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आज 10 जून 2021 (गुरुवार), जेष्ठ कृष्ण पक्ष अमावस्या (विक्रम संवत 2078) को शनि जयंती मनाई जा रही है। पुराणों के अनुसार कर्म फल दाता शनि देव के सिर पर एक स्वर्ण मुकुट शोभित है, उनके गले में माला तथा शनि देव नीले वस्त्र धारण किए हुए हैं। शनिदेव की सवारी गिद्ध पर है। शनि देव के हाथों में धनुष, बाण तथा त्रिशूल है।

शनि देव के जन्म की पौराणिक कथा-

स्कंद पुराण के काशीखंड के मुताबिक शनिदेव का जन्म सूर्य देव और संवर्णा की मिलन से हुआ था। सर्वप्रथम सूर्य देव का विवाह राजा दक्ष की कन्या संज्ञा से हुआ था। संज्ञा हमेशा सूर्य देव के तप से परेशान रहती थी। समय बीतने के साथ संज्ञा के गर्भ से यमराज, यमुना और वैवस्वत उत्पन्न हुए। लेकिन संज्ञा अब भी सूर्य देव के तप से परेशान थी। संज्ञा ने सूर्य देव के तप को कम करने के लिए एक तपस्या की। तप के प्रभाव से संज्ञा ने एक छाया नामक संवर्णा को पैदा किया। ऐसा करने के बाद संज्ञा अपने बच्चों की जिम्मेदारी सूर्य देव और संवर्णा को देकर अपने पिता के घर चले गई। संज्ञा ने अपनी परेशानी अपने पिता को बताई, सारी बात जानकर संज्ञा के पिता बहुत क्रोधित हुए और संज्ञा को डांट कर वापस भेज दिया। लेकिन अपने पति के घर वापस जाने के बजाय, संज्ञा जंगल में चले गई। उधर संज्ञा का जंगल में रहना तथा इधर संवर्णा और सूर्य देव का मिलन शनि देव, मनु और भद्रा नामक तीन संतानों के जन्म का कारण बना। इसी प्रकार शनि देव भी सूर्य के पुत्र है, इसीलिए , शनिदेव को भी सूर्यपुत्र कहा जाता है।

शनि की क्रूर दृष्टि –

ब्रह्म पुराण के अनुसार सूर्य देव ने अपने पुत्र शनि का विवाह चित्ररथ की कन्या से करवाया था। शनि देव की पत्नी परम तेजस्विनी थी। एक रात वह पुत्र प्राप्ति की इच्छा से शनि के पास पहुंची, लेकिन उस समय शनि देव भगवान विष्णु के ध्यान में अत्यंत लीन अवस्था में थे। शनिदेव की पत्नी उनकी प्रतीक्षा करते-करते थक गई, लेकिन फिर भी शनि देव ने अपनी आंखें नहीं खोली, जिस कारण से उनका ऋतुकाल निष्फल हो गया। इसी वजह से उनकी पत्नी ने क्रुद्ध होकर उन्हें शाप दिया कि आज से जिसे भी तुम देखोंगे, वह नष्ट हो जाएगा। इसीलिए आज भी लोग मंदिरों में शनिदेव की मूर्ति को सामने से देखना बाध्य किया करते है। जिससे कि शनि देव की क्रूर दृष्टि हम पर भी न पड़े और हमारा भी कोई अनिष्ट न हो।

शनि देव को न्याय का देवता माना जाता है, कैसे?

ज्योतिषानुसार माना जाता है कि हमारे शरीर में सभी नौ ग्रहों के तत्व मौजूद होते हैं। जब भी कोई व्यक्ति समाज में अपराध करता है, तो शनि देव के आदेश अनुसार, राहु और केतु उसे दंड देने के लिए सक्रिय हो जाते हैं। शनि के न्यायालय में दंड पहले दिया जाता है, और कार्यवाही बाद में होती है इस बात पर कि व्यक्ति के चाल-चलन आगे भी इसी प्रकार ठीक रहे, तो उसे दंड की अवधि पूर्ण होने पर, फिर से उसके जीवन को खुशहाल कर दिया जाएं या नहीं।

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शनि देव के कुछ प्रमुख सिद्ध मंत्र –

1.) शनि मंत्र, भगवान शनि देव की पूजा करते समय –

ओम् शं शनैश्चराय नमः।

2.) शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव कम करने हेतु अचूक शनि मंत्र – ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नमः।

3.) समस्त भय, रोग, दोष और बाधा दूर करने के साथ, आपके भीतर एक आध्यात्मिक शक्ति को जागृत करने वाला शनि गायत्री मंत्र –

ओम् भगभवाय विद्महे मृत्युरुपाय धीमहि तन्नो शनि: प्रचोदयात।

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