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हिन्दू धर्म के अनुसार सारी सृष्टि त्रिदेव यानी ब्रह्मा,विष्णु और महेश से ही है। भगवान् ब्रह्मा अगर सृष्टि के रचयिता हैं तो भगवान विष्णु समस्त संसार के पालनकर्ता हैं और महेश यानि भगवान शिव को संहारक के रूप में देखा जाता हैं। धर्म शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव अजन्मे है, अनंत है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महादेव शिवशंकर जहाँ-जहाँ स्वयं प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों(Jyotirlinga) के रूप में पूजा जाता है। भारत में कुल 64 ज्योतिर्लिंग है जो भारत के विभिन्न स्थलों पर स्थित है। इन ज्योतिर्लिंगों में से 12 को ही मुख्य ज्योतिर्लिंग में शामिल किया गया है। ये 12 ज्योतिर्लिंग, हिन्दू आस्था के बड़े केन्द्र हैं, जो समूचे भारत में फैले हुए हैं। जहाँ भारत के उत्तर में केदारनाथ (उत्तराखंड) है, तो दक्षिण में रामेश्वरम (तमिलनाडु) है। ऐसे ही पूर्व में वैद्यनाथ (झारखंड) है, तो पश्चिम में नागेश्वर (गुजरात) ज्योतिर्लिंग है। पुराणो के अनुसार कहा जाता है कि 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से भक्तों के समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं। उनके जन्म-जन्मांतर के सारे पाप मिट जाते हैं और भक्त शिवजी के कृपा पात्र बन जाते हैं। हिन्दू धर्म के पवित्र स्थलों में 12 ज्योतिर्लिंगों का महत्वपूर्ण स्थान है।

ज्योतिर्लिंग पौराणिक कथा  ( Legend of Jyotirlinga)

“ज्योतिर्लिंग” की पौराणिक कथा का उल्लेख शिव पुराण में मिलता है। एक बार त्रिदेव के बीच में बहस हुई थी कि कौन सर्वोच्च है, तब भगवान शिव ने प्रकाश के एक विशाल स्तंभ का निर्माण किया था और भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा को दोनों दिशाओं में प्रकाश का अंत खोजने के लिए कहा था। जिस पर, भगवान ब्रह्मा ने झूठ बोला कि उन्हें अंत मिल गया, लेकिन भगवान विष्णु ने हार मान ली। भगवान शिव ने भगवान ब्रह्मा को शाप दिया कि भले ही वह ब्रह्माण्ड के निर्माता हैं, लेकिन उनकी पूजा नहीं की जाएगी। और माना जाता है कि ज्योतिर्लिंग भगवान शिव द्वारा निर्मित प्रकाश के उस अनंत स्तंभ से प्रकट हुए।

द्वादश ज्योतिर्लिं स्तोत्रम् और उनके स्थान – Dwadasa Jyotirlinga Stotram

शिव पुराण की कोटि ‘रुद्रसंहिता’ में द्वादश ज्योतिर्लिंगों के सम्बन्ध निम्नलिखित श्लोक दिया गया है-

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्। सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः। सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥
एतेशां दर्शनादेव पातकं नैव तिष्ठति। कर्मक्षयो भवेत्तस्य यस्य तुष्टो महेश्वराः॥:

जो भी भक्त प्रतिदिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर इस द्वादश ज्योतिर्लिंगों श्लोक  का पाठ करता है, अर्थात् उपर्युक्त श्लोक को पढ़ता हुआ, शिवलिंगों (Jyotirlinga) का ध्यान करता है, उसके सात जन्मों तक के पाप नष्ट हो जाते हैं और वो जिस कामना की पूर्ति के लिए नित्य इन नामों का पाठ करता है, शीघ्र ही उसे उस फल की प्राप्ति हो जाती है।

द्वादश ज्योतिर्लिं स्थान – Dwadasa Jyotirlinga Place

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग – गिर, गुजरात
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग – श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग – उज्जैन, मध्यप्रदेश
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग- ओंकारेश्वर, मध्यप्रदेश
केदारनाथ ज्योतिर्लिंग – रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग – भीमाशंकर, महाराष्ट्र
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग – वाराणसी, उत्तर प्रदेश
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग – नासिक, महाराष्ट्र
बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग – देवघर, झारखंड
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग – द्वारका, गुजरात
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग – रामेश्वरम, तमिलनाडु
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग – औरंगाबाद, महाराष्ट्र

 

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Grishneshwar Jyotirling- घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग https://astrodeeva.com/grishneshwar-jyotirling-%e0%a4%98%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2/ https://astrodeeva.com/grishneshwar-jyotirling-%e0%a4%98%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2/#respond Sun, 25 Apr 2021 19:42:40 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1963 घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग(Grishneshwar Jyotirling) महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे घृसणेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है और यहाँ दर्शन करके ही […]

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घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग(Grishneshwar Jyotirling) महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे घृसणेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है और यहाँ दर्शन करके ही ज्योतिर्लिंगों की यात्रा पूरी होती है।। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं इस मंदिर के समीप स्थित हैं। यहीं पर श्री एकनाथजी गुरु व श्री जनार्दन महाराज की समाधि भी है।

श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा ( Story of Grishneshwar Jyotirlinga)

दक्षिण में देवगिरि नामक पर्वत के निकट भरद्वाज कुल में उत्पन्न सुधर्मा नाम के एक ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण रहते थे। उनकी प्रिय पत्नी का नाम सुदेहा था, वह सदा शिवधर्म के पालन में तत्पर रहती थी। वह गृहकार्य में निपुण और पतिव्रता स्त्री थी। सुधर्मा भी सदाचारी और वेद – शास्त्र के मर्मज्ञ थे। वे सदा शिव भक्ति में ही लगे रहते थे। यह सब कुछ होने पर भी उनके कोई पुत्र नहीं था जिससे उनकी पत्नी बहुत दुखी रहती थी। तब उस ब्राह्मणी ने अत्यंत दुखी होकर हठपूर्वक अपनी बहन घुश्मा से पति का दूसरा विवाह करा दिया।

विवाह से पहले सुधर्मा ने सुदेहा को समझाया कि ‘ इस समय तो बहन के प्रति तुम्हारा प्रेम है पर जब इसके पुत्र हो जायेगा तब तुम इससे स्पर्धा करने लगोगी।‘ यह सुनकर सुदेहा ने सब प्रकार से अपने पति को विश्वास दिलाया कि मैं कभी भी अपनी बहन से स्पर्धा नहीं करूँगी। विवाह हो जाने पर घुश्मा दासी की भाँति बड़ी बहन की सेवा करने लगी। सुदेहा भी उसे बहुत प्यार करती थी। घुश्मा अपनी शिवभक्ता बहन की आज्ञा से नित्य एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर विधिवत पूजा करने लगी। पूजा करके वह नजदीक के तालाब में उनका विसर्जन कर देती थी।

शंकर जी की कृपा से उसको एक सुन्दर, सौभाग्यवान और सद्गुण संपन्न पुत्र हुआ। इससे घुश्मा का कुछ मान बढ़ा और यह देखकर सुदेहा के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो गयी। समय आने पर घुश्मा के पुत्र का विवाह हुआ और पुत्रवधु घर में आ गयी। अब तो सुदेहा घुश्मा से और भी जलने लगी। उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी और एक दिन उसने रात में सोते हुए पुत्र को छुरे से मार कर उसके शरीर के टुकड़े टुकड़े कर दिए और कटे हुए अंगों को उसी तालाब में ले जाकर डाल दिया जहाँ घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव लिंगों का विसर्जन करती थी।

घुश्मा के पुत्र के अंगों को उस तालाब में फेंककर वह लौट आयी और घर में सुखपूर्वक सो गयी। घुश्मा सबेरे उठकर प्रतिदिन का पूजनादि कर्म करने लगी। सुधर्मा स्वयं भी नित्यकर्म में लग गए। सुदेहा भी उठकर बड़े आनंद से घर के काम काज करने लगी क्योंकि उसके ह्रदय में पहले जो ईर्ष्या की आग जलती थी वह अब बुझ गयी थी। प्रातःकाल उठकर जब बहु ने पति की शय्या को देखा तो वह खून से भीगी दिखायी दी और वहाँ शरीर के कुछ अंग भी दिखाई दिए, इससे उसको बड़ा दुःख हुआ।

