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Interesting Facts of Lord Shiva : भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनकी वेश-भूषा व उनसे जुड़े तथ्य उतने ही विचित्र हैं। शिव श्मशान में निवास करते हैं, गले में नाग धारण करते हैं, भांग व धतूरा ग्रहण करते हैं। आदि न जाने कितने रोचक तथ्य इनके साथ जुड़े हैं। आज हम आपको भगवान शिव से जुड़ी ऐसी ही रोचक बातें व इनमें छिपे लाइफ मैनेजमेंट के सूत्रों के बारे में बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-

1- क्यों हैं भगवान शिव की तीन आंखें (Why does Lord Shiva have three eyes?)

धर्म ग्रंथों के अनुसार सभी देवताओं की दो आंखें हैं, लेकिन एकमात्र शिव ही ऐसे देवता हैं जिनकी तीन आंखें हैं। तीन आंखों वाला होने के कारण इन्हें त्रिनेत्रधारी भी कहते हैं। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो शिव का तीसरा नेत्र प्रतीकात्मक है। आंखों का काम होता है रास्ता दिखाना और रास्ते में आने वाली मुसीबतों से सावधान करना। जीवन में कई बार ऐसे संकट भी आ जाते हैं, जिन्हें हम समझ नहीं पाते। ऐसे समय में विवेक और धैर्य ही एक सच्चे मार्गदर्शक के रूप में हमें सही-गलत की पहचान कराता है। यह विवेक अत:प्रेरणा के रूप में हमारे अंदर ही रहता है। बस ज़रुरत है उसे जगाने की। भगवान शिव का तीसरा नेत्र आज्ञा चक्र का स्थान है। यह आज्ञा चक्र ही विवेक बुद्धि का स्रोत है। यही हमें विपरीत परिस्थिति में सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है।

2- शिव अपने शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं ( Why does Lord Shiva apply ash on his body?)

हमारे धर्म शास्त्रों में जहां सभी देवी-देवताओं को वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है वहीं भगवान शंकर को सिर्फ मृग चर्म (हिरण की खाल) लपेटे और भस्म लगाए बताया गया है। भस्म शिव का प्रमुख वस्त्र भी है क्योंकि शिव का पूरा शरीर ही भस्म से ढंका रहता है। शिव का भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक कारण भी हैं। भस्म की एक विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इसका मुख्य गुण है कि इसको शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती। भस्मी त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम करती है। भस्मी धारण करने वाले शिव यह संदेश भी देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है।

3- भगवान शिव के हाथ में त्रिशूल क्यों (Why Shiva always carry Trishul?)

त्रिशूल भगवान शिव का प्रमुख अस्त्र है। यदि त्रिशूल का प्रतीक चित्र देखें तो उसमें तीन नुकीले सिरे दिखते हैं। यूं तो यह अस्त्र संहार का प्रतीक है पर वास्तव में यह बहुत ही गूढ़ बात बताता है। संसार में तीन तरह की प्रवृत्तियां होती हैं- सत, रज और तम। सत मतलब सात्विक, रज मतलब सांसारिक और तम मतलब तामसी अर्थात निशाचरी प्रवृति। हर मनुष्य में ये तीनों प्रवृत्तियां पाई जाती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इनकी मात्रा में अंतर होता है। त्रिशूल के तीन नुकीले सिरे इन तीनों प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। त्रिशूल के माध्यम से भगवान शिव यह संदेश देते हैं कि इन गुणों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण हो। यह त्रिशूल तभी उठाया जाए जब कोई मुश्किल आए। तभी इन तीन गुणों का आवश्यकतानुसार उपयोग हो।

4- भगवान शिव ने क्यों पीया था जहर (Why did Lord Shiva drink poison?)

देवताओं और दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से निकला विष भगवान शंकर ने अपने कंठ में धारण किया था। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। समुद्र मंथन का अर्थ है अपने मन को मथना, विचारों का मंथन करना। मन में असंख्य विचार और भावनाएं होती हैं उन्हें मथ कर निकालना और अच्छे विचारों को अपनाना। हम जब अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही निकलेंगे। यही विष हैं, विष बुराइयों का प्रतीक है। शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया। उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। शिव का विष पीना हमें यह संदेश देता है कि हमें बुराइयों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। बुराइयों का हर कदम पर सामना करना चाहिए। शिव द्वारा विष पीना यह भी सीख देता है कि यदि कोई बुराई पैदा हो रही हो तो हम उसे दूसरों तक नहीं पहुंचने दें।

5- क्यों है भगवान शंकर का वाहन बैल(Why is the bullock the vehicle of Lord Shankar?)

भगवान शंकर का वाहन नंदी यानी बैल है। बैल बहुत ही मेहनती जीव होता है। वह शक्तिशाली होने के बावजूद शांत एवं भोला होता है। वैसे ही भगवान शिव भी परमयोगी एवं शक्तिशाली होते हुए भी परम शांत एवं इतने भोले हैं कि उनका एक नाम ही भोलेनाथ जगत में प्रसिद्ध है। भगवान शंकर ने जिस तरह काम को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त की थी, उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता। उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है।

साथ ही नंदी पुरुषार्थ का भी प्रतीक माना गया है। कड़ी मेहनत करने के बाद भी बैल कभी थकता नहीं है। वह लगातार अपने कर्म करते रहता है। इसका अर्थ है हमें भी सदैव अपना कर्म करते रहना चाहिए। कर्म करते रहने के कारण जिस तरह नंदी शिव को प्रिय है, उसी प्रकार हम भी भगवान शंकर की कृपा पा सकते हैं।

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6- क्यों है भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा (Why is the moon on Lord Shiva’s head?)

