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Laabh Panchami 2023 – हिन्दू कैलेंडर का कार्तिक महीना तीज त्योहारों से भरा होता है। इसी माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को लाभ पंचमी या सौभाग्य पंचमी के रूप में मनाया जाता है। Laabh Panchami को सौभाग्य पंचमी, ज्ञान पंचमी और लेचनी पंचमी के नाम से भी जाना जाता है।

वैसे तो लाभ पंचमी का पर्व पूरे भारत में मनाया जाता है परंतु यह गुजरात राज्य का एक लोकप्रिय त्यौहार है। गुजरात में लाभ पंचमी को पाँच दिवसीय दीपावली उत्सव का समापन होता है। गुजराती नव वर्ष दीपावली के दूसरे दिन होता है अतः लाभ पंचमी का दिन गुजराती नववर्ष का पहला कामकाजी दिन होता है। गुजरात में अधिकतर व्यवसायी दिवाली के पश्चात  लाभ पंचमी के दिन वापस अपने काम को प्रारंभ करते हैं। इस दिन भक्त धन और समृद्धि के लिए भगवान शिव, लक्ष्मी जी और भगवान गणेश जी की पूजा अर्चना करते हैं। इसी दिन व्यापारी गण, नया बही खाता प्रारम्भ करते है।

लाभ पंचमी का महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लाभ पंचमी  दिन भगवान गणेश की उपासना करने से सौभाग्य की प्राप्ती होती है। कार्तिक शुक्ल पंचमी के दिन जो जातक पूरे भक्ति भाव से भगवान शिव, माता लक्ष्मी और गणेश जी को पूजता है उसकी सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। कुछ जगहों पर दीपावली के दिन नए साल की शुरुआत होती है और सौभाग्य पंचमी वाले दिन व्यापार और कारोबार में तरक्की-विस्तार के लिए शुभ माना जाता है।

Laabh Panchami 2023 दिनांक और शुभ मुहूर्त

दिनांक : 18 नवम्बर 2023
वार: शनिवार
पंचमी तिथि प्रारम्भ : 17 नवम्बर 2023 को 11:03 ए एम बजे
पंचमी तिथि समाप्त : 18 नवम्बर 2023 को 09:18 ए एम बजे
लाभ पंचमी पूजा शुभ मुहूर्त : प्रातःकाल 06:46 ए एम से 10:19 ए एम
अवधि : 03 घण्टे 34 मिनट्स

ये भी पढ़ें : प्रबोधिनि या देवउठनी एकादशी -महत्व, व्रत कथा और विधि

Laabh Panchami 2023 पूजन विधि

  • लाभ पंचमी के दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान आदि से निवृत होकर सर्वप्रथम भगवान सूर्य देव को जलाभिषेक करें।
  • इसके बाद भगवान शिव जी, लक्ष्मी जी और गणेश जी की प्रतिमा या तस्वीर को स्थापित कर पूजा प्रारम्भ करें। गणेश जी की प्रतिमा या तस्वीर ना हो तो सुपारी पर मौली लपेटकर चावल के अष्दल पर श्रीगणेश के रूप में विराजित कर सकते हैं।
  • एक कलश स्थापित कर उसमें द्रव्य, अक्षत आदि डालकर उसको लाल वस्त्र से ढँकें।
  • तत्पश्चात भगवान शिव जी को भस्म, बेलपत्र, धतूरा सफ़ेद अंगोछा अर्पित कर पूजा करें एवम भगवान गणेश जी की पूजा फल, फूल, चन्दन, अक्षत, दूर्वा आदि से करें। भगवान शिव जी को दूध से बने मिष्ठान एवम गणेश जी को मोदक का भोग लगाएं।
  • भोलेनाथ, माता लक्ष्मी और भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए नीचे दिए मंत्रो का जाप करें।

        गणेश मंत्र

         लम्बोदरं महाकायं गजवक्त्रं चतुर्भुजम्। आवाहयाम्यहं देवं गणेशं सिद्धिदायकम्।।

         शिव मंत्र 

          त्रिनेत्राय नमस्तुभ्यं उमादेहार्धधारिणे। त्रिशूलधारिणे तुभ्यं भूतानां पतये नम:।।

         लक्ष्मी गायत्री मंत्र

         ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥

 

  • मन्त्र स्मरण के पश्चात धुप, दीप से आरती करें। आरती सम्पन्न होने पर भगवान से सुख, शांति और समृद्धि की कामना करें।

इस प्रकार लाभ-पंचमी की कथा सम्पन्न हुई। प्रेम से बोलिए भगवान शिव जी, माता लक्ष्मी एवं गणेश जी की जय।

 

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Sawan 2022: पवित्र श्रावण मास में भोलेनाथ को प्रसन्न करने लिये सहज उपाय.. https://astrodeeva.com/sawan-2022-easy-way-to-please-bholenath-from-holy-shravan-month/ https://astrodeeva.com/sawan-2022-easy-way-to-please-bholenath-from-holy-shravan-month/#comments Fri, 15 Jul 2022 05:08:04 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3528 सनातन धर्म में भगवान भोलेनाथ से जुड़े कई पर्व मनाए जाते हैं और इनमें श्रावण मास (sawan 2022) यानी सावन का अपना अलग ही विशेष महत्व है। भगवान शिव को यह मास अत्यधिक प्रिय है व इस माह में भगवान शिव की पूजा करने से अच्छा व शुभ फल प्राप्त होता है। हम हमेशा से […]

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सनातन धर्म में भगवान भोलेनाथ से जुड़े कई पर्व मनाए जाते हैं और इनमें श्रावण मास (sawan 2022) यानी सावन का अपना अलग ही विशेष महत्व है। भगवान शिव को यह मास अत्यधिक प्रिय है व इस माह में भगवान शिव की पूजा करने से अच्छा व शुभ फल प्राप्त होता है।
हम हमेशा से भगवान शिव की पूजा अर्चना के बारे में ही सुनते आ रहे हैं कि शिव पूजन के बारे में कहा जाता है कि शिव पूजन में विधि विधान से मंत्रों का जाप करना अनिवार्य होता है , यदि आप विधि विधान से मंत्रों का जाप करते हैं तभी आपको इसका फल मिलता है। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है| भगवान भोलेनाथ सिर्फ यह देखते हैं कि जो व्यक्ति उनकी पूजा कर रहा है उसका मन कैसा है ,उसकी श्रद्धा का भाव कैसा है, भगवान शिव या कोई भी भगवान यह नहीं देखते हैं कि किसी व्यक्ति ने उनके मंत्र का कितनी बार जाप किया या उनकी पूजा पर कितना खर्चा किया। अगर हम सही शब्दों में जाने तो भगवान भोलेनाथ यह देखते हैं कि इंसान की भक्ति का भाव कैसा है और वह कैसी भावना रखता है अगर उसकी भावना अच्छी होगी तो भगवान भोलेनाथ अवश्य प्रसन्न होंगे और उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण करेंगे |
भगवान के भक्त सच्चे मन से बिना मंत्र पढ़े भी सभी पूजन सामग्री अर्पित कर सकते हैं। उसके लिए उसमें सच्ची श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए।
अगर हम सच्ची श्रद्धा और भक्ति से एक फूल भी भगवान को अर्पित करते हैं  तो सारे पूज्य देवी- देवता व भोलेनाथ हमारे सभी कार्य सिद्ध करने के लिए मदद करते हैं और हमारा साथ देते हैं | हम जब खुद की रक्षा करेंगे तो भगवान भोलेनाथ हमारी स्वयं रक्षा करेंगे| भगवान भोलेनाथ ने स्वयं कहा है –
“न मे प्रियष्चतुर्वेदी मद्भभक्तः ष्वपचोऽपि यः।
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम्।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तस्याहं न प्रणस्यामि स च मे न प्रणस्यति। “
(अर्थात: जो भक्त सच्चे मन ,श्रद्धा और भक्ति भाव से बिना किसी वैदिक मंत्र का जाप किए भगवान शिव को सिर्फ एक पुष्प अथवा जल समर्पित करता है भगवान शिव उस व्यक्ति से भी उतना ही प्रसन्न होते हैं जितना कि किसी वैदिक मंत्रों के उच्चारण करने वाले व्यक्ति से खुश होते हैं।भगवान शिव कभी उस व्यक्ति की नजरों से दूर नहीं होते और न ही वह व्यक्ति भगवान शिव की नजरों से कभी दूर होता है। भगवान शिव एवं सभी देवी देवताओं के लिए किसी भी मंत्र के जाप से ज्यादा सच्चे मन से की जाने वाली पूजा ज्यादा मायने रखती है।)

