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शाकंभरी पूर्णिमा को शाकंभरी जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, शाकंभरी नवरात्रि अष्टमी तिथि के दिन शुरू होती है और पौष माह की पूर्णिमा तिथि के दिन समाप्त होती है। इस त्यौहार को आठ दिनों तक मनाया जाता है और शाकंभरी पूर्णिमा को शाकंभरी नवरात्रि का समापन होता है।

कौन हैं देवी शाकंभरी ?

देवी शाकंभरी देवी भगवती का अवतार हैं। इन्हें ‘हरियाली का प्रतीक’ भी कहा जाता है। शास्त्रों और हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, सभी शाकाहारी खाद्य उत्पादों को देवी शाकंभरी  का प्रसाद या पवित्र प्रसाद माना जाता है।

शाकंभरी माता की कथा

हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ, देवी भागवतम के अनुसार, एक बार दुर्गम नाम का एक दानव था, जिसने अत्यधिक कष्टों और तपस्या से सभी चारों वेदों का अधिग्रहण कर लिया। उसने यह भी वरदान प्राप्त किया कि देवताओं को की जाने वाली सभी पूजाएँ और प्रार्थनाएँ उसके पास पहुँचेगी और इस तरह वह दुर्गम अविनाशी बन गया।

ऐसी शक्तियों को प्राप्त करने के बाद, उसने सभी को परेशान करना शुरू कर दिया जिसके परिणामस्वरूप धर्म का नुकसान हुआ और इसके कारण सैकड़ों वर्षों तक बारिश भी नहीं हुई, जिससे गंभीर अकाल की स्थिति पैदा हो गई। इससे निवारण पाने के लिए सभी साधु, ऋषि मुनि हिमालय की गुफाओं में चले गए और उन्होनें देवी माँ से मदद पाने के लिए निरंतर यज्ञ और तप किया। उनके कष्टों और संकटों को सुनकर, देवी ने शाकंभरी  को अनाज, फल, जड़ी-बूटियाँ, दालें, सब्जियाँ, और साग-भाजी के रूप में अवतरित किया।

शाक शब्द का अर्थ सब्जियों से है और इस प्रकार देवी, शाकंभरी के नाम से प्रसिद्ध हुई। लोगों की दुर्दशा को देखकर देवी शाकंभरी की आंखों से 9 दिन और 9 रातों तक लगातार आँसू बहते रहे। अतः, उनके आँसू एक नदी में बदल गए और अकाल की स्थिति का अंत हो गया।

देवी ने मनुष्यों और ऋषियों को राक्षस दुर्गम की क्रूरता से बचाने के लिए उसके खिलाफ भी युद्ध किया। देवी शाकंभरी  ने अपने अंदर 10 शक्तियों को प्रकट किया और अपनी सभी शक्तियों के साथ दुर्गम का वध कर  चारों वेद ऋषियों को वापस कर दिए। चूंकि देवी ने राक्षस दुर्गम को मारा था, अतः उन्हें दुर्गा नाम भी दिया गया। उस समय से भक्त शाकंभरी पूर्णिमा का व्रत रखते हैं और देवी का आशीर्वाद पाने के लिए और अपने घरों में खुशहाली की कामना करते हैं।

शाकंभरी जयंती का महत्व क्या है?

शाकंभरी पूर्णिमा का बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि यह शाकंभरी देवी की जयंती भी है। भारत में विभिन्न स्थानों पर, इस दिन को पौष पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है जिसे हिंदू कैलेंडर के अनुसार एक अत्यधिक महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस्कॉन के अनुयायी या वैष्णव सम्प्रदाय इस दिन की शुरुआत पुष्य अभिषेक यात्रा से करते हैं क्योंकि यह माघ की शुरुआत भी है जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार धार्मिक मितव्ययिता का महीना है। यदि लोग इस विशेष दिन पर पवित्र स्नान करते हैं तो उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है और साथ ही वे शाकंभरी  पूर्णिमा के दिन दान करके भी अत्यधिक गुण प्राप्त कर सकते हैं।

शाकंभरी जयंती 2024

दिनांक : 25 जनवरी 2024
वार: बृहस्पतिवार
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ  : 24 जनवरी 2024 को 09:49 पी एम बजे से
पूर्णिमा तिथि समाप्त : 25 जनवरी 2024 को 11:23 पी ए बजे तक

शाकंभरी जयंती पर क्या करें?

देवी शाकंभरी  को देवी दुर्गा का सौम्य रूप माना जाता है जो अत्यंत दयालु, कृपालु और स्नेही हैं। इस दिन, लोगों को शाकंभरी  देवी की पूजा और प्रार्थना करनी चाहिए, दान करना चाहिए, उपहार देने चाहिए, व्रत करना चाहिए, तीर्थ यात्रा करनी चाहिए, पवित्र स्नान करना चाहिए और देवी का दिव्य आशीर्वाद पाने के लिए अच्छे कर्म करने चाहिए।

माँ शाकंभरी की पूजा विधि

  • भक्तों को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर, पवित्र स्नान करना चाहिए और फिर देवी शाकंभरी  की मूर्ति को श्रद्धांजलि अर्पित करनी चाहिए।
  • भक्तों को बाणशंकरी प्रतः स्मरण मंत्र का जाप करना चाहिए।
  • देवी शाकंभरी  की मूर्ति या तस्वीर को फल और मौसमी सब्जियों से सजाना चाहिए।
  • भक्तों को देवी शाकंभरी  के मंदिर जाना चाहिए।
  • देवी को पवित्र भोजन (प्रसादम) अर्पित करना चाहिए।
  • परिवार के सभी सदस्यों के साथ मिलकर आरती की जानी चाहिए।
  • सभी भक्तों को पवित्र भोजन वितरित किया जाना चाहिए।
  • व्रत रखने वाले व्यक्ति को शाकंभरी  कथा अवश्य पढ़नी चाहिए।

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Baglamukhi Jayanti 2022: अगर पानी है गंभीर बीमारियों और शत्रुओं पर विजय तो इस दिन करें मां का पूजन https://astrodeeva.com/baglamukhi-jayanti-2022-if-water-is-a-victory-over-serious-diseases-and-enemies-then-worship-the-mother-on-this-day/ https://astrodeeva.com/baglamukhi-jayanti-2022-if-water-is-a-victory-over-serious-diseases-and-enemies-then-worship-the-mother-on-this-day/#respond Mon, 09 May 2022 03:08:45 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3393 हिंदू धर्म ग्रंथ के अनुसार, मां बगलामुखी को 10 महाविद्याओं में से एक माना गया है। ये 10 महाविद्याओं के क्रम में 8वीं महाविद्या है। इन्हें माता पीताम्बरा या ब्रह्मास्त्र विद्या भी कहा जाता है। प्रति वर्ष वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मां बगलामुखी की जयंती (Baglamukhi Jayanti) मनाई जाती है। […]

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हिंदू धर्म ग्रंथ के अनुसार, मां बगलामुखी को 10 महाविद्याओं में से एक माना गया है। ये 10 महाविद्याओं के क्रम में 8वीं महाविद्या है। इन्हें माता पीताम्बरा या ब्रह्मास्त्र विद्या भी कहा जाता है। प्रति वर्ष वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मां बगलामुखी की जयंती (Baglamukhi Jayanti) मनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस तिथि को ही मां बगलामुखी अवतरित हुई थी। इस दिन भक्त मां बगलामुखी की विधि-विधान से पूजा की करते है।

