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The post Hanuman Jayanti 2022 : हनुमान जयंती उत्सव और अनुष्ठान appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>मान्यता है त्रेतायुग में प्रभु श्रीराम के साथ ही सभी देवी-देवतागण अपने-अपने लोकों को प्रस्थान कर गये थे किन्तु प्रभु श्रीराम के आशीर्वाद से हनुमानजी प्रभु के भजन और जनकल्याण हेतु पृथ्वी पर ही रह गये थे। अपनी प्रत्यक्षता का प्रमाण वे समय-समय पर पृथ्वी वासियों को भिन्न-भिन्न रूपों में देते रहते हैं। जहाँ भी रामकथा, रामचरितमानस सुन्दरकाण्ड आदि का आयोजन किया जाता है वहाँ हनुमानजी के लिये एक पृथक आसन की व्यवस्था की जाती है। जहाँ भी प्रभु श्रीराम का स्मरण किया जाता है वहाँ हनुमानजी प्रत्यक्ष उपस्थित रहते हैं। हनुमानजी देवता होने के साथ-साथ सर्वश्रेष्ठ गुरू भी हैं। प्रभु श्रीराम को शीघ्र पाने का सबसे सरल और सुगम मार्ग स्वयं हनुमानजी ही हैं। हनुमान जन्मोत्सव के दिन बजरंगबली की विधिवत पूजा करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है साथ ही सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
ऐसा माना जाता है कि हनुमान जी का जन्म सूर्योदय के समय हुआ था। हनुमान जयन्ती के दिन मन्दिरों में प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में आध्यात्मिक प्रवचनों का आयोजन किया जाता है और यह आयोजन सूर्योदय के साथ ही समाप्त हो जाते हैं।
दिनांक : 16 अप्रैल 2022
वार : शनिवार
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ: 16 अप्रैल 2022 को 02:25 ए एम बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त: 17 अप्रैल 2022 को 12:24 पी एम बजे
हनुमान जी को भगवान शिव का 11वां रूद्र अवतार माना जाता हैं| इनके जन्म के बारे में पुराणों में उल्लेख है की जब अमरत्व की प्राप्ति के लिये देवताओं व असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था तब समुद्र से निकले अमृत को असुरों ने छीन लिया और आपस में ही लड़ने लगे। तब भगवान विष्णु मोहिनी के रूप में अवतरित हुए। मोहनी रूप देख देवता व असुर तो क्या स्वयं भगवान शिवजी कामातुर हो गए। इस समय भगवान शिव ने जो वीर्य त्याग किया उसे पवनदेव ने वानरराज केसरी की पत्नी अंजना के गर्भ में प्रविष्ट कर दिया। जिसके फलस्वरूप माता अंजना के गर्भ से केसरी नंदन मारुती संकट मोचन रामभक्त श्री हनुमान का जन्म हुआ।
हनुमान भगवान राम के आराध्य भक्त हैं। वह भगवान की भक्ति के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में बरकरार है। वह एक ब्रह्मचारी है और उन्हें बजरंग बली, पवनपुत्र, महावीर और मारुति जैसे कई नामों से जाना जाता है। हनुमान शक्ति, भक्ति, निस्वार्थ सेवा और समर्पण के प्रतीक है।
माना जाता है कि हनुमान जन्मोत्सव पर हनुमान जी की पूजा-अर्चना करने से जीवन में संकटों से मुक्ति और सुख शान्ति की प्राप्ति होती है। अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि या मंगल ग्रह का अशुभ प्रभाव होता है, तो उसे विधिपूर्वक हनुमान जी की पूजा करनी चाहिए। इनकी विधि पूर्वक पूजा करने से इन दोनों ग्रहों से जुड़ी समस्याएं भी दूर हो जाती हैं। साथ ही साथ नकारात्मक ऊर्जा, भूत-प्रेत बाधा जैसी परेशानियों से भी मुक्ति मिल जाती है। इस दिन हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ अवश्य करना चाहिए।
इस व्रत को रखने वालों के लिए कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक होता है।
भक्तगण अपनी स्थानीय मान्यताओं एवं कैलेण्डर के आधार पर वर्ष में भिन्न-भिन्न समय पर हनुमान जयन्ती का त्यौहार मनाते हैं। उत्तर भारतीय राज्यों में चैत्र पूर्णिमा की हनुमान जयन्ती सर्वाधिक लोकप्रिय है।
