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जब-जब संसार में दैत्यों का अत्याचार बढ़ता है और लोगों का धर्म से विश्वास कम होने लगता है तब-तब दुराचारियों का अंत करने दैविय शक्ति का किसी न किसी रूप में पदार्पण होता है। सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति ने इस संसार में अलग- अलग रूपों में अवतार ले कर जनमानस का कल्याण किया है। माँ दुर्गा के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

शास्त्रों में माता के नौ स्वरूप बताए गये है और इन स्वरूपों कि पूजा करने से लाभ होता है। हमने आप को अपने पूर्व लेखों में देवी के प्रथम सात रूपों (माँ शैलपुत्रीमाँ ब्रह्मचारिणीमाँ चंद्रघंटामाँ कुष्मांडामाँ स्कंदमातामाँ कात्यायनी और माँ कालरात्रि) के बारे में विस्तार से बताया है। इस लेख में हम दुर्गा जी के अष्टम स्वरूप के बारे में बता रहे है।  देवी अपने अष्टम स्वरूप में महागौरी के नाम से जानी जाती हैं। देवी के इस स्वरूप के नाम का अर्थ- महा अर्थात महान और बड़ा है और गौरी अर्थात् गोरी है। महागौरी के नाम का शाब्दिक अर्थ है सबसे गोरी/ सुंदर।

माँ महागौरी का स्वरूप 

देवी महागौरी का वर्ण पूर्णतः गोरा है, इस गौरता की उपमा शंख और चंद्र से दी गई है। इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं। इसलिए इन्हें महागौरी कहा गया है। इनकी चार भुजाएँ है । माता अपने एक बाएँ हाथ में डमरू धारण किए हुए है तथा दूसरा बायां हाथ वर मुद्रा में है। देवी अपने दाएँ एक हाथ में त्रिशूल धारण करती है और दूसरा दाहिना हाथ अभय मुद्रा धारण किए हुए है। देवी महागौरी वृषभ की सवारी करती हैं। 

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माँ महागौरी की कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए देवी ने अपने बाल्यकाल से ही कठोर तपस्या प्रारम्भ की और कई वर्षों के कठोर तप के बाद भगवान शिव प्रसन्न हुए और देवी को अपनी भार्या के रूप में स्वीकार किया। इतने वर्षों की कठोर तपस्या के कारण देवी का शरीर अत्यंत जीर्ण व कमजोर होकर काले रंग का हो गया था। देवी की ऐसी दशा को देख कर भोलेनाथ ने अपने कमंडल से गंगा जल निकाल कर देवी पे छिड़क दिया और देवी को गंगा जल से स्नान करवाया। जिसके प्रभाव व शिव की इच्छा से देवी का वर्ण विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान हो गया। तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा। 

देवी का नाम महागौरी क्यों पड़ा इस पर एक और पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार माता और शिव जी बातें कर रहे थे इसी बीच बातों बातों में भगवान शिव ने माता से कुछ कह दिया। जिसे माता ने अपने मन में लगा लिया और वहाँ से चली गयी और तपस्या में लीन हो गयी। जब माता कई वर्षों तक नहीं लौटी तो भगवान शिव उन्हें खोजने के लिए निकल पड़े। खोजते खोजते शिव वहाँ पहुँच गये जहाँ माता तपस्या में लीन थी। तपस्या के कारण माता का शरीर अति तेज से युक्त हो गया जिसे देख शिव जी में माता को गौरी कह कर संबोधित किया तभी से इन्हें माँ महागौरी के रूप में जाना जाने लगा।

माँ महागौरी की पूजा का विधान 

श्री माँ दुर्गा जी के इस अष्टम रूप में महागौरी की पूजा नवरात्रि के आठवे दिन होती है। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र के आठवे दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर, माँ के निमित्त विविध प्रकार की विहित पूजन की सामाग्री को संग्रहित करके पूजा करनी चाहिए। सर्व प्रथम एक चौकी पर सफ़ेद वस्त्र बिछाकर उस पर महागौरी यंत्र रखें और यंत्र की स्थापना कर माँ महागौरी की पूजा करनी चाहिए। और दुर्गसप्तशती का पाठ करें या ब्राह्मण से करवाएँ। 

दुर्गा पूजा में अष्टमी तिथि का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है। इस दिन महिलाएँ अपने सुहाग के लिए देवी माँ को चुनरी भेंट करती हैं। अष्टमी के दिन कन्या पूजन करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। कन्याओं की संख्या 9 होनी चाहिए। कन्याओं की आयु 2 साल से ऊपर और 10 साल से अधिक न हो। भोजन कराने के बाद कन्याओं को दक्षिणा देनी चाहिए।

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माँ महागौरी के मंत्र

माँ महागौरी के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप करने का अपना ही महत्व है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है:

ॐ देवी महागौर्यै नमः॥

॥ प्रार्थना मंत्र ॥

श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥

॥ स्तुति ॥

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

॥ ध्यान मंत्र ॥

वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढा चतुर्भुजा महागौरी यशस्विनीम्॥
पूर्णन्दु निभाम् गौरी सोमचक्रस्थिताम् अष्टमम् महागौरी त्रिनेत्राम्।
वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् त्रैलोक्य मोहनम्।
कमनीयां लावण्यां मृणालां चन्दन गन्धलिप्ताम्॥

॥ स्त्रोत ॥

सर्वसङ्कट हन्त्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥
सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदायनीम्।
डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यमङ्गल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।
वददम् चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

॥ कवच मंत्र ॥

ॐकारः पातु शीर्षो माँ, हीं बीजम् माँ, हृदयो।
क्लीं बीजम् सदापातु नभो गृहो च पादयो॥
ललाटम् कर्णो हुं बीजम् पातु महागौरी माँ नेत्रम्‌ घ्राणो।
कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा माँ सर्ववदनो॥

॥ माँ महागौरी की आरती ॥

जय महागौरी जगत की माया।
जया उमा भवानी जय महामाया॥

हरिद्वार कनखल के पासा।
महागौरी तेरी वहां निवासा॥

चंद्रकली ओर ममता अंबे।
जय शक्ति जय जय माँ जगंदबे॥

भीमा देवी विमला माता।
कौशिकी देवी जग विख्यता॥

हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा।
महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा॥

सती {सत} हवन कुंड में था जलाया।
उसी धुएं ने रूप काली बनाया॥

बना धर्म सिंह जो सवारी में आया।
तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया॥

तभी माँ ने महागौरी नाम पाया।
शरण आनेवाले का संकट मिटाया॥

शनिवार को तेरी पूजा जो करता।
माँ बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता॥

भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो।
महागौरी माँ तेरी हरदम ही जय हो॥

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ज्योतिषीय पहलू

ज्योतिष के अनुसार देवी महागौरी राहु ग्रह को नियंत्रित करती , इसलिए उनकी विधिवत उपासना करने से राहु ग्रह के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।

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