sawan 2022 पूजा -अर्चना की विधि:

1. भगवान शिव का दूध, दही, शहद , और मिश्री, मिलाकर जलाभिषेक करें।
2. भगवान शिव को पांच प्रकार के फल चढ़ाएं।
3. भगवान शिव को धतूरा अर्पित करें व चंदन से तिलक करें।
4. भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करें और उस बेलपत्र पर ओम नमः शिवाय या राम लिखकर अर्पित करें।
5. भगवान शिव की चालीसा और आरती करें।

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Lord Shiva : भगवान शिव से जुड़ी 12 रोचक बातें और उनके पिछे के अर्थ https://astrodeeva.com/lord-shiva-12-interesting-things-related-to-lord-shiva-and-their-meaning-behind-them/ https://astrodeeva.com/lord-shiva-12-interesting-things-related-to-lord-shiva-and-their-meaning-behind-them/#comments Mon, 14 Mar 2022 07:50:16 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2966 Interesting Facts of Lord Shiva : भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनकी वेश-भूषा व उनसे जुड़े तथ्य उतने ही विचित्र हैं। शिव श्मशान में निवास करते हैं, गले में नाग धारण करते हैं, भांग व धतूरा ग्रहण करते हैं। आदि न जाने कितने रोचक तथ्य इनके साथ जुड़े हैं। आज हम आपको भगवान शिव से […]

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Interesting Facts of Lord Shiva : भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनकी वेश-भूषा व उनसे जुड़े तथ्य उतने ही विचित्र हैं। शिव श्मशान में निवास करते हैं, गले में नाग धारण करते हैं, भांग व धतूरा ग्रहण करते हैं। आदि न जाने कितने रोचक तथ्य इनके साथ जुड़े हैं। आज हम आपको भगवान शिव से जुड़ी ऐसी ही रोचक बातें व इनमें छिपे लाइफ मैनेजमेंट के सूत्रों के बारे में बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-

1- क्यों हैं भगवान शिव की तीन आंखें (Why does Lord Shiva have three eyes?)

धर्म ग्रंथों के अनुसार सभी देवताओं की दो आंखें हैं, लेकिन एकमात्र शिव ही ऐसे देवता हैं जिनकी तीन आंखें हैं। तीन आंखों वाला होने के कारण इन्हें त्रिनेत्रधारी भी कहते हैं। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो शिव का तीसरा नेत्र प्रतीकात्मक है। आंखों का काम होता है रास्ता दिखाना और रास्ते में आने वाली मुसीबतों से सावधान करना। जीवन में कई बार ऐसे संकट भी आ जाते हैं, जिन्हें हम समझ नहीं पाते। ऐसे समय में विवेक और धैर्य ही एक सच्चे मार्गदर्शक के रूप में हमें सही-गलत की पहचान कराता है। यह विवेक अत:प्रेरणा के रूप में हमारे अंदर ही रहता है। बस ज़रुरत है उसे जगाने की। भगवान शिव का तीसरा नेत्र आज्ञा चक्र का स्थान है। यह आज्ञा चक्र ही विवेक बुद्धि का स्रोत है। यही हमें विपरीत परिस्थिति में सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है।

2- शिव अपने शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं ( Why does Lord Shiva apply ash on his body?)

हमारे धर्म शास्त्रों में जहां सभी देवी-देवताओं को वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है वहीं भगवान शंकर को सिर्फ मृग चर्म (हिरण की खाल) लपेटे और भस्म लगाए बताया गया है। भस्म शिव का प्रमुख वस्त्र भी है क्योंकि शिव का पूरा शरीर ही भस्म से ढंका रहता है। शिव का भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक कारण भी हैं। भस्म की एक विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इसका मुख्य गुण है कि इसको शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती। भस्मी त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम करती है। भस्मी धारण करने वाले शिव यह संदेश भी देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है।

3- भगवान शिव के हाथ में त्रिशूल क्यों (Why Shiva always carry Trishul?)

त्रिशूल भगवान शिव का प्रमुख अस्त्र है। यदि त्रिशूल का प्रतीक चित्र देखें तो उसमें तीन नुकीले सिरे दिखते हैं। यूं तो यह अस्त्र संहार का प्रतीक है पर वास्तव में यह बहुत ही गूढ़ बात बताता है। संसार में तीन तरह की प्रवृत्तियां होती हैं- सत, रज और तम। सत मतलब सात्विक, रज मतलब सांसारिक और तम मतलब तामसी अर्थात निशाचरी प्रवृति। हर मनुष्य में ये तीनों प्रवृत्तियां पाई जाती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इनकी मात्रा में अंतर होता है। त्रिशूल के तीन नुकीले सिरे इन तीनों प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। त्रिशूल के माध्यम से भगवान शिव यह संदेश देते हैं कि इन गुणों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण हो। यह त्रिशूल तभी उठाया जाए जब कोई मुश्किल आए। तभी इन तीन गुणों का आवश्यकतानुसार उपयोग हो।

4- भगवान शिव ने क्यों पीया था जहर (Why did Lord Shiva drink poison?)

देवताओं और दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से निकला विष भगवान शंकर ने अपने कंठ में धारण किया था। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। समुद्र मंथन का अर्थ है अपने मन को मथना, विचारों का मंथन करना। मन में असंख्य विचार और भावनाएं होती हैं उन्हें मथ कर निकालना और अच्छे विचारों को अपनाना। हम जब अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही निकलेंगे। यही विष हैं, विष बुराइयों का प्रतीक है। शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया। उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। शिव का विष पीना हमें यह संदेश देता है कि हमें बुराइयों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। बुराइयों का हर कदम पर सामना करना चाहिए। शिव द्वारा विष पीना यह भी सीख देता है कि यदि कोई बुराई पैदा हो रही हो तो हम उसे दूसरों तक नहीं पहुंचने दें।

5- क्यों है भगवान शंकर का वाहन बैल(Why is the bullock the vehicle of Lord Shankar?)

