरे आराध्य देव की परिक्षा लेकर गलत कार्य किया है। ऐसा करके आपने भगवान राम का अपमान किया है। इसलिए आपने वामांगी होने का अधिकार खो दिया है।

 

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Ashta Lakshmi: माता लक्ष्मी के 8 स्वरूप https://astrodeeva.com/ashta-lakshmi-8-forms-of-mata-lakshmi/ https://astrodeeva.com/ashta-lakshmi-8-forms-of-mata-lakshmi/#comments Fri, 15 Apr 2022 01:19:00 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3212 Ashta Lakshmi – धर्मग्रंथों में माता लक्ष्मी को धन समृद्धि की देवी बताया गया है। इन्हें भगवान विष्णु की पत्नी और आदिशक्ति भी कहा गया। धन समृद्धि के लिए लोग इनकी पूजा अर्चना करते हैं लेकिन देवी लक्ष्मी एक नहीं पूरी 8 हैं और यह अलग-अलग माध्यमों से अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती हैं। इसलिए […]

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Ashta Lakshmi – धर्मग्रंथों में माता लक्ष्मी को धन समृद्धि की देवी बताया गया है। इन्हें भगवान विष्णु की पत्नी और आदिशक्ति भी कहा गया। धन समृद्धि के लिए लोग इनकी पूजा अर्चना करते हैं लेकिन देवी लक्ष्मी एक नहीं पूरी 8 हैं और यह अलग-अलग माध्यमों से अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती हैं। इसलिए धर्मग्रंथों में अष्ट लक्ष्मी का उल्लेख किया गया है। ये अष्ट लक्ष्मी (Ashta Lakshmi) अपने नाम के अनुसार फल देती हैं इसलिए आपको मनोकामना और सुख-समृद्धि की चाहत के अनुसार ही देवी लक्ष्मी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करनी चाहिए है। भक्त प्रति शुक्रवार और दीपावली को माँ लक्ष्मी के इन (Ashta Lakshmi) सभी रूपों की वंदना कर माता को प्रसन्न करके असीम सम्पदा और धन की प्राप्ति कर सकते है | आज मां लक्ष्मी के प्रिय दिन शुक्रवार को हम आपको अष्ट लक्ष्मी के सभी स्वरूपों और उनकी पूजा विधि के बारे में बता रहे हैं…

अष्ट लक्ष्मी के स्वरूप – Ashta Lakshmi Forms

पहला स्वरूप – आदिलक्ष्मी 

देवी लक्ष्मी का पहला स्वरूप आदिलक्ष्मी का है इन्हें मूललक्ष्मी, आदिशक्ति भी कहा जाता है। श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार महालक्ष्मी ने ही सृष्टि के आरंभ में त्रिदेवों को प्रकट किया और इन्हीं से महाकाली और महासरस्वती ने आकार लिया। इन्होंने स्वयं जगत के संचालन के लिए भगवान विष्णु के साथ रहना स्वीकार किया। यह देवी जीव-जंतुओं को प्राण प्रदान करती हैं, इनसे जीवन की उत्पत्ति हुई है। इनके भक्त मोह-माया से मुक्ति होकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं। इनकी कृपा से लोक-परलोक में सुख-संपदा प्राप्त होती है।

दूसरा स्वरूप – धनलक्ष्मी 

देवी लक्ष्मी का दूसरा स्वरूप हैं धनलक्ष्मी। इन्होंने भगवान विष्णु को कुबेर के कर्ज से मुक्ति दिलाने के लिए यह रूप धारण किया था। इस देवी का संबंध भगवान वेंकटेश से है जो भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। वेंकटेश रूप में भगवान ने देवी पद्मावती से विवाह के लिए कुबेर से कर्ज लिया। इसी कर्ज को चुकाने में भगवान की सहायता के लिए देवी लक्ष्मी धनलक्ष्मी रूप में प्रकट हुईं। इनके पास धन से भरा कलश है और एक हाथ में कमल फूल है। इनकी पूजा और भक्ति आर्थिक परेशानियों और कर्ज से मुक्ति दिलाती है। कर्ज से परेशान लोगों को देवी लक्ष्मी के इस स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।

