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]]>हिन्दू शास्त्रों में भगवान शिव बहुत ही भोले माने गए हैं और वह अपने भक्तों द्वारा सच्चे मन से की गयी भक्ति से आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं। यही कारण है कि देश के इन 7 मंदिरों में कहते हैं कि यदि मनुष्य सच्चे और निश्छल भाव से शिव जी का दर्शन कर ले तो उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। तो आइए आपको बताएं ये प्रमुख 7 मंदिर कौन से हैं
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में स्थित केदारनाथ का मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह चार धाम यात्रा में से भी एक माना जाता है। उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ-ये दो प्रधान तीर्थ हैं, दोनो के दर्शन का बड़ा ही माहात्म्य है। मान्यता है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल हो जाती है। शास्त्रों लिखा है कि केदारनाथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों का नाश कर भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण करता है।
जम्मू-कश्मीर में स्थित अमरनाथ गुफा हिंदुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल है और यहां दर्शन करना बहुत ही पुण्यदायी माना गया है। यह मंदिर एक गुफा के रूप स्थित है। पवित्र गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग का निर्मित होना है। प्राकृतिक बर्फ से निर्मित होने के कारण इसे स्वयंभू बर्फ का शिवलिंग भी कहते हैं प्रतिवर्ष यह शिवलिंग लगभग 10 फुट ऊचा बनता है। आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक पूरे सावन महीने में होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए लाखो लोग यहां की यात्रा करते है। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इस बर्फ का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। श्रावण पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार में आ जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव ने इसी गुफा में माता पार्वती को अमर कथा सुनाई थी।
गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे स्थित सोमनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों से एक है। यह ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु विश्व का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। सोमनाथ-ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कंद पुराणादि में उल्लेखित है। चन्द्रदेव का एक नाम सोम भी है। उन्होंने भगवान शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी इसीलिए इसका नाम ‘सोमनाथ’ हो गया।
ओंकारेश्वर मंदिर मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप खंडवा में नर्मदा के तट पर स्थित है। भोलेनाथ के 12 ज्योतिर्लिंगों में ओमकारेश्वर मंदिर को प्रमुख शिव मंदिर में गिना जाता है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है। चार धाम यात्रा के बाद यहां ओमारेश्वर महादेव का दर्शन करना जरूरी होता है, तभी चार धाम यात्रा का पुण्य मिलता है।
महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के किनारे स्थित त्रयंबकेश्वर मंदिर हिंदुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है। काले पत्थरों से बना ये मंदिर चमत्कारिक माना गया है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में विराजित होना पड़ा। इसी स्थान पर कालसर्प दोष निवारण हेतु पूजा की जाती है और मान्यता हैं यहां से शिवजी का कोई भक्त खाली हाथ नहीं लौटता।
उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित कनखल में दक्षेश्वर मंदिर अपनी आस्था और चमत्कार के लिए जाना जाता है। शास्त्रों के अनुसार ये वहीं मंदिर है जहां राजा दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें सभी देवी-देवताओं, ऋषियों और संतों को तो आमंत्रित किया गया था परंतु भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया गया था। मान्यता है कि जो व्यक्ति दक्षेश्वर महादेव स्थित शिवलिंग का जलाभिषेक करता है, उसे अन्य स्थान पर जल चढ़ाने से कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है।
