if ( ! function_exists( 'jnews_get_views' ) ) {
/**
* Gets views count.
*
* @param int $id The Post ID.
* @param string|array $range Either an string (eg. 'last7days') or -since 5.3- an array (eg. ['range' => 'custom', 'time_unit' => 'day', 'time_quantity' => 7])
* @param bool $number_format Whether to format the number (eg. 9,999) or not (eg. 9999)
* @return string
*/
function jnews_get_views( $id = null, $range = null, $number_format = true ) {
$attr = array(
'id' => $id,
'range' => $range,
'number_format' => $number_format,
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$query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $attr ) );
$views = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' );
if ( false === $views ) {
$views = JNews_View_Counter()->counter->get_views( $id, $range, $number_format );
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}
return $views;
}
}
if ( ! function_exists( 'jnews_view_counter_query' ) ) {
/**
* Do Query
*
* @param $instance
* @return array
*/
function jnews_view_counter_query( $instance ) {
$query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $instance ) );
$query = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' );
if ( false === $query ) {
$query = JNews_View_Counter()->counter->query( $instance );
wp_cache_set( $query_hash, $query, 'jnews-view-counter' );
}
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}
}
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]]>मौनी अमावस्या के दिन स्नान का अत्यधिक महत्त्व है। अगर संभव हो तो गंगास्नान अवश्य करना चाहिए। अगर गंगा तक जाना संभव नहीं हो तो साधारण जल में गंगाजल मिला कर स्नान करना चाहिए। मौनी अमावस्या के दिन मौन व्रत रखने का विशेष महत्त्व है। ये एक मिनट, एक घंटे या पूरे दिन – आपकी सुविधा के अनुसार कितने भी समय तक के लिए रखा जा सकता है। और अगर यदि किसी के लिये मौन रहना संभव न हो तो वह अपने विचारों में किसी भी प्रकार की मलिनता न आने दे, किसी के प्रति कोई कटुवचन न निकले तो भी मौनी अमावस्या का व्रत उसके लिये सफल होता है। कहा यह भी जाता है कि इस एक दिन समस्त देवतागण गंगा में प्रवास करते हैं इसीलिए इस दिन गंगास्नान का महत्त्व अत्यधिक होता है। और मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है की मौनी अमावस्या कि रात्रि को बुरी आत्मायें सक्रिय हो जाती है इसीलिए इस दिन रात्रि को श्मशान के नजदीक नहीं जाना चाहिए।
पौराणिक कथा के अनुसार कांचीपुरी नामक नगर में एक ब्राह्मण रहता था। उसका नाम देवस्वामी तथा उसकी पत्नी का नाम धनवती था। उनके सात पुत्र तथा एक गुणवती पुत्री थी। ब्राह्मण के सातों पुत्रों का विवाह हो चुका था और वह अपनी पुत्री के विवाह हेतु योग्य वर की तलाश कर रहा था। उसी समय एक विद्वान पंडित ने उसकी कुंडली देखकर बताया कि ये कन्या विवाह होते ही विधवा हो जाएगी। तब ब्राह्मण ने विद्वान पंडित से इसका निवारण पूछा तो उस पंडित ने बताया कि सोमा, जो एक धोबिन है जो सिंहल द्वीप में रहती है, उसकी पूजा करने से इसका वैधव्य दोष समाप्त हो जाएगा। इसीलिए उसका गुणवती के विवाह में रहना अत्यंत आवश्यक है। तब देवस्वामी ने अपने छोटे लड़के को अपनी बहन को साथ लेकर सिंहल द्वीप जाने को कहा।
