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Dhanteras 2021: धनतेरस का त्योहार हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाएगा। इस वर्ष कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी 10 नवम्बर 2023 को दोपहर 12:35 बजे से प्रारम्भ होकर 11 नवम्बर 2023 को दोपहर 01:57 बजे तक रहेगी।

धनतेरस को धनत्रयोदशी या धन्वंतरिजयंती के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि देवताओं और दैत्यों के मध्य समुद्र मंथन के दौरान इसी दिन 14वें रत्न के रूप में धन्वंतरि देव प्रकट हुए थे। धन्वंतरि देव जब प्रकट हुए तो उनके हाथ में अमृत से भरा पीतल का कलश था। इसलिए धनतेरस के दिन पीतल का कोई बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है।आइये जानते है कि आप की जन्म राशि के अनुसार धनतेरस के दिन क्या खरीदना शुभ फल दायी होगा:

मेष राशि (Mesh Rashi) –इस राशि का स्वामी मंगल है। धनतरेस के शुभ मुहूर्त पर मेष राशि के जातकों के लिए ताबें की वस्तुएं खरीदना शुभ माना जाता है। इस दिन आप चाहें तो भूमि में भी निवेश कर सकते हैं। अगर आप इस दिन तांबे की कोई वस्तु नहीं खरीदना चाहते तो आप चांदी या इलेक्ट्रॉनिक का भी कोई समान खरीद सकते हैं। वहीं इस राशि के लोगों को शेयर, केमिकल, चमड़े, लोहे से संबंधित काम में निवेश करने से बचना चाहिए।

वृषभ राशि (Vrishabh Rashi) – वृषभ राशि का स्वामी शुक्र है। इन राशि के लोग धनतेरस के दिन चांदी का कोई सामान खरीद सकते हैं। इसके अलावा धनतेरस के दिन चावल अवश्य खरीदने चाहिए। इस खास मौके पर अनाज, कपड़ा, चांदी, चीनी, चावल, ब्यूटी प्रोडक्ट्स, परफ्यूम, दूध और उससे बने पदार्थ, प्लास्टिक, खाद्य तेल, कपड़े, और रत्नों में निवेश करने या खरीदने से लाभ होगा। इससे मां लक्ष्मी हमेशा कृपा बरसाती रहेंगी।

मिथुन राशि (Mithun Rashi) –मिथुन राशि के जातकों का स्वामी बुध है। बुध व्यापारियों को लाभ देने वाला ग्रह है। मिथुन राशि के जातक धनतेरस पर स्टील के बर्तन खरीद सकते हैं। धनतेरस के दिन आपका वाहन खरीदना या सोने में निवेश करना भी शुभ माना जाता है। इस दिन आप सफेद वस्त्र का दान करें, जिससे आपकी वित्तीय स्थिति बेहतर हो जाएगी। इसके अलावा धनतेरस के दिन कागज, लकड़ी, पीतल, गेहूं, दालें, कपड़ा, स्टील, प्लास्टिक, तेल, सौदर्य सामग्री, सीमेंट, खनिज पदार्थ आदि का व्यापार करने वाले और खरीदने वाले को लाभ मिलेगा।

कर्क राशि (Kark Rashi)-कर्क राशि का स्वामी चंद्र है। धनतेरस के दिन आपका कंपनियों के शेयर और फाइनेंस कंपनियों में निवेश करना लाभदायी होगा। कर्क राशि के लोग धनतेरस के दिन चांदी की वस्तुएं खरीद सकते हैं। इसके अलावा चाहें तो आप स्टील के बर्तन भी खरीद सकते हैं। इस दिन इलेक्ट्रॉनिक का आइटम खरीदना आपके लिए शुभ होगा, यदि आप ऐसा करते हैं तो आपके घर में मां लक्ष्मी का वास हमेशा बना रहेगा।

सिंह राशि (Singh Rashi)-सिंह राशि का स्वामी सूर्य है। धनतेरस के दिन आप शेयर या जमीन-जायदाद में निवेश कर सकते हैं। इस दिन सिंह राशि के जातक तांबे या कांसे की वस्तुओं को खरीद सकते हैं। आप चाहें तो इस खास मौके पर सोने मे निवेश कर सकते हैं या इलेक्ट्रॉनिक का कोई आइटम खरीद सकते हैं। इस दिन आप नए कपड़े भी खरीद सकते हैं ऐसा करने से मां लक्ष्मी का आशीर्वाद आप पर हमेशा बना रहेगा।

ये भी पढ़ें :Dhanteras 2023: जाने तिथि , शुभ मुहूर्त, कथा और पूजा विधि

कन्या राशि (Kanya Rashi) –कन्या राशि का स्वामी बुध है, जिसे चंद्रमा का शत्रु माना जाता है। इन राशि के लोगों के लिए धनतेरस के दिन तांबे के गणेश जी खरीदना शुभ माना जाता है। वहीं इस खास मौके पर आप रसोई के लिए कोई आइटम भी खरीद सकते हैं। इस खास मौके पर अगर आप चाहें तो कांसे या हाथी के दांत से बनी चीजें भी खरीद सकते हैं।