तीसरा स्वरूप – धान्यलक्ष्मी 

धान्य का अर्थ है अन्न संपदा। देवी लक्ष्मी का यह स्वरूप अन्न का भंडार बनाए रखती हैं। इन्हें माता अन्नपूर्णा का स्वरूप भी माना जाता है। यह देवी हर घर में अन्न रूप में विराजमान रहती हैं। इन्हें प्रसन्न करने का एक सरल तरीका है कि घर में अन्न की बर्बादी ना करें। जिन घरों में अन्न का निरादर नहीं होता है उस घर में यह देवी प्रसन्नता पूर्वक रहती हैं और अन्न धन का भंडार बना रहता है।

चौथा स्वरूप – गजलक्ष्मी 

देवी लक्ष्मी अपने चौथे स्वरूप में गजलक्ष्मी रूप में पूजी जाती हैं। इस स्वरूप में देवी कमल पुष्प के ऊपर हाथी पर विराजमान हैं और इनके दोनों ओर हाथी सूंड में जल लेकर इनका अभिषेक करते हैं। देवी की चार भुजाएं हैं जिनमें देवी ने कमल का फूल, अमृत कलश, बेल और शंख धारण किया है। देवी गजलक्ष्मी को कृषि और उर्वरता की देवी माना गया है। राज को समृद्धि प्रदान करने वाली देवी होने के कारण इन्हें राजलक्ष्मी भी कहा जाता है। यह संतान सुख भी प्रदान करती हैं। कृषिक्षेत्र से जुड़े लोगों और संतान की इच्छा रखने वालों को देवी के इस स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।

पांचवां स्वरूप – सन्तानलक्ष्मी 

माता लक्ष्मी का पांचवां स्वरूप संतान लक्ष्मी का है। श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार देवी आदिशक्ति का पांचवां स्वरूप स्कंदमाता का है जो अपनी गोद में बालक कुमार स्कंद को बैठाए हुई हैं। माता संतानलक्ष्मी का स्वरूप स्कंदमाता से मिलता-जुलता हुआ है और यह देवी लक्ष्मी का पांचवां स्वरूप हैं इसलिए स्कंदमाता और संतान लक्ष्मी को समान माना गया है। संतान लक्ष्मी माता की चार भुजाएं हैं जिनमें दो भुजाओं में माता ने कलश धारण किया है और नीचे के दोनों हाथों में तलवार और ढ़ाल है। यह देवी भक्तों की रक्षा अपने संतान के समान करती हैं। इनकी पूजा से योग्य संतान की प्राप्ति होती है। संतान से घर में सुख समृद्धि आती है।

छठा स्वरूप – वीरलक्ष्मी 

अपने नाम के अनुसार यह देवी वीरों और साहसी लोगों की आराध्य हैं। यह युद्ध में विजय दिलाती हैं। इनकी आठ भुजाएं हैं जिनमें देवी ने विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण किया हुआ है। माता वीर लक्ष्मी भक्तों की रक्षा करती हैं और अकाल मृत्यु से बचाती हैं। इनकी कृपा से सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इन्हें मां कात्यायिनी का स्वरूप भी माना जाता है जिन्होंने महिषासुर का वध करके भक्तों की रक्षा की।

सातवां स्वरूप – विजयलक्ष्मी 

देवी का सातवां स्वरूप विजयलक्ष्मी का है इन्हें जयलक्ष्मी भी कहा जाता है। इस स्वरूप में माता सभी प्रकार की विजय प्रादान करने वाली हैं। अष्टभुजी यह माता भक्तों को अभय प्रदान करती हैं। कोर्ट-कचहरी में जीत का मामला हो या किसी क्षेत्र में आप संकट में फंसे हों तो देवी के इस स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।

आठवां स्वरूप – विद्यालक्ष्मी 

शिक्षा और ज्ञान से समृद्धि प्रदान करने वाली देवी लक्ष्मी माता का आठवां स्वरूप है। इनका स्वरूप मां दुर्गा से दूसरे स्वरूप ब्रह्मचारिणी माता से मिलता-जुलता है। इनकी साधना से शिक्षा के क्षेत्र में सफलता और ज्ञान की वृद्धि होती है। इनके साधक अपनी बुद्धि और ज्ञान से प्रसिद्धि पाते हैं।