अपनी बहन को लेकर उसका भाई समुद्र तट पर पहुँचा जिसके पार सिंहल द्वीप था। लेकिन उस सागर को कैसे पार किया जाये? ये सोचकर वो हताश होकर अपनी बहन के साथ एक वृक्ष की छाया में बैठ गए। उस वृक्ष पर एक विशाल गिद्ध रहता था जो जब अपने बच्चों के लिए खाना लेकर आया तो उनके बच्चों ने भोजन करने से मना कर दिया क्यूंकि उनके घर के नीचे दो प्राणी भूखे प्यासे बैठे थे। तब उस गिद्ध ने उन्हें भोजन दिया और स्वयं अपने ऊपर बिठा कर सिंहल द्वीप पहुँचा दिया।
वहाँ वे लोगों से पूछते-पूछते सोम के घर पहुँचे। सोमा अपने पति, पुत्र, बहु और पोते के साथ रहती थी। वहाँ दोनों भाई-बहन ने सोमा की बड़ी सेवा की। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर सोमा उनके साथ जाने को तैयार हो गयी। वे सोमा को लेकर वापस आये और उसकी उपस्थिति में गुणवती का विवाह हुआ। विवाह होते ही उसका पति मर गया पर सोमा ने अपने सारे संचित पुण्य के प्रभाव से उसके पति को जीवित कर दिया। फिर सबने उसका बहुत सत्कार कर धन-धान्य के साथ विदा किया। उधर उसका पुण्य समाप्त हो जाने से उसके पूरे परिवार की मृत्यु हो गयी। जब वो वापस पहुँची तो ये दृश्य देख कर रोने लगी। उस दिन मौनी अमावस्या थी। उसने अपना धैर्य नहीं खोया और वही पर लगे पीपल के पेड़ की १०८ परिक्रमाएं कर भगवान शिव और श्रीहरि की पूजा की। उनकी कृपा और सोमा की भक्ति के कारण उनके परिवार के सदस्य जीवित हो गए। तब से ही मौनी अमावस्या का व्रत रखने का विधान चल पड़ा।
मौनी अमावस्या के दिन पितृ तर्पण का भी विशेष महत्व दिया जाता है। इस दिन गंगा जी में स्नान करके पितरों का तर्पण किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन पितरों का तर्पण करने से उन्हें मुक्ति मिलती है और जिन लोगों की मृत्यु अकास्मिक होती है उनका तर्पण करने से उन्हें भी शांति प्राप्त होती है। जिन पर पितृ दोष है अगर वो इस दिन पितरों का तर्पण करते हैं तो उन्हें पितृ दोष से भी मुक्ति मिलती है। इसलिए इस दिन पितरों का तर्पण अवश्य करें।
दिनांक : 11 फरवरी 2021
वार : गुरुवार (बृहस्पतिवार)
अमावस्या तिथि प्रारम्भ : 11 फरवरी 2021 को 01:08 ए एम बजे
अमावस्या तिथि समाप्त : 12 फरवरी 2021 को 12:35 ए एम बजे
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]]>The post Somvati Amavasya : सोमवती अमावस्या – महत्व और व्रत कथा appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>अमावस्या जब सोमवार के दिन पड़ती है तो उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, सोमवती अमावस्या का एक विशेष महत्त्व है। कहते है कि पांडव इस सोमवती अमावस्या के लिए जीवन भर तरसे थे, परंतु उनके जीवन काल में यह कभी नहीं आई। इस दिन पितृ तर्पण से लेकर स्नान-दान आदि कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त रहता है। सोमवती अमावस्या पितृों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान आदि कार्यों के लिए श्रेष्ठ तिथि मानी गयी है। इस दिन पितृ दोष और कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए उपवास और पूजा की जाती है। इस दिन महिलाएँ तुलसी माता की 108 परिक्रमा लगाते हुए कोई भी वस्तु / फल दान करने का संकल्प लेतीं हैं।
