if ( ! function_exists( 'jnews_get_views' ) ) {
/**
* Gets views count.
*
* @param int $id The Post ID.
* @param string|array $range Either an string (eg. 'last7days') or -since 5.3- an array (eg. ['range' => 'custom', 'time_unit' => 'day', 'time_quantity' => 7])
* @param bool $number_format Whether to format the number (eg. 9,999) or not (eg. 9999)
* @return string
*/
function jnews_get_views( $id = null, $range = null, $number_format = true ) {
$attr = array(
'id' => $id,
'range' => $range,
'number_format' => $number_format,
);
$query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $attr ) );
$views = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' );
if ( false === $views ) {
$views = JNews_View_Counter()->counter->get_views( $id, $range, $number_format );
wp_cache_set( $query_hash, $views, 'jnews-view-counter' );
}
return $views;
}
}
if ( ! function_exists( 'jnews_view_counter_query' ) ) {
/**
* Do Query
*
* @param $instance
* @return array
*/
function jnews_view_counter_query( $instance ) {
$query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $instance ) );
$query = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' );
if ( false === $query ) {
$query = JNews_View_Counter()->counter->query( $instance );
wp_cache_set( $query_hash, $query, 'jnews-view-counter' );
}
return $query;
}
}
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]]>रामायण में सीता एक ऐसा चरित्र है जिससे सभी को ज्ञान मिलता हैं। माता सीता के चरित्र का वर्णन सभी वेदों में बहुत सुंदर शब्दों में किया गया हैं। वाल्मीकि रामायण में भी माता सीता को शक्ति स्वरूपा, ममतामयी, राक्षस नाशिनी, पति व्रता आदि कई गुणों से सज्जित बताया गया हैं। सीता मैया के जन्म दिवस को सीता अथवा जानकी जयंती के रूप में मनाया जाता हैं। इसे विवाहित स्त्रियाँ पति की लम्बी आयु के लिए करती हैं। सीता मैया को जानकी भी कहा जाता हैं अतः उनकी जयंती को जानकी जयंती भी कहा जाता हैं। उनके पिता का नाम जनक था और सीता जनक की गोद ली हुई पुत्री थी। राजा जनक मिथिला के राजा थे, जनक उनके पूर्वजों द्वारा दी गई उपाधि थी, उनका असली नाम सीराध्वाज था एवं उनकी पत्नी का नाम महारानी सुनैना था।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार जब राजा जनक ने यज्ञ के लिए धरती को जोता था, तब निर्मित हुई क्यारी में उन्हें एक छोटी सी कन्या मिली थी और तब राजा जनक ने इन्हें धरती माता की पुत्री के रूप में अपना लिया था। यह भी कहा जाता हैं जब राजा जनक ने यज्ञ हेतु धरती को जोता , तब धरती में एक गहरी दरार उत्पन्न हुई और उस दरार से एक सोने की डलिया में मिट्टी से लिपटी हुई सुंदर छवि वाली कन्या प्राप्त हुई। राजा जनक की कोई संतान नहीं थी, इसलिए इस छोटी सी कन्या को जैसे ही उन्होंने अपने हाथों में लिया, उन्हें पिता प्रेम की अनुभूति हुई और उन्होंने उस कन्या को सीता नाम दिया और उसे अपनी बेटी के रूप में स्वीकार किया।
मान्यताओं के अनुसार असल में देवी सीता रावण और मंदोदरी की बेटी थी। माता सीता वेदवती का पुनर्जन्म जन्म थी। वेदवती एक बहुत सुंदर, सुशिल धार्मिक कन्या थी, जो कि भगवान विष्णु की परम भक्त थी और उन्ही से विवाह करना चाहती थी।
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार वेदवती ने अपनी इच्छा (भगवान विष्णु से विवाह) हेतु कठिन तपस्या की। उसने सांसारिक जीवन छोड़ स्वयं को तपस्या में लीन कर दिया था और उपवन में कुटिया बनाकर रहने लगी।
एक दिन वेदवती उपवन में तपस्या कर रही थी। तब ही रावण वहां से निकला और वेदवती के सुंदर स्वरूप को देख कर उस पर मोहित हो गया और उसने वेदवती के साथ दुर्व्यवहार करना चाहा, जिस कारण वेदवती ने हवन कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया और वेदवती ने ही मरने से पूर्व रावण को श्राप दिया, कि वो खुद रावण की पुत्री के रूप में जन्म लेगी और रावण की मृत्यु का कारण बनेगी।
कुछ समय पश्चात रावण को मंदोदरी से एक पुत्री प्राप्त हुई, जिसे उसने जन्म लेते ही सागर में फेंक दिया। सागर में डूबती वह कन्या सागर की देवी वरुणी को मिली और वरुणी ने उसे धरती की देवी पृथ्वी को सौंप दिया और देवी पृथ्वी ने उस कन्या को राजा जनक और माता सुनैना को सौंप दिया, जिसके बाद वह कन्या सीता के रूप में जानी गई और बाद में इसी सीता के अपहरण के कारण भगवान राम ने रावण का वध व लंका का दहन किया।
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