भगवान शंकर का वाहन नंदी यानी बैल है। बैल बहुत ही मेहनती जीव होता है। वह शक्तिशाली होने के बावजूद शांत एवं भोला होता है। वैसे ही भगवान शिव भी परमयोगी एवं शक्तिशाली होते हुए भी परम शांत एवं इतने भोले हैं कि उनका एक नाम ही भोलेनाथ जगत में प्रसिद्ध है। भगवान शंकर ने जिस तरह काम को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त की थी, उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता। उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है।

साथ ही नंदी पुरुषार्थ का भी प्रतीक माना गया है। कड़ी मेहनत करने के बाद भी बैल कभी थकता नहीं है। वह लगातार अपने कर्म करते रहता है। इसका अर्थ है हमें भी सदैव अपना कर्म करते रहना चाहिए। कर्म करते रहने के कारण जिस तरह नंदी शिव को प्रिय है, उसी प्रकार हम भी भगवान शंकर की कृपा पा सकते हैं।

Also Read: शिव चालीसा हिंदी अर्थ सहित

6- क्यों है भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा (Why is the moon on Lord Shiva’s head?)

भगवान शिव का एक नाम भालचंद्र भी प्रसिद्ध है। भालचंद्र का अर्थ है मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाला। चंद्रमा का स्वभाव शीतल होता है। चंद्रमा की किरणें भी शीतलता प्रदान करती हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव कहते हैं कि जीवन में कितनी भी बड़ी समस्या क्यों न आ जाए, दिमाग हमेशा शांत ही रखना चाहिए। यदि दिमाग शांत रहेगा तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल भी निकल आएगा। ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना गया है। मन की प्रवृत्ति बहुत चंचल होती है। भगवान शिव का चंद्रमा को धारण करने का अर्थ है कि मन को सदैव अपने काबू में रखना चाहिए। मन भटकेगा तो लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पाएगी। जिसने मन पर नियंत्रण कर लिया, वह अपने जीवन में कठिन से कठिन लक्ष्य भी आसानी से पा लेता है।

7- भगवान शिव को क्यों कहते श्मशान का निवासी (Why is Lord Shiva called a resident of the crematorium?)

भगवान शिव को वैसे तो परिवार का देवता कहा जाता है, लेकिन फिर भी श्मशान में निवास करते हैं। भगवान शिव के सांसारिक होते हुए भी श्मशान में निवास करने के पीछे लाइफ मैनेजमेंट का एक गूढ़ सूत्र छिपा है। संसार मोह-माया का प्रतीक है जबकि श्मशान वैराग्य का। भगवान शिव कहते हैं कि संसार में रहते हुए अपने कर्तव्य पूरे करो, लेकिन मोह-माया से दूर रहो। क्योंकि ये संसार तो नश्वर है। एक न एक दिन ये सबकुछ नष्ट होने वाला है। इसलिए संसार में रहते हुए भी किसी से मोह मत रखो और अपने कर्तव्य पूरे करते हुए वैरागी की तरह आचरण करो।

8- भगवान शिव गले में क्यों धारण करते हैं नाग (Why does Lord Shiva wear a snake around his neck?)

भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनका वस्त्र व आभूषण भी उतने ही विचित्र हैं। सांसारिक लोग जिनसे दूर भागते हैं। भगवान शिव उसे ही अपने साथ रखते हैं। भगवान शिव एकमात्र ऐसे देवता हैं जो गले में नाग धारण करते हैं। देखा जाए तो नाग बहुत ही खतरनाक प्राणी है, लेकिन वह बिना कारण किसी को नहीं काटता। नाग पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण जीव है। जाने-अंजाने में ये मनुष्यों की सहायता ही करता है। कुछ लोग डर कर या अपने निजी स्वार्थ के लिए नागों को मार देते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव नाग को गले में धारण कर ये संदेश देते हैं कि जीवन चक्र में हर प्राणी का अपना विशेष योगदान है। इसलिए बिना वजह किसी प्राणी की हत्या न करें। द्वादश ज्योतिर्लिंग कथा, स्तोत्रम्  और स्थान

9- भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं भांग-धतूरा (Why is hemp-datura offered to Lord Shiva?)

भगवान शिव को भांग-धतूरा मुख्य रूप से चढ़ाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान को भांग-धतूरा चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं। भांग व धतूरा नशीले पदार्थ हैं। आमजन इनका सेवन नशे के लिए करते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के अनुसार भगवान शिव को भांग-धतूरा चढ़ाने का अर्थ है अपनी बुराइयों को भगवान को समर्पित करना। यानी अगर आप किसी प्रकार का नशा करते हैं तो इसे भगवान को अर्पित करे दें और भविष्य में कभी भी नशीले पदार्थों का सेवन न करने का संकल्प लें। ऐसा करने से भगवान की कृपा आप पर बनी रहेगी और जीवन सुखमय होगा।

10- भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं बिल्व पत्र (Why do we offer Bilva leaves to Shiva?)

शिवपुराण आदि ग्रंथों में भगवान शिव को बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व बताया गया है। 3 पत्तों वाला बिल्व पत्र ही शिव पूजन में उपयुक्त माना गया है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बिल्वपत्र के तीनों पत्ते कहीं से कटे-फटे न हो। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो बिल्व पत्र के ये तीन पत्ते चार पुरुषार्थों में से तीन का प्रतीक हैं- धर्म, अर्थ व काम। जब आप ये तीनों निस्वार्थ भाव से भगवान शिव को समर्पित कर देते हैं तो चौथा पुरुषार्थ यानी मोक्ष अपने आप ही प्राप्त हो जाता है।

11- कैलाश पर्वत क्यों है भगवान शिव को प्रिय (Why is Mount Kailash the favorite abode of Shiva?)

शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं। पर्वतों पर आम लोग नहीं आते-जाते। सिद्ध पुरुष ही वहां तक पहुंच पाते हैं। भगवान शिव भी कैलाश पर्वत पर योग में लीन रहते हैं। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो पर्वत प्रतीक है एकांत व ऊंचाई का। यदि आप किसी प्रकार की सिद्धि पाना चाहते हैं तो इसके लिए आपको एकांत स्थान पर ही साधना करनी चाहिए। ऐसे स्थान पर साधना करने से आपका मन भटकेगा नहीं और साधना की उच्च अवस्था तक पहुंच जाएगा।स्कंद पुराण के अनुसार यहाँ है भगवान शिव की आरामगाह

12- क्यों है भूत-प्रेत शिव के गण (Why are the ghosts and spirits of Lord Shiva gan?)

