if ( ! function_exists( 'jnews_get_views' ) ) { /** * Gets views count. * * @param int $id The Post ID. * @param string|array $range Either an string (eg. 'last7days') or -since 5.3- an array (eg. ['range' => 'custom', 'time_unit' => 'day', 'time_quantity' => 7]) * @param bool $number_format Whether to format the number (eg. 9,999) or not (eg. 9999) * @return string */ function jnews_get_views( $id = null, $range = null, $number_format = true ) { $attr = array( 'id' => $id, 'range' => $range, 'number_format' => $number_format, ); $query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $attr ) ); $views = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' ); if ( false === $views ) { $views = JNews_View_Counter()->counter->get_views( $id, $range, $number_format ); wp_cache_set( $query_hash, $views, 'jnews-view-counter' ); } return $views; } } if ( ! function_exists( 'jnews_view_counter_query' ) ) { /** * Do Query * * @param $instance * @return array */ function jnews_view_counter_query( $instance ) { $query_hash = 'query_hash_' . md5( serialize( $instance ) ); $query = wp_cache_get( $query_hash, 'jnews-view-counter' ); if ( false === $query ) { $query = JNews_View_Counter()->counter->query( $instance ); wp_cache_set( $query_hash, $query, 'jnews-view-counter' ); } return $query; } } tulsi Archives - हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव https://astrodeeva.com/tag/tulsi/ Daily Dose of Astrology Mon, 31 Jan 2022 05:20:44 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0 https://astrodeeva.com/wp-content/uploads/2022/03/cropped-Logo-32x32.png tulsi Archives - हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव https://astrodeeva.com/tag/tulsi/ 32 32 Somvati Amavasya : सोमवती अमावस्या – महत्व और व्रत कथा https://astrodeeva.com/somvati-amavasya-%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%ae%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5/ https://astrodeeva.com/somvati-amavasya-%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%ae%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5/#respond Wed, 09 Dec 2020 08:32:42 +0000 https://astrodeeva.com/?p=1483 हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की पंद्रहवी तिथि को अमावस्या होती है। यह एक महत्वपूर्ण दिन होता है क्योंकि कई धार्मिक कृत्य केवल अमावस्या तिथि के दिन ही किये जाते हैं। अमावस्या जब सोमवार के दिन पड़ती है तो उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, सोमवती […]

The post Somvati Amavasya : सोमवती अमावस्या – महत्व और व्रत कथा appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.

]]>
हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की पंद्रहवी तिथि को अमावस्या होती है। यह एक महत्वपूर्ण दिन होता है क्योंकि कई धार्मिक कृत्य केवल अमावस्या तिथि के दिन ही किये जाते हैं।

अमावस्या जब सोमवार के दिन पड़ती है तो उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, सोमवती अमावस्या का एक विशेष महत्त्व है। कहते है कि पांडव इस सोमवती अमावस्या के लिए जीवन भर तरसे थे, परंतु उनके जीवन काल में यह कभी नहीं आई। इस दिन पितृ तर्पण से लेकर स्नान-दान आदि कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त रहता है। सोमवती अमावस्या पितृों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान आदि कार्यों के लिए श्रेष्ठ तिथि मानी गयी है। इस दिन पितृ दोष और कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए उपवास और पूजा की जाती है। इस दिन महिलाएँ तुलसी माता की 108 परिक्रमा लगाते हुए कोई भी वस्तु / फल दान करने का संकल्प लेतीं हैं।

सोमवती अमावस्या का महत्व

सोमवती अमावस्या पर किए गए स्नान और दान का विशेष महत्व है। इस दिन मौन (मौन रहना) बहुत फलदायी होता है। देव ऋषि व्यास के अनुसार, जो मनुष्य इस दिन मौन रह कर  स्नान और दान करता है उसे हजार गायों के दान के समान पुण्य मिलता हैं।