सोमवती अमावस्या पर किए गए स्नान और दान का विशेष महत्व है। इस दिन मौन (मौन रहना) बहुत फलदायी होता है। देव ऋषि व्यास के अनुसार, जो मनुष्य इस दिन मौन रह कर स्नान और दान करता है उसे हजार गायों के दान के समान पुण्य मिलता हैं।
यह व्रत अटूट फल देता है। व्रत करने वाला व्यक्ति यदि पीपल के पेड़ के चारों ओर 108 बार परिक्रमा करता है और भगवान विष्णु और वृक्ष की पूजा करता है और इसके बाद, क्षमताओं के अनुसार दान करता है उस व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।
सोमवती अमावस्या के दिन पवित्र छंद की गूंज सभी दिशाओं में फैली होती है। इस दिन हजारों लोगों को हरिद्वार में डुबकी लगाते हुए देखा जा सकता है। कुरुक्षेत्र के ब्रह्म सरोवर में डुबकी लगाने से इस दिन व्यक्ति को शुभ फल मिलते हैं। सूर्योदय से सूर्यास्त तक, लोगों की भीड़ को पवित्र नदी में स्नान करते देखा जा सकता है।
जब महाभारत युद्ध के मैदान में भीष्म पितामह शर-शैय्या पर पड़े हुए थे। उस समय युधिष्ठर भीष्म पितामह से पश्चाताप करने लगे और धर्मराज कहने लगे। हे पितामह! दुर्योधन की हठ के कारण हम पंडवो से सारे कुरू वंश का नाश हो गया है। वंश का नाश देखकर मेरे हृदय में दिन रात संताप रहता है। हे पितामह! अब आप ही बताइये कि मैं क्या करू, कहाँ जाऊँ, जिससे हमें शीघ्र ही चिरंजीवी संतति प्राप्त हो। पितामह ने कहा, हे! धर्मराज युधिष्ठर मैं तुम्हें व्रतों में शिरोमणि व्रत बतलाता हूँ जिसके करने एवं स्नान करने मात्र से चिरंजीवी संतान एवं मुक्ति प्राप्त होगी। वह है व्रतराज सोमवती अमावस्या का व्रत। धर्मराज ने कहा, पितामह कृपया इस व्रतराज के बारे में विस्तार से बताइये ये सोमवती कौन है? और इस व्रत को किसने शुरू किया।
भीष्म जी ने कहा- एक कांची नाम की नगरी थी, वहाँ देवस्वामी नामक ब्राह्मण निवास करता था उसके सात पुत्र एवं गुणवती नाम की कन्या थी। एक दिन ब्राह्मण भिक्षुक भिक्षा माँगने आया। देवस्वामी की सातों बहुओं ने अलग-अलग भिक्षा दी और सौभाग्यवती होने का आर्शीवाद पाया। अंत में गुणवती ने भिक्षा दी। भिक्षुक ब्राह्मण ने उसे धर्मवती होने का आर्शीवाद दिया और कहा- यह कन्या विवाह के समय सप्तपदी( सात फेरो) के बीच ही विधवा हो जायेगी इसलिए इसे धर्माचरण ही करना चाहिए। गुणवती की माँ धनवती ने गिड़गिड़ाते हुए दीन स्वर में कहा- हे ब्राह्मण! हमारी पुत्री के इस दोष को मिटाने का उपाय कहिए। तब वह भिक्षुक कहने लगा- हे पुत्री! यदि तेरे घर सौमा आ जाए तो उसके पूजन मात्र से ही तेरी पुत्री का वैधव्य( विधवापन ) मिट सकता है। गुणवती की माँ ने कहा कि पण्डित जी यह सौमा कौन है? कहाँ निवास करती है? विस्तार से बताइये। भिक्षु कहने लगा- भारत के दक्षिण में समुद्र के बीच एक द्वीप है जिसका नाम सिंहल द्वीप है। वहाँ पर एक कीर्तिमान धोबी निवास करता है। उस धोबी के यहाँ सौमा नाम की स्त्री है, वह तीनों लोकों में अपने सत्य के कारण पतिव्रत धर्म से प्रकाश करने वाली सती है। उसके सामने भगवान एवं यमराज को भी झुकना पड़ता है। तुम उसे अपने घर ले आओ तो आपकी बेटी का वैधव्य मिट जाएगा।