शिव को संहार का देवता कहा गया है। अर्थात जब मनुष्य अपनी सभी मर्यादाओं को तोडऩे लगता है तब शिव उसका संहार कर देते हैं। जिन्हें अपने पाप कर्मों का फल भोगना बचा रहता है वे ही प्रेतयोनि को प्राप्त होते हैं। चूंकि शिव संहार के देवता हैं। इसलिए इनको दंड भी वे ही देते हैं। इसलिए शिव को भूत-प्रेतों का देवता भी कहा जाता है। दरअसल यह जो भूत-प्रेत है वह कुछ और नहीं बल्कि सूक्ष्म शरीर का प्रतीक है। भगवान शिव का यह संदेश है कि हर तरह के जीव जिससे सब घृणा करते हैं या भय करते हैं वे भी शिव के समीप पहुंच सकते हैं, केवल शर्त है कि वे अपना सर्वस्व शिव को समर्पित कर दें।

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Mahashivratri 2022: महाशिवरात्रि के दिन बन रहा है विशेष योग, इस तरह पूजा करने से मिलता है कई गुना ज्यादा फल https://astrodeeva.com/mahashivratri-2022-special-yoga-is-being-made-on-the-day-of-mahashivratri-worshiping-in-this-way-gives-many-times-more-fruit/ https://astrodeeva.com/mahashivratri-2022-special-yoga-is-being-made-on-the-day-of-mahashivratri-worshiping-in-this-way-gives-many-times-more-fruit/#comments Sun, 27 Feb 2022 19:48:38 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2923 Mahashivratri 2022: देशभर में भगवान शिव की आराधना का पर्व महाशिवरात्रि की तैयारियां शुरू हो गई हैं। वर्ष में एक बार आने वाली महाशिवरात्रि का इंतजार शिवभक्तों को पूरे वर्ष रहता है। इस पर्व को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है और इस दिन शिव मंदिरों में भक्तों का तांता लगा नजर आता है। […]

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Mahashivratri 2022: देशभर में भगवान शिव की आराधना का पर्व महाशिवरात्रि की तैयारियां शुरू हो गई हैं। वर्ष में एक बार आने वाली महाशिवरात्रि का इंतजार शिवभक्तों को पूरे वर्ष रहता है। इस पर्व को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है और इस दिन शिव मंदिरों में भक्तों का तांता लगा नजर आता है। शिवभक्त भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए उपवास समेत कई उपाय करते हैं। ऐसी मान्यता है कि महाशिवरात्रि की पूजा अगर शुभ मुहूर्त में की जाए तो कई गुना फल प्राप्त होता है। इस बार महाशिवरात्रि के दिन विशेष योग भी बन रहा है और इस योग में पूजा करने से फल में वृद्धि होती है।

ज्योतिष के अनुसार इस वर्ष महाशिवरात्रि के एक दिन पूर्व यानि 28 फरवरी को सोम प्रदोष व्रत रहेगा। 1 मार्च को महाशिवरात्रि और 2 मार्च को अमावस्या का विशेष पूजन अनुष्ठान संपन्न होगा। इस बार महाशिवरात्रि पर पंचग्रही योग के साथ ही केदार योग का महासंयोग निर्मित हो रहा है। इस महासंयोग में की गई महादेव की आराधना पुण्यफलदायी और सर्वमनोरथ को पूर्ण करने वाली होगी।

पंच ग्रहों के योग का महासंयोग

सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाला इस बार महाशिवरात्रि पर पंच ग्रहों के योग का महासंयोग और दो महाशुभ योग बन रहे हैं, मंगलवार को मकर राशि में शुक्र, मंगल, बुध, चंद्र, शनि के संयोग के साथ ही केदार योग भी बनेगा, जो पूजा उपासना के लिए विशेष कल्याणकारी है।

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महाशिवरात्रि शुभ मुहूर्त 2022 (Mahashivratri 2022 )

दिनांक : 01 मार्च 2022
वार : मंगलवार
निशीथ काल पूजा मुहूर्त: रात्रि 12:08 ए एम से 12:08 ए एम तक
महाशिवरात्रि पारणा मुहूर्त : 02 मार्च 2022 को सुबह 06 बजकर 45 मिनट

चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ – 01 मार्च 2022 को 03:16 ए एम बजे
चतुर्दशी तिथि समाप्त – 02 मार्च 2022 को 01:00 ए एम बजे

कैसे करें महाशिवरात्रि की पूजा :- महाशिवरात्रि के दिन प्रातः स्नान आदि करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा आरंभ करें अगर उपवास ले रहे हैं तो नियमों का पूरी कठोरता के साथ पालन करें तभी फल की प्राप्ति होगी। इसके साथ ही महाशिवरात्रि के व्रत का पारण भी विधि पूर्वक करना चाहिए। सूर्योदय और चतुर्दशी तिथि के अस्त होने के मध्य समय में ही व्रत का पारण कर लेना चाहिए।

हर प्रहर में होती है पूजा :- वैसे तो अधिकतर लोग महाशिवरात्रि की पूजा प्रातः करते हैं। लेकिन इस दिन चार बार भगवान शिव की पूजा करने का विधान है। मान्यता है कि भोलेनाथ की पूजा अगर संभव हो तो रात के समय एक बार या फिर चार बार जरूर करनी चाहिए। इस दिन हर प्रहर में भोलेनाथ की पूजा-अर्चना की जाती है।

रात्रि प्रथम प्रहर पूजा समय – 06:21 पी एम से 09:27 पी एम
रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा समय – 09:27 पी एम से 12:33 ए एम, मार्च 02
रात्रि तृतीय प्रहर पूजा समय – 12:33 ए एम से 03:39 ए एम, मार्च 02
रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा समय – 03:39 ए एम से 06:45 ए एम, मार्च 02

Disclaimer: इस स्टोरी में दी गई सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं। Astrodeeva Portal किसी भी अंधविश्वास और इन तथ्यों की किसी प्रकार से कोई पुष्टि नहीं करता है। इन तथ्यों पर अमल करने से पहले संबंधित ज्योतिषी, आचार्य तथा विशेषज्ञ से संपर्क करें। 

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Dev Diwali 2021: देव दीपावली कब और वाराणसी में क्यों मनायी जाती है ? https://astrodeeva.com/dev-diwali-2021-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5-%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3/ https://astrodeeva.com/dev-diwali-2021-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5-%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3/#respond Wed, 17 Nov 2021 00:28:07 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2676 देव दीपावली ( Dev Diwali )या देवताओं की दीपावली हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। हिन्दू कैलंडर के अनुसार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व दीपावली के 15 दिन के बाद मनाया जाता है। इस पर्व के दिन उत्तर प्रदेश के धार्मिक शहर वाराणसी(काशी) की रौनक़ […]

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देव दीपावली ( Dev Diwali )या देवताओं की दीपावली हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। हिन्दू कैलंडर के अनुसार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व दीपावली के 15 दिन के बाद मनाया जाता है। इस पर्व के दिन उत्तर प्रदेश के धार्मिक शहर वाराणसी(काशी) की रौनक़ देखते ही बनती है। देव दिवाली देवताओं का त्योहार है, इस दिन माँ गंगा और भोलेनाथ की बड़े धूम-धाम के पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है की इस दिन सभी देवी देवता भगवान शिव के विजयोत्सव को मनाने पृथ्वी पर आए थे और इस दिन को दीपावली उत्सव की तरह मनाया था।

देव दीपावली 2021 ( Dev Diwali 2021)

दिनांक – 18 नवंबर 2021
वार – बृहस्पतिवार
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ – 18 नवंबर 2021 को 12:00 पी एम बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त – 19 नवंबर 2021  को 02:26 पी एम बजे
प्रदोषकाल देव दीपावली मुहूर्त – 05:09 पी एम से 07:47 पी एम
अवधि – 02 घण्टे 38 मिनट्स

देव दीपावली व्रत कथा ( Legend of Dev Diwali )

