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हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष 16 फरवरी को माघ मास की पूर्णिमा पड़ रही है। इसे माघ पूर्णिमा (Magh Purnima) या माघी पूर्णिमा(Maghi Purnima) के नाम से जाना जाता है। इस दिन स्नान, दान और तर्पण का खास महत्व होता है। माघ माह में दान, पुण्य आदि के कार्य किए जाने से सभी तरह के संकट दूर हो होते है और मनुष्य सुख और समृद्धि को पाता है। आइए जानते है इस दिन कौन से सरल उपाय कर के समृद्धि दायक मां लक्ष्मी और श्री विष्णु को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है।

माघ पूर्णिमा के उपाय ( Magh Purnima Upay)

1. स्नान : पुराणों के अनुसार माघ पूर्णिमा के दिन स्वयं भगवान श्री विष्णु गंगाजल में निवास करते हैं। इस दिन गंगा स्नान करने से विष्णु सहित देवी लक्ष्मी की कृपा मिलती है तथा धन-संपदा लक्ष्मी, यश, सुख-सौभाग्य तथा उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।
2. मंत्र जाप : पूर्णिमा पर माता लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करना चाहिए। इससे घर में धन समृद्धि में बढ़ोतरी होती है। माघ माह में श्रीहरि भगवान विष्णु की माता लक्ष्मी के साथ पूजा करना चाहिए। इससे घर में सुख, शांति, धन और समृद्धि बनी रहती है।
3. पीली सामग्री करें दान : इस दिन देवी लक्ष्मी जी को पीले तथा लाल रंग की सामग्री अर्पित कर खीर का भोग लगाने से वे प्रसन्न होती हैं।
माघ पूर्णिमा के दिन कंबल, वस्त्र, तिल, अन्न, घी, नमक, गुड़, पांच तरह के अनाज, गाय आदि का दान करने से 32 गुना पुण्य फल की प्राप्ति होती है और धन समृद्धि बढ़ती है।
4. दीपदान : माघ पूर्णिमा (Magh Purnima) पर नदी के तट पर या नदी में दीपदान करने को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे देवी और देवता प्रसन्न होते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है। तुसली के नीचे घी का दीया जलाने से भी मां लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
5. श्रीसूक्त का पाठ : माघ पूर्णिमा के दिन देवी लक्ष्मी की विधिवत पूजा करके श्रीसूक्त का पाठ करना चाहिए। इससे देवी लक्ष्मी प्रसन्न होकर जातक को आशीर्वाद देती हैं।
6. विष्णु पूजा : माघ माह में श्रीहरि भगवान विष्णु की माता लक्ष्मी के साथ पूजा करना चाहिए। इससे घर में सुख, शांति, धन और समृद्धि बनी रहती है। उपरोक्त बताए गए व्रतों में भगवान विष्णु की पूजा होती है।
7. तर्पण : माघ माह में अमास्या और पूर्णिमा के दिन पितरों के निमित्त तर्पण करना चाहिए क्योंकि इस पवित्र माह में पितरों को मुक्ति मिलती है। यह पुण्य का सबसे बड़ा कार्य है। पितृदोष के कारण भी घर में सुख, शांति, धन और समृद्धि में बाधा उत्पन्न होती है।
8. पीपल और तुलसी की सेवा: माघ पूर्णिमा के दिन पीपल में माता लक्ष्मी का आगमन होता है। अत: इस दिन पीपल में जल अर्पित करके उसकी पूजा करें। इस दिन तुलसी को भी जल अर्पित करके उनकी पूजा करना चाहिए और भोग लगाना चाहिए। दोनों ही कार्यों से माता लक्ष्मी प्रसन्न होकर धन समृद्धि का वरदान देती हैं।
9. चंद्रदेव को अर्पित करें खीर: माघ पूर्णिमा के दिन चंद्रमा को खीर अर्पित करने से चंद्रदेव की कृपा प्राप्त होती है और धन संबंधी समस्या का निवारण होता है।
10. माता लक्ष्मी को अर्पित करें कोड़ियां : आर्थिक तंगी दूर करने के लिए 11 कोड़ियों को हल्दी से रंगकर माता लक्ष्मी को अर्पित करें। फिर इनको लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में रख दें।

(यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है।)

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Vishnu Sahasranamam Stotram-विष्णु सहस्रनाम

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Sharad Purnima 2020: शरद पूर्णिमा, अमृत वर्षा की रात https://astrodeeva.com/sharad-purnima-2020-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a5%83%e0%a4%a4-%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7/ https://astrodeeva.com/sharad-purnima-2020-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a5%83%e0%a4%a4-%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7/#comments Tue, 27 Oct 2020 10:08:47 +0000 https://astrodeeva.com/?p=995 हिन्दू ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि को पूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन चंद्रमा अपने पूर्ण रूप में होता है। शास्त्रों में इस दिन का बहुत महत्व बताया गया है, इस दिन दान, धर्म और व्रत करने की मान्यता है। वर्ष भर में आने वाली हर पूर्णिमा को व्रत […]

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हिन्दू ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि को पूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन चंद्रमा अपने पूर्ण रूप में होता है। शास्त्रों में इस दिन का बहुत महत्व बताया गया है, इस दिन दान, धर्म और व्रत करने की मान्यता है। वर्ष भर में आने वाली हर पूर्णिमा को व्रत किया जाता है पर आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा का इन सब में विशेष महत्व है।

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। इसे रास पूर्णिमा, कौमुदी या कोजगिरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार वर्ष भर में इसी दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से परी पूर्ण  होता है और इससे निकलने वाली किरणे अमृत समान मानी जाती है। इस दिन रात्रि को दूध की खीर बनाकर चंद्रमा की रोशनी में रखने की प्रथा है, मान्यता है कि चंद्रमा की किरणे पड़ने से यह सेहत के लिए कई गुना लाभकारी हो जाती है। 

शरद पूर्णिमा का महत्व 

शरद पूर्णिमा वर्ष भर में वह दिन होता है जिस दिन चंद्रमा पृथ्वी के सबसे करीब होता है और सबसे ज़्यादा चमकता है। इस दिन आकाश में धूल और मिट्टी नहीं होती और वातावरण निर्मल होता है। इस दिन से धार्मिक स्नान और व्रत प्रारम्भ होते है। माताएं संतान की मंगल कामना के लिए देवी-देवताओं का पूजन करती है। इस दिन चंद्रमा की किरणो का शरीर पर पड़ना बहुत ही शुभ माना जाता है और इसका स्वास्थ्य पर लाभकारी प्रभाव पड़ता है।

माना जाता है की द्वापर यूग में भगवान विष्णु जब श्री कृष्ण के रूप में धरती पर आए तो माता लक्ष्मी भी राधा के रूप में उन के साथ आई थीं। लेकिन जब श्राप के कारण श्री कृष्ण राधा और गोपियों से दूर हो गए थे, तब राधा और सभी गोपियों ने श्री कृष्ण को वापस बुलाने के लिए मां कात्यायनी की आराधना की। शरद पूर्णिमा की रात को ही श्री कृष्ण ने बंसी बजाकर गोपियों और राधा जी को अपने पास बुलाया और उनके साथ महारास किया था। इसी कारण इस दिन को रास पूर्णिमा और कामुदी महोत्सव के नाम से भी जाना जाता है।

शरद पूर्णिमा व्रत कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार बहुत समय पूर्व एक नगर में प्रसिद्ध साहूकार रहता था। उसकी दो पुत्रियां थी, जिसमें बड़ी पुत्री सीधी- सधी, संस्कारी और पूजा-पाठ करने वाली थी। उसकी छोटी पुत्री स्वभाव में चंचल थी और उस का पूजा-पाठ में मन नहीं लगता था। साहूकार अपनी छोटी पुत्री को उसकी बड़ी बहन की तरह धार्मिक कार्यों में ध्यान लगने के लिए कहता था । छोटी पुत्री अपने पिता के दबाव के कारण व्रत करती पर उसको अधूरा छोड़ दिया करती थी।