शक्ति-स्वरूपा माँ बगलामुखी की महिमा

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को आदि शक्ति के एक और स्वरूप देवी बगलामुखी माता की जयंती (Baglamukhi Jayanti) मनाई  जाती है। इस दिन देवी बगलामुखी का व्रत एवं उनकी उपासना करना लाभकारी सिद्ध होता है। माँ बगलामुखी देवी की साधना, पूजा-अर्चना एवं उनका व्रत करना बहुत ही मंगलकारी होता है।
माता बगलामुखी देवी स्तंभन शक्ति की एक अधिष्ठात्री देवी भी है। जो अपने भक्तों के भय को दूर कर, शांति प्रदान करती है। उनके शत्रुओं का नाश करती है तथा साथ ही भक्तों पर आई बुरी शक्तियों का भी दमन करने में माता बगलामुखी की साधना उत्तम मानी गई हैं।
माता बगलामुखी का एक नाम पीतांबरा देवी भी है। माता बगलामुखी को पीले रंग की सामग्री अति प्रिय है, इसलिए माता की पूजा में पीले रंग की वस्तुओं का उपयोग करना शुभ माना गया है। माता बगलामुखी का वर्ण, स्वर्ण के समान पीला होता है। इसलिए जातक को भी देवी बगलामुखी के पूजन के दौरान पीले वस्त्र अवश्य धारण करना चाहिए। माँ बगलामुखी देवी दस महाविद्याओं में एक आठवीं महाविद्या है जो कि एक स्तंभन की देवी मानी जाती है। कहां जाता है संपूर्ण ब्रह्मांड की शक्ति का समावेश माता बगलामुखी देवी में ही निहित है। शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद-विवाद में विजयी बनाने के लिए माता बगलामुखी की उपासना करना श्रेष्ठ माना गया है, और यह लाभप्रद भी है। माँ बगलामुखी की उपासना से जीवन में सफलता व उन्नति प्राप्त होती है। इस अष्टमी के दिन माता बगलामुखी को पीले फूल चढ़ाना और पीले वस्त्र चढाने से देवी अति प्रसन्न होती है एवं अपने भक्तों पर सदा अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखती है। इस दिन माता को नारियल चढ़ाने का भी विधान है। और इस दिन हल्दी के ढेर पर एक दीपक लगाने से भी माँ बगलामुखी प्रसन्न होती है।

बगलामुखी के उत्पत्ति की कथा

हिंदू धर्म ग्रंथों में वर्णित पौराणिक कथा के अनुसार, बहुत पहले एक विश्व विनाश करने वाला तूफान उत्पन्न हुआ। जिस कारण पृथ्वी पर चारों ओर हाहाकार मच गया। इस विनाशकारी तूफान को देखकर श्री हरि विष्णु अति चिंतित हुए, और जब भगवान विष्णु को इस समस्या का कोई समाधान नहीं मिला, तब वे उनके आराध्य देवाधिदेव महादेव की शरण लेने के लिए उनका स्मरण करने लगे। तभी भगवान शिव ने अपने ध्यान में लीन भगवान विष्णु को यह ध्यान दिलाया कि किसी शक्ति द्वारा इस तूफान को रोक पाना संभव नहीं। फिर भगवान विष्णु ने आदि-शक्ति जगदंबा को प्रसन्न करने के लिए एक हरिद्रा सरोवर के निकट बैठकर, एक कठोर तप करना आरंभ कर दिया । भगवान विष्णु ने तप के माध्यम से शक्तिस्वरुपा आदिशक्ति त्रिपुर सुंदरी को प्रसन्न किया। देवी त्रिपुर सुंदरी माता, श्री हरि विष्णु की साधना से बहुत प्रसन्न हुई। उस समय वैशाख शुक्ल पक्ष की अष्टमी की रात्रि थी। उसी अष्टमी की रात देवी त्रिपुर सुंदरी ने माता बगलामुखी का रूप धारण किया(Baglamukhi Jayanti)। तभी त्र्येलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी ने भगवान विष्णु के कहने पर सृष्टि के विनाश को नियंत्रित कर रोका एवं भगवान विष्णु की चिंतित अवस्था को दूर किया। तभी सृष्टि का ऐसा महाविनाश, महाप्रलय रुक सका। माता बगलामुखी एक प्रकार से समस्त संशयों का शमन करने वाली देवी है, जो कि उनके भक्तों की हर दुविधा दूर कर उनकी रक्षा भी करती है।

मां बगलामुखी पूजन 

माँ बगलामुखी की पूजा हेतु इस दिन(Baglamukhi Jayanti) प्रात: काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर अपनी निद्रा त्याग कर नित्य कर्मों में निवृत्त होकर, पीले वस्त्र धारण करने चाहिए. साधना अकेले में, मंदिर में या किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर की जानी चाहिए. पूजा करने के हेतु पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा करने के लिए आसन पर बैठें चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती बगलामुखी का चित्र स्थापित करें.

इसके बाद आचमन कर हाथ धोएं। आसन पवित्रीकरण, स्वस्तिवाचन, दीप प्रज्जवलन के बाद हाथ में पीले चावल, हरिद्रा, पीले फूल और दक्षिणा लेकर संकल्प करें। इस पूजा में  ब्रह्मचर्य का पालन करना आवशयक होता है  मंत्र- सिद्ध करने की साधना में माँ बगलामुखी का पूजन यंत्र चने की दाल से बनाया जाता है और यदि हो सके तो ताम्रपत्र या चाँदी के पत्र पर इसे अंकित करें।

ये भी पढ़ें : एक मंत्र के जाप से पायें दुर्गा सप्तशती सम्पूर्ण पाठ का फल

माँ बगलामुखी मंत्र | Bagalamukhi Mantra

ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै सर्व दुष्टानाम वाचं मुखं पदम् स्तम्भय जिह्वाम कीलय-कीलय बुद्धिम विनाशाय ह्लीं ॐ नम:
(इस मंत्र को मां का विशेष मंत्र माना जाता है। मां के इस मंत्र का जप करने से मां प्रसन्न होती हैं और सभी मनोकामनाओं को पूरा करती हैं।)
ॐ ह्लीं ह्लीं ह्लीं बगले सर्व भयं हर:
(इस मंत्र को मां बगलामुखी का भय नाशक मंत्र कहा जाता है। इस मंत्र के जप से भय दूर हो जाता है। जिन लोगों को किसी भी चीज से डर लगता है, उन्हें नियमित मां बगलामुखी के इस भयनाशक मंत्र का जप करना चाहिए।)
ॐ बगलामुखी देव्यै ह्लीं ह्रीं क्लीं शत्रु नाशं कुरु
(इस मंत्र को मां बगलामुखी का शत्रु नाशक मंत्र कहा जाता है। जिन व्यक्तियों को अपने शत्रुओं से भय रहता है उन्हें इस मंत्र का जप करना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति इस मंत्र का नियमित जप करते हैं, उनका शत्रु भी कुछ नहीं बिगाड़ पाते हैं। इस मंत्र के नियमित जप से मां बगलामुखी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।)
ॐ ह्लीं श्रीं ह्लीं पितांबरे तंत्र बाधां नाशय नाशय
(मां बगलामुखी का यह मंत्र काफी प्रभावशाली है। इस मंत्र को जादू-टोना नाशक मंत्र कहा जाता है। जिन जातकों पर भूत-प्रेत या कोई बुरा साया होता है, उन्हें इस मंत्र का नियमित जप करना चाहिए। इस मंत्र के जप करने से व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है और उसके ऊपर से भूत-प्रेत का साया हट जाता है।)

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Navratri Havan : नवरात्रि हवन करने की सरल विधि https://astrodeeva.com/navratri-havan-simple-method-to-perform-navratri-havan/ https://astrodeeva.com/navratri-havan-simple-method-to-perform-navratri-havan/#respond Sun, 10 Apr 2022 00:51:32 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3185 नवरात्रि में भक्त नौ दिनों तक देवी दुर्गा का व्रत रखते है और माता के विभिन्न स्वरूपों की उपासना करते हैं और नवमी तिथि को हवन(Navratri Havan) के साथ आराधना पूरी करते हैं। नवरात्रि के पावन पर्व के समापन में हवन का बहुत महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार हवन के बिना नौ दिनों की उपासना […]