पौराणिक कथा के अनुसार, शिव जी और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर नामक राक्षस का वध कर दिया तो उसका बदला लेने के लिए उसके तीन पुत्र तारकाक्ष, कमलाक्ष औऱ विद्युन्माली ने ब्रह्मा जी की तपस्या की और उन्हें प्रसन्न करके उनसे अमर होने का वरदान मांगा परंतु ब्रह्मा जी ने उन्हें यह वरदान देने से मना कर दिया। ब्रह्मा जी ने कहा कि तुम इसकी जगह कुछ और वरदान मांग लो इसके बाद तारकासुर के पुत्रों ने कहा “आप हमें वरदान दीजिए की आप हमारे नाम के नगर बनायेंगे और हम तीनो भाइयों का वध एक ही तीर से हो। ब्रह्मा जी ने उन्हें तथास्तु कह दिया।

ब्रह्मा जी से वरदान पाने के बाद तारकासुर के तीनों पुत्रों ने तीनों लोकों पर कब्जा कर लिया। और देवी देवताओं पर अत्याचार करने लगे। उनके अत्याचार से मुक्ति पाने के लिए सभी देवी देवता भगवान शिव के पास पहुंचे और भोलेनाथ को सारा वृत्तांत बताया । उन्होंने तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली का वध कर उनके अत्याचारों से मुक्ति प्रदान करने के लिए प्रार्थना की। तब भोलेनाथ ने देव विश्वकर्मा से एक रथ का निर्माण करवाया और उस दिव्य रथ पर सवार होकर भगवान शिव दैत्यों का वध करने निकले। देव और राक्षसों के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया और जब युद्ध के दौरान तीनों दैत्य यानि त्रिपुरा एक साथ आए तो भगवान शंकर ने एक ही तीर से ही तीनों का वध कर दिया। इसके बाद से ही भोलेनाथ को त्रिपुरारी कहा जाने लगा। तब देवताओं ने भोलेनाथ की विजय की खुशी में उनकी नगरी काशी नगरी वाराणसी(काशी) में दीप दान किया। कहते हैं तभी से वाराणसी(काशी) में कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव-दिवाली मनाने की परंपरा चली आ रही है।

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देव दीपावली पर क्या करें?

इस त्योहार पर, भक्त प्रातःकाल पवित्र गंगा नदी में स्नान करते हैं जिसे कार्तिक स्नान के रूप में जाना जाता है। इसके बाद भक्त पहले भगवान गणेश जी की फिर भगवान शिव और भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करते है। भगवान शिव को इस दिन पूजा में पुष्प, घी, नैवेद्य, बेलपत्र और भगवान विष्णु को पूजा में पीले फूल, नैवेद्य, पीले वस्त्र, पीली मिठाई अर्पित करते हैं। इसके बाद दीप दान किया जाता है, अर्थात् देवी गंगा को श्रद्धा के प्रतीक के रूप में दीपक अर्पित किए जाते हैं।

वाराणसी की गंगा आरती इस धार्मिक त्योहार का एक प्रमुख आकर्षण है, जो 24 पुजारियों और 24 युवा लड़कियों द्वारा अत्यंत पवित्रता और भक्ति के साथ किया जाता है।

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भोलेनाथ के 7 चमत्कारिक मंदिर, जहां दर्शन मात्र से होती है भक्तों की मुरादें पूरी https://astrodeeva.com/7-miracle-temples-of-shiv/ https://astrodeeva.com/7-miracle-temples-of-shiv/#comments Mon, 10 May 2021 02:56:21 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2033 हिन्द मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव सर्वोच्च शक्तिमान है। प्राचीन धार्मिक शास्त्रों में शिव को भैरव या नटराज के रूप में एक उग्र देवता के रूप में भी वर्णित किया गया है। भारत देश में कश्मीर से कन्याकुमारी और सौराष्ट्र से लेकर असम तक, बुराइयों को नष्ट करने और मासूमों को बचाने वाले के रूप […]

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हिन्द मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव सर्वोच्च शक्तिमान है। प्राचीन धार्मिक शास्त्रों में शिव को भैरव या नटराज के रूप में एक उग्र देवता के रूप में भी वर्णित किया गया है। भारत देश में कश्मीर से कन्याकुमारी और सौराष्ट्र से लेकर असम तक, बुराइयों को नष्ट करने और मासूमों को बचाने वाले के रूप में उनकी अलग-अलग रूपों में पूजा की जाती है। भगवान शिव की अगर किसी पर कृपा हो जाये तो वह मनुष्य का जीवन फलीभूत हो जाता है और वो इस संसार के सारे ही सांसारिक सुख भोगता है। इसलिए शिवजी की कृपा पाने के लिए मनुष्य भोलेनाथ के मंदिरों के चक्कर लगता है।

हिन्दू शास्त्रों में भगवान शिव बहुत ही भोले माने गए हैं और वह अपने भक्तों द्वारा सच्चे मन से की गयी भक्ति से आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं। यही कारण है कि देश के इन 7 मंदिरों में कहते हैं कि यदि मनुष्य सच्चे और निश्छल भाव से शिव जी का दर्शन कर ले तो उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। तो आइए आपको बताएं ये प्रमुख 7 मंदिर कौन से हैं

केदारनाथ मंदिर

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में स्थित केदारनाथ का मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह चार धाम यात्रा में से भी एक माना जाता है। उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ-ये दो प्रधान तीर्थ हैं, दोनो के दर्शन का बड़ा ही माहात्म्य है। मान्यता है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल हो जाती है। शास्त्रों लिखा है कि केदारनाथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों का नाश कर भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण करता है।

अमरनाथ गुफा

जम्मू-कश्मीर में स्थित अमरनाथ गुफा हिंदुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल है और यहां दर्शन करना बहुत ही पुण्यदायी माना गया है। यह मंदिर एक गुफा के रूप स्थित है। पवित्र गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग का निर्मित होना है। प्राकृतिक बर्फ से निर्मित होने के कारण इसे स्वयंभू बर्फ का शिवलिंग भी कहते हैं प्रतिवर्ष यह शिवलिंग लगभग 10 फुट ऊचा बनता है। आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक पूरे सावन महीने में होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए लाखो लोग यहां की यात्रा करते है। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इस बर्फ का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। श्रावण पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार में आ जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव ने इसी गुफा में माता पार्वती को अमर कथा सुनाई थी।

सोमनाथ मंदिर

गुजरात  के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे स्थित सोमनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों से एक है। यह ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु विश्व का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। सोमनाथ-ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कंद पुराणादि में उल्लेखित है। चन्द्रदेव का एक नाम सोम भी है। उन्होंने भगवान शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी इसीलिए इसका नाम ‘सोमनाथ’ हो गया।

ओंकारेश्वर मंदिर

ओंकारेश्वर मंदिर मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप खंडवा में नर्मदा के तट पर स्थित है। भोलेनाथ के 12 ज्योतिर्लिंगों में ओमकारेश्वर मंदिर को प्रमुख शिव मंदिर में गिना जाता है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है। चार धाम यात्रा के बाद यहां ओमारेश्वर महादेव का दर्शन करना जरूरी होता है, तभी चार धाम यात्रा का पुण्य मिलता है।

त्रयंबकेश्वर मंदिर

महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के किनारे स्थित त्रयंबकेश्वर मंदिर हिंदुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है। काले पत्थरों से बना ये मंदिर चमत्कारिक माना गया है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में विराजित होना पड़ा। इसी स्थान पर कालसर्प दोष निवारण हेतु पूजा की जाती है और मान्यता हैं यहां से शिवजी का कोई भक्त खाली हाथ नहीं लौटता।