भगवान शिव का एक नाम भालचंद्र भी प्रसिद्ध है। भालचंद्र का अर्थ है मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाला। चंद्रमा का स्वभाव शीतल होता है। चंद्रमा की किरणें भी शीतलता प्रदान करती हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव कहते हैं कि जीवन में कितनी भी बड़ी समस्या क्यों न आ जाए, दिमाग हमेशा शांत ही रखना चाहिए। यदि दिमाग शांत रहेगा तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल भी निकल आएगा। ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना गया है। मन की प्रवृत्ति बहुत चंचल होती है। भगवान शिव का चंद्रमा को धारण करने का अर्थ है कि मन को सदैव अपने काबू में रखना चाहिए। मन भटकेगा तो लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पाएगी। जिसने मन पर नियंत्रण कर लिया, वह अपने जीवन में कठिन से कठिन लक्ष्य भी आसानी से पा लेता है।

7- भगवान शिव को क्यों कहते श्मशान का निवासी (Why is Lord Shiva called a resident of the crematorium?)

भगवान शिव को वैसे तो परिवार का देवता कहा जाता है, लेकिन फिर भी श्मशान में निवास करते हैं। भगवान शिव के सांसारिक होते हुए भी श्मशान में निवास करने के पीछे लाइफ मैनेजमेंट का एक गूढ़ सूत्र छिपा है। संसार मोह-माया का प्रतीक है जबकि श्मशान वैराग्य का। भगवान शिव कहते हैं कि संसार में रहते हुए अपने कर्तव्य पूरे करो, लेकिन मोह-माया से दूर रहो। क्योंकि ये संसार तो नश्वर है। एक न एक दिन ये सबकुछ नष्ट होने वाला है। इसलिए संसार में रहते हुए भी किसी से मोह मत रखो और अपने कर्तव्य पूरे करते हुए वैरागी की तरह आचरण करो।

8- भगवान शिव गले में क्यों धारण करते हैं नाग (Why does Lord Shiva wear a snake around his neck?)

भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनका वस्त्र व आभूषण भी उतने ही विचित्र हैं। सांसारिक लोग जिनसे दूर भागते हैं। भगवान शिव उसे ही अपने साथ रखते हैं। भगवान शिव एकमात्र ऐसे देवता हैं जो गले में नाग धारण करते हैं। देखा जाए तो नाग बहुत ही खतरनाक प्राणी है, लेकिन वह बिना कारण किसी को नहीं काटता। नाग पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण जीव है। जाने-अंजाने में ये मनुष्यों की सहायता ही करता है। कुछ लोग डर कर या अपने निजी स्वार्थ के लिए नागों को मार देते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव नाग को गले में धारण कर ये संदेश देते हैं कि जीवन चक्र में हर प्राणी का अपना विशेष योगदान है। इसलिए बिना वजह किसी प्राणी की हत्या न करें। द्वादश ज्योतिर्लिंग कथा, स्तोत्रम्  और स्थान

9- भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं भांग-धतूरा (Why is hemp-datura offered to Lord Shiva?)

भगवान शिव को भांग-धतूरा मुख्य रूप से चढ़ाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान को भांग-धतूरा चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं। भांग व धतूरा नशीले पदार्थ हैं। आमजन इनका सेवन नशे के लिए करते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के अनुसार भगवान शिव को भांग-धतूरा चढ़ाने का अर्थ है अपनी बुराइयों को भगवान को समर्पित करना। यानी अगर आप किसी प्रकार का नशा करते हैं तो इसे भगवान को अर्पित करे दें और भविष्य में कभी भी नशीले पदार्थों का सेवन न करने का संकल्प लें। ऐसा करने से भगवान की कृपा आप पर बनी रहेगी और जीवन सुखमय होगा।

10- भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं बिल्व पत्र (Why do we offer Bilva leaves to Shiva?)

शिवपुराण आदि ग्रंथों में भगवान शिव को बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व बताया गया है। 3 पत्तों वाला बिल्व पत्र ही शिव पूजन में उपयुक्त माना गया है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बिल्वपत्र के तीनों पत्ते कहीं से कटे-फटे न हो। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो बिल्व पत्र के ये तीन पत्ते चार पुरुषार्थों में से तीन का प्रतीक हैं- धर्म, अर्थ व काम। जब आप ये तीनों निस्वार्थ भाव से भगवान शिव को समर्पित कर देते हैं तो चौथा पुरुषार्थ यानी मोक्ष अपने आप ही प्राप्त हो जाता है।

11- कैलाश पर्वत क्यों है भगवान शिव को प्रिय (Why is Mount Kailash the favorite abode of Shiva?)

शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं। पर्वतों पर आम लोग नहीं आते-जाते। सिद्ध पुरुष ही वहां तक पहुंच पाते हैं। भगवान शिव भी कैलाश पर्वत पर योग में लीन रहते हैं। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो पर्वत प्रतीक है एकांत व ऊंचाई का। यदि आप किसी प्रकार की सिद्धि पाना चाहते हैं तो इसके लिए आपको एकांत स्थान पर ही साधना करनी चाहिए। ऐसे स्थान पर साधना करने से आपका मन भटकेगा नहीं और साधना की उच्च अवस्था तक पहुंच जाएगा।स्कंद पुराण के अनुसार यहाँ है भगवान शिव की आरामगाह

12- क्यों है भूत-प्रेत शिव के गण (Why are the ghosts and spirits of Lord Shiva gan?)