तमिलनाडु के तिरुवनमलाई जिले में शिव का अनूठा मंदिर है। अन्नामलाई पर्वत की तराई में स्थित इस मंदिर को अनामलार या अरुणाचलेश्वर शिव मंदिर कहा जाता है। यहां हर पूर्णिमा को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। खासतौर पर कार्तिक पूर्णिमा पर विशाल मेला लगता है। श्रद्धालु यहां अन्नामलाई पर्वत की 14 किलोमीटर लंबी परिक्रमा कर शिव से कल्याण की मन्नत मांगते हैं। माना जाता है कि यह शिव का विश्व में सबसे बड़ा मंदिर है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार ब्रह्माजी ने हंस का रूप धारण किया और शिवजी के शीर्ष को देखने के लिए उड़ान भरी। उसे देखने में असमर्थ रहने पर ब्रह्माजी ने एक केवड़े के पुष्प से, जो शिवजी के मुकुट से नीचे गिरा था, शिखर के बारे में पूछा। फूल ने कहा कि वह तो चालीस हजार साल से गिरा पड़ा है। ब्रह्माजी को लगा कि वे शीर्ष तक नहीं पहुंच पाएंगे, तब उन्होंने फूल को यह झूठी गवाही देने के लिए राजी कर लिया कि ब्रह्माजी ने शिवजी का शीर्ष देखा था। शिवजी इस धोखे पर गुस्सा हो गए और ब्रह्माजी को शाप दिया कि उनका कोई मंदिर धरती पर नहीं बनेगा। वहीं केवड़े के फूल को शाप दिया कि वह कभी भी शिव पूजा में इस्तेमाल नहीं होगा। मान्यता है कि जहां शिवजी ने ब्रह्माजी को शाप दिया था, वह स्थल तिरुवनमलाई है।
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]]>The post Rameshwaram Jyotirlinga- रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>जब रावण सीताजी का हरण करके लंका ले गया, तब सुग्रीव के साथ उसकी वानर सेना लेकर श्रीराम समुद्र तट पर आये। वहाँ वे विचार करने लगे कि हम किस प्रकार इस समुद्र को पार करेंगे और किस प्रकार रावण को परास्त कर सीता जी को मुक्त कराएँगे। इतने में ही श्रीराम को प्यास लगी। उन्होंने जल माँगा और वानर मीठा जल ले आये। प्रभु श्रीराम ने प्रसन्न होकर वह जल ले लिया। तभी उन्हें स्मरण हुआ कि – ‘ मैंने अपने स्वामी भगवान शंकर का दर्शन तो किया ही नहीं। फिर यह जल मैं कैसे ग्रहण कर सकता हूँ? ‘
इस प्रकार विचार कर उन्होंने उस जल को नहीं पिया। इसके बाद उन्होंने शिवलिंग बनाया और आवाहन आदि सोलह उपचारों का पालन करके उन्होंने विधिपूर्वक बड़े प्रेम से शंकर जी की पूजा अर्चना की। इसके बाद दिव्य स्तोत्रों के द्वारा यत्नपूर्वक भगवान शंकर को संतुष्ट करके श्रीराम ने उनसे प्रार्थना की। श्रीराम बोले – ” उत्तम व्रत का पालन करने वाले मेरे स्वामी महेश्वर ! आप मेरी सहायता कीजिये। आपके सहयोग के बिना मेरे कार्य की सिद्धि अत्यंत कठिन है। रावण भी आपका ही भक्त है, वह सबके लिए सर्वथा दुर्जय और महावीर है पर आपके दिए हुए वरदान के कारण सदा अहंकार से भरा रहता है और संसार को कष्ट देता है।”
श्रीराम के पूजन से प्रसन्न होकर माता पार्वती सहित भगवान शंकर अपने पार्षदगणों के साथ निर्मल रूप धारण करके वहाँ प्रकट हो गए। श्रीराम ने भगवान शिव का पूजन और विभिन्न प्रकार से स्तुति करके उनसे रावण के साथ होने वाले युद्ध में अपने लिए विजय की प्रार्थना की। तब भगवान शिव ने श्रीराम को युद्ध की आज्ञा और रावण पर विजय का वरदान दिया। भगवान शिव से विजय का वरदान पाकर नतमस्तक हो हाथ जोड़कर श्रीराम बोले –
” हे भोलेनाथ! यदि आप संतुष्ट हैं तो संसार के कल्याण के लिए आप सदा यहाँ निवास करें।“ श्रीराम के ऐसा कहने पर भगवान शिव वहाँ ज्योतिर्लिंग में स्थित हो गए और वह तीनों लोकों में रामेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए। भगवान रामेश्वर सदा भोग और मोक्ष देनेवाले तथा भक्तों की इक्षा पूर्ण करने वाले हैं।
सुबह- 05:00 बजे फिर दोपहर 1 बजे
शाम को- 03:00 और रात्रि में 9 बजे
मंदिर में 26 प्रकार की पूजा विधि का उल्लेख किया गया है। जिनमें से 9 पूजा विधि प्रमुख हैं। जो निश्चित रकम का भुगतान करने पर करवाई जा सकती हैं।
रामेश्वरम् केवल धार्मिक महत्व का तीर्थ ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से भी यह स्थल दर्शनीय है। इस के समुद्र तट पर तरह-तरह की कोड़ियां, शंख और सीपें मिलती हैं।