वह तुरंत घुश्मा के पास गयी और कहा – ” माता ! आपके पुत्र कहाँ गए ? उनकी शय्या रक्त से भीगी हुई है। किसने यह क्रूर कर्म किया है?“ यह कहकर घुश्मा की बहु विलाप करती हुई रोने लगी। सुदेहा भी उस समय रोने का नाटक करने लगी पर मन ही मन वह हर्ष से भरी हुई थी। पर उस परिस्थिति में भी घुश्मा अपने नित्य पार्थिव पूजन व्रत से विचलित नहीं हुई। जब तक नित्य पूजन का नियम पूरा नहीं हुआ तब तक उसे किसी दूसरी बात की चिंता नहीं हुई।

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दोपहर को पूजन समाप्त होने पर घुश्मा ने अपने पुत्र की भयंकर शय्या पर दृष्टिपात किया। वह सोचने लगी – ‘ जिन्होंने यह बेटा दिया था, वे ही इसकी रक्षा करेंगे। वे काल के भी काल हैं और सत्पुरुषों के आश्रय हैं। मेरे चिंता करने से क्या होगा। ‘इस तरह विचार करते हुए उसने भगवान शिव के भरोसे धैर्य धारण किया। वह अपने नियम के अनुसार पार्थिव शिवलिंगों को लेकर शिव के नामों का उच्चारण करती हुई उस तालाब के किनारे गयी। उन पार्थिव लिंगों को तालाब में डालकर जब वह लौटने लगी तो उसे अपना पुत्र उसी तालाब के किनारे खड़ा दिखाई दिया। उस समय अपने पुत्र को जीवित देखकर घुश्मा को न तो हर्ष हुआ और न ही विषाद। वह शांतचित्त से यह सब देख ही रही थी कि तभी ज्योतिस्वरूप महेश्वर शिव उस पर संतुष्ट होकर वहाँ प्रकट हो गए। शिव बोले – “सुमुखि ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। वर माँगो। तुम्हारी दुष्टा सौत ने इस बच्चे को मार डाला था। अतः मैं उसे इस अपराध का दंड दूँगा।“

तब घुश्मा ने शिव जी को प्रणाम करके यह वर माँगा – ”नाथ ! सुदेहा मेरी बड़ी बहन है अतः आपको उसकी रक्षा करनी चाहिए।“ शिव बोले – ”उसने तो तुम्हारा बड़ा भारी अपकार किया है तो तुम उसका उपकार क्यों करना चाहती हो ? दुष्ट कर्म करने वाली सुदेहा तो उसके किए हुए दुष्कर्म के कारण वो मृत्यु की सजा के योग्य है। “

घुश्मा ने कहा – ” देव ! आपके दर्शन मात्र से ही मनुष्यों के पूर्वसंचित पापराशि भस्म हो जाते हैं और मन निर्मल हो जाता है। जो अपकार करने वालों का भी उपकार करता है उसके संसर्ग से पुण्य की प्राप्ति होती है, ऐसा मैंने सुना है। मैं किसी भी प्राणी का अहित नहीं चाहती फिर वह तो मेरी बहन है।“ घुश्मा के ऐसा कहने पर भगवान शंकर अत्यंत प्रसन्न हुए और कहा – ” घुश्मे ! तुम कोई और भी वर माँगो क्योंकि तुम्हारी भक्ति और विकारशून्य स्वभाव से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। “

भगवान शिव की बात सुनकर घुश्मा बोली – ” प्रभो ! यदि आप वर देना चाहते हैं तो लोगों की रक्षा के लिए सदा यहाँ निवास कीजिये और मेरे नाम से ही आप की ख्याति हो।“ तब महेश्वर शिव ने अत्यंत प्रसन्न होकर कहा – ” मैं तुम्हारे ही नाम से घुश्मेश्वर कहलाता हुआ सदा यहाँ निवास करूँगा और सबके लिए सुखदायक होऊँगा। मेरा ये ज्योतिर्लिंग घुश्मेश नाम से प्रसिद्ध हो। यह सरोवर तीनों लोक में शिवालय नाम से प्रसिद्ध हो। इस सरोवर का दर्शन सम्पूर्ण फल को देने वाला हो। ऐसा कहकर भगवान शिव वहाँ घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हो गए। इस ज्योतिर्लिंग का दर्शन और पूजन सुख समृद्धि की वृद्धि करने वाला है।

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर खुलने का समय – Grishneshwar Jyotirling Temple Timing

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर सुबह 5:30 बजे खुलता हैं और शाम को 9 बजे बंद हो जाता हैं। हालाकि श्रवण माह में (अगस्त से सितम्बर माह) में सुबह 3 बजे से रात के 11 बजे तक मंदिर यहां आने वाले भक्तो के लिए खुला रहता हैं।

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर कैसे पहुँचें – How To Reach Grishneshwar Temple In Hindi

By Air: घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर जाने के लिए यदि आपने हवाई मार्ग का चुनाव किया हैं, तो हम आपको बता दे कि औरंगाबाद शहर का हवाई अड्डा घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर हैं। आप यहाँ से बस या टैक्सी की सहायता से घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर आसानी से पहुँच जाएंगे।

By Train: घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर जाने के लिए यदि आपने रेलवे मार्ग का चुनाव किया हैं तो हम आपको बता दें कि औरंगाबाद रेलवे स्टेशन देश के प्रमुख रेलवे स्टेशन से बहुत अच्छी तरह से जुडा हुआ हैं। आप यहा से बस या टैक्सी की मदद से घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर आसानी से पहुँच जायेंगे जोकि लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर हैं।

By Road: घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर की यात्रा के लिए यदि आपने सड़क मार्ग का चुनाव किया हैं तो हम आपको बता दें कि औरंगाबाद बस स्टैंड से आप एलोरा गुफा के लिए बस पकड़ सकते हैं। एलोरा केव्स से लगभग 1-2 किलोमीटर की दूरी पर ही घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर हैं।

**(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैंजिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

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Rameshwaram Jyotirlinga- रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग https://astrodeeva.com/rameshwaram-jyotirlinga-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a4%ae-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf/ https://astrodeeva.com/rameshwaram-jyotirlinga-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a4%ae-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf/#respond Mon, 19 Apr 2021 06:17:16 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1924 रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग (Rameshwaram Jyotirlinga) तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरम नामक स्थान में स्थित है।यह भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ यह स्थान हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है, कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी और यहाँ लंका पर […]

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रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग (Rameshwaram Jyotirlinga) तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरम नामक स्थान में स्थित है।यह भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ यह स्थान हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है, कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी और यहाँ लंका पर विजय पाने के लिए राम जी ने पूजा कर शिव जी का आशीर्वाद प्राप्त किया था। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम के नाम पर रामेश्वरम नाम दिया गया है।

श्री रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की कथा ( Story of Rameshwaram Jyotirlinga)

जब रावण सीताजी का हरण करके लंका ले गया, तब सुग्रीव के साथ उसकी वानर सेना लेकर श्रीराम समुद्र तट पर आये। वहाँ वे विचार करने लगे कि हम किस प्रकार इस समुद्र को पार करेंगे और किस प्रकार रावण को परास्त कर सीता जी को मुक्त कराएँगे। इतने में ही श्रीराम को प्यास लगी। उन्होंने जल माँगा और वानर मीठा जल ले आये। प्रभु श्रीराम ने प्रसन्न होकर वह जल ले लिया। तभी उन्हें स्मरण हुआ कि – ‘ मैंने अपने स्वामी भगवान शंकर का दर्शन तो किया ही नहीं। फिर यह जल मैं कैसे ग्रहण कर सकता हूँ? ‘

इस प्रकार विचार कर उन्होंने उस जल को नहीं पिया। इसके बाद उन्होंने शिवलिंग बनाया और आवाहन आदि सोलह उपचारों का पालन करके उन्होंने विधिपूर्वक बड़े प्रेम से शंकर जी की पूजा अर्चना की। इसके बाद दिव्य स्तोत्रों के द्वारा यत्नपूर्वक भगवान शंकर को संतुष्ट करके श्रीराम ने उनसे प्रार्थना की। श्रीराम बोले – ” उत्तम व्रत का पालन करने वाले मेरे स्वामी महेश्वर ! आप मेरी सहायता कीजिये। आपके सहयोग के बिना मेरे कार्य की सिद्धि अत्यंत कठिन है। रावण भी आपका ही भक्त है, वह सबके लिए सर्वथा दुर्जय और महावीर है पर आपके दिए हुए वरदान के कारण सदा अहंकार से भरा रहता है और संसार को कष्ट देता है।”