दक्षेश्वर महादेव मंदि

उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित कनखल में दक्षेश्वर मंदिर अपनी आस्था और चमत्कार के लिए जाना जाता है। शास्त्रों के अनुसार ये वहीं मंदिर है जहां राजा दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें सभी देवी-देवताओं, ऋषियों और संतों को तो आमंत्रित किया गया था परंतु भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया गया था। मान्यता है कि जो व्यक्ति दक्षेश्वर महादेव स्थित शिवलिंग का जलाभिषेक करता है, उसे अन्य स्थान पर जल चढ़ाने से कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है।

अरुणाचलेश्वर मंदिर

तमिलनाडु के तिरुवनमलाई जिले में शिव का अनूठा मंदिर है। अन्नामलाई पर्वत की तराई में स्थित इस मंदिर को अनामलार या अरुणाचलेश्वर शिव मंदिर कहा जाता है। यहां हर पूर्णिमा को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। खासतौर पर कार्तिक पूर्णिमा पर विशाल मेला लगता है। श्रद्धालु यहां अन्नामलाई पर्वत की 14 किलोमीटर लंबी परिक्रमा कर शिव से कल्याण की मन्नत मांगते हैं। माना जाता है कि यह शिव का विश्व में सबसे बड़ा मंदिर है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार ब्रह्माजी ने हंस का रूप धारण किया और शिवजी के शीर्ष को देखने के लिए उड़ान भरी। उसे देखने में असमर्थ रहने पर ब्रह्माजी ने एक केवड़े के पुष्प से, जो शिवजी के मुकुट से नीचे गिरा था, शिखर के बारे में पूछा। फूल ने कहा कि वह तो चालीस हजार साल से गिरा पड़ा है। ब्रह्माजी को लगा कि वे शीर्ष तक नहीं पहुंच पाएंगे, तब उन्होंने फूल को यह झूठी गवाही देने के लिए राजी कर लिया कि ब्रह्माजी ने शिवजी का शीर्ष देखा था। शिवजी इस धोखे पर गुस्सा हो गए और ब्रह्माजी को शाप दिया कि उनका कोई मंदिर धरती पर नहीं बनेगा। वहीं केवड़े के फूल को शाप दिया कि वह कभी भी शिव पूजा में इस्तेमाल नहीं होगा। मान्यता है कि जहां शिवजी ने ब्रह्माजी को शाप दिया था, वह स्थल तिरुवनमलाई है।

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Mallikarjuna Jyotirlinga: मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा https://astrodeeva.com/mallikarjuna-jyotirlinga-%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%a8-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0/ https://astrodeeva.com/mallikarjuna-jyotirlinga-%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%a8-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0/#respond Mon, 01 Feb 2021 05:26:05 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1668 मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (Mallikarjuna Jyotirlinga) आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं। स्कंदपुराण में श्री शैल काण्ड नाम का अध्याय है। इसमें […]

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मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (Mallikarjuna Jyotirlinga) आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं। स्कंदपुराण में श्री शैल काण्ड नाम का अध्याय है। इसमें उपरोक्त मंदिर का वर्णन है। इससे इस मंदिर की प्राचीनता का पता चलता है। कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जहां पर यह ज्योतिर्लिंग है, उस पर्वत पर आकर शिव का पूजन करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होते हैं।

तमिल संतों ने भी प्राचीन काल से ही इसकी स्तुति गायी है। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने जब इस मंदिर की यात्रा की, तब उन्होंने शिवनंद लहरी की रचना की थी। श्री शैलम का सन्दर्भ प्राचीन हिन्दू पुराणों और ग्रंथ महाभारत में भी आता है।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा ( Story of Mallikarjuna Jyotirlinga)

एक बार विवाह को लेकर कार्तिकेय और अग्रपूज्य गणेश जी में विवाद हो गया। तब भगवान शिव और पार्वती माता ने पहले गणेश जी का विवाह करने का निर्णय लिया। जिससे कुमार कार्तिकेय माता पिता से रुष्ट होकर क्रौञ्च पर्वत पर चले गए और शिव पार्वती के अनुरोध करने पर भी वापस नहीं लौटे तथा वहाँ से भी 12 कोस दूर चले गए। तब शिव पार्वती ज्योतिर्मय स्वरुप धारण करके वहीँ प्रतिष्ठित हो गए। वे दोनों पुत्र स्नेह के कारण विशेष तिथियों में अपने पुत्र कुमार को देखने के लिए उनके पास जाया करते हैं।

अमावस्या के दिन भगवान भोलेनाथ स्वयं वहाँ जाते हैं और पूर्णिमा के दिन पार्वती जी वहाँ जाती हैं। उसी दिन से भगवान शिव का मल्लिकार्जुन नामक शिवलिंग संसार में प्रसिद्ध हुआ। मल्लिका का अर्थ पार्वती है और अर्जुन भगवान शिव का ही एक नाम है। इस ज्योतिर्लिंग का जो भी दर्शन पूजन करता है वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और मनोवांछित फल पाता है।

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स्कंद पुराण के अनुसार यहाँ है भगवान शिव की आरामगाह

Somnath Ji : कथा सोमनाथ की

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Somnath Ji : कथा सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की https://astrodeeva.com/somnath-ji-%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%95%e0%a5%80/ https://astrodeeva.com/somnath-ji-%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%95%e0%a5%80/#respond Mon, 25 Jan 2021 03:17:25 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1656 सोमनाथ ( Somnath ji) ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु विश्व का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में वेरावल बंदरगाह में स्थित है। इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्र देव ने किया था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। सोमनाथ (Somnath ji) मंदिर […]

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सोमनाथ ( Somnath ji) ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु विश्व का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में वेरावल बंदरगाह में स्थित है। इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्र देव ने किया था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।

सोमनाथ (Somnath ji) मंदिर पितृगणों के श्राद्ध, नारायण बलि आदि धार्मिक कर्म-कांडों के लिए भी प्रसिद्ध है। चैत्र, भाद्रपद, कार्तिक माह में यहाँ श्राद्ध करने का विशेष महत्व बताया गया है। इसी कारण इन तीन महीनों में यहां श्रद्धालुओं की बडी भीड़ लगती है। इसके अलावा यहां तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती का महासंगम होता है। इस त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्व है।

सोमनाथ कथा ( Story of Somnath )

शिव पुराण के अनुसार प्रजापति दक्ष ने अपनी सत्ताईस कन्याओं का विवाह चन्द्रमा के साथ किया था। चन्द्रमा को पति रूप में पाकर दक्ष कन्यायें अत्यंत प्रसन्न हुईं और चन्द्रमा भी उन्हें पत्नी रूप में पाकर अत्यंत संतुष्ट हुए। सभी पत्नियों में चन्द्रमा को रोहिणी विशेष प्रिय थी। इससे दूसरी स्त्रियों को बड़ा दुःख हुआ। वे सब अपने पिता दक्ष की पास गयीं और उनसे अपना दुःख सुनाया। उनकी बात सुनकर दक्ष भी दुखी हो गए और चन्द्रमा के पास जाकर उनसे प्रार्थना करते हुए बोले – “हे कलानिधे ! तुम निर्मल कुल में उत्पन्न हुए हो। तुम्हारी जितनी भी पत्नियाँ हैं उन सबके प्रति तुम्हारे मन में अलग अलग भाव क्यों हैं ? तुम किसी को अधिक और किसी को कम प्रेम क्यों करते हो ? अब तक जो किया सो किया अब आगे फिर कभी ऐसा भेदभावपूर्ण बर्ताव तुम्हें नहीं करना चाहिए। “ अपने दामाद चन्द्रमा से ऐसी प्रार्थना करके प्रजापति दक्ष घर को चले गए। उन्हें पूरा विश्वास था कि अब आगे फिर ऐसा नहीं होगा। पर चन्द्रमा रोहिणी में इतने आसक्त हो गए थे कि दूसरी किसी पत्नी का कभी आदर नहीं करते थे।

