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The post Somvati Amavasya : सोमवती अमावस्या – महत्व और व्रत कथा appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>अमावस्या जब सोमवार के दिन पड़ती है तो उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, सोमवती अमावस्या का एक विशेष महत्त्व है। कहते है कि पांडव इस सोमवती अमावस्या के लिए जीवन भर तरसे थे, परंतु उनके जीवन काल में यह कभी नहीं आई। इस दिन पितृ तर्पण से लेकर स्नान-दान आदि कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त रहता है। सोमवती अमावस्या पितृों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान आदि कार्यों के लिए श्रेष्ठ तिथि मानी गयी है। इस दिन पितृ दोष और कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए उपवास और पूजा की जाती है। इस दिन महिलाएँ तुलसी माता की 108 परिक्रमा लगाते हुए कोई भी वस्तु / फल दान करने का संकल्प लेतीं हैं।
सोमवती अमावस्या पर किए गए स्नान और दान का विशेष महत्व है। इस दिन मौन (मौन रहना) बहुत फलदायी होता है। देव ऋषि व्यास के अनुसार, जो मनुष्य इस दिन मौन रह कर स्नान और दान करता है उसे हजार गायों के दान के समान पुण्य मिलता हैं।
यह व्रत अटूट फल देता है। व्रत करने वाला व्यक्ति यदि पीपल के पेड़ के चारों ओर 108 बार परिक्रमा करता है और भगवान विष्णु और वृक्ष की पूजा करता है और इसके बाद, क्षमताओं के अनुसार दान करता है उस व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।
सोमवती अमावस्या के दिन पवित्र छंद की गूंज सभी दिशाओं में फैली होती है। इस दिन हजारों लोगों को हरिद्वार में डुबकी लगाते हुए देखा जा सकता है। कुरुक्षेत्र के ब्रह्म सरोवर में डुबकी लगाने से इस दिन व्यक्ति को शुभ फल मिलते हैं। सूर्योदय से सूर्यास्त तक, लोगों की भीड़ को पवित्र नदी में स्नान करते देखा जा सकता है।
जब महाभारत युद्ध के मैदान में भीष्म पितामह शर-शैय्या पर पड़े हुए थे। उस समय युधिष्ठर भीष्म पितामह से पश्चाताप करने लगे और धर्मराज कहने लगे। हे पितामह! दुर्योधन की हठ के कारण हम पंडवो से सारे कुरू वंश का नाश हो गया है। वंश का नाश देखकर मेरे हृदय में दिन रात संताप रहता है। हे पितामह! अब आप ही बताइये कि मैं क्या करू, कहाँ जाऊँ, जिससे हमें शीघ्र ही चिरंजीवी संतति प्राप्त हो। पितामह ने कहा, हे! धर्मराज युधिष्ठर मैं तुम्हें व्रतों में शिरोमणि व्रत बतलाता हूँ जिसके करने एवं स्नान करने मात्र से चिरंजीवी संतान एवं मुक्ति प्राप्त होगी। वह है व्रतराज सोमवती अमावस्या का व्रत। धर्मराज ने कहा, पितामह कृपया इस व्रतराज के बारे में विस्तार से बताइये ये सोमवती कौन है? और इस व्रत को किसने शुरू किया।
भीष्म जी ने कहा- एक कांची नाम की नगरी थी, वहाँ देवस्वामी नामक ब्राह्मण निवास करता था उसके सात पुत्र एवं गुणवती नाम की कन्या थी। एक दिन ब्राह्मण भिक्षुक भिक्षा माँगने आया। देवस्वामी की सातों बहुओं ने अलग-अलग भिक्षा दी और सौभाग्यवती होने का आर्शीवाद पाया। अंत में गुणवती ने भिक्षा दी। भिक्षुक ब्राह्मण ने उसे धर्मवती होने का आर्शीवाद दिया और कहा- यह कन्या विवाह के समय सप्तपदी( सात फेरो) के बीच ही विधवा हो जायेगी इसलिए इसे धर्माचरण ही करना चाहिए। गुणवती की माँ धनवती ने गिड़गिड़ाते हुए दीन स्वर में कहा- हे ब्राह्मण! हमारी पुत्री के इस दोष को मिटाने का उपाय कहिए। तब वह भिक्षुक कहने लगा- हे पुत्री! यदि तेरे घर सौमा आ जाए तो उसके पूजन मात्र से ही तेरी पुत्री का वैधव्य( विधवापन ) मिट सकता है। गुणवती की माँ ने कहा कि पण्डित जी यह सौमा कौन है? कहाँ निवास करती है? विस्तार से बताइये। भिक्षु कहने लगा- भारत के दक्षिण में समुद्र के बीच एक द्वीप है जिसका नाम सिंहल द्वीप है। वहाँ पर एक कीर्तिमान धोबी निवास करता है। उस धोबी के यहाँ सौमा नाम की स्त्री है, वह तीनों लोकों में अपने सत्य के कारण पतिव्रत धर्म से प्रकाश करने वाली सती है। उसके सामने भगवान एवं यमराज को भी झुकना पड़ता है। तुम उसे अपने घर ले आओ तो आपकी बेटी का वैधव्य मिट जाएगा।
