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Skanda Sashti – स्कन्द षष्ठी का व्रत कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। ‘तिथितत्त्व’ ने चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी को ‘स्कन्द षष्ठी’ कहा है।यह व्रत ‘संतान षष्ठी’ नाम से भी जाना जाता है। स्कंदपुराण के नारद-नारायण संवाद में संतान प्राप्ति और संतान की पीड़ाओं का शमन करने वाले इस व्रत का विधान बताया गया है। एक दिन पूर्व से उपवास करके षष्ठी को ‘कुमार’ अर्थात् कार्तिकेय की पूजा करनी चाहिए। तमिल प्रदेश में स्कन्द षष्ठी महत्त्वपूर्ण दिन है और इनकी पूजा मन्दिरों में विधि विधान से की जाती है।

स्कन्द षष्ठी व्रत की प्राचीनता एवं प्रमाणिकता

इस व्रत की प्राचीनता एवं प्रामाणिकता स्वयं परिलक्षित होती है। इस कारण यह व्रत श्रद्धाभाव से मनाया जाने वाले पर्व का रूप धारण करता है। स्कंद षष्ठी के संबंध में मान्यता है कि राजा शर्याति और भार्गव ऋषि च्यवन का भी ऐतिहासिक कथानक इससे जुड़ा है। कहते हैं कि स्कंद षष्ठी की उपासना से च्यवन ऋषि को आँखों की ज्योति प्राप्त हुई।
ब्रह्मवैवर्तपुराण में बताया गया है कि स्कंद षष्ठी की कृपा से प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो जाता है। स्कन्द षष्ठी पूजा की पौरांणिक परम्परा है। भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कन्द की छह कृतिकाओं ने स्तनपान करा कर रक्षा की थी। इनके छह मुख हैं और उन्हें ‘कार्तिकेय’ नाम से पुकारा जाने लगा।पुराण व उपनिषद में इनकी महिमा का उल्लेख मिलता है।
निर्णयामृत में आया है कि भाद्रपद की षष्ठी को दक्षिणापथ में कार्तिकेय का दर्शन लेने से ब्रह्महत्या जैसे गम्भीर पापों से मुक्ति मिल जाती है।हेमाद्रि एवं कृत्यरत्नाकर ने ब्रह्म पुराण से उद्धरण देकर बताया है कि स्कन्द की उत्पत्ति अमावास्या को अग्निसे हुई थी, वे चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी को प्रत्यक्ष हुए थे, देवों के द्वारा सेनानायक बनाये गये थे तथा तारकासुर का वध किया था, अत: उनकी पूजा, दीपों, वस्त्रों, अलंकरणों, मुर्गों (खिलौनों के रूप में) आदि से की जानी चाहिए अथवा उनकी पूजा बच्चों के स्वास्थ्य के लिए सभी शुक्ल षष्ठियों पर करनी चाहिए।

स्कन्द षष्ठी व्रत का महत्त्व (Importance Of Skanda Sashti)

भगवान स्कंद शक्ति के अधिदेव हैं, देवताओं ने इन्हें अपना सेनापतित्व प्रदान किया था। मयूर पर आसीन देवसेनापति कुमार कार्तिक की आराधना दक्षिण भारत मे सबसे ज्यादा होती है, यहाँ पर यह ‘मुरुगन’ नाम से विख्यात हैं।
प्रतिष्ठा, विजय, व्यवस्था, अनुशासन सभी कुछ इनकी कृपा से सम्पन्न होते हैं। स्कन्दपुराण के मूल उपदेष्टा कुमार कार्तिकेय ही हैं तथा यह पुराणसभी पुराणों में सबसे विशाल है। स्कंद भगवान हिंदू धर्म के प्रमुख देवों मे से एक हैं। स्कंद को कार्तिकेय और मुरुगन नामों से भी पुकारा जाता है।काम्या वैदिक एस्ट्रो
दक्षिण भारत में पूजे जाने वाले प्रमुख देवताओं में से एक भगवान कार्तिकेय शिव पार्वती के पुत्र हैं। कार्तिकेय भगवान के अधिकतर भक्त तमिल हिन्दू हैं। इनकी पूजा मुख्यत: भारत के दक्षिणी राज्यों और विशेषकर तमिलनाडु में होती है। भगवान स्कंद के सबसे प्रसिद्ध मंदिर तमिलनाडू में ही स्थित हैं।

स्कन्द षष्ठी का व्रत कब करें (When to observe Skanda Sashti fast)

यह व्रत प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को किया जाता है। वर्ष के किसी भी मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को यह व्रत आरंभ किया जा सकता है। वैसे चैत्र अथवा आश्विन मास की षष्ठी को इस व्रत को आरंभ करने का प्रचलन अधिक है।

स्कन्द षष्ठी व्रत पूजा की आवश्यक सामग्री

भगवान शालिग्राम जी का विग्रह, कार्तिकेय का चित्र, तुलसी का पौधा (गमले में लगा हुआ), तांबे का लोटा, नारियल, पूजा की सामग्री, जैसे- कुंकुम, अक्षत, हल्दी, चंदन अबीर, गुलाल, दीपक, घी, इत्र, पुष्प, दूध, जल, मौसमी फल, मेवा, मौली आसन इत्यादि।

स्कन्द षष्ठी व्रत की पूजन विधि 

स्कंद षष्ठी के अवसर पर शिव-पार्वती को पूजा जाता है। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसमें स्कंद देव (कार्तिकेय) की स्थापना करके पूजा की जाती है तथा अखंड दीपक जलाए जाते हैं। भक्तों द्वारा स्कंद षष्ठी महात्म्य का नित्य पाठ किया जाता है। भगवान को स्नान कराया जाता है, नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और उनकी पूजा की जाती है। इस दिन भगवान को भोग लगाते हैं, विशेष कार्य की सिद्धि के लिए इस समय कि गई पूजा-अर्चना विशेष फलदायी होती है। इसमें साधक तंत्र साधना भी करते हैं, इसमें मांस, शराब, प्याज, लहसुन का त्याग करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का संयम रखना आवश्यक होता है।

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Hanuman Jayanti 2022 : हनुमान जयंती उत्सव और अनुष्ठान https://astrodeeva.com/hanuman-jayanti-2022-hanuman-jayanti-celebrations-and-rituals/ https://astrodeeva.com/hanuman-jayanti-2022-hanuman-jayanti-celebrations-and-rituals/#respond Tue, 12 Apr 2022 11:03:57 +0000 https://astrodeeva.com/?p=3207 हनुमान जी को बजरंगबली, पवनपुत्र, आदि कई नामों से भी जाना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार हनुमान जी को भगवान श्री राम का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है। हिन्दू धर्म ग्रंथो के अनुसार इनका जन्म चैत्र माह की पूर्णिमा के दिन हुआ था। हनुमान जयंती(Hanuman Jayanti 2022) पूरे भारत में बहुत उत्साह […]