प्रजापति दक्ष अपनी कन्याओं से बार-बार इस शिकायत को सुनकर बहुत दुखी हुए और चन्द्रमा के पास जाकर बोले – “हे चन्द्रमा ! सुनो, मैं पहले अनेक बार तुमसे प्रार्थना कर चुका हूँ। फिर भी तुमने मेरी बात नहीं मानी। इसलिए आज शाप देता हूँ कि तुम्हें क्षय का रोग हो जाये। “ दक्ष के इतना कहते ही क्षणभर में ही चन्द्रमा क्षय रोग से ग्रस्त हो गए। उनके क्षीण होते ही चारों ओर हाहाकार मच गया। चन्द्रमा ने इन्द्र आदि सभी देवताओं और ऋषियों को अपने साथ हुए घटना की सूचना दी। तब इन्द्र सहित सभी देवता और ऋषिगण ब्रह्मा जी की शरण में गए।

उनकी बात सुनकर ब्रह्मा जी ने कहा – ” देवताओं ! जो हो गया अब वह निश्चय ही पलट नहीं सकता। अतः उसके निवारण के लिए मैं तुम्हें एक उत्तम उपाय बताता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो। आप सभी देवता प्रभास नामक शुभ क्षेत्र में जाएँ और वहाँ शिवलिंग की स्थापना कर नित्य तपस्या करें और मृत्युंजय मंत्र का विधिपूर्वक अनुष्ठान करते हुए भगवान शिव की आराधना करें। इससे प्रसन्न होकर शिव उन्हें क्षयरहित कर देंगे। “ तब देवताओं तथा ऋषियों के कहने से ब्रह्मा जी की आज्ञा के अनुसार चन्द्रमा ने वहाँ 6 महीने तक निरंतर तपस्या की, मृत्युंजय मंत्र से भगवान भोलेनाथ का पूजन किया।

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दस करोड़ मंत्र का जप और मृत्युंजय का ध्यान करते हुए चन्द्रमा वहाँ स्थिरचित्त होकर लगातार खड़े रहे। उन्हें तपस्या करते देख भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रसन्न होकर उनके सामने प्रकट हो गए और चन्द्रमा से बोले –”चन्द्रदेव! तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम्हारे मन में जो भी इच्छा हो वह वर माँगो। तुम्हें सभी उत्तम वर प्रदान करूँगा।“

चन्द्रमा बोले – “ हे देवेश्वर! यदि आप मेरी भक्ति से प्रसन्न हैं तो मेरे लिए क्या असाध्य हो सकता है। तथापि प्रभु, आप मेरे शरीर के इस क्षयरोग का निवारण कीजिये। मुझसे जाने अनजाने जो भी अपराध हुए हों उसे क्षमा कीजिये। “

शिवजी ने कहा –“चन्द्रदेव! एक पक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी कला क्षीण हो और दूसरे पक्ष में फिर वह निरंतर बढ़ती रहे।“ इसके बाद चन्द्रमा ने भक्तिभाव से भगवान शंकर की स्तुति की। देवताओं पर प्रसन्न हो उस क्षेत्र के माहात्म्य को बढ़ाने तथा चन्द्रमा के यश का विस्तार करने के लिए भगवान शंकर उन्हीं के नाम पर वहाँ सोमेश्वर कहलाये और सोमनाथ के नाम से संसार में विख्यात हुए।

सोमनाथ (Somnath ji) का पूजन करने से उपासक के क्षय तथा कोढ़ आदि रोगों का नाश हो जाता है। उसी स्थान पर सभी देवताओं ने सोमकुण्ड या चन्द्रकुण्ड की भी स्थापना की। जिसमें शिव और ब्रह्मा का सदा निवास माना जाता है। सोमकुण्ड इस भूतल पर पापनाशन तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है। जो मनुष्य उसमें स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। क्षय आदि जो असाध्य रोग होते हैं, वे सब उस कुंड में 6 मास तक स्नान करने मात्र से नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य जिस किसी भी फल के उद्देश्य से इस उत्तम तीर्थ का सेवन करता है उस फल को अवश्य पाता है, इसमें कोई संशय नहीं है।

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पशुपतिनाथ मंदिर – Pashupatinath Temple https://astrodeeva.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0-pashupatinath-temple/ https://astrodeeva.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0-pashupatinath-temple/#comments Mon, 18 Jan 2021 03:00:25 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1625 हिन्दू धर्म के अनुसार सारी सृष्टि त्रिदेव यानी ब्रह्मा,विष्णु और महेश से ही है। भगवान् ब्रह्मा अगर सृष्टि के रचयिता हैं तो भगवान विष्णु समस्त संसार के पालनकर्ता हैं और महेश यानि भगवान शिव को संहारक के रूप में देखा जाता हैं। जब-जब इस संसार में पाप बढ़ता हैं सभी जगह नकारात्मकता बढ़ती हैं उस […]

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हिन्दू धर्म के अनुसार सारी सृष्टि त्रिदेव यानी ब्रह्मा,विष्णु और महेश से ही है। भगवान् ब्रह्मा अगर सृष्टि के रचयिता हैं तो भगवान विष्णु समस्त संसार के पालनकर्ता हैं और महेश यानि भगवान शिव को संहारक के रूप में देखा जाता हैं।

जब-जब इस संसार में पाप बढ़ता हैं सभी जगह नकारात्मकता बढ़ती हैं उस वक़्त बुराईयों के नाश के लिए स्वयं भगवान शंकर आते हैं। भगवान शंकर को यूँ तो भोलेनाथ कहा जाता हैं, लेकिन भगवान शिव का क्रोध हर किसी को ज्ञात हैं। यदि भोलेनाथ किसी बात से नाराज़ हो जाये तो उनके क्रोध को शांत कराना लगभग असंभव कार्य होता हैं परन्तु भक्तों द्वारा की गयी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् शिव जल्दी शांत भी हो जाते हैं। यही वजह हैं कि भगवान शंकर को उनके भक्त भोलेनाथ के नाम से भी पुकारते हैं।

इस विश्व ने भगवान शंकर के अनेक प्रसिद्ध मंदिर है उन सभी मंदिरो में पशुपतिनाथ मंदिर मंदिर का सर्वोच्च स्थान है। पशुपतिनाथ (Pashupatinath) मंदिर काठमांडू (नेपाल) की राजधानी काठमांडू से तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में देवपाटन गावँ में बगमती नदी के तट स्थित है। भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित यह मंदिर नेपाल में भगवान शिव का सबसे पवित्र मंदिर है। मंदिर दुनिया भर के हिन्दू तीर्थ यात्रियों के अलावा गैर हिन्दू पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी रहा है। यह मंदिर यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में शामिल है। इस मंदिर में भारतीय पुजारियों की काफी संख्या है। सदियों से यह परंपरा रही है कि मंदिर में चार पुजारी और एक मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के ब्राह्मणों में से रखे जाते हैं। मान्यता के अनुसार मंदिर का निर्माण सोमदेव राजवंश के राजाओं ने तीसरी सदी ईसा पूर्व करवाया था। पशुपतिनाथ (Pashupatinath)मंदिर का मुख्य परिसर आखिरी बार 17वीं शताब्दी के अंत में बनाया गया था, जो दीमक के कारण जगह-जगह से नष्ट हो गया था। मूल मंदिर तो न जाने कितनी बार नष्ट हुआ, लेकिन मंदिर को नरेश भूपलेंद्र मल्ला ने 1697 में वर्तमान स्वरूप दिया।