यह सुन देवस्वामी का सबसे छोटे पुत्र अपनी बहिन को साथ लेकर सिंघल द्वीप के लिए निकल पड़ा । रास्ते में समुद्र के समीप रात्रि में गृद्धराज के यहाँ विश्राम किया। सुबह होते ही उस गृद्धराज ने उन्हें सिंघलद्वीप पहुँचा दिया और वे सौमा के घर के समीप ही ठहर गये। इसके बाद वह दोनों भाई बहिन प्रात: काल के समय उस धोबी की पत्नी सोमा के घर की चौक को साफ़ कर उसे प्रतिदिन लीप पोत कर सुन्दर बनाते थे। ऐसे करते करते उन्हें एक साल बीत गया। इस प्रकार की स्वच्छता को देखकर सोमा ने विस्मित हो कर अपने पुत्रों एवं पुत्रवधुओं से पूछा कि यहाँ कौन झाडू लगाकर लीपा पोती करता है, उन्होंने कहा हमें नहीं मालूम और न ही हमने किया है। तब उस धोबिन ने रात में छिपकर पता किया तो ज्ञात हुआ कि एक लड़की आँगन में झाडू लगा रही है और एक लड़का उसे लीप रहा है। सौमा धोबिन ने उन दोनों को पूछा की आप कौन है और ऐसा क्यों कर रहे हैं? देवस्वामी के पुत्र ने कहा हम दोनों भाई बहन ब्राह्मण हैं। यह गुणवती मेरी बहिन है इसके विवाह के समय सप्तवदी के बीच वैधव्य योग पड़ा है। आप के पास रहने से वैधव्य योग का नाश हो सकता है इसलिए हम यह दास कर्म कर रहे हैं। सोमा ने कहा तुम्हारे इस तरह कार्य करने से मुझे घोर पाप लगा है। विप्र मैं धोबिन हूँ आप ब्राह्मण हैं कृपा कर आगे से ऐसा मत करना मैं तुम्हारे साथ चलूँगी।
सोमा ने अपनी वधुओं से कहा मैं इनके साथ जा रही हूँ यदि इस बीच हमारे घर में कोई अनहोनी हो जाए और किसी की मृत्यु हो जाए तो जब तक मैं लौटकर न आ जाऊँ तब तक उसका क्रिया कर्म मत करना और उसके शरीर को सुरक्षित रखना। ऐसा कह सोम दोनों ब्राह्मण भाई बहन को लेकर समुद्र मार्ग से होकर कांची नगरी में पहुँच गयी। सोमा को देखकर धनवती ने प्रसन्न हो उसकी पूजा अर्चना की और अपनी पुत्री की विवाह का आयोजन करा। सोमा की मौजूदगी विवाह के दौरान सप्तसदी के बीच वर की मृत्यु हो गयी। बहिन को विधवा जानकर सारे घरवाले रोने लगे किन्तु सोमा शांत रही। सोमा ने अपने सती पन से वर को जीवित कर दिया। जब उस ब्राह्मण ने चमत्कार देखा तो वह सोमा के चरणों में गिर गया धूप, दीप, पुष्प, कपूर से सोमा की आरती की और कहा तुम सर्वशक्तिमान हो युगों-युगों तक आपकी पूजा यह ब्राह्मण वंश करेगा। जो उपकार आपने किया है वह भुलाने योग्य नहीं है आपके साथ-साथ आपके वंश की जो सतियां आपके चरित्र का अनुसरण करेंगी उसकी आपकी ही भाँति युगों-युगों तक पूजा होगी।
उसी बीच उस सोमा के घर में पहले उसके लड़को की मर्त्यु हो गयी फिर उसका पति मरा फिर उसका जमाता भी मर गया। सोमा ने अपने सत्य से सारी स्थिति जान ली और वह बिना देर किए घर को चल दी। उस दिन सोमवार का दिन था और अमावस्या की तिथि भी थी, रास्ते में सोमा ने नदी के किनारे स्थित एक पीपल के पेड़ के पास जाकर नदी में स्नान किया और विष्णु भगवान की पूजा करके शक्कर हाथ में लेकर 108 प्रदाक्षिणाऐं पूरी की। भीष्म जी बोले जब सोमा ने हाथ में शक्कर लेकर 108वीं प्रदक्षणा पूरी की तभी उसके पति जमाता और पुत्र भी सभी जीवित हो गये और वह नगर लक्ष्मी से परिपूर्ण हो गया। विशेष कर उसका घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। चारों ओर हर्षोल्लास छा गया। भीष्म जी कहने लगे यदि सोमवार युक्त अमावस्या अर्थात सोमवती अमावस्या हो तो पुण्यकाल देवताओं को भी दुर्लभ है। तुम भी यह व्रत धारण करो तुम्हारा कल्याण हो जाएगा।