तुला राशि (Tula Rashi) –तुला राशि का स्वामी शुक्र है। इस ऱाशि वालों को इलेक्ट्रॉनिक सामान और तेल में निवेश करना शुभ माना जाता है। तुला राशि के जातक धनतेरस के दिन चांदी या स्टील से बनी कोई भी चीजें खरीद सकते हैं। इसके अलावा आप कोई ब्यूटी प्रोडक्ट्स या घर को सजाने वाली किसी वस्तु को खरीद सकते हैं। ऐसा करने से आपको ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

वृश्चिक राशि (Vrishchik Rashi) –इस राशि के जातकों का स्वामी मंगल है। इस राशि वाले लोगों को धनतेरस के दिन जमीन, मकान, दुकान और वस्त्रों में निवेश करना चाहिए। इस खास मौके पर सोने की वस्तु को खरीदना काफी शुभ माना जाता है। यदि आप चाहें तो इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं भी खरीद सकते हैं। यदि आप इन वस्तुओं को खरीदते हैं तो आपको धनलाभ के कई योग बनेंगे।

धनु राशि (Dhanu Rashi) –इस राशि के लोगों का स्वामी गुरु है। गुरु व्यापारियों को लाभ प्रदान कराने वाला ग्रह है। धनतेरस के दिन सोने का आइटम और अनाज खरीदना शुभ माना जाता है। इसके अलावा आप इस दिन आभूषण, रत्न, अनाज, चांदी और ब्यूटी प्रोडक्टस भी खरीद सकते हैं। यदि आप इस दिन कोई पीली वस्तु खरीद लें तो आपके ऊपर लक्ष्मी के साथ-साथ बृहस्पति देव का भी आशीर्वाद बना रहेगा।

Dhanteras 2023: श्री कुबेर पूजा विधि

मकर राशि (Makar Rashi) – मकर राशि का स्वामी शनि है। धनतेरस के दिन इलेक्ट्रॉनिक सामान, वाहन, इत्र, स्टील और ब्यूटी प्रोडक्ट्स में निवेश से लाभ प्राप्त होता है। मकर राशि के लोग धनतेरस के दिन वाहन खरीद सकते हैं क्योंकि उनके लिए यह दिन काफी शुभ है। इसके अलावा आप मां लक्ष्मी के पूजन के लिए वस्त्र और चांदी का सिक्का भी खरीद सकते हैं। इस पावन अवसर पर यह सब चीजें खरीदने से आपके घर में समृद्धि का वास होगा।

कुम्भ राशि (Kumbh Rashi) –इस राशि के जातकों का स्वामी शनि है। धनतेरस के दिन लोहे, इलेक्ट्रॉनिक सामान, वाहन, इत्र, स्टील आदि वस्तुएं खऱीद सकते हैं। इस दिन आप चाहें तो नीलम रत्न भी खरीद सकते हैं। यह काफी शुभ माना जाता है। यदि आप चाहें तो इस दिन भगवान गणेश और धन की देवी लक्ष्मी के चित्र वाला सोने का सिक्का भी खरीद सकते हैं। ऐसा करने से आपकी आर्थिक स्थिति बेहतर रहेगी।

मीन राशि (Meen Rashi) –मीन राशि वालों का स्वामी गुरु है। चंद्रमा का घनिष्ठ मित्र माना जाता है। धनतेरस के दिन सोना, चांदी, रत्न, आभूषण आदि सामग्रियों को खरीदना शुभ माना जाता है। इसके अलावा आप इस दिन चांदी के बर्तन भी खरीद सकते हैं। अगर आप चाहें तो कोई इलेक्ट्रॉनिक आइटम भी खरीद सकते हैं। ये सब खरीदते हैं तो आप पर मां लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है।

 

नोट:- ये सब समान खरीदना आपकी इच्छा पे निर्भर करता है जो लोग किसी वजह से समान नहीं खरीद सकते वो भगवान के हाथ जोड़ कर पूजा अर्चना कर प्रसाद ग्रहण करे | बताई गयी वस्तुओं के अलावा धनतेरस के दिन नमक ,हल्दी की गांठ ,लक्ष्मी गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति ,साबुत धनिया और झाड़ू भी खरीदना अति शुभ माना जाता है |

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Diwali 2020: शुभ दीपावली, जाने पूजा का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि https://astrodeeva.com/diwali-2020-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%ad-%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be/ https://astrodeeva.com/diwali-2020-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%ad-%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be/#respond Sat, 14 Nov 2020 03:42:23 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1362 हिन्दू धर्म में दीपावली एक ऐसा त्यौहार है जिसका हर हिन्दू वर्ष भर बेसब्री से इंतज़ार करता है और अपनी यथाशक्ति अनुसार इस पर्व को मनाता है। यह पर्व हर वर्ष हिन्दू  पंचांग  के अनुसार कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भक्तजन माता लक्ष्मी, सरस्वती  और भगवान गणेश […]