शिव को संहार का देवता कहा गया है। अर्थात जब मनुष्य अपनी सभी मर्यादाओं को तोडऩे लगता है तब शिव उसका संहार कर देते हैं। जिन्हें अपने पाप कर्मों का फल भोगना बचा रहता है वे ही प्रेतयोनि को प्राप्त होते हैं। चूंकि शिव संहार के देवता हैं। इसलिए इनको दंड भी वे ही देते हैं। इसलिए शिव को भूत-प्रेतों का देवता भी कहा जाता है। दरअसल यह जो भूत-प्रेत है वह कुछ और नहीं बल्कि सूक्ष्म शरीर का प्रतीक है। भगवान शिव का यह संदेश है कि हर तरह के जीव जिससे सब घृणा करते हैं या भय करते हैं वे भी शिव के समीप पहुंच सकते हैं, केवल शर्त है कि वे अपना सर्वस्व शिव को समर्पित कर दें।

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भोलेनाथ के 7 चमत्कारिक मंदिर, जहां दर्शन मात्र से होती है भक्तों की मुरादें पूरी https://astrodeeva.com/7-miracle-temples-of-shiv/ https://astrodeeva.com/7-miracle-temples-of-shiv/#comments Mon, 10 May 2021 02:56:21 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2033 हिन्द मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव सर्वोच्च शक्तिमान है। प्राचीन धार्मिक शास्त्रों में शिव को भैरव या नटराज के रूप में एक उग्र देवता के रूप में भी वर्णित किया गया है। भारत देश में कश्मीर से कन्याकुमारी और सौराष्ट्र से लेकर असम तक, बुराइयों को नष्ट करने और मासूमों को बचाने वाले के रूप […]

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हिन्द मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव सर्वोच्च शक्तिमान है। प्राचीन धार्मिक शास्त्रों में शिव को भैरव या नटराज के रूप में एक उग्र देवता के रूप में भी वर्णित किया गया है। भारत देश में कश्मीर से कन्याकुमारी और सौराष्ट्र से लेकर असम तक, बुराइयों को नष्ट करने और मासूमों को बचाने वाले के रूप में उनकी अलग-अलग रूपों में पूजा की जाती है। भगवान शिव की अगर किसी पर कृपा हो जाये तो वह मनुष्य का जीवन फलीभूत हो जाता है और वो इस संसार के सारे ही सांसारिक सुख भोगता है। इसलिए शिवजी की कृपा पाने के लिए मनुष्य भोलेनाथ के मंदिरों के चक्कर लगता है।

हिन्दू शास्त्रों में भगवान शिव बहुत ही भोले माने गए हैं और वह अपने भक्तों द्वारा सच्चे मन से की गयी भक्ति से आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं। यही कारण है कि देश के इन 7 मंदिरों में कहते हैं कि यदि मनुष्य सच्चे और निश्छल भाव से शिव जी का दर्शन कर ले तो उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। तो आइए आपको बताएं ये प्रमुख 7 मंदिर कौन से हैं

केदारनाथ मंदिर

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में स्थित केदारनाथ का मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह चार धाम यात्रा में से भी एक माना जाता है। उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ-ये दो प्रधान तीर्थ हैं, दोनो के दर्शन का बड़ा ही माहात्म्य है। मान्यता है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल हो जाती है। शास्त्रों लिखा है कि केदारनाथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों का नाश कर भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण करता है।

अमरनाथ गुफा

जम्मू-कश्मीर में स्थित अमरनाथ गुफा हिंदुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल है और यहां दर्शन करना बहुत ही पुण्यदायी माना गया है। यह मंदिर एक गुफा के रूप स्थित है। पवित्र गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग का निर्मित होना है। प्राकृतिक बर्फ से निर्मित होने के कारण इसे स्वयंभू बर्फ का शिवलिंग भी कहते हैं प्रतिवर्ष यह शिवलिंग लगभग 10 फुट ऊचा बनता है। आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक पूरे सावन महीने में होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए लाखो लोग यहां की यात्रा करते है। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इस बर्फ का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। श्रावण पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार में आ जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव ने इसी गुफा में माता पार्वती को अमर कथा सुनाई थी।

सोमनाथ मंदिर

गुजरात  के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे स्थित सोमनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों से एक है। यह ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु विश्व का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। सोमनाथ-ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कंद पुराणादि में उल्लेखित है। चन्द्रदेव का एक नाम सोम भी है। उन्होंने भगवान शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी इसीलिए इसका नाम ‘सोमनाथ’ हो गया।

ओंकारेश्वर मंदिर

ओंकारेश्वर मंदिर मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप खंडवा में नर्मदा के तट पर स्थित है। भोलेनाथ के 12 ज्योतिर्लिंगों में ओमकारेश्वर मंदिर को प्रमुख शिव मंदिर में गिना जाता है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है। चार धाम यात्रा के बाद यहां ओमारेश्वर महादेव का दर्शन करना जरूरी होता है, तभी चार धाम यात्रा का पुण्य मिलता है।

त्रयंबकेश्वर मंदिर

महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के किनारे स्थित त्रयंबकेश्वर मंदिर हिंदुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है। काले पत्थरों से बना ये मंदिर चमत्कारिक माना गया है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में विराजित होना पड़ा। इसी स्थान पर कालसर्प दोष निवारण हेतु पूजा की जाती है और मान्यता हैं यहां से शिवजी का कोई भक्त खाली हाथ नहीं लौटता।

दक्षेश्वर महादेव मंदि

उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित कनखल में दक्षेश्वर मंदिर अपनी आस्था और चमत्कार के लिए जाना जाता है। शास्त्रों के अनुसार ये वहीं मंदिर है जहां राजा दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें सभी देवी-देवताओं, ऋषियों और संतों को तो आमंत्रित किया गया था परंतु भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया गया था। मान्यता है कि जो व्यक्ति दक्षेश्वर महादेव स्थित शिवलिंग का जलाभिषेक करता है, उसे अन्य स्थान पर जल चढ़ाने से कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है।