यह व्रत अटूट फल देता है। व्रत करने वाला व्यक्ति यदि पीपल के पेड़ के चारों ओर 108 बार परिक्रमा करता है और भगवान विष्णु और वृक्ष की पूजा करता है और इसके बाद,  क्षमताओं के अनुसार दान करता है उस व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।

सोमवती अमावस्या के दिन पवित्र छंद की गूंज सभी दिशाओं में फैली होती है। इस दिन  हजारों लोगों को हरिद्वार में डुबकी लगाते हुए देखा जा सकता है। कुरुक्षेत्र के ब्रह्म सरोवर में डुबकी लगाने से इस दिन व्यक्ति को शुभ फल मिलते हैं। सूर्योदय से सूर्यास्त तक, लोगों की भीड़ को पवित्र नदी में स्नान करते देखा जा सकता है।

सोमवती अमावस्या व्रत कथा

जब महाभारत युद्ध के मैदान में भीष्म पितामह शर-शैय्या पर पड़े हुए थे। उस समय युधिष्ठर भीष्म पितामह से पश्चाताप करने लगे और धर्मराज कहने लगे। हे पितामह! दुर्योधन की हठ के कारण हम पंडवो से सारे कुरू वंश का नाश हो गया है। वंश का नाश देखकर मेरे हृदय में दिन रात संताप रहता है। हे पितामह! अब आप ही बताइये कि मैं क्या करू, कहाँ जाऊँ, जिससे हमें शीघ्र ही चिरंजीवी संतति प्राप्त हो। पितामह ने कहा, हे! धर्मराज युधिष्ठर मैं तुम्हें व्रतों में शिरोमणि व्रत बतलाता हूँ जिसके करने एवं स्नान करने मात्र से चिरंजीवी संतान एवं मुक्ति प्राप्त होगी। वह है व्रतराज सोमवती अमावस्या का व्रत। धर्मराज ने कहा, पितामह कृपया इस व्रतराज के बारे में विस्तार से बताइये ये सोमवती कौन है? और इस व्रत को किसने शुरू किया।

भीष्म जी ने कहा- एक कांची नाम की नगरी थी, वहाँ देवस्वामी नामक ब्राह्मण निवास करता था उसके सात पुत्र एवं गुणवती नाम की कन्या थी। एक दिन ब्राह्मण भिक्षुक भिक्षा माँगने आया। देवस्वामी की सातों बहुओं ने अलग-अलग भिक्षा दी और सौभाग्यवती होने का आर्शीवाद पाया। अंत में गुणवती ने भिक्षा दी। भिक्षुक ब्राह्मण ने उसे धर्मवती होने का आर्शीवाद दिया और कहा- यह कन्या विवाह के समय सप्तपदी( सात फेरो) के बीच ही विधवा हो जायेगी इसलिए इसे धर्माचरण ही करना चाहिए। गुणवती की माँ धनवती ने गिड़गिड़ाते हुए दीन स्वर में कहा- हे ब्राह्मण! हमारी पुत्री के इस दोष को मिटाने का उपाय कहिए। तब वह भिक्षुक कहने लगा- हे पुत्री! यदि तेरे घर सौमा आ जाए तो उसके पूजन मात्र से ही तेरी पुत्री का वैधव्य( विधवापन ) मिट सकता है। गुणवती की माँ ने कहा कि पण्डित जी यह सौमा कौन है? कहाँ निवास करती है? विस्तार से बताइये। भिक्षु कहने लगा- भारत के दक्षिण में समुद्र के बीच एक द्वीप है जिसका नाम सिंहल द्वीप है। वहाँ पर एक कीर्तिमान धोबी निवास करता है। उस धोबी के यहाँ सौमा नाम की स्त्री है, वह तीनों लोकों में अपने सत्य के कारण पतिव्रत धर्म से प्रकाश करने वाली सती है। उसके सामने भगवान एवं यमराज को भी झुकना पड़ता है। तुम उसे अपने घर ले आओ तो आपकी बेटी का वैधव्य मिट जाएगा।