रामेश्वरम जिला अच्छी तरह से मदुरै, कन्याकुमारी, चेन्नई और त्रिची जैसे बड़े शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा है। यह सड़क मार्ग से पांडिचेरी और तंजावुर से भी जुड़ा है। यात्रा के लिए आप जीप, ऑटो रिक्शा और यहां तक कि चक्र रिक्शा किराया पर करके भी जा सकते हैं।
रामेश्वरम चेन्नई, मदुरै, कोयंबटूर, त्रिची, तंजावुर और अन्य महत्वपूर्ण शहरों के साथ रेल द्वारा जुड़ा हुआ है। जो मांडापम रेल्वे स्टेशन से थो़ड़ी दूर चलने पर प्रारंभ हो जाता है जिसकी लंम्बाई 2 किमी है। रामेश्वरम तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई रेल्वे स्टेशन से 596 किलोमीटर दूर है जहां नियमित ट्रेन रामेश्वरम एक्सप्रेस चलाई जाती है।
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]]>The post Shri Kashi Vishwanath – श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>मान्यता के अनुसार अपने अद्वैत भाव में ही रमने वाले उन निर्गुण परब्रह्म परमात्मा में कभी एक से दो हो जाने की इच्छा हुई। फिर वे ही परमात्मा सगुण रूप में प्रकट हो शिव कहलाये। वे शिव ही पुरुष और स्त्री दो रूपों में प्रकट हो गए। उनमें जो पुरुष थे, उनका नाम शिव हुआ और जो स्त्री थी, उन्हें शक्ति कहते हैं। उन शिव और शक्ति ने स्वयं अदृश्य रह कर पुरुष और प्रकृति की रचना की। अपने माता-पिता को सामने न देखकर पुरुष और प्रकृति संशय में पड़ गए।
उस समय निर्गुण परमात्मा से आकाशवाणी हुई – ” तुम दोनों को तपस्या करनी चाहिए। फिर तुमसे सृष्टि का विस्तार होगा।“ वे पुरुष और प्रकृति बोले – ” प्रभो ! तपस्या के लिए तो कोई स्थान है ही नहीं फिर हम दोनों आपकी आज्ञा के अनुसार कहाँ स्थित होकर तप करें ? “ तब निर्गुण शिव ने पाँच कोस लंबे और चौड़े एक सुन्दर नगर का निर्माण किया। वह नगर सभी आवश्यक वस्तुओं से युक्त था। वह नगर आकाश में पुरुष के समीप आकर स्थित हो गया। तब पुरुष (श्रीहरि) ने उस नगर में स्थित हो सृष्टि की कामना से शिव का ध्यान करते हुए बहुत वर्षों तक तप किया। उस समय उनके शरीर से श्वेत जल की अनेक धाराएँ प्रकट हुईं, जिनसे सारा आकाश व्याप्त हो गया। उस अपार जल राशि में वह नगर डूबने लगा, तब निर्गुण शिव ने तत्काल उस नगर को अपने त्रिशूल पर धारण कर लिया। इसके बाद भगवान श्रीहरि योगनिद्रा में ध्यानस्थ हो गए और उनकी नाभि से एक कमल प्रकट हुआ फिर उस कमल से ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए। तत्पश्चात ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण आरम्भ किया।
जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण कर लिया तब भगवान शिव ने सोचा कि – ‘ इस ब्रह्माण्ड में कर्मपाश से बंधे हुए प्राणी मुझे कैसे प्राप्त करेंगे ? ‘ यह सोचकर उन्होंने मुक्तिदायिनी पंचक्रोशी (काशी) को इस जगत में छोड़ दिया। यह काशी नगरी कर्म बंधन का नाश करने वाली तथा मोक्षदायिनी है। यहाँ स्वयं परमात्मा ने अविमुक्त लिंग की स्थापना की है। वह महापातकी पुरुषों को भी मोक्ष प्रदान करने वाला है। जिनकी कहीं भी गति नहीं है, उनके लिए काशी पुरी में ही गति है। ब्रह्मा जी का एक दिन पूरा होने पर जब सारा संसार प्रलय में मग्न हो जाता है, तब भी इस काशी नगरी का नाश नहीं होता है। उस समय भगवान शिव इसे त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और जब ब्रह्मा द्वारा पुनः नयी सृष्टि की जाती है, तब वे इसे फिर से इस भूतल पर स्थापित कर देते हैं। कर्मों का कर्षण करने से ही इस नगरी को काशी कहते हैं। इस काशी पुरी में भगवान शिव उमा सहित सदा निवास करते हैं। यह शंकर जी की प्रिय नगरी काशी सदा भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली है।
काशी विश्वनाथ मंदिर पूरे 12 महीनें भक्तों के दर्शन हेतु खुला रहता है | पूरे विश्वभर से श्रद्धालु मंदिर के दर्शन करने आते है | यहाँ प्रतिदिन 5 आरतियाँ होती है | आरती में शामिल होकर भक्त अपने आप को धन्य पाते है | काशी विश्वनाथ मंदिर में होने वाली 5 आरतियाँ इस प्रकार है :-