अरुणाचलेश्वर मंदिर

तमिलनाडु के तिरुवनमलाई जिले में शिव का अनूठा मंदिर है। अन्नामलाई पर्वत की तराई में स्थित इस मंदिर को अनामलार या अरुणाचलेश्वर शिव मंदिर कहा जाता है। यहां हर पूर्णिमा को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। खासतौर पर कार्तिक पूर्णिमा पर विशाल मेला लगता है। श्रद्धालु यहां अन्नामलाई पर्वत की 14 किलोमीटर लंबी परिक्रमा कर शिव से कल्याण की मन्नत मांगते हैं। माना जाता है कि यह शिव का विश्व में सबसे बड़ा मंदिर है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार ब्रह्माजी ने हंस का रूप धारण किया और शिवजी के शीर्ष को देखने के लिए उड़ान भरी। उसे देखने में असमर्थ रहने पर ब्रह्माजी ने एक केवड़े के पुष्प से, जो शिवजी के मुकुट से नीचे गिरा था, शिखर के बारे में पूछा। फूल ने कहा कि वह तो चालीस हजार साल से गिरा पड़ा है। ब्रह्माजी को लगा कि वे शीर्ष तक नहीं पहुंच पाएंगे, तब उन्होंने फूल को यह झूठी गवाही देने के लिए राजी कर लिया कि ब्रह्माजी ने शिवजी का शीर्ष देखा था। शिवजी इस धोखे पर गुस्सा हो गए और ब्रह्माजी को शाप दिया कि उनका कोई मंदिर धरती पर नहीं बनेगा। वहीं केवड़े के फूल को शाप दिया कि वह कभी भी शिव पूजा में इस्तेमाल नहीं होगा। मान्यता है कि जहां शिवजी ने ब्रह्माजी को शाप दिया था, वह स्थल तिरुवनमलाई है।

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Grishneshwar Jyotirling- घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग https://astrodeeva.com/grishneshwar-jyotirling-%e0%a4%98%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2/ https://astrodeeva.com/grishneshwar-jyotirling-%e0%a4%98%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2/#respond Sun, 25 Apr 2021 19:42:40 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1963 घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग(Grishneshwar Jyotirling) महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे घृसणेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है और यहाँ दर्शन करके ही […]

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घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग(Grishneshwar Jyotirling) महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे घृसणेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है और यहाँ दर्शन करके ही ज्योतिर्लिंगों की यात्रा पूरी होती है।। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं इस मंदिर के समीप स्थित हैं। यहीं पर श्री एकनाथजी गुरु व श्री जनार्दन महाराज की समाधि भी है।

श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा ( Story of Grishneshwar Jyotirlinga)

दक्षिण में देवगिरि नामक पर्वत के निकट भरद्वाज कुल में उत्पन्न सुधर्मा नाम के एक ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण रहते थे। उनकी प्रिय पत्नी का नाम सुदेहा था, वह सदा शिवधर्म के पालन में तत्पर रहती थी। वह गृहकार्य में निपुण और पतिव्रता स्त्री थी। सुधर्मा भी सदाचारी और वेद – शास्त्र के मर्मज्ञ थे। वे सदा शिव भक्ति में ही लगे रहते थे। यह सब कुछ होने पर भी उनके कोई पुत्र नहीं था जिससे उनकी पत्नी बहुत दुखी रहती थी। तब उस ब्राह्मणी ने अत्यंत दुखी होकर हठपूर्वक अपनी बहन घुश्मा से पति का दूसरा विवाह करा दिया।

विवाह से पहले सुधर्मा ने सुदेहा को समझाया कि ‘ इस समय तो बहन के प्रति तुम्हारा प्रेम है पर जब इसके पुत्र हो जायेगा तब तुम इससे स्पर्धा करने लगोगी।‘ यह सुनकर सुदेहा ने सब प्रकार से अपने पति को विश्वास दिलाया कि मैं कभी भी अपनी बहन से स्पर्धा नहीं करूँगी। विवाह हो जाने पर घुश्मा दासी की भाँति बड़ी बहन की सेवा करने लगी। सुदेहा भी उसे बहुत प्यार करती थी। घुश्मा अपनी शिवभक्ता बहन की आज्ञा से नित्य एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर विधिवत पूजा करने लगी। पूजा करके वह नजदीक के तालाब में उनका विसर्जन कर देती थी।

शंकर जी की कृपा से उसको एक सुन्दर, सौभाग्यवान और सद्गुण संपन्न पुत्र हुआ। इससे घुश्मा का कुछ मान बढ़ा और यह देखकर सुदेहा के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो गयी। समय आने पर घुश्मा के पुत्र का विवाह हुआ और पुत्रवधु घर में आ गयी। अब तो सुदेहा घुश्मा से और भी जलने लगी। उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी और एक दिन उसने रात में सोते हुए पुत्र को छुरे से मार कर उसके शरीर के टुकड़े टुकड़े कर दिए और कटे हुए अंगों को उसी तालाब में ले जाकर डाल दिया जहाँ घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव लिंगों का विसर्जन करती थी।

घुश्मा के पुत्र के अंगों को उस तालाब में फेंककर वह लौट आयी और घर में सुखपूर्वक सो गयी। घुश्मा सबेरे उठकर प्रतिदिन का पूजनादि कर्म करने लगी। सुधर्मा स्वयं भी नित्यकर्म में लग गए। सुदेहा भी उठकर बड़े आनंद से घर के काम काज करने लगी क्योंकि उसके ह्रदय में पहले जो ईर्ष्या की आग जलती थी वह अब बुझ गयी थी। प्रातःकाल उठकर जब बहु ने पति की शय्या को देखा तो वह खून से भीगी दिखायी दी और वहाँ शरीर के कुछ अंग भी दिखाई दिए, इससे उसको बड़ा दुःख हुआ।

