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* Gets views count.
*
* @param int $id The Post ID.
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* @param bool $number_format Whether to format the number (eg. 9,999) or not (eg. 9999)
* @return string
*/
function jnews_get_views( $id = null, $range = null, $number_format = true ) {
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'range' => $range,
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if ( ! function_exists( 'jnews_view_counter_query' ) ) {
/**
* Do Query
*
* @param $instance
* @return array
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function jnews_view_counter_query( $instance ) {
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The post Mata Skandmata | माँ स्कंदमाता- जाने माता के मंत्र, पूजा विधि और आरती appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>शास्त्रों के अनुसार माँ आदिशक्ति के नौ स्वरूप है और इन स्वरूपों कि पूजा करने से लाभ होता है। वो अपने पांचवें स्वरूप में स्कंदमाता के नाम से जानी जाती हैं। माता के इस रूप का शाब्दिक अर्थ है स्कंद मतलब भगवान कार्तिकेय/मुरुगन और माता मतलब माता है, अतः इनके नाम का मतलब स्कंद की माता है।
माता का यह ममतामयी स्वरूप है शास्त्रों के अनुसार इनकी चार भुजाएँ हैं। माँ ने एक हाथ से अपने पुत्र भगवान कार्तिकेय(स्कंद) को अपने गोद में बैठाया हुआ है, दो भुजाओं में माँ कमल के फूल को धारण किये हुए है और एक भुजा से अपने भक्तों को आशीर्वाद प्रदान कर रही हैं। माँ शक्ति अपने इस रूप से संदेश देती है की वो अपना वात्सल्य सभी को एक समान प्रदान करती है परंतु अगर कोई उनके संतान/भक्त को किसी प्रकार का कष्ट देता है तो माँ उग्र रूप में आकर दुष्टों का संहार भी करती हैं।
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श्री माँ दुर्गा जी के इस पंचम रूप में माँ स्कंदमाता की पूजा नवरात्रि के पाँचवें दिन होती है। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र के पाँचवें दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर, माँ के निमित्त विविध प्रकार की विहित पूजन की सामाग्री को संग्रहित करके भक्ति-भाव से पूजन करना चहिये और दुर्गसप्तशती का पाठ करें या ब्राह्मण से करवाएँ। माँ को केले का भोग लगना चहिये।
माँ स्कंदमाता की पूजा करने से भगवान स्कंद की पूजा भी स्वतः हो जाती है। जो भक्त भक्ति-भाव से माता की पूजा आराधना करता है तो माँ उसे ज्ञान, शक्ति और समृद्धि प्रदान करती है।
माँ स्कंदमाता के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप किए जाने का विधान है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है
ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥
Must Read: दुर्गा सप्तशती सम्पूर्ण पाठ का फल पायें इस एक मंत्र के जाप से।Durga Saptashati
सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चित करद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।
धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥
नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।
समग्रतत्वसागररमपारपार गहराम्॥
शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्।
ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रीन्तिभास्कराम्॥
महेन्द्रकश्यपार्चिता सनंतकुमाररसस्तुताम्।
सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलादभुताम्॥
अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्।
मुमुक्षुभिर्विचिन्तता विशेषतत्वमुचिताम्॥
नानालंकार भूषितां मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्।
सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेन्दमारभुषताम्॥
सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्रकौरिघातिनीम्।
शुभां पुष्पमालिनी सुकर्णकल्पशाखिनीम्॥
तमोन्धकारयामिनी शिवस्वभाव कामिनीम्।
सहस्त्र्सूर्यराजिका धनज्ज्योगकारिकाम्॥
सुशुध्द काल कन्दला सुभडवृन्दमजुल्लाम्।
प्रजायिनी प्रजावति नमामि मातरं सतीम्॥
स्वकर्मकारिणी गति हरिप्रयाच पार्वतीम्।
अनन्तशक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्तिमुक्तिदाम्॥
पुनःपुनर्जगद्वितां नमाम्यहं सुरार्चिताम्।
जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवीपाहिमाम्॥
ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा।
हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥
श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।
सर्वांग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा॥
वाणंवपणमृते हुं फ्ट बीज समन्विता।
उत्तरस्या तथाग्नेव वारुणे नैॠतेअवतु॥
इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी।
सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥
जय तेरी हो स्कन्द माता। पांचवां नाम तुम्हारा आता॥
सबके मन की जानन हारी। जग जननी सबकी महतारी॥
तेरी जोत जलाता रहूं मैं। हरदम तुझे ध्याता रहूं मै॥
कई नामों से तुझे पुकारा। मुझे एक है तेरा सहारा॥
कही पहाड़ों पर है डेरा। कई शहरों में तेरा बसेरा॥
हर मन्दिर में तेरे नजारे। गुण गाए तेरे भक्त प्यारे॥
भक्ति अपनी मुझे दिला दो। शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो॥
इन्द्र आदि देवता मिल सारे। करे पुकार तुम्हारे द्वारे॥
दुष्ट दैत्य जब चढ़ कर आए। तू ही खण्ड हाथ उठाए॥
दासों को सदा बचाने आयी। भक्त की आस पुजाने आयी॥
ज्योतिष के अनुसार देवी स्कंदमाता बुध ग्रह को नियंत्रित करती , इसलिए उनकी विधिवत उपासना करने से बुध के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।
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]]>The post Mata Brahmacharini | माँ ब्रह्मचारिणी- जाने माता की कथा, मंत्र, पूजा विधि और आरती appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>पौराणिक कथा के अनुसार देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया। देवऋषि नारद ने इनकी कुंडली देख कर बताया कि इस कन्या का विवाह तो त्रिलोक के स्वामी भगवान शंकर से होगा। यह सुन देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने की इच्छा अपने माता-पिता के सामने व्यक्त की। देवी की यह इच्छा सुन उनके माता-पिता को चिंता हुई और उन्होंने देवी को हतोत्साहित करने की पुरजोर कोशिश की परंतु देवी ने तो भोलेनाथ को पति के रूप में पाने दृढ़ निश्चय कर लिया था।
देवी ने भगवान शंकर को पाने के लिए कठोर तपस्या की। उन्होंने एक हजार वर्ष तक केवल फल-फूल का सेवन किया तथा एक सौ वर्ष तक केवल शाक पर निर्वाह किया। देवी ने कई हजार वर्ष तक निर्जला तप किया। इस कठोर तपस्या करने के कारण ही देवी को तपश्चारिणी के नाम से भी जाना जाता है। अंत में देवी भगवान शिव को मनाने में सफल हुई और शिव जी ने उनसे विवाह किया।
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माँ ब्रह्मचारिणी श्री दुर्गा जी का दूसरा रूप हैं। इनकी पूजा बड़े विधि-विधान से करनी चहिये, अतः नवरात्र के दूसरे दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर, नियमित कार्यों के निवृत्त होकर माँ की पूजा करनी चहिये।
देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें-
इधाना कदपद्माभ्याममक्षमालाक कमण्डलु । देवी प्रसिदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्त्मा ।।
इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भांति भांति के फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें, देवी को लाल फूल अति पसंद है।
माँ ब्रह्मचारिणी के अनेक मंत्र है, अतः ज़रूरतों के अनुसार उपयुक्त मंत्र का उच्चारण व जाप किए जाने का विधान है। यहाँ हम माँ के कुछ उपयोगी मंत्र बता रहे हैं जिन के जप से माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है।
ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।
Must Read: दुर्गा सप्तशती सम्पूर्ण पाठ का फल पायें इस एक मंत्र के जाप से।Durga Saptashati
वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥
परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।
मंत्र, स्तोत्र पाठ और कवच के जाप के साथ घी एवं कपूर मिलाकर देवी की आरती करें।
जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता। जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।
ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो।।
ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा। जिसको जपे सकल संसारा।
जय गायत्री वेद की माता। जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।।
कमी कोई रहने न पाए। कोई भी दुख सहने न पाए।
उसकी विरति रहे ठिकाने। जो तेरी महिमा को जाने।।
रुद्राक्ष की माला ले कर। जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।
आलस छोड़ करे गुणगाना। मां तुम उसको सुख पहुंचाना।।
ब्रह्माचारिणी तेरो नाम। पूर्ण करो सब मेरे काम।
भक्त तेरे चरणों का पुजारी। रखना लाज मेरी महतारी।।
आरती करने के उपरांत दोनों हाथ जोड़कर सभी देवी देवताओं को प्रणाम करें और नीचे दिए मंत्र के द्वारा क्षमा प्रार्थना करें-
“आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं, पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी”
ज्योतिष के अनुसार माँ ब्रह्मचारिणी मंगल ग्रह को नियंत्रित करती हैं, इसलिए उनकी विधिवत से उपासना करने से मंगल ग्रह के द्वारा पड़ने वाले बुरे प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।
The post Mata Brahmacharini | माँ ब्रह्मचारिणी- जाने माता की कथा, मंत्र, पूजा विधि और आरती appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
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