आन्ध्र प्रदेश तथा तेलंगाना में, हनुमान जयन्ती 41 दिनों तक मनायी जाती है, जो चैत्र पूर्णिमा से प्रारम्भ होती है तथा वैशाख माह में कृष्ण पक्ष के दौरान दसवें दिन समाप्त होती है। आन्ध्र प्रदेश में भक्त चैत्र पूर्णिमा पर 41 दिनों की दीक्षा आरम्भ करते हैं तथा हनुमान जयन्ती के दिन इसका समापन करते हैं।
तमिलनाडु में, हनुमान जयन्ती को हनुमथ जयन्ती के नाम से जाना जाता है और मार्गशीर्ष अमावस्या के दौरान मनाया जाता है। ग्रेगोरियन कैलेण्डर में तमिल हनुमान जयन्ती जनवरी या दिसम्बर माह में आती है।
कर्नाटक में, मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पक्ष त्रयोदशी को हनुमान जयन्ती मनाई जाती है। इस शुभ दिन को हनुमान व्रतम के नाम से जाना जाता है।
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]]>The post Vivah Panchami : क्यों नहीं करते विवाह पंचमी महोत्सव के दिन विवाह? appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>दिनांक – 07 दिसम्बर 2021
वार – बुधवार
पञ्चमी तिथि प्रारम्भ – 07 दिसम्बर 2021 को 11:40 पी एम बजे
पञ्चमी तिथि समाप्त – 08 दिसम्बर 2021 को 09:45 पी एम बजे
विवाह पंचमी के दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें।
इसके बाद राम विवाह का संकल्प लें और भगवान श्री राम और माता सीता जी की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करें।
मूर्ति स्थापना के बाद भगवान राम को पीले वस्त्र और माता सीता को लाल वस्त्र अर्पित करें। “ॐ जानकीवल्लभाय नमः” इस मंत्र का 108 बार जाप करें और भगवान राम और सीता का गठबंधन करें।
इसके बाद भगवान राम और सीता जी की आरती उतारें और भोग लगाएं तथा पूरे घर में प्रसाद बांटकर आप भी ग्रहण करें।
विवाह पंचमी का महोत्सव भारत और नेपाल में पूरे धूम-धाम से मनाया जाता है। इस उत्सव को नेपाल के पौराणिक शहर जनकपुरधाम और अयोध्या में भव्य रूप से मनाया जाता है।
इस महोतवस्व के दौरान नेपाल के जनकपुरधाम में प्रभु श्रीराम तथा माता सीता के विवाह का आयोजन किया जाता है। शहर की साफ-सफाई कर जनकपुर के सभी मंदिरों को सजाया जाता है। इस दिन अयोध्या से आ रही बारात के स्वागत की जबरदस्त तैयारी की जाती है। नगर भ्रमण और स्वागत करने के लिए बच्चों को राम जी और लक्ष्मण जी की प्रतिमूर्ति के रूप में बनाया जाता है। इस दिन झांकी जानकी मंदिर पहुंचकर नगर भ्रमण करती है। महोत्सव के प्रथम दिन फुलवारी लीला ,दूसरे दिन धनुष यज्ञ, तीसरे दिन भगवान राम के तिलकोत्सव की रस्म, चौथे दिन मटकोर और पंचवे दिन विवाहोत्सव मनाया जाता है। जिससे त्रेता युग की अनुभूति होती है। विवाहोत्सव के अगले दिन राम कलेवा के साथ इस महोत्सव का समापन होता है।
हिन्दू धर्म में विवाह पंचमी का विशेष महत्व है। लेकिन इस दिन कई जगह खासकर भारत के मिथिलांचल और नेपाल में विवाह नहीं करने की परंपरा है। दरअसल, 36 गुण मिलने के बाद भी सीता जी का वैवाहिक जीवन अति दुखद रहा था इसी वजह से लोग विवाह पंचमी के दिन विवाह करना उचित नहीं मानते। मान्यता है कि 14 वर्ष के कठोर वनवास के उपरांत राम ने गर्भवती सीता का त्याग कर दिया था और इस वजह से माता सीता को महारानी का सुख नहीं मील पाया। इसलिए विवाह पंचमी के दिन लोग अपनी बेटियों का विवाह नहीं करते हैं। लोगों का मानना है कि विवाह पंचमी के दिन विवाह करने से कहीं सीता की तरह ही उनकी बेटी का वैवाहिक जीवन भी दुखमयी न हो जाए।
यह भी जाने : माता सीता की आरती