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]]>The post Bhimashankar Jyotirling- भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>प्राचीन काल में भीम नाम का एक महापराक्रमी राक्षस हुआ। वह सदा धर्म का नाश करता और सभी प्राणियों को दुःख देता था। वह महाबली राक्षस कुम्भकरण के वीर्य और कर्कटी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। एक दिन भीम ने अपनी माता से पुछा –”माँ ! मेरे पिता कहाँ हैं? तुम अकेली क्यों रहती हो? मैं यह सब जानना चाहता हूँ। “
कर्कटी बोली – ”बेटा! रावण के छोटे भाई कुम्भकरण तेरे पिता थे। भाई सहित उस महाबली वीर को श्रीराम ने मार डाला। मेरे पिता का नाम कर्कट और माता का नाम पुष्कसी था।
विराध मेरे पति थे, जिन्हें राम ने पहले ही मार डाला था। अपने प्रिय स्वामी के मारे जाने पर मैं अपने माता-पिता के साथ रहती थी। एक दिन मेरे माता-पिता अगस्त्य मुनि के शिष्य सुतीक्ष्ण को अपना आहार बनाने के लिए गए। उन्होंने कुपित होकर मेरे माता-पिता को भस्म कर दिया। तब से मैं अकेली होकर बड़े दुःख के साथ इस पर्वत पर रहने लगी। एक दिन महान बल पराक्रम से संपन्न कुम्भकरण यहाँ आये और उन्होंने बलात मेरे साथ समागम किया फिर मुझे छोड़कर लंका चले गए। इसके बाद तुम्हारा जन्म हुआ। तुम भी अपने पिता के समान महान बलवान और पराक्रमी हो। अब मैं तुम्हारे सहारे ही यहाँ अपना समय व्यतीत करती हूँ। “
अपनी माता की बात सुनकर भयानक पराक्रमी भीम क्रोधित होकर विचार करने लगा कि – ‘विष्णु ने मेरे पिता को मार डाला। मेरे नाना-नानी भी उनके भक्त के हाथों मारे गए। उन्होंने विराध को भी मार डाला इस प्रकार मेरी माता को बहुत दुःख दिया है। अगर मैं अपने पिता का पुत्र हूँ तो श्रीहरि को अवश्य पीड़ा दूँगा।‘ ऐसा निश्चय करके उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए एक हजार वर्षों तक कठोर तप किया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी उसके सामने प्रकट हुए और बोले –”भीम ! मै तुम्हारी तपस्या सेप्रसन्न हूँ, तुम्हारी जो भीअभिलाषा हो मांग लो।“
भीम बोला – ”हे कमलासन ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसा बल दीजिये जिसकी कहीं कोई तुलना न हो।“ ब्रह्मा जी ने भीम को मनोवांछित वर प्रदान किया और अंतर्ध्यान हो गए। ब्रह्मा जी से वर पाकर भीम अपने घर पहुँचा और अपनी माता को प्रणाम करके बोला –”माँ! अब तुम मेरा बल देखो। मैं इन्द्र आदि देवताओं तथा उनकी सहायता करने वाले विष्णु का संहार कर डालूँगा। ऐसा कहकर परम भीम ने पहले इन्द्र सहित समस्त देवताओं को पराजित किया और देवताओं की सहायता को पहुँचे श्रीहरि को भी परास्त किया।
इसके बाद उसने पृथ्वी को जीतना आरम्भ किया। सबसे पहले वह कामरूप देश के राजा सुदक्षिण को जीतने के लिए गया सुदक्षिण भगवान शिव के परम भक्त थे और उनके ही आश्रित होकर राज्य करते थे। सुदक्षिण के साथ भीम का भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में सुदक्षिण पराजित हुए और भीम ने उनका राज्य अपने अधिकार में ले लिया। इसके बाद भीम ने उस शिवभक्त राजा सुदक्षिण को कारागार में डाल दिया। सुदक्षिण कारागार में ही एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर भगवान शिव के ध्यान-पूजन और पंचाक्षर मन्त्र के जप में अपना समय व्यतीत करने लगे।इधर दुष्ट भीम अपनी विशाल सेना के साथ समस्त पृथ्वी को अपने वश में कर लिया। वह वेदों और शास्त्रों में वर्णित धर्म का लोप करने लगा।
तब समस्त देवता और ऋषिगण भगवान शिव के शरण में पहुँचे और प्रणाम करके उनकी स्तुति की। उनकी स्तुति से अत्यंत प्रसन्न होकर भगवान शिव बोले –
” देवगण तथा महर्षियों ! मैं प्रसन्न हूँ। वर मांगो। तुम्हारा कौन सा कार्य सिद्ध करूँ ? “
देवता बोले – ” देवेश्वर ! आप अंतर्यामी हैं, आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है। प्रभो ! कुम्भकरण से उत्पन्न कर्कटी का बलवान पुत्र राक्षस भीम ब्रह्मा जी से वर पाकर समस्त संसार को पीड़ा दे रहा है। अतः आप इस दुखदायी राक्षस का नाश करके हम पर कृपा कीजिये।“ शम्भू ने कहा – ” देवताओं ! कामरूप देश के राजा सुदक्षिण मेरे श्रेष्ठ भक्त हैं। उनसे मेरा एक संदेश कह दो। उनसे कहना कि ब्रह्माजी के वर से शक्तिशाली होकर भीम ने जो उनका तिरस्कार किया है , मैं शीघ्र ही उस दुष्ट राक्षस को उसका उचित दंड दूँगा। “