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श्रीराम के पूजन से प्रसन्न होकर माता पार्वती सहित भगवान शंकर अपने पार्षदगणों के साथ निर्मल रूप धारण करके वहाँ प्रकट हो गए। श्रीराम ने भगवान शिव का पूजन और विभिन्न प्रकार से स्तुति करके उनसे रावण के साथ होने वाले युद्ध में अपने लिए विजय की प्रार्थना की। तब भगवान शिव ने श्रीराम को युद्ध की आज्ञा और रावण पर विजय का वरदान दिया। भगवान शिव से विजय का वरदान पाकर नतमस्तक हो हाथ जोड़कर श्रीराम बोले –

” हे भोलेनाथ! यदि आप संतुष्ट हैं तो संसार के कल्याण के लिए आप सदा यहाँ निवास करें।“ श्रीराम के ऐसा कहने पर भगवान शिव वहाँ ज्योतिर्लिंग में स्थित हो गए और वह तीनों लोकों में रामेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए। भगवान रामेश्वर सदा भोग और मोक्ष देनेवाले तथा भक्तों की इक्षा पूर्ण करने वाले हैं।

श्री रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग मंदिर पूजा/दर्शन समय(Rameshwaram Jyotirlinga Temple Darshan Timing)

सुबह- 05:00 बजे फिर दोपहर 1 बजे

शाम को- 03:00 और रात्रि में 9 बजे

मंदिर में 26 प्रकार की पूजा विधि का उल्लेख किया गया है। जिनमें से 9 पूजा विधि प्रमुख हैं। जो निश्चित रकम का भुगतान करने पर करवाई जा सकती हैं।

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग कैसे पहुँचे ( How to Reach Rameshwaram Jyotirlinga Temple)

रामेश्वरम् केवल धार्मिक महत्व का तीर्थ ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से भी यह स्थल  दर्शनीय है। इस के समुद्र तट पर तरह-तरह की कोड़ियां, शंख और सीपें मिलती हैं।

हवाई यात्रा द्वारा (By AIR)
निकटतम हवाई अड्डा मदुरै है जो रामेश्वरम से 163 किमी की दूरी पर है।
सड़क मार्ग(By Road)

रामेश्वरम जिला अच्छी तरह से मदुरै, कन्याकुमारी, चेन्नई और त्रिची जैसे बड़े शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा है। यह सड़क मार्ग से पांडिचेरी और तंजावुर से भी जुड़ा है। यात्रा के लिए आप जीप, ऑटो रिक्शा और यहां तक ​​कि चक्र रिक्शा किराया पर करके भी जा सकते हैं।

रेल द्वारा (By Train)

रामेश्वरम चेन्नई, मदुरै, कोयंबटूर, त्रिची, तंजावुर और अन्य महत्वपूर्ण शहरों के साथ रेल द्वारा जुड़ा हुआ है। जो मांडापम रेल्वे स्टेशन से थो़ड़ी दूर चलने पर प्रारंभ हो जाता है जिसकी लंम्बाई 2 किमी है। रामेश्वरम तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई रेल्वे स्टेशन से 596 किलोमीटर दूर है जहां नियमित ट्रेन रामेश्वरम एक्सप्रेस चलाई जाती है।

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Nageshvara Jyotirling – श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग https://astrodeeva.com/nageshvara-jyotirling-%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0/ https://astrodeeva.com/nageshvara-jyotirling-%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0/#respond Mon, 12 Apr 2021 01:16:33 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1873 श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग (Nageshvara Jyotirling ) गुजरात के द्वारिका से 17 मील दूर स्थित है। शास्त्रों में भगवान शिव को नागों के देवता माना जाता है और नागेश्वर का अर्थ होता है नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। नागेश्वर मंदिर में स्थित ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में से […]

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श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग (Nageshvara Jyotirling ) गुजरात के द्वारिका से 17 मील दूर स्थित है। शास्त्रों में भगवान शिव को नागों के देवता माना जाता है और नागेश्वर का अर्थ होता है नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। नागेश्वर मंदिर में स्थित ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में से है तथा 12 ज्योतिर्लिंग में से नागेश्वर को दसवां ज्योतिर्लिंग माना जाता है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा जाता है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शनों के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा ( Story of Nageshvara Jyotirling)

पुराणो के अनुसार एक समय दारुका नाम की एक महा बलशाली राक्षसी हुई जिसे माता पार्वती से वरदान पाकर बहुत अहंकार हो गया था। पश्चिम समुद्र तट पर उसका एक वन था जो सम्पूर्ण समृद्धियों से भरा रहता था। उस वन का विस्तार 16 योजन था। दारुका अपने विलास के लिए जहाँ भी जाती थी, वह वन भी अपनी समस्त भूमि, वृक्षों तथा अन्य सभी वस्तुओं समेत वहीं चला जाता था। देवी पार्वती ने उस वन की रक्षा का भार दारुका को सौंप दिया था। दारुका अपने पति के साथ इच्छानुसार उस वन में विचरण करती थी। उसके पति का नाम दारुक था जो अत्यंत शक्तिशाली था। राक्षस दारुक अपनी पत्नी दारुका के साथ वहाँ रहकर सबको प्रताड़ित करता था। वह सदा यज्ञ और धर्म का नाश करता था। उससे पीड़ित हुई प्रजा ने महर्षि और्व की शरण में जाकर उनको अपना दुःख सुनाया।

और्व मुनि ने शरणागतों की रक्षा के लिए राक्षसों को यह श्राप दिया कि – ‘ ये राक्षस यदि पृथ्वी पर प्राणियों की हिंसा या यज्ञों का विध्वंस करेंगे तो उसी समय अपने प्राणों से हाथ धो बैठेंगे। ‘ देवताओं ने जब यह बात सुनी तो उन्होंने इस का फयदा उठाने की सोची और उन दुराचारी राक्षसों पर आक्रमण कर दिया। राक्षस दुविधा में पड़ गए यदि वे युद्ध में देवताओं को मारेंगे तो मुनि के शाप से उनके प्राण भी चले जाएँगे और नहीं मारते तो पराजित हो जाते।

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इस अवस्था में राक्षसी दारुका ने कहा – ” माता पार्वती के वरदान से मैं इस सारे वन को जहाँ चाहूँ ले जा सकती हूँ।” यह कहकर वह समस्त वन को साथ ले जाकर समुद्र में जा बसी। राक्षस लोग पृथ्वी से हटकर जल में निर्भय होकर रहने लगे और वहाँ के प्राणियों को पीड़ा देने लगे। एक बार बहुत सी नावें उधर से गुजरी जो मनुष्यों से भरी थीं जो व्यापार के उद्देश्य से परदेश जा रहे थे। राक्षसों ने उन सब को पकड़ लिया और बेड़ियों से बांधकर कारागार में डाल दिया और उनको विभिन्न प्रकार से कष्ट देने लगे। उनमें सुप्रिय नाम का एक प्रसिद्ध वैश्य था जो उस दल का मुखिया था। वह बड़ा सदाचारी, भस्म-रुद्राक्षधारी तथा भगवान शिव का परम भक्त था। सुप्रिय ने भोलेनाथ से प्रार्थना की– ” हे देवेश्वर! आप ही मेरे सर्वस्व हैं, मैं आपका हूँ, आपके अधीन हूँ, मेरा जीवन आप को समर्पित है आप हमारी रक्षा कीजिये और हमें इन राक्षसों के चूँगाल से मुक्त कराइये।“

सुप्रिय की इस करुणामयी प्रार्थना करने पर भगवान शंकर एक विवर से प्रकट हो गए। तब सुप्रिय ने उत्तम प्रकार से भगवान शिव की स्तुति एवं पूजन किया। उसके पूजन से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने पाशुपतास्त्र लेकर सभी राक्षसों का तत्काल संहार कर दिया और अपने भक्त सुप्रिय और उसके साथियों की रक्षा की। इसके बाद भगवान शिव ने उस वन को यह वर दिया कि – ‘ आज से इस वन में श्रेष्ठ मुनि निवास करेंगे और राक्षस इसमें कभी न रहेंगे।‘

इसी समय राक्षसी दारुका ने दीन भाव से देवी पार्वती की स्तुति की। उसकी प्रार्थना से पार्वती माता प्रसन्न हो गयीं और दारुका से बोली – ” बता, तेरा क्या इच्छा है? “ दारुका ने कहा – ” माता, मेरे वंश की रक्षा कीजिये। “पार्वती माता बोली – ” मैं सच कहती हूँ, तेरे कुल की रक्षा करूँगी। “ ऐसा कहकर माता पार्वती ने भगवान शिव जी से प्रार्थना की “हे नाथ!यह राक्षसी दारुका मेरी भक्त है और राक्षसियों में बलिष्ठ है। अतः यही राक्षसों के राज्य का शासन करे। ये राक्षस पत्नियां जिन पुत्रों को पैदा करेंगी वे सब मिलकर इस वन में निवास करें, ऐसी मेरी इच्छा है।“ शिव बोले – ” प्रिये ! यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो ऐसा ही हो। मैं भक्तों का पालन करने के लिए प्रसन्नतापूर्वक इस वन में निवास करूँगा।“ इस प्रकार भगवान शिव और माता पार्वती वहाँ स्थित हो गए। ज्योतिर्लिंग स्वरुप महादेव वहाँ नागेश्वर के नाम से विख्यात हुए। वे तीनों लोकों की सम्पूर्ण कामनाओं को सदा पूर्ण करने वाले और महापातकों का नाश करने वाले हैं।