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समयोपरंत साहूकार ने अच्छा रिश्ता ढूंढ बड़े धूम-धाम से अपनी दोनो पुत्रियों का विवाह किया। विवाह उपरांत बड़ी पुत्री का जीवन अत्यंत ही खुशहाल व सुखमय बीतने लगा परंतु उसकी छोटी बेटी के जीवन में हर समय कलह और परेशनियाँ रहती थी। कुछ वर्षों के पश्चात दोनो पुत्रीयों ने गर्भ धारण किया और बड़ी पुत्री को हष्ट पुष्ट संतान की प्राप्ति हुई परंतु छोटी बेटी की संतान जन्म लेते के साथ मृत्यु के गाल में समा गयी। वो जब भी संतान प्राप्ति के प्रयास करती तब संतान की बात सिरे नहीं चढ़ती या फिर संतान जीवित नहीं बचती। इस कारण वह अत्यंत दुखी रहती। यह देख उसके ससुराल वालों ने पंडितों को उसकी कुंडली दिखायी और उपाय सुझाने का अनुरोध किया। पंडितों ने कुंडली देख कर बताया की इसने विवाह के पूर्व पूर्णिमा के अधूरे व्रत किये हैं ईसी कारण ऐसा हो रहा है। अतः इसके निवारण हेतु तुम्हें शरद पूर्णिमा के व्रत को पूरे विधि-विधान से करने की सलाह दी और व्रत की विधि बताई।

तत्पश्चात साहूकार की छोटी बेटी ने शरद पूर्णिमा का व्रत पूरे विधि-विधान से किया पर इस बार संतान जन्म के पश्चात कुछ दिनो तक ही जीवित रही। इस से दुखी हो कर उसने मृत शीशु को पीढ़े पर लिटाकर उस पर कपड़ा रख दिया और अपनी बहन को बुला । सारी बात अपनी बड़ी बहन को बता उससे अपने मृत शीशु को स्पर्श करने का आग्रह किया। बड़ी बहन ने जैसे ही छोटी बेटी के संतान को छुआ वो रोने लगा और उसमें प्राण वापस आ गये। बस फिर क्या था, पूर्णिमा व्रत की शक्ति का महत्व पूरे नगर में फैल गया और तब से नगरवासी पूर्णिमा का व्रत विधि विधान से करने लगे। 

शरद पूर्णिमा 2020

दिनांक : अक्टूबर 30, 2020

चन्द्रोदय सायं 05:11 पी एम

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ – अक्टूबर 30, 2020 को 05:45 पी एम बजे

पूर्णिमा तिथि समाप्त – अक्टूबर 31, 2020 को 08:18 पी एम बजे

शरद पूर्णिमा व्रत विधि 

  • शरद पूर्णिमा के दिन सूर्योदय से पहले ब्रह्म मूर्त में स्नान आदि की दैनिक क्रिया को सम्पन्न कर सूर्य देवता को अर्घ्य प्रदान करें। अगर सम्भव हो तो पवित्र नदी, तालाब या सरोवर में स्नान करें।
  • तत्पश्चात अपने आस-पास के मंदिरो अथवा घर के मंदिर में पूर्णिमा व्रत का संकलप ले कर कलश की स्थापना कर भगवान कृष्ण और माता लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करें। 
  • भगवान कृष्ण और देवी लक्ष्मी की प्रतिमा को सुंदर वस्त्र और आभूषणों पहनाएँ । आवाहन, आसन, आचमन, वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप,नैवेद्य, तांबूल, सुपारी और दक्षिणा आदि अर्पित कर पूजन करें।
  • इस दिन पूरे दिन भर व्रत करना चहिये।
  • रात्रि के समय गाय के दूध से बनी खीर आधी रात के समय भगवान भोग लगाएँ।
  • रात्रि में चंद्रमा के आकाश के मध्य में स्थित होने पर चंद्र देव का पूजन करें तथा खीर का नेवैद्य अर्पण करें।
  • रात को खीर से भरा बर्तन चांदनी में रखकर दूसरे दिन उसका भोजन करें और सबको प्रसाद के रूप में वितरित करें।
  • पूर्णिमा का व्रत करके कथा सुननी चाहिए। कथा से पूर्व एक लोटे में जल और गिलास में गेहूं, पत्ते के दोने में रोली व चावल रखकर कलश की वंदना करें और दक्षिणा चढ़ाएँ।
  • इस दिन भगवान शिव-पार्वती और भगवान कार्तिकेय की भी पूजा होती है।

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