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हनुमान जी को बजरंगबली, पवनपुत्र, आदि कई नामों से भी जाना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार हनुमान जी को भगवान श्री राम का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है। हिन्दू धर्म ग्रंथो के अनुसार इनका जन्म चैत्र माह की पूर्णिमा के दिन हुआ था। हनुमान जयंती(Hanuman Jayanti 2022) पूरे भारत में बहुत उत्साह और उल्लास के साथ मनाई जाती है।

मान्यता है त्रेतायुग में प्रभु श्रीराम के साथ ही सभी देवी-देवतागण अपने-अपने लोकों को प्रस्थान कर गये थे किन्तु प्रभु श्रीराम के आशीर्वाद से हनुमानजी प्रभु के भजन और जनकल्याण हेतु पृथ्वी पर ही रह गये थे। अपनी प्रत्यक्षता का प्रमाण वे समय-समय पर पृथ्वी वासियों को भिन्न-भिन्न रूपों में देते रहते हैं। जहाँ भी रामकथा, रामचरितमानस सुन्दरकाण्ड आदि का आयोजन किया जाता है वहाँ हनुमानजी के लिये एक पृथक आसन की व्यवस्था की जाती है। जहाँ भी प्रभु श्रीराम का स्मरण किया जाता है वहाँ हनुमानजी प्रत्यक्ष उपस्थित रहते हैं। हनुमानजी देवता होने के साथ-साथ सर्वश्रेष्ठ गुरू भी हैं। प्रभु श्रीराम को शीघ्र पाने का सबसे सरल और सुगम मार्ग स्वयं हनुमानजी ही हैं। हनुमान जन्मोत्सव के दिन बजरंगबली की विधिवत पूजा करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है साथ ही सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

हनुमान जयंती 2022 – Hanuman Jayanti 2022

ऐसा माना जाता है कि हनुमान जी का जन्म सूर्योदय के समय हुआ था। हनुमान जयन्ती के दिन मन्दिरों में प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में आध्यात्मिक प्रवचनों का आयोजन किया जाता है और यह आयोजन सूर्योदय के साथ ही समाप्त हो जाते हैं।

दिनांक : 16 अप्रैल 2022
वार : शनिवार
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ: 16 अप्रैल 2022 को 02:25 ए एम बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त: 17 अप्रैल 2022 को 12:24 पी एम बजे

हनुमान जयंती की कथा- Legend of Hanuman Jayanti

हनुमान जी को भगवान शिव का 11वां रूद्र अवतार माना जाता हैं| इनके जन्म के बारे में पुराणों में उल्लेख है की जब अमरत्व की प्राप्ति के लिये देवताओं व असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था तब समुद्र से निकले अमृत को असुरों ने छीन लिया और आपस में ही लड़ने लगे। तब भगवान विष्णु मोहिनी के रूप में अवतरित हुए। मोहनी रूप देख देवता व असुर तो क्या स्वयं भगवान शिवजी कामातुर हो गए। इस समय भगवान शिव ने जो वीर्य त्याग किया उसे पवनदेव ने वानरराज केसरी की पत्नी अंजना के गर्भ में प्रविष्ट कर दिया। जिसके फलस्वरूप माता अंजना के गर्भ से केसरी नंदन मारुती संकट मोचन रामभक्त श्री हनुमान का जन्म हुआ।

अन्य पड़ें : भगवान राम पर हनुमान जी का कर्जा

हनुमान जयंती का महत्व- Significance of Hanuman Jayanti

हनुमान भगवान राम के आराध्य भक्त हैं। वह भगवान की भक्ति के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में बरकरार है। वह एक ब्रह्मचारी है और उन्हें बजरंग बली, पवनपुत्र, महावीर और मारुति जैसे कई नामों से जाना जाता है। हनुमान शक्ति, भक्ति, निस्वार्थ सेवा और समर्पण के प्रतीक है।

माना जाता है कि हनुमान जन्मोत्सव पर हनुमान जी की पूजा-अर्चना करने से जीवन में संकटों से मुक्ति और सुख शान्ति की प्राप्ति होती है। अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि या मंगल ग्रह का अशुभ प्रभाव होता है, तो उसे विधिपूर्वक हनुमान जी की पूजा करनी चाहिए। इनकी विधि पूर्वक पूजा करने से इन दोनों ग्रहों से जुड़ी समस्याएं भी दूर हो जाती हैं। साथ ही साथ नकारात्मक ऊर्जा, भूत-प्रेत बाधा जैसी परेशानियों से भी मुक्ति मिल जाती है। इस दिन हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ अवश्य करना चाहिए।

हनुमान जयंती का उत्सव और अनुष्ठान-  and Ritual of Hanuman Jayanti

इस व्रत को रखने वालों के लिए कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक होता है।

  • व्रत के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना जरुरी है हो सके तो जमीन पर ही सोए।
  • प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर प्रभू श्री राम, माता सीता व श्री हनुमान का स्मरण करें।
  • नित्य क्रिया से निवृत होकर स्नान कर हनुमान जी की प्रतिमा को स्थापित कर विधि- विधान से पूजा करें।
  • पूजा में हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है।
  • पूजा की सभी विधि सम्पन्न करने के बाद हनुमान जी की आरती उतारें। इस दिन स्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड या हनुमान चालीसा का अखंड पाठ भी करवाया जाता है।
  • पूजा करने के बाद प्रसाद के रुप में गुड़, भीगे या भुने चने एवं बेसन के लड्डू हनुमान जी को चढ़ाये जाते हैं।
  • पूजा सामग्री में सिंदूर, केसर युक्त चंदन, धूप, अगरबती, दीपक के लिए शुद्ध घी या चमेली के तेल का उपयोग कर सकते हैं।
  • पूजन में पुष्प के रूप में गैंदा, गुलाब, कनेर, सूरजमुखी आदि के लाल या पीले पुष्प अर्पित करें।
  • इस दिन हनुमान जी को सिंदूर का चोला चढ़ाने से मनोकामना की शीघ्र पूर्ति होती है।

हनुमान जयंती का उत्सव ( Hanuman Jayanti 2022 Celebration)

भक्तगण अपनी स्थानीय मान्यताओं एवं कैलेण्डर के आधार पर वर्ष में भिन्न-भिन्न समय पर हनुमान जयन्ती का त्यौहार मनाते हैं। उत्तर भारतीय राज्यों में चैत्र पूर्णिमा की हनुमान जयन्ती सर्वाधिक लोकप्रिय है।

आन्ध्र प्रदेश तथा तेलंगाना में, हनुमान जयन्ती 41 दिनों तक मनायी जाती है, जो चैत्र पूर्णिमा से प्रारम्भ होती है तथा वैशाख माह में कृष्ण पक्ष के दौरान दसवें दिन समाप्त होती है। आन्ध्र प्रदेश में भक्त चैत्र पूर्णिमा पर 41 दिनों की दीक्षा आरम्भ करते हैं तथा हनुमान जयन्ती के दिन इसका समापन करते हैं।