वह तुरंत घुश्मा के पास गयी और कहा – ” माता ! आपके पुत्र कहाँ गए ? उनकी शय्या रक्त से भीगी हुई है। किसने यह क्रूर कर्म किया है?“ यह कहकर घुश्मा की बहु विलाप करती हुई रोने लगी। सुदेहा भी उस समय रोने का नाटक करने लगी पर मन ही मन वह हर्ष से भरी हुई थी। पर उस परिस्थिति में भी घुश्मा अपने नित्य पार्थिव पूजन व्रत से विचलित नहीं हुई। जब तक नित्य पूजन का नियम पूरा नहीं हुआ तब तक उसे किसी दूसरी बात की चिंता नहीं हुई।

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दोपहर को पूजन समाप्त होने पर घुश्मा ने अपने पुत्र की भयंकर शय्या पर दृष्टिपात किया। वह सोचने लगी – ‘ जिन्होंने यह बेटा दिया था, वे ही इसकी रक्षा करेंगे। वे काल के भी काल हैं और सत्पुरुषों के आश्रय हैं। मेरे चिंता करने से क्या होगा। ‘इस तरह विचार करते हुए उसने भगवान शिव के भरोसे धैर्य धारण किया। वह अपने नियम के अनुसार पार्थिव शिवलिंगों को लेकर शिव के नामों का उच्चारण करती हुई उस तालाब के किनारे गयी। उन पार्थिव लिंगों को तालाब में डालकर जब वह लौटने लगी तो उसे अपना पुत्र उसी तालाब के किनारे खड़ा दिखाई दिया। उस समय अपने पुत्र को जीवित देखकर घुश्मा को न तो हर्ष हुआ और न ही विषाद। वह शांतचित्त से यह सब देख ही रही थी कि तभी ज्योतिस्वरूप महेश्वर शिव उस पर संतुष्ट होकर वहाँ प्रकट हो गए। शिव बोले – “सुमुखि ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। वर माँगो। तुम्हारी दुष्टा सौत ने इस बच्चे को मार डाला था। अतः मैं उसे इस अपराध का दंड दूँगा।“

तब घुश्मा ने शिव जी को प्रणाम करके यह वर माँगा – ”नाथ ! सुदेहा मेरी बड़ी बहन है अतः आपको उसकी रक्षा करनी चाहिए।“ शिव बोले – ”उसने तो तुम्हारा बड़ा भारी अपकार किया है तो तुम उसका उपकार क्यों करना चाहती हो ? दुष्ट कर्म करने वाली सुदेहा तो उसके किए हुए दुष्कर्म के कारण वो मृत्यु की सजा के योग्य है। “

घुश्मा ने कहा – ” देव ! आपके दर्शन मात्र से ही मनुष्यों के पूर्वसंचित पापराशि भस्म हो जाते हैं और मन निर्मल हो जाता है। जो अपकार करने वालों का भी उपकार करता है उसके संसर्ग से पुण्य की प्राप्ति होती है, ऐसा मैंने सुना है। मैं किसी भी प्राणी का अहित नहीं चाहती फिर वह तो मेरी बहन है।“ घुश्मा के ऐसा कहने पर भगवान शंकर अत्यंत प्रसन्न हुए और कहा – ” घुश्मे ! तुम कोई और भी वर माँगो क्योंकि तुम्हारी भक्ति और विकारशून्य स्वभाव से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। “

भगवान शिव की बात सुनकर घुश्मा बोली – ” प्रभो ! यदि आप वर देना चाहते हैं तो लोगों की रक्षा के लिए सदा यहाँ निवास कीजिये और मेरे नाम से ही आप की ख्याति हो।“ तब महेश्वर शिव ने अत्यंत प्रसन्न होकर कहा – ” मैं तुम्हारे ही नाम से घुश्मेश्वर कहलाता हुआ सदा यहाँ निवास करूँगा और सबके लिए सुखदायक होऊँगा। मेरा ये ज्योतिर्लिंग घुश्मेश नाम से प्रसिद्ध हो। यह सरोवर तीनों लोक में शिवालय नाम से प्रसिद्ध हो। इस सरोवर का दर्शन सम्पूर्ण फल को देने वाला हो। ऐसा कहकर भगवान शिव वहाँ घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हो गए। इस ज्योतिर्लिंग का दर्शन और पूजन सुख समृद्धि की वृद्धि करने वाला है।

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर खुलने का समय – Grishneshwar Jyotirling Temple Timing

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर सुबह 5:30 बजे खुलता हैं और शाम को 9 बजे बंद हो जाता हैं। हालाकि श्रवण माह में (अगस्त से सितम्बर माह) में सुबह 3 बजे से रात के 11 बजे तक मंदिर यहां आने वाले भक्तो के लिए खुला रहता हैं।

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर कैसे पहुँचें – How To Reach Grishneshwar Temple In Hindi

By Air: घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर जाने के लिए यदि आपने हवाई मार्ग का चुनाव किया हैं, तो हम आपको बता दे कि औरंगाबाद शहर का हवाई अड्डा घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर हैं। आप यहाँ से बस या टैक्सी की सहायता से घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर आसानी से पहुँच जाएंगे।

By Train: घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर जाने के लिए यदि आपने रेलवे मार्ग का चुनाव किया हैं तो हम आपको बता दें कि औरंगाबाद रेलवे स्टेशन देश के प्रमुख रेलवे स्टेशन से बहुत अच्छी तरह से जुडा हुआ हैं। आप यहा से बस या टैक्सी की मदद से घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर आसानी से पहुँच जायेंगे जोकि लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर हैं।

