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*
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* Do Query
*
* @param $instance
* @return array
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]]>देवी लक्ष्मी का पहला स्वरूप आदिलक्ष्मी का है इन्हें मूललक्ष्मी, आदिशक्ति भी कहा जाता है। श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार महालक्ष्मी ने ही सृष्टि के आरंभ में त्रिदेवों को प्रकट किया और इन्हीं से महाकाली और महासरस्वती ने आकार लिया। इन्होंने स्वयं जगत के संचालन के लिए भगवान विष्णु के साथ रहना स्वीकार किया। यह देवी जीव-जंतुओं को प्राण प्रदान करती हैं, इनसे जीवन की उत्पत्ति हुई है। इनके भक्त मोह-माया से मुक्ति होकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं। इनकी कृपा से लोक-परलोक में सुख-संपदा प्राप्त होती है।
देवी लक्ष्मी का दूसरा स्वरूप हैं धनलक्ष्मी। इन्होंने भगवान विष्णु को कुबेर के कर्ज से मुक्ति दिलाने के लिए यह रूप धारण किया था। इस देवी का संबंध भगवान वेंकटेश से है जो भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। वेंकटेश रूप में भगवान ने देवी पद्मावती से विवाह के लिए कुबेर से कर्ज लिया। इसी कर्ज को चुकाने में भगवान की सहायता के लिए देवी लक्ष्मी धनलक्ष्मी रूप में प्रकट हुईं। इनके पास धन से भरा कलश है और एक हाथ में कमल फूल है। इनकी पूजा और भक्ति आर्थिक परेशानियों और कर्ज से मुक्ति दिलाती है। कर्ज से परेशान लोगों को देवी लक्ष्मी के इस स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।
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मेष राशि – मेष राशि के जातकों को धन प्राप्ति के लिए नित्य सुबह सूर्य देव के दर्शन करना चाहिए। पूजा में लक्ष्मीनारायण भगवान को गुड़ वाली खीर का भोग लगाना चाहिए। इस उपाय को करने लाभ होगा।
वृषभ राशि – वृष राशि के जातकों को नित्य सुबह भगवान शिव के दर्शन करना चाहिए और शुक्रवार के दिन शिवलिंग पर साबुत चावल अर्पित करना चाहिए। इस उपाय करने से धन से जुड़ी समस्याएं दूर हो सकती हैं।
मिथुन राशि – मिथुन राशि वालों को नित्य सुबह देवी लक्ष्मी या देवी दुर्गा के दर्शन करना चाहिए। वहीं बुधवार के दिन गणपति जी को लाल फूल अर्पित करना चाहिए। इस उपाय को करने से बुध देव आपके विघ्नों को दूर करेंगे।
कर्क राशि – कर्क राशि के जातकों को नित्य सुबह भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करना चाहिए और पूजा में उन्हें तुलसी पत्र, मिश्री माखन का भोग लगाना चाहिए। इस उपाय को करने से आपकी आर्थिक स्थिति समृद्ध होगी।
सिंह राशि – सिंह राशि वालों को नित्य सुबह भगवान सूर्य नारायण के दर्शन करें और लाल गुलाब हनुमान जी के चरणों से स्पर्श कराकर पर्स में रखें। आपको आर्थिक लाभ होगा।
कन्या राशि – कन्या राशि के जातकों को नित्य सुबह भगवान गणेश जी के दर्शन करने चाहिए और देवी दुर्गा जी को सफेद चावल अर्पित करें। यह उपाय आपके लिए कारगर सिद्ध होगा।
तुला राशि – तुला राशि के जातकों को भगवान लक्ष्मीनारायण जी को कमल का फूल अर्पित करना चाहिए और मंगलवार के दिन हनुमान जी पांच बूंदी के लड्डू का भोग लगाएं।