यह सुन देवस्वामी का सबसे छोटे पुत्र अपनी बहिन को साथ लेकर सिंघल द्वीप के लिए निकल पड़ा । रास्ते में समुद्र के समीप रात्रि में गृद्धराज के यहाँ विश्राम किया। सुबह होते ही उस गृद्धराज ने उन्हें सिंघलद्वीप पहुँचा दिया और वे सौमा के घर के समीप ही ठहर गये। इसके बाद वह दोनों भाई बहिन प्रात: काल के समय उस धोबी की पत्नी सोमा के घर की चौक को साफ़ कर उसे प्रतिदिन लीप पोत कर सुन्दर बनाते थे। ऐसे करते करते उन्हें एक साल बीत गया। इस प्रकार की स्वच्छता को देखकर सोमा ने विस्मित हो कर अपने पुत्रों एवं पुत्रवधुओं से पूछा कि यहाँ कौन झाडू लगाकर लीपा पोती करता है, उन्होंने कहा हमें नहीं मालूम और न ही हमने किया है। तब उस धोबिन ने रात में छिपकर पता किया तो ज्ञात हुआ कि एक लड़की आँगन में झाडू लगा रही है और एक लड़का उसे लीप रहा है। सौमा धोबिन ने उन दोनों को पूछा की आप कौन है और ऐसा क्यों कर रहे हैं? देवस्वामी के पुत्र ने कहा हम दोनों भाई बहन ब्राह्मण हैं। यह गुणवती मेरी बहिन है इसके विवाह के समय सप्तवदी के बीच वैधव्य योग पड़ा है। आप के पास रहने से वैधव्य योग का नाश हो सकता है इसलिए हम यह दास कर्म कर रहे हैं। सोमा ने कहा तुम्हारे इस तरह कार्य करने से मुझे घोर पाप लगा है। विप्र मैं धोबिन हूँ आप ब्राह्मण हैं कृपा कर आगे से ऐसा मत करना मैं तुम्हारे साथ चलूँगी।
सोमा ने अपनी वधुओं से कहा मैं इनके साथ जा रही हूँ यदि इस बीच हमारे घर में कोई अनहोनी हो जाए और किसी की मृत्यु हो जाए तो जब तक मैं लौटकर न आ जाऊँ तब तक उसका क्रिया कर्म मत करना और उसके शरीर को सुरक्षित रखना। ऐसा कह सोम दोनों ब्राह्मण भाई बहन को लेकर समुद्र मार्ग से होकर कांची नगरी में पहुँच गयी। सोमा को देखकर धनवती ने प्रसन्न हो उसकी पूजा अर्चना की और अपनी पुत्री की विवाह का आयोजन करा। सोमा की मौजूदगी विवाह के दौरान सप्तसदी के बीच वर की मृत्यु हो गयी। बहिन को विधवा जानकर सारे घरवाले रोने लगे किन्तु सोमा शांत रही। सोमा ने अपने सती पन से वर को जीवित कर दिया। जब उस ब्राह्मण ने चमत्कार देखा तो वह सोमा के चरणों में गिर गया धूप, दीप, पुष्प, कपूर से सोमा की आरती की और कहा तुम सर्वशक्तिमान हो युगों-युगों तक आपकी पूजा यह ब्राह्मण वंश करेगा। जो उपकार आपने किया है वह भुलाने योग्य नहीं है आपके साथ-साथ आपके वंश की जो सतियां आपके चरित्र का अनुसरण करेंगी उसकी आपकी ही भाँति युगों-युगों तक पूजा होगी।
उसी बीच उस सोमा के घर में पहले उसके लड़को की मर्त्यु हो गयी फिर उसका पति मरा फिर उसका जमाता भी मर गया। सोमा ने अपने सत्य से सारी स्थिति जान ली और वह बिना देर किए घर को चल दी। उस दिन सोमवार का दिन था और अमावस्या की तिथि भी थी, रास्ते में सोमा ने नदी के किनारे स्थित एक पीपल के पेड़ के पास जाकर नदी में स्नान किया और विष्णु भगवान की पूजा करके शक्कर हाथ में लेकर 108 प्रदाक्षिणाऐं पूरी की। भीष्म जी बोले जब सोमा ने हाथ में शक्कर लेकर 108वीं प्रदक्षणा पूरी की तभी उसके पति जमाता और पुत्र भी सभी जीवित हो गये और वह नगर लक्ष्मी से परिपूर्ण हो गया। विशेष कर उसका घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। चारों ओर हर्षोल्लास छा गया। भीष्म जी कहने लगे यदि सोमवार युक्त अमावस्या अर्थात सोमवती अमावस्या हो तो पुण्यकाल देवताओं को भी दुर्लभ है। तुम भी यह व्रत धारण करो तुम्हारा कल्याण हो जाएगा।
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