तमिलनाडु में, हनुमान जयन्ती को हनुमथ जयन्ती के नाम से जाना जाता है और मार्गशीर्ष अमावस्या के दौरान मनाया जाता है। ग्रेगोरियन कैलेण्डर में तमिल हनुमान जयन्ती जनवरी या दिसम्बर माह में आती है।

कर्नाटक में, मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पक्ष त्रयोदशी को हनुमान जयन्ती मनाई जाती है। इस शुभ दिन को हनुमान व्रतम के नाम से जाना जाता है।

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श्री हनुमान चालीसा हिंदी अर्थ सहित 

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Lord Shiva : भगवान शिव से जुड़ी 12 रोचक बातें और उनके पिछे के अर्थ https://astrodeeva.com/lord-shiva-12-interesting-things-related-to-lord-shiva-and-their-meaning-behind-them/ https://astrodeeva.com/lord-shiva-12-interesting-things-related-to-lord-shiva-and-their-meaning-behind-them/#comments Mon, 14 Mar 2022 07:50:16 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2966 Interesting Facts of Lord Shiva : भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनकी वेश-भूषा व उनसे जुड़े तथ्य उतने ही विचित्र हैं। शिव श्मशान में निवास करते हैं, गले में नाग धारण करते हैं, भांग व धतूरा ग्रहण करते हैं। आदि न जाने कितने रोचक तथ्य इनके साथ जुड़े हैं। आज हम आपको भगवान शिव से […]

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Interesting Facts of Lord Shiva : भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनकी वेश-भूषा व उनसे जुड़े तथ्य उतने ही विचित्र हैं। शिव श्मशान में निवास करते हैं, गले में नाग धारण करते हैं, भांग व धतूरा ग्रहण करते हैं। आदि न जाने कितने रोचक तथ्य इनके साथ जुड़े हैं। आज हम आपको भगवान शिव से जुड़ी ऐसी ही रोचक बातें व इनमें छिपे लाइफ मैनेजमेंट के सूत्रों के बारे में बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-

1- क्यों हैं भगवान शिव की तीन आंखें (Why does Lord Shiva have three eyes?)

धर्म ग्रंथों के अनुसार सभी देवताओं की दो आंखें हैं, लेकिन एकमात्र शिव ही ऐसे देवता हैं जिनकी तीन आंखें हैं। तीन आंखों वाला होने के कारण इन्हें त्रिनेत्रधारी भी कहते हैं। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो शिव का तीसरा नेत्र प्रतीकात्मक है। आंखों का काम होता है रास्ता दिखाना और रास्ते में आने वाली मुसीबतों से सावधान करना। जीवन में कई बार ऐसे संकट भी आ जाते हैं, जिन्हें हम समझ नहीं पाते। ऐसे समय में विवेक और धैर्य ही एक सच्चे मार्गदर्शक के रूप में हमें सही-गलत की पहचान कराता है। यह विवेक अत:प्रेरणा के रूप में हमारे अंदर ही रहता है। बस ज़रुरत है उसे जगाने की। भगवान शिव का तीसरा नेत्र आज्ञा चक्र का स्थान है। यह आज्ञा चक्र ही विवेक बुद्धि का स्रोत है। यही हमें विपरीत परिस्थिति में सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है।

2- शिव अपने शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं ( Why does Lord Shiva apply ash on his body?)

हमारे धर्म शास्त्रों में जहां सभी देवी-देवताओं को वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है वहीं भगवान शंकर को सिर्फ मृग चर्म (हिरण की खाल) लपेटे और भस्म लगाए बताया गया है। भस्म शिव का प्रमुख वस्त्र भी है क्योंकि शिव का पूरा शरीर ही भस्म से ढंका रहता है। शिव का भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक कारण भी हैं। भस्म की एक विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इसका मुख्य गुण है कि इसको शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती। भस्मी त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम करती है। भस्मी धारण करने वाले शिव यह संदेश भी देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है।

3- भगवान शिव के हाथ में त्रिशूल क्यों (Why Shiva always carry Trishul?)

त्रिशूल भगवान शिव का प्रमुख अस्त्र है। यदि त्रिशूल का प्रतीक चित्र देखें तो उसमें तीन नुकीले सिरे दिखते हैं। यूं तो यह अस्त्र संहार का प्रतीक है पर वास्तव में यह बहुत ही गूढ़ बात बताता है। संसार में तीन तरह की प्रवृत्तियां होती हैं- सत, रज और तम। सत मतलब सात्विक, रज मतलब सांसारिक और तम मतलब तामसी अर्थात निशाचरी प्रवृति। हर मनुष्य में ये तीनों प्रवृत्तियां पाई जाती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इनकी मात्रा में अंतर होता है। त्रिशूल के तीन नुकीले सिरे इन तीनों प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। त्रिशूल के माध्यम से भगवान शिव यह संदेश देते हैं कि इन गुणों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण हो। यह त्रिशूल तभी उठाया जाए जब कोई मुश्किल आए। तभी इन तीन गुणों का आवश्यकतानुसार उपयोग हो।

4- भगवान शिव ने क्यों पीया था जहर (Why did Lord Shiva drink poison?)

देवताओं और दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से निकला विष भगवान शंकर ने अपने कंठ में धारण किया था। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। समुद्र मंथन का अर्थ है अपने मन को मथना, विचारों का मंथन करना। मन में असंख्य विचार और भावनाएं होती हैं उन्हें मथ कर निकालना और अच्छे विचारों को अपनाना। हम जब अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही निकलेंगे। यही विष हैं, विष बुराइयों का प्रतीक है। शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया। उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। शिव का विष पीना हमें यह संदेश देता है कि हमें बुराइयों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। बुराइयों का हर कदम पर सामना करना चाहिए। शिव द्वारा विष पीना यह भी सीख देता है कि यदि कोई बुराई पैदा हो रही हो तो हम उसे दूसरों तक नहीं पहुंचने दें।

5- क्यों है भगवान शंकर का वाहन बैल(Why is the bullock the vehicle of Lord Shankar?)

भगवान शंकर का वाहन नंदी यानी बैल है। बैल बहुत ही मेहनती जीव होता है। वह शक्तिशाली होने के बावजूद शांत एवं भोला होता है। वैसे ही भगवान शिव भी परमयोगी एवं शक्तिशाली होते हुए भी परम शांत एवं इतने भोले हैं कि उनका एक नाम ही भोलेनाथ जगत में प्रसिद्ध है। भगवान शंकर ने जिस तरह काम को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त की थी, उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता। उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है।

साथ ही नंदी पुरुषार्थ का भी प्रतीक माना गया है। कड़ी मेहनत करने के बाद भी बैल कभी थकता नहीं है। वह लगातार अपने कर्म करते रहता है। इसका अर्थ है हमें भी सदैव अपना कर्म करते रहना चाहिए। कर्म करते रहने के कारण जिस तरह नंदी शिव को प्रिय है, उसी प्रकार हम भी भगवान शंकर की कृपा पा सकते हैं।

Also Read: शिव चालीसा हिंदी अर्थ सहित

6- क्यों है भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा (Why is the moon on Lord Shiva’s head?)