By Road: घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर की यात्रा के लिए यदि आपने सड़क मार्ग का चुनाव किया हैं तो हम आपको बता दें कि औरंगाबाद बस स्टैंड से आप एलोरा गुफा के लिए बस पकड़ सकते हैं। एलोरा केव्स से लगभग 1-2 किलोमीटर की दूरी पर ही घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर हैं।

**(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैंजिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

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Nageshvara Jyotirling – श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग https://astrodeeva.com/nageshvara-jyotirling-%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0/ https://astrodeeva.com/nageshvara-jyotirling-%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0/#respond Mon, 12 Apr 2021 01:16:33 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1873 श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग (Nageshvara Jyotirling ) गुजरात के द्वारिका से 17 मील दूर स्थित है। शास्त्रों में भगवान शिव को नागों के देवता माना जाता है और नागेश्वर का अर्थ होता है नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। नागेश्वर मंदिर में स्थित ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में से […]

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श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग (Nageshvara Jyotirling ) गुजरात के द्वारिका से 17 मील दूर स्थित है। शास्त्रों में भगवान शिव को नागों के देवता माना जाता है और नागेश्वर का अर्थ होता है नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। नागेश्वर मंदिर में स्थित ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में से है तथा 12 ज्योतिर्लिंग में से नागेश्वर को दसवां ज्योतिर्लिंग माना जाता है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा जाता है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शनों के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा ( Story of Nageshvara Jyotirling)

पुराणो के अनुसार एक समय दारुका नाम की एक महा बलशाली राक्षसी हुई जिसे माता पार्वती से वरदान पाकर बहुत अहंकार हो गया था। पश्चिम समुद्र तट पर उसका एक वन था जो सम्पूर्ण समृद्धियों से भरा रहता था। उस वन का विस्तार 16 योजन था। दारुका अपने विलास के लिए जहाँ भी जाती थी, वह वन भी अपनी समस्त भूमि, वृक्षों तथा अन्य सभी वस्तुओं समेत वहीं चला जाता था। देवी पार्वती ने उस वन की रक्षा का भार दारुका को सौंप दिया था। दारुका अपने पति के साथ इच्छानुसार उस वन में विचरण करती थी। उसके पति का नाम दारुक था जो अत्यंत शक्तिशाली था। राक्षस दारुक अपनी पत्नी दारुका के साथ वहाँ रहकर सबको प्रताड़ित करता था। वह सदा यज्ञ और धर्म का नाश करता था। उससे पीड़ित हुई प्रजा ने महर्षि और्व की शरण में जाकर उनको अपना दुःख सुनाया।

और्व मुनि ने शरणागतों की रक्षा के लिए राक्षसों को यह श्राप दिया कि – ‘ ये राक्षस यदि पृथ्वी पर प्राणियों की हिंसा या यज्ञों का विध्वंस करेंगे तो उसी समय अपने प्राणों से हाथ धो बैठेंगे। ‘ देवताओं ने जब यह बात सुनी तो उन्होंने इस का फयदा उठाने की सोची और उन दुराचारी राक्षसों पर आक्रमण कर दिया। राक्षस दुविधा में पड़ गए यदि वे युद्ध में देवताओं को मारेंगे तो मुनि के शाप से उनके प्राण भी चले जाएँगे और नहीं मारते तो पराजित हो जाते।

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इस अवस्था में राक्षसी दारुका ने कहा – ” माता पार्वती के वरदान से मैं इस सारे वन को जहाँ चाहूँ ले जा सकती हूँ।” यह कहकर वह समस्त वन को साथ ले जाकर समुद्र में जा बसी। राक्षस लोग पृथ्वी से हटकर जल में निर्भय होकर रहने लगे और वहाँ के प्राणियों को पीड़ा देने लगे। एक बार बहुत सी नावें उधर से गुजरी जो मनुष्यों से भरी थीं जो व्यापार के उद्देश्य से परदेश जा रहे थे। राक्षसों ने उन सब को पकड़ लिया और बेड़ियों से बांधकर कारागार में डाल दिया और उनको विभिन्न प्रकार से कष्ट देने लगे। उनमें सुप्रिय नाम का एक प्रसिद्ध वैश्य था जो उस दल का मुखिया था। वह बड़ा सदाचारी, भस्म-रुद्राक्षधारी तथा भगवान शिव का परम भक्त था। सुप्रिय ने भोलेनाथ से प्रार्थना की– ” हे देवेश्वर! आप ही मेरे सर्वस्व हैं, मैं आपका हूँ, आपके अधीन हूँ, मेरा जीवन आप को समर्पित है आप हमारी रक्षा कीजिये और हमें इन राक्षसों के चूँगाल से मुक्त कराइये।“

सुप्रिय की इस करुणामयी प्रार्थना करने पर भगवान शंकर एक विवर से प्रकट हो गए। तब सुप्रिय ने उत्तम प्रकार से भगवान शिव की स्तुति एवं पूजन किया। उसके पूजन से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने पाशुपतास्त्र लेकर सभी राक्षसों का तत्काल संहार कर दिया और अपने भक्त सुप्रिय और उसके साथियों की रक्षा की। इसके बाद भगवान शिव ने उस वन को यह वर दिया कि – ‘ आज से इस वन में श्रेष्ठ मुनि निवास करेंगे और राक्षस इसमें कभी न रहेंगे।‘