वृश्चिक राशि – वृश्चिक राशि के जातकों को तुलसी के पौधे को किसी विष्णु मंदिर में लगाना चाहिए। यदि आप व्यापारी वर्ग से आते हैं तो यात्रा करने से पहले श्री राम स्तुति का पाठ करें। आर्थिक लाभ की प्राप्ति हो सकती है।
धनु राशि – धनु राशि के जातकों को सुबह हनुमान जी का दर्शन करना चाहिए और गुरुवार के दिन पीपल के नीचे मिठाई रखनी चाहिए। इसके साथ ही आपको रोजाना पीले चंदन का तिलक लगाना चाहिए।
मकर राशि – मकर राशि के जातकों को नित्य सुबह देवी गायत्री का दर्शन करना चाहिए और सभी महत्वपूर्ण काम से पहले सफेद फूल अपने साथ लेकर जाना चाहिए। यह उपाय आपको कामयाबी दिला सकता है।
कुंभ राशि – कुंभ राशि के जातकों को केले के पेड़ के नीचे शुद्ध देसी घी का दीपक जलाना चाहिए और सभी महत्वपूर्ण काम से पहले हनुमान जी को मीठा पान अर्पित करना चाहिए।
मीन राशि – मीन राशि के जातकों को भगवान विष्णु को केसर का तिलक करना चाहिए, फिर वही तिलक अपने माथे पर भी लगाएं। साथ ही देवी लक्ष्मी को पेठे का भोग लगाएं।
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]]>(यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है।)
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]]>दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा को प्रदोष काल के दौरान किया जाना चाहिये, जो कि सूर्यास्त के बाद प्रारम्भ होता है और लगभग 2 घण्टे 24 मिनट तक रहता है। कुछ जानकार लक्ष्मी पूजा के लिए महानिशिता काल का सुझाव भी देते हैं। हमारे विचार में महानिशिता काल तांत्रिक समुदायों और पण्डितों के लिए अधिक उपयुक्त होता है। सामान्य जन के लिए प्रदोष काल मुहूर्त ही उपयुक्त माना गया है।
दिनांक – 14 नवम्बर 2020
वार – शनिवार
अमावस्या तिथि प्रारम्भ – 14 नवम्बर 2020 को 02:17 पी एम बजे
अमावस्या तिथि समाप्त – 15 नवम्बर 2020 को 10:36 ए एम बजे
प्रदोष काल – 05:28 पी एम से 08:07 पी एम
वृषभ लग्न – 05:28 पी एम से 07:24 पी एम
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त – 14 नवम्बर 2020 को 05:28 पी एम से 07:24 पी एम
अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत) – 02:17 पी एम से 04:07 पी एम
सायाह्न मुहूर्त (लाभ) – 05:28 पी एम से 07:07 पी एम
रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर) – 14 नवम्बर 08:47 पी एम से 15 नवम्बर 01:45 ए एम
उषाकाल मुहूर्त (लाभ) – 15 नवम्बर 05:04 ए एम से 06:44 ए एम
निशिता काल – 14 नवम्बर 11:39 पी एम से 15 नवम्बर 12:32 ए एम
सिंह लग्न – 14 नवम्बर 11:59 पी एम से 15 नवम्बर 02:16 ए एम
दीवाली पूजन की सभी सामग्री लगभग घर में ही मिल जाती हैं लेकिन कुछ अतिरिक्त चीजों को बाहर से लाया जा सकता है। ये वस्तुएं हैं- लक्ष्मी, सरस्वती व गणेश जी की प्रतिमा या चित्र, रोली, कुमकुम, चावल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, धूप, कपूर, अगरबत्तियां, मिट्टी तथा तांबे के दीपक, रुई, कलावा (मौलि), नारियल, शहद, दही, गंगाजल, गुड़, धनिया, फल, फूल( कमल और गुलाब के फूल भी मां को बहुत प्रिय हैं), जौ, गेहूँ, दूर्वा, चंदन, सिंदूर, घृत, पंचामृत, दूध, मेवे, खील, बताशे, गंगाजल, जनेऊ,वस्त्र, लाल कपड़ा,चौकी, कलश, कमल गट्टे की माला, शंख, आसन, थाली, चांदी का सिक्का, भोग व प्रसाद हेतु मिष्ठान्न।