भगवान शिव का एक नाम भालचंद्र भी प्रसिद्ध है। भालचंद्र का अर्थ है मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाला। चंद्रमा का स्वभाव शीतल होता है। चंद्रमा की किरणें भी शीतलता प्रदान करती हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव कहते हैं कि जीवन में कितनी भी बड़ी समस्या क्यों न आ जाए, दिमाग हमेशा शांत ही रखना चाहिए। यदि दिमाग शांत रहेगा तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल भी निकल आएगा। ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना गया है। मन की प्रवृत्ति बहुत चंचल होती है। भगवान शिव का चंद्रमा को धारण करने का अर्थ है कि मन को सदैव अपने काबू में रखना चाहिए। मन भटकेगा तो लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पाएगी। जिसने मन पर नियंत्रण कर लिया, वह अपने जीवन में कठिन से कठिन लक्ष्य भी आसानी से पा लेता है।

7- भगवान शिव को क्यों कहते श्मशान का निवासी (Why is Lord Shiva called a resident of the crematorium?)

भगवान शिव को वैसे तो परिवार का देवता कहा जाता है, लेकिन फिर भी श्मशान में निवास करते हैं। भगवान शिव के सांसारिक होते हुए भी श्मशान में निवास करने के पीछे लाइफ मैनेजमेंट का एक गूढ़ सूत्र छिपा है। संसार मोह-माया का प्रतीक है जबकि श्मशान वैराग्य का। भगवान शिव कहते हैं कि संसार में रहते हुए अपने कर्तव्य पूरे करो, लेकिन मोह-माया से दूर रहो। क्योंकि ये संसार तो नश्वर है। एक न एक दिन ये सबकुछ नष्ट होने वाला है। इसलिए संसार में रहते हुए भी किसी से मोह मत रखो और अपने कर्तव्य पूरे करते हुए वैरागी की तरह आचरण करो।

8- भगवान शिव गले में क्यों धारण करते हैं नाग (Why does Lord Shiva wear a snake around his neck?)

भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनका वस्त्र व आभूषण भी उतने ही विचित्र हैं। सांसारिक लोग जिनसे दूर भागते हैं। भगवान शिव उसे ही अपने साथ रखते हैं। भगवान शिव एकमात्र ऐसे देवता हैं जो गले में नाग धारण करते हैं। देखा जाए तो नाग बहुत ही खतरनाक प्राणी है, लेकिन वह बिना कारण किसी को नहीं काटता। नाग पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण जीव है। जाने-अंजाने में ये मनुष्यों की सहायता ही करता है। कुछ लोग डर कर या अपने निजी स्वार्थ के लिए नागों को मार देते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव नाग को गले में धारण कर ये संदेश देते हैं कि जीवन चक्र में हर प्राणी का अपना विशेष योगदान है। इसलिए बिना वजह किसी प्राणी की हत्या न करें। द्वादश ज्योतिर्लिंग कथा, स्तोत्रम्  और स्थान

9- भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं भांग-धतूरा (Why is hemp-datura offered to Lord Shiva?)

भगवान शिव को भांग-धतूरा मुख्य रूप से चढ़ाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान को भांग-धतूरा चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं। भांग व धतूरा नशीले पदार्थ हैं। आमजन इनका सेवन नशे के लिए करते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के अनुसार भगवान शिव को भांग-धतूरा चढ़ाने का अर्थ है अपनी बुराइयों को भगवान को समर्पित करना। यानी अगर आप किसी प्रकार का नशा करते हैं तो इसे भगवान को अर्पित करे दें और भविष्य में कभी भी नशीले पदार्थों का सेवन न करने का संकल्प लें। ऐसा करने से भगवान की कृपा आप पर बनी रहेगी और जीवन सुखमय होगा।

10- भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं बिल्व पत्र (Why do we offer Bilva leaves to Shiva?)

शिवपुराण आदि ग्रंथों में भगवान शिव को बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व बताया गया है। 3 पत्तों वाला बिल्व पत्र ही शिव पूजन में उपयुक्त माना गया है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बिल्वपत्र के तीनों पत्ते कहीं से कटे-फटे न हो। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो बिल्व पत्र के ये तीन पत्ते चार पुरुषार्थों में से तीन का प्रतीक हैं- धर्म, अर्थ व काम। जब आप ये तीनों निस्वार्थ भाव से भगवान शिव को समर्पित कर देते हैं तो चौथा पुरुषार्थ यानी मोक्ष अपने आप ही प्राप्त हो जाता है।

11- कैलाश पर्वत क्यों है भगवान शिव को प्रिय (Why is Mount Kailash the favorite abode of Shiva?)

शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं। पर्वतों पर आम लोग नहीं आते-जाते। सिद्ध पुरुष ही वहां तक पहुंच पाते हैं। भगवान शिव भी कैलाश पर्वत पर योग में लीन रहते हैं। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो पर्वत प्रतीक है एकांत व ऊंचाई का। यदि आप किसी प्रकार की सिद्धि पाना चाहते हैं तो इसके लिए आपको एकांत स्थान पर ही साधना करनी चाहिए। ऐसे स्थान पर साधना करने से आपका मन भटकेगा नहीं और साधना की उच्च अवस्था तक पहुंच जाएगा।स्कंद पुराण के अनुसार यहाँ है भगवान शिव की आरामगाह

12- क्यों है भूत-प्रेत शिव के गण (Why are the ghosts and spirits of Lord Shiva gan?)

शिव को संहार का देवता कहा गया है। अर्थात जब मनुष्य अपनी सभी मर्यादाओं को तोडऩे लगता है तब शिव उसका संहार कर देते हैं। जिन्हें अपने पाप कर्मों का फल भोगना बचा रहता है वे ही प्रेतयोनि को प्राप्त होते हैं। चूंकि शिव संहार के देवता हैं। इसलिए इनको दंड भी वे ही देते हैं। इसलिए शिव को भूत-प्रेतों का देवता भी कहा जाता है। दरअसल यह जो भूत-प्रेत है वह कुछ और नहीं बल्कि सूक्ष्म शरीर का प्रतीक है। भगवान शिव का यह संदेश है कि हर तरह के जीव जिससे सब घृणा करते हैं या भय करते हैं वे भी शिव के समीप पहुंच सकते हैं, केवल शर्त है कि वे अपना सर्वस्व शिव को समर्पित कर दें।