भारतीय ग्रंथों के अनुसार पशुपतिनाथ के विषय में मान्यता है कि महाभारत युद्घ में विजय के बाद पांण्डव अपने गुरूजनों और सगे संबंधियों को मारने के बाद दुखी थे और अपने पापों से मुक्ती चाहते थे। वे भगवान श्री कृष्ण के पास गए और अपने पापों से मुक्ति का उपाय पूछा । तब भगवान श्री कृष्ण ने उनसे कहा कि भगवान शिव ही आपको पापों से मुक्त कर सकते हैं।

पशुपतिनाथ मंदिर की कथा – Katha Of Pashupatinath Temple

पशुपतिनाथ मंदिर के बारे में अनेको कथा प्रचलित है। हिन्दू ग्रंथों के अनुसार पशुपतिनाथ के विषय में मान्यता है कि महाभारत युद्घ में विजय के बाद पांण्डव अपने गुरूजनों और सगे संबंधियों को मारने के बाद दुखी थे और अपने पापों से मुक्ती चाहते थे। वे भगवान श्री कृष्ण के पास गए और अपने पापों से मुक्ति का उपाय पूछा । तब भगवान श्री कृष्ण ने उनसे कहा कि भगवान शिव ही आपको पापों से मुक्त कर सकते हैं। भगवान श्री कृष्ण के कहने पर पांण्डव शिव जी को मनाने चल पड़े। पांण्डवों द्वारा अपने गुरूओं एवं सगे-संबंधियों का वध किये जाने से भगवान शिव जी पांण्डवों से नाराज थे । गुप्त काशी( उतराखंड,भारत) में पांण्डवों को देखकर भगवान शिव वहां से विलीन हो गये और उस स्थान पर पहुंच गये जहां पर वर्तमान में केदारनाथ स्थित है।

लेकिन पांण्डव भगवान शिव को हर हाल में मनाना चाहते थे। शिव जी का पीछा करते हुए पांण्डव केदारनाथ पहुंच गये। इस स्थान पर पांण्डवों को आया हुए देखकर भगवान शिव ने एक बैल का रूप धारण किया और इस क्षेत्र में चर रहे बैलों के झुंण्ड में शामिल हो गये। पांण्डवों ने बैलों के झुंण्ड में भी शिव जी को पहचान लिया तो शिव जी बैल के रूप में ही धरती में समाने लगे। भगवान शिव को बैल के रूप में धरती में समाता देख भीम ने कमर से कसकर पकड़ लिया। पांण्डवों की सच्ची श्रद्धा को देख भगवान शिव प्रकट हुए और पांण्डवों को पापों से मुक्त कर दिया। इस बीच बैल बने शिव जी का सिर काठमांडू स्थित पशुतिनाथ में पहुंच गया। इसलिए केदारनाथ और पशुपतिनाथ को मिलाकर एक ज्योर्तिलिंग भी कहा जाता है। केदरनाथ में बैल के पीठ रूप में शिवलिंग की पूजा होती है जबकि पशुपतिनाथ में बैल के सिर के रूप में शिवलिंग को पूजा जाता है।

स्थानीय ग्रंथों के अनुसार, विशेष तौर पर नेपाल महात्म्य और हिमवतखंड के अनुसार भगवान शिव एक बार वाराणसी के अन्य देवताओं को छोड़कर बागमती नदी के किनारे स्थित मृगस्थली चले गए, जो बागमती नदी के दूसरे किनारे पर जंगल में है। भगवान शिव वहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले गए। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। कहते हैं इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में प्रकट हुए ।

पशुपतिनाथ (Pashupatinath) लिंग विग्रह में चार दिशाओं में चार मुख और ऊपरी भाग में पांचवां मुख है। प्रत्येक मुखाकृति के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल है। प्रत्येक मुख अलग-अलग गुण प्रकट करता है। पहला मुख ‘अघोर’ मुख है, जो दक्षिण की ओर है। पूर्व मुख को ‘तत्पुरुष’ कहते हैं। उत्तर मुख ‘अर्धनारीश्वर’ रूप है। पश्चिमी मुख को ‘सद्योजात’ कहा जाता है। ऊपरी भाग ‘ईशान’ मुख के नाम से पुकारा जाता है। यह निराकार मुख है। यही भगवान पशुपतिनाथ का श्रेष्ठतम मुख है।

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पशुपतिनाथ मंदिर का महत्व- Importance of Pashupatinath Temple

मान्यता है कि जो व्यक्ति पशुपति नाथ के दर्शन करता है उसका जन्म कभी भी पशु योनी में नहीं होता है। मान्यता यह भी है कि इस मंदिर में दर्शन के लिए जाते समय भक्तों को मंदिर के बाहर स्थित नंदी के दर्शन पहले नहीं करने चाहिए। जो व्यक्ति पहले नंदी के दर्शन करता है बाद में शिवलिंग का दर्शन करता है उसे अगले जन्म पशु योनी मिलती है।

पशुपतिनाथ मंदिर में दैनिक अनुष्ठान – Daily Ritual at Pashupatinath Temple

पशुपतिनाथ मंदिर के दैनिक अनुष्ठान इस प्रकार हैं:

  • सुबह 4:00 बजे : पश्चिम द्वार पर्यटकों के लिए खुलता है।
  • सुबह 8:30 बजे : पुजारियों के आगमन के बाद भगवान की मूर्तियों को नहलाया और साफ किया जाता है, दिन के लिए कपड़े और गहने बदल दिए जाते हैं।
  • सुबह 9:30 बजे : बाल भोग या नाश्ता प्रभु को चढ़ाया जाता है।
  • सुबह 10:00 बजे : फिर पूजा करने के इच्छुक लोगों का स्वागत किया जाता है। इसे फार्मायशी पूजा भी कहा जाता है, जिसके तहत लोग पुजारी को अपने निर्दिष्ट कारणों के लिए एक विशेष पूजा करने के लिए कहते हैं। पूजा दोपहर 1:45 बजे तक जारी रहती है।
  • 1:50 बजे : मुख्य पशुपति मंदिर में भगवान को दोपहर का भोजन चढ़ाया जाता है।
  • दोपहर 2:00 बजे : सुबह की प्रार्थना समाप्त।
  • 5:15 बजे : मुख्य पशुपति मंदिर में संध्या आरती शुरू।
  • शाम 6:00 बजे : यहां बागमती किनारे होने वाली गंगा आरती आकर्षण का केंद्र है। यह आरती ज्यादातर आप शनिवार, सोमवार और विशेष अवसरों पर ही देख सकते हैं। गंगा आरती, रावण द्वारा लिखित शिव के तांडव भजन के साथ, गंगा आरती शाम को की जाती है।
  • शाम 7:00 बजे: दरवाजा बंद हो जाता है।

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