श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर समय सारणी(Nageshvara Jyotirling Temple time table)

मंदिर सुबह पांच बजे प्रातः ( 05:00 am) आरती के साथ खुलता है, आम जनता के लिए मंदिर छः बजे सुबह( 06:00 am) खुलता है। भक्तों के लिए शाम चार बजे श्रृंगार दर्शन होता है तथा उसके बाद गर्भगृह में प्रवेश बंद हो जाता है। शयन आरती शाम सात बजे होती है तथा रात नौ बजे मंदिर बंद हो जाता है।

श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर की विभिन्न पूजाएँ: Nageshvara Jyotirling worships)

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में मंदिर प्रबंधन समिति के द्वारा भक्तों की सुविधा के लिए रु. 105 से लेकर रु. 2101 के बीच विभिन्न प्रकार की पूजाएँ सशुल्क सम्पन्न कराई जाती हैं। जिन भक्तों को पूजन अभिषेक करवाना होता है, उन्हें मंदिर के पूजा काउंटर पर शुल्क जमा करवाकर रसीद प्राप्त करनी होती है, तत्पश्चात मंदिर समिति भक्त के साथ एक पुरोहित को अभिषेक के लिए भेजती है जो भक्त को लेकर गर्भगृह में लेकर जाता है तथा शुल्क के अनुसार पूजा करवाता है।

**(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैंजिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

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Baidyanath Jyotirlinga – वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग https://astrodeeva.com/baidyanath-jyotirlinga-%e0%a4%b5%e0%a5%88%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%82/ https://astrodeeva.com/baidyanath-jyotirlinga-%e0%a4%b5%e0%a5%88%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%82/#respond Mon, 05 Apr 2021 03:15:33 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1847 श्री वैद्यनाथ शिवलिंग (Baidyanath Jyotirlinga) का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर भारतवर्ष के राज्य झारखंड में अतिप्रसिद्ध देवघर नामक स्‍थान पर अवस्थित है। पवित्र तीर्थ होने के कारण लोग इसे वैद्यनाथ धाम भी कहते हैं। जहाँ पर यह मन्दिर स्थित है उस स्थान को […]

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श्री वैद्यनाथ शिवलिंग (Baidyanath Jyotirlinga) का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर भारतवर्ष के राज्य झारखंड में अतिप्रसिद्ध देवघर नामक स्‍थान पर अवस्थित है। पवित्र तीर्थ होने के कारण लोग इसे वैद्यनाथ धाम भी कहते हैं। जहाँ पर यह मन्दिर स्थित है उस स्थान को “देवघर” अर्थात देवताओं का घर कहते हैं। बैद्यनाथ ज्‍योतिर्लिंग स्थित होने के कारण इस स्‍थान को देवघर नाम मिला है। यह ज्‍योतिर्लिंग एक सिद्धपीठ है। कहा जाता है कि यहाँ पर आने वालों की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इस कारण इस लिंग को “कामना लिंग” भी कहा जाता हैं।

वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा ( Story of Baidyanath Jyotirlinga)

पौराणिक कथा के अनुसार एक समय राक्षसराज रावण ने कैलाश पर जाकर अत्यंत भक्तिभाव के साथ भगवान शिव की आराधना की। कुछ समय तक आराधना करने पर जब महादेव प्रसन्न नहीं हुए तब वह कैलाश पर्वत के पास स्थित वन में जाकर एक बड़ा गड्ढा खोदकर उसमें अग्नि प्रज्वलित करके वहीं बैठकर हवन और यज्ञ करते हुए और घोर तप करने लगा।

ग्रीष्म ऋतु में वह पाँच अग्नियों के बीच बैठता, वर्षा ऋतु में खुले मैदान में सोता और शीतकाल में जल के भीतर खड़ा रहता। इस तरह तीन प्रकार से उसकी कठोर तपस्या निरंतर चलती रही। तब एक दिन भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हो गए और रावण को उसकी इच्छा के अनुसार अनुपम और उत्तम बल प्रदान किया।

भगवान शिव का कृपा प्रसाद पाकर रावण ने नतमस्तक हो दोनों हाथ जोड़कर उनसे कहा –” हे कैलाशपती! मुझ पर प्रसन्न होइए। मैं आपको अपने साथ लंका ले जाना चाहता हूँ। आप मेरे इस मनोरथ को सफल कीजिये। मैं आपकी शरण में आया हूँ।“ रावण के ऐसा कहने पर भगवान शिव बड़े संकट में पड़ गए और अनमने होकर बोले – ” राक्षसराज! मेरी बात ध्यान से सुनो। तुम मेरे इस उत्तम लिंग को भक्तिभाव से अपने घर को ले जाओ। पर अगर मार्ग में तुमने इसे कहीं भी भूमि पर रखा तो यह वहीँ सुस्थिर हो जायेगा। “

भगवान शंकर के ऐसा कहने पर रावण ने उनकी आज्ञा लेकर वह शिवलिंग अपने साथ लेकर लंका को प्रस्थान किया। परन्तु मार्ग में भगवान शिव की माया से उसे मूत्रोत्सर्ग की इक्षा हुई। रावण अत्यंत सामर्थ्यवान होने पर भी मूत्र के वेग को नहीं रोक सका। इसी समय वहाँ आस-पास एक ग्वाले को देखकर उसने प्रार्थना करके वह शिवलिंग उसके हाथ में थमा दिया और स्वयं मूत्रत्याग के लिए बैठ गया। एक मुहूर्त बीतते-बीतते वह ग्वाला उस शिवलिंग के भार को सहन नहीं कर पाया और उसे पृथ्वी पर रख दिया। फिर वह ज्योतिर्मय शिवलिंग वहीँ स्थित हो गया। यह देख रावण क्रोधित हुआ पर वह कर भी क्या सकता था, वह वहीं स्थित हो गया तब रावण निराश होकर अपने घर चला गया। जब इन्द्र आदि देवताओं और ऋषि मुनियों ने यह समाचार सुना तो वे सब वहाँ आये और बड़ी प्रसन्नता के साथ शिवजी का विशेष पूजन किया। उन्होंने उस शिवलिंग की विधिवत स्थापना की और उसका नाम वैद्यनाथ रखकर उसकी वंदना करके अपने-अपने स्थान को चले गए। इस दिव्य एवं श्रेष्ठ ज्योतिर्लिंग का दर्शन एवं पूजन सम्पूर्ण अभीष्टों को देने वाला और समस्त पापराशि को हर लेने वाला है। यह सत्पुरुषों को भोग एवं मोक्ष प्रदान करने वाला है।

वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग रोचक तथ्य (Interesting Fact Of Baidyanath Jyotirlinga)

भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में झारखण्ड के देवघर जिले में स्थित वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग शामिल है। विश्व के सभी शिव मंदिरों के शीर्ष पर त्रिशूल लगा दीखता है मगर वैद्यनाथधाम परिसर के शिव, पार्वती, लक्ष्मी-नारायण व अन्य सभी मंदिरों के शीर्ष पर पंचशूल लगे हैं। कहा जाता है कि रावण पंचशूल से ही अपने राज्य लंका की सुरक्षा करता था। चूंकि वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग को लंका ले जाने के लिए कैलाश से रावण ही लेकर आया था पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। ज्योतिर्लिंग ले जाने की शर्त्त यह थी कि बीच में इसे कहीं नहीं रखना है मगर देव योग से रावण को लघुशंका का तीव्र वेग असहनशील हो गया और वह ज्योतिर्लिंग को भगवान के बदले हुए चरवाहे के रूप को देकर लघुशंका करने लगा। उस चरवाहे ने ज्योतिर्लिंग को जमीन पर रख दिया। इस तरह चरवाहे के नाम वैद्यनाथ पर वैद्यनाथधाम का निर्माण हुआ।

