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सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या (Somvati Amavasya 2022) कहा जाता है। सोमवार का दिन चंद्र देवता कों समर्पित है, चंद्र देव को मन का कारक माना जाता है अतः इस दिन अमावस्या पड़ने का अर्थ है की यह दिन मन सम्बन्धित दोषो को दूर करने के लिए उत्तम है। हमारे शास्त्रो में चंद्रमा को ही दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टो का कारक माना जाता है, इसलिए पूरे वर्ष में एक या दो बार ही पड़ने  वाले ऐसा संयोग का बहुत अधिक महत्त्व माना जाता है।

सोमवती अमावस्या कलयुग के कल्याणकारी पर्वो में से एक है,लेकिन सोमवती अमावस्या को अन्य अमावस्याओं से अधिक पुण्य कारक मानने के पीछे भी पौराणिक एवं शास्त्रीय कारण है। सोमवार को भगवन शिव एवं चंद्र का दिन माना जाता है। शास्त्रो के अनुसार सोमवती अमावस्या के दिन चन्द्रमा का अमृतांश पृथ्वी पर सबसे अधिक पड़ता है।

अमावस्या अमा और वस्या दो शब्दों से मिलकर बना है। शिव पुराण में इस संधि विच्छेद को भगवान् शिव ने माँ पार्वती को समझाया था। क्योंकि सोम को अमृत भी कहा जाता है अमा का अर्थ है एकत्रित करना और वास को वस्या कहा गया है। यानि जिसमे सभी वास करते हो वह अति पवित्र अमावस्या कहलाती है यह भी कहा जाता है की सोमवती अमावस्या में भक्तो को अमृत की प्राप्ति होती है।

सोमवती अमावस्या की तिथि एवं बन रहे संयोग(Somvati Amavasya 2022 Dates)

दिनांक : 30 मई 2022
वार : सोमवार
अमावस्या तिथि प्रारम्भ – 29 मई 2022 को दोपहर 02 बजकर 54 मिनट से
अमावस्या तिथि समाप्त – 30 मई 2022 को शाम 04 बजकर 59 मिनट तक

इस वर्ष सोमवती अमावस्या (Somvati Amavasya 2022) का पर्व बेहद खास माना जा रहा है क्यों कि इसी दिन शनि जयंती और वट सावित्री का त्योहार भी मनाया जा रहा है।ऐसा संयोग तकरीबन 30 साल बाद बन रहा है। इस दौरान शनि देव अपनी राशि कुंभ में रहेंगे और सर्वार्थ सिद्धि योग भी बनेगा।

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सोमवती अमावस्या कथा

सोमवती अमावस्या से सम्बंधित अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। परंपरा है कि सोमवती अमावस्या के दिन इन कथाओं को विधिपूर्वक सुना जाता है।

कांचीपुरी में देवस्वामी नामक एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम धनवती था। उनके सात पुत्र तथा एक पुत्री थी। पुत्री का नाम गुणवती था। ब्राह्मण ने सातों पुत्रों को विवाह करके बेटी के लिए वर खोजने अपने सबसे बड़े पुत्र को भेजा।

उस लड़की में समय के साथ सभी स्त्रियोचित गुणों का विकास हो रहा था। लड़की सुन्दर, संस्कारवान एवं गुणवान भी थी, लेकिन गरीब होने के कारण उसका विवाह नहीं हो पा रहा था। एक दिन ब्राह्मण के घर साधु पधारे जो कि कन्या के सेवाभाव से काफी प्रसन्न हुए। और कन्या का हाथ देखने के विचार रखे। हाथ देखकर उन्होंने बताया कि कन्या के हथेली में विवाह योग्य रेखा नहीं है।

कन्या को लम्बी आयु का आशीर्वाद देते हुए साधू ने कहा की “सप्तपदी होते-होते यह कन्या विधवा हो जाएगी।” तब उस ब्राह्मण ने साधु से पूछा- “पुत्री के इस वैधव्य दोष का निवारण कैसे होगा?”

साधू ने कुछ देर विचार करने के बाद अपनी अंतर्दृष्टि से ध्यान करके बताया कि “सोमा का पूजन करने से वैधव्य दोष दूर होगा। उसका निवास स्थान सिंहल द्वीप है। उसे जैसे-तैसे प्रसन्न करो और गुणवती के विवाह से पूर्व उसे यहाँ बुला लो।

सोमा बहुत ही आचार- विचार और संस्कार संपन्न तथा पति परायण है। यदि यह कन्या उसकी सेवा करे और वह महिला इसकी शादी में अपने मांग का सिन्दूर लगा दे, उसके बाद इस कन्या का विवाह हो तो इस कन्या का वैधव्य योग मिट सकता है। साधू ने यह भी बताया कि वह महिला कहीं आती जाती नहीं है।

यह बात सुनकर ब्राह्मणि ने अपनी बेटी से धोबिन कि सेवा करने कि बात कही। कन्या तडके ही उठ कर सोमा धोबिन के घर जाकर, सफाई और अन्य सारे कार्य करके अपने घर वापस आ जाती। सोना धोबिन अपनी बहू से पूछती है कि तुम तो तडके ही उठकर सारे काम कर लेती हो और पता भी नहीं चलता। बहू ने कहा कि माँजी मैंने तो सोचा कि आप ही सुबह उठकर सारे काम ख़ुद ही ख़तम कर लेती हैं। मैं तो देर से उठती हूँ। इस पर दोनों सास बहू निगरानी करने लगी कि कौन है जो तडके ही घर का सारा काम करके चला जाता हा।

कई दिनों के बाद धोबिन ने देखा कि एक कन्या अंधेरे घर में आती है और सारे काम करने के बाद चली जाती है। जब वह जाने लगी तो सोमा धोबिन उसके पैरों पर गिर पड़ी, पूछने लगी कि आप कौन है और इस तरह छुपकर मेरे घर की चाकरी क्यों करती हैं। तब कन्या ने साधू द्बारा कही गई सारी बात विस्तार से बताई।

सोमा धोबिन पति परायण थी, उसमें तेज था। वह तैयार हो गई। सोमा धोबिन के पति थोड़ा अस्वस्थ थे। उसने अपनी बहू से अपने लौट आने तक घर पर ही रहने को कहा। सोमा धोबिन ने जैसे ही अपने मांग का सिन्दूर कन्या की मांग में लगाया, उसके पति गुजर गए । उसे इस बात का पता चल गया। वह घर से निराजल ही चली थी, यह सोचकर की रास्ते में कहीं पीपल का पेड़ मिलेगा तो उसे भँवरी देकर और उसकी परिक्रमा करके ही जल ग्रहण करेगी, उस दिन सोमवती अमावस्या थी। ब्रह्मण के घर मिले पूए- पकवान की जगह उसने ईंट के टुकडों से 108 बार भँवरी देकर 108 बार पीपल के पेड़ की परिक्रमा की और उसके बाद जल ग्रहण किया। ऐसा करते ही उसके पति के मुर्दा शरीर में कम्पन होने लगा। कहते हैं कि जो भी व्यक्ति इस व्रत को करता है उसे अनन्त फल की प्राप्ति होती है।

 

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