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हिन्दू धर्म में दीपावली एक ऐसा त्यौहार है जिसका हर हिन्दू वर्ष भर बेसब्री से इंतज़ार करता है और अपनी यथाशक्ति अनुसार इस पर्व को मनाता है। यह पर्व हर वर्ष हिन्दू  पंचांग  के अनुसार कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भक्तजन माता लक्ष्मी, सरस्वती  और भगवान गणेश की विधि विधान से पूजा कर उनको प्रसन्न करते है और उन से धन-संपत्ती, बुद्धि  और सुख-समृद्धि प्रदान करने की कामना करते हैं।

दीपावली 2020 शुभ मुहूर्त

दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा को प्रदोष काल के दौरान किया जाना चाहिये, जो कि सूर्यास्त के बाद प्रारम्भ होता है और लगभग 2 घण्टे 24 मिनट तक रहता है। कुछ जानकार लक्ष्मी पूजा के लिए महानिशिता काल का सुझाव भी देते हैं। हमारे विचार में महानिशिता काल तांत्रिक समुदायों और पण्डितों के लिए अधिक उपयुक्त होता है। सामान्य जन के लिए प्रदोष काल मुहूर्त ही उपयुक्त माना गया है।

दिनांक – 14 नवम्बर 2020

वार – शनिवार

अमावस्या तिथि प्रारम्भ – 14 नवम्बर 2020 को 02:17 पी एम बजे

अमावस्या तिथि समाप्त – 15 नवम्बर 2020 को 10:36 ए एम बजे

प्रदोष काल – 05:28 पी एम से 08:07 पी एम

वृषभ लग्न – 05:28 पी एम से 07:24 पी एम

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त – 14 नवम्बर 2020 को 05:28 पी एम से 07:24 पी एम

दीपावली लक्ष्मी पूजा के लिये शुभ चौघड़िया मुहूर्त

अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत) – 02:17 पी एम से 04:07 पी एम

सायाह्न मुहूर्त (लाभ) – 05:28 पी एम से 07:07 पी एम

रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर) – 14 नवम्बर 08:47 पी एम से 15 नवम्बर 01:45 ए एम

उषाकाल मुहूर्त (लाभ) – 15 नवम्बर 05:04 ए एम से 06:44 ए एम

निशिता काल मुहूर्त

निशिता काल – 14 नवम्बर 11:39 पी एम से 15 नवम्बर 12:32 ए एम

सिंह लग्न – 14 नवम्बर 11:59 पी एम से 15 नवम्बर 02:16 ए एम

 

दीपावली पूजन सामग्री

दीवाली पूजन की सभी सामग्री लगभग घर में ही मिल जाती हैं लेकिन कुछ अतिरिक्त चीजों को बाहर से लाया जा सकता है। ये वस्तुएं हैं- लक्ष्मी, सरस्वती व गणेश जी की प्रतिमा या चित्र, रोली, कुमकुम, चावल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, धूप, कपूर, अगरबत्तियां, मिट्टी तथा तांबे के दीपक, रुई, कलावा (मौलि), नारियल, शहद, दही, गंगाजल, गुड़, धनिया, फल, फूल( कमल और गुलाब के फूल भी मां को बहुत प्रिय हैं), जौ, गेहूँ, दूर्वा, चंदन, सिंदूर, घृत, पंचामृत, दूध, मेवे, खील, बताशे, गंगाजल, जनेऊ,वस्त्र, लाल कपड़ा,चौकी, कलश, कमल गट्टे की माला, शंख, आसन, थाली, चांदी का सिक्का, भोग व प्रसाद हेतु मिष्ठान्न।

 

दीपावली पूजन विधि

दीवाली की पूजा में सबसे पहले एक चौकी पर सफेद या लाल वस्त्र बिछा कर उस पर मां लक्ष्मी, सरस्वती व गणेश जी को प्रतिमा या चित्र को विराजमान करें। इसके बाद हाथ में थोड़ा सा जल लेकर उसे प्रतिमा के ऊपर निम्न मंत्र पढ़ते हुए छिड़कें।

ऊँ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा।

य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: वाह्याभंतर: शुचि:।।

इसके बाद में इसी तरह से स्वयं को तथा अपने पूजा के आसन को भी इसी तरह जल छिड़ककर पवित्र कर लें।

अब मां पृथ्वी को प्रणाम करके निम्न मंत्र बोलें तथा उनसे क्षमा प्रार्थना करते हुए अपने आसन पर विराजमान हों

पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥

ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥ पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः

अब पुष्प या चम्मच से अपनी दायी अंजुलि में जल ले कर निम्न मंत्र बोलते हुए आचमन करें