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महाशिवरात्रि 2022 : धन-दौलत, संपत्ति में बढ़ोतरी के लिए आज करें ये ज्योतिषीय उपाय… https://astrodeeva.com/mahashivratri-2022-do-these-astrological-remedies-today-to-increase-wealth-and-wealth/ https://astrodeeva.com/mahashivratri-2022-do-these-astrological-remedies-today-to-increase-wealth-and-wealth/#respond Tue, 01 Mar 2022 05:44:20 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2932 आज महाशिवरात्रि का पावन पर्व है। हिंदुओं के लिए ये दिन बेहद ही खास होता है। इस दिन भक्त विशेष पूजा पाठ कर भगवान शिव की अराधना करते हैं। मान्यता है कि शिव की भक्ति की शक्ति से सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। यदि आपकी आर्थिक स्थिति कमजोर है या लाख प्रयत्न के बाद […]

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आज महाशिवरात्रि का पावन पर्व है। हिंदुओं के लिए ये दिन बेहद ही खास होता है। इस दिन भक्त विशेष पूजा पाठ कर भगवान शिव की अराधना करते हैं। मान्यता है कि शिव की भक्ति की शक्ति से सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। यदि आपकी आर्थिक स्थिति कमजोर है या लाख प्रयत्न के बाद भी तरक्की नहीं मिल पा रही है तो आज महाशिवरात्रि पर आप बताए गए ज्योतिषीय उपाय करके इन बाधाओं से मुक्ति पा सकते हैं।

मनोकामना पूर्ण करने के उपाय:  महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव को उनकी प्रिय वस्तुएं जरूर अर्पित करें। भांग, धूतरा, बेलपत्र, इत्र और भस्म भोलेनाथ को काफी प्रिय है इसलिए शिवरात्रि पूजा में इन चीजों का इस्तेमाल जरूर करें। पंचामृत से शिवलिंग का अभिषेक करें। चांदी के लोटे द्वारा जलधारा से भगवान शिव का अभिषेक करें और नम: शिवाय कहते जाएं। “ॐ पार्वतीपतये नमः” मंत्र का 108 बार जप करें।

महाशिवरात्रि के दिन बन रहा है विशेष योग, इस तरह पूजा करने से मिलता है कई गुना ज्यादा फल

आर्थिक पक्ष मजबूत करने के उपाय: मान्यता है कि शिव का दही से रुद्राभिषेक करने से संपत्ति में बढ़ोतरी होती है। गन्ने के रस से अभिषेक करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। धन प्राप्ति के लिए शिवलिंग का शहद और घी से अभिषेक भी अच्छा माना जाता है। रुके हुए धन की प्राप्ति के लिए महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव के वाहन नंदी यानी बैल को हरा चारा खिलाएं। महामृत्युंजय मंत्र का शाम के समय 108 बार जप करें।

सौभाग्य के लिए करें ये काम: दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने के लिए महाशिवरात्रि पर जरूरतमंदों की मदद करें। ऐसा करने से जीवन में सभी प्रकार की समस्याओं का अंत होगा। अगर कुंडली में ग्रहों की स्थिति कमजोर है तो महाशिवरात्रि के दिन आप शिवलिंग पर दुग्धाभिषेक करें और ओम नम: शिवाय मंत्र का जप करें। ऐसा करने से कुंडली में अशुभ ग्रह शुभ फल देने लगेंगे।

नौकरी और व्यापार में तरक्की के उपाय: अगर नौकरी या व्यापार में परेशानी चल रही है तो महाशिवरात्रि के दिन व्रत रखें और शिवलिंग पर जल में शहद मिलाकर अभिषेक करें। साथ ही अनार का फूल चढ़ाएं।

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Ganga Dussehra 2021 – गंगा दशहरा 2021 https://astrodeeva.com/ganga-dussehra-2021-%e0%a4%97%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%be-2021/ https://astrodeeva.com/ganga-dussehra-2021-%e0%a4%97%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%be-2021/#comments Sat, 19 Jun 2021 13:01:11 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2193 गंगा दशहरा(Ganga Dussehra) हिन्दू कलेंडर के अनुसार ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। गंगा दशहरा का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन गंगा स्नान से मनुष्य के समस्त पाप धुल जाते हैं। पुराणों के अनुसार, ऋषि भागीरथ के पूर्वजों की अस्तियों का विसर्जन करने के […]

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गंगा दशहरा(Ganga Dussehra) हिन्दू कलेंडर के अनुसार ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। गंगा दशहरा का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन गंगा स्नान से मनुष्य के समस्त पाप धुल जाते हैं।

पुराणों के अनुसार, ऋषि भागीरथ के पूर्वजों की अस्तियों का विसर्जन करने के लिए बहते हुए निर्मल जल की आवश्यकता पड़ी। जिसके लिए उन्होंने कड़ी तपस्या की जिससे गंगा धरती पर प्रवाहित हो सके। लेकिन माँ गंगा का भाव तेज होने के कारण वह उनकी इस इच्छा को पूर्ण नहीं कर पाई। परन्तु उन्होंने कहा कि यदि भगवान शिव मुझे अपनी जटाओं में समाकर पृथ्वी पर मेरी धारा प्रवाह कर दें तो यह संभव हो सकता है।

माँ गंगा के कथन के अनुसार भगीरथ ऋषि ने भगवान शिव की तपस्या की और उनसे गंगा को अपनी जटाओं में समाहित करने के लिए प्रार्थना की। जिसके बाद भगवान ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से भगवान शिवजी की जटाओं में गंगा को प्रवाहित कर दिया फिर भगवान शिव ने गंगा की एक धारा पृथ्वी की ओर प्रवाहित कर दी। जिसके बाद भागीरथ ने अपने पूर्वजों की अस्थियों को विसर्जित कर उन्हें मुक्ति दिलाई।गंगा जी के इसी अवतरण दिवस को गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष गंगा दशहरा 20 जून, दिन रविवार को पड़ रहा है।

गंगा दशहरा(Ganga Dussehra) के दिन करें ये उपाय 

गंगा दशहरा का शास्त्रों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होने के कारण इसदिन किया गया उपाय सदा फल देने वाला होता हैं तो आईये मैं आपको बताता हूँ कौनसे हैं वो 12 उपाय जिनको करने से हर इच्छा पूर्ण होती हैं