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Surya Arghya – क्या है सूर्य को जल चढ़ाने के नियम, पालन करने से बढ़ेगा मान-सम्मान https://astrodeeva.com/surya-arghya-what-is-the-honor-and-respect-will-increase-by-following-the-rules-of-offering-water-to-the-sun/ https://astrodeeva.com/surya-arghya-what-is-the-honor-and-respect-will-increase-by-following-the-rules-of-offering-water-to-the-sun/#respond Wed, 30 Mar 2022 11:30:28 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3107 धर्म ग्रंथों में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता कहा गया हैं। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा का कारक ग्रह माना गया है। इसलिए ऊर्जा और सकारात्मकता बढ़ाने के लिए सूर्य का पूजन किया जाता है। नियमित सूर्य को अर्घ्य देने/ जल चढ़ाने (Surya Arghya) से हमारी नेतृत्व क्षमता में वृद्धि होती है। साथ ही बल, […]

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धर्म ग्रंथों में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता कहा गया हैं। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा का कारक ग्रह माना गया है। इसलिए ऊर्जा और सकारात्मकता बढ़ाने के लिए सूर्य का पूजन किया जाता है। नियमित सूर्य को अर्घ्य देने/ जल चढ़ाने (Surya Arghya) से हमारी नेतृत्व क्षमता में वृद्धि होती है। साथ ही बल, तेज, पराक्रम, सम्मान और उत्साह बढ़ता है। धर्म ग्रंथों में सूर्य देव को जल चढ़ाने के कुछ खास नियम बताये गए है, जिनका पालन सभी को करना चाहिए अन्यथा सूर्य देव को जल चढाने का फल प्राप्त नहीं होता हैं। आइये जानते है क्या है यह नियम –

सूर्य को जल चढ़ाने के नियम – Rules of Surya Arghya

  1. सबसे पहले स्नान के बाद आसन पर खड़े हो जाएं।
  2. आसन पर खड़े होकर तांबे के पात्र में पवित्र जल लें और उसमें मिश्री भी मिलाएं। मान्यता है कि सूर्यदेव को मीठा जल चढ़ाने से मंगल के दोष दूर होता है।
  3. सुबह के समय सूर्य कि किरणें औषधी के समान काम करती हैं। इसलिए सूर्य को अर्घ्य देने से पहलो सूर्यदेव के हाथ जोड़कर कुछ मिनट सीधे सूर्य को देखें। ये आपको निरोगी बनाता है।
  4. सूर्य को धीरे-धीरे करके जल चढ़ाएं। ध्यान रखें सूर्यदेव को चढ़ाया जल आपके पैरों को स्पर्श नहीं करना चाहिए।
  5. सूर्य देव को चढ़ाया जल जमीन पर गिरने से अर्घ्य का संपूर्ण लाभ आप नहीं पा सकेंगे, इसलिए चढ़ाएं जल को किसी पात्र में एकत्रित कर लें।
  6. अर्घ्य देते समय यह मंत्र 11 या 21 बार बोलना चाहिए- ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय, सहस्त्रकिरणाय।मनोवांछित फलं देहि देहि स्वाहा:।।
  7. अर्घ्य देते समय थोड़ा-सा जल बचा लें और सीधे हाथ में लेकर अपने चारों और छिड़के।
  8. सूर्य देव को जल चढ़ाने के बाद अपने स्थान पर ही तीन बार घुमकर परिक्रमा करें।
  9. आसन उठाकर उस स्थान को नमन करें, जहां खड़े होकर आपने सूर्य को जल चढ़ाया हो।
  10. पात्र में एकत्रित हुए जल को मिट्‌टी से भरे गमले में डालें।

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April 2022 Vrat and Festival – अप्रैल 2022 में पड़ने वाले व्रत एवं त्यौहार https://astrodeeva.com/april-2022-vrat-and-festival-april-2022-vrat-and-festival/ https://astrodeeva.com/april-2022-vrat-and-festival-april-2022-vrat-and-festival/#respond Tue, 29 Mar 2022 11:30:54 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3079 April 2022 Vrat and Festival – अप्रैल 2022 व्रत एवं त्यौहार दिनांक  व्रत एवं त्यौहार  दिन / वार  1 अप्रैल 2022 चैत्र अमावस्या, इष्टि शुक्रवार 2 अप्रैल 2022 चैत्र नवरात्रि घटस्थापना पूजन,  उगादी , गुड़ी पड़वा, झूलेलाल जयन्ती शनिवार 3 अप्रैल 2022 मत्स्य जयन्ती, स्वायम्भुव मन्वादि रविवार 4 अप्रैल 2022 गौरी पूजा, गणगौर, मासिक कार्तिगाई सोमवार 5 अप्रैल 2022 विनायक चतुर्थी,  लक्ष्मी पञ्चमी, शुक्ल पञ्चमी मंगलवार 6 अप्रैल 2022 रोहिणी व्रत, स्कन्द […]