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नवरात्रि में भक्त नौ दिनों तक देवी दुर्गा का व्रत रखते है और माता के विभिन्न स्वरूपों की उपासना करते हैं और नवमी तिथि को हवन(Navratri Havan) के साथ आराधना पूरी करते हैं। नवरात्रि के पावन पर्व के समापन में हवन का बहुत महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार हवन के बिना नौ दिनों की उपासना अधूरी रह जाती है। इस लेख में नवरात्रि के पावन पर्व पर देवी साधको के समक्ष आसान हवन (Navratri Havan) की विधि बता रहे है इस हवन को आप किसी पुरोहित के बिना भी कर सकते है। आशा है आप सभी इसका लाभ उठाएंगे।

हवन सामग्री (Navratri Havan Samagri)

  1. हवन कुंड, हवन सामग्री, काले,लाल, सफेद तिल, आम की लकड़ी, साबूत चावल, जौ, पीली सरसों, चना, काली उडद साबुत, गुगुल, अनारदाना, बेलपत्र, गुड़, शहद।
  2. गाय का घी, कर्पूर, दीपक, घी की आहुति के लिये लंबा लकड़ी अथवा स्टील का चम्मच, हवन सामग्री मिलाने के लिये बड़ा पात्र, गंगाजल, लोटा या आचमनी, अनारदाना, पान के पत्ते, फूल माला, फल, भोग के लिये मिष्ठान, खीर आदि।

हवन की विधि (Navratri Havan Vidhi)

  • हवन आरम्भ करने से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र हो सके तो लाल रंग के धारण कर लें।
  • इसके बाद ऊपर बताई 1 नंबर हवन सामग्री को पात्र में डालकर मिला लें। या बाजार में मिली सामग्री भी प्रयोग कर सकते है।
  • इसके बाद हवन के लिये वेदी सुविधा अनुसार खुली जगह पर बनाए अथवा बाजार में मिलने वाली हवान वेदी का प्रयोग करें हवन वेदी को इस प्रकार स्थापित करे जिसमे हवन करने वाले का मुख पूर्व या उत्तर दिशा में आये।
  • इसके बाद अपने ऊपर गंगा जल छिड़के और इसके बाद हवन पूजन सामग्री को भी गंगा जल से पवित्र कर लें।
  • इसके बाद एक मिट्टी का अथवा जो भी उपलब्ध हो दिया प्रज्वलित करें दीपक को सुरक्षित स्थान पर अक्षत डाल कर स्थापित करे हवन के दौरान बुझे ना इसका ध्यान रखे।
  • इसके बाद आम की लकड़ियों को हवन कुंड में रखे और कर्पूर की सहायता से जलाये।
  • इसके बाद हाथ अथवा आचमनी से हवन कुंड के ऊपर से 3 बार जल को घुमा कर अग्नि देव को प्रणाम करें। अग्नि देव का यथा उपलब्ध सामग्री से पूजन करे मिष्ठान का भोग लगाएं, पुष्प माला हवन कुंड पर चढ़ाए ना कि अग्नि में डाले, तदोपरांत अग्नि देव से मानसिक प्रार्थना करे है अग्नि देव में जिन देवी देवताओं के निमित्त हवन कर रहा हूँ उनका भाग उनतक पहुचाने का कष्ट करें।
  • इसके बाद सर्वप्रथम पंच देवो की आहुति निम्न प्रकार मंत्र बोलते हुए दे मंत्र के बाद स्वाहा अवश्य लगाए स्वाहा के साथ ही आहुति भी अग्नि में अर्पण करते जाए।
            ॐ गं गणपतये स्वाहा
            ॐ रुद्राय स्वाहा
            ॐ ऐं ह्रीं क्लीं स्वाहा
            ॐ सूर्याय स्वाहा
            ॐ अग्निदेवाय स्वाहा
( निम्न मंत्रो से केवल घी की आहुती दे तथा आहुति से शेष बचा घी एक कटोरी में जल भर कर रखे उसमे डालते जाए।)
  • इसके बाद निम्न मंत्रो से भी घी की आहुति दें तथा शेष घी की कटोरी के जल में डालते रहे।
          ॐ दुर्गा देवी नमः स्वाहा
          ॐ शैलपुत्री देवी नमः स्वाहा
          ॐ ब्रह्मचारिणी देवी नमः स्वाहा
          ॐ चंद्र घंटा देवी नमः स्वाहा
          ॐ कुष्मांडा देवी नमः स्वाहा
          ॐ स्कन्द देवी नमः स्वाहा
          ॐ कात्यायनी देवी नमः स्वाहा
          ॐ कालरात्रि देवी नमः स्वाहा
          ॐ महागौरी देवी नमः स्वाहा
          ॐ सिद्धिदात्री देवी नमः स्वाहा
(इन आहुतियों के बाद कम से कम 1 माला नवार्ण मंत्र से आहुति डाले)
नवार्ण मंत्र – ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे नमः स्वाहा
नवार्ण मंत्र से आहुति के बाद साधक गण जिन्हें सप्तशती मंत्रो से हवन नही करना वे बची हुई हवन सामग्री को पान के पत्ते पर रखकर साथ मे अनार दाना और ऊपर बताई नंबर 2 सामग्री लेकर अग्नि में घी की धार बना कर छोड़ दे तथा हाथ मे जल लेकर हवन कुंड के चारो तरफ घुमाकर जमीन पर छोड़ दे इसके बाद माता की आरती कर क्षमा प्रार्थना करले इसके बाद कटोरी वाले जल को पूरे घर मे छिड़क दें।

ये भी पढ़ें – नवरात्रि व्रत का पारण कब और कैसे करें

दुर्गा सप्तशती पाठ व हवन ( Durga Saptashati Path And Navratri Havan)

  • प्रथम अध्याय –  एक पान देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना।
  • द्वितीय अध्याय –  प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, गुग्गुल विशेष।
  • तृतीय अध्याय –  प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक सं. 38 शहद।
  • चतुर्थ अध्याय –  प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक सं.1 से 11 मिश्री व खीर विशेष।
(चतुर्थ अध्याय के मंत्र संख्या 24 से 27 तक इन 4 मंत्रों की आहुति नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से देह नाश होता है। इस कारण इन चार मंत्रों के स्थान पर ओंम नमः चण्डिकायै स्वाहा’ बोलकर आहुति देना तथा मंत्रों का केवल पाठ करना चाहिए इनका पाठ करने से सब प्रकार का भय नष्ट हो जाता है।)
  • पंचम अध्याय –  प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक सं. 9 मंत्र कपूर, पुष्प, व ऋतुफल ही है।
  • षष्टम अध्याय –  प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक सं. 23 भोजपत्र।
  • सप्तम अध्याय – प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक सं. 10 दो जायफल श्लोक संख्या 19 में सफेद चन्दन श्लोक संख्या 27 में इन्द्र जौं।
  • अष्टम अध्याय – प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 54 एवं 62 लाल चंदन।
  • नवम अध्याय – प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या श्लोक संख्या 37 में 1 बेलफल 40 में गन्ना।
  • दशम अध्याय –  प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 5 में समुन्द्र झाग 31 में कत्था।
  • एकादश अध्याय – प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 2 से 23 तक पुष्प व खीर श्लोक संख्या 29 में गिलोय 31 में भोज पत्र 39 में पीली सरसों 42 में माखन मिश्री 44 मेें अनार व अनार का फूल श्लोक संख्या 49 में पालक श्लोक संख्या 54 एवं 55 मे फूल चावल और सामग्री।
  • द्वादश अध्याय – प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 10 मेें नीबू काटकर रोली लगाकर और पेठा श्लोक संख्या 13 में काली मिर्च श्लोक संख्या 16 में बाल-खाल श्लोक संख्या 18 में कुशा श्लोक संख्या 19 में जायफल और कमल गट्टा श्लोक संख्या 20 में ऋीतु फल, फूल, चावल और चन्दन श्लोक संख्या 21 पर हलवा और पुरी श्लोक संख्या 40 पर कमल गट्टा, मखाने और बादाम श्लोक संख्या 41 पर इत्र, फूल और चावल
  • त्रयोदश अध्याय – प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 27 से 29 तक फल व फूल।
नोट –  ऊपर दिए गए मंत्र संख्या अनुसार हवन (Navratri Havan) करें शेष मंत्रो में सामान्य हवन सामग्री का ही प्रयोग करे हवन के आरंभ एवं अंत मे यथा सामर्थ्य अधिक से अधिक नवार्ण मंत्र से आहुति डाले घी से दी गई आहुति को पात्र के जल में छोड़ते रहना है। नवार्ण आहुति के बाद पूर्ण आहुति के लिये एक सूखा नारियल (गोला) में सामग्री भर कर अग्नि में डाले तथा शेष बची सामग्री को नारियल पर घी की धार बांधते हुए उसी के ऊपर छोड़ दें आहुतियों के बाद अंत मे माता से प्रार्थना कर हाथ मे जल लेकर हवन कुंड के चारो तरफ घुमाकर जमीन पर छोड़ दे इसके बाद माता की आरती कर क्षमा प्रार्थना कर अग्नि से भस्मी निकालकर घर के सभी सदस्यों का तिलक करें। पात्र के घी मिश्रित जल को घर मे छिड़क दें। इससे नकारत्मक शक्तियां खत्म हो जाती है।