इसी समय राक्षसी दारुका ने दीन भाव से देवी पार्वती की स्तुति की। उसकी प्रार्थना से पार्वती माता प्रसन्न हो गयीं और दारुका से बोली – ” बता, तेरा क्या इच्छा है? “ दारुका ने कहा – ” माता, मेरे वंश की रक्षा कीजिये। “पार्वती माता बोली – ” मैं सच कहती हूँ, तेरे कुल की रक्षा करूँगी। “ ऐसा कहकर माता पार्वती ने भगवान शिव जी से प्रार्थना की “हे नाथ!यह राक्षसी दारुका मेरी भक्त है और राक्षसियों में बलिष्ठ है। अतः यही राक्षसों के राज्य का शासन करे। ये राक्षस पत्नियां जिन पुत्रों को पैदा करेंगी वे सब मिलकर इस वन में निवास करें, ऐसी मेरी इच्छा है।“ शिव बोले – ” प्रिये ! यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो ऐसा ही हो। मैं भक्तों का पालन करने के लिए प्रसन्नतापूर्वक इस वन में निवास करूँगा।“ इस प्रकार भगवान शिव और माता पार्वती वहाँ स्थित हो गए। ज्योतिर्लिंग स्वरुप महादेव वहाँ नागेश्वर के नाम से विख्यात हुए। वे तीनों लोकों की सम्पूर्ण कामनाओं को सदा पूर्ण करने वाले और महापातकों का नाश करने वाले हैं।

श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर समय सारणी(Nageshvara Jyotirling Temple time table)

मंदिर सुबह पांच बजे प्रातः ( 05:00 am) आरती के साथ खुलता है, आम जनता के लिए मंदिर छः बजे सुबह( 06:00 am) खुलता है। भक्तों के लिए शाम चार बजे श्रृंगार दर्शन होता है तथा उसके बाद गर्भगृह में प्रवेश बंद हो जाता है। शयन आरती शाम सात बजे होती है तथा रात नौ बजे मंदिर बंद हो जाता है।

श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर की विभिन्न पूजाएँ: Nageshvara Jyotirling worships)

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में मंदिर प्रबंधन समिति के द्वारा भक्तों की सुविधा के लिए रु. 105 से लेकर रु. 2101 के बीच विभिन्न प्रकार की पूजाएँ सशुल्क सम्पन्न कराई जाती हैं। जिन भक्तों को पूजन अभिषेक करवाना होता है, उन्हें मंदिर के पूजा काउंटर पर शुल्क जमा करवाकर रसीद प्राप्त करनी होती है, तत्पश्चात मंदिर समिति भक्त के साथ एक पुरोहित को अभिषेक के लिए भेजती है जो भक्त को लेकर गर्भगृह में लेकर जाता है तथा शुल्क के अनुसार पूजा करवाता है।

**(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैंजिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

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Baidyanath Jyotirlinga – वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग https://astrodeeva.com/baidyanath-jyotirlinga-%e0%a4%b5%e0%a5%88%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%82/ https://astrodeeva.com/baidyanath-jyotirlinga-%e0%a4%b5%e0%a5%88%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%82/#respond Mon, 05 Apr 2021 03:15:33 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1847 श्री वैद्यनाथ शिवलिंग (Baidyanath Jyotirlinga) का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर भारतवर्ष के राज्य झारखंड में अतिप्रसिद्ध देवघर नामक स्‍थान पर अवस्थित है। पवित्र तीर्थ होने के कारण लोग इसे वैद्यनाथ धाम भी कहते हैं। जहाँ पर यह मन्दिर स्थित है उस स्थान को […]

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श्री वैद्यनाथ शिवलिंग (Baidyanath Jyotirlinga) का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर भारतवर्ष के राज्य झारखंड में अतिप्रसिद्ध देवघर नामक स्‍थान पर अवस्थित है। पवित्र तीर्थ होने के कारण लोग इसे वैद्यनाथ धाम भी कहते हैं। जहाँ पर यह मन्दिर स्थित है उस स्थान को “देवघर” अर्थात देवताओं का घर कहते हैं। बैद्यनाथ ज्‍योतिर्लिंग स्थित होने के कारण इस स्‍थान को देवघर नाम मिला है। यह ज्‍योतिर्लिंग एक सिद्धपीठ है। कहा जाता है कि यहाँ पर आने वालों की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इस कारण इस लिंग को “कामना लिंग” भी कहा जाता हैं।

वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा ( Story of Baidyanath Jyotirlinga)

पौराणिक कथा के अनुसार एक समय राक्षसराज रावण ने कैलाश पर जाकर अत्यंत भक्तिभाव के साथ भगवान शिव की आराधना की। कुछ समय तक आराधना करने पर जब महादेव प्रसन्न नहीं हुए तब वह कैलाश पर्वत के पास स्थित वन में जाकर एक बड़ा गड्ढा खोदकर उसमें अग्नि प्रज्वलित करके वहीं बैठकर हवन और यज्ञ करते हुए और घोर तप करने लगा।

ग्रीष्म ऋतु में वह पाँच अग्नियों के बीच बैठता, वर्षा ऋतु में खुले मैदान में सोता और शीतकाल में जल के भीतर खड़ा रहता। इस तरह तीन प्रकार से उसकी कठोर तपस्या निरंतर चलती रही। तब एक दिन भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हो गए और रावण को उसकी इच्छा के अनुसार अनुपम और उत्तम बल प्रदान किया।

भगवान शिव का कृपा प्रसाद पाकर रावण ने नतमस्तक हो दोनों हाथ जोड़कर उनसे कहा –” हे कैलाशपती! मुझ पर प्रसन्न होइए। मैं आपको अपने साथ लंका ले जाना चाहता हूँ। आप मेरे इस मनोरथ को सफल कीजिये। मैं आपकी शरण में आया हूँ।“ रावण के ऐसा कहने पर भगवान शिव बड़े संकट में पड़ गए और अनमने होकर बोले – ” राक्षसराज! मेरी बात ध्यान से सुनो। तुम मेरे इस उत्तम लिंग को भक्तिभाव से अपने घर को ले जाओ। पर अगर मार्ग में तुमने इसे कहीं भी भूमि पर रखा तो यह वहीँ सुस्थिर हो जायेगा। “