इसके बाद सभी देवता और ऋषिगण प्रसन्न होकर राजा सुदक्षिण के पास जाकर उनको भगवान शिव का संदेश सुनाया और अपने अपने स्थान को चले गए। भीम के गुप्तचरों ने इस बात की सूचना उसे दी और कहा कि राजा सुदक्षिण आपके नाश के लिए कोई षड्यंत्र कर रहे हैं।यह समाचार सुनते ही भीम कुपित होकर राजा सुदक्षिण को मारने के उद्देश्य से हाथ में तलवार लेकर कारागार में पहुँचा। वहाँ पहुँच कर उसने राजा को बहुत सारे दुर्वचन कहे और भगवान शंकर के पार्थिव लिंग को नष्ट करने हेतु तलवार चलायी।
वह तलवार उस पार्थिव लिंग का स्पर्श करे इसके पहले ही वहाँ साक्षात भगवान शंकर प्रकट हो गए और बोले – ” देखो, मैं अपने भक्त की रक्षा के लिए यहाँ प्रकट हुआ हूँ। मेरा व्रत है कि मैं सदा अपने भक्त की रक्षा करूँ। ऐसा कहकर भगवान शंकर ने अपने त्रिशूल से उस तलवार के दो टुकड़े कर दिए और हुंकार मात्र से ही तत्काल भीम सहित समस्त राक्षसों को भस्म कर डाला। भगवान शंकर की कृपा से इन्द्र आदि समस्त देवताओं और ऋषियों को शांति मिली तथा सारे संसार की पीड़ा और दुःख का अंत हुआ।
उस समय देवताओं और ऋषियों ने भगवान शंकर की स्तुति की और कहा – ” प्रभो ! आप यहाँ लोगों को सुख देने के लिए सदा निवास करें। आपका दर्शन करने से यहाँ सबका कल्याण होगा। आप भीमशंकर के नाम से विख्यात होंगे और सबके मनोरथों को सिद्ध करेंगे। आपका यह ज्योतिर्लिंग सदा पूजनीय और समस्त विपत्तियों का निवारण करने वाला होगा। “उनके इस प्रकार प्रार्थना करने पर लोक हि में भक्तवत्सल भगवान शिव प्रसन्नतापूर्वक वहीं स्थित हो गए।
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]]>The post Kedarnath Jyotirling- केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>मान्यताओं के अनुसार महाभारत युद्घ में विजय के बाद पांण्डव अपने गुरूजनों और सगे संबंधियों को मारने के बाद दुखी थे और अपने पापों से मुक्ती चाहते थे। वे भगवान श्री कृष्ण के पास गए और अपने पापों से मुक्ति का उपाय पूछा । तब भगवान श्री कृष्ण ने उनसे कहा कि भगवान शिव ही आपको पापों से मुक्त कर सकते हैं। भगवान श्री कृष्ण के कहने पर पांण्डव शिव जी को मनाने चल पड़े। पांण्डवों द्वारा अपने गुरूओं एवं सगे-संबंधियों का वध किये जाने से भगवान शिव जी पांण्डवों से नाराज थे । गुप्त काशी( उतराखंड,भारत) में पांण्डवों को देखकर भगवान शिव वहां से विलीन हो गये और उस स्थान पर पहुंच गये जहां पर वर्तमान में केदारनाथ स्थित है।
लेकिन पांण्डव भगवान शिव को हर हाल में मनाना चाहते थे। शिव जी का पीछा करते हुए पांण्डव केदारनाथ पहुंच गये। इस स्थान पर पांण्डवों को आया हुए देखकर भगवान शिव ने एक बैल का रूप धारण किया और इस क्षेत्र में चर रहे बैलों के झुंण्ड में शामिल हो गये। पांण्डवों ने बैलों के झुंण्ड में भी शिव जी को पहचान लिया तो शिव जी बैल के रूप में ही धरती में समाने लगे। भगवान शिव को बैल के रूप में धरती में समाता देख भीम ने कमर से कसकर पकड़ लिया। पांण्डवों की सच्ची श्रद्धा को देख भगवान शिव प्रकट हुए और पांण्डवों को पापों से मुक्त कर दिया। इस बीच बैल बने शिव जी का सिर काठमांडू स्थित पशुतिनाथ में पहुंच गया। इसलिए केदारनाथ और पशुपतिनाथ को मिलाकर एक ज्योर्तिलिंग भी कहा जाता है। केदरनाथ में बैल के पीठ रूप में शिवलिंग की पूजा होती है जबकि पशुपतिनाथ में बैल के सिर के रूप में शिवलिंग को पूजा जाता है। केदारतीर्थ में पहुँच कर वहाँ प्रेमपूर्वक केदारेश्वर की पूजा करके वहाँ का जल पी लेने के बाद मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता।
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]]>The post Shri Omkareshwar Jyotirlinga- श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>पौराणिक कथा के अनुसार एक समय देवर्षि नारद ने गोकर्ण नामक तीर्थ में जाकर भगवान शिव की आराधना की। कुछ समय के बाद नारद मुनि वहाँ से गिरिराज विंध्य पर आए। विंध्य ने नारद मुनि का बहुत आदर के साथ पूजन किया और कहा – ” मेरे यहाँ सब कुछ है, कभी किसी बात की कमी नहीं होती है।“ विंध्य की ऐसी अभिमान भरी बात सुनकर नारद मुनि लंबी साँस खींचकर चुप रह गए। यह देखकर विंध्य पर्वत ने कहा – ” मुनिवर, लगता है आप मेरे बात से सहमत नहीं हैं। आपने मेरे यहाँ कौन सी कमी देखी है? “