माँ दुर्गा की आरती ( Maa Durga Aarti)

जय अंबे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ ॐ जय…
मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को ।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥ ॐ जय…
कनक समान कलेवर, रक्तांबर राजै ।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै ॥ ॐ जय…
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी ।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ॥ ॐ जय…
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती ।
कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत सम ज्योती ॥ ॐ जय…
शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती ।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥ॐ जय…
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे ।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भय दूर करे ॥ॐ जय…
ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी ।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥ॐ जय…
चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैंरू ।
बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू ॥ॐ जय…
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता ।
भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता ॥ॐ जय…
भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी ।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥ॐ जय…
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती ।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती ॥ॐ जय…
श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे ।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे ॥ॐ जय…
हवन के उपरांत यथा सामर्थ्य कन्याओं को भोजन करा दक्षिणा दे तदोपरान्त स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करें।
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Navratri 2022 : नवरात्रि में व्रत क्यों करना चाहिए? https://astrodeeva.com/navratri-2022-why-one-should-fast-during-navratri/ https://astrodeeva.com/navratri-2022-why-one-should-fast-during-navratri/#respond Thu, 31 Mar 2022 10:30:25 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3125 चैत्र नवरात्रि (Navratri 2022)एक नए मौसम की शुरुआत का प्रतीक है और इस दौरान उपवास करना शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो लोग इन नौ दिनों का उपवास करते हैं, उन्हें देवी दुर्गा अपनी कृपा प्रदान करती हैं। इस दौरान भक्तों को ध्यान करना चाहिए, देवी महात्म्य का पाठ करना चाहिए और […]

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चैत्र नवरात्रि (Navratri 2022)एक नए मौसम की शुरुआत का प्रतीक है और इस दौरान उपवास करना शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो लोग इन नौ दिनों का उपवास करते हैं, उन्हें देवी दुर्गा अपनी कृपा प्रदान करती हैं। इस दौरान भक्तों को ध्यान करना चाहिए, देवी महात्म्य का पाठ करना चाहिए और माँ दुर्गा के नौ रूपों में से प्रत्येक को समर्पित श्लोकों / मंत्रों का जाप करना चाहिए। नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान एक व्रती (उपवास रखने वाले व्यक्ति) को लहसुन, प्याज, गेहूं, चावल, दाल और मांस से परहेज़ करना चाहिए।

नवरात्रि (Navratri) के दौरान उपवास करने से आध्यात्मिक और आंतरिक शक्ति का संचार होता है। यह मन की बेचैनी को कम करता है और चीत को शांत कर जागरूकता और आनंद की अनुभती लाता है। ये आपकी इंद्रियों, शरीर, मन और आत्मा को शांत करने में आपकी मदद करते हैं।

ये भी पढ़ें : चैत्र नवरात्र प्रारम्भ , जानिए तिथि और कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

नवरात्रि के दौरान उपवास के लाभ (Benefits of fasting during Navratri)

  • आध्यात्मिक आत्म से जुड़ने के लिए एक आदर्श समय होने के अलावा, नवरात्रि का समय अपने आप को डिटॉक्स करने और पूर्व में जाने अनजाने में हुए पाप के लिए पश्चाताप करने का सबसे अच्छा समय होता है।
  • इन नौ दिनों के दौरान, लोग विभिन्न प्रकार के फल और खाद्य पदार्थ का सेवन करते हैं जो पौष्टिक होने के साथ-साथ इनमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट पूरे शरीर की सफाई के लिए फायदेमंद होते हैं।
  • जब आप उपवास करते हैं, तो आपके तरल पदार्थ का सेवन बढ़ जाता है। यह शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करता है।

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  • गेहूं, चावल और दाल से परहेज करते हुए हल्के भोजन पदार्थ जैसे सिंघारे का आटा, कुट्टू का आटा, समा, साबूदाना आदि सामग्री को भोजन में लेने से लोग अपने पाचन तंत्र को बहुत जरूरी आराम देते हैं।
  • नवरात्रि उपवास के दौरान लोग टेबल सॉल्ट या प्रोसेस्ड/रिफाइंड नमक की जगह सेंधा नमक (रासायनिक के बिना शुद्ध नमक) लेते हैं जो पाचन में मदद करता है, प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, रक्तचाप को नियंत्रित करता है और पूरे दिन शरीर को सक्रिय रखता है।
  • उपवास के दौरान व्रती गर्मी पैदा करने वाले मसालों जैसे हल्दी, हिंग, गरम मसाला, राय / सरसों, लवंग (लौंग) के उपयोग से बचते हैं और खाना पकाने के लिए तिल/सरसों के तेल के उपयोग से भी बचते हैं। व्रत की रेसिपी बनाने के लिए मूंगफली के तेल या घी का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रकार, इनसे परहेज करके और जीरा (जीरा) और काली मिर्च (काली मिर्च) का उपयोग करने से शरीर ठंडा और तरोताजा रहता है।
  • ध्यान और प्रार्थना नवरात्रि व्रत के महत्वपूर्ण अंग हैं। ये आपकी इंद्रियों, शरीर, मन और आत्मा को शांत करने में आपकी मदद करते हैं। संक्षेप में, नवरात्रि के दौरान उपवास करने से व्यक्ति आत्म-संयम, आत्म-अनुशासन, और कम से कम आध्यात्मिक जागरण का अभ्यास कर सकता है।

 

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Chaitra Navratri 2021 – चैत्र नवरात्र में किस देवी को लगायें कौन-सा भोग? https://astrodeeva.com/chaitra-navratri-2021-%e0%a4%9a%e0%a5%88%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8-%e0%a4%a6/ https://astrodeeva.com/chaitra-navratri-2021-%e0%a4%9a%e0%a5%88%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8-%e0%a4%a6/#respond Thu, 15 Apr 2021 09:58:34 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1906 चैत्र नवरात्र (Chaitra Navratri 2021) के पावन व्रत चल रहें हैं। नौ दिनों तक चलने वाले इस पावन पर्व में देवी दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा होती है। इस व्रत के दौरान तिथि और देवी के अनुसार उन्हें अलग-अलग चीजों का भोग लगाया जाता है। 13 अप्रैल चैत्र नवरात्र (Chaitra Navratri 2021) के पहले […]

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चैत्र नवरात्र (Chaitra Navratri 2021) के पावन व्रत चल रहें हैं। नौ दिनों तक चलने वाले इस पावन पर्व में देवी दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा होती है। इस व्रत के दौरान तिथि और देवी के अनुसार उन्हें अलग-अलग चीजों का भोग लगाया जाता है।