ॐ केशवाय नमः

ॐ नारायणाय नमः

ॐ वासुदेवाय नमः

अब हृषिकेशाय नमः मंत्र कहते हुए हाथों को धो लें। इस प्रक्रिया को आचमन कहते हैं इससे विद्या, आत्म और बुद्धि तत्व का शोधन हो जाता है। तत्पश्चात तिलक लगाएँ। अब आप पूजा के लिये पूरी तरह पवित्र हैं।

ध्यान व संकल्प

अब मन को एकाग्र कर प्रभु में ध्यान लगाएँ और संकल्प करें।

संकल्प के लिये हाथ में अक्षत, पुष्प और जल लें साथ में कुछ द्रव्य यानि पैसे भी लें और संकल्प मंत्र का जाप करते हुए संकल्प करें कि “मैं अमुक व्यक्ति( अपना नाम), अमुक गोत्र( आप का गोत्र),अमुक स्थान( जिस शहर व स्थान में पूजा की जा रही है) , दिनांक, समय पर सपरिवार  मां लक्ष्मी, सरस्वती तथा गणेश जी का पूजन करने जा रहा हूं, जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हों।”

 इसके बाद भगवान गणेश और माँ गौरी की पूजा करें। इसके बाद कलश पूजन करें। अब फिर नवग्रहों का पूजन कीजिए। हाथ में अक्षत और पुष्प ले कर नवग्रह स्तोत्र बोलिए। इसके बाद भगवती षोडश मातृकाओं ( १. गौरी, २. पद्मा, ३. शची, ४. मेधा, ५. सावित्री, ६. विजया, ७. जया, ८. देव सेना, ९. स्वधा, १०. स्वाहा, ११. मातरः, १२. लोकमातरः, १३. धृतिः, १४. पुष्टिः, १५. तुष्टिः, १६. आत्मनः कुलदेवताः ) का पूजन किया जाता है। इन सभी के पूजन के बाद मातृकाओं को गंध, अक्षत व पुष्प प्रदान करते हुए पूजन करें। अब मौलि लेकर गणपति जी , माता लक्ष्मी व सरस्वती को अर्पण कर और स्वयं के हाथ पर भी बंधवा लें। अब सभी देवी-देवताओं के तिलक लगाकर स्वयं को भी तिलक लगवाएं। इसके बाद मां महालक्ष्मी की पूजा आरंभ करें।

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लक्ष्मी पूजन

सर्व प्रथम माता लक्ष्मी का ध्यान करें और निम्न मंत्र बोलें

ॐ या सा पद्मासनस्था, विपुल-कटि-तटी, पद्म-दलायताक्षी।

गम्भीरावर्त-नाभिः, स्तन-भर-नमिता, शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया।।

लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। मणि-गज-खचितैः, स्नापिता हेम-कुम्भैः।

नित्यं सा पद्म-हस्ता, मम वसतु गृहे, सर्व-मांगल्य-युक्ता।।

 अर्थात – भगवती लक्ष्मी कमल के आसन पर विराजमान हैं, कमल की पंखुड़ियों के समान सुन्दर बड़े-बड़े जिनके नेत्र हैं, जिनकी विस्तृत कमर और गहरे आवर्तवाली नाभि है, जो पयोधरों के भार से झुकी हुई और सुन्दर वस्त्र के उत्तरीय से सुशोभित हैं, जो मणि-जटित दिव्य स्वर्ण-कलशों के द्वारा स्नान किए हुए हैं, वे कमल-हस्ता सदा सभी मङ्गलों के सहित मेरे घर में निवास करें।

 

देवी की प्रतिष्ठा करें

हाथ में अक्षत लेकर बोलें “ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मी, इहागच्छ इह तिष्ठ, एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।

स्नान कराएं

ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः।।

इदं रक्त चंदनम् लेपनम् से रक्त चंदन लगाएं।

इदं सिन्दूराभरणं से सिन्दूर लगाएं।

ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, कमलायै नमो नमः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।’ इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं। अब लक्ष्मी देवी को इदं रक्त वस्त्र समर्पयामि कहकर लाल वस्त्र पहनाएं।

 

लक्ष्मी देवी की अंग पूजा

बायें हाथ में अक्षत लेकर दायें हाथ से थोड़ा-थोड़ा छोड़ते जायें—

ॐ चपलायै नम: पादौ पूजयामि।

ॐ चंचलायै नम: जानूं पूजयामि ।

ॐ कमलायै नम: कटि पूजयामि ।

ॐ कात्यायिन्यै नम: नाभि पूजयामि ।

ॐ जगन्मातरे नम: जठरं पूजयामि ।

ॐ विश्ववल्लभायै नम: वक्षस्थल पूजयामि ।

ॐ कमलवासिन्यै नम: भुजौ पूजयामि ।

ॐ कमल पत्राक्ष्य नम: नेत्रत्रयं पूजयामि ।

ॐ श्रियै नम: शिरं: पूजयामि।

 

अष्ट-सिद्धि पूजा

अङ्ग-देवताओं की पूजा करने के बाद पुनः बाएँ हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें.