नारद जी ने कहा – ”हे गिरिराज! तुम्हारे यहाँ सब कुछ है फिर भी मेरु पर्वत तुमसे बहुत ऊँचा है। उसके शिखर देवताओं के लोकों में भी पहुँचे हुए हैं। “ऐसा कहकर नारद जी वहाँ से चल दिए। पर विंध्य पर्वत के दिमाग़ में नारद जी बात चुभ गयी और ‘मेरे जीवन को धिक्कार है‘ ऐसा सोचता हुआ मन ही मन संतप्त हो उठा।‘ और अब मैं भगवान विश्वनाथ की तपस्या करूँगा ‘, ऐसा निश्चय करके वह भगवान शंकर की शरण में गया। अभी वर्तमान में जहाँ ओंकारेश्वर स्थित है, वहाँ जाकर उसने भगवान शिव की मूर्ति बनाई और छः मास तक निरंतर शिव के ध्यान में तत्पर हो कठिन तपस्या की। विंध्याचल की ऐसी तपस्या देखकर भगवान शंकर प्रसन्न हो गए। उन्होंने विंध्याचल को अपना वह स्वरुप दिखाया जो योगियों के लिए भी दुर्लभ है।
वे प्रसन्न होकर विंध्याचल से बोले – ” विंध्य! में तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। तुम मनोवांछित वर मांगो।“
विंध्य बोले – ” देवेश्वर शम्भो! आप सदा ही भक्तवत्सल हैं। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे वह बुद्धि प्रदान कीजिये जो प्रत्येक कार्य को सिद्ध करने वाली हो।” भगवान शंकर ने विंध्य को वह उत्तम वर दिया और कहा – ” पर्वतराज विंध्य ! तुम जैसा चाहो वैसा करो। “उसी समय देवता और ऋषिगण वहाँ आये और शंकर जी की पूजा करके बोले – ” प्रभो ! आप यहाँ स्थिर रूप से निवास करें।” देवताओं के आग्रह को सुनकर भोलेनाथ प्रसन्न हो गए और सबको सुख देने के लिए इसे सहर्ष स्वीकार किया।
वहाँ जो एक ही ओंकारलिंग था वह दो स्वरूपों में विभक्त हो गया। पहला ओंकारेश्वर और दूसरा अमलेश्वर के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुआ। ये दोनों शिवलिंग भक्तों को अभीष्ट फल प्रदान करने वाले हैं। उस समय देवताओं और ऋषियों ने उन दोनों लिंगों की पूजा की और भगवान शिव को संतुष्ट करके अनेक वर प्राप्त किये। इसके बाद देवता और ऋषिगण अपने अपने स्थान को चले गए और विंध्याचल भी अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव करने लगे।
The post Shri Omkareshwar Jyotirlinga- श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>The post Mahakaleshwar – महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>उज्जैन का प्राचीन नाम अवन्ति था। एक समय वहाँ वेदप्रिय नामक एक ब्राह्मण रहते थे जो सदाचारी , वेद और शास्त्रों के स्वाध्याय में संलग्न तथा वैदिक कर्मों के अनुष्ठान में सदा तत्पर रहने वाले थे। वे घर में प्रतिदिन अग्निहोत्र करते और निरंतर शिव की पूजा में लीन रहते थे। वे ब्राह्मण प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा किया करते थे।उनके देवप्रिय , प्रियमेधा , सुकृत और सुव्रत नाम के चार तेजस्वी पुत्र थे, जो सद्गुनो में अपने माता पिता के समान ही थे। अपने सद्गुणों के कारण उन सभी भाइयों का यश चारों ओर फैला हुआ था।
उसी समय रत्नमाल पर्वत पर दूषण नामक एक असुर ने ब्रह्मा जी से वर पाकर वेद, धर्म तथा धर्मात्माओं पर आक्रमण किया। इसके बाद उसने सेना के साथ अवन्ति के ब्राह्मणों पर आक्रमण किया। उसकी आज्ञा से दैत्यों ने अवन्ति को चारों ओर से घेर लिया। जब नगर के सभी लोग बहुत घबरा गए तब उन शिव भक्त ब्राह्मण बंधुओं ने सबसे कहा – ”आपलोग भगवान शंकर पर भरोसा रखें।” ये कहकर शिवलिंग का पूजन करके वे भगवान शिव का ध्यान करने लगे। इतने में ही सेना सहित दूषण वहाँ पहुँच गया और कहा– ” इन्हें मार डालो, बांध लो। “