13 अप्रैल चैत्र नवरात्र (Chaitra Navratri 2021) के पहले दिन मां दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप की पूजा की जाती है। इस दिन माता को गाय के दूध से बने पकवानों का भोग लगाया जाता है। पिपरमिंट युक्त मीठा मसाला पान, अनार और गुड़ से बने पकवान भी देवी को अर्पण किए जाते हैं। वहीं फल में देवी शैलपुत्री को एक अनार का फल जरूर चढ़ाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि अनार चढ़ाने से देवी जल्द प्रसन्न होती हैं। अनार उनका प्रिय फल भी माना जाता है।

14 अप्रैल नवरात्र (Chaitra Navratri 2021) के दूसरे दिन मां दुर्गा की ब्रह्मचारिणी के रूप में पूजा होती है। मातारानी को को चीनी, मिश्री और पंचामृत का भोग लगाया जाता है। देवी को इस दिन पान-सुपाड़ी भी चढ़ाएं। इस दिन प्रसाद के तौर पर देवी को 2 सेब का भोग लगाया जाता है।

15 अप्रैल नवरात्र (Chaitra Navratri 2021) के तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी चीजें अर्पित करनी चाहिए। गुड़ और लाल सेब भी मैय्या को बहुत पसंद है। ऐसा करने से सभी बुरी शक्तियां दूर भाग जाती हैं। देवी चंद्रघंटा को 3 केले भी अर्पण करें।

16 अप्रैल नवरात्र (Chaitra Navratri 2021) के चौथे दिन माता के चौथे स्वरूप यानि इस दिन देवी कुष्मांडा की पूजा होती है। इनकी उपासना करने से जटिल से जटिल रोगों से मुक्ति मिलती है और सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। इस दिन माता को मालपुए का भोग लगाएं। चौथे दिन देवी कुष्मांडा को 4 नाशपाती का भोग लगाया जाता है।

ये भो पढ़ें : दुर्गा सप्तशती सम्पूर्ण पाठ का फल पायें इस एक मंत्र के जाप से

17 अप्रैल नवरात्र (Chaitra Navratri 2021) के पांचवे दिन देवी स्कंदमाता की की गई पूजा से भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति होती है। नवरात्र के पांचवे दिन देवी को लगाएं केले का भोग या फिर इसे प्रसाद के रूप में दान करें। इस दिन बुद्धि में वृद्धि के लिए माता को मंत्रों के साथ छह इलायची भी चढ़ाएं। फल में देवी स्कंदमाता को अंगूर के 5 गुच्छे चढ़ाएं।

18 अप्रैल नवरात्र (Chaitra Navratri 2021) के छ्ठे दिन देवी कात्यायनी की आराधना से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। शहद का भोग लगाकर मां कात्यायनी को प्रसन्न किया जाता है। कात्यायनी माता को फल में 6 अमरूद भी अर्पित कर उन्हें प्रसन्न करें।

19 अप्रैल नवरात्र (Chaitra Navratri 2021) के सांतवे दिन कालरात्रि की पूजा  की जाती है। भूत-प्रेतों से मुक्ति दिलवाने वाली देवी कालरात्रि की उपासना करने से सभी दुख दूर होते हैं। माता को लगाएं गुड़ के नैवेद्य का भोग। नवरात्र के सांतवे दिन 7 चीकू का प्रसाद लगाएं।

20 अप्रैल नवरात्र (Chaitra Navratri 2021) के आंठवें दिन महागौरी के स्वरूप का वंदन किया जाता है। इस दिन देवी को नारियल प्रसाद चढ़ाने से घर में सुख-समृद्धि आती है। महागौरी की पूजा करने के बाद पूरी, हलवा और चना कन्याओं को खिलाना शुभ माना जाता है। महागौरी को फल में शरीफा का प्रसाद चढ़ाएं। इनकी पूजा से संतान संबंधी परेशानियों से छुटकारा मिलता है।

21 अप्रैल नवरात्र (Chaitra Navratri 2020) के आखिरी दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। मां सिद्धिदात्री को जगत को संचालित करने वाली देवी कहा जाता है। इस दिन माता को हलवा, पूरी, चना, खीर, पुए आदि का भोग लगाएं। नवरात्र के आखिरी दिन मां सिद्धिदात्री को 9 संतरे का प्रसाद लगाना शुभ माना जाता है।

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Gupt Navratri – गुप्त नवरात्र 2021 https://astrodeeva.com/gupt-navratri-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-2021/ https://astrodeeva.com/gupt-navratri-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-2021/#comments Sun, 07 Feb 2021 05:20:17 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1691 हिन्दू धर्म में नवरात्र का अत्यधिक महत्व है। इन नौ दिनो में भक्त मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना करते हैं। देवी भागवत में चार प्रकार के नवरात्रि का उल्लेख है। शरद नवरात्रि(Sharadiya Navratri), चैत्र नवरात्रि(Chaitra Navratri),माघ नवरात्रि(Magh Gupt Navratri) और आषाढ़ (Ashadh Gupt Navratri)। शारदीय और चैत्र नवरात्रि को हर कोई व्यापक रूप […]

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हिन्दू धर्म में नवरात्र का अत्यधिक महत्व है। इन नौ दिनो में भक्त मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना करते हैं। देवी भागवत में चार प्रकार के नवरात्रि का उल्लेख है। शरद नवरात्रि(Sharadiya Navratri), चैत्र नवरात्रि(Chaitra Navratri),माघ नवरात्रि(Magh Gupt Navratri) और आषाढ़ (Ashadh Gupt Navratri)। शारदीय और चैत्र नवरात्रि को हर कोई व्यापक रूप से मनाता है जबकि माघ नवरात्रि और आषाढ़ नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि के रूप में जाना जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, माघ गुप्त नवरात्रि जनवरी-फरवरी महीने में मनाई जाती है। जबकि आषाढ़ गुप्त नवरात्र जून-जुलाई के महीने में आते हैं। माघ नवरात्री उत्तरी भारत में अधिक प्रसिद्ध है जबकि आषाढ़ नवरात्रि मुख्य रूप से दक्षिणी भारत में लोकप्रिय है।

मस्तक पर तिलक का दिन ओर रंग का असर

जैसे नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है, ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। गुप्त नवरात्रि के दौरान गुप्त अनुष्ठान किए जाते हैं। गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है। इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। इस दौरान लोग लंबी साधना कर दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं। मान्यता है कि गुप्त नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की पूजा को जितना गुप्त रखा जाता है, उतना ही ज्यादा फल प्राप्त होता है।

गुप्त नवरात्रि के दौरान पूजे जाने वाली मां दुर्गा के विभिन्न रूप हैं-

  • माँ कालिके
  • तारा देवी
  • त्रिपुर सुंदरी
  • भुवनेश्वरी
  • माता चित्रमस्ता
  • त्रिपुर भैरवी
  • माँ धूम्रवती
  • माता बगलामुखी
  • मातंगी
  • कमला देवी

गुप्त नवरात्रि पूजा विधि (Gupt Navratri Puja Vidhi)

गुप्त नवरात्रि के दौरान पूजा की सबसे प्रसिद्ध विधि तांत्रिक विद्या है जिसमें धन, बुद्धि और समृद्धि प्राप्त करने के लिए देवी दुर्गा की आराधना शामिल है। ऐसा माना जाता है कि गुप्त नवरात्रि के दौरान देवी दुर्गा को शक्तिशाली मंत्र और गुप्त तंत्र विद्या व तांत्रिक साधनाओं के रूप में गुप्त पूजा की पेशकश की जाती है, जो भक्तों को सभी इच्छाओं और आशाओं को पूरा करने के लिए विशेष शक्तियां प्राप्त करने में मदद करती हैं। गुप्त नवरात्रि के दौरान तांत्रिक और अघोरी मां दुर्गा की आधी रात में पूजा करते हैं।