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April 2022 Vrat and Festival – अप्रैल 2022 व्रत एवं त्यौहार

दिनांक 

व्रत एवं त्यौहार 

दिन / वार 

अप्रैल 2022

चैत्र अमावस्या, इष्टि

शुक्रवार

अप्रैल 2022

चैत्र नवरात्रि घटस्थापना पूजन,  उगादी , गुड़ी पड़वा, झूलेलाल जयन्ती

शनिवार

अप्रैल 2022

मत्स्य जयन्ती, स्वायम्भुव मन्वादि

रविवार

अप्रैल 2022

गौरी पूजा, गणगौर, मासिक कार्तिगाई

सोमवार

5 अप्रैल 2022

विनायक चतुर्थी,  लक्ष्मी पञ्चमी, शुक्ल पञ्चमी

मंगलवार

6 अप्रैल 2022

रोहिणी व्रतस्कन्द षष्ठी

बुधवार

7 अप्रैल 2022

यमुना छठ

बृहस्पतिवार

8 अप्रैल 2022

चैत्र नवपद ओली प्रारम्भ

शुक्रवार

9 अप्रैल 2022

मासिक दुर्गाष्टमी

शनिवार

10 अप्रैल 2022

राम नवमी, स्वामीनारायण जयन्ती, महातारा जयन्ती

रविवार

12 अप्रैल 2022

कामदा एकादशी

मंगलवार

13 अप्रैल 2022

वैष्णव कामदा एकादशी, वामन द्वादशी

बुधवार

14 अप्रैल 2022

महावीर स्वामी जयन्ती, मेष संक्रान्ति, सूर्य का मीन से मेष राशि में प्रवेश, पुथन्डू, अम्बेडकर जयन्ती, बैसाखी, प्रदोष व्रत

गुरुवार

15 अप्रैल 2022

विषु कानी, पहेला वैशाख, गुड फ्राइडे

शुक्रवार

16 अप्रैल 2022

हनुमान जयन्ती,  शुक्ल पूर्णिमा, चैत्र नवपद ओली पूर्ण, चैत्र पूर्णिमा व्रत, स्वारोचिष मन्वादि

शनिवार

17 अप्रैल 2022

वैशाख प्रारम्भ, ईस्टर, इष्टि

रविवार

19 अप्रैल 2022

विकट संकष्टी चतुर्थी

मंगलवार

23 अप्रैल 2022

कालाष्टमी

शनिवार

26 अप्रैल 2022

बरूथिनी एकादशी, वल्लभाचार्य जयन्ती

मंगलवार

28 अप्रैल 2022

प्रदोष व्रत

बृहस्पतिवार

29 अप्रैल 2022

मासिक शिवरात्रि,

 शुक्रवार

30 अप्रैल 2022

दर्श अमावस्या,

वैशाख अमावस्या

शनिवार

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Papmochani Ekadashi 2022 – पापमोचनी एकादशी https://astrodeeva.com/papmochani-ekadashi-2022-papmochani-ekadashi/ https://astrodeeva.com/papmochani-ekadashi-2022-papmochani-ekadashi/#respond Sat, 26 Mar 2022 04:30:13 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3057 हिन्दू या सनातन धर्म विविधता से परिपूर्ण है यह वास्तव में एक जीवन पद्धति है। हर वर्ष  होने वाले तीज, त्यौहार, कर्म कांड ही हिन्दू धर्म की विविधता और विशालता को दर्शाते हैं। हिन्दू धर्म में शुभ तिथियों और त्यौहार का बड़ा महत्व है। विभिन्न हिंदू व्रतों के बीच, एकादशी व्रत का सर्वोच्च स्थान है। हिंदू […]