  1. गंगा दशहरे के दिन शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करने से और विधिवत भगवान शिव और माँ गंगा की पूजा करने से हर इच्छा पूरी होती है।
  2. गंगा दशहरे के दिन रोगी या बीमार व्यक्ति को शिवलिंग पर चढ़ा हुआ गंगाजल पिलाने से वह जल्द ही स्वस्थ हो जाता है।
  3. गंगा दशहरे के दिन शुद्ध बिस्तर पर गंगाजल का छिड़काव करने से उसपर सोने वाले व्यक्ति को कभी भी बुरे सपने नहीं आते है।
  4. गंगा दशहरे के दिन घर में गंगाजल को पीतल के लोटे में रख दें और फिर फिर उसे लाल कपड़े से बांध दें ऐसा करने से बड़े से बड़ा कर्ज समाप्त हो जाता है और धन से जुड़ी सभी परेशानियों का अंत होता है।
  5. गंगा दशहरे के दिन घर में सवा सेर चूरमा बनाकर घर के सभी सदस्यों का हाथ लगाकर शिव मंदिर में दान करने से आर्थिक स्थिति में सुधार आता है और पापों का क्षय होता है।
  6. गंगा दशहरे के दिन गंगा में या फिर घर में गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करने से व्यक्ति के सभी पापों का क्षय होता है और अंत समय में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  7. गंगा दशहरे के दिन किसी भी मंदिर या किसी योग्य ब्राह्मण को 10 वस्तुएँ दान करनी चाहिए इससे व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिल पुण्य की प्राप्ति होती है।
  8. गंगा दशहरे के दिन उपवास रखने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते है और ऐसे व्यक्ति पर माँ लक्ष्मी की कृपा सदा बनी रहती है।
  9. गंगा दशहरे के दिन से शुरूकर लगातार 11 दिन तक अपने घर में गंगाजल का छिड़काव करने से घर में वास्तुदोष दूर होता है।
  10. गंगा दशहरे के दिन 10 आम के फल किसी योग्य ब्राह्मण को दान करने से जीवन में भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है।
  11. गंगा दशहरे के दिन अपने पितरों के निमित्त कम से कम एक ब्राह्मण को भोजन अवश्य करवाना चाहिए इससे पितर प्रसन्न होकर अपना आशीर्वाद सदा बनाये रखते है।
  12. गंगा दशहरे के दिन घर में ईशान कोण या उत्तर दिशा में भगवान शिव की जटाओं से उतर रहीं देवी गंगा का चित्र लगाने से घर में कोई भी नकरात्मक शक्ति प्रवेश नहीं कर सकती और घर में रहने वाले सदस्य में सदा प्रेम बना रहता है।

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पशुपतिनाथ मंदिर – Pashupatinath Temple https://astrodeeva.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0-pashupatinath-temple/ https://astrodeeva.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0-pashupatinath-temple/#comments Mon, 18 Jan 2021 03:00:25 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1625 हिन्दू धर्म के अनुसार सारी सृष्टि त्रिदेव यानी ब्रह्मा,विष्णु और महेश से ही है। भगवान् ब्रह्मा अगर सृष्टि के रचयिता हैं तो भगवान विष्णु समस्त संसार के पालनकर्ता हैं और महेश यानि भगवान शिव को संहारक के रूप में देखा जाता हैं। जब-जब इस संसार में पाप बढ़ता हैं सभी जगह नकारात्मकता बढ़ती हैं उस […]

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हिन्दू धर्म के अनुसार सारी सृष्टि त्रिदेव यानी ब्रह्मा,विष्णु और महेश से ही है। भगवान् ब्रह्मा अगर सृष्टि के रचयिता हैं तो भगवान विष्णु समस्त संसार के पालनकर्ता हैं और महेश यानि भगवान शिव को संहारक के रूप में देखा जाता हैं।

जब-जब इस संसार में पाप बढ़ता हैं सभी जगह नकारात्मकता बढ़ती हैं उस वक़्त बुराईयों के नाश के लिए स्वयं भगवान शंकर आते हैं। भगवान शंकर को यूँ तो भोलेनाथ कहा जाता हैं, लेकिन भगवान शिव का क्रोध हर किसी को ज्ञात हैं। यदि भोलेनाथ किसी बात से नाराज़ हो जाये तो उनके क्रोध को शांत कराना लगभग असंभव कार्य होता हैं परन्तु भक्तों द्वारा की गयी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् शिव जल्दी शांत भी हो जाते हैं। यही वजह हैं कि भगवान शंकर को उनके भक्त भोलेनाथ के नाम से भी पुकारते हैं।

इस विश्व ने भगवान शंकर के अनेक प्रसिद्ध मंदिर है उन सभी मंदिरो में पशुपतिनाथ मंदिर मंदिर का सर्वोच्च स्थान है। पशुपतिनाथ (Pashupatinath) मंदिर काठमांडू (नेपाल) की राजधानी काठमांडू से तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में देवपाटन गावँ में बगमती नदी के तट स्थित है। भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित यह मंदिर नेपाल में भगवान शिव का सबसे पवित्र मंदिर है। मंदिर दुनिया भर के हिन्दू तीर्थ यात्रियों के अलावा गैर हिन्दू पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी रहा है। यह मंदिर यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में शामिल है। इस मंदिर में भारतीय पुजारियों की काफी संख्या है। सदियों से यह परंपरा रही है कि मंदिर में चार पुजारी और एक मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के ब्राह्मणों में से रखे जाते हैं। मान्यता के अनुसार मंदिर का निर्माण सोमदेव राजवंश के राजाओं ने तीसरी सदी ईसा पूर्व करवाया था। पशुपतिनाथ (Pashupatinath)मंदिर का मुख्य परिसर आखिरी बार 17वीं शताब्दी के अंत में बनाया गया था, जो दीमक के कारण जगह-जगह से नष्ट हो गया था। मूल मंदिर तो न जाने कितनी बार नष्ट हुआ, लेकिन मंदिर को नरेश भूपलेंद्र मल्ला ने 1697 में वर्तमान स्वरूप दिया।

भारतीय ग्रंथों के अनुसार पशुपतिनाथ के विषय में मान्यता है कि महाभारत युद्घ में विजय के बाद पांण्डव अपने गुरूजनों और सगे संबंधियों को मारने के बाद दुखी थे और अपने पापों से मुक्ती चाहते थे। वे भगवान श्री कृष्ण के पास गए और अपने पापों से मुक्ति का उपाय पूछा । तब भगवान श्री कृष्ण ने उनसे कहा कि भगवान शिव ही आपको पापों से मुक्त कर सकते हैं।

पशुपतिनाथ मंदिर की कथा – Katha Of Pashupatinath Temple

पशुपतिनाथ मंदिर के बारे में अनेको कथा प्रचलित है। हिन्दू ग्रंथों के अनुसार पशुपतिनाथ के विषय में मान्यता है कि महाभारत युद्घ में विजय के बाद पांण्डव अपने गुरूजनों और सगे संबंधियों को मारने के बाद दुखी थे और अपने पापों से मुक्ती चाहते थे। वे भगवान श्री कृष्ण के पास गए और अपने पापों से मुक्ति का उपाय पूछा । तब भगवान श्री कृष्ण ने उनसे कहा कि भगवान शिव ही आपको पापों से मुक्त कर सकते हैं। भगवान श्री कृष्ण के कहने पर पांण्डव शिव जी को मनाने चल पड़े। पांण्डवों द्वारा अपने गुरूओं एवं सगे-संबंधियों का वध किये जाने से भगवान शिव जी पांण्डवों से नाराज थे । गुप्त काशी( उतराखंड,भारत) में पांण्डवों को देखकर भगवान शिव वहां से विलीन हो गये और उस स्थान पर पहुंच गये जहां पर वर्तमान में केदारनाथ स्थित है।