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]]>The post भगवान राम पर हनुमान जी का कर्जा appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>अब प्रजा में सुगबुगाहट होने लगी कि क्या बात है कि सब अतिथि चले गए परन्तु अयोध्या से हनुमान जी नहीं गये।
अब दरबार में कानाफूसी शुरू हुई कि हनुमान जी से कौन जाने के लिए कहे , तो सबसे पहले माता सीता जी की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमान जी चले जायें।
माता सीता बोलीं- मै तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक-एक दिन एक-एक यूग के समान बीत रहा था। वो तो हनुमान जी थे, जो प्रभु की मुद्रिका ले के आए, और धीरज बंधवाया कि…!
कछुक दिवस जननी धरु धीरा।
कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।
तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥
हनुमान को मैंने अपना पुत्र माना है, मैं तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए, आप किसी और से बुलावा लो।
अब बारी आई लक्ष्मण जी की। तो लक्ष्मण जी ने कहा, मै तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था। पूरा राम दल विलाप कर रहा था।
प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।
ये तो जो आप सब के सामने खड़ा है, वो हनुमान जी का लक्ष्मण है। मैं किस मुंह से कैसे बोलूं, कि हनुमान जी अयोध्या से चले जाएं।
अब बारी आयी भरत जी की। भरत जी तो इतना रोये, कि राम जी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही मुझ पर लगा है। आप सब मिलके हनुमान जी का और लगवा दो।
और दूसरी बात ये कि…!
बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना।
अधम कवन जग मोहि समाना॥
मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी, वो तो हनुमान जी थे जिन्होंने आकर ये खबर दी कि…!
रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।
सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥
मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमान जी से अयोध्या छोड़कर चले जाओ, आप किसी और से बुलवा लो।
अब बचा कौन..? सिर्फ शत्रुघ्न भैया। जैसे ही सब ने उनकी तरफ देखा,
तो शत्रुघ्न भैया बोल पड़े.. मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला, तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो, और वो भी हनुमान जी को अयोध्या से जाने के लिए। जिन्होंने ने माता सीता, लखन भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो, किसी अच्छे काम के लिए कहते तो बोल भी देता। मै तो बिल्कुल भी नहीं बोलूँगा।
अब बचे तो मेरे राम सरकार…
माता सीता ने कहा प्रभु! आप तो तीनों लोकों के स्वामी हो, और देखती हूं आप हनुमान जी से सकुचाते हैं। और आप खुद भी कहते हो कि…!
प्रति उपकार करौं का तोरा।
सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥
आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु!
राम जी ने कहा, देवी मैं हनुमान जी का क़र्ज़दार जो हूं, , इसीलिए तो..
सनमुख होइ न सकत मन मोरा
देवी ! हनुमान जी का कर्ज़ा उतारना आसान नहीं है और इतना सामर्थ राम में नहीं है, जो “राम नाम” में है। क्योंकि कर्ज़ा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न…!
यदि सुनना चाहती हो तो सुनो – हनुमान जी का कर्ज़ा कैसे उतारा जा सकता है।
पहले हनुमान विवाह करें, लंकेश हरें इनकी जब नारी।
मुंदरी लै रघुनाथ चले, निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी।
आयि कहें, सुधि सोच हरें, तन से, मन से होई जाएं उपकारी।
तब रघुनाथ चुकायि सकें, ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी।।
देवी ! इतना आसान नहीं है, हनुमान जी का कर्ज़ा चुकाना। मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि…!
“सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं”
मैंने बहुत सोच विचार कर कहा था। लेकिन यदि आप कहती हो तो कल सभा में हनुमान जी से बोलूंगा कि वो भी कुछ मांग लें।
दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए, सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमान जी क्या मांगेंगे, और राम जी क्या देंगे।
राघव जी ने कहा– हनुमान सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया। विभीषण और सुग्रीव को क्रमशः लंका और किष्कन्धा का राजपद, अंगद को युवराज पद। तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ…?
हनुमान जी बोले – प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो…!
तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना
तो फिर यदि मैं दो पद मांगू तो..?
सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमान जी भी ठीक ही कह रहे हैं।
राम जी ने कहा ! ठीक है, मांग लो।
सब लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमान जी का कर्ज़ा चुकता हो जायेगा।
हनुमान जी ने कहा – प्रभु जो पद आप ने सबको दिए हैं, उनके पद में राजमद हो सकता है, तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिसमें राजमद की शंका हो।
राम जी ने पूछा – तो फिर…! आप को कौन सा पद चाहिए ?
हनुमान जी ने राम जी के दोनों चरण पकड़ लिए, प्रभु ..! हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिए।
हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी।
नहीं कोउ रामचरण अनुरागी।
जानकी जी की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए राम जी बोले, लो उतर गया हनुमानजी का कर्जा! और अभी तक जिसको बोलना था, सब बोल चुके है, अब जो मै बोलता हूं उसे सब सुनो,
रामजी भरत भैया की तरफ देखते हुए बोले-
“हे! भरत भैया’ कपि से उऋण हम नाही”
हम चारों भाई चाहे जितनी बार जन्म ले लें, हनुमानजी से उऋण नहीं हो सकते।
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]]>The post अयोध्या का इतिहास एवं वर्तमान appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>इस की महत्ता के बारे में जनसाधारण में कहावत प्रचलित है :
गंगा बड़ी गोदावरी,
तीरथ बड़ो प्रयाग,
सबसे बड़ी अयोध्यानगरी,
जहाँ राम लियो अवतार।
अयोध्या पुण्यनगरी है। यह नगरी कई महान महापुरुषों के युग की साक्षी है और यहाँ गंगा- जमुनी तहज़ीब का संगम है। जैन मत के अनुसार यहाँ आदिनाथ सहित 5 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। बौद्ध मन्यताओ के अनुसार बुद्ध देव ने अयोध्या में 16 वर्ष तक निवास किया था।
रामायण में अयोध्या का उल्लेख कोशल जनपद की राजधानी के रूप में किया गया है। वहीं राम जी के जन्म के समय यह नगर अवध नाम से जाना जाता है।

मंदिर के स्थान पर मस्ज़िद का निर्माण
कहा जाता है कि मुगल बादशाह बाबर के सेनापति मीर बाकी ने यहाँ मस्जिद बनवाई थी, जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था। बाबर 1526 में भारत आया और 1528 तक उसने अपना साम्राज्य अवध तक पहुँचा दिया।
इस विश्वास को वर्ष 1813 – 14 के बाद लोकप्रियता हासिल हुई, जब ईस्ट इंडिया कम्पनी के सर्वेक्षक फ़्रांसिस बुकानन ने बताया की उसे मस्जिद की दिवार पर एक शिलालेख मिला है जो बाबरी मस्जिद के निर्माण से जुड़ा है।
उसने प्रचलित स्थानीय पारंपरिक कथा का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार औरंगजेब (1658-1707) ने राम को समर्पित एक मंदिर को ध्वस्त करने के बाद मस्जिद का निर्माण कराया था।
जब बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने पर मचा था बवाल
अक्टूबर 1990 को हज़ारों राम भक्तों ने तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा खड़ी की गयी अनेक बाधाओं को पार कर के अयोध्या में प्रवेश किया और विवादित ढाँचे पर भगवा ध्वज फहरा दिया।