ॐ अणिम्ने नम:। ॐ महिम्न नम:।

ॐ गरिम्णे नम:। ॐ लघिम्ने नम:।

ॐ प्राप्त्यै नम:। ॐ प्राकाम्यै नम:।

ॐ ईशितायै नम:। ॐ वशितायै नम:।

 

अष्टलक्ष्मी पूजन

पुनः बाएँ हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें.

ॐ आद्ये लक्ष्म्यै नम:। ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम:।

ॐ सौभाग्य लक्ष्म्यै नम:। ॐ अमृत लक्ष्म्यै नम:।

ॐ लक्ष्म्यै नम:। ॐ सत्य लक्ष्म्यै नम:।

ॐ भोगलक्ष्म्यै नम:। ॐ योग लक्ष्म्यै नम:।

 

नैवैद्य अर्पण

पूजन के पश्चात देवी को “इदं नानाविधि नैवेद्यानि ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें।

मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: “इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” बालें।

प्रसाद अर्पित करने के बाद “इदं आचमनयं ॐ महालक्ष्मियै नम: ” मंत्र बोले और आचमन करायें.

अब पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि।

अब एक फूल लेकर लक्ष्मी देवी पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ॐ महालक्ष्मियै नम:।

लक्ष्मी जी की पूजा के बाद भगवान विष्णु एवं शिव जी की पूजा करनी चाहिए और फिर गल्ले की पूजा करें। पूजन के पश्चात सपरिवार आरती और क्षमा प्रार्थना करें।

क्षमा प्रार्थना मंत्र

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम।

पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर।।

मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।

यत्पूजितं माया देवं परिपूर्ण तदस्तु में।

अर्थात- हे ईश्वर मैं आपका “आवाह्न” करना नहीं जानता हूं न ही विसर्जन अर्थात् न ही आपको विदा करना जानता हूं मुझे आपकी पूजा भी करनी नहीं आती है। अगर मेरे से आप की पूजा में कोई भूल हो गयी है तो कृपा करके मुझे क्षमा करें। न मुझे मंत्र का ज्ञान है न ही क्रिया का, मैं तो आपकी भक्ति करना भी नहीं जानता। मैं यथा संभव पूजा कर रहा हूं, कृपा करके मेरी भूल को क्षमा कर दें और पूजा को पूर्णता प्रदान करें।

अब अपने बड़ों का आशीर्वाद लें और छोटों को भेंट व उपहार दें और सब के साथ पर्व मनाएँ।

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Dhanteras 2020: जाने तिथि , शुभ मुहूर्त, कथा और पूजा विधि https://astrodeeva.com/dhanteras-2020-%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a5%e0%a4%bf-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%ad-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c/ https://astrodeeva.com/dhanteras-2020-%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a5%e0%a4%bf-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%ad-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c/#comments Thu, 12 Nov 2020 02:32:07 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1341 हिन्दू धर्म में दीपावली एक ऐसा त्यौहार है जिसका हर हिन्दू बेसब्री से इंतज़ार करता है और अपनी यथाशक्ति अनुसार इस पर्व को मनाता है। भारत सहित पूरे विश्व में दीपावली का त्यौहार 5 दिन चलता है और हिन्दू कलेंडर के अनुसार इसकी शुरुआत प्रतिवर्ष कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन […]

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हिन्दू धर्म में दीपावली एक ऐसा त्यौहार है जिसका हर हिन्दू बेसब्री से इंतज़ार करता है और अपनी यथाशक्ति अनुसार इस पर्व को मनाता है। भारत सहित पूरे विश्व में दीपावली का त्यौहार 5 दिन चलता है और हिन्दू कलेंडर के अनुसार इसकी शुरुआत प्रतिवर्ष कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन धनतेरस पर्व से होती है।

धनतेरस को धनत्रयोदशी या धन्वंतरि जंयती के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि देवताओं और दैत्यों के मध्य समुद्र मंथन के दौरान इसी दिन 14वें रत्न के रूप में धन्वंतरि देव प्रकट हुए थे। धन्वंतरि देव जब प्रकट हुए तो उनके हाथ में अमृत से भरा पीतल का कलश था। इसलिए धनतेरस के दिन पीतल का कोई बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है।

धनतेरस 2020 तिथि और शुभ मुहूर्त

दिनांक: 13 नवम्बर 2020

वार : शुक्रवार

धनतेरस पूजा मुहूर्त : 05:28 पी एम से 05:59 पी एम

प्रदोष काल : 05:28 पी एम से 08:07 पी एम

वृषभ काल : 05:32 पी एम से 07:28 पी एम

त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ : 12 नवम्बर 2020 को 09:30 पी एम बजे

त्रयोदशी तिथि समाप्त: 13 नवम्बर 2020 को 05:59 पी एम बजे

धनतेरस की कथा

एक बार, देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से पृथ्वी पर अपनी एक यात्रा के दौरान उनका साथ देने का आग्रह किया। भगवान विष्णु ने उनका आग्रह मान लिया लेकिन इस शर्त पर कि वह सांसारिक प्रलोभनों की ओर आकर्षित नहीं होगी और दक्षिण दिशा में नहीं देखेंगी। देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु की इस शर्त से सहमत हो गईं।