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हिन्दू या सनातन धर्म विविधता से परिपूर्ण है यह वास्तव में एक जीवन पद्धति है। हर वर्ष  होने वाले तीज, त्यौहार, कर्म कांड ही हिन्दू धर्म की विविधता और विशालता को दर्शाते हैं। हिन्दू धर्म में शुभ तिथियों और त्यौहार का बड़ा महत्व है। विभिन्न हिंदू व्रतों के बीच, एकादशी व्रत का सर्वोच्च स्थान है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक माह में दो पक्ष होते हैं, दोनों पक्षों शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की ग्याहरवीं तिथि को एकादशी का व्रत किया जाता है। इस तरह  एक महीने में दो एकादशियां, और एक वर्ष में 24 एकादशियां होती हैं।हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की ग्याहरवीं तिथि को पापमोचनी (Papmochani Ekadashi) अथवा पापों को भस्म करने वाली एकादशी के रूप में मनाया जाता हैं। इस मोह माया से भरे संसार में ऐसा कोई मनुष्य नहीं जन्मा जिससे अनजाने में कोई पाप नहीं हुआ हो इसलिए पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) का विशेष महत्व है इस एकादशी को करने से जाने-अनजाने में हुए सभी तरह के पाप के दोष से मुक्ति प्राप्त होती हैं।

पापमोचनी एकादशी 2022 (Papmochani Ekadashi 2022)

दिनांक : 28 मार्च 2022
वार : सोमवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ : 27 मार्च 2022 को 06:04 पी एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त : 28 मार्च 2022 को 04:15 पी एम बजे
पारण (व्रत तोड़ने का) समय : 29 मार्च 2022 को 06:15 ए एम से 08:43 ए एम
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय02:38 पी एम

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पापमोचनी एकादशी कथा (Story of Papmochani Ekadashi)

 पुराणों के अनुसार एक बार अर्जुन ने कहा- “हे कमलनयन! मैं ज्यों-ज्यों एकादशियों के व्रतों की कथाएँ सुन रहा हूँ, त्यों-त्यों अन्य एकादशियों के व्रतों की कथाएँ सुनने की मेरी जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही है। हे मधुसूदन! अब कृपा कर आप चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के विषय में बतलाइये। इस एकादशी का नाम क्या है? इसमें कौन-से देवता का पूजन किया जाता है तथा इस व्रत का क्या विधान है? हे श्रीकृष्ण! यह सब आप मुझे विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें।”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! एक बार यही प्रश्न पृथ्वीपति मान्धाता ने लोमश ऋषि से किया था, जो कुछ लोमश ऋषि ने राजा मान्धाता को बताया था, वही मैं तुमसे कह रहा हूँ। राजा मान्धाता ने धर्म के गुह्यतम रहस्यों के ज्ञाता महर्षि लोमश से पूछा- ‘हे ऋषिश्रेष्ठ! मनुष्य के पापों का मोचन किस प्रकार सम्भव है? कृपा कर कोई ऐसा सरल उपाय बतायें, जिससे सहज ही पापों से छुटकारा मिल जाए।’

महर्षि लोमश ने कहा- ‘हे नृपति! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम पापमोचिनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) है। उसके व्रत के प्रभाव से मनुष्यों के अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं। मैं तुम्हें इस व्रत की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो- प्राचीन समय में चैत्ररथ नामक एक वन था। उसमें अप्सराएँ किन्नरों के साथ विहार किया करती थीं। वहाँ सदैव वसन्त का मौसम रहता था, अर्थात उस जगह सदा नाना प्रकार के पुष्प खिले रहते थे। कभी गन्धर्व कन्‍याएँ विहार किया करती थीं, कभी देवेन्द्र अन्य देवताओं के साथ क्रीड़ा किया करते थे।