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]]>The post जन्म कुंडली में कालसर्प दोष के लक्षण और इसके सरल उपाय appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>अपने पहले लेख “कालसर्प दोष : क्या होता है और कैसे पहचाने” में हम ने कालसर्प दोष क्या होता है और इस के प्रकार एवं प्रभाव के बारे में विस्तार से बताया है ।
इस लेख में हम आप को कालसर्प दोष के लक्षण एवं सरल उपाय बताएँगे।
पूर्ण कालसर्प दोष : यदि जातक की जन्म कुंडली में समस्त सात ग्रह राहु और केतु के अक्ष में एक ही तरफ़ हो तो पूर्ण कालसर्प सर्प दोष बनता है।
आंशिक कालसर्प दोष : यदि जातक की जन्म कुंडली में एक भी ग्रह राहु और केतु के अक्ष से बाहर हो तो आंशिक कालसर्प सर्प दोष बनता है।
कालसर्प दोष के लक्षण
कालसर्प दोष के अनेकों लक्षण होते हैं सामान्य प्राथमिक लक्षण इस प्रकार के होते है :
कालसर्प दोष निवारण
कालसर्प दोष की पूजा नाशिक के त्रंबकेश्वर मंदिर या उज्जैन में करना सर्वोतम कहा गया है, इसके शुभ फल बहुत जल्दी प्राप्त होते हैं। परंतु अगर किसी कारण वश नाशिक अथवा उज्जैन जाना सम्भव ना हो तो भी आप ज्योतिष शास्त्र में बताये गए सरल उपाय करके कालसर्प दोष का निवारण कर सकते हैं।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
राहु के मंत्र– ।।ऊँ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:।।
केतु के मंत्र – ।। ऊँ स्त्रां स्त्रीं स्त्रों सः केतवे नमः।।
उपरोक्त कालसर्प दोष के उपाय सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ करके आप कालसर्प दोष का असर कम कर सकते हैं या पूर्ण रूप से ख़त्म भी कर सकते हैं।
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]]>The post कालसर्प दोष : क्या होता है और कैसे पहचाने appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>आप को जान कर हैरानी होगी की लगभग 70% लोगों की कुंडली में कालसर्प योग पाया जाता है और कई जाने माने लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष था फिर भी वे अपने अपने कार्यक्षेत्र में अग्रणी रहे जैसे प्रथम प्रधानमंत्री जी की कुंडली में भी यह दोष था और तो और क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर की कुंडली भी कालसर्प दोष से प्रभावित थी लेकिन फिर भी दोनों व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्रों में नाम और मान-सम्मान प्राप्त करने में सफल रहे।
कालसर्प दोष क्या होता है और ये कुंडली में कैसे बनता है?
यदि व्यक्ति की कुंडली में राहु और केतु के मध्य अन्य सभी ग्रह आ जाते हैं तो उससे कालसर्प दोष का निर्माण होता है। ऐसी स्तिथि में अन्य सारे ग्रह इन दोनो के बीच में फस जाते हैं जिससे उन ग्रहों से आ रहे फल रुक जाते हैं और यहाँ से जातक के लिए समस्या उत्पन हो जाती है। इस दोष के प्रभाव से व्यक्ति के जीवन में काम में बाधा, नौकरी में रूकावट, शादी में देरी और धन संबंधित परेशानियाँ, उत्पन्न होने लगती हैं।
ग्रहों की स्तिथि के अनुसार कालसर्प दोष १२ प्रकार के होते हैं
1. अनंत काल सर्प दोष,
2. कुलिक कालसर्प दोष,
3. वासुकी कालसर्प दोष,
4. शंखपाल काल सर्प दोष,
5. पद्म कालसर्प दोष,
6. महापद्म काल सर्प दोष,
7. तक्षक कालसर्प दोष,
8. कर्कोटक काल सर्प दोष,
9. शंखचूड कालसर्प दोष,
10. घातक कालसर्प दोष,
11. विषाक्तर कालसर्प दोष,
12. शेषनाग कालसर्प दोष।
अनंत काल सर्प दोष

