if ( ! function_exists( 'jnews_get_views' ) ) {
/**
* Gets views count.
*
* @param int $id The Post ID.
* @param string|array $range Either an string (eg. 'last7days') or -since 5.3- an array (eg. ['range' => 'custom', 'time_unit' => 'day', 'time_quantity' => 7])
* @param bool $number_format Whether to format the number (eg. 9,999) or not (eg. 9999)
* @return string
*/
function jnews_get_views( $id = null, $range = null, $number_format = true ) {
$attr = array(
'id' => $id,
'range' => $range,
'number_format' => $number_format,
);
$query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $attr ) );
$views = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' );
if ( false === $views ) {
$views = JNews_View_Counter()->counter->get_views( $id, $range, $number_format );
wp_cache_set( $query_hash, $views, 'jnews-view-counter' );
}
return $views;
}
}
if ( ! function_exists( 'jnews_view_counter_query' ) ) {
/**
* Do Query
*
* @param $instance
* @return array
*/
function jnews_view_counter_query( $instance ) {
$query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $instance ) );
$query = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' );
if ( false === $query ) {
$query = JNews_View_Counter()->counter->query( $instance );
wp_cache_set( $query_hash, $query, 'jnews-view-counter' );
}
return $query;
}
}
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]]>पौराणिक कथा के अनुसार एक समय देवर्षि नारद ने गोकर्ण नामक तीर्थ में जाकर भगवान शिव की आराधना की। कुछ समय के बाद नारद मुनि वहाँ से गिरिराज विंध्य पर आए। विंध्य ने नारद मुनि का बहुत आदर के साथ पूजन किया और कहा – ” मेरे यहाँ सब कुछ है, कभी किसी बात की कमी नहीं होती है।“ विंध्य की ऐसी अभिमान भरी बात सुनकर नारद मुनि लंबी साँस खींचकर चुप रह गए। यह देखकर विंध्य पर्वत ने कहा – ” मुनिवर, लगता है आप मेरे बात से सहमत नहीं हैं। आपने मेरे यहाँ कौन सी कमी देखी है? “
नारद जी ने कहा – ”हे गिरिराज! तुम्हारे यहाँ सब कुछ है फिर भी मेरु पर्वत तुमसे बहुत ऊँचा है। उसके शिखर देवताओं के लोकों में भी पहुँचे हुए हैं। “ऐसा कहकर नारद जी वहाँ से चल दिए। पर विंध्य पर्वत के दिमाग़ में नारद जी बात चुभ गयी और ‘मेरे जीवन को धिक्कार है‘ ऐसा सोचता हुआ मन ही मन संतप्त हो उठा।‘ और अब मैं भगवान विश्वनाथ की तपस्या करूँगा ‘, ऐसा निश्चय करके वह भगवान शंकर की शरण में गया। अभी वर्तमान में जहाँ ओंकारेश्वर स्थित है, वहाँ जाकर उसने भगवान शिव की मूर्ति बनाई और छः मास तक निरंतर शिव के ध्यान में तत्पर हो कठिन तपस्या की। विंध्याचल की ऐसी तपस्या देखकर भगवान शंकर प्रसन्न हो गए। उन्होंने विंध्याचल को अपना वह स्वरुप दिखाया जो योगियों के लिए भी दुर्लभ है।
वे प्रसन्न होकर विंध्याचल से बोले – ” विंध्य! में तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। तुम मनोवांछित वर मांगो।“
विंध्य बोले – ” देवेश्वर शम्भो! आप सदा ही भक्तवत्सल हैं। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे वह बुद्धि प्रदान कीजिये जो प्रत्येक कार्य को सिद्ध करने वाली हो।” भगवान शंकर ने विंध्य को वह उत्तम वर दिया और कहा – ” पर्वतराज विंध्य ! तुम जैसा चाहो वैसा करो। “उसी समय देवता और ऋषिगण वहाँ आये और शंकर जी की पूजा करके बोले – ” प्रभो ! आप यहाँ स्थिर रूप से निवास करें।” देवताओं के आग्रह को सुनकर भोलेनाथ प्रसन्न हो गए और सबको सुख देने के लिए इसे सहर्ष स्वीकार किया।
वहाँ जो एक ही ओंकारलिंग था वह दो स्वरूपों में विभक्त हो गया। पहला ओंकारेश्वर और दूसरा अमलेश्वर के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुआ। ये दोनों शिवलिंग भक्तों को अभीष्ट फल प्रदान करने वाले हैं। उस समय देवताओं और ऋषियों ने उन दोनों लिंगों की पूजा की और भगवान शिव को संतुष्ट करके अनेक वर प्राप्त किये। इसके बाद देवता और ऋषिगण अपने अपने स्थान को चले गए और विंध्याचल भी अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव करने लगे।
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