6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया और अस्थाई राम मंदिर बनया गया।
16 दिसंबर 1992 को मस्जिद की तोड़ – फोड़ की जीम्मेदार स्थितियों की जांच के लिए एम.एस. लिब्रहान आयोग का गठन हुआ।
1993 : भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने संविधान की धारा 143 (ए) के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को एक प्रश्न ‘रेफर’ किया। प्रश्न था, ‘क्या जिस स्थान पर ढांचा खड़ा था वहां राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के निर्माण से पहले कोई हिन्दू मंदिर या हिन्दू धार्मिक इमारत थी? इसके जवाब में कोर्ट की पांच जजों की पीठ में से दो जजों ने कहा था कि इस सवाल का जवाब तभी दिया जा सकता है जब पुरातत्व और इतिहासकारों के विशिष्ट साक्ष्य हों और उन्हें जिरह के दौरान परखा जाए।
इस रेफरेंस पर सुप्रीम कोर्ट ने मुद्दे को लेकर सरकार से और रुख स्पष्ट करने को कहा था जिसके जवाब में तत्कालीन सालिसिटर जनरल ने 14 सिंतबर 1994 को लिखित जवाब दाखिल कर कोर्ट में अयोध्या मसले पर सरकार का नजरिया रखा था। जिसमें सरकार की ओर से कहा गया था कि ‘सरकार धर्मनिरपेक्ष और सभी धर्मावलंबियों के साथ समान व्यवहार की नीति पर कायम है। अयोध्या में जमीन अधिग्रहण कानून 1993 और राष्ट्रपति की ओर सुप्रीम कोर्ट को भेजा गया रेफरेंस भारत के लोगों में भाईचारा और पब्लिक आर्डर बनाए रखने के लिए है।
इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने करीब 20 महीने सुनवाई की और 24 अक्टूबर, 1994 को अपने निर्णय में कहा- इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ विवादित स्थल के स्वामित्व का निर्णय करेगी और राष्ट्रपति द्वारा दिए गए विशेष ‘रेफरेंस’ का जवाब देगी।
राष्ट्रपति रेफरेंस के संदर्भ में 2002 अयोध्या में विवाद की सुनवाई कर रहे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सच्चाई का पता लगाने के लिए एएसआई को वहाँ खुदाई करने का निर्देश दिया और खुदाई के दौरान पारदर्शिता और दोनो समुदायों के मौजूदगी का पूरा ध्यान रखने के आदेश भी दिए।
अप्रेल 2002 में अयोध्या के विवादित स्थल पा मालिकाना हक को ले कर उच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू की, जो वर्ष 2010 में पूरी हुई।
30 सितंबर, 2010 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उच्च न्यायालय के फैसले को टालने की याचिका खारिज किये जाने के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने विवादित भूमि को तीन भागों में विभाजित करने का निर्णय दिया। 2:1 के बहुमत के साथ दिये गए इस निर्णय के अनुसार, विवादित 2.77 एकड़ भूमि को तीन हिस्सों में विभाजित किया जाना था, इसमें से एक-तिहाई सुन्नी वक्फ बोर्ड को, एक-तिहाई निर्मोही अखाड़े को और शेष एक तिहाई हिस्सा राम लला के मंदिर निर्माण हेतु दिया जाना था जिसका प्रतिनिधित्त्व हिंदू महासभा द्वारा किया गया था।
रोजाना 40 दिन तक की सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने, अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीन पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला विराजमान के बीच बराबर-बराबर बांटने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर छह अगस्त से रोजाना 40 दिन तक सुनवाई की थी। इस दौरान विभन्न पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश की थीं।
ऐतिहासिक फैसला
9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया

ट्रस्ट का गठन:
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार ने 5 फरवरी 2020 को ट्रस्ट का गठन किया और इस की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में की और पूरा प्लान भी बताया। इस ट्रस्ट का नाम “श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र” ट्रस्ट रखा।
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