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Trimbakeshwar Jyotirlinga – त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग https://astrodeeva.com/trimbakeshwar-jyotirlinga-%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%82%e0%a4%ac%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf/ https://astrodeeva.com/trimbakeshwar-jyotirlinga-%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%82%e0%a4%ac%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf/#respond Sun, 21 Mar 2021 21:55:59 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1798 श्री त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग(Trimbakeshwar Jyotirlinga) गोदावरी नदी के करीब महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरू होती है। भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के […]

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श्री त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग(Trimbakeshwar Jyotirlinga) गोदावरी नदी के करीब महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरू होती है। भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में रहना पड़ा।

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा ( Story of Trimbakeshwar Jyotirlinga)

पौराणिक कथा के अनुसार पूर्वकाल में गौतम नाम के एक विख्यात ऋषि हुए। उनकी पत्नी का नाम अहिल्या था। दक्षिण दिशा में ब्रह्मगिरि नामक एक पर्वत है वहीं रह कर उन्होंने दीर्घकाल तक तपस्या की थी। एक समय वहाँ भयंकर अकाल पड़ा। पूरी धरती सुख चुकी थी और एक गीला पत्ता भी नहीं दिखाई पड़ता था। उस समय वहाँ रहने वाले मनुष्य और वन्य जीव उस क्षेत्र को त्याग कर दूसरी जगह चले गए। तब गौतम ऋषि ने छह महीने तक तप करके वरुण देवता को प्रसन्न किया।

गौतम ऋषि ने वरुणदेव से वृष्टि की प्रार्थना की। इस पर वरुण देवता ने कहा – ” देवताओं के विधान के विरुद्ध वृष्टि न करके मैं तुम्हारी इच्छा के अनुसार तुम्हें सदा अक्षय रहने वाला जल देता हूँ। तुम एक गड्ढा तैयार करो। “ उनके ऐसा कहने पर गौतम ऋषि ने एक छोटा सा गड्ढा खोदा और वरुणदेव ने उसे दिव्य जल से भर दिया और कहा – ” महामुने ! कभी क्षीण न होने वाला यह जल तुम्हारे लिए तीर्थरूप होगा और पृथ्वी पर तुम्हारे ही नाम से इसकी ख्याति होगी।“ ऐसा कहकर महर्षि गौतम से प्रशंसित होकर वरुणदेव अंतर्ध्यान हो गए। गौतम ऋषि वहाँ उस परम दुर्लभ जल को पाकर पहले की तरह ही विधिपूर्वक नित्य पूजन आदि अन्य कर्म करने लगे। उन्होंने वहाँ धान, जौ आदि अनेक प्रकार के अन्न और तरह तरह के फल-फूल के वृक्ष लगा दिए। देखते देखते वे सब लहलहा उठे और वह क्षेत्र अत्यंत सुन्दर हो गया। यह समाचार सुनकर सहस्त्रों ऋषि-मुनि सपरिवार वहाँ आकर रहने लगे। इसके साथ ही अनेक प्रकार के पशु-पक्षी और वन्य जीव भी वहाँ आ गए। वरुणदेव के दिए अक्षय जल के प्रभाव से उस वन में सब ओर आनंद छा गया।

एक बार वहाँ गौतम मुनि के आश्रम में आकर बसे हुए ब्राह्मणों की स्त्रियाँ उस पवित्र जल के विषय पर अहिल्या से नाराज हो गयीं। उन्होंने अपने पतियों को उकसाया। इसके बाद उन ब्राह्मणों ने गौतम मुनि का अनिष्ट करने के लिए गणेश जी की आराधना की। भक्त पराधीन गणेश जी ने प्रकट होकर उनसे वर माँगने को कहा। तब उन ब्राह्मणों ने गणेश जी से कहा – ” भगवन! यदि आप हमें वर देना चाहते हैं तो ऐसा कोई उपाय कीजिये जिससे गौतम मुनि को यह क्षेत्र छोड़ कर जाना पड़े। “

गणेश जी ने कहा – ” ऋषियों ! तुम सब लोग ध्यान से मेरी बात सुनो। इस समय तुम उचित कार्य नहीं कर रहे हो। बिना किसी अपराध के उन पर क्रोध करने से तुम्हारी ही हानि होगी। जिन्होंने पहले उपकार किया हो, उन्हें यदि दुःख दिया जाये तो वह अपने लिए हितकारक नहीं होता। पहले अकाल के कारण जब तुम लोगों को दुःख भोगना पड़ा था, तब महर्षि गौतम ने जल की व्यवस्था करके तुम्हें सुख दिया। परन्तु इस समय तुम सब लोग उन्हें दुःख देना चाहते हो। यह किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। इसलिए तुम लोग कोई दूसरा वर माँगो। “

यद्यपि गणेश भगवान ने ब्राह्मणों को हितकर उपदेश दिया पर उन्होंने गणेश जी की बात नहीं मानी। तब भक्तों के अधीन होने के कारण गणेश जी ने उन ब्राह्मणों से कहा – ” तुम लोगों ने जिस कार्य के लिए प्रार्थना की है, उसे मैं अवश्य करूँगा। आगे जो होना होगा, वह होकर रहेगा।“ ऐसा कह कर वे अंतर्ध्यान हो गए। कुछ दिनों के बाद गणेश जी एक दुर्बल गाय का रूप धारण करके गौतम ऋषि के धान और जौ के खेतों के पास पहुँचे। वह गौ अपनी दुर्बलता के कारण काँपती हुई उन खेतों में जाकर चरने लगी। उसी समय दैववश गौतम जी वहाँ आ गए। अपने दयालु स्वभाव के कारण वे मुट्ठी भर तिनके लेकर उन्हीं से उस गाय को हाँकने लगे। उन तिनकों का स्पर्श होते ही वह गौ पृथ्वी पर गिर पड़ी और उसी क्षण मर गयी।

वे द्वेषी ब्राह्मण और उनकी दुष्ट स्त्रियाँ वहीं छिप कर सब कुछ देख रहे थे। उस गाय के मरते ही वे सब वहाँ पहुँच गए और कहने लगे – ” हे भगवान ! गौतम ऋषि ने यह क्या कर डाला ? एक ब्राह्मण होकर इन्होनें गौ हत्या का पाप किया। ” गौतम मुनि आश्चर्यचकित होकर अहिल्या को बुलाकर कहने लगे – ” देवी ! यह क्या हुआ, कैसे हुआ, कुछ पता नहीं। लगता है परमेश्वर मुझ पर कुपित हो गए हैं। अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ ? मुझे गौ हत्या का पाप लग गया। “

इधर वे ब्राह्मण और उनकी पत्नियाँ विभिन्न प्रकार के दुर्वचनों के द्वारा गौतम ऋषि और अहिल्या को पीड़ित करने लगे। ब्राह्मण बोले – ” अब तुम्हें अपना मुँह नहीं दिखाना चाहिए। यहाँ से जाओ। जब तक तुम इस स्थान में रहोगे तब तक अग्निदेव और पितर हमारे पूजा तर्पण को स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए तुम जल्दी से जल्दी परिवार सहित यहाँ से किसी अन्य स्थान पर चले जाओ। “

यह सुनकर गौतम ऋषि तत्काल सपरिवार उस स्थान से निकल गए और उन सबकी आज्ञा से एक कोस दूर जाकर अपने लिए आश्रम बनाया। उन ब्राह्मणों ने वहाँ जाकर गौतम ऋषि से कहा – ” जब तक तुम गौ हत्या का प्रायश्चित नहीं कर लेते तब तक तुम्हें यज्ञ आदि किसी भी वैदिक अनुष्ठान का अधिकार नहीं रह गया है।“ यह सुनकर गौतम मुनि ने उनसे प्रायश्चित का मार्ग पुछा।

तब उन ब्राह्मणों ने कहा – ” गौतम ! तुम एक करोड़ पार्थिव लिंग बनाकर महादेव की आराधना करो। फिर गंगा में स्नान करके ब्रह्मगिरि पर्वत की ग्यारह बार परिक्रमा करने से तुम्हारा उद्धार होगा। ” गौतम मुनि ने उन ब्राह्मणों की बात मान ली और पार्थिव लिंगों का निर्माण करके शिव आराधना करने लगे। इस प्रकार बहुत समय बीत जाने पर गौतम ऋषि के आराधना से संतुष्ट होकर भगवान शिव वहाँ माता पार्वती और अपने पार्षद गणों के साथ प्रकट हो गए और गौतम मुनि से कहा – ” महामुने! मैं तुम्हारी उत्तम भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई वर माँगो।“ उस समय शिव जी के सुन्दर रूप को देख कर आनंदित हुए गौतम ऋषि ने भक्तिभाव से शंकर जी को प्रणाम करके उनकी स्तुति की, फिर दोनों हाथ जोड़कर बोले – ” देव ! मुझे निष्पाप कर दीजिये। “