उसी वन में मेधावी नाम के एक ऋषि भी तपस्या में लीन रहते थे। वे शिवभक्त थे। एक दिन मञ्जुघोषा नामक एक अप्सरा ने उनको मोहित कर उनकी निकटता का लाभ उठाने की चेष्टा की, इसलिए वह कुछ दूरी पर बैठ वीणा बजाकर मधुर स्वर में गाने लगी। उसी समय शिव भक्त महर्षि मेधावी को कामदेव भी जीतने का प्रयास करने लगे। कामदेव ने उस सुन्दर अप्सरा के भ्रू का धनुष बनाया। कटाक्ष को उसकी प्रत्यन्चा बनाई और उसके नेत्रों को मञ्जुघोषा अप्सरा का सेनापति बनाया। इस तरह कामदेव अपने शत्रुभक्त को जीतने को तैयार हुआ। उस समय महर्षि मेधावी भी युवावस्था में थे और काफी हृष्ट-पुष्ट थे। उन्होंने यज्ञोपवीत तथा दण्ड धारण कर रखा था। वे दूसरे कामदेव के समान प्रतीत हो रहे थे। उस मुनि को देखकर कामदेव के वश में हुई मञ्जुघोषा ने धीरे-धीरे मधुर वाणी से वीणा पर गायन शुरू किया तो महर्षि मेधावी भी मञ्जुघोषा के मधुर गाने पर तथा उसके सौन्दर्य पर मोहित हो गए। वह अप्सरा मेधावी मुनि को कामदेव से पीड़ित जानकर उनसे आलिङ्गन करने लगी।

महर्षि मेधावी उसके सौन्दर्य पर मोहित होकर शिव रहस्य को भूल गए और काम के वशीभूत होकर उसके साथ रमण करने लगे। काम के वशीभूत होने के कारण मुनि को उस समय दिन-रात का कुछ भी ज्ञान न रहा और काफी समय तक वे रमण करते रहे। तदुपरान्त मञ्जुघोषा उस मुनि से बोली- ‘हे ऋषिवर! अब मुझे बहुत समय हो गया है, अतः स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये।’

अप्सरा की बात सुनकर ऋषि ने कहा- ‘हे मोहिनी! सन्ध्या को तो आयी हो, प्रातःकाल होने पर चली जाना।’

ऋषि के ऐसे वचनों को सुनकर अप्सरा उनके साथ रमण करने लगी। इसी प्रकार दोनों ने साथ-साथ बहुत समय बिताया।

मञ्जुघोषा ने एक दिन ऋषि से कहा- ‘हे विप्र! अब आप मुझे स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये।’

मुनि ने इस बार भी वही कहा- ‘हे रूपसी! अभी ज्यादा समय व्यतीत नहीं हुआ है, कुछ समय और ठहरो।’

मुनि की बात सुन अप्सरा ने कहा- ‘हे ऋषिवर! आपकी रात तो बहुत लम्बी है। आप स्वयं ही सोचिये कि मुझे आपके पास आये कितना समय हो गया। अब और ज्यादा समय तक ठहरना क्या उचित है?’

अप्सरा की बात सुन मुनि को समय का बोध हुआ और वह गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगे। जब उन्हें समय का ज्ञान हुआ कि उन्हें रमण करते सत्तावन (57) वर्ष व्यतीत हो चुके हैं तो उस अप्सरा को वह काल का रूप समझने लगे। इतना ज्यादा समय भोग-विलास में व्यर्थ चला जाने पर उन्हें बड़ा क्रोध आया। अब वह भयंकर क्रोध में जलते हुए उस तप नाश करने वाली अप्सरा की तरफ भृकुटी तानकर देखने लगे। क्रोध से उनके अधर काँपने लगे और इन्द्रियाँ बेकाबू होने लगीं। क्रोध से थरथराते स्वर में मुनि ने उस अप्सरा से कहा- ‘मेरे तप को नष्ट करने वाली दुष्टा! तू महा पापिन और बहुत ही दुराचारिणी है, तुझ पर धिक्कार है। अब तू मेरे शाप (श्राप) से पिशाचिनी बन जा।’

मुनि के क्रोधयुक्त शाप (श्राप) से वह अप्सरा पिशाचिनी बन गई। यह देख वह व्यथित होकर बोली- ‘हे ऋषिवर! अब मुझ पर क्रोध त्यागकर प्रसन्न होइए और कृपा करके बताइये कि इस शाप (श्राप) का निवारण किस प्रकार होगा? विद्वानों ने कहा है, साधुओं की सङ्गत अच्छा फल देने वाली होती है और आपके साथ तो मेरे बहुत वर्ष व्यतीत हुए हैं, अतः अब आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइए, अन्यथा लोग कहेंगे कि एक पुण्य आत्मा के साथ रहने पर मञ्जुघोषा को पिशाचिनी बनना पड़ा।’ मञ्जुघोषा की बात सुनकर मुनि को अपने क्रोध पर अत्यन्त ग्लानि हुई साथ ही अपनी अपकीर्ति का भय भी हुआ, अतः पिशाचिनी बनी मञ्जुघोषा से मुनि ने कहा- ‘तूने मेरा बड़ा बुरा किया है, किन्तु फिर भी मैं तुझे इस शाप (श्राप) से मुक्ति का उपाय बतलाता हूँ। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी है, उसका नाम पापमोचिनी(Papmochani Ekadashi) है। उस एकादशी का उपवास करने से तेरी पिशाचिनी की देह से मुक्ति हो जाएगी।’

