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जब-जब संसार में दैत्यों का अत्याचार बढ़ता है और लोगों का धर्म से विश्वास कम होने लगता है तब-तब दुराचारियों का अंत करने दैविय शक्ति का किसी न किसी रूप में पदार्पण होता है। सनातन धर्म में माँ आदिशक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति ने इस संसार में अलग- अलग रूपों में अवतार ले कर जनमानस का कल्याण किया है। माँ भवानी के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

शास्त्रों में माता के नौ स्वरूप है और इन स्वरूपों कि पूजा करने से लाभ होता है। वो अपने छठे स्वरूप में कात्यायनी के नाम से जानी जाती हैं। देवी ने यह रूप महिषासुर नामक राक्षक का वध करने के लिए धारण किया था। माँ कात्यायनी को उनके हिंसक रूप के कारण युद्ध की देवी भी कहा जाता है।

माँ कात्यायनी का स्वरूप

माँ कात्यायनी शेर पे सवार हैं। इनकी चार भुजाएँ है ये अपने बाएँ एक हाथ ने कमल और दूसरे बाएँ हाथ में तलवार धारण करती हैं वहीं माता अपने दाएँ एक हाथ में अभय मुद्रा और दूसरे हाथ से माँ सब को आशीर्वाद प्रदान करती है। 

माँ कात्यायनी की कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार प्रसिद्ध महर्षि  कात्यायन ने अनेक वर्षों तक भगवती पराम्बा की कठिन तपस्या की और उन्होंने भगवती को प्रसन्न कर उन्हें अपने घर में पुत्री रूप में जन्म लेने का वरदान माँगा। माता ने उनकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न हो कर उनकी यह इच्छा स्वीकार कर ली और देवताओं, ऋषियों के संकट दूर करने हेतु महर्षि कात्यायन के घर अश्विन कृष्णचतुर्दशी के दिन पुत्री रूप में जन्म लिया। इसलिए माता का नाम कात्यायनी पड़ा। 

कुछ समय पश्चात जब पूरी दुनिया में महिषासुर नामक राक्षस ने अपना उत्पात व तांडव मचाया था तब देवी ने दशमी के दिन महिषासुर का वध कर देवों और ऋषियों को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया। 

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माँ कात्यायनी की पूजा का विधान 

श्री माँ दुर्गा जी के इस छठे रूप में माँ कात्यायनी  की पूजा नवरात्रि के छठवें दिन होती है। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र के छठवें दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर, माँ के निमित्त विविध प्रकार की विहित पूजन की सामाग्री को संग्रहित करके भक्ति-भाव से पूजन करना चहिये और दुर्गसप्तशती का पाठ करें या ब्राह्मण से करवाएँ। माँ को केले का भोग लगना चहिये।

माँ कात्यायनी की पूरे भक्ति भाव से पूजा करने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है तथा शारीरिक बल और समृद्ध होता है। भक्त रोग और भय से मुक्त होता है तथा प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष शत्रुओं से छुटकारा प्राप्त करता है। 

ऐसी भी मान्यता है की ब्रज की गोपियों ने भगवान कृष्ण को प्रियतम के रूप में पाने के लिए माँ कात्यायनी की पूजा कालिंदी यमुनाके तट पर की थी। 

माँ कात्यायनी के मंत्र

माँ कात्यायनी के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप किए जाने का विधान है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है 

ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥

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प्रार्थना मंत्र

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥

स्तुति

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान

वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्विनीम्॥
स्वर्णवर्णा आज्ञाचक्र स्थिताम् षष्ठम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम्॥

माँ कात्यायनी की स्तोत्र पाठ (Mata Katyayani Stotra)

कञ्चनाभां वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखी शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोऽस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालङ्कार भूषिताम्।
सिंहस्थिताम् पद्महस्तां कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
परमानन्दमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभर्ती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्वाचिन्ता, विश्वातीता कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
कां बीजा, कां जपानन्दकां बीज जप तोषिते।
कां कां बीज जपदासक्ताकां कां सन्तुता॥
कांकारहर्षिणीकां धनदाधनमासना।
कां बीज जपकारिणीकां बीज तप मानसा॥
कां कारिणी कां मन्त्रपूजिताकां बीज धारिणी।
कां कीं कूंकै क: ठ: छ: स्वाहारूपिणी॥

माँ कात्यायनी की कवच ( Mata Katyayani Kavach)

कात्यायनौमुख पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी हृदयम् पातु जया भगमालिनी॥

|| माँ कात्यायनी की आरती ||

जय कात्यायनी माँ, मैया जय कात्यायनी माँ ।
उपमा  रहित  भवानी,   दूँ   किसकी  उपमा ॥
मैया जय कात्यायनी….