शिव जी ने कहा – ” मुने ! तुम धन्य हो और सदा ही निष्पाप हो। इन दुष्टों ने तुम्हारे साथ छल किया है। जिन दुरात्माओं ने तुम पर अत्याचार किया है, वे ही पापी और दुराचारी हैं। वे सब के सब कृतघ्न हैं। उनका कभी उद्धार नहीं हो सकता।“ महादेव जी की बात सुनकर महर्षि गौतम बड़े विस्मित हुए और भक्तिपूर्वक प्रणाम करके कहा –” महेश्वर ! उन ऋषियों ने तो मेरा बहुत उपकार किया है। यदि उन्होंने मेरे साथ ऐसा व्यवहार न किया होता तो मुझे आपका दर्शन कैसे प्राप्त होता ? “ महर्षि गौतम की बात सुनकर भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए और कहा – ” विप्रवर ! तुम धन्य हो और सभी ऋषियों में श्रेष्ठ हो। मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे कोई उत्तम वर माँगो। “

गौतम बोले – ” नाथ ! यदि आप प्रसन्न हैं तो लोक कल्याण के लिए मुझे गंगा प्रदान कीजिये।“ तब शिव जी की आज्ञा से गंगा एक सुन्दर स्त्री का रूप धारण करके वहाँ खड़ी हो गयी। गौतम ऋषि ने गंगा माता को प्रणाम करके कहा – ” गंगे ! तुम सम्पूर्ण जगत को पवित्र करने वाली हो। इसलिए नरक में गिरते हुए मुझ गौतम को पवित्र करो।“ इस पर शिव जी ने गंगा से कहा – ” देवी ! तुम गौतम मुनि को पवित्र करो और तुरंत वापस न जाकर वैवस्वत मनु के अट्ठाईसवें कलियुग तक यहीं रहो। “

गंगा ने कहा – ” महेश्वर ! अम्बिका तथा गणों के साथ आप भी यहाँ रहें, तभी मैं यहाँ रहूँगी।“ गंगा जी की बात सुनकर भगवान शिव बोले – ” गंगे ! तुम धन्य हो। तुम्हारे कथनानुसार मैं भी यहाँ रहूँगा। “ इस प्रकार महर्षि गौतम की प्रार्थना पर भगवान शंकर और नदियों में श्रेष्ठ गंगा वहाँ स्थित हो गए। वहाँ की गंगा, गौतमी ( गोदावरी ) नाम से विख्यात हुई और भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग त्र्यम्बकेश्वर कहलाया।

उस दिन से लेकर जब जब बृहस्पति सिंह राशि में स्थित होते हैं, तब तब सभी तीर्थ और देवतागण गौतमी के तट पर वास करते हैं। वे सब जब तक गौतमी के किनारे रहते हैं, तब तक अपने स्थान पर उनका कोई फल नहीं होता। जब वे अपने स्थान पर लौटते हैं तभी वहाँ इनके सेवन का फल मिलता है। यह त्र्यम्बक नाम से प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग गौतमी के तट पर स्थित है और पापों का नाश करने वाला है। जो भक्तिभाव से इस त्र्यम्बक लिंग का दर्शन और पूजन करता है वह समस्त अभीष्टों को प्राप्त करता है।

एक ही साथ विराजमान हैं (त्रिदेव) ब्रह्मा, विष्णु और महेश

त्र्यंबकेश्‍वर ज्योर्तिलिंग (Trimbakeshwar Jyotirlinga ) में ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश तीनों ही भगवान विराजित हैं। यही इस ज्‍योतिर्लिंग की सबसे बड़ी विशेषता है। जो यहां की महत्वता को बढ़ाती है। त्र्यबंकेश्वर मंदिर के पास तीन पर्वत स्थित हैं। जिन्हें ब्रह्मगिरी, नीलगिरी और गंगा द्वार के नाम से जाना जाता है। अन्‍य स्थानों पर विराजमान सभी ज्‍योतिर्लिंगों में केवल भगवान शिव ही विराजित हैं। यहां मंदिर के अंदर एक छोटे से गड्ढे में तीन छोटे-छोटे लिंग है जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और शिव- इन तीनों देवों का प्रतीक माना जाता है।

त्र्यंबकेश्‍वर ज्योर्तिलिंग कैसें पहुँचे(How To Reach Trimbakeshwar Jyotirlinga)

अगर आप त्र्यंबकेश्‍वर ज्योर्तिलिंग (Trimbakeshwar Jyotirlinga)जाने की योजना बना रहे हैं तो त्र्यंबकेश्वर जाने के लिए आपको पहले नासिक जाना होगा। जो भारत के लगभग हर क्षेत्र से रेल तथा सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। अगर आप हवाई मार्ग से जाने की योजना बना रहे हैं तो आपको मुम्बई से होकर जा सकते हैं। त्र्यंबकेश्वर नासिक से केवल 30 किलोमीटर की दूरी पर स्तिथ है। यहां से आपको कभी भी टैक्सी मिल सकती है। हर साल यहां हज़ारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

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Shri Kashi Vishwanath – श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग https://astrodeeva.com/shri-kashi-vishwanath-%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af/ https://astrodeeva.com/shri-kashi-vishwanath-%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af/#respond Sun, 14 Mar 2021 23:27:50 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1778 काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग(Kashi Vishwanath) भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है। इसलिए सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है। इस स्थान की मान्यता है, कि प्रलय आने पर भी यह […]

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काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग(Kashi Vishwanath) भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है। इसलिए सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है। इस स्थान की मान्यता है, कि प्रलय आने पर भी यह स्थान बना रहेगा। इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने पर काशी को उसके स्थान पर पुन: रख देंगे।

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा (Story of Kashi Vishwanath Jyotirlinga)

मान्यता के अनुसार अपने अद्वैत भाव में ही रमने वाले उन निर्गुण परब्रह्म परमात्मा में कभी एक से दो हो जाने की इच्छा हुई। फिर वे ही परमात्मा सगुण रूप में प्रकट हो शिव कहलाये। वे शिव ही पुरुष और स्त्री दो रूपों में प्रकट हो गए। उनमें जो पुरुष थे, उनका नाम शिव हुआ और जो स्त्री थी, उन्हें शक्ति कहते हैं। उन शिव और शक्ति ने स्वयं अदृश्य रह कर पुरुष और प्रकृति की रचना की। अपने माता-पिता को सामने न देखकर पुरुष और प्रकृति संशय में पड़ गए।

उस समय निर्गुण परमात्मा से आकाशवाणी हुई – ” तुम दोनों को तपस्या करनी चाहिए। फिर तुमसे सृष्टि का विस्तार होगा।“ वे पुरुष और प्रकृति बोले – ” प्रभो ! तपस्या के लिए तो कोई स्थान है ही नहीं फिर हम दोनों आपकी आज्ञा के अनुसार कहाँ स्थित होकर तप करें ? “ तब निर्गुण शिव ने पाँच कोस लंबे और चौड़े एक सुन्दर नगर का निर्माण किया। वह नगर सभी आवश्यक वस्तुओं से युक्त था। वह नगर आकाश में पुरुष के समीप आकर स्थित हो गया। तब पुरुष (श्रीहरि) ने उस नगर में स्थित हो सृष्टि की कामना से शिव का ध्यान करते हुए बहुत वर्षों तक तप किया। उस समय उनके शरीर से श्वेत जल की अनेक धाराएँ प्रकट हुईं, जिनसे सारा आकाश व्याप्त हो गया। उस अपार जल राशि में वह नगर डूबने लगा, तब निर्गुण शिव ने तत्काल उस नगर को अपने त्रिशूल पर धारण कर लिया। इसके बाद भगवान श्रीहरि योगनिद्रा में ध्यानस्थ हो गए और उनकी नाभि से एक कमल प्रकट हुआ फिर उस कमल से ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए। तत्पश्चात ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण आरम्भ किया।

जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण कर लिया तब भगवान शिव ने सोचा कि – ‘ इस ब्रह्माण्ड में कर्मपाश से बंधे हुए प्राणी मुझे कैसे प्राप्त करेंगे ? ‘ यह सोचकर उन्होंने मुक्तिदायिनी पंचक्रोशी (काशी) को इस जगत में छोड़ दिया। यह काशी नगरी कर्म बंधन का नाश करने वाली तथा मोक्षदायिनी है। यहाँ स्वयं परमात्मा ने अविमुक्त लिंग की स्थापना की है। वह महापातकी पुरुषों को भी मोक्ष प्रदान करने वाला है। जिनकी कहीं भी गति नहीं है, उनके लिए काशी पुरी में ही गति है। ब्रह्मा जी का एक दिन पूरा होने पर जब सारा संसार प्रलय में मग्न हो जाता है, तब भी इस काशी नगरी का नाश नहीं होता है। उस समय भगवान शिव इसे त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और जब ब्रह्मा द्वारा पुनः नयी सृष्टि की जाती है, तब वे इसे फिर से इस भूतल पर स्थापित कर देते हैं। कर्मों का कर्षण करने से ही इस नगरी को काशी कहते हैं। इस काशी पुरी में भगवान शिव उमा सहित सदा निवास करते हैं। यह शंकर जी की प्रिय नगरी काशी सदा भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली है।

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के आरती का समय ( Shri Kashi Vishwanath Aarti Timings)

काशी विश्वनाथ मंदिर पूरे 12 महीनें भक्तों के दर्शन हेतु खुला रहता है | पूरे विश्वभर से श्रद्धालु मंदिर के दर्शन करने आते है | यहाँ प्रतिदिन 5 आरतियाँ होती है | आरती में शामिल होकर भक्त अपने आप को धन्य पाते है | काशी विश्वनाथ मंदिर में होने वाली 5 आरतियाँ इस प्रकार है :-

  • मंगला आरती – 03:00 से 04:00  (सुबह के समय )
  • भोग आरती   – 11: 15  से  12: 20
  • संध्या आरती – 07:00 से 08:15
  • श्रृंगार आरती – 09:00 से 10:00 रात्रि
  • शयन आरती – 10:30  से 11:00  रात्रि

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Bhimashankar Jyotirling- भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग https://astrodeeva.com/bhimashankar-jyotirling-%e0%a4%ad%e0%a5%80%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b6%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%82/ https://astrodeeva.com/bhimashankar-jyotirling-%e0%a4%ad%e0%a5%80%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b6%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%82/#respond Mon, 08 Mar 2021 04:43:05 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1760 भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (Bhimashankar Jyotirling) महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रृद्धा से इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के […]

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भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (Bhimashankar Jyotirling) महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रृद्धा से इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं।

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की कथा (Story of Shri Bhimashankar Jyotirlinga)

प्राचीन काल में भीम नाम का एक महापराक्रमी राक्षस हुआ। वह सदा धर्म का नाश करता और सभी प्राणियों को दुःख देता था। वह महाबली राक्षस कुम्भकरण के वीर्य और कर्कटी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। एक दिन भीम ने अपनी माता से पुछा –”माँ ! मेरे पिता कहाँ हैं? तुम अकेली क्यों रहती हो? मैं यह सब जानना चाहता हूँ। “

कर्कटी बोली – ”बेटा! रावण के छोटे भाई कुम्भकरण तेरे पिता थे। भाई सहित उस महाबली वीर को श्रीराम ने मार डाला। मेरे पिता का नाम कर्कट और माता का नाम पुष्कसी था।

विराध मेरे पति थे, जिन्हें राम ने पहले ही मार डाला था। अपने प्रिय स्वामी के मारे जाने पर मैं अपने माता-पिता के साथ रहती थी। एक दिन मेरे माता-पिता अगस्त्य मुनि के शिष्य सुतीक्ष्ण को अपना आहार बनाने के लिए गए। उन्होंने कुपित होकर मेरे माता-पिता को भस्म कर दिया। तब से मैं अकेली होकर बड़े दुःख के साथ इस पर्वत पर रहने लगी। एक दिन महान बल पराक्रम से संपन्न कुम्भकरण यहाँ आये और उन्होंने बलात मेरे साथ समागम किया फिर मुझे छोड़कर लंका चले गए। इसके बाद तुम्हारा जन्म हुआ। तुम भी अपने पिता के समान महान बलवान और पराक्रमी हो। अब मैं तुम्हारे सहारे ही यहाँ अपना समय व्यतीत करती हूँ। “

अपनी माता की बात सुनकर भयानक पराक्रमी भीम क्रोधित होकर विचार करने लगा कि – ‘विष्णु ने मेरे पिता को मार डाला। मेरे नाना-नानी भी उनके भक्त के हाथों मारे गए। उन्होंने विराध को भी मार डाला इस प्रकार मेरी माता को बहुत दुःख दिया है। अगर मैं अपने पिता का पुत्र हूँ तो श्रीहरि को अवश्य पीड़ा दूँगा।‘ ऐसा निश्चय करके उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए एक हजार वर्षों तक कठोर तप किया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी उसके सामने प्रकट हुए और बोले –”भीम ! मै तुम्हारी तपस्या सेप्रसन्न हूँ, तुम्हारी जो भीअभिलाषा हो मांग लो।“

भीम बोला – ”हे कमलासन ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसा बल दीजिये जिसकी कहीं कोई तुलना न हो।“ ब्रह्मा जी ने भीम को मनोवांछित वर प्रदान किया और अंतर्ध्यान हो गए। ब्रह्मा जी से वर पाकर भीम अपने घर पहुँचा और अपनी माता को प्रणाम करके बोला –”माँ! अब तुम मेरा बल देखो। मैं इन्द्र आदि देवताओं तथा उनकी सहायता करने वाले विष्णु का संहार कर डालूँगा।  ऐसा कहकर परम भीम ने पहले इन्द्र सहित समस्त देवताओं को पराजित किया और देवताओं की सहायता को पहुँचे श्रीहरि को भी परास्त किया।

इसके बाद उसने पृथ्वी को जीतना आरम्भ किया। सबसे पहले वह कामरूप देश के राजा सुदक्षिण को जीतने के लिए गया सुदक्षिण भगवान शिव के परम भक्त थे और उनके ही आश्रित होकर राज्य करते थे। सुदक्षिण के साथ भीम का भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में सुदक्षिण पराजित हुए और भीम ने उनका राज्य अपने अधिकार में ले लिया। इसके बाद भीम ने उस शिवभक्त राजा सुदक्षिण को कारागार में डाल दिया। सुदक्षिण कारागार में ही एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर भगवान शिव के ध्यान-पूजन और पंचाक्षर मन्त्र के जप में अपना समय व्यतीत करने लगे।इधर दुष्ट भीम अपनी विशाल सेना के साथ समस्त पृथ्वी को अपने वश में कर लिया। वह वेदों और शास्त्रों में वर्णित धर्म का लोप करने लगा।

तब समस्त देवता और ऋषिगण भगवान शिव के शरण में पहुँचे और प्रणाम करके उनकी स्तुति की। उनकी स्तुति से अत्यंत प्रसन्न होकर भगवान शिव बोले –

” देवगण तथा महर्षियों ! मैं प्रसन्न हूँ। वर मांगो। तुम्हारा कौन सा कार्य सिद्ध करूँ ? “

देवता बोले – ” देवेश्वर ! आप अंतर्यामी हैं, आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है। प्रभो ! कुम्भकरण से उत्पन्न कर्कटी का बलवान पुत्र राक्षस भीम ब्रह्मा जी से वर पाकर समस्त संसार को पीड़ा दे रहा है। अतः आप इस दुखदायी राक्षस का नाश करके हम पर कृपा कीजिये।“ शम्भू ने कहा – ” देवताओं ! कामरूप देश के राजा सुदक्षिण मेरे श्रेष्ठ भक्त हैं। उनसे मेरा एक संदेश कह दो। उनसे कहना कि ब्रह्माजी के वर से शक्तिशाली होकर भीम ने जो उनका तिरस्कार किया है , मैं शीघ्र ही उस दुष्ट राक्षस को उसका उचित दंड दूँगा। “

इसके बाद सभी देवता और ऋषिगण प्रसन्न होकर राजा सुदक्षिण के पास जाकर उनको भगवान शिव का संदेश सुनाया और अपने अपने स्थान को चले गए। भीम के गुप्तचरों ने इस बात की सूचना उसे दी और कहा कि राजा सुदक्षिण आपके नाश के लिए कोई षड्यंत्र कर रहे हैं।यह समाचार सुनते ही भीम कुपित होकर राजा सुदक्षिण को मारने के उद्देश्य से हाथ में तलवार लेकर कारागार में पहुँचा। वहाँ पहुँच कर उसने राजा को बहुत सारे दुर्वचन कहे और भगवान शंकर के पार्थिव लिंग को नष्ट करने हेतु तलवार चलायी।