ये भी पढ़ें: उत्पन्ना एकादशी – प्रथम एकादशी व्रत, महत्व, कथा और विधि

यह सुन देवस्वामी का सबसे छोटे पुत्र अपनी बहिन को साथ लेकर सिंघल द्वीप के लिए निकल पड़ा । रास्ते में समुद्र के समीप रात्रि में गृद्धराज के यहाँ विश्राम किया। सुबह होते ही उस गृद्धराज ने उन्हें सिंघलद्वीप पहुँचा दिया और वे सौमा के घर के समीप ही ठहर गये। इसके बाद वह दोनों भाई बहिन प्रात: काल के समय उस धोबी की पत्नी सोमा के घर की चौक को साफ़ कर उसे प्रतिदिन लीप पोत कर सुन्दर बनाते थे। ऐसे करते करते उन्हें एक साल बीत गया। इस प्रकार की स्वच्छता को देखकर सोमा ने विस्मित हो कर अपने पुत्रों एवं पुत्रवधुओं से पूछा कि यहाँ कौन झाडू लगाकर लीपा पोती करता है, उन्होंने कहा हमें नहीं मालूम और न ही हमने किया है। तब उस धोबिन ने रात में छिपकर पता किया तो ज्ञात हुआ कि एक लड़की आँगन में झाडू लगा रही है और एक लड़का उसे लीप रहा है। सौमा धोबिन ने उन दोनों को पूछा की आप कौन है और ऐसा क्यों कर रहे हैं? देवस्वामी के पुत्र ने कहा हम दोनों भाई बहन ब्राह्मण हैं। यह गुणवती मेरी बहिन है इसके विवाह के समय सप्तवदी के बीच वैधव्य योग पड़ा है। आप के पास रहने से वैधव्य योग का नाश हो सकता है इसलिए हम यह दास कर्म कर रहे हैं। सोमा ने कहा तुम्हारे इस तरह कार्य करने से मुझे घोर पाप लगा है। विप्र मैं धोबिन हूँ आप ब्राह्मण हैं कृपा कर आगे से ऐसा मत करना मैं तुम्हारे साथ चलूँगी।

सोमा ने अपनी वधुओं से कहा मैं इनके साथ जा रही हूँ यदि इस बीच हमारे घर में कोई अनहोनी हो जाए और किसी की मृत्यु हो जाए तो जब तक मैं लौटकर न आ जाऊँ तब तक उसका क्रिया कर्म मत करना और उसके शरीर को सुरक्षित रखना। ऐसा कह सोम दोनों ब्राह्मण भाई बहन को लेकर समुद्र मार्ग से होकर कांची नगरी में पहुँच गयी। सोमा को देखकर धनवती ने प्रसन्न हो उसकी पूजा अर्चना की और अपनी पुत्री की विवाह का आयोजन करा। सोमा की मौजूदगी विवाह के दौरान सप्तसदी के बीच वर की मृत्यु हो गयी। बहिन को विधवा जानकर सारे घरवाले रोने लगे किन्तु सोमा शांत रही। सोमा ने अपने सती पन से वर को जीवित कर दिया। जब उस ब्राह्मण ने चमत्कार देखा तो वह सोमा के चरणों में गिर गया धूप, दीप, पुष्प, कपूर से सोमा  की आरती की और कहा तुम सर्वशक्तिमान हो युगों-युगों तक आपकी पूजा यह ब्राह्मण वंश करेगा। जो उपकार आपने किया है वह भुलाने योग्य नहीं है आपके साथ-साथ आपके वंश की जो सतियां आपके चरित्र का अनुसरण करेंगी उसकी आपकी ही भाँति युगों-युगों तक पूजा होगी।