वेदप्रिय के पुत्रों ने उस समय उस दैत्य की कही हुई कोई बात नहीं सुनी, क्योंकि वे भगवान शिव के ध्यान में स्थित थे। वह दैत्य जैसे ही उन ब्राह्मणों को मारने के लिए आगे बढ़ा वैसे ही उनके द्वारा पूजित पार्थिव शिवलिंग के स्थान में बड़ी भारी आवाज के साथ एक गड्ढा प्रकट हो गया। उस गड्ढे से तत्काल विकट रूप धारण किये हुए भगवान शिव प्रकट हो गए, जो महाकाल के नाम से विख्यात हुए। वे दुष्टों के विनाशक तथा सत्पुरुषों के रक्षक हैं। उन्होंने उन दैत्यों से कहा – ” अरे दुष्ट! मैं तुझ जैसे पापियों के संहार हेतु महाकाल रूप में प्रकट हुआ हूँ।“ ऐसा कहकर महाकाल शंकर ने तत्काल दूषण को सेनासहित भस्म कर दिया और उन ब्राह्मणों को आश्वासन देकर स्वयं महाकाल शिव ने प्रसन्न होकर उनसे कहा – ” तुम लोग वर माँगो “
तब सभी ब्राह्मणों ने हाथ जोड़ कर भक्तिभाव से प्रणाम करके कहा – ” हे महाकाल! दुष्टों को दंड देनेवाले प्रभु! आप हमें मोक्ष प्रदान करें। आप जनसाधारण की रक्षा के लिए सदा यहीं निवास करें और अपना दर्शन करने वाले मनुष्यों का आप सदेव उद्धार करें।“ उन ब्राह्मणों के ऐसा कहने पर उन्हें सद्गति देकर भगवान शिव अपने भक्तों की रक्षा के लिए उस परम सुन्दर गड्ढे में स्थित हो गए। उस स्थान से चारों ओर एक कोस की भूमि लिंगरूपी भगवान शिव का तीर्थ बन गयी और वह स्थान संसार में महाकालेश्वर के नाम से विख्यात हुआ। उनका दर्शन करने से सपने में भी कोई दुःख नहीं होता। जिस किसी भी कामना को लेकर कोई उस लिंग की उपासना करता है उसे अपना मनोरथ प्राप्त होता है तथा परलोक में मोक्ष भी मिल जाता है।
भगवान महाकाल को तीनो लोकों में विद्यमान सभी शिवलिंगों में प्रधान कहा गया है, वराह पुराण में कहा गया है
नाभिदेशे महाकालस्तन्नाम्ना तत्र वै हर:
अर्थात नाभिदेश उज्जैन में स्थित भगवान महाकालेश्वर(Mahakaleshwar Jyotirlinga) तीनों लोकों में पूज्यनीय हैं।
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]]>The post Mallikarjuna Jyotirlinga: मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>तमिल संतों ने भी प्राचीन काल से ही इसकी स्तुति गायी है। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने जब इस मंदिर की यात्रा की, तब उन्होंने शिवनंद लहरी की रचना की थी। श्री शैलम का सन्दर्भ प्राचीन हिन्दू पुराणों और ग्रंथ महाभारत में भी आता है।
एक बार विवाह को लेकर कार्तिकेय और अग्रपूज्य गणेश जी में विवाद हो गया। तब भगवान शिव और पार्वती माता ने पहले गणेश जी का विवाह करने का निर्णय लिया। जिससे कुमार कार्तिकेय माता पिता से रुष्ट होकर क्रौञ्च पर्वत पर चले गए और शिव पार्वती के अनुरोध करने पर भी वापस नहीं लौटे तथा वहाँ से भी 12 कोस दूर चले गए। तब शिव पार्वती ज्योतिर्मय स्वरुप धारण करके वहीँ प्रतिष्ठित हो गए। वे दोनों पुत्र स्नेह के कारण विशेष तिथियों में अपने पुत्र कुमार को देखने के लिए उनके पास जाया करते हैं।
अमावस्या के दिन भगवान भोलेनाथ स्वयं वहाँ जाते हैं और पूर्णिमा के दिन पार्वती जी वहाँ जाती हैं। उसी दिन से भगवान शिव का मल्लिकार्जुन नामक शिवलिंग संसार में प्रसिद्ध हुआ। मल्लिका का अर्थ पार्वती है और अर्जुन भगवान शिव का ही एक नाम है। इस ज्योतिर्लिंग का जो भी दर्शन पूजन करता है वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और मनोवांछित फल पाता है।
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]]>The post Somnath Ji : कथा सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>सोमनाथ (Somnath ji) मंदिर पितृगणों के श्राद्ध, नारायण बलि आदि धार्मिक कर्म-कांडों के लिए भी प्रसिद्ध है। चैत्र, भाद्रपद, कार्तिक माह में यहाँ श्राद्ध करने का विशेष महत्व बताया गया है। इसी कारण इन तीन महीनों में यहां श्रद्धालुओं की बडी भीड़ लगती है। इसके अलावा यहां तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती का महासंगम होता है। इस त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्व है।