ऐसा कहकर मुनि ने उसको व्रत का सब विधान समझा दिया। फिर अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए वे अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गये।

च्यवन ऋषि ने अपने पुत्र मेधावी को देखकर कहा- ‘हे पुत्र! ऐसा क्या किया है तूने कि तेरे सभी तप नष्ट हो गए हैं? जिससे तुम्हारा समस्त तेज मलिन हो गया है?’

मेधावी मुनि ने लज्जा से अपना सिर झुकाकर कहा- ‘पिताश्री! मैंने एक अप्सरा से रमण करके बहुत बड़ा पाप किया है। इसी पाप के कारण सम्भवतः मेरा सारा तेज और मेरे तप नष्ट हो गए हैं। कृपा करके आप इस पाप से छूटने का उपाय बतलाइये।’

ऋषि ने कहा- ‘हे पुत्र! तुम चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी का विधि तथा भक्तिपूर्वक उपवास करो, इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।’

अपने पिता च्यवन ऋषि के वचनों को सुनकर मेधावी मुनि ने पापमोचिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। उसके प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए। मञ्जुघोषा अप्सरा भी पापमोचिनी एकादशी का उपवास करने से पिशाचिनी की देह से छूट गई और पुनः अपना सुन्दर रूप धारण कर स्वर्गलोक चली गई। लोमश मुनि ने कहा-हे राजन! इस पापमोचिनी एकादशी के प्रभाव से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी की कथा के श्रवण व पठन से एक हजार गौदान करने का फल प्राप्त होता है। इस उपवास के करने से ब्रह्म हत्या करने वाले, स्वर्ण चुराने वाले, मद्यपान करने वाले, अगम्या गमन करने वाले आदि भयंकर पाप भी नष्ट हो जाते हैं और अन्त में स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।”

पापमोचनी एकादशी व्रत विधि 

Papmochani Ekadashi व्रत के विषय में भविष्योत्तर पुराण में विस्तार से वर्णन किया गया है। इस व्रत में भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है। इस व्रत को रखने वाले व्रती को दशमी तिथि को एक बार सात्विक भोजन करना चहिये और मन से भोग विलास की भावना को निकालकर श्री हरि में मन को लगाना चहिये।

  • व्रती एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करे। स्नान करते हुए इस पवित्र नदियों को समर्पित मंत्र का जाप कर सकते हैं।

गंगा च यमुना चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेसमिन सानिधिम कुरु”

(अर्थात्- इस पानी में, मैं गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी नदियों से दिव्य जल की उपस्थिति का आह्वान करता हूं)

  • पूजा स्थल पर पीले कुशा आसन पर बैठकर घी का दीपक जलाकर व्रत का संकल्प करें।
  • संकल्प के उपरान्त षोड्षोपचार सहित श्री विष्णु की पूजा करें।
  • पूजा के पश्चात भगवान के समक्ष बैठकर भग्वद् कथा का पाठ अथवा श्रवण करें।
  • एकादशी तिथि को जागरण करने से कई गुणा पुण्य मिलता है अत: रात्रि में भी निराहार रहकर भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें।
  • द्वादशी के दिन प्रात: स्नान करके विष्णु भगवान की पूजा करें फिर ब्रह्मणों को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करें।
  • तत्पश्चात व्रत का पारण करें

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस संसार में जो भी मनुष्य भगवान श्री विष्णु का आशीर्वाद पाना चाहता है, उसे एकादशी का व्रत जरुर करना चाहिए। एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। एकादशी के व्रत रखने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होने के साथ ही सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

 

**(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैंजिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

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