जब व्यक्ति की कुंडली में राहु लग्न भाव बैठा हो और केतु उसी के सामने यानी सप्तम भाव में हो और सारे ग्रह इन के मध्य में हों तो अनंत काल सर्प दोष होता है। इस कालसर्प दोष के कारण जातक को मानसिक शांति नहीं मिलती और जातक के वैवाहिक जीवन में भी परेशनियाँ आती है।
कुलिक कालसर्प दोष

जब राहु कुंडली के दूसरे घर में और केतु अष्टम घर में बैठे हों, और बाकी सारे ग्रह इन दोनो के बीच में हों तो कुलिक कालसर्प दोष बनता है। इस दोष से ग्रसित जातक अपने जीवन में अपार मेहनत के पश्चात भी कई असफलताओं से झूझते है | इन जातकों को बड़े बड़े आर्थिक नुकसान हो सकते है और इससे इनको आर्थिक तंगी के कारण हुए तनाव का भी सामना करना पड़ता है | इनको रिश्तों में धोखा भी मिलता है | समाज में निंदा भी सहन करनी पड़ सकती है | शारीरिक व मानसिक तनाव भी इन जातकों के जीवन में बना रहता है | विवाह में रुकावट व वैवाहिक जीवन सम्बन्धी समस्याएं भी आ सकती है |
वासुकी कालसर्प दोष