उसी बीच उस सोमा के घर में पहले उसके लड़को की मर्त्यु हो गयी फिर उसका पति मरा फिर उसका जमाता भी मर गया। सोमा ने अपने सत्य से सारी स्थिति जान ली और वह बिना देर किए घर को चल दी। उस दिन सोमवार का दिन था और अमावस्या की तिथि भी थी, रास्ते में सोमा ने नदी के किनारे स्थित एक पीपल के पेड़ के पास जाकर नदी में स्नान किया और विष्णु भगवान की पूजा करके शक्कर हाथ में लेकर 108 प्रदाक्षिणाऐं पूरी की। भीष्म जी बोले जब सोमा ने हाथ में शक्कर लेकर 108वीं प्रदक्षणा पूरी की तभी उसके पति जमाता और पुत्र भी सभी जीवित हो गये और वह नगर लक्ष्मी से परिपूर्ण हो गया। विशेष कर उसका घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। चारों ओर हर्षोल्लास छा गया। भीष्म जी कहने लगे यदि सोमवार युक्त अमावस्या अर्थात सोमवती अमावस्या हो तो पुण्यकाल देवताओं को भी दुर्लभ है। तुम भी यह व्रत धारण करो तुम्हारा कल्याण हो जाएगा।

सोमवती अमावस्या की पूजा विधि  

  • सोमवती अमावस्या के दिन ब्रह्ममुहूर्त में गंगा जी में स्नान करना चाहिए। यदि गंगा जी जाना संभव न हो तो प्रात:काल किसी नदी या सरोवर आदि में स्नान करके भगवान शंकर, पार्वती और तुलसी की भक्तिपूर्वक पूजा करें। यदि यह भी संभव नही हो तो घर में ही पवित्र नदियों का स्मरण करते हुए स्नान करें और उसके बाद साफ वस्त्र धारण करने चाहिए।
  • एक साफ चौकी पर भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्थापित करें।
  • इसके बाद उन्हें चंदन का तिलक लगाएं और उन्हें पीले फूलों की माला, पीले फूल और ऋतुफल आदि अर्पित करके उनकी विधिवत पूजा करें।
  • भगवान विष्णु की विधि विधान से पूजा कर सोमवती अमावस्या की कथा पढ़े या सुनें और भगवान विष्णु की धूप व दीप से आरती उतारें।
  • इसके बाद भगवान विष्णु को पीली मिठाई का भोग लगाएं और अपने पितरों का तर्पण भी करें। इसके साथ ही उनके नाम से दान दक्षिणा भी दें।

 

The post Somvati Amavasya : सोमवती अमावस्या – महत्व और व्रत कथा appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.

]]>
https://astrodeeva.com/somvati-amavasya-%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%ae%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5/feed/ 0
Vastu: घर में समृद्धि लानी है तो लगाएँ ये पेड़ -पौधे https://astrodeeva.com/vastu-%e0%a4%98%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%83%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%bf-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%a4%e0%a5%8b/ https://astrodeeva.com/vastu-%e0%a4%98%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%83%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%bf-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%a4%e0%a5%8b/#respond Mon, 14 Sep 2020 10:03:55 +0000 https://astrodeeva.com/?p=725 क्या आप जानते हैं की पेड़ -पौधों का हमारे जीवन में शुभ -अशुभ असर भी होता है ओर कौन से पौधे शुभ होते हैं?  हमारे जीवन में पेड़- पौधों का महत्व हमें बचपन से बताया जाता है | पेड़ पौधे हमें ऑक्सीजन के साथ साथ फल-फूल , जड़ी बूटी और लकड़ी भी देते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार अगर घर में […]

The post Vastu: घर में समृद्धि लानी है तो लगाएँ ये पेड़ -पौधे appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.

]]>
क्या आप जानते हैं की पेड़ -पौधों का हमारे जीवन में शुभ -अशुभ असर भी होता है ओर कौन से पौधे शुभ होते हैं? 