जब भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी पृथ्वी की यात्रा कर रहे थे, तब माता लक्ष्मी अपने चंचल प्रवृत्ति के कारण दक्षिण दिशा में देखने के लिए अपनी  इच्छा का विरोध नहीं कर पायी और देखने लगी अतः उन्होंने भगवान विष्णु को दिया हुआ वचन तोड़ दिया और दक्षिण की ओर बढ़ने लगीं। जैसे ही देवी लक्ष्मी ने दक्षिणी दिशा में बढ़ना शुरू किया, वह धरती पर पीले सरसों के फूलों और गन्ने के खेतों की सुंदरता से मंत्रमुग्ध हो गई। सरसों के फूलों की सुंदरता देख उन्होंने खेत से सरसों के फूलों को तोड़ कर खुद को फूलों से सजाया और गन्ने के रस का आनंद लेना शुरू कर दिया।

जब भगवान विष्णु ने ये देखा कि देवी लक्ष्मी ने उनकी प्रतिज्ञा तोड़ दी है, तो वे नाराज हो गए और उन्होंने लक्ष्मी जी को अगले बारह साल तपस्या के रूप में धरती पर बिताने को कहा और उस खेत के मालिक के यहाँ सेवा करने को कहा।

जिसके बाद माता लक्ष्मी ने एक बूढ़ी औरत का रूप धारण किया और उस किसान के घर चली गई। वह किसान बहुत गरीब था। जब वहां लक्ष्मी जी पहुंची तो उन्होंने किसान से उनके घर रहने के लिए आग्रह किया। किसान दयालु था इसलिए एक बूढ़ी औरत को देख उसने उन्हें अपने घर में रहने की हामी भर दी।

देवी लक्ष्मी के आगमन के साथ, धीरे-धीरे गरीब किसान का घर अन्न व धन से भर गया और वह किसान समृद्ध हो गया। इसतरह बारह वर्ष बीत गए और देवी लक्ष्मी के वापस वैकुंठ लौटने का समय आ गया। जब भगवान विष्णु देवी लक्ष्मी को वापस लेने के लिए एक साधारण व्यक्ति के भेष में पृथ्वी पर आए, तो किसान ने उनकी सेवाओं से देवी लक्ष्मी को राहत देने से इनकार कर दिया।

जब भगवान विष्णु के सभी प्रयास विफल हो गए और किसान अपनी सेवाओं से देवी लक्ष्मी को राहत देने के लिए सहमत नहीं हुए, तो देवी लक्ष्मी ने किसान को अपनी असली पहचान बताई और उसे कहा कि वह अब पृथ्वी पर नहीं रह सकती है और उन्हें वैकुंठ लोक लौटना होगा। देवी लक्ष्मी को साक्षात रूप में देख किसान मना नहीं कर सका पर उसने माता से आग्रह किया की वो उसके घर आती रहेंगी। किसान की भक्ति देख लक्ष्मी जी ने वादा किया कि वह हर साल दीवाली से पहले कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी की रात पृथ्वी पर आएँगी और किसान से मिलेंगी।

उसके बाद प्रति वर्ष दिवाली से पहले कृष्ण त्रयोदशी के दिन देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए उस किसान ने अपने घर की सफाई करना शुरू कर दिया और रात भर घी से भरा मिट्टी का दीपक जलाना शुरू कर दिया। देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के इन अनुष्ठानों ने किसान को साल-दर-साल समृद्ध और समृद्ध बना दिया।

ये भी पढ़ें: Dhanteras : श्री कुबेर पूजा विधि

 

यह देख अन्य लोग भी दीपावली से पहले कृष्ण त्रयोदशी की रात को देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए घर की सफ़ाई करने लगे और उन्हें प्रसन्न कर अपने घर में स्वागत करने के लिए विधि-विधान से पूजा करने लगे।

धनतेरस की पूजा विधि

धनतेरस के दिन मानव जीवन की दो महत्वपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति के लिए भगवान की विधी-विधान से पूजा की जाती है। इस दिन धन सम्पदा पाने हेतु माता लक्ष्मी और कुबेर जी की पूजा की जाती है और जीवन के दूसरे सबसे बड़े धन उत्तम स्वास्थ के लिए आयुर्वेद के देव धन्वंतरि से पूजा की जाती है।

संध्याकाल में पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है|  पूजा के स्थान पर उत्तर दिशा की तरफ भगवान कुबेर और धन्वन्तरि की मूर्ति स्थापना कर उनकी पूजा करनी चाहिए| इनके साथ ही माता लक्ष्मी और भगवान श्रीगणेश की पूजा का विधान है| ऐसी मान्‍यता है कि भगवान कुबेर को सफेद मिठाई का भोग और  धनवंतरि‍ को पीली मिठाई का भोग लगाना चाहिए | क्योंकि धन्वन्तरि को पीली वस्तु अधिक प्रिय है|  पूजा में फूल, फल, चावल, रोली, चंदन, धूप व दीप का इस्तेमाल करना फलदायक होता है|

