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महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग (Mahakaleshwar Jyotirlinga) मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी कही जाने वाली उज्जैन नगरी में शिप्रा नदी के किनारे स्थित है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है। महाकालेश्वर की पूजा विशेष रूप से आयु वृद्धि और आयु पर आए हुए संकट को टालने के लिए की जाती है। उज्जैन वासी मानते हैं कि भगवान महाकालेश्वर ही उनके राजा हैं और वे ही उज्जैन की रक्षा कर रहे हैं।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा (Story of Mahakaleshwar Jyotirlinga)

उज्जैन का प्राचीन नाम अवन्ति था। एक समय वहाँ वेदप्रिय नामक एक ब्राह्मण रहते थे जो सदाचारी , वेद और शास्त्रों के स्वाध्याय में संलग्न तथा वैदिक कर्मों के अनुष्ठान में सदा तत्पर रहने वाले थे। वे घर में प्रतिदिन अग्निहोत्र करते और निरंतर शिव की पूजा में लीन रहते थे। वे ब्राह्मण प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा किया करते थे।उनके देवप्रिय , प्रियमेधा , सुकृत और सुव्रत नाम के चार तेजस्वी पुत्र थे, जो सद्गुनो में अपने माता पिता के समान ही थे। अपने सद्गुणों के कारण उन सभी भाइयों का यश चारों ओर फैला हुआ था।

उसी समय रत्नमाल पर्वत पर दूषण नामक एक असुर ने ब्रह्मा जी से वर पाकर वेद, धर्म तथा धर्मात्माओं पर आक्रमण किया। इसके बाद उसने सेना के साथ अवन्ति के ब्राह्मणों पर आक्रमण किया। उसकी आज्ञा से दैत्यों ने अवन्ति को चारों ओर से घेर लिया। जब नगर के सभी लोग बहुत घबरा गए तब उन शिव भक्त ब्राह्मण बंधुओं ने सबसे कहा – ”आपलोग भगवान शंकर पर भरोसा रखें।” ये कहकर शिवलिंग का पूजन करके वे भगवान शिव का ध्यान करने लगे। इतने में ही सेना सहित दूषण वहाँ पहुँच गया और कहा– ” इन्हें मार डालो, बांध लो। “

वेदप्रिय के पुत्रों ने उस समय उस दैत्य की कही हुई कोई बात नहीं सुनी, क्योंकि वे भगवान शिव के ध्यान में स्थित थे। वह दैत्य जैसे ही उन ब्राह्मणों को मारने के लिए आगे बढ़ा वैसे ही उनके द्वारा पूजित पार्थिव शिवलिंग के स्थान में बड़ी भारी आवाज के साथ एक गड्ढा प्रकट हो गया। उस गड्ढे से तत्काल विकट रूप धारण किये हुए भगवान शिव प्रकट हो गए, जो महाकाल के नाम से विख्यात हुए। वे दुष्टों के विनाशक तथा सत्पुरुषों के रक्षक हैं। उन्होंने उन दैत्यों से कहा – ” अरे दुष्ट! मैं तुझ जैसे पापियों के संहार हेतु महाकाल रूप में प्रकट हुआ हूँ।“ ऐसा कहकर महाकाल शंकर ने तत्काल दूषण को सेनासहित भस्म कर दिया और उन ब्राह्मणों को आश्वासन देकर स्वयं महाकाल शिव ने प्रसन्न होकर उनसे कहा – ” तुम लोग वर माँगो “

तब सभी ब्राह्मणों ने हाथ जोड़ कर भक्तिभाव से प्रणाम करके कहा – ” हे महाकाल! दुष्टों को दंड देनेवाले प्रभु! आप हमें मोक्ष प्रदान करें। आप जनसाधारण की रक्षा के लिए सदा यहीं निवास करें और अपना दर्शन करने वाले मनुष्यों का आप सदेव उद्धार करें।“ उन ब्राह्मणों के ऐसा कहने पर उन्हें सद्गति देकर भगवान शिव अपने भक्तों की रक्षा के लिए उस परम सुन्दर गड्ढे में स्थित हो गए। उस स्थान से चारों ओर एक कोस की भूमि लिंगरूपी भगवान शिव का तीर्थ बन गयी और वह स्थान संसार में महाकालेश्वर के नाम से विख्यात हुआ। उनका दर्शन करने से सपने में भी कोई दुःख नहीं होता। जिस किसी भी कामना को लेकर कोई उस लिंग की उपासना करता है उसे अपना मनोरथ प्राप्त होता है तथा परलोक में मोक्ष भी मिल जाता है।

आकाशे तारकांलिंगम्, पाताले हाटकेश्वरम्।
मृत्युलोके महाकालं, सर्वलिंग नमोस्तुते ॥

 

भगवान महाकाल को तीनो लोकों में विद्यमान सभी शिवलिंगों में प्रधान कहा गया है, वराह पुराण में कहा गया है

नाभिदेशे महाकालस्तन्नाम्ना तत्र वै हर:

अर्थात नाभिदेश उज्जैन में स्थित भगवान महाकालेश्वर(Mahakaleshwar Jyotirlinga) तीनों लोकों में पूज्यनीय हैं।

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