if ( ! function_exists( 'jnews_get_views' ) ) {
/**
* Gets views count.
*
* @param int $id The Post ID.
* @param string|array $range Either an string (eg. 'last7days') or -since 5.3- an array (eg. ['range' => 'custom', 'time_unit' => 'day', 'time_quantity' => 7])
* @param bool $number_format Whether to format the number (eg. 9,999) or not (eg. 9999)
* @return string
*/
function jnews_get_views( $id = null, $range = null, $number_format = true ) {
$attr = array(
'id' => $id,
'range' => $range,
'number_format' => $number_format,
);
$query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $attr ) );
$views = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' );
if ( false === $views ) {
$views = JNews_View_Counter()->counter->get_views( $id, $range, $number_format );
wp_cache_set( $query_hash, $views, 'jnews-view-counter' );
}
return $views;
}
}
if ( ! function_exists( 'jnews_view_counter_query' ) ) {
/**
* Do Query
*
* @param $instance
* @return array
*/
function jnews_view_counter_query( $instance ) {
$query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $instance ) );
$query = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' );
if ( false === $query ) {
$query = JNews_View_Counter()->counter->query( $instance );
wp_cache_set( $query_hash, $query, 'jnews-view-counter' );
}
return $query;
}
}
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]]>पौराणिक कथा के अनुसार एक समय राक्षसराज रावण ने कैलाश पर जाकर अत्यंत भक्तिभाव के साथ भगवान शिव की आराधना की। कुछ समय तक आराधना करने पर जब महादेव प्रसन्न नहीं हुए तब वह कैलाश पर्वत के पास स्थित वन में जाकर एक बड़ा गड्ढा खोदकर उसमें अग्नि प्रज्वलित करके वहीं बैठकर हवन और यज्ञ करते हुए और घोर तप करने लगा।
ग्रीष्म ऋतु में वह पाँच अग्नियों के बीच बैठता, वर्षा ऋतु में खुले मैदान में सोता और शीतकाल में जल के भीतर खड़ा रहता। इस तरह तीन प्रकार से उसकी कठोर तपस्या निरंतर चलती रही। तब एक दिन भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हो गए और रावण को उसकी इच्छा के अनुसार अनुपम और उत्तम बल प्रदान किया।
भगवान शिव का कृपा प्रसाद पाकर रावण ने नतमस्तक हो दोनों हाथ जोड़कर उनसे कहा –” हे कैलाशपती! मुझ पर प्रसन्न होइए। मैं आपको अपने साथ लंका ले जाना चाहता हूँ। आप मेरे इस मनोरथ को सफल कीजिये। मैं आपकी शरण में आया हूँ।“ रावण के ऐसा कहने पर भगवान शिव बड़े संकट में पड़ गए और अनमने होकर बोले – ” राक्षसराज! मेरी बात ध्यान से सुनो। तुम मेरे इस उत्तम लिंग को भक्तिभाव से अपने घर को ले जाओ। पर अगर मार्ग में तुमने इसे कहीं भी भूमि पर रखा तो यह वहीँ सुस्थिर हो जायेगा। “
भगवान शंकर के ऐसा कहने पर रावण ने उनकी आज्ञा लेकर वह शिवलिंग अपने साथ लेकर लंका को प्रस्थान किया। परन्तु मार्ग में भगवान शिव की माया से उसे मूत्रोत्सर्ग की इक्षा हुई। रावण अत्यंत सामर्थ्यवान होने पर भी मूत्र के वेग को नहीं रोक सका। इसी समय वहाँ आस-पास एक ग्वाले को देखकर उसने प्रार्थना करके वह शिवलिंग उसके हाथ में थमा दिया और स्वयं मूत्रत्याग के लिए बैठ गया। एक मुहूर्त बीतते-बीतते वह ग्वाला उस शिवलिंग के भार को सहन नहीं कर पाया और उसे पृथ्वी पर रख दिया। फिर वह ज्योतिर्मय शिवलिंग वहीँ स्थित हो गया। यह देख रावण क्रोधित हुआ पर वह कर भी क्या सकता था, वह वहीं स्थित हो गया तब रावण निराश होकर अपने घर चला गया। जब इन्द्र आदि देवताओं और ऋषि मुनियों ने यह समाचार सुना तो वे सब वहाँ आये और बड़ी प्रसन्नता के साथ शिवजी का विशेष पूजन किया। उन्होंने उस शिवलिंग की विधिवत स्थापना की और उसका नाम वैद्यनाथ रखकर उसकी वंदना करके अपने-अपने स्थान को चले गए। इस दिव्य एवं श्रेष्ठ ज्योतिर्लिंग का दर्शन एवं पूजन सम्पूर्ण अभीष्टों को देने वाला और समस्त पापराशि को हर लेने वाला है। यह सत्पुरुषों को भोग एवं मोक्ष प्रदान करने वाला है।
भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में झारखण्ड के देवघर जिले में स्थित वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग शामिल है। विश्व के सभी शिव मंदिरों के शीर्ष पर त्रिशूल लगा दीखता है मगर वैद्यनाथधाम परिसर के शिव, पार्वती, लक्ष्मी-नारायण व अन्य सभी मंदिरों के शीर्ष पर पंचशूल लगे हैं। कहा जाता है कि रावण पंचशूल से ही अपने राज्य लंका की सुरक्षा करता था। चूंकि वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग को लंका ले जाने के लिए कैलाश से रावण ही लेकर आया था पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। ज्योतिर्लिंग ले जाने की शर्त्त यह थी कि बीच में इसे कहीं नहीं रखना है मगर देव योग से रावण को लघुशंका का तीव्र वेग असहनशील हो गया और वह ज्योतिर्लिंग को भगवान के बदले हुए चरवाहे के रूप को देकर लघुशंका करने लगा। उस चरवाहे ने ज्योतिर्लिंग को जमीन पर रख दिया। इस तरह चरवाहे के नाम वैद्यनाथ पर वैद्यनाथधाम का निर्माण हुआ।
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