गिरजापति शिव का तप, असुर रम्भ कीन्हाँ ।
वर-फल जन्म रम्भ  गृह,  महिषासुर  लीन्हाँ ॥
मैया जय कात्यायनी….

कर  शशांक-शेखर   तप,  महिषासुर   भारी ।
शासन   कियो   सुरन  पर,  बन   अत्याचारी ॥
मैया जय कात्यायनी….

त्रिनयन  ब्रह्म  शचीपति,  पहुँचे, अच्युत  गृह ।
महिषासुर   बध   हेतू,   सुर   कीन्हौं   आग्रह ॥
मैया जय कात्यायनी….

सुन  पुकार  देवन मुख,  तेज  हुआ  मुखरित ।
जन्म लियो कात्यायनी, सुर-नर-मुनि के हित ॥
मैया जय कात्यायनी….

अश्विन कृष्ण-चौथ  पर,  प्रकटी  भवभामिनि ।
पूजे  ऋषि   कात्यायन,  नाम  काऽऽत्यायिनि ॥
मैया जय कात्यायनी….

अश्विन  शुक्ल-दशी    को,   महिषासुर  मारा ।
नाम   पड़ा   रणचण्डी,   मरणलोक    न्यारा ॥
मैया जय कात्यायनी….

दूजे      कल्प    संहारा,    रूप     भद्रकाली ।
तीजे    कल्प    में    दुर्गा,   मारा   बलशाली ॥
मैया जय कात्यायनी….

दीन्हौं पद  पार्षद  निज,  जगतजननि  माया ।
देवी   सँग    महिषासुर,  रूप   बहुत   भाया ॥
मैया जय कात्यायनी….

उमा     रमा     ब्रह्माणी,    सीता    श्रीराधा ।
तुम  सुर-मुनि  मन-मोहनि, हरिये  भव-बाधा ॥
मैया जय कात्यायनी….

जयति   मङ्गला  काली,  आद्या  भवमोचनि ।
सत्यानन्दस्वरूपणि,        महिषासुर-मर्दनि ॥
मैया जय कात्यायनी….

जय-जय  अग्निज्वाला,   साध्वी   भवप्रीता ।
करो  हरण   दुःख   मेरे,   भव्या    सुपुनीता॥
मैया जय कात्यायनी….

अघहारिणि भवतारिणि, चरण-शरण  दीजै ।
हृदय-निवासिनि    दुर्गा,   कृपा-दृष्टि  कीजै ॥
मैया जय कात्यायनी….

ब्रह्मा  अक्षर  शिवजी,  तुमको   नित  ध्यावै ।
करत ‘अशोक’ नीराजन, वाञ्छितफल पावै॥
मैया जय कात्यायनी….

(आरती रचना-अशोक कुमार खरे)

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ज्योतिषीय पहलू

ज्योतिष के अनुसार देवी कात्यायनि बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करती , इसलिए उनकी विधिवत उपासना करने से बृहस्पति के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।

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Mata Brahmacharini | माँ ब्रह्मचारिणी- जाने माता की कथा, मंत्र, पूजा विधि और आरती https://astrodeeva.com/mata-brahmacharini-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a3%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87/ https://astrodeeva.com/mata-brahmacharini-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a3%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87/#comments Fri, 02 Oct 2020 05:21:19 +0000 https://astrodeeva.com/?p=873 माँ आदिशक्ति सम्पूर्ण जगत का कल्याण करती है। माँ भवानी के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार माँ आदिशक्ति के नौ स्वरूप है और वो अपने दूसरे स्वरूप में ब्रह्मचारिणी के नाम से जानी जाती हैं। […]