जब जातक की जंन्म कुंडली में राहु तीसरे और केतु नवें घर में विराजमान हो एवं बाकी सारे ग्रह इनके बीच में हों तो वासुकी कालसर्प दोष उत्पन होता है। इस योग से पीड़ित व्यक्ति आर्थिक व शारीरिक रूप से परेशान होता है, मुख्यत उसको संतान संबंधी कष्ट होता है। या तो उसे संतान का सुख मिलता ही नहीं, और अगर मिल भी जाये तो वह बहुत ही दुर्बल व रोगी होती है। उसकी रोजी-रोटी का जुगाड़ भी बड़ी मुश्किल से हो पाता है। उसे अप्रत्याशित रूप से आर्थिक क्षति होती रहती है। अलग- अलग तरह के रोगों से परेशान रहता है |
शंखपाल काल सर्प दोष

जब जातक की जन्म कुंडली में राहु चौथे भाव में और केतू दसवें भाव में हो और सारे बचे बाकी ग्रह इन दोनो के मध्य में हो तो कुंडली में शंखपाल काल सर्प योग निर्माण होता है। इस कुंडली वाले जातक का जीवन कष्टमय, विद्या प्राप्ति में भी बाधाएं, चल अचल संपत्ति सम्बंधित कठिनाईयां, वाहन सम्बंधित कष्ट , नौकरों से परेशानी, माता को या माता के कारण जीवन भर कष्ट , नौकरी अथवा व्यवसाय में उतार चढ़ाव होता है।
पद्म कालसर्प दोष

जब जातक की जन्म कुंडली में राहु पंचम स्थान में और केतु एकादश स्थान में उपस्थित हो एवं बाकी सारे ग्रह इनके बीच में हो तो पद्म कालसर्प दोष होता है। ऐसी कुंडली वाले जातक को उच्च शिक्षा में कई व्यवधान उत्पन्न हो सकते हैं , इन जातको का अध्यन में मन नहीं लगता अथवा याद नहीं रहता है , दाम्पत्य जीवन में तनाव बना रहता है, संतान सुख प्राप्ति में देरी होती है और स्वास्थ में उतार चढ़ाव रहता है।
महापद्म काल सर्प दोष

जब जातक की जन्म कुंडली में राहु छठे घर में और केतु बारहवें घर में विराजमान हों तथा बाकी ग्रह मध्य में हो तो महापद्म कालसर्प दोष निर्मित होता है। इस प्रकार की कुंडली वाले जातक को आनुवांशिक बीमारियां ग्रसित करती है। इन जातकों का जीवन आर्थिक तंगी से ग्रसित रहता है और किसी भारी ऋण इनके लिए कष्टकारी हो सकता है | इन जातकों को शत्रु से अधिक सावधान रहने की ज़रूरत होती है।
तक्षक कालसर्प दोष

जब जातक की जन्मकुंडली में राहु सप्तम और केतु लग्न में उपस्थित हो और बाकी से सब ग्रह इनके बीच में हो तो तक्षक कालसर्प योग होता है। इस कुंडली वाले जातक मनचले स्वभाव के होते हैं। इन जातकों का वैवाहिक जीवन तनाव पूर्ण होता है और जीवनसाथी अन-बन रहती है। इस कुंडली वाले जातकों को व्यापार में साझेदारों से धोखा मिलता है बनते हुए कार्य रुक जाते हैं तथा जातक मानसिक रूप से परेशान रहते हैं चिंता बनी रहती है।
कर्कोटक काल सर्प दोष

जब जातक की कुंडली के अष्टम भाव में राहु दूसरे भाव में केतु हो और सभी ग्रह इन के मध्य में हो तो ऐसी ग्रह स्तिथि के कारण बनने वाला योग कर्कोटक कालसर्प योग कहलाता है। इस जातक के भाग्य उदय में कई बाधाएँ आती हैं। सदैव बीमारी से घिरे रहता है। पैतृक संपत्ति से लाभ नहीं मिलता और मित्र कम शत्रु अधिक होते हैं। मित्र के विश्वासघात के कारण आर्थिक कष्ट उठाना पड़ता है व्यापार में परिश्रम करने पर भी लाभ नहीं होता। अकस्मात मृत्यु हो सकती है। शादी होने की संभावना बहुत कम होती है।
शंखचूड कालसर्प दोष