शिव पुराण के अनुसार प्रजापति दक्ष ने अपनी सत्ताईस कन्याओं का विवाह चन्द्रमा के साथ किया था। चन्द्रमा को पति रूप में पाकर दक्ष कन्यायें अत्यंत प्रसन्न हुईं और चन्द्रमा भी उन्हें पत्नी रूप में पाकर अत्यंत संतुष्ट हुए। सभी पत्नियों में चन्द्रमा को रोहिणी विशेष प्रिय थी। इससे दूसरी स्त्रियों को बड़ा दुःख हुआ। वे सब अपने पिता दक्ष की पास गयीं और उनसे अपना दुःख सुनाया। उनकी बात सुनकर दक्ष भी दुखी हो गए और चन्द्रमा के पास जाकर उनसे प्रार्थना करते हुए बोले – “हे कलानिधे ! तुम निर्मल कुल में उत्पन्न हुए हो। तुम्हारी जितनी भी पत्नियाँ हैं उन सबके प्रति तुम्हारे मन में अलग अलग भाव क्यों हैं ? तुम किसी को अधिक और किसी को कम प्रेम क्यों करते हो ? अब तक जो किया सो किया अब आगे फिर कभी ऐसा भेदभावपूर्ण बर्ताव तुम्हें नहीं करना चाहिए। “ अपने दामाद चन्द्रमा से ऐसी प्रार्थना करके प्रजापति दक्ष घर को चले गए। उन्हें पूरा विश्वास था कि अब आगे फिर ऐसा नहीं होगा। पर चन्द्रमा रोहिणी में इतने आसक्त हो गए थे कि दूसरी किसी पत्नी का कभी आदर नहीं करते थे।
प्रजापति दक्ष अपनी कन्याओं से बार-बार इस शिकायत को सुनकर बहुत दुखी हुए और चन्द्रमा के पास जाकर बोले – “हे चन्द्रमा ! सुनो, मैं पहले अनेक बार तुमसे प्रार्थना कर चुका हूँ। फिर भी तुमने मेरी बात नहीं मानी। इसलिए आज शाप देता हूँ कि तुम्हें क्षय का रोग हो जाये। “ दक्ष के इतना कहते ही क्षणभर में ही चन्द्रमा क्षय रोग से ग्रस्त हो गए। उनके क्षीण होते ही चारों ओर हाहाकार मच गया। चन्द्रमा ने इन्द्र आदि सभी देवताओं और ऋषियों को अपने साथ हुए घटना की सूचना दी। तब इन्द्र सहित सभी देवता और ऋषिगण ब्रह्मा जी की शरण में गए।
उनकी बात सुनकर ब्रह्मा जी ने कहा – ” देवताओं ! जो हो गया अब वह निश्चय ही पलट नहीं सकता। अतः उसके निवारण के लिए मैं तुम्हें एक उत्तम उपाय बताता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो। आप सभी देवता प्रभास नामक शुभ क्षेत्र में जाएँ और वहाँ शिवलिंग की स्थापना कर नित्य तपस्या करें और मृत्युंजय मंत्र का विधिपूर्वक अनुष्ठान करते हुए भगवान शिव की आराधना करें। इससे प्रसन्न होकर शिव उन्हें क्षयरहित कर देंगे। “ तब देवताओं तथा ऋषियों के कहने से ब्रह्मा जी की आज्ञा के अनुसार चन्द्रमा ने वहाँ 6 महीने तक निरंतर तपस्या की, मृत्युंजय मंत्र से भगवान भोलेनाथ का पूजन किया।
दस करोड़ मंत्र का जप और मृत्युंजय का ध्यान करते हुए चन्द्रमा वहाँ स्थिरचित्त होकर लगातार खड़े रहे। उन्हें तपस्या करते देख भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रसन्न होकर उनके सामने प्रकट हो गए और चन्द्रमा से बोले –”चन्द्रदेव! तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम्हारे मन में जो भी इच्छा हो वह वर माँगो। तुम्हें सभी उत्तम वर प्रदान करूँगा।“
चन्द्रमा बोले – “ हे देवेश्वर! यदि आप मेरी भक्ति से प्रसन्न हैं तो मेरे लिए क्या असाध्य हो सकता है। तथापि प्रभु, आप मेरे शरीर के इस क्षयरोग का निवारण कीजिये। मुझसे जाने अनजाने जो भी अपराध हुए हों उसे क्षमा कीजिये। “
शिवजी ने कहा –“चन्द्रदेव! एक पक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी कला क्षीण हो और दूसरे पक्ष में फिर वह निरंतर बढ़ती रहे।“ इसके बाद चन्द्रमा ने भक्तिभाव से भगवान शंकर की स्तुति की। देवताओं पर प्रसन्न हो उस क्षेत्र के माहात्म्य को बढ़ाने तथा चन्द्रमा के यश का विस्तार करने के लिए भगवान शंकर उन्हीं के नाम पर वहाँ सोमेश्वर कहलाये और सोमनाथ के नाम से संसार में विख्यात हुए।
सोमनाथ (Somnath ji) का पूजन करने से उपासक के क्षय तथा कोढ़ आदि रोगों का नाश हो जाता है। उसी स्थान पर सभी देवताओं ने सोमकुण्ड या चन्द्रकुण्ड की भी स्थापना की। जिसमें शिव और ब्रह्मा का सदा निवास माना जाता है। सोमकुण्ड इस भूतल पर पापनाशन तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है। जो मनुष्य उसमें स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। क्षय आदि जो असाध्य रोग होते हैं, वे सब उस कुंड में 6 मास तक स्नान करने मात्र से नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य जिस किसी भी फल के उद्देश्य से इस उत्तम तीर्थ का सेवन करता है उस फल को अवश्य पाता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
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]]>The post कालसर्प दोष क्या होता है और ये कुंडली में कब बनता है? appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
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