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सकट चौथ(Sakat Chauth) को संकटा चौथ, तिलकुट चौथ या संकष्टी चतुर्थी नामों से भी जाना जाता है। सकट चौथ के दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु की कामना के लिए भगवान गणेश और सकट माता का व्रत और उपासना करती हैं। भगवान गणेश को समर्पित यह व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत पूर्ण माना जाता है।

सकट माता व्रत कथा -Sakat Mata Vrat Katha

पौराणिक मान्यता के अनुसार बहुत समय पहले एक गाँव में एक कुम्हार रहता था। वह मिट्टी के अच्छे बर्तन बनाता था और उन्हें भट्ठे में रख कर पकाता था। एक वर्ष जब कुम्हार ने भट्ठे में बर्तन रखे, तो आग बर्तन को नहीं पका पाई। उसके बार-बार प्रयास के बाद भी मिट्टी के बर्तनों को नहीं पका पाई। अंत में कुम्हार ने मदद के लिए राजा से संपर्क किया। कुम्हार की दुर्दशा सुनने के बाद राजा ने राजपुरोहित से सलाह की और उन्हें इस विचित्र घटना का उचित समाधान सुझाने को कहा। राजपुरोहित ने उस कुम्हार से सारा घटनाक्रम सुना और गहन चिंतन के बाद  सुझाव दिया कि हर बार कुम्हार जब बर्तन पकाने के लिए भट्टी में रखे तो उसके साथ एक बच्चे की बलि दे जिससे भट्टी में अग्नि प्रज्वलित हो जाएगी और बर्तन पक जाएँगें।

राजपुरोहित के सुझाव को सुन राजा ने फैसला सुनाया कि राज्य का प्रत्येक परिवार अपना एक बच्चा बलि के लिए भेंट करेगा। सभी परिवारों ने, एक-एक करके, राजा के फरमान को मानते हुए अपने बच्चों में से एक बच्चा बलि के लिए देना शुरू किया।

उसी राज्य में एक बूढ़ी औरत रहती थी उसका एक ही बेटा था। कुछ दिनो के बाद उसकी बारी आयी, यह सकट( Sakat ) चौथ का दिन था। वृद्ध महिला का परिवार में केवल एक बेटा था जो उसकी वृद्धावस्था में सेवा करता था। उसने सोचा आगर वो उस एकलोते बेटे को बलि के लिए भेंट कर देगी तो उसकी सेवा कौन करेगा परंतु राजा के आदेश की अवज्ञा भी नहीं की जा सकती थी तो उस बूढ़ी औरत को डर था कि सकट के शुभ दिन उसके एकमात्र बच्चे की राजा के आदेश अनुसार बलि दे दी जाएगी।

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बूढ़ी औरत सकट माता की भक्त थी उसने माता से अपने पुत्र की रक्षा के लिए प्रार्थना की और तभी उसे एक उपाय सूझा। उसने अपने लड़के को एक सकट की सुपारी तथा दूब का बीड़ा देकर कहा, ”इस सामग्री के साथ तुम बलि वाले दिन भगवान का नाम लेकर भट्ठे में बैठ जाना। सकट माता तेरी रक्षा करेंगी।”

सकट के दिन बूढ़ी औरत का बेटा अपने माता के कहे अनुसार माता के दिए हुए एक सकट की सुपारी तथा दूब का बीड़ा लेकर भट्ठे में बलि के लिए बिठा दिया गया और बुढ़िया सकट माता के सामने बैठकर अपने पुत्र की रक्षा के लिए पूजा प्रार्थना करने लगी। पहले तो बर्तन पकने में कई दिन लग जाते थे, पर इस बार सकट माता की कृपा से एक ही रात में पक गये। सवेरे कुम्हार ने यह देखा तो हैरान रह गया। बर्तन एक रात में ही पक गये थे और बुढ़िया का बेटा जीवित व सुरक्षित था। सकट माता की कृपा से नगर के अन्य बालक भी जी उठे। यह देख नगरवासियों ने माता सकट की महिमा स्वीकार कर ली। तब से आज तक सकट माता की पूजा और व्रत का विधान चला आ रहा है।

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