वह तलवार उस पार्थिव लिंग का स्पर्श करे इसके पहले ही वहाँ साक्षात भगवान शंकर प्रकट हो गए और बोले – ” देखो, मैं अपने भक्त की रक्षा के लिए यहाँ प्रकट हुआ हूँ। मेरा व्रत है कि मैं सदा अपने भक्त की रक्षा करूँ।  ऐसा कहकर भगवान शंकर ने अपने त्रिशूल से उस तलवार के दो टुकड़े कर दिए और हुंकार मात्र से ही तत्काल भीम सहित समस्त राक्षसों को भस्म कर डाला। भगवान शंकर की कृपा से इन्द्र आदि समस्त देवताओं और ऋषियों को शांति मिली तथा सारे संसार की पीड़ा और दुःख का अंत हुआ।

उस समय देवताओं और ऋषियों ने भगवान शंकर की स्तुति की और कहा – ” प्रभो ! आप यहाँ लोगों को सुख देने के लिए सदा निवास करें। आपका दर्शन करने से यहाँ सबका कल्याण होगा। आप भीमशंकर के नाम से विख्यात होंगे और सबके मनोरथों को सिद्ध करेंगे। आपका यह ज्योतिर्लिंग सदा पूजनीय और समस्त विपत्तियों का निवारण करने वाला होगा। “उनके इस प्रकार प्रार्थना करने पर लोक हि में भक्तवत्सल भगवान शिव प्रसन्नतापूर्वक वहीं स्थित हो गए।

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Kedarnath Jyotirling- केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा https://astrodeeva.com/kedarnath-jyotirling-%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%82/ https://astrodeeva.com/kedarnath-jyotirling-%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%82/#respond Mon, 01 Mar 2021 03:19:05 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1726 केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग (Kedarnath Jyotirling) भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड में मन्दाकिनी नदी के तट पर स्थित है। केदारनाथ समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस […]

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केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग (Kedarnath Jyotirling) भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड में मन्दाकिनी नदी के तट पर स्थित है। केदारनाथ समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व केदार क्षेत्र को भी दिया है।

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा (Story of Kedarnath Jyotirling)

मान्यताओं के अनुसार महाभारत युद्घ में विजय के बाद पांण्डव अपने गुरूजनों और सगे संबंधियों को मारने के बाद दुखी थे और अपने पापों से मुक्ती चाहते थे। वे भगवान श्री कृष्ण के पास गए और अपने पापों से मुक्ति का उपाय पूछा । तब भगवान श्री कृष्ण ने उनसे कहा कि भगवान शिव ही आपको पापों से मुक्त कर सकते हैं। भगवान श्री कृष्ण के कहने पर पांण्डव शिव जी को मनाने चल पड़े। पांण्डवों द्वारा अपने गुरूओं एवं सगे-संबंधियों का वध किये जाने से भगवान शिव जी पांण्डवों से नाराज थे । गुप्त काशी( उतराखंड,भारत) में पांण्डवों को देखकर भगवान शिव वहां से विलीन हो गये और उस स्थान पर पहुंच गये जहां पर वर्तमान में केदारनाथ स्थित है।

लेकिन पांण्डव भगवान शिव को हर हाल में मनाना चाहते थे। शिव जी का पीछा करते हुए पांण्डव केदारनाथ पहुंच गये। इस स्थान पर पांण्डवों को आया हुए देखकर भगवान शिव ने एक बैल का रूप धारण किया और इस क्षेत्र में चर रहे बैलों के झुंण्ड में शामिल हो गये। पांण्डवों ने बैलों के झुंण्ड में भी शिव जी को पहचान लिया तो शिव जी बैल के रूप में ही धरती में समाने लगे। भगवान शिव को बैल के रूप में धरती में समाता देख भीम ने कमर से कसकर पकड़ लिया। पांण्डवों की सच्ची श्रद्धा को देख भगवान शिव प्रकट हुए और पांण्डवों को पापों से मुक्त कर दिया। इस बीच बैल बने शिव जी का सिर काठमांडू स्थित पशुतिनाथ में पहुंच गया। इसलिए केदारनाथ और पशुपतिनाथ को मिलाकर एक ज्योर्तिलिंग भी कहा जाता है। केदरनाथ में बैल के पीठ रूप में शिवलिंग की पूजा होती है जबकि पशुपतिनाथ में बैल के सिर के रूप में शिवलिंग को पूजा जाता है। केदारतीर्थ में पहुँच कर वहाँ प्रेमपूर्वक केदारेश्वर की पूजा करके वहाँ का जल पी लेने के बाद मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता।

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Shri Omkareshwar Jyotirlinga- श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग https://astrodeeva.com/shri-omkareshwar-jyotirlinga/ https://astrodeeva.com/shri-omkareshwar-jyotirlinga/#comments Mon, 22 Feb 2021 02:14:25 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1706 ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग (Omkareshwar Jyotirlinga) मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप नर्मदा के तट पर स्थित है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है। ऊं शब्द की उत्पति ब्रह्मा के मुख से हुई है। इसलिए किसी भी धार्मिक […]

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ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग (Omkareshwar Jyotirlinga) मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप नर्मदा के तट पर स्थित है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है। ऊं शब्द की उत्पति ब्रह्मा के मुख से हुई है। इसलिए किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊं के साथ ही किया जाता है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा (Story of Shri Omkareshwar Jyotirlinga)

पौराणिक कथा के अनुसार एक समय देवर्षि नारद ने गोकर्ण नामक तीर्थ में जाकर भगवान शिव की आराधना की। कुछ समय के बाद नारद मुनि वहाँ से गिरिराज विंध्य पर आए। विंध्य ने नारद मुनि का बहुत आदर के साथ पूजन किया और कहा – ” मेरे यहाँ सब कुछ है, कभी किसी बात की कमी नहीं होती है।“ विंध्य की ऐसी अभिमान भरी बात सुनकर नारद मुनि लंबी साँस खींचकर चुप रह गए। यह देखकर विंध्य पर्वत ने कहा – ” मुनिवर, लगता है आप मेरे बात से सहमत नहीं हैं। आपने मेरे यहाँ कौन सी कमी देखी है? “

नारद जी ने कहा – ”हे गिरिराज! तुम्हारे यहाँ सब कुछ है फिर भी मेरु पर्वत तुमसे बहुत ऊँचा है। उसके शिखर देवताओं के लोकों में भी पहुँचे हुए हैं। “ऐसा कहकर नारद जी वहाँ से चल दिए। पर विंध्य पर्वत के दिमाग़ में नारद जी बात चुभ गयी और ‘मेरे जीवन को धिक्कार है‘ ऐसा सोचता हुआ मन ही मन संतप्त हो उठा।‘ और अब मैं भगवान विश्वनाथ की तपस्या करूँगा ‘, ऐसा निश्चय करके वह भगवान शंकर की शरण में गया। अभी वर्तमान में जहाँ ओंकारेश्वर स्थित है, वहाँ जाकर उसने भगवान शिव की मूर्ति बनाई और छः मास तक निरंतर शिव के ध्यान में तत्पर हो कठिन तपस्या की। विंध्याचल की ऐसी तपस्या देखकर भगवान शंकर प्रसन्न हो गए। उन्होंने विंध्याचल को अपना वह स्वरुप दिखाया जो योगियों के लिए भी दुर्लभ है।

वे प्रसन्न होकर विंध्याचल से बोले – ” विंध्य! में तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। तुम मनोवांछित वर मांगो।“

विंध्य बोले – ” देवेश्वर शम्भो! आप सदा ही भक्तवत्सल हैं। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे वह बुद्धि प्रदान कीजिये जो प्रत्येक कार्य को सिद्ध करने वाली हो।” भगवान शंकर ने विंध्य को वह उत्तम वर दिया और कहा – ” पर्वतराज विंध्य ! तुम जैसा चाहो वैसा करो। “उसी समय देवता और ऋषिगण वहाँ आये और शंकर जी की पूजा करके बोले – ” प्रभो ! आप यहाँ स्थिर रूप से निवास करें।” देवताओं के आग्रह को सुनकर भोलेनाथ प्रसन्न हो गए और सबको सुख देने के लिए इसे सहर्ष स्वीकार किया।

वहाँ जो एक ही ओंकारलिंग था वह दो स्वरूपों में विभक्त हो गया। पहला ओंकारेश्वर और दूसरा अमलेश्वर के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुआ। ये दोनों शिवलिंग भक्तों को अभीष्ट फल प्रदान करने वाले हैं। उस समय देवताओं और ऋषियों ने उन दोनों लिंगों की पूजा की और भगवान शिव को संतुष्ट करके अनेक वर प्राप्त किये। इसके बाद देवता और ऋषिगण अपने अपने स्थान को चले गए और विंध्याचल भी अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव करने लगे।

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