भगवान शंकर के ऐसा कहने पर रावण ने उनकी आज्ञा लेकर वह शिवलिंग अपने साथ लेकर लंका को प्रस्थान किया। परन्तु मार्ग में भगवान शिव की माया से उसे मूत्रोत्सर्ग की इक्षा हुई। रावण अत्यंत सामर्थ्यवान होने पर भी मूत्र के वेग को नहीं रोक सका। इसी समय वहाँ आस-पास एक ग्वाले को देखकर उसने प्रार्थना करके वह शिवलिंग उसके हाथ में थमा दिया और स्वयं मूत्रत्याग के लिए बैठ गया। एक मुहूर्त बीतते-बीतते वह ग्वाला उस शिवलिंग के भार को सहन नहीं कर पाया और उसे पृथ्वी पर रख दिया। फिर वह ज्योतिर्मय शिवलिंग वहीँ स्थित हो गया। यह देख रावण क्रोधित हुआ पर वह कर भी क्या सकता था, वह वहीं स्थित हो गया तब रावण निराश होकर अपने घर चला गया। जब इन्द्र आदि देवताओं और ऋषि मुनियों ने यह समाचार सुना तो वे सब वहाँ आये और बड़ी प्रसन्नता के साथ शिवजी का विशेष पूजन किया। उन्होंने उस शिवलिंग की विधिवत स्थापना की और उसका नाम वैद्यनाथ रखकर उसकी वंदना करके अपने-अपने स्थान को चले गए। इस दिव्य एवं श्रेष्ठ ज्योतिर्लिंग का दर्शन एवं पूजन सम्पूर्ण अभीष्टों को देने वाला और समस्त पापराशि को हर लेने वाला है। यह सत्पुरुषों को भोग एवं मोक्ष प्रदान करने वाला है।

वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग रोचक तथ्य (Interesting Fact Of Baidyanath Jyotirlinga)

भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में झारखण्ड के देवघर जिले में स्थित वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग शामिल है। विश्व के सभी शिव मंदिरों के शीर्ष पर त्रिशूल लगा दीखता है मगर वैद्यनाथधाम परिसर के शिव, पार्वती, लक्ष्मी-नारायण व अन्य सभी मंदिरों के शीर्ष पर पंचशूल लगे हैं। कहा जाता है कि रावण पंचशूल से ही अपने राज्य लंका की सुरक्षा करता था। चूंकि वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग को लंका ले जाने के लिए कैलाश से रावण ही लेकर आया था पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। ज्योतिर्लिंग ले जाने की शर्त्त यह थी कि बीच में इसे कहीं नहीं रखना है मगर देव योग से रावण को लघुशंका का तीव्र वेग असहनशील हो गया और वह ज्योतिर्लिंग को भगवान के बदले हुए चरवाहे के रूप को देकर लघुशंका करने लगा। उस चरवाहे ने ज्योतिर्लिंग को जमीन पर रख दिया। इस तरह चरवाहे के नाम वैद्यनाथ पर वैद्यनाथधाम का निर्माण हुआ।

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Mallikarjuna Jyotirlinga: मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा https://astrodeeva.com/mallikarjuna-jyotirlinga-%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%a8-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0/ https://astrodeeva.com/mallikarjuna-jyotirlinga-%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%a8-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0/#respond Mon, 01 Feb 2021 05:26:05 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1668 मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (Mallikarjuna Jyotirlinga) आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं। स्कंदपुराण में श्री शैल काण्ड नाम का अध्याय है। इसमें […]

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मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (Mallikarjuna Jyotirlinga) आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं। स्कंदपुराण में श्री शैल काण्ड नाम का अध्याय है। इसमें उपरोक्त मंदिर का वर्णन है। इससे इस मंदिर की प्राचीनता का पता चलता है। कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जहां पर यह ज्योतिर्लिंग है, उस पर्वत पर आकर शिव का पूजन करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होते हैं।

तमिल संतों ने भी प्राचीन काल से ही इसकी स्तुति गायी है। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने जब इस मंदिर की यात्रा की, तब उन्होंने शिवनंद लहरी की रचना की थी। श्री शैलम का सन्दर्भ प्राचीन हिन्दू पुराणों और ग्रंथ महाभारत में भी आता है।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा ( Story of Mallikarjuna Jyotirlinga)

एक बार विवाह को लेकर कार्तिकेय और अग्रपूज्य गणेश जी में विवाद हो गया। तब भगवान शिव और पार्वती माता ने पहले गणेश जी का विवाह करने का निर्णय लिया। जिससे कुमार कार्तिकेय माता पिता से रुष्ट होकर क्रौञ्च पर्वत पर चले गए और शिव पार्वती के अनुरोध करने पर भी वापस नहीं लौटे तथा वहाँ से भी 12 कोस दूर चले गए। तब शिव पार्वती ज्योतिर्मय स्वरुप धारण करके वहीँ प्रतिष्ठित हो गए। वे दोनों पुत्र स्नेह के कारण विशेष तिथियों में अपने पुत्र कुमार को देखने के लिए उनके पास जाया करते हैं।

अमावस्या के दिन भगवान भोलेनाथ स्वयं वहाँ जाते हैं और पूर्णिमा के दिन पार्वती जी वहाँ जाती हैं। उसी दिन से भगवान शिव का मल्लिकार्जुन नामक शिवलिंग संसार में प्रसिद्ध हुआ। मल्लिका का अर्थ पार्वती है और अर्जुन भगवान शिव का ही एक नाम है। इस ज्योतिर्लिंग का जो भी दर्शन पूजन करता है वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और मनोवांछित फल पाता है।

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