  • सर्वप्रथम मां दुर्गा की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित की जाती है।
  • इसके उपरांत मां को लाल रंग का सिंदूर और सुनहरे गोटे वाली चुनरी अर्पित की जाती है।
  • इसके बाद मां के चरणों में पानी वाला नारियल, केले, सेब, खील, बताशे और श्रृंगार का सामान अर्पित किया जाता है।
  • मां दुर्गा को लाल पुष्प चढ़ाना शुभ माना जाता है।
  • सरसों के तेल से दीपक जलाकर ‘ॐ दुं दुर्गायै नमः’ मंत्र का जाप करना चाहिए।

गुप्त नवरात्रि 2021 तिथि (Gupt Navratri 2021)

नवरात्रि प्रारम्भ – 12 फरवरी 2021 दिन शुक्रवार

नवरात्रि समाप्त – 21 फरवरी 2021 दिन रविवार

घटस्थापना मुहूर्त – सुबह 08:34 ए एम से 09:59 ए एम तक।

(अवधि – 01 घण्टा 25 मिनट्स)

घटस्थापना अभिजित मुहूर्त – दोपहर 12:13 पी एम से 12:58 पी एम तक ।

(अवधि – 44 मिनट्स)

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माँ दुर्गा के नौ रूप-Navaratri https://astrodeeva.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a5%8c-%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%aa-navaratri/ https://astrodeeva.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a5%8c-%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%aa-navaratri/#respond Tue, 15 Dec 2020 04:00:50 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1499 The post माँ दुर्गा के नौ रूप-Navaratri appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.

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Mata Mahagauri | माँ महागौरी – जाने माता की कथा, मंत्र, पूजा विधि और आरती https://astrodeeva.com/mata-mahagauri-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95/ https://astrodeeva.com/mata-mahagauri-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95/#respond Fri, 16 Oct 2020 09:35:24 +0000 https://astrodeeva.com/?p=958 जब-जब संसार में दैत्यों का अत्याचार बढ़ता है और लोगों का धर्म से विश्वास कम होने लगता है तब-तब दुराचारियों का अंत करने दैविय शक्ति का किसी न किसी रूप में पदार्पण होता है। सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति ने इस संसार में अलग- अलग […]

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जब-जब संसार में दैत्यों का अत्याचार बढ़ता है और लोगों का धर्म से विश्वास कम होने लगता है तब-तब दुराचारियों का अंत करने दैविय शक्ति का किसी न किसी रूप में पदार्पण होता है। सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति ने इस संसार में अलग- अलग रूपों में अवतार ले कर जनमानस का कल्याण किया है। माँ दुर्गा के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

शास्त्रों में माता के नौ स्वरूप बताए गये है और इन स्वरूपों कि पूजा करने से लाभ होता है। हमने आप को अपने पूर्व लेखों में देवी के प्रथम सात रूपों (माँ शैलपुत्रीमाँ ब्रह्मचारिणीमाँ चंद्रघंटामाँ कुष्मांडामाँ स्कंदमातामाँ कात्यायनी और माँ कालरात्रि) के बारे में विस्तार से बताया है। इस लेख में हम दुर्गा जी के अष्टम स्वरूप के बारे में बता रहे है।  देवी अपने अष्टम स्वरूप में महागौरी के नाम से जानी जाती हैं। देवी के इस स्वरूप के नाम का अर्थ- महा अर्थात महान और बड़ा है और गौरी अर्थात् गोरी है। महागौरी के नाम का शाब्दिक अर्थ है सबसे गोरी/ सुंदर।

माँ महागौरी का स्वरूप 

देवी महागौरी का वर्ण पूर्णतः गोरा है, इस गौरता की उपमा शंख और चंद्र से दी गई है। इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं। इसलिए इन्हें महागौरी कहा गया है। इनकी चार भुजाएँ है । माता अपने एक बाएँ हाथ में डमरू धारण किए हुए है तथा दूसरा बायां हाथ वर मुद्रा में है। देवी अपने दाएँ एक हाथ में त्रिशूल धारण करती है और दूसरा दाहिना हाथ अभय मुद्रा धारण किए हुए है। देवी महागौरी वृषभ की सवारी करती हैं। 

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माँ महागौरी की कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए देवी ने अपने बाल्यकाल से ही कठोर तपस्या प्रारम्भ की और कई वर्षों के कठोर तप के बाद भगवान शिव प्रसन्न हुए और देवी को अपनी भार्या के रूप में स्वीकार किया। इतने वर्षों की कठोर तपस्या के कारण देवी का शरीर अत्यंत जीर्ण व कमजोर होकर काले रंग का हो गया था। देवी की ऐसी दशा को देख कर भोलेनाथ ने अपने कमंडल से गंगा जल निकाल कर देवी पे छिड़क दिया और देवी को गंगा जल से स्नान करवाया। जिसके प्रभाव व शिव की इच्छा से देवी का वर्ण विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान हो गया। तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा। 

देवी का नाम महागौरी क्यों पड़ा इस पर एक और पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार माता और शिव जी बातें कर रहे थे इसी बीच बातों बातों में भगवान शिव ने माता से कुछ कह दिया। जिसे माता ने अपने मन में लगा लिया और वहाँ से चली गयी और तपस्या में लीन हो गयी। जब माता कई वर्षों तक नहीं लौटी तो भगवान शिव उन्हें खोजने के लिए निकल पड़े। खोजते खोजते शिव वहाँ पहुँच गये जहाँ माता तपस्या में लीन थी। तपस्या के कारण माता का शरीर अति तेज से युक्त हो गया जिसे देख शिव जी में माता को गौरी कह कर संबोधित किया तभी से इन्हें माँ महागौरी के रूप में जाना जाने लगा।

माँ महागौरी की पूजा का विधान 

श्री माँ दुर्गा जी के इस अष्टम रूप में महागौरी की पूजा नवरात्रि के आठवे दिन होती है। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र के आठवे दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर, माँ के निमित्त विविध प्रकार की विहित पूजन की सामाग्री को संग्रहित करके पूजा करनी चाहिए। सर्व प्रथम एक चौकी पर सफ़ेद वस्त्र बिछाकर उस पर महागौरी यंत्र रखें और यंत्र की स्थापना कर माँ महागौरी की पूजा करनी चाहिए। और दुर्गसप्तशती का पाठ करें या ब्राह्मण से करवाएँ। 

दुर्गा पूजा में अष्टमी तिथि का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है। इस दिन महिलाएँ अपने सुहाग के लिए देवी माँ को चुनरी भेंट करती हैं। अष्टमी के दिन कन्या पूजन करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। कन्याओं की संख्या 9 होनी चाहिए। कन्याओं की आयु 2 साल से ऊपर और 10 साल से अधिक न हो। भोजन कराने के बाद कन्याओं को दक्षिणा देनी चाहिए।

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माँ महागौरी के मंत्र

माँ महागौरी के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप करने का अपना ही महत्व है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है:

ॐ देवी महागौर्यै नमः॥

॥ प्रार्थना मंत्र ॥

श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥

॥ स्तुति ॥

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

॥ ध्यान मंत्र ॥

वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढा चतुर्भुजा महागौरी यशस्विनीम्॥
पूर्णन्दु निभाम् गौरी सोमचक्रस्थिताम् अष्टमम् महागौरी त्रिनेत्राम्।
वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् त्रैलोक्य मोहनम्।
कमनीयां लावण्यां मृणालां चन्दन गन्धलिप्ताम्॥

॥ स्त्रोत ॥

सर्वसङ्कट हन्त्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥
सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदायनीम्।
डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यमङ्गल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।
वददम् चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

॥ कवच मंत्र ॥

ॐकारः पातु शीर्षो माँ, हीं बीजम् माँ, हृदयो।
क्लीं बीजम् सदापातु नभो गृहो च पादयो॥
ललाटम् कर्णो हुं बीजम् पातु महागौरी माँ नेत्रम्‌ घ्राणो।
कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा माँ सर्ववदनो॥