जिस जातक की जन्मकुंडली में राहु नवम भाव में और केतु उसी के सामने तीसरे भाव में विराजमान हो और बाकी के सारे ग्रह इन दोनो के मध्य में हों तो शंखचूड कालसर्प योग बनता है। इस कुंडली वाले जातक अहंकारी हो सकते हैं। यह दोष पिता – पुत्र के रिश्तों में दूरियों का कारक बनता हैं। कुंडली विशेष में शंखचूड़ काल सर्प दोष के होने पर जातक के जीवन में पितृ दोष का संयोग बना रहता है |
घातक कालसर्प दोष

ज्योतिषशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार जन्मकुंडली में राहु यदि आजीविका स्थान यानी दशम भाव में हो तथा केतु सुख स्थान यानी चतुर्थ भाव में हो और शेष सभी ग्रह दशम से चतुर्थ भाव में एक ही दिशा में स्थित हों तब यह मानना चाहिए कि जन्मपत्री में घातक कालसर्प दोष है। इस योग के कारण जातक को कार्य या व्यापार में अकल्पनीय कठिनाइयां होती हैं। व्यापार में सफलता के समीप पहुँच कर भी बाधाएं उत्पन होती हैं। संतान कष्ट, माता पिता तथा दादा दादी का अल्प सुख होता है।
विषाक्तर कालसर्प दोष

जब जन्मकुंडली के ग्याहरहवें भाव में राहु और पांचवें भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य मे अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को विषाक्तर कालसर्प योग कहते है। इस योग में जातक को धन हानि होती है
शेषनाग कालसर्प दोष

सर्पों में सबसे पराक्रमी एवं पूज्य नाग शेषनाग हैं। इन्हीं शेषनाग के नाम पर कालसर्प दोष के बारहवें प्रकार का नाम शेषनाग कालसर्प दोष रखा गया है। शेष नाग के विषय में माना जाता है कि इनके सहस्रों फन और इन्होंने अपने फन पर पृथ्वी को उठा रखा है। यदि, जन्म कुण्डली में शेषनाग कालसर्प दोष है तो इसकी पहचान का तरीका यह है कि राहु कुण्डली में व्यय स्थान, यात्रा एवं मोक्ष के भाव में होगा यानी द्वादश भाव में रहेगा तथा केतु रोग, कष्ट, शत्रु एवं मामा के भाव में अर्थात षष्टम भाव में बैठा होगा। शेष सातों ग्रह सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरू, शुक्र, शनि राहु-केतु के बीच में द्वादश भाव से छठे भाव में होंगे।
जब किसी व्यक्ति की कुण्डली में शेषनाग कालसर्प दोष बनता है तब व्यक्ति को इस दोष के कारण कई तरह की परेशानियों का सामना करना होता है। शेषनाग कालसर्प दोष से प्रभावित व्यक्ति को बदनामी भी सहनी होती है। व्यक्ति मेहनत करके कमाता है और खर्च पहले से ही अपना मुंह खेलकर बैठा रहता है जिससे आर्थिक चुनौतियां का सामना करना पड़ता है। परिवारिक सुख-शांति को लेकर भी व्यक्ति की चिंताएं बनी रहती हैं। इस दोष से प्रभावित व्यक्ति को नेत्र रोग होने की संभावना अधिक रहती है। ज्योतिषशास्त्रियों का मानना है कि शेषनाग कालसर्प दोष से प्रभावित व्यक्ति को अपने जीवनकाल में भले ही कष्ट और अपमान उठाना पड़े लेकिन, मृत्यु पश्चात उसकी ख्याति फैलती।
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