लेकिन पांण्डव भगवान शिव को हर हाल में मनाना चाहते थे। शिव जी का पीछा करते हुए पांण्डव केदारनाथ पहुंच गये। इस स्थान पर पांण्डवों को आया हुए देखकर भगवान शिव ने एक बैल का रूप धारण किया और इस क्षेत्र में चर रहे बैलों के झुंण्ड में शामिल हो गये। पांण्डवों ने बैलों के झुंण्ड में भी शिव जी को पहचान लिया तो शिव जी बैल के रूप में ही धरती में समाने लगे। भगवान शिव को बैल के रूप में धरती में समाता देख भीम ने कमर से कसकर पकड़ लिया। पांण्डवों की सच्ची श्रद्धा को देख भगवान शिव प्रकट हुए और पांण्डवों को पापों से मुक्त कर दिया। इस बीच बैल बने शिव जी का सिर काठमांडू स्थित पशुतिनाथ में पहुंच गया। इसलिए केदारनाथ और पशुपतिनाथ को मिलाकर एक ज्योर्तिलिंग भी कहा जाता है। केदरनाथ में बैल के पीठ रूप में शिवलिंग की पूजा होती है जबकि पशुपतिनाथ में बैल के सिर के रूप में शिवलिंग को पूजा जाता है।

स्थानीय ग्रंथों के अनुसार, विशेष तौर पर नेपाल महात्म्य और हिमवतखंड के अनुसार भगवान शिव एक बार वाराणसी के अन्य देवताओं को छोड़कर बागमती नदी के किनारे स्थित मृगस्थली चले गए, जो बागमती नदी के दूसरे किनारे पर जंगल में है। भगवान शिव वहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले गए। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। कहते हैं इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में प्रकट हुए ।

पशुपतिनाथ (Pashupatinath) लिंग विग्रह में चार दिशाओं में चार मुख और ऊपरी भाग में पांचवां मुख है। प्रत्येक मुखाकृति के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल है। प्रत्येक मुख अलग-अलग गुण प्रकट करता है। पहला मुख ‘अघोर’ मुख है, जो दक्षिण की ओर है। पूर्व मुख को ‘तत्पुरुष’ कहते हैं। उत्तर मुख ‘अर्धनारीश्वर’ रूप है। पश्चिमी मुख को ‘सद्योजात’ कहा जाता है। ऊपरी भाग ‘ईशान’ मुख के नाम से पुकारा जाता है। यह निराकार मुख है। यही भगवान पशुपतिनाथ का श्रेष्ठतम मुख है।

ये भी पढ़ें: स्कंद पुराण के अनुसार यहाँ है भगवान शिव की आरामगाह

पशुपतिनाथ मंदिर का महत्व- Importance of Pashupatinath Temple

मान्यता है कि जो व्यक्ति पशुपति नाथ के दर्शन करता है उसका जन्म कभी भी पशु योनी में नहीं होता है। मान्यता यह भी है कि इस मंदिर में दर्शन के लिए जाते समय भक्तों को मंदिर के बाहर स्थित नंदी के दर्शन पहले नहीं करने चाहिए। जो व्यक्ति पहले नंदी के दर्शन करता है बाद में शिवलिंग का दर्शन करता है उसे अगले जन्म पशु योनी मिलती है।

पशुपतिनाथ मंदिर में दैनिक अनुष्ठान – Daily Ritual at Pashupatinath Temple

पशुपतिनाथ मंदिर के दैनिक अनुष्ठान इस प्रकार हैं:

  • सुबह 4:00 बजे : पश्चिम द्वार पर्यटकों के लिए खुलता है।
  • सुबह 8:30 बजे : पुजारियों के आगमन के बाद भगवान की मूर्तियों को नहलाया और साफ किया जाता है, दिन के लिए कपड़े और गहने बदल दिए जाते हैं।
  • सुबह 9:30 बजे : बाल भोग या नाश्ता प्रभु को चढ़ाया जाता है।
  • सुबह 10:00 बजे : फिर पूजा करने के इच्छुक लोगों का स्वागत किया जाता है। इसे फार्मायशी पूजा भी कहा जाता है, जिसके तहत लोग पुजारी को अपने निर्दिष्ट कारणों के लिए एक विशेष पूजा करने के लिए कहते हैं। पूजा दोपहर 1:45 बजे तक जारी रहती है।
  • 1:50 बजे : मुख्य पशुपति मंदिर में भगवान को दोपहर का भोजन चढ़ाया जाता है।
  • दोपहर 2:00 बजे : सुबह की प्रार्थना समाप्त।
  • 5:15 बजे : मुख्य पशुपति मंदिर में संध्या आरती शुरू।
  • शाम 6:00 बजे : यहां बागमती किनारे होने वाली गंगा आरती आकर्षण का केंद्र है। यह आरती ज्यादातर आप शनिवार, सोमवार और विशेष अवसरों पर ही देख सकते हैं। गंगा आरती, रावण द्वारा लिखित शिव के तांडव भजन के साथ, गंगा आरती शाम को की जाती है।
  • शाम 7:00 बजे: दरवाजा बंद हो जाता है।

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शिव पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रदोष व्रत

 

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Pradosh Vrat: प्रदोष व्रत भगवान भोलेनाथ की कृपा को प्राप्त करने के लिए सबसे उत्तम व्रत https://astrodeeva.com/pradosh-vrat-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b7-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%a8/ https://astrodeeva.com/pradosh-vrat-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b7-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%a8/#comments Thu, 10 Dec 2020 04:33:00 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1487 हिन्दू पंचांग में प्रति माह में दो बार त्रयोदशी तिथि आती है एक कृष्ण पक्ष और दूसरा  शुक्ल पक्ष में और उसी दिन प्रदोष व्रत किया जाता है। प्रदोष व्रत को प्रदोषम के नाम से भी जाना जाता है। सनातन धर्म में इस व्रत को बड़ा पवित्र व्रत माना जाता है। यह दिन भगवान् शिव […]

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हिन्दू पंचांग में प्रति माह में दो बार त्रयोदशी तिथि आती है एक कृष्ण पक्ष और दूसरा  शुक्ल पक्ष में और उसी दिन प्रदोष व्रत किया जाता है। प्रदोष व्रत को प्रदोषम के नाम से भी जाना जाता है। सनातन धर्म में इस व्रत को बड़ा पवित्र व्रत माना जाता है। यह दिन भगवान् शिव और देवी पार्वती को समर्पित है। हिन्दू पुराणो के अनुसार कलयुग में व्रत करना अति उत्तम, लाभदायक और मंगलकारी बताया गया है। प्रदोष व्रत करने से भक्त को भोलेनाथ की कृपा से उत्तम स्वास्थ्य और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

प्रदोष व्रत के नाम और उनका महत्व

सप्ताह के अलग-अलग दिन त्रयोदशी तिथि होने पर प्रदोष व्रत का नाम और फल भी भिन्न-भिन्न होता है।

रवि प्रदोष : त्रयोदशी तिथि अगर रविवार को हो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को रवि प्रदोष कहते हैं। इस प्रदोष व्रत को करने से भक्त के रोगों का नाश होता है और वो दीर्घायु होता है।

