if ( ! function_exists( 'jnews_get_views' ) ) {
/**
* Gets views count.
*
* @param int $id The Post ID.
* @param string|array $range Either an string (eg. 'last7days') or -since 5.3- an array (eg. ['range' => 'custom', 'time_unit' => 'day', 'time_quantity' => 7])
* @param bool $number_format Whether to format the number (eg. 9,999) or not (eg. 9999)
* @return string
*/
function jnews_get_views( $id = null, $range = null, $number_format = true ) {
$attr = array(
'id' => $id,
'range' => $range,
'number_format' => $number_format,
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$views = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' );
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$views = JNews_View_Counter()->counter->get_views( $id, $range, $number_format );
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}
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}
}
if ( ! function_exists( 'jnews_view_counter_query' ) ) {
/**
* Do Query
*
* @param $instance
* @return array
*/
function jnews_view_counter_query( $instance ) {
$query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $instance ) );
$query = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' );
if ( false === $query ) {
$query = JNews_View_Counter()->counter->query( $instance );
wp_cache_set( $query_hash, $query, 'jnews-view-counter' );
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}
}
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]]>यह त्यौहार प्रति वर्ष मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व उसकी पूर्वसंध्या पर 13 जनवरी को धूम-धाम से सिखों द्वारा पूरे विश्व में मनाया जाता है। लोहड़ी के दिन से कुछ दिन पहले से बालक एवं बालिकाएँ लोकगीत गाकर अपने मोहल्ले अथवा गाँव से लोहड़ी के लिए लकड़ी और उपले इकट्ठे करते हैं। इस अवसर पर विवाहिता महिलाओं के मयके से वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फलादि तथा अन्य उपहार भेजे जाते हैं।
लोहड़ी(Lohri ) मनाए जाने के पिछे वैसे तो कई मान्यताएं हैं, लेकिन सबसे प्रचलित लोककथा दुल्ला भट्टी से जुड़ी है।
कई वर्षों से लोग लोहड़ी पर्व को दूल्ला भट्टी नामक चरित्र से जोड़ते हैं। लोहड़ी के कई गीतों में इनके नाम का ज़िक्र आता है। कहते हैं कि मुगल शासक अकबर के काल में एक नौजवान था। कथा के अनुसार एक गरीब ब्राह्मण की दो बेटियाँ थी। जिनका नाम सुंदरी और मुंदरी था। वह दोनो बहुत सुंदर थी। ब्राह्मण ने उन दोनो का विवाह पास के गाँव में पक्का कर दिया। जब ब्राह्मण की बेटियों की सुंदरता के बारे में वहाँ के मुग़ल शासकों को पता चला तो उनकी नियत ख़राब हो गयी। इस बात का जब लड़के वालों को पता चला तो उन लोगों ने रिश्ता तोड़ दिया।
इस बात से परेशान ब्राह्मण अपनी क़िस्मत को कोसते हुए जब रास्ते में जा रहा था तो उसकी मुलाक़ात दुल्ला भट्टी से हुयी। दुल्ला भट्टी को जब सारी बात पता चली तो उसने ब्राह्मण को उसकी बेटियों का विवाह कराने का आश्वासन दिया और उन की बेटियों को अपनी लड़की माना। इसके बाद उसके सारे गाँव वालों को जंगल में इकट्ठा किया और एक जगह आग जला कर उन दोनो लड़कियों की शादी करवाई। ग़रीबी के कारण शादी के समय लड़कियों के कपड़े फटे पुराने थे। उस समय सभी गाँव वालों ने उन्हें दान दिया। दुल्ला भट्टी के पास केवल शक्कर होने के कारण उसने उन्हें शक्कर शगुन में दी। तब से यह त्यौहार मनाया जा रहा है।
लोहड़ी आने के कई दिनों पहले ही युवा एवम बच्चे लोहड़ी के गीत गाते हैं. पन्द्रह दिनों पहले यह गीत गाना शुरू कर दिया जाता हैं जिन्हें घर-घर जाकर गया जाता हैं. इन गीतों में वीर शहीदों को याद किया जाता हैं जिनमे दुल्ला भट्टी के नाम विशेष रूप से लिया जाता हैं
लोहड़ी के दिन शाम को आग जलाने के बाद उसमें तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी और मूंगफली लोहड़ी को अर्पित की जाती है। उसके बाद सुंदरिए-मुंदरिए हो, ओ आ गई लोहड़ी वे, जैसे पारंपरिक गीत अग्नि के गोल-गोल चक्कर लगाकर गाते हैं और ढोल-नगाड़े बजाते और नाचते हैं।
सुंदर मुंदरिए – हो
तेरा कौन विचारा-हो
दुल्ला भट्टी वाला-हो
दुल्ले ने धी ब्याही-हो
सेर शक्कर पाई-हो
कुडी दे बोझे पाई-हो
कुड़ी दा लाल पटाका-हो
कुड़ी दा शालू पाटा-हो
शालू कौन समेटे-हो
चाचा गाली देसे-हो
चाचे चूरी कुट्टी-हो
जिमींदारां लुट्टी-हो
जिमींदारा सदाए-हो
गिन-गिन पोले लाए-हो
इक पोला घिस गया जिमींदार वोट्टी लै के नस्स गया – हो!
आंध्र प्रदेश में मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व भोगी मनाया जाता है। इस दिन लोग पुरानी चीज़ों को बदलते हैं। वहीं आग जलाने के लिए लकड़ी, पुराना फ़र्नीचर आदि का भी इस्तेमाल करते हैं। इसमें धातु की चीज़ों को दहन नहीं किया जाता है। इस क्रिया के तहत लोग अपने सभी बुरे व्यसनों का त्याग करते हैं। इसे रुद्र गीता ज्ञान यज्ञ भी कहते हैं। यह आत्मा के बदलाव एवं उसके शुद्धिकरण का प्रतीक माना जाता है।
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