इसी दिन परिवार के किसी भी सदस्य की असामयिक मृत्यु से बचने के लिए मृत्यु के देवता यमराज के लिए घर के बाहर दीपक जलाया जाता है जिसे यम दीपम के नाम से जाना जाता है और इस धार्मिक संस्कार को त्रयोदशी तिथि के दिन किया जाता है।

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Dhanteras : श्री कुबेर पूजा विधि https://astrodeeva.com/dhanteras-%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%bf/ https://astrodeeva.com/dhanteras-%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%bf/#comments Tue, 10 Nov 2020 02:58:53 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1333 श्री कुबेर महामुनि विश्रवा के पुत्र थे। कुबेर जी का जन्म विश्रवा की प्रथम पत्नी इलवती के गर्भ से हुआ था, जबकि उनकी दूसरी पत्नी कैकसी के गर्भ से रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा का जन्म हुआ था। हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार माँ लक्ष्मी धन की देवी हैं उसी तरह कुबेर देव को धन का […]

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श्री कुबेर महामुनि विश्रवा के पुत्र थे। कुबेर जी का जन्म विश्रवा की प्रथम पत्नी इलवती के गर्भ से हुआ था, जबकि उनकी दूसरी पत्नी कैकसी के गर्भ से रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा का जन्म हुआ था। हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार माँ लक्ष्मी धन की देवी हैं उसी तरह कुबेर देव को धन का देवता माना गया है। ये देवताओं के भी कोषाध्यक्ष है और इस संसार में जो भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ऐश्वर्य है उन सभी के अधिष्ठाता देव कुबेर को कहा गया है।

भारत और पूरे विश्व में हिंदुओं के सबसे प्रमुख त्यौहार दीपावली के पाँच दिवसीय पर्व का शुभ आरंभ धनतेरस से होता है। धनतेरस के दिन माँ लक्ष्मी , श्री गणेश और कुबेर देव की पूजा की जाती है। जो भक्त कुबेर देव की पूजा पूरे विधि-विधान से करता है उसको उदारता, सौम्यता, शांति और तृप्ति की प्राप्ति होती है। उस भक्त के लिए कुबेर देव अपने ख़ज़ाने के द्वार खोल देते है जिससे उसे कभी भी धन समस्याओं का सामना नही करना पड़ता है।

धनतेरस 2021 तिथि और शुभ मुहूर्त – Dhanteras 2021

दिनांक: 02 नवम्बर 2021
वार : मंगलवार
धनतेरस पूजा मुहूर्त : 06:17 पी एम से 08:11 पी एम
प्रदोष काल : 05:35 पी एम से 08:11 पी एम
वृषभ काल : 06:17 पी एम से 08:12 पी एम
त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ : 02 नवम्बर 2021 को 11:31 ए एम बजे
त्रयोदशी तिथि समाप्त: 03 नवम्बर 2021 को 09:02 ए एम बजे

धनतेरस के दिन लक्ष्मी पूजा को प्रदोष काल में किया जाना चाहिए जो कि सूर्यास्त के बाद प्रारम्भ होता है और लगभग 2 घण्टे 24 मिनट तक रहता है।

कुबेर देव की पूजा विधि

श्री कुबेर की मूर्ति है तो वह पूजा में उपयोग की जा सकती है। अगर आपके पास कुबेर की मूर्ति नहीं है तो आप तिजोरी या गहनों के बक्से को श्री कुबेर का रूप मान कर उनकी पूजा करनी चहिये। तिजोरी, बक्से आदि की पूजा से पहले सिन्दूर से स्वस्तिक-चिह्न बनाना चाहिए और उस पर ‘मौली’ बाँधना चाहिये।

1.सर्व प्रथम निम्नलिखित मन्त्र द्वारा श्री कुबेर जी का ध्यान करें।

मनुज –ब्रह्मा –विमान –स्थितम, 
गरुड़ –रत्न –निभं निधि –नायकम। 
शिव –सखम  मुकुटादि –विभूषिताम , 
वर –गड़े दधतं भजे  तुन्दिलम ॥

अर्थात –मानव-स्वरूप विमान पर विराजमान, श्रेष्ठ गरुड़ के समान सभी निधियों के स्वामी, भगवान् शिव के मित्र, मुकुट आदि से सुशोभित और हाथों में वर-मुद्रा एवं गदा धारण करनेवाले भव्य श्रीकुबेर जी की मैं वन्दना करता हूँ।

 

2.भगवान कुबेर का ध्यान करते हुए उनकी मूर्ति या तिजोरी या गहनों के बक्से सम्मुख निम्न मन्त्र द्वारा उनका आवाहन करें।