सोम प्रदोष या सौम्य प्रदोषम : त्रयोदशी तिथि अगर सोमवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को सोम प्रदोष या सौम्य प्रदोषम के नाम से जाना जाता है। सोमवार दिन शिव जी को समर्पित होने के कारण इस दिन व्रत करने से जातक की सम्पूर्ण मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।

भौम प्रदोष: त्रयोदशी तिथि अगर मंगलवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को भौम प्रदोष के नाम से जाना जाता है। उस व्रत को करने से जातक को शारीरिक और मानसिक बल प्राप्त होता है।

बुध प्रदोष: त्रयोदशी तिथि अगर बुधवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को बुध प्रदोष या बुध प्रदोषम कहते हैं। इस व्रत को करने से जातक की सभी इच्छायें पूर्ण होती है।

गुरु प्रदोष: त्रयोदशी तिथि अगर गुरुवार यानी बृहस्पतिवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को गुरु प्रदोष कहते हैं। इस व्रत को करने से जातक के शत्रुओं का नाश होता है और वो उन पर विजय प्राप्त करता है।

शुक्र प्रदोष: त्रयोदशी तिथि अगर शुक्रवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को शुक्र प्रदोष के नाम से जाना जाता है। इस व्रत को करने से जातक के सौभाग्य में व्रद्धि होती है और उसे धन-संपदा को प्राप्ति होती है।

शनि प्रदोष: त्रयोदशी तिथि अगर शनिवार को हो तो उस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को शनि प्रदोष कहते हैं। इस व्रत को करने से संतान की अभिलाषा रखने वाले जातक को संतान की प्राप्ति होती है।

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प्रदोष व्रत का महत्व

प्रदोष व्रत में भगवान शिव का रुद्राभिषेक और उनका श्रृंगार करने का बहुत ही महत्व है। प्रदोष वाले दिन महादेव की पूजा अर्चना से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। विवाह में आ रही अड़चनें दूर होती है। संतान की इच्छा रखने वाले लोगों को इस दिन पंचगव्य से महादेव का अभिषेक करना चाहिए। जिन्हें लक्ष्मी प्राप्ति और कारोबार मे सफलता की कामना हो उन्हें दूध से अभिषेक करने के बाद शिवलिंग पर फूलों की माला अर्पित करनी चाहिए। इस पूजा से उन्हें प्रत्येक काम में सफलता प्राप्त होगी।

प्रदोष व्रत की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का स्वर्गवास हो गया था। उसका अब कोई आश्रयदाता नहीं था इसलिए प्रात: होते ही वह अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल पड़ती थी। भिक्षाटन से ही वह स्वयं व पुत्र का पेट पालती थी।

एक दिन ब्राह्मणी घर लौट रही थी तो उसे एक लड़का घायल अवस्था में कराहता हुआ मिला। ब्राह्मणी दयावश उसे अपने घर ले आई। वह लड़का विदर्भ का राजकुमार था। शत्रु सैनिकों ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसके पिता को बंदी बना लिया था और राज्य पर नियंत्रण कर लिया था इसलिए वह मारा-मारा फिर रहा था। राजकुमार ब्राह्मण-पुत्र के साथ ब्राह्मणी के घर रहने लगा।

एक दिन अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा तो वह उस पर मोहित हो गई। अगले दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने लाई। उन्हें भी राजकुमार भा गया। कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को शंकर भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि राजकुमार और अंशुमति का विवाह कर दिया जाए उन्होंने वैसा ही किया।

ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करती थी। उसके व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को खदेड़ दिया और पिता के राज्य को पुन: प्राप्त कर आनंदपूर्वक रहने लगा।

राजकुमार ने ब्राह्मण-पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया। ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के महात्म्य से जैसे राजकुमार और ब्राह्मण-पुत्र के दिन फिरे, वैसे ही शंकर भगवान अपने दूसरे भक्तों के दिन भी फेरते हैं। अत: प्रदोष का व्रत करने वाले सभी भक्तों को यह कथा अवश्य पढ़नी अथवा सुननी चाहिए।

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प्रदोष व्रत पूजन विधि

स्कन्द पुराण में प्रदोष व्रत करने की सही विधि का वर्णन किया गया है। आप दो प्रकार से इस व्रत कर सकते है।

  • 24 घंटे का व्रत रखें जिसमें रात के समय जागरण भी शामिल होगा।
  • दूसरी  प्रक्रिया है सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक उपवास रखना और संध्या में शिव पूजा के पश्चात् व्रत तोडना।

व्रत के दौरान इन बातों का ध्यान रखें 

  • प्रदोष के दिन प्रात:काल नित्य कर्म से निवृत्त होकर बेलपत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप आदि चढ़ाकर शिवजी का पूजन करना चाहिए।
  • प्रदोष के पूरे दिन निराहार रहें।
  • पूरे दिन ‘ॐ नम: शिवाय’ मंत्र का मन ही मन अधिक से अधिक जप करें।
  • प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 से लेकर 7:00 बजे के बीच की जाती है।
  • त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सूर्यास्त से 3 घड़ी पूर्व शिव जी का पूजन करना चाहिए।
  • व्रतधारी को चाहिए कि पूजन से पहले शाम को दोबारा स्नान कर स्वच्छ सफेद वस्त्र धारण करें।

पूजन विधि

व्रतधारी जातक शिव मंदिर जाकर या घर में भी पूजा कर सकता हैं। वो पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार कर पूजन की सभी सामग्री एकत्रित करें। फिर कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भरकर रख लें।

इसके बाद कुश के आसन पर बैठकर शिवजी की पूजा विधि-विधान से करें और ॐ नम: शिवाय मंत्र का जाप करते हुए शिवजी का जलाभिषेक करें।

इसके बाद दोनों हाथ जो‌ड़कर शिवजी का ध्यान करें। शिवजी का ध्यान करते समय उनसे भक्ति भाव से प्रार्थना करें-

“त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्रमा का आभूषण धारण करने वाले पिंगल वर्ण के जटाजूटधारी, करोड़ों चंद्रमा के समान कांतिवान, नीले कंठ तथा अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान, वरदहस्त, त्रिशूलधारी, नागों के कुंडल पहने, व्याघ्र चर्म धारण किए हुए भगवान शिव हमारे सारे कष्टों को दूर कर सुख-समृद्धि प्रदान करें।”

इस प्रकार ध्यानमग्न होकर प्रदोष व्रत की कथा सुनें अथवा सुनाएं।

कथा समाप्ति के बाद हवन सामग्री मिलाकर “ॐ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा” मंत्र से 11 या 21 या 108 बार आहुति दें।

तत्पश्चात शिवजी की आरती करें तथा प्रसाद वितरित करके भोजन ग्रहण करें।

व्रत करने वाले व्यक्ति को कम-से-कम 11 अथवा 26 त्रयोदशी व्रत के बाद उद्यापन करना चाहिए।

सोमवती अमावस्या – महत्व और व्रत कथा

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