॥ माँ महागौरी की आरती ॥

जय महागौरी जगत की माया।
जया उमा भवानी जय महामाया॥

हरिद्वार कनखल के पासा।
महागौरी तेरी वहां निवासा॥

चंद्रकली ओर ममता अंबे।
जय शक्ति जय जय माँ जगंदबे॥

भीमा देवी विमला माता।
कौशिकी देवी जग विख्यता॥

हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा।
महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा॥

सती {सत} हवन कुंड में था जलाया।
उसी धुएं ने रूप काली बनाया॥

बना धर्म सिंह जो सवारी में आया।
तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया॥

तभी माँ ने महागौरी नाम पाया।
शरण आनेवाले का संकट मिटाया॥

शनिवार को तेरी पूजा जो करता।
माँ बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता॥

भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो।
महागौरी माँ तेरी हरदम ही जय हो॥

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ज्योतिषीय पहलू

ज्योतिष के अनुसार देवी महागौरी राहु ग्रह को नियंत्रित करती , इसलिए उनकी विधिवत उपासना करने से राहु ग्रह के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।

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जब-जब संसार में दैत्यों का अत्याचार बढ़ता है और लोगों का धर्म से विश्वास कम होने लगता है तब-तब दुराचारियों का अंत करने दैविय शक्ति का किसी न किसी रूप में पदार्पण होता है। सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति ने इस संसार में अलग- अलग रूपों में अवतार ले कर जनमानस का कल्याण किया है। माँ दुर्गा के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

शास्त्रों में माता के नौ स्वरूप बताए गये है और इन स्वरूपों कि पूजा करने से लाभ होता है। हमने आप को अपने पूर्व लेखों में देवी के प्रथम छःरूपों (माँ शैलपुत्रीमाँ ब्रह्मचारिणीमाँ चंद्रघंटामाँ कुष्मांडामाँ स्कंदमाता और माँ कात्यायनी ) के बारे में विस्तार से बताया है। इस लेख में हम दुर्गा जी के सातवें स्वरूप के बारे में बता रहे है। देवी अपने सातवें स्वरूप में कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। देवी के इस स्वरूप के नाम का अर्थ- काल अर्थात मृत्यु और समय है और रात्रि अर्थात् रात है। कालरात्रि के नाम का शाब्दिक अर्थ है रात/ अंधेरे को ख़त्म करने वाली। 

माँ कालरात्रि का स्वरूप 

देवी कालरात्रि का शरीर रात के अंधकार की तरह कृष्ण वर्ण का है इनके बाल बिखरे हुए हैं तथा इनके गले में विधुत की माला है। इनके चार भुजाएँ है अपनी बाएँ एक हाथ में कटार तथा एक हाथ में खगड धारण किया हुआ है। देवी के दोनो दाहिने हाथ वरमुद्रा और अभय मुद्रा में है। कालरात्रि का वाहन गर्दभ(गधा) है। इनके तीन नेत्र है तथा इनके श्वास से अग्नि निकलती है। ये तीनों ही नेत्र ब्रह्मांड के समान गोल हैं। माँ कालरात्रि भक्तों का हमेशा कल्याण करती हैं, अतः इन्हें शुभंकरी भी कहते हैं।

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माँ कालरात्रि की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार तीनों लोकों में शुम्भ निशुम्भ नामक दानवो ने आतंक मचा रखा था और देवलोक पर दानवो का राज हो गया था। इससे परेशान होकर सभी देवता माँ पार्वती के पास इस समस्या के समाधान के लिए पहुंचे। माँ उस समय अपने घर में स्नान कर रहीं थीं, इसलिए उन्होंने उनकी मदद के लिए चण्डी को भेजा।

जब देवी चण्डी दानवो से युद्ध करने पहुँची तो दानवो की तरफ़ से चण्ड-मुण्ड नामक दानव आए। देवी ने उनका वध किया जिसके कारण उनका नाम चामुंडा पड़ा। इसके बाद रक्तबीज नामक राक्षस आया। उस को वरदान था की जैसे ही उसके रक्त की बूँद धरती पर गिरेगी तो एक नया रक्तबीज उत्पन होगा। तब देवी ने उसे मारकर उसका रक्त पान करने का निर्णय किया और माँ कालरात्रि को उत्पन्न किया। ताकि माँ कालरात्रि रक्तबीज का वध कर उस का सारा रक्तपान कर ले ताकि रक्त की एक बूँद भी धरती पर ना गिरे और नया रक्तबीज उत्पन ना हो सके।

माँ कालरात्रि की पूजा का विधान 

श्री माँ दुर्गा जी के इस सप्तम रूप में माँ कालरात्रि की पूजा नवरात्रि के सातवें दिन होती है। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र के सातवें दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर, माँ के निमित्त विविध प्रकार की विहित पूजन की सामाग्री को संग्रहित करके नवग्रह, दशदिक्पाल, देवी के परिवार में उपस्थित देवी देवता की पूजा करनी चाहिए, फिर मां कालरात्रि की पूजा करनी चाहिए। और दुर्गसप्तशती का पाठ करें या ब्राह्मण से करवाएँ। 

दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है। सप्तमी की पूजा अन्य दिनों की तरह ही होती परंतु रात्रि में विशेष विधान के साथ देवी की पूजा करने का विधान है। इस दिन कहीं कहीं तांत्रिक विधि से पूजा होने पर मदिरा भी देवी को अर्पित कि जाती है। सप्तमी की रात्रि ‘को सिद्धियों’ की रात भी कहा जाता है। इनकी साधना यदि शास्त्रीय विधि से की जाए तो तत्काल फल प्राप्त होता है। इसमे तनिक भी संदेह नहीं हैं। काली कलकत्ते वाली का नाम कौन नहीं जानता? वैसे तो माँ काली की पूजा व अर्चना सम्पूर्ण भारत व विश्व के अन्य देशों में होती है। किन्तु बंगाल व असम में उनकी पूजा बड़े ही धूम-धाम से की जाती है।

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माँ कालरात्रि के मंत्र

माँ कालरात्रि के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप करने का अपना ही महत्व है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है:

ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥

प्रार्थना मंत्र

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोह लताकण्टकभूषणा।
वर्धन मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

स्तुति

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान मंत्र

करालवन्दना घोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिम् करालिंका दिव्याम् विद्युतमाला विभूषिताम्॥
दिव्यम् लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयम् वरदाम् चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम्॥
महामेघ प्रभाम् श्यामाम् तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवम् सचियन्तयेत् कालरात्रिम् सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥

स्त्रोत

हीं कालरात्रि श्रीं कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥
कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥
क्लीं ह्रीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

कवच मंत्र

ऊँ क्लीं मे हृदयम् पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततम् पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥
रसनाम् पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशङ्करभामिनी॥
वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥

माँ कालरात्रि की आरती

कालरात्रि जय-जय-महाकाली।
काल के मुह से बचाने वाली॥

दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा।
महाचंडी तेरा अवतार॥

पृथ्वी और आकाश पे सारा।
महाकाली है तेरा पसारा॥

खडग खप्पर रखने वाली।
दुष्टों का लहू चखने वाली॥

कलकत्ता स्थान तुम्हारा।
सब जगह देखूं तेरा नजारा॥

सभी देवता सब नर-नारी।
गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥

रक्तदंता और अन्नपूर्णा।
कृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥

ना कोई चिंता रहे बीमारी।
ना कोई गम ना संकट भारी॥

उस पर कभी कष्ट ना आवें।
महाकाली माँ जिसे बचाबे॥

तू भी भक्त प्रेम से कह।
कालरात्रि माँ तेरी जय॥

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ज्योतिषीय पहलू

ज्योतिष के अनुसार देवी कालरात्रि शनि ग्रह को नियंत्रित करती , इसलिए उनकी विधिवत उपासना करने से शनि के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।

