if ( ! function_exists( 'jnews_get_views' ) ) {
/**
* Gets views count.
*
* @param int $id The Post ID.
* @param string|array $range Either an string (eg. 'last7days') or -since 5.3- an array (eg. ['range' => 'custom', 'time_unit' => 'day', 'time_quantity' => 7])
* @param bool $number_format Whether to format the number (eg. 9,999) or not (eg. 9999)
* @return string
*/
function jnews_get_views( $id = null, $range = null, $number_format = true ) {
$attr = array(
'id' => $id,
'range' => $range,
'number_format' => $number_format,
);
$query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $attr ) );
$views = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' );
if ( false === $views ) {
$views = JNews_View_Counter()->counter->get_views( $id, $range, $number_format );
wp_cache_set( $query_hash, $views, 'jnews-view-counter' );
}
return $views;
}
}
if ( ! function_exists( 'jnews_view_counter_query' ) ) {
/**
* Do Query
*
* @param $instance
* @return array
*/
function jnews_view_counter_query( $instance ) {
$query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $instance ) );
$query = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' );
if ( false === $query ) {
$query = JNews_View_Counter()->counter->query( $instance );
wp_cache_set( $query_hash, $query, 'jnews-view-counter' );
}
return $query;
}
}
The post प्रबोधिनि या देवउठनी एकादशी -महत्व, व्रत कथा और विधि appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>मान्यता है कि भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी को ४ माह के लिए क्षिरसागर में शयन के लिए जाते है और भगवान विष्णु के शयनकाल के ४ मास के दौरान विवाह आदि मांगलिक कार्य नहीं किये जाते हैं। भगवान विष्णु अपने शयनकाल के उपरांत प्रबोधिनि एकादशी के दिन जागते है और इसी दिन के बाद सभी शुभ तथा मांगलिक कार्य शुरू होते हैं। इस दिन तुलसी विवाह का आयोजन भी किया जाता है।
दिनांक : नवम्बर 25, 2020
वार : बुधवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 25 नवम्बर 2020 को 02:42 ए एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त – 26 नवम्बर 2020 को 05:10 ए एम बजे
पारण( व्रत तोड़ने की) तिथि: नवम्बर 26, 2020
पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय-11:49 ए एम
एक समय भगवान नारायण से लक्ष्मी जी ने कहा- ‘हे नाथ! अब आप दिन-रात जागते रहते हैं और जब सोते हैं तो लाखों-करोड़ों वर्ष तक को सो जाते हैं तथा उस समय समस्त चराचर का नाश भी कर डालते हैं। अत: आप नियम से प्रतिवर्ष निद्रा लिया करें। इससे मुझे भी कुछ समय विश्राम करने का समय मिल जाएगा।’ लक्ष्मी जी की बात सुनकर नारायण मुस्काराए और बोले- ‘देवी’! तुमने ठीक कहा है। मेरे जागने से सब देवों को और ख़ास कर तुमको कष्ट होता है। तुम्हें मेरी सेवा से जरा भी अवकाश नहीं मिलता। इसलिए, तुम्हारे कथनानुसार आज से मैं प्रति वर्ष चार मास वर्षा ऋतु में शयन किया करूंगा। उस समय तुमको और देवगणों को आराम मिलेगा। मेरी यह निद्रा अल्पनिद्रा और प्रलयकालीन महानिद्रा कहलाएगी। यह मेरी अल्पनिद्रा मेरे भक्तों को परम मंगलकारी उत्सवप्रद तथा पुण्यवर्धक होगी। इस काल में मेरे जो भी भक्त मेरे शयन की भावना कर मेरी सेवा करेंगे तथा शयन और उत्पादन के उत्सव आनन्दपूर्वक आयोजित करेंगे उनके घर में तुम्हारे सहित निवास करूँगा।
अर्जुन ने श्री हरी से कहा आप कृपा करके मुझे कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के विषय में भी बतलाइये। इसके व्रत का क्या विधान है? इसकी क्या विधि है? इस व्रत के करने से किस फल की प्राप्ति होती है? कृपया यह सब विस्तारपूर्वक कहिए।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे पार्थ! तुम मेरे बड़े ही प्रिय सखा हो। इस विषय में मैं तुम्हें नारद और ब्रह्माजी के बीच हुए वार्तालाप को सुनाता हूं। एक समय नारदजी ने ब्रह्माजी से पूछा – ‘हे पिता! प्रबोधिनी एकादशी के व्रत का क्या फल होता है, आप कृपा करके मुझे यह सब विधानपूर्वक बताएं।’
ब्रह्माजी ने कहा- ‘हे पुत्र! कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रबोधिनी एकादशी के व्रत का फल एक सहस्र अश्वमेध यज्ञ तथा सौ राजसूय यज्ञ के फल के बराबर होता है।’ प्राणी को सभी कर्मों को त्यागते हुए भगवान नारायण की प्रसन्नता के लिए कार्तिक माह की प्रबोधिनी एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। जो मनुष्य इस एकादशी व्रत को करता है, वह धनवान, योगी तपस्वी तथा इन्द्रियों को जीतने वाला होता है, क्योंकि एकादशी भगवान विष्णु की अत्यंत प्रिय है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
ब्रह्माजी की बात सुनकर नारद जी बोले – ‘हे पिता! अब आप एकादशी के व्रत का विधान कहिए और इस व्रत के करने से किस पुण्य की प्राप्ति होती है? कृपा कर यह भी बतायिए।
नारद की बात सुन ब्रह्माजी बोले – इस एकादशी के दिन मनुष्य को ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाना चाहिए और स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प करना चाहिए। उस समय भगवान विष्णु से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे प्रभु! आज मैं निराहार रहूंगा और दूसरे दिन भोजन करूंगा, इसलिए आप मेरी रक्षा करें। इस प्रकार प्रार्थना करके भगवान का पूजन करना चाहिए और व्रत प्रारंभ करना चाहिए। शंख के जल से भगवान को अर्घ्य देना चाहिए। इस दिन रात्रि को जागरण करना चहिये और रात्रि में भगवान का स्मरण और भजन करते हुए रात्रि व्यतीत करनी चाहिए।
इस प्रकार रात्रि में भगवान का पूजन करके प्रातःकाल शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए। स्नान करने के बाद भगवान की स्तुति करते हुए भगवान का पूजन करना चाहिए। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और दक्षिणा देकर आदर सहित उन्हें प्रसन्नता पूर्वक विदा करना चाहिए और उचित समयानुसर व्रत का पारण करना चहिये।
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