आवाहयामि  देव ! त्वामिहायाहि  कृपाम  कुरु ।

कोषम  वर्ध्दन्या  नित्यं , तवं  परी–रक्ष  सुरेश्वर ॥

॥ श्री  कुबेर –देवम  आवाहयामि ॥

अर्थात – हे देव, सुरेश्वर! मैं आपका आवाहन करता हूँ। आप कृपा कर यहाँ पधारें और सदा मेरे भण्डार की वृद्धि करें और रक्षा करें और कहें:

॥मैं श्रीकुबेर देव का आवाहन करता हूँ॥

 

3.आवाहन करने के उपरांत निम्न मन्त्र पढ़कर श्रीकुबेर देव के आसन के लिए पाँच पुष्प अञ्जलि( हथेलियों पर बनाया गया गड्ढा) में लेकर अपनेसामने श्री कुबेर की मूर्ति अथवा तिजोरी-बक्से आदि के निकट छोड़े।

नाना –रत्न –समायुक्तं  कर्त्य –स्वर –विभूषिताम । 
आसनं  देव –देवेश ! प्रीत्यर्थं  प्रति -गृह्यताम ॥ 
॥ श्री  कुबेर -देवाय  आसनार्थे  पंचा -पुष्पाणि  समर्पयामि ॥

अर्थात- हे देवताओं के ईश्वर! विविध प्रकार के रत्न से युक्त स्वर्ण-सज्जित आसन को प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण करें और और कहें:
॥भगवान् श्रीकुबेर के आसन के लिए मैं पाँच पुष्प अर्पित करता हूँ॥

 

4.इसके बाद ‘चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य’ से भगवान् श्रीकुबेर का पूजन निम्न मन्त्रों द्वारा करें।

ॐ  श्री  कुबेराय  नमः  पद्यों  पद्यम  समर्पयामि । 
ॐ  श्री  कुबेराय  नमः शिरसि  अर्घ्यम  समर्पयामि । 
ॐ  श्री  कुबेराय  नमः गन्धाक्षतं समर्पयामि । 
ॐ  श्री  कुबेराय  नमः पुष्पम  समर्पयामि । 
ॐ  श्री  कुबेराय  नमः धूपं  घ्रापयामि । 
ॐ  श्री  कुबेराय  नमः दीपम  दर्शयामि । 
ॐ  श्री  कुबेराय  नमः नैवेद्यम  समर्पयामि । 
ॐ  श्री  कुबेराय  नमः आचमनीयं  समर्पयामि । 
ॐ  श्री  कुबेराय  नमः ताम्बूलं  समर्पयामि ।

 

5.बतायी गयी विधि से पूजन करने के बाद बाएँ हाथ में गन्ध, अक्षत, पुष्प लेकर दाहिने हाथ द्वारा निम्न मन्त्र पढ़ते हुए श्री कुबेर जी की मूर्ति ‘यातिजोरी-बक्से’ आदि पर छोड़े।

ॐ  श्री  कुबेराय  नमः । 
अनेन  पूजने  श्री  धनाध्यक्ष -श्री  कुबेर  प्रियतम ।
नमो  नमः ।

अर्थात – श्री कुबेर को नमस्कार! इस पूजन से श्रीकुबेर भगवान् प्रसन्न हों, उन्हें बारम्बार नमस्कार।

 

।।अब कुबेर जी की आरती करें।।

 

ऊँ जै यक्ष कुबेर हरे,स्वामी जै यक्ष जै यक्ष कुबेर हरे।
शरण पड़े भगतों के,भण्डार कुबेर भरे ।। ॐ।।

शिव भक्तों में भक्त कुबेर बड़े,स्वामी भक्त कुबेर बड़े।
दैत्य दानव मानव से,कई-कई युद्ध लड़े ।। ॐ।।

स्वर्ण सिंहासन बैठे,सिर पर छत्र फिरे, स्वामी सिर पर छत्र फिरे।
योगिनी मंगल गावैं,सब जय जय कार करैं ।। ॐ।।

गदा त्रिशूल हाथ में,शस्त्र बहुत धरे, स्वामी शस्त्र बहुत धरे।
दख भय संकट मोचन,धनुष टंकार करें ।। ॐ।।

भांति भांति के व्यंजन बहुत बने,स्वामी व्यंजन बहुत बने।
मोहन भोग लगावैं,साथ में उड़द चने ।। ॐ।।

बल बुद्धि विद्या दाता,हम तेरी शरण पड़े, स्वामी हम तेरी शरण पड़े
अपने भक्त जनों के,सारे काम संवारे ।। ॐ।।

मुकुट मणी की शोभा,मोतियन हार गले, स्वामी मोतियन हार गले।
अगर कपूर की बाती,घी की जोत जले ।। ॐ।।

यक्ष कुबेर जी की आरती,जो कोई नर गावे, स्वामी जो कोई नर गावे।
कहत प्रेमपाल स्वामी,मनवांछित फल पावे ।। ॐ।।

 

॥ इसके साथ श्री-कुबेर पूजा समाप्त हुयी ॥

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