हमारे जीवन में पेड़- पौधों का महत्व हमें बचपन से बताया जाता है | पेड़ पौधे हमें ऑक्सीजन के साथ साथ फल-फूल , जड़ी बूटी और लकड़ी भी देते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार अगर घर में शुभ पेड़-पौधों को सही स्थान पर लगाया जाए तो यह आप की किस्मत के द्वार खोल देते हैं।

यदि पौधे का स्थान उचित जगह न हो तो ये अशुभ परिणाम भी देते है और कई पेड़ पौधों को तो घर के आस –पास होना ही अशुभ समझा जाता है | वेसे तो घर मे दूध और फल देने वाले पौधे नहीं लगाने चाहिए पर नारंगी और अनार इसमे शामिल नहीं हैं हलाकी इनमे भी फल आते है पर इनको लगाने से किसी की बुरी नजर आपके घर पर नहीं लगती है |

 घर मे गुड़हल ,शमी ,नारंगी ,अनार ,बेल ,केले , अशोक, नींबू ,आंबला,आम ,नीम सुख स्मरधी को बड़ाने के काम आते है इनमे सबसे जरूरी है तुलसी जो न सिर्फ एक औषधि हे अपितु भगवान विष्णु की अति प्रिय होने के साथ साथ वेकुनठ के द्वार भी खोलती है कहते है की रोज शाम को तुलसी के नीचे घी का दीपक जलाने से घर मे महालक्ष्मी जी का निवास बना रहता है | 

The post Vastu: घर में समृद्धि लानी है तो लगाएँ ये पेड़ -पौधे appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.

]]>
https://astrodeeva.com/vastu-%e0%a4%98%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%83%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%bf-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%a4%e0%a5%8b/feed/ 0
गणेश पूजा में तुलसी क्यों वर्जित हैं ? https://astrodeeva.com/%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82/ https://astrodeeva.com/%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82/#comments Tue, 25 Aug 2020 12:29:21 +0000 https://astrodeeva.com/?p=553 हिन्दू धर्म प्रकृति से जुड़ा धर्म है। इस धर्म में कई पेड़-पौधों को देवी-देवताओं जैसा माना जाता है और उन की पूजा भी की जाती है, उन सब पेड़-पौधों में तुलसी को सबसे पवित्र माना गया हैं और इस की पूजा भी की जाती हैं। हर हिन्दू देवता की पूजा में तुलसी को चढ़ाने की […]

The post गणेश पूजा में तुलसी क्यों वर्जित हैं ? appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.

]]>
हिन्दू धर्म प्रकृति से जुड़ा धर्म है। इस धर्म में कई पेड़-पौधों को देवी-देवताओं जैसा माना जाता है और उन की पूजा भी की जाती है, उन सब पेड़-पौधों में तुलसी को सबसे पवित्र माना गया हैं और इस की पूजा भी की जाती हैं। हर हिन्दू देवता की पूजा में तुलसी को चढ़ाने की प्रथा हैं। विष्णु जी को तुलसी समर्पित करने से विशेष फल की प्राप्ति होती हैं। परंतु क्या आप जानते हैं की गणेश जी को तुलसी चढ़ना वर्जित है और इसे अशुभ माना जाता है।

पौराणिक कथा :

कथा के अनुसार एक बार तुलसी जी भ्रमण कर रहीं थी। भ्रमण करते-करते वो गंगा जी के तट के समीप पहुँची जहाँ भगवान गणेश तपस्या में लीन थे। उनके तेज को देख कर तुलसी बहुत प्रभावित हुई और उन्होंने गणेश जी से विवाह करने का मन बनाय और गणेश जी की तपस्या पूर्ण होने तक वहाँ इंतज़ार किया। जब गणेश जी की तपस्या पूर्ण हुई तो अपनी 

इस इच्छा को तुलसी ने गणेश जी के सामने विनय पूर्वक रखा और कहा “हे देव! मैं उचित वर प्राप्ति की कामना लेकर बहुत काल से भटक रही हूँ। आज आपको देख कर लगा कि मेरी तपस्या पूर्ण हुई। आपका ये तेजस्वी रूप देख कर मैंने मन ही मन आपको अपना पति मान लिया है इसीलिए कृपा कर मुझे अपनी भार्या के रूप में स्वीकार करें।”