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Mata Katyayani | माँ कात्यायनी – जाने माता की कथा, मंत्र, पूजा विधि और आरती https://astrodeeva.com/mata-katyayani-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4/ https://astrodeeva.com/mata-katyayani-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4/#comments Tue, 13 Oct 2020 04:08:49 +0000 https://astrodeeva.com/?p=935 जब-जब संसार में दैत्यों का अत्याचार बढ़ता है और लोगों का धर्म से विश्वास कम होने लगता है तब-तब दुराचारियों का अंत करने दैविय शक्ति का किसी न किसी रूप में पदार्पण होता है। सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति ने इस संसार में अलग- अलग […]

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जब-जब संसार में दैत्यों का अत्याचार बढ़ता है और लोगों का धर्म से विश्वास कम होने लगता है तब-तब दुराचारियों का अंत करने दैविय शक्ति का किसी न किसी रूप में पदार्पण होता है। सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति ने इस संसार में अलग- अलग रूपों में अवतार ले कर जनमानस का कल्याण किया है। माँ भवानी के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

शास्त्रों में माता के नौ स्वरूप है और इन स्वरूपों कि पूजा करने से लाभ होता है। वो अपने छठे स्वरूप में कात्यायनी के नाम से जानी जाती हैं। देवी ने यह रूप महिषासुर नामक राक्षक का वध करने के लिए धारण किया था। माँ कात्यायनी को उनके हिंसक रूप के कारण युद्ध की देवी भी कहा जाता है।

माँ कात्यायनी का स्वरूप

माँ कात्यायनी शेर पे सवार हैं। इनकी चार भुजाएँ है ये अपने बाएँ एक हाथ ने कमल और दूसरे बाएँ हाथ में तलवार धारण करती हैं वहीं माता अपने दाएँ एक हाथ में अभय मुद्रा और दूसरे हाथ से माँ सब को आशीर्वाद प्रदान करती है। 

माँ कात्यायनी की कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार प्रसिद्ध महर्षि  कात्यायन ने अनेक वर्षों तक भगवती पराम्बा की कठिन तपस्या की और उन्होंने भगवती को प्रसन्न कर उन्हें अपने घर में पुत्री रूप में जन्म लेने का वरदान माँगा। माता ने उनकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न हो कर उनकी यह इच्छा स्वीकार कर ली और देवताओं, ऋषियों के संकट दूर करने हेतु महर्षि कात्यायन के घर अश्विन कृष्णचतुर्दशी के दिन पुत्री रूप में जन्म लिया। इसलिए माता का नाम कात्यायनी पड़ा। 

कुछ समय पश्चात जब पूरी दुनिया में महिषासुर नामक राक्षस ने अपना उत्पात व तांडव मचाया था तब देवी ने दशमी के दिन महिषासुर का वध कर देवों और ऋषियों को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया। 

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माँ कात्यायनी की पूजा का विधान 

श्री माँ दुर्गा जी के इस छठे रूप में माँ कात्यायनी  की पूजा नवरात्रि के छठवें दिन होती है। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र के छठवें दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर, माँ के निमित्त विविध प्रकार की विहित पूजन की सामाग्री को संग्रहित करके भक्ति-भाव से पूजन करना चहिये और दुर्गसप्तशती का पाठ करें या ब्राह्मण से करवाएँ। माँ को केले का भोग लगना चहिये।

माँ कात्यायनी की पूरे भक्ति भाव से पूजा करने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है तथा शारीरिक बल और समृद्ध होता है। भक्त रोग और भय से मुक्त होता है तथा प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष शत्रुओं से छुटकारा प्राप्त करता है। 

ऐसी भी मान्यता है की ब्रज की गोपियों ने भगवान कृष्ण को प्रियतम के रूप में पाने के लिए माँ कात्यायनी की पूजा कालिंदी यमुनाके तट पर की थी। 

माँ कात्यायनी के मंत्र

माँ कात्यायनी के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप किए जाने का विधान है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है 

ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥

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प्रार्थना मंत्र

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥

स्तुति

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान

वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्विनीम्॥
स्वर्णवर्णा आज्ञाचक्र स्थिताम् षष्ठम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम्॥

माँ कात्यायनी की स्तोत्र पाठ (Mata Katyayani Stotra)

कञ्चनाभां वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखी शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोऽस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालङ्कार भूषिताम्।
सिंहस्थिताम् पद्महस्तां कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
परमानन्दमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभर्ती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्वाचिन्ता, विश्वातीता कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
कां बीजा, कां जपानन्दकां बीज जप तोषिते।
कां कां बीज जपदासक्ताकां कां सन्तुता॥
कांकारहर्षिणीकां धनदाधनमासना।
कां बीज जपकारिणीकां बीज तप मानसा॥
कां कारिणी कां मन्त्रपूजिताकां बीज धारिणी।
कां कीं कूंकै क: ठ: छ: स्वाहारूपिणी॥

माँ कात्यायनी की कवच ( Mata Katyayani Kavach)

कात्यायनौमुख पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी हृदयम् पातु जया भगमालिनी॥

|| माँ कात्यायनी की आरती ||

जय कात्यायनी माँ, मैया जय कात्यायनी माँ ।
उपमा  रहित  भवानी,   दूँ   किसकी  उपमा ॥
मैया जय कात्यायनी….

गिरजापति शिव का तप, असुर रम्भ कीन्हाँ ।
वर-फल जन्म रम्भ  गृह,  महिषासुर  लीन्हाँ ॥
मैया जय कात्यायनी….

कर  शशांक-शेखर   तप,  महिषासुर   भारी ।
शासन   कियो   सुरन  पर,  बन   अत्याचारी ॥
मैया जय कात्यायनी….

त्रिनयन  ब्रह्म  शचीपति,  पहुँचे, अच्युत  गृह ।
महिषासुर   बध   हेतू,   सुर   कीन्हौं   आग्रह ॥
मैया जय कात्यायनी….

सुन  पुकार  देवन मुख,  तेज  हुआ  मुखरित ।
जन्म लियो कात्यायनी, सुर-नर-मुनि के हित ॥
मैया जय कात्यायनी….

अश्विन कृष्ण-चौथ  पर,  प्रकटी  भवभामिनि ।
पूजे  ऋषि   कात्यायन,  नाम  काऽऽत्यायिनि ॥
मैया जय कात्यायनी….

अश्विन  शुक्ल-दशी    को,   महिषासुर  मारा ।
नाम   पड़ा   रणचण्डी,   मरणलोक    न्यारा ॥
मैया जय कात्यायनी….

दूजे      कल्प    संहारा,    रूप     भद्रकाली ।
तीजे    कल्प    में    दुर्गा,   मारा   बलशाली ॥
मैया जय कात्यायनी….

दीन्हौं पद  पार्षद  निज,  जगतजननि  माया ।
देवी   सँग    महिषासुर,  रूप   बहुत   भाया ॥
मैया जय कात्यायनी….

उमा     रमा     ब्रह्माणी,    सीता    श्रीराधा ।
तुम  सुर-मुनि  मन-मोहनि, हरिये  भव-बाधा ॥
मैया जय कात्यायनी….

जयति   मङ्गला  काली,  आद्या  भवमोचनि ।
सत्यानन्दस्वरूपणि,        महिषासुर-मर्दनि ॥
मैया जय कात्यायनी….

जय-जय  अग्निज्वाला,   साध्वी   भवप्रीता ।
करो  हरण   दुःख   मेरे,   भव्या    सुपुनीता॥
मैया जय कात्यायनी….

अघहारिणि भवतारिणि, चरण-शरण  दीजै ।
हृदय-निवासिनि    दुर्गा,   कृपा-दृष्टि  कीजै ॥
मैया जय कात्यायनी….

ब्रह्मा  अक्षर  शिवजी,  तुमको   नित  ध्यावै ।
करत ‘अशोक’ नीराजन, वाञ्छितफल पावै॥
मैया जय कात्यायनी….

(आरती रचना-अशोक कुमार खरे)

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ज्योतिषीय पहलू

ज्योतिष के अनुसार देवी कात्यायनि बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करती , इसलिए उनकी विधिवत उपासना करने से बृहस्पति के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।

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