दीवाली की पूजा में सबसे पहले एक चौकी पर सफेद या लाल वस्त्र बिछा कर उस पर मां लक्ष्मी, सरस्वती व गणेश जी को प्रतिमा या चित्र को विराजमान करें। इसके बाद हाथ में थोड़ा सा जल लेकर उसे प्रतिमा के ऊपर निम्न मंत्र पढ़ते हुए छिड़कें।
ऊँ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा।
य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: वाह्याभंतर: शुचि:।।
इसके बाद में इसी तरह से स्वयं को तथा अपने पूजा के आसन को भी इसी तरह जल छिड़ककर पवित्र कर लें।
अब मां पृथ्वी को प्रणाम करके निम्न मंत्र बोलें तथा उनसे क्षमा प्रार्थना करते हुए अपने आसन पर विराजमान हों
पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥
ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥ पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः
अब पुष्प या चम्मच से अपनी दायी अंजुलि में जल ले कर निम्न मंत्र बोलते हुए आचमन करें
ॐ केशवाय नमः
ॐ नारायणाय नमः
ॐ वासुदेवाय नमः
अब ॐ हृषिकेशाय नमः मंत्र कहते हुए हाथों को धो लें। इस प्रक्रिया को आचमन कहते हैं इससे विद्या, आत्म और बुद्धि तत्व का शोधन हो जाता है। तत्पश्चात तिलक लगाएँ। अब आप पूजा के लिये पूरी तरह पवित्र हैं।
अब मन को एकाग्र कर प्रभु में ध्यान लगाएँ और संकल्प करें।
संकल्प के लिये हाथ में अक्षत, पुष्प और जल लें साथ में कुछ द्रव्य यानि पैसे भी लें और संकल्प मंत्र का जाप करते हुए संकल्प करें कि “मैं अमुक व्यक्ति( अपना नाम), अमुक गोत्र( आप का गोत्र),अमुक स्थान( जिस शहर व स्थान में पूजा की जा रही है) , दिनांक, समय पर सपरिवार मां लक्ष्मी, सरस्वती तथा गणेश जी का पूजन करने जा रहा हूं, जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हों।”
इसके बाद भगवान गणेश और माँ गौरी की पूजा करें। इसके बाद कलश पूजन करें। अब फिर नवग्रहों का पूजन कीजिए। हाथ में अक्षत और पुष्प ले कर नवग्रह स्तोत्र बोलिए। इसके बाद भगवती षोडश मातृकाओं ( १. गौरी, २. पद्मा, ३. शची, ४. मेधा, ५. सावित्री, ६. विजया, ७. जया, ८. देव सेना, ९. स्वधा, १०. स्वाहा, ११. मातरः, १२. लोकमातरः, १३. धृतिः, १४. पुष्टिः, १५. तुष्टिः, १६. आत्मनः कुलदेवताः ) का पूजन किया जाता है। इन सभी के पूजन के बाद मातृकाओं को गंध, अक्षत व पुष्प प्रदान करते हुए पूजन करें। अब मौलि लेकर गणपति जी , माता लक्ष्मी व सरस्वती को अर्पण कर और स्वयं के हाथ पर भी बंधवा लें। अब सभी देवी-देवताओं के तिलक लगाकर स्वयं को भी तिलक लगवाएं। इसके बाद मां महालक्ष्मी की पूजा आरंभ करें।
सर्व प्रथम माता लक्ष्मी का ध्यान करें और निम्न मंत्र बोलें
ॐ या सा पद्मासनस्था, विपुल-कटि-तटी, पद्म-दलायताक्षी।
गम्भीरावर्त-नाभिः, स्तन-भर-नमिता, शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया।।
लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। मणि-गज-खचितैः, स्नापिता हेम-कुम्भैः।
नित्यं सा पद्म-हस्ता, मम वसतु गृहे, सर्व-मांगल्य-युक्ता।।
अर्थात – भगवती लक्ष्मी कमल के आसन पर विराजमान हैं, कमल की पंखुड़ियों के समान सुन्दर बड़े-बड़े जिनके नेत्र हैं, जिनकी विस्तृत कमर और गहरे आवर्तवाली नाभि है, जो पयोधरों के भार से झुकी हुई और सुन्दर वस्त्र के उत्तरीय से सुशोभित हैं, जो मणि-जटित दिव्य स्वर्ण-कलशों के द्वारा स्नान किए हुए हैं, वे कमल-हस्ता सदा सभी मङ्गलों के सहित मेरे घर में निवास करें।