गणेश जी उस समय विवाह नहीं करना चाहते थे इस लिए तुलसी की इस इच्छा को सुन कर उन्हें समझ नहीं आया कि क्या उत्तर दें, इसी कारण गणेश जी ने बड़ी मधुरता से कहा “हे देवी! आप अद्वितीय सौंदर्य की धनी हैं और आप का सौंदर्य देखकर मैं भी अभिभूत हूँ। विश्व में कदाचित ही कोई ऐसा होगा जो आपके अपनी भार्या के रूप में स्वीकार  ना करे। किन्तु आप कृपया मुझे क्षमा करें क्यूँकि मैं अभी विवाह नहीं कर सकता।“ इस वचन को सुन तुलसी जी ने कहा “हे देव! अगर आप अभी विवाह नहीं करना चाहते तो में आप की प्रतीक्षा करूँगी” तब गणेश जी ने विनम्रता से कहा “हे देवी! आप मेरी बात नहीं समझी। मैं ब्रह्मचारी हूँ इसलिए मैं विवाह नहीं कर सकता। अत: आप मुझे क्षमा करें और अपने योग्य कोई अन्य वर ढूँढ लें।“

यह सुन तुलसी को अति दुःख हुआ और वो दुखी मन से वहाँ से वापिस लौट गयी। थोड़ी दूर जाने के बाद तुलसी को नारद देव मिले, तुलसी से उन्हें प्रणाम किया। तुलसी को उदास देख कर देवर्षि नारद ने कहा – “हे देवी! आप उदास क्यों हैं?” इसपर तुलसी ने देवर्षि नारद को पूरी बात बतायी। बात सब देवर्षि नारद हसने लगे और कहा “हे देवी, आप भोली हैं और किन की बात में आ गयी? सत्य तो ये है कि वे ब्रह्मचारी नहीं हैं। उन्होंने आपसे ठिठोलि की हैं।“

देवर्षि नारद का यह कथन सुन तुलसी को बहुत क्रोध आया। वो गणेश जी के पास वापस लौटी और कहा “हे देव! मैं आप से सच्चे मन से विवाह करना चाहती थी किन्तु आप ने असत्य कहकर मेरा मज़ाक़ बनाया और मेरी निष्ठा का अपमान किया। मैं आप को श्राप देती हूँ की आप एक विवाह से बच रहें हैं, अब आप की इच्छा के विरूद्ध आप के दो विवाह होंगे।“ इस श्राप को पा कर गणेश जी भी क्रोधित हो गए और उन्होंने भी तुलसी को श्राप दे दिया कि उसका विवाह एक राक्षस के साथ होगा और उस का वध अल्प काल में महादेव भगवान शंकर के हाथों से होगा। यह सुन तुलसी को बहुत पछतावा हुआ और उस ने भगवान गणेश जी से क्षमा याचना की। तब गणेश जी ने कहा “हे देवी! मेरा श्राप विफल नहीं हो सकता किन्तु मैं आपको वरदान देता हूँ कि अगले जन्म में आप को नारायण की पत्नी बनने का सौभाग्य प्राप्त होगा और कलयुग में तुम्हें पूजा जाएगा एवं तुम मनुष्य के मोक्ष प्राप्ति में सहायक होगी। परन्तु मेरी पूजा में तुम्हारा प्रयोग वर्जित होगा।

भगवान गणेश और तुलसी को अपना-अपना श्राप भोगना पड़ा। गणेश जी का विवाह रिद्धि और सिद्धि से हुआ। तुलसी का विवाह शंखचूड(जलंधर) नामक राक्षक से हुआ जिसका वध महादेव के हाथों से हुआ। अगले जन्म में तुलसी अपनी राख से एक पौधे के रूप में उत्पन हुई और उन का विवाह नारायण के रूप शालिग्राम से हुआ। 

The post गणेश पूजा में तुलसी क्यों वर्जित हैं ? appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.

]]>
https://astrodeeva.com/%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82/feed/ 2