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माँ आदिशक्ति सम्पूर्ण जगत का कल्याण करती है। माँ भवानी के रूप इतने कल्याणकारी है कि इनके दर्शन एवं पूजन से भक्त के संकट नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार माँ आदिशक्ति के नौ स्वरूप है और वो अपने दूसरे स्वरूप में ब्रह्मचारिणी के नाम से जानी जाती हैं। नवरात्र के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। भक्त एवं योगी इस दिन माँ के चरणों में अपना मन लगाते हैं। ब्रह्म का शाब्दिक अर्थ होता है तपस्या और चारिणी का अर्थ होता है आचरण करने वाली। अतः ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। जो माता के रूप में सीधा दिखता है। माँ ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में जप की माला और बाएँ हाथ में कमंडल रहता है। 

माँ ब्रह्मचारिणी की कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया। देवऋषि नारद ने इनकी कुंडली देख कर बताया कि इस कन्या का विवाह तो त्रिलोक के स्वामी भगवान शंकर से होगा। यह सुन देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने की इच्छा अपने माता-पिता के सामने व्यक्त की। देवी की यह इच्छा सुन उनके माता-पिता को चिंता हुई और उन्होंने देवी को हतोत्साहित करने की पुरजोर कोशिश की परंतु देवी ने तो भोलेनाथ को पति के रूप में पाने दृढ़ निश्चय कर लिया था। 

देवी ने भगवान शंकर को पाने के लिए कठोर तपस्या की। उन्होंने एक हजार वर्ष तक केवल फल-फूल का सेवन किया तथा एक सौ वर्ष तक केवल शाक पर निर्वाह किया। देवी ने कई हजार वर्ष तक निर्जला तप किया। इस कठोर तपस्या करने के कारण ही देवी को तपश्चारिणी के नाम से भी जाना जाता है। अंत में देवी भगवान शिव को मनाने में सफल हुई और शिव जी ने उनसे विवाह किया। 

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माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा का विधान 

माँ ब्रह्मचारिणी श्री दुर्गा जी का दूसरा रूप हैं। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र के दूसरे दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर माँ की पूजा करनी चहिये।  

देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें-

इधाना कदपद्माभ्याममक्षमालाक कमण्डलु । देवी प्रसिदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्त्मा ।।

इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भांति भांति के फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें, देवी को लाल फूल अति पसंद है। 

माँ ब्रह्मचारिणी के मंत्र

माँ ब्रह्मचारिणी के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप किए जाने का विधान है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है। 

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

Must Read: दुर्गा सप्तशती सम्पूर्ण पाठ का फल पायें इस एक मंत्र के जाप से।Durga Saptashati

ध्यान मंत्र 

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥
परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

कवच

त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

मंत्र, स्तोत्र पाठ और कवच के जाप के साथ घी एवं  कपूर मिलाकर देवी की आरती करें। 

माँ ब्रह्मचारिणी की आरती:

जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता। जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।

ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो।।

ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा। जिसको जपे सकल संसारा।

जय गायत्री वेद की माता। जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।।

कमी कोई रहने न पाए। कोई भी दुख सहने न पाए।

उसकी विरति रहे ठिकाने। जो ​तेरी महिमा को जाने।।

रुद्राक्ष की माला ले कर। जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।

आलस छोड़ करे गुणगाना। मां तुम उसको सुख पहुंचाना।।

ब्रह्माचारिणी तेरो नाम। पूर्ण करो सब मेरे काम।

भक्त तेरे चरणों का पुजारी। रखना लाज मेरी महतारी।।

आरती करने के उपरांत  दोनों हाथ जोड़कर सभी देवी देवताओं को प्रणाम करें और नीचे दिए मंत्र के द्वारा क्षमा प्रार्थना करें-
“आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं, पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी”

ज्योतिषीय पहलू

ज्योतिष के अनुसार माँ ब्रह्मचारिणी मंगल ग्रह को नियंत्रित करती हैंइसलिए उनकी विधिवत से उपासना करने से मंगल ग्रह के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।

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