हाथ में अक्षत लेकर बोलें “ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मी, इहागच्छ इह तिष्ठ, एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।”
ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः।।
इदं रक्त चंदनम् लेपनम् से रक्त चंदन लगाएं।
इदं सिन्दूराभरणं से सिन्दूर लगाएं।
ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, कमलायै नमो नमः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।’ इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं। अब लक्ष्मी देवी को इदं रक्त वस्त्र समर्पयामि कहकर लाल वस्त्र पहनाएं।
बायें हाथ में अक्षत लेकर दायें हाथ से थोड़ा-थोड़ा छोड़ते जायें—
ॐ चपलायै नम: पादौ पूजयामि।
ॐ चंचलायै नम: जानूं पूजयामि ।
ॐ कमलायै नम: कटि पूजयामि ।
ॐ कात्यायिन्यै नम: नाभि पूजयामि ।
ॐ जगन्मातरे नम: जठरं पूजयामि ।
ॐ विश्ववल्लभायै नम: वक्षस्थल पूजयामि ।
ॐ कमलवासिन्यै नम: भुजौ पूजयामि ।
ॐ कमल पत्राक्ष्य नम: नेत्रत्रयं पूजयामि ।
ॐ श्रियै नम: शिरं: पूजयामि।
अङ्ग-देवताओं की पूजा करने के बाद पुनः बाएँ हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें.
ॐ अणिम्ने नम:। ॐ महिम्न नम:।
ॐ गरिम्णे नम:। ॐ लघिम्ने नम:।
ॐ प्राप्त्यै नम:। ॐ प्राकाम्यै नम:।
ॐ ईशितायै नम:। ॐ वशितायै नम:।
पुनः बाएँ हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें.
ॐ आद्ये लक्ष्म्यै नम:। ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम:।
ॐ सौभाग्य लक्ष्म्यै नम:। ॐ अमृत लक्ष्म्यै नम:।
ॐ लक्ष्म्यै नम:। ॐ सत्य लक्ष्म्यै नम:।
ॐ भोगलक्ष्म्यै नम:। ॐ योग लक्ष्म्यै नम:।
पूजन के पश्चात देवी को “इदं नानाविधि नैवेद्यानि ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें।
मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: “इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” बालें।
प्रसाद अर्पित करने के बाद “इदं आचमनयं ॐ महालक्ष्मियै नम: ” मंत्र बोले और आचमन करायें.
अब पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि।
अब एक फूल लेकर लक्ष्मी देवी पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ॐ महालक्ष्मियै नम:।
लक्ष्मी जी की पूजा के बाद भगवान विष्णु एवं शिव जी की पूजा करनी चाहिए और फिर गल्ले की पूजा करें। पूजन के पश्चात सपरिवार आरती और क्षमा प्रार्थना करें।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर।।
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं माया देवं परिपूर्ण तदस्तु में।
अर्थात- हे ईश्वर मैं आपका “आवाह्न” करना नहीं जानता हूं न ही विसर्जन अर्थात् न ही आपको विदा करना जानता हूं मुझे आपकी पूजा भी करनी नहीं आती है। अगर मेरे से आप की पूजा में कोई भूल हो गयी है तो कृपा करके मुझे क्षमा करें। न मुझे मंत्र का ज्ञान है न ही क्रिया का, मैं तो आपकी भक्ति करना भी नहीं जानता। मैं यथा संभव पूजा कर रहा हूं, कृपा करके मेरी भूल को क्षमा कर दें और पूजा को पूर्णता प्रदान करें।
अब अपने बड़ों का आशीर्वाद लें और छोटों को भेंट व उपहार दें और सब के साथ पर्व मनाएँ।
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